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गाँधी-नेहरू नाम काफी नहीं, क्षेत्रीय दलों के मरने पर ही जिंदा होगी कॉन्ग्रेस: अधीर रंजन चौधरी

लोकसभा में कॉन्ग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी ने शनिवार (अगस्त 17, 2019) को कहा कि गांधी-नेहरू परिवार से बाहर के किसी व्यक्ति का पार्टी चला पाना काफी मुश्किल है, क्योंकि गाँधी-नेहरू परिवार ही कॉन्ग्रेस की ब्रांड इक्विटी हैं। चौधरी के मुताबिक, कॉन्ग्रेस पार्टी की वापसी अब काफी हद तक उन क्षेत्रीय पार्टियों के कमजोर होने पर निर्भर है, जिनकी कोई विचारधारा ही नहीं है।

चौधरी ने कहा कि कॉन्ग्रेस जैसी मजबूत विचारधारा वाली पार्टी, जिसकी हर जगह पहुँच हो वह पार्टी ही भाजपा जैसे सांप्रदायिक दल का सामना कर सकती है। अधीर रंजन चौधरी का कहना है कि वर्तमान समय में क्षेत्रीय दल जिस तरह से काम कर रहे हैं, वे आने वाले दिनों में अपना महत्व खो देंगे और उनके महत्व खोने का मतलब है कि देश द्विध्रुवी राजनीति की ओर बढ़ जाएगा। और द्विध्रुवी राजनीति की स्थिति उत्पन्न होने से कॉन्ग्रेस दोबारा सत्ता में आ सकते हैं। इसलिए पार्टी का भविष्य उज्ज्वल है।

कॉन्ग्रेस नेता ने कहा कि कॉन्ग्रेस पार्टी की वापसी अब काफी हद तक उन क्षेत्रीय पार्टियों के कमजोर होने पर निर्भर करता है, जिनकी कोई विचारधारा ही नहीं है। जबकि कॉन्ग्रेस को व्यापक समर्थन प्राप्त है। साथ ही उन्होंने सोनिया गाँधी के अंतरिम अध्यक्ष बनने पर भी टिप्पणी करते हुए कहा कि सोनिया गाँधी पार्टी की डोर हाथ में नहीं लेना चाहती थीं, लेकिन राहुल गाँधी के इस्तीफा देने के बाद संगठन को संकट में देख उन्होंने वरिष्ठ कॉन्ग्रेस पदाधिकारियों का अनुरोध स्वीकार कर लिया। चौधरी ने कहा कि सोनिया गाँधी ने संकट के समय में पार्टी की बागडोर संभाली। उन्हीं के नेतृत्व में ही मुश्किल समय में 2004 और 2009 में दो बार कॉन्ग्रेस ने सरकार बनाई थी।   

उन्होंने कहा, ‘‘गाँधी परिवार से बाहर किसी व्यक्ति का पार्टी का नेतृत्व करना वास्तव में मुश्किल होगा। राजनीति में भी ‘ब्रांड इक्विटी’ होती है। अगर आप अभी भाजपा को देखेंगे तो क्या मोदी और शाह के बिना वह सुचारू रूप से चल सकती है? जवाब है नहीं। इसी तरह हमारी कॉन्ग्रेस पार्टी में भी गाँधी परिवार हमारी ‘ब्रांड इक्विटी’ है। इसमें कोई नुकसान नहीं है। किसी और पार्टी के पास वह बात नहीं है। यह एक कठोर सत्य है।”

इसके साथ ही उन्होंने कहा कि पुराने और नए लोगों का मिश्रण पार्टी के लिए अच्छा है। पार्टी में विचारों में अंतर हो सकता है, लेकिन लक्ष्य समान है। चौधरी का कहना है कि कॉन्ग्रेस राजनैतिक और वैचारिक दोनों ही स्तर पर भाजपा से लड़ रही है। अभी भले ही सांप्रदायिक राजनीति का स्तर ऊपर है, मगर ये स्थाई नहीं रहेगा। जल्दी ही चीजें बदल जाएँगी। 

वहीं, जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 के निरस्त होने को लेकर चौधरी का कहना है, “जिस तरह से अनुच्छेद 370 को निरस्त किया गया वह अभूतपूर्व और अलोकतांत्रिक है। हमने यूटी को राज्यों में परिवर्तित होते देखा है लेकिन यह पहली बार है कि किसी राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों में बदल दिया गया है।”

PAk से आज़ादी माँग रहे बलूचिस्तान में बीएनपी नेता और उनके 14 साल के पोते को गोलियों से छलनी किया

पाकिस्तान से आजादी की मॉंग जोड़ पकड़ने के साथ ही बलूचिस्तान में नेताओं की हत्या का सिलसिला शुरू हो गया है। बलूचिस्तान नेशनल पार्टी (बीएनपी) के नेता मीर नवाब अमानुल्लाह जेहरी की खुजदार में शुक्रवार देर रात गोली मारकर हत्या कर दी गई।

हमलावरों ने जेहरी के 14 साल के पोते और दो मित्रों को भी गोलियों से छलनी कर दिया। बीएनपी अध्यक्ष और नेशनल एसेंबली के सदस्य अख्तर मेंगल ने जेहरी की हत्या की पुष्टि की है। उन्होंने ट्वीट कर जेहरी की हत्या को “पार्टी और बलूचिस्तान की जनता के लिए काला दिवस करार दिया है।”

