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कॉन्ग्रेसी महिला ने पूछा – फिर से किसे वोट दोगे – 82% ने कहा, ‘मोदी-मोदी’; खुद की पार्टी को सिर्फ 12%

कॉन्ग्रेस के चोटी के नेता तो दूर की बात, उसके आम सदस्य भी अभी तक इस सच्चाई को स्वीकारने की बजाय कि देश की जनता उनकी रीति-नीति को सिरे से नकार चुकी है, बार-बार इसी का प्रदर्शन कर रहे हैं कि वे बस मोदी से नाराज़गी के बल-बूते सत्ता में वापसी का ख्वाब पाले बैठे हैं। इसका सबूत है कॉन्ग्रेस की सदस्या और सोशल मीडिया एक्टिविस्ट ऐंड्रिया “रिया” डिसूज़ा का वह ट्विटर-पोल, जिसमें सवाल पूछा गया है कि देश में पिछले कुछ दिनों में जो कुछ हुआ है, उसे देखते हुए अगर उन्हें फिर से अपना वोट देने का मौका मिले तो किसे वोट देना चाहेंगे। बाकायदा विकल्प भी दिए गए कॉन्ग्रेस, भाजपा, नोटा और अन्य पार्टियों में।

इस ‘मध्यावधि चुनाव’ का नतीजा वही निकला जो कोई भी इंसान बिना देखे, सड़क पर रोक कर भी आप पूछिए तो बता देगा। इस सर्वे में भाजपा 82% वोट लेकर विजयी रही, और कॉन्ग्रेस महज़ 12% मत ही जुटा पाई। झुठलाने को इसे भी “IT सेल वालों ने रेड मार दी” कहकर झुठलाने की भरसक कोशिश की गई, ठीक उसी तरह जैसे कॉन्ग्रेस दीवार पर लिखी लोकसभा नतीजों की इबारत को आखिरी समय तक EVM पर सवाल उठाकर झुठलाने की कोशिश करती रही। जैसे राहुल गाँधी के खुद ही नतीजों की जिम्मेदारी लेकर इस्तीफ़ा देने (जो उनके राजनीतिक करियर के चुनिंदा अनुकरणीय लमहों में से है) के बाद भी कॉन्ग्रेसी आज तक राहुल गाँधी के अलावा हर किसी को हार के ज़िम्मेदार ठहरा कर सच्चाई झुठलाते ही रहे हैं।

विकल्पहीन एंटी-इंकम्बेंसी पंचतंत्र वाले अंडकोष जैसी है

पंचतंत्र में एक कहानी है, जिसमें सियार दंपत्ति सांड के अंडकोषों को पक कर बस गिरने ही जा रहे माँस-पिण्ड समझकर अपनी बनी-बनाई शिकार को छोड़ कर सांड के पीछे भटकने लगते हैं। वे सांड का न जाने कब तक पीछा यही सोच कर करते रहते हैं कि अंडकोष अब गिरे-तब गिरे। अंत में हार कर जब वे वापस लौटते हैं तो पता चलता है कि नदी किनारे की उनकी शिकार की जगह पर किसी और शिकारी ने कब्ज़ा कर लिया है। कॉन्ग्रेस पार्टी वही सियार दंपत्ति है।

कॉन्ग्रेस के पूरे लोकसभा चुनाव अभियान में साफ दिखा कि वह अपना कोई वैकल्पिक, सकारात्मक नीतिगत विकल्प (‘न्याय’ जैसी वाहियात योजनाओं के अलावा) लाने की बजाय केवल “कुछ-न-कुछ प्रतिशत जनता तो मोदी से इतनी नाराज़ होगी ही कि हमें वोट दे बैठे” के भरोसे थी। इसीलिए उसकी 52 सीटें भी बहुत लोगों को बहुत ज़्यादा ही लगीं। इस पोल से साफ़ पता चल रहा है कि यही उम्मीद अभी भी जारी है- कब मोदी कोई बड़ी गलती करे, और कब हमें बैठे-ठाले उससे नाराज़ लोगों के वोट मिलें!

विकल्पहीन एंटी-इंकम्बेंसी कितनी खोखली होती है, भाजपा यह जानती है। इसकी भुक्तभोगी रह चुकी है। 2008 के 26/11 हमलों के कुछ ही समय बाद हुए चुनावों में वह इसी तरह हारी थी- लालकृष्ण आडवाणी ने अपना चुनाव अभियान बिना किसी रीति-नीति के केवल 26/11 के वक्त की गई मनमोहन सरकार की चूकों के लिए जनता की नाराज़गी के भरोसे ही टिका रखा था, इसलिए वह भी झटका खाए, और पार्टी भी। लेकिन हैरानी की बात है कि 2009 में दुश्मन की हार की कीमत पर मिला यह सबक न कॉन्ग्रेस को 2019 चुनावों के पहले समझ में आया था, न ही लग रहा है कि अभी भी समझ में आया है।

मंदिर का प्रसाद चाहिए तो AADHAAR कार्ड दिखाओ, MP के मंदसौर में जिला कलेक्टर का फरमान

मध्य प्रदेश के मंदसौर स्थित चर्चित पशुपतिनाथ मंदिर में भंडारे के लिए आधार कार्ड अनिवार्य कर दिया गया है। प्रशासन ने ऐसा स्थानीय लोगों को भंडारे से दूर रखने के लिए किया है। इस तरह भंडारे के लिए आधार कार्ड अनिवार्य करने वाला यह देश का पहला मंदिर बन गया है।

