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पाकिस्तान ने किया जम्मू-कश्मीर में संघर्ष-विराम का उल्लंघन, गँवाए 3 सैनिक

पाकिस्तान ने आज (15 अगस्त) नियंत्रण रेखा (LoC) के पास विभिन्न स्थानों पर गोलीबारी कर संघर्ष-विराम का उल्लंघन किया। भारतीय सेना की जवाबी कार्रवाई में उसे अपने तीन सैनिकों से भी हाथ धोना पड़ा है। पाकिस्तान ने 5 भारतीय सैनिकों को भी मारने का दावा किया है, लेकिन मीडिया खबरों के अनुसार सेना ने इस दावे को नकार दिया है।

कई सेक्टरों पर हुआ हमला

आ रही जानकारी के मुताबिक पाकिस्तानी हमला तीन सेक्टरों पर हुआ है। जिन सेक्टरों पर हमला हुआ है, वे हैं उरी, राजौरी और नांगी टेकरी इलाके का केजी (कृष्ण घाटी) सेक्टर। ज़ी न्यूज़ की खबर के मुताबिक हमला बिना किसी उकसावे के पाकिस्तान की तरफ से शुरू हुआ था। सेना की जवाबी कार्रवाई में तीन पाकिस्तानी सैनिकों के मारे जाने की खबर है।

‘इन्हें कायदे से जवाब दिया जाना चाहिए’

समाचार एजेंसी ANI ने स्थानीय कश्मीरी नागरिक मोहम्मद मुज़िर मुग़ल के हवाले से कहा कि अगर स्वतंत्रता दिवस पर ऐसा हमला होता है, तो प्रधानमंत्री मोदी को इसका कायदे से जवाब देना चाहिए। “मैं झंडारोहण समारोह में था। समारोह से लौटते हुए मैंने पाकिस्तानी छोर से गोलियों की आवाज़ सुनी।” ANI से ही बात करते हुए नांगी टेकरी के एक दूसरे निवासी चमनलाल ने कहा कि पाकिस्तान को यह समझना होगा कि यह पुराना हिंदुस्तान नहीं है जो ऐसी हरकतों पर चुप रहेगा

तीन दिन में दूसरा हमला

पिछले तीन दिन के भीतर पाकिस्तान का यह सीमा पर दूसरा दुःसाहस है। इसके पहले 13-14 अगस्त, 2019 की रात भी पाकिस्तान ने जिहादियों की घुसपैठ कराने की कोशिश की थी, जिसे हिंदुस्तान की सेना ने नाकाम कर दिया। मीडिया सूत्रों के मुताबिक घुसपैठ में पाकिस्तानी सेना ने भी सहयोग किया था। अनुच्छेद 370 हटाकर हिंदुस्तान के जम्मू-कश्मीर का विलय पूर्ण कर लेने और इसकी मुख़ालफ़त में दुनिया में अलग-थलग पड़ जाने से पाकिस्तान की हताशा को देखते हुए सरकार को यह आदेश पहले से था, इसीलिए 5 अगस्त को जम्मू-कश्मीर में संविधान पूरी तरह लागू करने के पहले ही सरकार ने वहाँ हज़ारों की तादाद में अतिरिक्त सुरक्षा बलों की तैनाती कर दी थी।

मेरे भी वालिद हिंदुस्तान में पैदा हुए-मरे, और पाकिस्तान का ‘बाप’ भी: अदनान सामी की खरी-खरी

पाकिस्तानी मूल के हिंदुस्तानी गायक अदनान सामी ने ट्विटर पर एक पाकिस्तानी ट्रोल की बोलती उस समय बंद कर दी, जब वह उन्हें हिंदुस्तान का स्वतन्त्रता दिवस को मनाने और पाकिस्तान को आईना दिखाने पर ट्रोल करने की कोशिश कर रहा था। सामी ने पाकिस्तान मूवमेंट के ‘बाप’ माने जाने वाले शायर अल्लामा इक़बाल के खुद हिंदुस्तानी के रूप में पैदा होने और मरने का ज़िक्र किया था, तो इसपर उन्हें ट्रोल करने की कोशिश हुई थी।