मेंगल ने कहा, “बीएनपी और बलूचिस्तान की जनता के लिए एक और काला दिन। जेहरी की हत्या से हम सभी बेसहारा हो गए हैं। शहीद जेहरी और उनके मित्र तथा निर्दोष पोते की मध्य रात्रि निर्मम ढंग से हत्या का समाचार सुन सन्न हूँ।” डॉन के मुताबिक मृतकों के शव उनके परिजनों के हवाले कर पुलिस मामले की जॉंच कर रही है।

गौरतलब है कि जम्मू-कश्मीर में आर्टिकल 370 के प्रावधानों को निष्प्रभावी किए जाने के बाद से ही बलूचिस्तान में भी पाकिस्तान के खिलाफ आवाजों ने जोर पकड़ लिया है। आज़ादी की लड़ाई लड़ रहे क्रांतिकारियों और सेनानियों ने पाकिस्तान के चंगुल से आज़ाद होने के लिए हिंदुस्तान से मदद माँगी है।

पाकिस्तान को अपने स्वतन्त्रता दिवस (14 अगस्त) के दिन तब शर्मिंदगी का सामना करना पड़ा जब ट्विटर पर बलूचिस्तान के समर्थन में BalochistanSolidarityDay और 14thAugustBlackDay हैशटैग ट्रेंड करने लगा था। इन ट्रेंडों पर तकरीबन क्रमशः 100,000 और 54,000 ट्वीट्स हुए।

पाकिस्तान के कब्जे के खिलाफ बलूचिस्तान 1948 से ही संघर्ष करता आ रहा है। इस इलाके में पाकिस्तानी सेना पर मानवाधिकार के जघन्य आरोप आए दिन लगते रहते हैं। बलूचों की आवाज दबाने के लिए समय-समय पर उनके नेताओं की भी हत्याएँ होती रही है। अमूमन ऐसी हत्याओं का दोष अज्ञात हमलावरों के सिर मढ़ दिया जाता है जो कभी पकड़ में नहीं आते।

जिसके पिता ने लिखी सत्यनारायण कथा, उसके 3 बेटों ने ‘इज्जत लूटने वाले’ अंग्रेज को मारा और चढ़ गए फाँसी पर

आज अगर कोई कहे कि घर में पूजा है, तो ये माना जा सकता है कि “सत्यनारायण कथा” होने वाली है। ऐसा हमेशा से नहीं था। दो सौ साल पहले के दौर में घरों में होने वाली पूजा में सत्यनारायण कथा सुनाया जाना उतना आम नहीं था। हरि विनायक ने कभी 1890 के आस-पास स्कन्द पुराण में मौजूद इस संस्कृत कहानी का जिस रूप में अनुवाद किया, हमलोग लगभग वही सुनते हैं। हरि विनायक की आर्थिक स्थिति बहुत मजबूत नहीं थी और वो दरबारों और दूसरी जगहों पर कीर्तन गाकर आजीविका चलाते थे।

कुछ तो आर्थिक कारणों से और कुछ अपने बेटों को अपना काम सिखाने के लिए उन्होंने अपनी कीर्तन मंडली में अलग से कोई संगीत बजाने वाले नहीं रखे। उन्होंने अपने तीनों बेटों को इसी काम में लगा रखा था। दामोदर, बालकृष्ण और वासुदेव को इसी कारण कोई ख़ास स्कूल की शिक्षा नहीं मिली। हाँ ये कहा जा सकता है कि संस्कृत और मराठी जैसी भाषाएँ इनके लिए परिवार में ही सीख लेना बिलकुल आसान था। ऊपर से लगातार दरबार जैसी जगहों पर आने-जाने के कारण अपने समय के बड़े पंडितों के साथ उनका उठना-बैठना था। दामोदर हरि अपनी आत्मकथा में भी यही लिखते हैं कि दो चार परीक्षाएँ पास करने से बेहतर शिक्षा उन्हें ज्ञानियों के साथ उठने-बैठने के कारण मिल गई थी।

आज अगर पूछा जाए तो हरि विनायक को उनके सत्यनारायण कथा के अनुवाद के लिए तो नहीं ही याद किया जाता। उन्हें उनके बेटों की वजह से याद किया जाता है। सर्टिफिकेट के आधार पर जो तीनों कम पढ़े-लिखे बेटे थे और अपनी पत्नी के साथ हरि विनायक पुणे के पास रहते थे। आज जिसे इंडस्ट्रियल एरिया माना जाता है, वो चिंचवाड़ उस दौर में पूरा ही गाँव हुआ करता था। 1896 के अंत में पुणे में प्लेग फैला और 1897 की फ़रवरी तक इस बीमारी ने भयावह रूप धारण कर लिया। ब्युबोनिक प्लेग से जितनी मौतें होती हैं, पुणे के उस प्लेग में उससे दोगुनी दर से मौतें हो रही थीं। तब तक भारत के अंतिम बड़े स्वतंत्रता संग्राम को चालीस साल हो चुके थे और फिरंगियों ने पूरे भारत पर अपना शिकंजा कस रखा था।