दरअसल, मंदिर की प्रबंध समिति ने कलेक्टर मनोज पुष्प के आदेश पर बाहर से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए 1 अगस्त 2019 से नियमित भंडारे की व्यवस्था की थी। जानकारी के मुताबिक, 1500 साल पुरानी अष्टमुखी प्रतिमा के दर्शन के लिए सामान्य दिनों में रोजाना देशभर से औसतन 300 से 500 लोग पहुँचते हैं और पूरे सावन महीने में 1 लाख से अधिक श्रद्धालु यहाँ आते हैं। इन श्रद्धालुओं को ध्यान में रखकर भंडारे की व्यवस्था की गई थी, लेकिन बाहर से आए श्रद्धालुओं को इसका फायदा नहीं मिल पा रहा था।

मंदिर समिति के प्रबंधक राहुल रुनवाल का कहना है कि भंडारे में 300 लोगों के लिए बना भोजन रोज डेढ़ घंटे में ही खत्म होने लगा। जब मंदिर समिति ने पड़ताल की तो पता चला कि आसपास के स्थानीय लोग ही भोजन चट कर जाते हैं। कुछ लोगों ने तो अपने घरों में खाना ही बनाना बंद कर दिया है। इसके बाद मंदसौर के जिलाधिकारी मनोज पुष्प के आदेश पर भंडारा (प्रसाद) का आनंद लेने के लिए आधार कार्ड को अनिवार्य कर दिया गया।

यह व्यवस्था लागू होने के बाद मंदिर में भोजन करने वाले लोगों की संख्या आधी रह गई है। कलेक्टर मनोज पुष्प ने बताया कि फ्री भोजन व्यवस्था बाहरी श्रद्धालुओं के लिए है। इसका लाभ स्थानीय लोग लेने लगे थे। इससे व्यवस्था बिगड़ रही थी। उन्होंने बताया कि अगर किसी के पास आधार कार्ड नहीं है तो वो अपने साथी का आधार कार्ड भी दिखा सकता है। साथ ही जिलाधिकारी का कहना है कि आस-पास के लोग मंदिर के भंडारा का लाभ उठा सकते हैं, लेकिन उनकी वजह से मंदिर में भीड़ हो जाती है और दूर से आए श्रद्धालु इस सेवा का लाभ नहीं उठा पाते हैं। इसलिए आधार कार्ड का प्रवाधान लाया गया है। 

हालाँकि, मध्य प्रदेश के जनसंपर्क विभाग के प्रवक्ता ने मंदिर में भंडारे का लाभ उठाने के लिए किसी भी तरह के कार्ड की अनिवार्यता या आवश्यकता को नकार दिया है। उन्होंने बताया कि बाहर से आने वाले तीर्थयात्री और श्रद्धालुओं को नि:शुल्क भोजन कराने की व्यवस्था की गई है। प्रत्येक दिन श्रद्धालुओं की उपस्थिति को देखते हुए भोजन का प्रबंध किया जाता है। उन्होंने बताया कि श्रद्धालुओं को सुबह 11 बजे से 2 बजे के बीच और शाम को 6 बजे से 9 बजे तक भोजन कराया जाता है।   

मदरसे में चल रहा था 15 अगस्त का प्रोग्राम, कपड़े बदलते लड़कियों को CCTV में देख रहा था टीचर सुलेमान

मदरसों के अंदर बड़े पैमाने पर बाल शोषण के कई मामले सामने आए हैं। ऐसी ही एक शर्मसार कर देने वाली घटना उत्तर प्रदेश के कुशीनगर की है। यहाँ मदरसे के एक शिक्षक ने छात्राओं को कपड़े बदलते हुए देखने के लिए मदरसे में लगे CCTV कैमरों का इस्तेमाल किया।

ख़बर के अनुसार, बरवन छतर दास गाँव के मुस्तफा दारुल उलूम मदरसा में हुए इस घृर्णित कृत्य की रिपोर्ट हाटा थाना क्षेत्र के अंतर्गत की गई है। दरअसल, मदरसे में बीते 15 अगस्त को सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किया गया था। मदरसे में पढ़ने वाली छात्राओं ने इन कार्यक्रमों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था। सुरजीत सिंह, पवन सिंह, सुबोध गौड़, किशन सिंह आदि द्वारा पुलिस को दी गई तहरीर के मुताबिक़, सांस्कृतिक कार्यक्रम में भाग लेने वाली छात्राएँ मदरसे के जिस कमरे में कपड़े बदल रही थीं, उस कमरे का सीसीटीवी कैमरा अध्यापक सुलेमान अंसारी ने चालू कर दिया।

ग्रामीणों के अनुसार, सुलेमान अंसारी काफ़ी देर तक कैमरा चालू करके छात्राओं को कपड़े बदलते देखता रहा। उसकी इस हरक़त पर जब एक बच्चे की नज़र पड़ी तो उसने इसकी सूचना छात्राओं को दे दी। इसके वाद वो सभी छात्राएँ सुलेमान अंसारी के पास पहुँची और विरोध जताया। इस पर अंसारी ने उन्हें डराया-धमकाया कि अगर उन्होंने इस बात पर विरोध प्रकट किया तो वो मदरसे से उनका नाम काट देगा और उन्हें मदरसे से बाहर निकाल देगा।

इस बात की ख़बर जब छात्राओं के परिजनों और आसपास के ग्रामीणों को लगी तो उन्होंने सुलेमान अंसारी के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल दिया और उन्होंने उससे अपने किए की माफ़ी माँगने को कहा। बजाए अपनी ग़लती मानने के सुलेमान अंसारी झगड़े पर उतारू हो गया। इसके बाद ग्रामीणों ने उसके ख़िलाफ़ मामला दर्ज करवाया। इस मामले में स्थानीय पुलिस ने सुलेमान अंसारी और मदरसे के प्रबंधन के ख़िलाफ़ आईपीसी की धारा-354 ग के तहत मुक़दमा दर्ज किया है।

‘2 सितंबर तक CBI की गिरफ्त में ही रहने दो’ – क्यों पलटे चिदंबरम, तिहाड़ जेल का क्या है इसमें कनेक्शन?