हिंदुस्तानी मरे थे ‘सारे जहाँ से अच्छा’ के रचयिता

किसी समय हिंदुस्तान की शान में ‘सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा’ लिखने वाले सर मोहम्मद ‘अल्लामा’ इक़बाल पाकिस्तान मूवमेंट के जनक माने जाते हैं। अदनान सामी ने स्वतंत्रता दिवस के मौके पर उनकी इन्हीं पंक्तियों में ट्विटर पर शेयर किया था, इस तथ्य के साथ कि पाकिस्तान के ‘बौद्धिक पिता’ माने जाने वाले इक़बाल तकनीकी रूप से हिंदुस्तानी ही रहे, सारी उम्र। इक़बाल की मौत देश के विभाजन से 9 साल पहले 1938 में हो गई थी। उनका जन्म भी हिंदुस्तान में ही हुआ था। अदनान सामी ने इक़बाल की तस्वीर के साथ तिरंगा भी लगाया था।

इस ट्वीट से बिफ़रे पाकिस्तानी ट्रोल मुहम्मद शफ़ीक़ ने अदनान से पूछा कि उनके वालिद कहाँ पैदा हुए और मरे थे?

अदनान ने शफ़ीक़ के ट्वीट को रीट्वीट करते हुए जवाब दिया कि उनके वालिद हिंदुस्तान में ही 1942 में पैदा हुए थे, और 2009 में हिंदुस्तान में ही उन्होंने अंतिम साँस ली।

‘जय हिन्द’, ‘भारत माता की जय’: बलूचिस्तानी आज़ादी के परवानों को हिंदुस्तान से आस

बलूचिस्तान की आज़ादी की लड़ाई लड़ रहे क्रांतिकारियों और सेनानियों ने पाकिस्तान के चंगुल से आज़ाद होने के लिए हिंदुस्तान से मदद माँगी है। हमारे 73वें स्वतंत्रता दिवस पर बलूचिस्तानी एक्टिविस्ट अट्टा बलोच ने बधाई देते हुए कहा कि बलूचिस्तानी अपनी आज़ादी की लड़ाई में हिंदुस्तानियों द्वारा दिए जा रहे समर्थन के लिए शुक्रगुज़ार हैं। “हम चाहते हैं कि वे (हिंदुस्तानी) एक आज़ाद बलूचिस्तान के लिए आवाज़ उठाएँ। हमें उनका समर्थन चाहिए। शुक्रिया और जय हिन्द।”

एक दूसरे बलूच कार्यकर्ता अशरफ़ शेरजान ने हिंदुस्तान से UN समेत सभी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बलूचिस्तान की आवाज़ उठाने की गुज़ारिश की है। “बलूचिस्तान के लोगों पर पाकिस्तान और उसकी सेना के हाथों अत्याचार हो रहा है, उनका सामूहिक हत्याकाण्ड हो रहा है। बलूचिस्तान का खून बहाया जा रहा है।” हिंदुस्तान से बेआवाज़ों की आवाज़ बनने की याचना करते हुए शेरजान ने अपनी अपील का अंत “भारत माता की जय” से किया।

पाकिस्तान के स्वतन्त्रता दिवस (14 अगस्त) के दिन उसे शर्मिंदगी का सामना करना पड़ा था जब ट्विटर पर बलूचिस्तान के समर्थन में BalochistanSolidarityDay और 14thAugustBlackDay ट्रेंड करने लगा था। इन ट्रेंडों पर तकरीबन क्रमशः 100,000 और 54,000 ट्वीट्स हुए। पाकिस्तान द्वारा बलूचिस्तान में किए जा रहे जघन्य मानवाधिकार हनन के चलते उसे पहले भी कई बार शर्मिंदगी का सामना करना पड़ा है।