अंग्रेजों को दहेज़ में मिले मुंबई (तब बॉम्बे) के इतने पास प्लेग के भयावह स्वरूप को देखते हुए आईसीएस अधिकारी वॉल्टर चार्ल्स रैंड को नियुक्त किया गया। उसके प्लेग नियंत्रण के तरीके दमनकारी थे। उसके साथ के फौजी अफसर घरों में जबरन घुसकर लोगों में प्लेग के लक्षण ढूँढते और उन्हें अलग कैंप में ले जाते। इस काम के लिए वो घरों में घुसकर औरतों-मर्दों सभी को नंगा करके जाँच करते। तीनों भाइयों को साफ़ समझ में आ रहा था कि महिलाओं के साथ होते इस दुर्व्यवहार के लिए वॉल्टर रैंड ही जिम्मेदार है। उन्होंने देशवासियों के साथ हो रहे इस दमन के विरोध में वाल्टर रैंड का वध करने की ठान ली।

थोड़े समय बाद (22 जून 1897 को) रानी विक्टोरिया के राज्याभिषेक की डायमंड जुबली मनाई जाने वाली थी। दामोदर, बालकृष्ण और वासुदेव ने इसी दिन वॉल्टर रैंड का वध करने की ठानी। हरेक भाई एक तलवार और एक बन्दूक/पिस्तौल से लैस होकर निकले। आज जिसे सेनापति बापत मार्ग कहा जाता है, वो वहीं वॉल्टर रैंड का इन्तजार करने वाले थे मगर ढकी हुई सवारी की वजह से वो जाते वक्त वॉल्टर रैंड की सवारी को पहचान नहीं पाए। लिहाजा अपने हथियार छुपाकर दामोदर हरि ने लौटते वक्त वॉल्टर रैंड का इंतजार किया। जैसे ही वॉल्टर रवाना हुआ, दामोदर हरि उसकी सवारी के पीछे दौड़े और चिल्लाकर अपने भाइयों से कहा “गुंडया आला रे!”

सवारी का पर्दा खींचकर दामोदर हरि ने गोली दाग दी। उसके ठीक पीछे की सवारी में आय्रेस्ट नाम का वॉल्टर का ही फौजी एस्कॉर्ट था। बालकृष्ण हरि ने उसके सर में गोली मार दी, जिससे उसकी फ़ौरन मौत हो गयी। वॉल्टर फ़ौरन नहीं मरा था, उसे ससून हॉस्पिटल ले जाया गया और 3 जुलाई 1897 को उसकी मौत हुई। इस घटना की गवाही द्रविड़ बंधुओं ने दी थी। उनकी पहचान पर दामोदर हरि गिरफ्तार हुए और उन्हें 18 अप्रैल 1898 को फाँसी दी गई। बालकृष्ण हरि भागने में कामयाब तो हुए मगर जनवरी 1899 को किसी साथी की गद्दारी की वजह से पकड़े गए। बालकृष्ण हरि को 12 मई 1899 को फाँसी दी गई।

भाई के खिलाफ गवाही देने वाले द्रविड़ बंधुओं का वासुदेव हरि ने वध कर दिया था। अपने साथियों महादेव विनायक रानाडे और खांडो विष्णु साठे के साथ उन्होंने उसी शाम (9 फ़रवरी 1899) को पुलिस के चीफ कॉन्स्टेबल रामा पांडू को भी मारने की कोशिश की, मगर पकड़े गए। वासुदेव हरि को 8 मई 1899 और महादेव रानाडे को 10 मई 1899 को फाँसी दी गई। खांडो विष्णु साठे उस वक्त नाबालिग थे इसलिए उन्हें दस साल कैद-ए-बामुशक्कत सुनाई गई।

मैंने स्कूल के इतिहास में भारत का स्वतंत्रता संग्राम पढ़ते वक्त दामोदर चापेकर, बालकृष्ण चापेकर और वासुदेव चापेकर की कहानी नहीं पढ़ी थी। जैसे पटना में सात शहीदों की मूर्ती दिखती है, वैसे ही चापेकर बंधुओं की मूर्तियाँ पुणे के चिंचवाड़ में लगी हैं। उनकी पुरानी किस्म की बंदूकें देखकर जब हमने पूछा कि ये क्या 1857 के सेनानी थे? तब चापेकर बंधुओं का नाम और उनकी कहानी मालूम पड़ी। भारत के स्वतंत्रता संग्राम को अहिंसक साबित करने की जिद में शायद इनका नाम किताबों में शामिल करना उपन्यासकारों को जरूरी नहीं लगा होगा। काफी बाद में (2018) भारत सरकार ने दामोदर हरि चापेकर का डाक टिकट जारी किया है।

बाकी इतिहास खंगालिएगा भी तो चापेकर के किए अनुवाद से पहले, सत्यनारायण कथा के पूरे भारत में प्रचलित होने का कोई पुराना इतिहास नहीं निकलेगा। चापेकर बंधुओं को किताबों और फिल्मों आदि में भले कम जगह मिली हो, धर्म अपने बलिदानियों को कैसे याद रखता है, ये अगली बार सत्यनारायण की कथा सुनते वक्त जरूर याद कर लीजिएगा। धर्म है, तो राष्ट्र भी है!