कुछ दिन पहले तक सीबीआई की पकड़ से बचने के लिए तरह-तरह की युक्तियाँ जुगाड़ने वाले पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने एक आप्रत्याशित आवेदन के जरिए 2 सितंबर तक खुद सीबीआई की गिरफ्त में रहने की इच्छा जताई है।

जानकारी के अनुसार आज शुक्रवार (30 अगस्त) को उनकी सीबीआई रिमांड में रहने की 8 दिन की अवधि खत्म हो गई है। जिसके बाद उनकी पेशी निचली अदालत में होनी है। कहा जा रहा है कि उन्हें पेशी के बाद सीबीआई रिमांड पर न भेजकर सीधे तिहाड़ में डाला जाएगा, जिससे बचने के लिए वह उपाय खोज रहे हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो चिदंबरम का कहना है कि जब तक सुप्रीम कोर्ट सीबीआई रिमांड पर भेजने के आदेश के खिलाफ उनकी याचिका पर सुनवाई नहीं कर लेती तब तक वह सीबीआई कस्टडी में ही रहना चाहते हैं। हालाँकि, उनकी इस बात पर सर्वोच्च न्यायालय ने उन्हें कहा है कि वह अपनी बात को निचली अदालत में रखें। जबकि मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक सॉलिसिटर तुषार मेहता ने उनके इन ऑफर का पुरजोर विरोध किया है। उन्होंने पूछा है कि सर्वोच्च न्यायालय इस मामले में क्यों दखल दे? ये तो स्पेशल कोर्ट को तय करना चाहिए कि किसे कब तक हिरासत में रखना है और कब न्यायिक हिरासत में भेजना है।

गौरतलब है कि सोमवार को यानी 2 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट में पी चिदंबरम को सीबीआई रिमांड में भेजने के लिए निचली अदालत के फैसले के ख़िलाफ़ डाली गई याचिका पर सुनवाई होनी है। जिसका पी चिदंबरम और उनके वकील इंतजार करने को कह रहे हैं। लेकिन आज सीबीआई रिमांड के लिए माँग बढ़ाने की बात करने वाले चिदंबरम और उनके वकील कपिल सिब्बल की ये माँग इसलिए सवालिए घेरे में है क्योंकि अभी कुछ दिन पहले सिब्बल कोर्ट में इस बात पर बिफर गए थे कि सीबीआई चिदंबरम की 5 दिन की कस्टडी क्यों बढ़वा रही है। उन्होंने इस दौरान कहा था कि उनके मुवक्किल को हिरासत में रखने की कोई जरूरत नहीं हैं क्योंकि उनसे बार-बार एक ही सवाल पूछे जा रहे हैं। और ऐसा सिर्फ उन्हें नीचा दिखाने के लिए किया जा रहा है।

‘मुझे PCC चीफ बनाओ वरना मेरे पास और भी विकल्प हैं’ – सिंधिया का अल्टीमेटम, मुश्किल में कॉन्ग्रेस

मध्य प्रदेश में कॉन्ग्रेस के सामने एक नई समस्या आ गई है। वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने पार्टी हाईकमान को उन्हें मध्य प्रदेश इकाई का प्रमुख बनाने का अल्टीमेटम दे डाला है। उन्होंने अपने इस अल्टिमेटम में कॉन्ग्रेस को चेताया है कि अगर उनके इस अल्टीमेटम को जल्द से जल्द अमल में न लाया गया तो वो अन्य विकल्प के बारे में सोचेंगे। यहाँ अन्य विकल्प का मतलब पार्टी बदलने से है। सिंधिया के इस अल्टीमेटम से राजनीतिक गलियारे में अटकलें तेज़ हो गई हैं कि वो बीजेपी के साथ लगातार सम्पर्क में हैं।

पिछले साल, मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव जीत के बाद ऐसा अनुमान लगाया जा रहा था कि मुख्यमंत्री बनने के बाद कमलनाथ राज्य इकाई प्रमुख का पद छोड़ देंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। उन्होंने सीएम और प्रदेश कॉन्ग्रेस कमिटी (PCC) प्रमुख – दोनों पदों पर क़ब्ज़ा जमाए रखा। इस संदर्भ में बातचीत के बावजूद, श्री सिंधिया को उप मुख्यमंत्री नामित नहीं किया गया।

दिलचस्प बात यह है कि 2019 के लोकसभा चुनावों में, श्री सिंधिया गुना के अपने परिवार के गढ़ से हार गए थे। इतने के बाद भी सिंधिया को लगता है कि पार्टी की ओर से उन्हें कुछ प्राप्त होना चाहिए। हाल ही में, पार्टी ने उन्हें महाराष्ट्र में आगामी विधानसभा चुनावों के लिए स्क्रीनिंग कमिटी का अध्यक्ष नियुक्त किया। लेकिन, सिंधिया की नज़र मध्य प्रदेश के पीसीसी प्रमुख के पद पर टिकी रहीं। पिछले हफ्ते, राज्य की एक मंत्री, सुश्री इमरती देवी ने सिंधिया का समर्थन करते हुए कहा था कि श्री सिंधिया को राज्य इकाई प्रमुख नियुक्त किया जाना चाहिए।