आज़ाद होते ही बलूचिस्तान को बनाया गुलाम

विभाजन के पहले बलूचिस्तान के 4 हिस्से होते थे- कलात, लसबेला, खारन और मकरान। बाकी तीनों हिस्से कलात के विभिन्न तरीकों से अधीन थे। बलूचिस्तानियों का दावा है कि बलूचिस्तान को अंग्रेज़ों से आज़ादी हिंदुस्तान-पाकिस्तान के पहले 11 अगस्त, 1947 को ही मिल गई थी।

पहले तो पाकिस्तान ने ब्रिटिश सरकार से अपनी सौदेबाज़ी में कलात को हिंदुस्तान से अलग एक सम्प्रभु, आज़ाद राज्य के रूप में मान्यता दे दी। उसके बाद जिन्ना ने बलूचिस्तान के पाकिस्तान में विलय का एकतरफ़ा निर्णय ले लिया। बलूचिस्तान की असेम्बली ने हालाँकि पाकिस्तान के साथ मिलने के प्रस्ताव को सिरे से नकार दिया था। इस विषय, और बलूचिस्तान से जुड़े अन्य विषयों पर, ऑपइंडिया की बलूचिस्तान लिबरेशन फ़्रंट के डॉ. अल्लाह नज़र के साथ एक्सक्लूसिव बातचीत आप यहाँ पढ़ सकते हैं

पाकिस्तान कर रहा है घुसपैठ, मुँहतोड़ जवाब देने के लिए हम तैयार- लेफ़्टिनेंट जनरल रणबीर सिंह

73वें स्वतंत्रता दिवस के मौक़े पर जहाँ पूरा देश आज़ादी का जश्न मना रहा है, वहीं जम्मू-कश्मीर के कुपवाड़ा में सेना के कैंप में भी इस जश्न को बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। इस अवसर पर सेना की उत्तरी कमांड के चीफ़ लेफ़्टिनेंट जनरल रणबीर सिंह ने तिरंगा फहराया और जवानों को स्वतंत्रता दिवस की ढेरों शुभकामनाएँ दी। 

लेफ़्टिनेंट जनरल रणबीर सिंह ने अपने संबोधन में जवानों से कहा,

“मैं आप सब को इस अवसर पर मुबारकबाद और शुभकामनाएँ देता हूँ। आज रक्षाबंधन का भी त्योहार है। आपको आपके परिवार को स्वतंत्रता दिवस और रक्षाबंधन की शुभकामनाएँ।”

इस बीच उन्होंने न्यूज़ एजेंसी ANI से बातचीत करते हुए कहा, “पिछले कुछ दिनों से पाकिस्तान की ओर से घुसपैठियों को खदेड़ने की कोशिश की जा रही है, घुसपैठ की ऐसी कोशिशों को संघर्ष विराम उल्लंघन का समर्थन मिला है। भारतीय सेना पूरी तरह से सतर्क है और हम ऐसे सभी प्रयासों को विफल करने में सक्षम हैं।” उन्होंने इस बात पर ज़ोर देते हुए कहा कि भारतीय सेना पाकिस्तान के मंसूबों को कभी पूरा नहीं होने देगी।

 

जवानों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा,

“अभी तक आपने सब कुछ अच्छे तरीक़े से संभाला हुआ है, आपका आर्मी कमांडर होने के नाते मुझे आप सभी पर गर्व है, जो भी चुनौती हमारे सामने आएगी हम उस पर अच्छी तरह से फ़तह पाएँगे।”

अनुच्छेद-370 को हटाए जाने पर लेफ्टिनेंट जनरल रणबीर सिंह का कहना है कि इससे राज्य में अलगाववाद और आतंकवाद को बढ़ावा मिला है। साथ ही उन्होंने कहा कि वो कश्मीर की आवाम को धन्यवाद देना चाहेंगे क्योंकि सभी ने सुरक्षा बलों के साथ मिलकर यह बात मुमकिन की है कि जम्मू-कश्मीर में शांति का माहौल बना रहे। ग़ौरतलब है कि पाकिस्तान की यह बौखलाहट जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद-370 को हटाए जाने के बाद और बढ़ गई है, क्योंकि कश्मीर मुद्दे पर एक के बाद एक कई देशों से उसके हाथों मायूसी ही लग रही है।