कट्टरपंथियों के हाथों मारे गए हरीश का परिवार आत्मदाह की तैयारी में, नेत्रहीन पिता पहले ही कर चुके हैं आत्महत्या

मजहबी भीड़ के हाथों मारे गए हरीश जाटव के परिवार ने आत्मदाह की चेतावनी दी है। न्याय मिलने में देरी से आहत हरीश के नेत्रहीन पिता रत्तीराम पहले ही जहर खा कर जान दे चुके हैं। अब परिजनों ने जल्द न्याय नहीं मिलने पर आत्मदाह की बात कही है।

मामला राजस्थान के अलवर का है। हरीश के परिजनों ने पुलिस पर मामले को दबाने का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि पुलिस के काम करने के तरीके से परेशान होकर ही रत्तीराम ने आत्महत्या की। पीड़ित परिवार का आरोप है कि अलवर पुलिस मॉब लिंचिंग के इस मामले को एक्सीडेंट साबित करने पर तुली हुई है।

गत 16 जुलाई को हरीश जाटव बाइक पर सवार होकर अलवर के भिवाड़ी से अपने गाँव झिवाणा जा रहा था। रास्ते में फलसा गाँव में हरीश की बाइक से दूसरे समुदाय की एक महिला को टक्कर लग गई थी। इसके बाद महिला के परिजनों ने हरीश की जमकर पिटाई की। वह गंभीर रूप से घायल हो गया था। इलाज के दौरान 18 जुलाई को
हरीश की मौत हो गई। हरीश के परिजन इसे मॉब लिंचिंग की घटना बता रहे, वहीं अलवर एसपी ने प्रेसवार्ता कर हरीश की मौत को एक एक्सीडेंट करार दिया।

इस मामले में पुलिस की कथित लापरवाही और हरीश के नेत्रहीन पिता की आत्महत्या के बाद दलित समाज के लोग टपूकड़ा में एकत्रित हो गए और आरोपितों की गिरफ्तारी नहीं होने पर जयपुर-दिल्ली राष्ट्रीय राजमार्ग जाम करने की चेतावनी दी।

मामला सामने आने के बाद बसपा और भाजपा के नेता टपूकड़ा पहुँच गए हैं। दलित समाज के आक्रोश को देखते हुए पुलिस फोर्स तैनात की गई है। पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी दलित समाज के प्रमुख लोगों को समझाने के प्रयास में जुटे है। बसपा विधायक संदीप यादव ने बताया कि पार्टी के सभी 6 विधायक इस मामले में मुख्यमंत्री से मिलकर दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई की माँग करेंगे।

370 का हटना: देश के स्वाभिमान और विकास का सूरज उगना… लेकिन विरोधियों का मुरझाना

एक भारत, श्रेष्ठ भारत का संकल्प पूरा हो रहा है। भारत के एकीकरण में जो दृढ़ इच्छाशक्ति लौह पुरुष सरदार बल्लभ भाई पटेल ने दिखाई थी, वैसी ही संकल्पबद्धता एवं साहस भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ने जम्मू-कश्मीर के अभिशाप अनुच्छेद 370 को समाप्त कर प्रदर्शित किया है।

महाराजा हरिसिंह द्वारा 26 अक्टूबर, 1947 को बिना शर्त भारत में रियासत का विलय किया गया था। लेकिन जवाहर लाल नेहरू पर यह आरोप लगते रहे हैं कि वो मजहबी उन्मादियों के नेता शेख अब्दुल्ला के साथ सांठगांठ कर जम्मू-कश्मीर को भारत से अलग-थलग करने के लिये अनुच्छेद 370 करने का कुचक्र रचने लगे थे।

नेहरू पर षडयंत्र का यह आरोप तब और मजबूत होने लगा, जब भारत की सेना कबाइलियों के वेश में आये पाकिस्तानी सेना के हमलावरों से पूरा कश्मीर का एक—एक इंच वापस लेने के लिये विजयी होती हुई आगे बढ़ रही थी, तभी अचानक उन्होंने अकारण ही एकतरफा युद्ध विराम की घोषणा करके जम्मू-कश्मीर को विवादित बताते हुये स्वयं ही संयुक्त राष्ट्र में जाकर जनमत संग्रह कराने की पहल कराने का प्रस्ताव किया और तत्कालीन उपप्रधानमंत्री व गृह मंत्री सरदार बल्लभ भाई पटेल के राष्ट्रीय एकीकरण की राह एक तरह से बाधा बनते हुए कश्मीर का विषय गृह मंत्रालय से लेकर अपने पास रख लिया।

जब नेहरू ने अचानक 17 अक्टूबर, 1949 को नेहरू ने संसद में अपने कैबिनेट मंत्री गोपालस्वामी अयंगर ने घोषणा करवाई कि वो जम्मू-कश्मीर को अनुच्छेद 370 देना चाहते हैं तो उन पर आरोप गहरा गया। आनन-फानन में बिना पर्याप्त चर्चा के यह अनुच्छेद पारित कर दिया गया।

बाबा साहब अंबेडकर पहले ही अनुच्छेद 370 का विरोध करते हुए इसका प्रारूप तैयार करने से मना कर चुके थे। बाबा साहब ने कहा था कि अनुच्छेद 370 जैसे कानून को तैयार करना और लागू करना देशद्रोह के समान है। किंतु नेहरू नहीं माने और इसका प्रारूप एन गोपालस्वामी अयंगर से तैयार करवाया। हालाँकि नेहरू ने इस धारा को 370 लागू करते समय देश को गुमराह करते हुए कहा कि यह अस्थाई है और जब स्थिति सामान्य होगी तो हट जाएगी, लेकिन जब उन्होंने शेख अब्दुल्ला के साथ मिलकर 1952 में अनैतिक समझौता ‘दिल्ली अग्रीमेंट’ करके अलगाववाद को और ईंधन देने वाली अनुच्छेद 35-ए लागू करने की पृष्ठभूमि तैयार की तो संदेह बढ़ गया कि वो स्वयं ही जम्मू-कश्मीर को शेष भारत से पूर्णतः अलग-थलग करने के षडयंत्रकारी हैं।