बता दें कि मध्य प्रदेश में इस पद के दावेदार केवल सिंधिया ही नहीं हैं बल्कि कॉन्ग्रेस के पूर्व दिग्गज नेता अर्जुन सिंह के बेटे अजय सिंह भी इस कतार में खड़े हैं। अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह उनका समर्थन कर रहे हैं। इन सबके मद्देनज़र राज्य इकाई में संभावित बदलाव को लेकर जल्द ही कॉन्ग्रेस के शीर्ष नेतृत्व के साथ मुख्यमंत्री कमलनाथ की बैठक होने की उम्मीद है।

सिख लड़की ने मर्जी से क़बूला इस्लाम और किया निकाह या… 2:17 मिनट का वीडियो देख खुद फैसला कीजिए

पाकिस्तान में हिंदू लड़कियों के जबरन धर्मांतरण और निक़ाह की ख़बरों के बाद अब एक सिख लड़की को जबरन इस्लाम क़बूल करवाने का मामला सामने आया है। पाकिस्तान के ननकाना साहिब गुरुद्वारा तंबी साहिब के एक ग्रन्थि (सिख पुजारी) की बेटी पिछले तीन दिनों से लापता थी। इसके बाद गुरुवार (29 अगस्त) को लड़की के धर्मांतरण और निक़ाह की बात सामने आई।

दरअसल, अगवा (लड़की के परिवार वालों द्वारा लगाए गए आरोप के अनुसार) की गई सिख लड़की के निक़ाह का एक वीडियो सामने आया है, जिसमें वो साफ़तौर पर डरी-सहमी दिख रही है। वो इसलिए क्योंकि अपनी शादी के अवसर पर एक लड़की के चेहरे पर जो ख़ुशी का भाव होता है, वो उसके चेहरे से ग़ायब है। भले ही इस वीडियो में उसका चेहरा सामने है, लेकिन अल्फ़ाज़ उसके नहीं हैं। इस वीडियो में एक मौलवी उसे उसके इस्लामी नाम आइशा से बुलाता नज़र आ रहा है।

इस मामले पर शिरोमणि अकाली दल के विधायक मनजिंदर सिंह सिरसा ने गुरुवार को एक वीडियो शेयर किया। इस वीडियो में लड़की के मजबूर परिजन पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान से मदद की गुहार लगाते दिख रहे हैं। इस वीडियो में आप देख सकते हैं कि मनमोहन सिंह नाम का एक शख़्स जो ख़ुद को लड़की का भाई बता रहा है, उसने कहा कि उसकी बहन को धमकी दी गई थी कि अगर उसने इस्लाम क़बूल नहीं किया तो उसके भाई और पिता को गोली मार दी जाएगी।

लड़की के भाई ने आगे कहा कि वो पाकिस्तान के प्रधानमंत्री और आर्मी चीफ़ (क़मर जावेद) बाजवा से गुजारिश करते हैं कि लड़की को वापस लाने में हमारी मदद करें। इस वीडियो को शेयर करते हुए सिरसा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विदेश मंत्री एस जयशंकर से संयुक्त राष्ट्र में वैश्विक स्तर पर इस मुद्दे को उठाने का आग्रह किया है।

मनजिंदर सिंह सिरसा द्वारा शेयर किए एक अन्य वीडियो में लड़की के भाई सुरेंद्र सिंह ने बताया कि रात के समय उनकी छोटी बहन को गुंडे घसीटकर ले गए, ज़बरदस्ती इस्लाम क़बूल करवाया। इस मामले को लेकर जब परिजन पुलिस स्टेशन गए तो वहाँ उनकी न तो किसी ने कोई बात ही सुनी और न ही किसी तरह की कोई मदद की। 

घर आने पर वही गुंडे वापस उनके घर आए और उन्हें डराया-धमकाया और उन्हें कोई कार्रवाई न करने के लिए कहा। ऐसा न करने पर सभी को इस्लाम क़बूल करवाने की धमकी दी गई। सुरेंद्र सिंह ने इमरान ख़ान और चीफ़ जस्टिस से इंसाफ़ की माँग की और कहा कि अगर उनकी छोटी बहन को सुरक्षित वापस नहीं लाया गया तो वो 31 अगस्त को गवर्नर हाउस के सामने पूरे परिवार के साथ आत्मदाह कर लेगा।


भैंस चुराने गए थे आरिफ, इसरार और कलुआ; असफल होने पर गुस्से में 10 साल की बच्ची संग किया गैंगरेप

उत्तर प्रदेश के एटा जिले में पुलिस ने एक नाबालिग के अपहरण और बाद में उसके साथ सामूहिक दुष्कर्म करने के आरोप में 3 पशु चोरों को गिरफ्तार किया है। तीनों आरोपितों की पहचान आरिफ खान, इसरार और कलुआ के रूप में हुई। तीनों के ख़िलाफ़ पुलिस ने आईपीसी धारा 376 (डी) (सामूहिक दुष्कर्म), धारा 363 (अपहरण के लिए दंड) और पॉक्सो एक्ट के तहत मामला दर्ज किया है।

टाइम्स ऑफ इंडिया में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक पुलिस ने बताया कि तीनों आरोपितों ने बच्ची का अपहरण 25 अगस्त को उसके घर के बाहर से किया था। बच्ची उस समय अपनी बहन के साथ घर के खुले क्षेत्र में सो रही थी जो सड़क के सामने था। अपहरण करने के बाद ये तीनों उसे खेत में लेकर गए और फिर बच्ची के साथ बलात्कार किया।