‘मेरा लेखन तभी सार्थक है, जब कोई एक व्यक्ति भी कुछ अच्छा और सही करने के लिए प्रेरित हो सके’

महिलाओं को किसी एक विशेषण में समेटने की कोशिश करना एक नादानी से ज्यादा कुछ नहीं हो सकता है। महिलाएँ एक माँ, बेटी, बहन, औरत होने के साथ-साथ कितने ही रूपों में अन्य सामाजिक दायित्व भी निभाती हैं, अंकिता जैन इसका एक उदाहरण हैं। अपनी बहुचर्चित पुस्तक ‘मैं से माँ तक़’ और ‘ऐसी वैसी औरत’ (जागरण-नील्सन बेस्ट सेलर) के अलावा अंकिता जैन वर्तमान में किस तरह से एक प्रेरणाश्रोत बनकर महिला सशक्तिकरण की एक मजबूत मिशाल पेश करती हैं।अंकिता जैन ऑपइंडिया के साथ आज शेयर कर रही हैं अपने संघर्ष से सशक्तिकरण तक का अपना सफर।

लेखन जगत में मेरी यात्रा 2011 में शुरू हुई थी। शुरुआत फेसबुक से ही हुई थी। फिर सफ़र आगे बढ़ा और रेडियो के लिए कहानियाँ लिखीं, संपादन और अनुवाद का काम किया, घोस्ट राइटिंग की, और 2017 में पहली हिंदी किताब ‘ऐसी वैसी औरत’ आई।

इसी बीच शादी हुई और मैं छत्तीसगढ़ के आदिवासी बाहुल्य इलाके में पहुँच गई। वहाँ मेरे पति (समर्थ) खेती-बाड़ी करते हैं। रसायन मुक्त खेती। वे एक वैज्ञानिक हैं और पहले बेल्जियम की सरकारी रिसर्च लैब में शोधकर्ता थे। वहाँ वे जब आस-पास के गाँवों के किसानों को देखते, तो उनके आगे उन्हें अपने यहाँ के किसानों की दरिद्र हालत पर दुःख होता। वह ही उनके जीवन का टर्निंग पॉइंट था, जब वे विदेश में नौकरी छोड़कर स्वदेश लौटे और उन्होंने छोटे किसानों के लिए कुछ करने के बारे में सोचा।

शुरुआत में यह कठिन लगता था क्योंकि शिक्षा बिल्कुल अलग विषय में हुई थी, लेकिन किताबों का साथ और शोध की प्रवृत्ति ने उनकी राह आसान बनाई। उनके पास पैतृक ज़मीन थी, जिस पर उन्होंने विभिन्न प्रकार की फसलों के साथ रसायन मुक्त खेती के प्रयोग शुरू किए। सफलता मिलने लगी तो गाँव-गाँव जाकर किसानों को प्रशिक्षण देना शुरू किया। अब तक लगभग 300 गाँवों के किसानों से जुड़कर वे उन तक रसायन मुक्त खेती के तरीके पहुँचा चुके हैं। कई किसानों ने उनकी बताई राह पर चलना भी शुरू किया है।

रसायन मुक्त खेती के प्रयोगों के दौरान ही उन्होंने रसायन मुक्त खाद एवं दवाइयाँ बनाने के प्रयोग शुरू किए। जब वे सफल रहे तो उन्हें बाज़ार में उतारा। ऐसा नहीं था कि जैविक उत्पाद बाज़ार में उपलब्ध नहीं थे, लेकिन अधिकांश उत्पादों में मिलावट और छल पाया। साथ ही, उनकी कीमतें इतनी अधिक होतीं, कि एक छोटा किसान उसे खरीदने से पहले ही जैविक खेती से विरक्त हो जाए।