भारतीय जनता पार्टी के पूर्ववर्ती संगठन जनसंघ के संस्थापक डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने मुखर विरोध करते हुए कहा कि आर्टिकल 370 व ‘दिल्ली एग्रीमेंट’ से भारत टुकड़ों में बंट रहा है। डॉ मुखर्जी ने जम्मू-कश्मीर को देश की मुख्यधारा से पृथक करने के इस षडयंत्र के विरुद्ध संघर्ष करने का बीड़ा उठाया। उन्होंने इस अनुच्छेद के विरुद्ध भूख हड़ताल की। एक ध्वज, एक विधान और एक प्रधान के नारे के साथ जब वे इसको समाप्त करने की माँग करते हुए आंदोलन के लिए जम्मू-कश्मीर जा रहे थे तो केंद्र की नेहरू और राज्य की शेख अब्दुल्ला की सरकार ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया और 23 जून 1953 को हिरासत के दौरान ही उनकी रहस्यमय ढंग से हत्या (संदिग्ध मृत्यु) हो गई।

फिर नेहरू ने 1954 में अवैध तरीके एक प्रकार से सांसद व देश की जनता से धोखाधड़ी करते हुए अनुच्छेद 35-ए 11 सितम्बर, 1964 को आर्यसमाज के नेता व सांसद प्रकाशवीर शास्त्री (ओम प्रकाश त्यागी) ने अनुच्छेद 370 को हटाने का एक प्रस्ताव संसद में प्रस्तुत किया।

किंतु तत्कालीन गृहमंत्री गुलजारी लाल नंदा 4 दिसम्बर, 1964 को जवाब में इस विषय को टालते रहे, हालाँकि उन्होंने इतना अवश्य कहा कि इस अनुच्छेद में कमियाँ हैं। तब से न जाने कितनी आँखें जम्मू-कश्मीर पर लगे इस ग्रहण के समाप्त होने का सपना पाले संसार से चली गईं, पर अनुच्छेद 370 का जख्म ठीक होने के बजाय नासूर बनता गया। 70 साल की यह टीस समाप्त किया प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ने। इस धारा को समाप्त करते हुए संसद में अमित शाह ने कहा, ‘यदि 1948 में सेनाओं को छूट दी गई होती तो आज पाक के कब्जे वाला कश्मीर नहीं होता, पूरा कश्मीर ही भारत का अंग होता।

आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साहस के कारण अनुच्छेद 370 का कलंक हटा है। साथ ही गृह मंत्री ने स्पष्टता व ढृढ़ता से कहा, ‘मैंने जब भी संसद में जम्मू कश्मीर की बात की है उसमें हमेशा पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर और अक्साई चिन भी शामिल है। नरेंद्र मोदी की सरकार इसे छोड़ने वाली नहीं है। पर नेहरू की ऐतिहासिक भूल को सुधारकर जम्मू-कश्मीर को देश के विकास की मुख्यधारा के साथ एकीकृत करने के इस महान कार्य को कॉन्ग्रेस, पीडीपी, नेशनल कॉन्फ्रेंस सहित अनेक विपक्षी दल सहन नहीं कर पा रहे हैं। देशहित के इतने बड़े कार्य के विरोध के पीछे इन दलों ने जो कारण बताए हैं, वे अविश्वसनीय हैं, भ्रम उत्पन्न करने वाले हैं। विशेषकर स्वयं को राष्ट्रीय पार्टी कहने वाली कॉन्ग्रेस का पाकिस्तान की भाषा बोलना दुर्भाग्यपूर्ण है।

यह प्रश्न उठता है कि जिस विषय पर पूरा देश सरकार के साथ है, उस पर ये दल जनभावना व जनादेश का अपमान करते हुए विरोध करने का दुस्साहस कैसे कर पा रहे हैं? असल में उनके विरोध के कारण कुछ और हैं। इन कारणों में एक तो यह जान पड़ता है कि मजहबी आधार पर जम्मू-कश्मीर में जनांकिकीय असंतुलन बनाकर अलगाववाद व आतंकवाद को प्रश्रय देना, दूसरा कुछ परिवारों का भ्रष्टाचार और तीसरा जम्मू-कश्मीर के लोगों को विकास की धारा से दूर रखना, ताकि वे गरीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा, विकासहीनता के दलदल में पड़े रहकर इन परिवारों के लिये वोटबैंक बने रहें और इनके आगे भीख माँगते हुए इनकी गुलामी करते रहें और इनके भ्रष्टाचार की ओर जनता का ध्यान न जाए।

370 पर चर्चा के समय उत्तर देते हुए लोकसभा में गृह मंत्री अमित शाह ने बताया कि वर्ष 2004 से 2019 तक केंद्र सरकार की ओर से इस राज्य को 2 लाख 77 हजार करोड़ रुपए भेजे गए, वर्ष 2011-12 में केंद्र की ओर से देश में जहाँ प्रति व्यक्ति औसत 3683 रुपए भेजे गए वहीं जम्मू-कश्मीर में प्रति व्यक्ति 14255 रुपए गए, किंतु वहाँ की जनता आज भी गरीबी, बदहाली, दुर्दिन में जी रही है।

ये धन कहाँ, किसकी जेब में गया? क्या ये इस बात की पुष्टि नहीं करता है कि विरोधी अनुच्छेद 370 का कवच आतंकवाद और इसके वित्त पोषण एवं कुछ परिवारों के भ्रष्टाचार को संरक्षण देने के लिए चाहते हैं?