एटा जिले के एसपी सुनील कुमार सिंह के मुताबिक, “शुरू में इन तीनों का मकसद बच्ची के घर की भैंस चुराना था, जिसके लिए वह पहले भी वहाँ जाकर मुआयना कर चुके थे, लेकिन जब ये भैंसों को चुराने पहुँचे तो इन्हें वहाँ भैंसे नहीं मिली क्योंकि वो बच्ची के चाचा के खलिहान में बँधी थीं। गुस्से में इन तीनों ने बच्ची को चारपाई से उठाया और नजदीक के खेत में ले जाकर उसका बलात्कार किया।”

पुलिस के मुताबिक घरवालों को बच्ची के साथ हुई घटना के बारे में उस समय पता चला जब वह खून से लथपथ वापस घर लौटी। घरवालों ने लड़की के गुप्तांगों से खून बहता देखकर तुरंत उसे पास के सामुदायिक स्वास्थ्य सेंटर में भर्ती करवाया और साथ ही पुलिस को इस घटना की सूचना दी। पुलिस ने मामले की जाँच शुरू की। इसी बीच बच्ची को उसके इलाज के लिए अलीगढ़ भेज दिया गया।

पुलिस ने बताया कि अब तक उन्हें अपनी जाँच में एक खून से सना कंबल और एक रस्सी बरामद हुई है, जिसे पशु चोर भैंस चुराने के लिए अपने साथ लाए थे। अब आरोपितों की गिरफ्तारी के बाद पुलिस आगे की जाँच में इनके वीर्य की फॉरेंसिक जाँच कराएगी ताकि आरोपों की पुष्टि हो सके।

वैसे बता दें कि गुरुवार को जालेसर के सीओ गुरमीत सिंह ने बच्ची से मिलने के बाद बताया है कि बच्ची की हालत स्थिर है, वह अपने साथ हुई घटना के बारे में भी बता पा रही है। इसलिए अब आरोपितों की पहचान जल्द ही बच्ची से करवाई जाएगी।

जम्मू कश्मीर में आतंकियों ने ली एक और नागरिक की जान, पुंछ जिले के स्कूल पर भी की गई गोलीबारी

जम्मू कश्मीर में आतंकियों की कायराना हरकत जारी है। आतंकियों ने एक बार फिर से श्रीनगर के नागरिक को निशाना बनाया और गुरूवार (अगस्त 29, 2019) देर रात गुलाम मोहम्मद नाम के एक दुकानदार की गोली मारकर हत्या कर दी। अधिकारियों के मुताबिक, 65 वर्षीय गुलाम मोहम्मद जब रात में अपनी दुकान बंद कर रहे थे, तभी कुछ लोग मोटरसाइकिल पर आए और उन पर ताबड़तोड़ गोलियाँ चला दी।

जम्मू-कश्मीर पुलिस के मुताबिक, गुलाम मोहम्मद को तुरंत नजदीकी अस्पताल ले जाया गया, जहाँ इलाज के दौरान उन्होंने दम तोड़ दिया। सुरक्षा बलों द्वारा आतंकवादियों को पकड़ने के लिए तलाशी भी शुरू कर दी गई है। वहीं, इस घटना के बाद इलाके में सुरक्षा व्यवस्था को और भी ज्यादा बढ़ा दिया गया है।

नवभारत टाइम्स में प्रकाशित खबर का स्क्रीनशॉट

जम्मू कश्मीर पर हर तरफ से मिल रही हार से बौखलाए पाकिस्तान ने गुरुवार को एक बार फिर से सीजफायर का उल्लंघन कर अपने नापाक इरादे को अंजाम दिया। इस बार पुंछ जिले के मेंढर सेक्टर में एक स्कूल पर गोलाबारी की गई। इस फायरिंग की वजह से बच्चे स्कूल में ही फँस गए। जवाब में भारतीय सेना ने भी जमकर गोलाबारी की। 

गौरतलब है कि इससे पहले दक्षिण कश्मीर के अनंतनाग के बिजबेहरा इलाके में रविवार (अगस्त 25, 2019) को पत्थरबाजों ने सेना का जवान समझकर एक ट्रक ड्राइवर की बर्बरता से हत्या कर दी थी। मृतक की पहचान 42 वर्षीय नूर मोहम्मद डार के रूप में हुई थी। नूर मोहम्मद देर शाम ट्रक लेकर वापस घर लौट रहा था कि तभी वहाँ मौजूद कुछ पत्थरबाजों की नजर उस पर पड़ी। पत्थरबाजों ने उसके ट्रक को सुरक्षाबल की गाड़ी और उसे जवान समझ लिया। इसके बाद उन्होंने नूर पर पत्थरबाजी शुरू कर दी, जिससे उनकी जान चली गई।

‘मुल्लों से आज हर कोई डरता है’: रेप के अड्डे बने मदरसे, मुँह खोलने पर 19 साल की नुसरत को जलाकर मारा डाला

इसी साल जून में केरल के कोट्टायम जिले के एक मदरसे में पढ़ाने वाला 63 साल का मौलाना गिरफ्तार किया गया। 19 से ज्यादा बच्चों के यौन शोषण के आरोप में। गिरफ्तारी के बाद उसने कबूला कि वह 25 साल की उम्र से ही बच्चों को हवस का शिकार बना रहा था। कल्पना कीजिए बीते 38 साल में कितने बच्चे उस ​दरिंदे का शिकार बने होंगे। यदि 19 बच्चों के परिजनों ने हिम्मत न दिखाई होती तो उसका यह चेहरा कभी दुनिया के सामने आ ही नहीं पाता। इतना ही नहीं इस मौलाना की माने तो वह ऐसा इसलिए कर रहा था, क्योंकि बचपन में उसका यौन शोषण भी उसे पढ़ाने वाले मौलाना ने किया था।