अतः समर्थ का मुख्य उद्देश्य कम से कम कीमत पर शुद्ध रसायन मुक्त उत्पाद किसानों तक पहुँचाना एवं उन्हें स्वयं रसायन मुक्त खाद एवं दवाइयाँ बनाना सिखाना था। मैं पिछले चार वर्षों में उनके इस कार्य में सहयोगी रही हूँ। और वे मेरे लेखन में सहयोगी रहे।

मेरी दूसरी किताब ‘मैं से माँ तक’ मैं उनके सहयोग की वजह से ही लिख पाई। अन्यथा मातृत्व, प्रेग्नेंसी के नौ माह, और उस दौरान भारतीय स्त्रियों के सामने आने वाली कठिनाइयों के बारे में मुखर होकर लिखना एक ‘बहु’ के लिए आसान नहीं होता।

अधिकांश स्त्रियाँ माँ बनने के दौरान काम से ब्रेक ले लेती हैं। मेरे जीवन में लेखन मुख्य रूप से उसी दौर में शुरू हुआ। मैं माँ बन रही थी, बनी और अब बच्चे के साथ भी काम करती हूँ, रुकना या ब्रेक लेना नहीं चाहती। ऐसा नहीं है कि कठिनाइयों ने परेशान नहीं किया, लेकिन रुक जाऊँगी तो पीछे छूट जाऊँगी, बस यही सोच कर काम में लगाए रखती हूँ।

मैंने जब यह कॉलम लिखना शुरू किया, तो ढेर सारी महिलाओं के संदेश आते। वे सभी किसी न किसी समस्या से जूझते हुए अपने नौ माह काट रही थीं। ऐसे में मुझमें वे डिजिटल सहेली पातीं और अपना मन हल्का करतीं। आज यह किताब के रूप में है और ख़ुशी की बात यह है कि महिलाओं के अलावा पुरुषों से भी इस किताब पर सुंदर और सकारात्मक प्रतिक्रिया मिलती है।

मेरे लेखन का उद्देश्य यही है कि कोई एक व्यक्ति भी कुछ अच्छा और सही करने के लिए प्रेरित हो सके तो मैं अपना लेखन सार्थक मानूँगी। मेरी आगामी दो किताबें भी इसी उद्देश्य के साथ आ रही हैं। जिनमें से एक उपेक्षित स्त्रियों को केंद्र में रखकर लिखा गया कहानी संग्रह है और दूसरी किसानों से जुड़ी, खेती से जुड़ी, असल समस्याओं और किसानों के जीवन के भीतर की कहानी पर आधारित है।

मैं और समर्थ दोनों ही इसी उद्देश्य के साथ आगे बढ़ रहे हैं कि सकारात्मक रहते हुए इस देश और समाज के लिए कुछ कर पाएँ। इन दिनों समर्थ प्लास्टिक से तेल निकालने की मशीन बना रहे हैं। हमारा बिज़नेस स्टार्टअप इंडिया के तहत रजिस्टर्ड है और हमें सरकार की तरफ से लोन के अलावा गाइडेंस भी मिलती है।

यह इस तरह का पहला एक्सपेरिमेंट नहीं है। दुनियाभर में इसके लिए काम हुआ है और कुछ जगहों पर सफलतापूर्वक प्लास्टिक से तेल निकाला भी जा रहा है। हमारे प्रयोग में जो नई कोशिश है वह है; छोटे-छोटे गाँव और नगरों के लिए न्यूनतम ख़र्च में एक मशीन तैयार करना जो नॉन-रीसायकल या डिस्पोजल प्लास्टिक से तेल निकाल सके। जो तेल निकलेगा वह केरोसीन और डीज़ल के बीच की या कई बार डीज़ल जितनी ही गुणवत्ता का रहेगा और उस तरह से इस्तेमाल किया जा सकेगा।