बात केवल आर्थिक पक्ष की ही नहीं है। यह अनुच्छेद अमानवीय, लोकतंत्र विरोधी तथा महिला, दलित, आदिवासी और गरीब विरोधी भी थी। इस अनुच्छेद के कारण जम्मू-कश्मीर में बाल विवाह निरोधी कानून लागू नहीं कर सकते थे, जैन व बौद्ध अल्पसंख्यकों के लिये अल्पसंख्यक आयोग नहीं बना सकते थे, अनुसूचित जाति व जनजाति के लिये राजनीतिक आरक्षण नहीं दे सकते थे, बच्चों को शिक्षा का अधिकार लागू नहीं कर सकते थे, भूमि अधिग्रहण अधिनियम लागू नहीं कर सकते थे, राज्य में परिसीमन नहीं कर सकते थे, वाल्मीकि समाज के लाखों सफाईकर्मियों को केंद्र सरकार की योजनाओं का लाभ नहीं दे सकते थे, उन्हें नागरिकता तक नहीं दी गई थी, महिलाओं पर परोक्ष रूप से शरीयत लागू करके उनके अधिकार छीन लिए गए थे, राज्य की महिला अपनी इच्छा से राज्य के बाहर विवाह नहीं कर सकती थी।

यह प्रश्न भी समीचीन है कि जब ऐतिहासिक रूप से केंद्रीय धन का अधिकतम भाग जम्मू-कश्मीर को दिया गया, उसके बाद भी यह बुनियादी ढाँचे, शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाओं, रोजगार के अवसर आदि जैसे विकास के कार्यों में क्यों नहीं परिलक्षित हुआ है? राज्य देश के अन्य राज्यों की तरह विकसित क्यों नहीं हो पाया?

तुष्टीकरण और वोटबैंक की राजनीति करने वाले दलों के लिए 370 के उन्मूलन का विरोध सैद्धांतिक नहीं, अपितु अवसरवादी और पोल खुलने के भय से उपजा है। क्योंकि वे जानते हैं जम्मू-कश्मीर से इस कलंक के समाप्त होने के बाद अब वहाँ निजी निवेश के द्वार खुल जाएँगे, जिससे वहाँ विकास की संभावना बढ़ेगी। निवेश में वृद्धि से रोजगार सृजन में वृद्धि होगी और राज्य में सामाजिक-आर्थिक बुनियादी ढाँचे में और सुधार होगा।

उद्योगों के विकास के लिये निजी लोगों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों से निवेश आएगा और स्थानीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिलेगा। केंद्र की योजनाओं का सीधा लाभ राज्य की जनता को मिलेगा। अब राज्य में विकास, समता व अधिकार का सूरज निकलेगा तो जनता स्वयं फर्क महसूस करेगी और फिर 70 वर्ष तक उन्हें बुनियादी सुविधाओं, अधिकारों और भागीदारी से वंचित करने वालों से जवाब माँगेगी। यही डर विरोधियों को अनुच्छेद 370 के अभिशाप को हटाने का विरोध करने को मजबूर कर रहा है।

लेखक राजनीतिक व सामाजिक विश्लेषक हैं।

बेगम ज़मीना को फ़िदायीन बता विमान में ब्लास्ट की धमकी देने वाला नसीरुद्दीन गिरफ़्तार

दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने एक ऐसे शख़्स को गिरफ़्तार कर लिया है जिसने अपनी बेगम को फ़िदायीन बताकर विमान में बम विस्फ़ोट की धमकी दी थी। शख़्स की पहचान 29 वर्षीय नसीरुद्दीन के रूप में हुई है। उसे दिल्ली के बवाना इलाक़े से गिरफ़्तार किया गया।

पूछताछ में उसने अपना ज़ुर्म क़बूल करते हुए बताया कि उसने ही एयरपोर्ट की डायल सेवा को कॉल कर फ़्लाइट उड़ाने की धमकी दी थी। बता दें कि 8 अगस्त को दिल्ली एयरपोर्ट की डायल सेवा को एक गुमनाम कॉल आया था कि जिसमें कहा गया कि एक महिला जिसका नाम ज़मीना है वो फ़िदायीन है। फ़ोन करने वाले ने कहा कि महिला दुबई या सऊदी अरब जाने वाली फ़्लाइट को बम से उड़ा सकती है।

इस कॉल से एयरपोर्ट पर अफरा-तफरी मच गई थी। हरकत में आते हुए दिल्ली पुलिस ने मामले की जाँच शुरू की। जाँच में पता चला कि नसीरुद्दीन की बेगम देश से बाहर जा रही थी। अपनी बीवी को रोकने के लिए उसने कॉल की थी।

Zomato सहित कई की डाइन-इन सर्विस से 1200 से अधिक रेस्तरां कंपनियों ने किया किनारा

देश के कई प्रमुख शहरों की रेस्तरां कंपनियों और एग्रीगेटर्स के बीच विवाद गहरा गया है। लिहाजा 1,200 से अधिक रेस्तरां कंपनियों ने जोमैटो सहित अन्य की डाइन-इन सर्विस से किनारा कर लिया है। जोमैटो ने इसे प्रतिस्पर्धा विरोधी और अवैध बताया है।