अब दक्षिण से उत्तर भारत आइए। उत्तर प्रदेश के मेरठ के खेरी कलाँ गाँव से मदरसे का हाफिज 12 साल की नाबालिग से दुष्कर्म के आरोप में गिरफ्तार किया जाता है। इसी प्रदेश के कानपुर के एक मदरसे में 16 साल की लड़की के साथ मौलवी रेप करता है। यूपी के ही हापुड़ में भी एक मदरसे में नाबालिग बच्ची से रेप होता है। मौलाना तब पकड़ा जाता है जब बच्ची के गर्भवती होने की बात सामने आती है।

दुष्कर्म के मामलों में मौलवियों की गिरफ्तारी की देश की हालिया चुनिंदा घटनाओं की याद केवल इसलिए दिलाई, क्योंकि पड़ोसी बांग्लादेश मदरसों के यौन शोषण के अड्डे में बदलने से उबल रहा है। वो तो बांग्लादेश के मदरसों से पढ़े कुछ छात्रों की हिम्मत की दाद दीजिए कि वे अपनी आपबीती सोशल मीडिया के जरिए दुनिया को सुना रहे हैं और मदरसों का छिपा चेहरा सामने आ रहा है। वरना भारत हो या बांग्लादेश या फिर पाकिस्तान हर मुल्क के मदरसों की हकीकत करीब-करीब एक जैसी ही है। बच्चों के यौन शोषण का अड्डा बनने की। और मुल्लों का खौफ ऐसा है कि कुछ ही मामले सामने आ पाते हैं। ज्यादातर दबा दिए जाते हैं।

ऐसा हम नहीं कह रहे। पाकिस्तान के मानवाधिकार मामलों के वकील सैफ उल मुल्क की बातों पर गौर फरमाइए। उनके मुताबिक- मुल्लों से आज हर कोई डरता है। उन पर यौन दुर्व्यवहार का आरोप लगाने का मतलब है कि न्याय दुर्लभ बन जाएगा। पुलिस भी पीड़ितों की नहीं मुल्लाओं की ही मदद करती है।

खौफ कैसा है? दबाव कितना भयानक होता है? जानना है तो बांग्लादेश ही चलते हैं, क्योंकि अभी वहीं के मदरसे सुर्खियाँ बटोर रहे हैं। ढाका मेडिकल कॉलेज में 6 अप्रैल को 80 फीसदी जल चुकी नुसरत जहाँ राफी लाई जाती है। 10 अप्रैल को वह मर जाती है। 19 साल की राफी ने 27 मार्च को पुलिस से शिकायत की थी कि मदरसे के प्रिंसिपल ने ऑफिस में बुला उसे गलत तरीके से छुआ। उसने मदरसे के प्रिंसिपल पर बार-बार यौन शोषण का आरोप लगाया। मदरसे के अन्य शिक्षकों ने भी राफी को ही मुँह बंद रखने को कहा। उस पर शिकायत वापस लेने का दबाव डाला जाता है। 6 अप्रैल की रात नुसरत को मदरसे की छत पर बुलाया जाता है। शिकायत वापस लेने को कहा जाता है। वह इनकार कर देती है। हमलावर मिट्टी का तेल उड़ेल उसे आग लगा देते हैं।

नुसरत की हत्या के तीन आरोपी उसके साथ पढ़ते थे। पुलिस के मुताबिक मौलवी ने कहा था कि शिकायत वापस लेने का दबाव डालो, नहीं माने तो मार डालो। योजना तो उसकी हत्या को आत्महत्या की तरह दिखाने की थी। लेकिन ऐसा हो नहीं पाया, क्योंकि नुसरत के हाथ-पैर को जिस स्कार्फ से बाँधा गया था वह जल गया और वह सीढ़ियों से नीचे उतरने में कामयाब रही।

नुसरत मर गई। पर जाते-जाते बांग्लादेश के लोगों की गैरत को जगा गई। सड़कों पर प्रदर्शन का सिलसिला शुरू हो गया। प्रधानमंत्री शेख हसीना को कार्रवाई का वादा करना पड़ा। नुसरत की मौत से जली मशाल ने कुछ पूर्व छात्रों को अपनी आपबीती लेकर दुनिया के सामने आने को प्रेरित किया, जिसके कारण मदरसों में होने वाली यौन ज्यादतियों की आज चर्चा हो रही है।

यौन शोषण की ​हिला देने वाली जो दास्तानें सोशल मीडिया के जरिए सामने आ रही हैं, सबमें एक चीज कॉमन है। दरिंदगी तब हुई जब पीड़ित या पीड़िता मदरसे में पढ़ रहे थे। ज्यादातर मामले में हवस के भेड़िए वहाँ पढ़ाने वाले मौलवी ही हैं।

रिपोर्टों के मुताबिक बांग्लादेश में केवल जुलाई में कम से कम पाँच मौलवी लड़के और लड़कियों के यौन शोषण के आरोप में गिरफ्तार किए गए हैं। रिपोर्ट यह भी बताते हैं कि ज्यादातर पीड़ित गरीब हैं और उनकी इसी मजबूरी का मौलवियों ने फायदा उठाया। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की मानें तो मदरसों में यौन शोषण की घटनाएँ आम हैं और हालिया शिकायतें बस नमूने भर।

चाइल्ड राइट ग्रुप ‘बांग्लादेश शिशु अधिकार फोरम’ के अब्दुस शाहिद के अनुसार यह सिलसिला काफी पुराना है। उनके मुताबिक पीड़ितों के परिजन बदनामी और धार्मिक कारणों से ज्यादातर मामलों में चुप्पी साध लेते हैं।

राजधानी ढाका के तीन मदरसों में पढ़ चुके 23 साल के होजेफा अल ममदूह ने ऐसी घटनाओं को लेकर जुलाई में फेसबुक पर कई पोस्ट लिखे हैं। इनमें विस्तार से आपबीती और अन्य छात्रों के साथ हुई ज्यादतियों को बयाँ किया है। ममदूह फिलहाल ढाका यूनिवर्सिटी से जर्नलिज्म की पढ़ाई कर रहे हैं। उनकी मानें तो मदरसों में ऐसी घटनाएँ इतनी आम हैं कि वहाँ पढ़ने वाला हर बच्चा इससे वाकिफ होता है। उनका कहना है कि कई मौलवी बच्चों के साथ संभोग को अविवाहित महिला के साथ संबंध बनाने से कम नापाक मानते हैं।

उनके पोस्ट ने देश में नई बहस छेड़ दी है। इसके लिए उन्हें धमकी भी मिल रही। कोई यहूदियों और ईसाइयों का एजेंट बता रहा तो कोई मदरसों की पाक छवि को धूमिल करने का गुनहगार। एक ने तो सोशल मीडिया में उन्हें 2015 में कट्टरपंथियों द्वारा की गई उदारवादी बांग्लादेशी ब्लॉगर और लेखक अविजीत रॉय की हत्या की याद दिलाते हुए धमकी भी दे डाली।

इसके बावजूद उनके पोस्ट गवाह हैं कि कैसे बांग्लादेश में मदरसों में होने वाले यौन शोषण को लेकर लोगों की चुप्पी टूट रही है। यही कारण है कि 12 साल के एक यतीम के साथ कुकर्म कर उसका गला रेतने के जुर्म में कुछ सीनियर स्टूडेंट गिरफ्तार किए गए हैं, तो ढाका के दो मौलवी 12 से 19 साल के एक दर्जन लड़कों के यौन शोषण के आरोप में।

ममदूह की देखादेखी कई और भी अपनी आपबीती सुनाने सामने आ रहे हैं। एक फेमिनिस्ट वेबसाइट पर 25 साल के मोस्ताकिमबिल्लाह मासूम ने पोस्ट कर बताया है कि उसके साथ पहली बार रेप तब किया गया जब वह महज सात साल का था। बाद में एक मौलवी ने बेहोश कर उसके साथ कुकर्म किया। इस घटना से वह आज भी खौफ खाता है। उसने बताया- मैं मदरसे के दर्जनों छात्रों को जानता हूँ जो पीड़ित हैं या अपने सहपाठियों के साथ हुए रेप के चश्मदीद हैं।

हालाँकि एक मदरसा जहाँ से ममदूह पढ़ चुका है के प्रिंसिपल महफुजुल हक का कहना है कि देश में 20 हजार मदरसे हैं। ऐसी एकाध घटनाओं से मदरसों को लेकर छवि नहीं बनाई जा सकती। उनके अनुसार जो लोग मदरसे में पढ़ना पसंद नहीं करते इस तरह की घटनाओं को बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर रहे हैं।

पारंपरिक मुस्लिम बहुल देश में जहाँ ज्यादातर कट्टरपंथी ही हावी रहे हों, मदरसों में यौन ज्यादतियों के खिलाफ आवाजें उठना सुखद है। लेकिन, इसका भी ख्याल रखा जाना चाहिए कि ऐसी आवाजें आखिर में क्षणिक आवेग न साबित हों। पाकिस्तान में भी 2017 में मदरसों के खिलाफ इसी तरह आवाजें उठी थी। तब कौसर परवीन का 9 साल का बेटा खून में लथपथ होकर मदरसे से घर लौटा था।

रिपोर्टों के मुताबिक अप्रैल की एक रात मदरसे में रहने वाले कौसर के बेटे की जब नींद खुली तो मौलवी उसे बगल में लेटा मिला। मौलवी को देख बच्चा डर गया। मौलवी ने फिर उसके साथ कुकर्म किया। 9 साल का वह बच्चा चिल्ला न पाए इसलिए मौलवी ने उसके मुॅंह में उसकी ही कमीज ठूंस दी थी। इस मामले में भी आखिर वही हुआ जो अमूमन ऐसे ज्यादातर मामलों में होता है। मौलवी बच निकला। इस घटना के बाद भी पाकिस्तान के मदरसों में बच्चों का यौन शोषण बदस्तूर जारी है।

यह केवल पाकिस्तान की ही हकीकत नहीं है। कहीं धर्म तो कहीं तुष्टिकरण के नाम पर ऐसे ही आरोपी मौलवियों के कुकर्म धुलते रहते हैं।

‘हैकरमैन अर्थशास्त्री’ ने दी नोट छापकर जनता में बाँटने की राय, मैग्सेसे विजेता ने कहा- सहमत दद्दा

भारत की अर्थव्यवस्था को लेकर मीडिया और सोशल मीडिया पर चर्चा गरम है। इसी बीच खुदको पत्रकार मानने वाले अनिंद्यों चक्रवर्ती और एनडीटीवी के वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार के बीच अर्थव्यवस्था पर एक गहरी चर्चा सामने आई है जिसमें वो अर्थव्यवस्था सुधारने के लिए कुछ ‘अचूक उपाय’ एक दूसरे से साझा करते हुए नजर आ रहे हैं।