मुंबई, दिल्ली, बेंगलुरू, कोलकाता, गोवा, पुणे और वडोदरा के ये रेस्तरां #Logout अभियान के तहत Zomato, EazyDiner, Nearbuy, MagicPin और Gourmet Passport सहित कई प्लेटफार्मों से बाहर हैं। रेस्तरां कंपनियों का कहना है कि एग्रीगेटर्स द्वारा टेबल रिजर्वेशन सेवाओं पर दी जा रही छूट पर्याप्त नहीं थी और इससे उनके बिजनेस को नुकसान हो रहा था।

जोमैटो ने एक ब्लॉग लिखकर #Logout अभियान से रेस्तरां कंपनियों को सावधान रहने के लिए कहा है। साथ ही जोमैटो ने इन कंपनियों को 45 दिन का नोटिस पीरियड भी दिया है और कहा है कि इस बीच वो उन्हें बता दें कि वो उनकी कंपनी से निकलना चाहते हैं या फिर वापस से ज्वाइन करना चाहते हैं। यदि निकलना चाहते हैं तो क्या वो साइन अप शुल्क का भुगतान करने के लिए तैयार हैं।

नेशनल रेस्टोरेंट एसोसिएशन ऑफ इंडिया (NRAI) के अध्यक्ष राहुल सिंह ने कहा, “दो दिन पहले गुड़गाँव में शुरू हुआ #Logout आंदोलन देशव्यापी हो गया है। यह दिखाता है कि बिज़नेस के इस मॉडल से रेस्तरां कैसे नुकसान झेल रहे थे।”

जम्मू में 2G इंटरनेट सेवा शुरू, श्रीनगर में लैंडलाइन सेवा बहाल

जम्मू-कश्मीर में आज शनिवार (17 अगस्त) से फोन सेवाएँ शुरू हो गई हैं। जम्मू में 2G स्पीड के साथ इंटरनेट सेवा शुरू हो गई है। वहीं कश्मीर के श्रीनगर के राजबाग क्षेत्र में लैंडलाइन सेवा शुरू कर दी गई है। फ़िलहाल, कश्मीर में इंटरनेट सेवा शुरू नहीं हुई है।

ख़बर के अनुसार, जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद-370 के प्रावधानों को हटाए जाने के बाद जो प्रतिबंध लगाए गए थे उन्हें चरणबद्ध तरीक़े से हटाया जाएगा। फ़िलहाल, जम्मू, रियासी ज़िले, सांबा, कठुआ और उधमपुर में 2G इंटरनेट सेवा शुरू कर दी गई है। राज्य के मुख्य सचिव बीवीआर सुब्रमण्यम ने शुक्रवार को मीडिया से बात करते हुए कहा था कि सप्ताह के अंत तक कश्मीर घाटी के सभी स्कूल और कॉलेज खुल जाएँगे और दूरसंचार लिंक भी धीरे-धीरे बहाल हो जाएँगे।

अधिकारी ने इस बात की भी जानकारी दी कि बीते 12 दिनों से लॉकडाउन के दौरान कश्मीर घाटी में किसी व्यक्ति की जान नहीं गई है। उन्होंने जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा निष्प्रभावी किए जाने के बाद घाटी में प्रदर्शनों के दौरान मौत व गंभीर रूप से घायल होने की बात का खंडन किया। उनका कहना है कि पाकिस्तान कश्मीर मुद्दे पर भारत के ख़िलाफ़ अंतरराष्ट्रीय सहानुभूति हासिल करने के लिए विदेशी मीडिया रिपोर्टस का इस्तेमाल कर रहा है। इसके साथ ही उन्होंने यह स्पष्ट किया कि जल्द ही प्रतिबंधों को हटा लिया जाएगा और जीवन पूरी तरह से सामान्य हो जाएगा।

ख़बर के अनुसार, जम्मू-कश्मीर के 22 ज़िलों में से 12 ज़िलों में आम जनजीवन अब सामान्य हो गया है। केवल पाँच ज़िले ऐसे हैं जहाँ रात में पाबंदियाँ लगाई जा रही हैं। बीते शुक्रवार (16 अगस्त) को जुमे की नमाज़ के बाद भी पूरे राज्य में शातिंपूर्ण माहौल रहा।

मेरे गाल पर कीड़ा बैठ गया था इसलिए तिरंगे को सलामी नहीं दे रहा था: JDU विधायक शर्फुद्दीन

बिहार से जेडीयू विधायक शर्फुद्दीन की एक फ़ोटो बड़ी तेज़ी से वायरल हो रही है। इस फ़ोटो में वो तिरंगे को सलामी देते समय अपने बाएँ गाल पर हाथ रखे हुए हैं, जबकि आसपास खड़े प्रशासनिक अधिकारी व नेता लोग तिरंगे के सम्मान में सलामी देते दिख रहे हैं। इस फ़ोटो के वायरल होते ही सूबे में सियासत गर्मा गई है।

इस फ़ोटो पर जेडीयू विधायक ने तर्क दिया कि अचानक उनके गाल पर एक कीड़ा बैठ गया था, जिसे वो हटा रहे थे। ठीक इसी बीच किसी ने यह फ़ोटो खींच ली और सोशल मीडिया पर वायरल कर दी। विधायक शर्फुद्दीन के इस तर्क में कोई दम नहीं है क्योंकि यह बात किसी के गले नहीं उतर रही है कि एक कीड़े की वजह से उन्होंने तिरंगे की शान में यह गुस्ताखी की, वो भी बाएँ हाथ से! लेकिन जेडीयू अपने इस विधायक के बचाव में पूरी तैयारी के साथ खड़ी है।