सोशल मीडिया पर वायरल हो रही इस वीडियो क्लिप में पत्रकार अनिंद्यो चक्रवर्ती रवीश कुमार को समझा रहे हैं कि यदि सरकार खूब सारे रुपए छापकर जनता में बाँट दे तो अर्थव्यवस्था तुरंत ठीक हो सकती है। इस पर रवीश कुमार भी अपनी सहमति दर्ज कराते नजर आए रहे हैं। बता दें कि हाल ही में रवीश कुमार को प्रतिष्ठित रैमन मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित किया गया है।

इस वार्ता में अनिंद्यो चक्रवर्ती कह रहे हैं- “सरकार को खुदको एक परिवार के रूप में सोचना चाहिए। जैसे एक परिवार को उतना ही खर्चा करना चाहिए, जितनी कि उस परिवार की आय है।” इसके बाद बेहद गंभीर हाव-भाव में अनिंद्यो चक्रवर्ती कहते हैं – “लेकिन परिवार नोट नहीं छापती (नोट नहीं छापता) है ना, सरकार तो नोट छापती है। इसलिए सरकार को सिर्फ नोट छापने चाहिए। ज्यादातर अर्थशास्त्री आपसे कहेंगे कि इससे कुछ नहीं होता। जी होता है।”

इसके बाद महान अर्थशास्त्री अनिंद्यो चक्रवर्ती एक उदाहरण के द्वारा इस तर्क को साबित करते हुए कहते हैं- “गाड़ी बनाने की फैक्ट्री बंद हैं क्योंकि लोगों के पास पैसे नहीं हैं खरीदने के लिए।”

इसके बाद अनिंद्यो चक्रवर्ती कालजयी बात कहते हैं- “अगर सरकार लोगों के हाथ में जाकर नोट छापकर पैसे दे दे तो वो जाकर खरीदेंगे।”

अनिंद्यो चक्रवर्ती के इस कालजयी बयान के बाद रवीश कुमार मंद-मंद मुस्कराते हुए अपनी सहमति जताते हुए कहते हैं- “कमाल है।”

अनिंद्यो चक्रवर्ती इसके बाद अपनी राय आगे रखते हुए हाथ झटकते हुए कहते हैं कि लोग इसका मतलब यह लगा लगा लेते हैं कि लोगों के हाथ में पैसे दे देने से महँगाई बढ़ जाएगी, जबकि कभी-कभी ऐसा होता है कि जब आप लोगों के हाथ में पैसे देते हैं, तो दाम बढ़ते नहीं बल्कि घटते हैं। रवीश कुमार यह सब सुनने के बाद अपने परिचित अंदाज में कहते सुने जा सकते हैं- “हम्म्म।”

हालाँकि, महान अर्थशास्त्री अनिंद्यो चक्रवर्ती शायद ये बात न जानते हों लेकिन सत्यान्वेषी पत्रकार रवीश कुमार इस बात पर कई बार ब्लॉग लिख चुके हैं। आखिरी बार उन्होंने नोट की छपाई पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से सम्बन्धित एक लेख लिखा था। जिसे पढ़ने के बाद मैं यह मानकर चल रहा हूँ कि शायद वे जानते होंगे कि नोट कि छपाई उतनी आसान नहीं है जितनी गंभीरता से अनिंद्यो चक्रवर्ती के साथ मिलकर वो आज इस पर सहमति जता रहे हैं।

रवीश द्वारा ही लिखा गया एक ब्लॉग NDTV की वेबसाइट पर प्रकाशित है। हालाँकि, ब्लॉग किसने और कब लिखा यह रहस्य है लेकिन लेख की भाषाशैली, अनुभव का जिक्र और दिए गए Tag यही बताते हैं कि यह अनुभव रवीश कुमार ने ही लिखा है।

इस पूरे लेख में रवीश कुमार ने प्रधानमंत्री मोदी द्वारा जालसाजी से बचने के लिए भारत में ही नोट छापने की बात को ‘सुखद अनुभव’ बताते हुए नोट छपाई की पूरी प्रक्रिया के बारे में लिखा है। इसलिए मैं मानकर चल रहा हूँ कि यह वार्ता और रवीश द्वारा जताई गई सारी सहमति मात्र ‘महान अर्थशास्त्री’ अनिंद्यो चक्रवर्ती का मन रखने भर के लिए ही रही होगी। वरना नोट छापकर उन्हें जनता में बाँट देने के के फायदे और नुकसान हो सकते हैं, यह रवीश कुमार ने अपने ब्लॉग में खूब समझाया है।

दूसरी बात यह भी हो सकती है कि रवीश कुमार ने यह ब्लॉग साल 2014 में चुनाव परिणाम के कुछ ही दिन बाद लिखा होगा। हालाँकि, इससे असहमत होने के लिए उनके हर लेख के अंत में एक अस्वीकरण हमेशा रहता ही है कि इस लेख की जिम्मेदारी किसी की भी नहीं है।

असल में, नोट छापने और उसे लोगों में बाँट देने की यह सारी चर्चा सरकार द्वारा RBI से लिए गए 1.76 लाख करोड़ रुपए लाभाँश और सरप्लस पूँजी के तौर पर देने के बाद चालू हुई है। इसलिए रवीश कुमार का फर्ज तो बनता ही है कि वो इस फैसले को सनसनी बनाकर अपनी प्रासंगिकता जनता के बीच कायम रख सकें। इसीलिए तो सुप्रीम कोर्ट भी आजकल ‘पीत पत्रकारिता अवार्ड‘ बाँट रही है।