जेडीयू विधायक का तर्क, गाल पर बैठ गया था कीड़ा (तस्वीर आभार: दैनिक जागरण)

यह कहना ग़लत नहीं होगा कि नेताओं की इस तरह की हरक़त किसी भी तरह से क्षम्य नहीं है। राजनीतिक पार्टी ऐसे नेताओं के बचाव में इसलिए भी उतरती है क्योंकि वो अपने दामन में किसी की तरह का दाग लेना पसंद नहीं करती।

किसी पार्टी का अपने नेता के बचाव में उतरना तो एक हद तक समझ में आता है, लेकिन आश्चर्य तब होता है जब कोई न्यूज़ चैनल ऐसी हरक़त पर नेता का बचाव करता दिखता है। ऐसा ही कुछ NDTV ने भी किया है, जिसे देखकर लगता है कि जैसे इस विधायक को उसने अपनी ख़बर के ज़रिए एक तरह का सुरक्षा कवच प्रदान करने की कोशिश की हो।

दरअसल, हर मीडिया हाउस की ही तरह NDTV ने भी इस ख़बर का उल्लेख किया, लेकिन कुछ इस तरह जैसे विधायक के तर्क से वो पूरी तरह संतुष्ट हों। पहली बात तो यह कि NDTV ने विधायक की वो फ़ोटो ही नहीं लगाई जिसमें वो तिरंगे के समक्ष ऐसी ओछी हरक़त करते दिखे। दूसरी बात यह कि विधायक शर्फुद्दीन के कहे अनुसार उनके गाल पर एक कीड़ा बैठा था, जिसे वो हटा रहे थे। तो NDTV को यह बात ध्यान में रखनी चाहिए थी कि विधायक के बाएँ गाल पर कीड़ा बैठा था न कि दाएँ गाल पर। जहाँ तक सवाल सलामी दिए जाने को लेकर है तो वो दाएँ हाथ से दी जाती है न कि बाएँ हाथ से।

NDTV ने अपनी ख़बर में नहीं लगाई जेडीयू विधायक की वायरल फ़ोटो

इस ख़बर से NDTV ने अपनी ‘ओछी’ पत्रकारिता का स्पष्ट प्रमाण दे डाला कि संवेदनशील मुद्दों के साथ खिलवाड़ कर कैसे वो अपने पाठकों और दर्शकों को ठगने का काम करता है।

AAP के पूर्व मंत्री कपिल मिश्रा BJP में शामिल, केजरीवाल सरकार पर लगा चुके हैं कई आरोप

आम आदमी पार्टी (AAP) के बागी और अयोग्य करार दिए जा चुके विधायक कपिल मिश्रा भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए हैं। कपिल मिश्रा ने दिल्ली में भाजपा नेता मनोज तिवारी और विजय गोयल की मौजूदगी में पार्टी की सदस्यता ग्रहण की। बता दें कि कपिल मिश्रा ने शुक्रवार (अगस्त 16, 2019) को ही ट्वीट कर इस बात की जानकारी दे दी थी कि वो बीजेपी में शामिल होने जा रहे हैं। उन्होंने ट्वीट कर लिखा था कि वो शनिवार (अगस्त 17, 2019) को 11 बजे बीजेपी में शामिल होंगे।

गौरतलब है कि कपिल मिश्रा कई बार आम आदमी पार्टी का विरोध करने और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ करने को लेकर सुर्खियों में रह चुके हैं और लोकसभा चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए अभियान चलाने की वजह से पार्टी ने कपिल मिश्रा की विधानसभा की सदस्यता रद्द कर दी थी। करावल नगर से विधायक रहे कपिल मिश्रा ने लोकसभा चुनाव के दौरान दिल्ली की सातों संसदीय सीटों पर भाजपा के समर्थन में अभियान चलाया था। AAP विधायक सौरभ भारद्वाज ने इसकी शिकायत विधानसभा अध्यक्ष राम निवास गोयल से की थी। इसकी सुनवाई करते हुए बीते दिनों विधानसभा अध्यक्ष ने उनकी सदस्यता रद्द कर दी थी।

हालाँकि, इसके खिलाफ कपिल मिश्रा ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की है। कोर्ट में कपिल मिश्रा ने कहा कि दिल्ली विधानसभा अध्यक्ष महोदय ने ‘लॉ ऑफ नेचुरल जस्टिस’ के खिलाफ जाकर निर्णय सुनाया। एक असंवैधानिक याचिका पर सुनवाई करके अध्यक्ष ने अपनी संवैधानिक शक्तियों का गलत इस्तेमाल किया।

AAP से निकाले जाने के बाद कपिल मिश्रा ने केजरीवाल सरकार के खिलाफ मोर्चा शुरू किया था। साथ ही केजरीवाल सरकार पर भ्रष्टचार समेत कई गंभीर आरोप लगाए थे। केजरीवाल के खिलाफ गाने बनाए और सोशल मीडिया के जरिए तमाम चीजें ट्वीट भी की थीं। इसके अलावा उन्होंने केजरीवाल के खिलाफ धरना भी दिया था।