हमारी कोशिश है कि गाँव वालों के लिए एक ऐसी मशीन बन सके जो उन्हें उन्हीं के गाँव में उपयोग की जा रही प्लास्टिक से तेल निकाल सके और वे उस तेल का प्रयोग रोजमर्रा के कामों में कर सकें। यह प्लास्टिक से तेल निकालने का सबसे अच्छा तरीका जिसकी प्रक्रिया में किसी भी प्रकार का प्रदूषण नहीं होगा। हमारा उद्देश्य बस इतना है कि प्रकृति और समाज स्वस्थ रहें, ख़ुश रहें। 

अंकिता जैन जशपुर छतीसगढ़ की रहने वाली हैं। इंजीनियरिंग के बाद विप्रो इंफोटेक में काम कर चुकी हैं। इसके अलावा सीडैक, पुणे में बतौर रिसर्च एसोसिएट एक साल रहीं। साल 2012 में भोपाल के एक इंजीनियरिंग इंस्टिट्यूट में असिस्टेंट प्रोफेसर रहीं। इस सबके बावजूद उनकी दिलचस्पी लेखन और कृषि में है।

जल संकट: PM मोदी ने भी माना कि सच हो गई मिशनरी विरोधी जैन मुनि की भविष्यवाणी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने सरकार की उपलब्धियों पर बात करते हुए नया ‘जल शक्ति मंत्रालय’ गठित किए जाने का जिक्र किया। जल संरक्षण की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए पीएम ने अपने संबोधन में जल संकट की गंभीरता पर बात की। उन्होंने कहा कि इंतजार की घड़ी ख़त्म हो गई है और देश-समाज को इस बारे में सोचना पड़ेगा। उन्होंने शिक्षकों को सलाह दी कि छात्रों को बचपन से ही जल संरक्षण की शिक्षा दी जाए और पानी के हर एक बूँद से अधिक पैदावार हो।

इस दौरान पीएम ने जैन मुनि बुद्धिसागर सूरी की कविता का जिक्र किया। जैन मुनि बुद्धिसागर महाराज ने आज से एक सदी पहले ही भविष्यवाणी की थी कि एक ऐसा समय आएगा, जब पीने का पानी किराने की दुकान पर मिलेगा। आज ऐसा ही हो रहा है। प्रधानमंत्री मोदी ने इस पर बात करते हुए कहा:

“आजादी के 70 साल हो गए। हर किसी ने अपने-अपने तरीके से प्रयास किया है लेकिन आज हिन्दुस्तान में आधे घर ऐसे हैं जिनको पीने के पानी के लिए मशक्क्त करनी पड़ती है। 2-5 किमी पैदल जाना पड़ता है। आधा जीवन इसी में खप जाता है। हर घर को जल कैसे मिले? हम आने वाले दिनों में जल जीवन मिशन को लेकर आगे बढ़ेंगे। इस मद में साढ़े तीन लाख करोड़ से भी ज्यादा खर्च करने का संकल्प किया है।”

प्रधानमंत्री ने जिन जैन मुनि का जिक्र किया, वह छठी कक्षा तक ही पढ़े थे लेकिन आगे चल कर संस्कृत और योग के बड़े विद्वान कहलाए। आचार्य बुद्धिसागर सूरी ने गुजरात के मनसा में महुड़ी जैन मंदिर की स्थापना की, जो कई सम्प्रदायों का पवित्र स्थान बना। वह क्रिश्चियनिटी के प्रखर आलोचक थे और गुजरात में मिशनरी ईसाईयों द्वारा चलाए जा रहे धर्मान्तरण के सख्त विरोधी। 125 पुस्तकें लिखने वाले बुद्धिसागर ने मूर्तिपूजा का समर्थन किया और वह तर्क-शास्त्रार्थ में किस को भी बौना साबित करने की क्षमता रखते थे।

देखें 3:15 के बाद: PM मोदी ने किया जैन मुनि की भविष्यवाणी का जिक्र

अगर उनके द्वारा स्थापित महुड़ी मंदिर की बात करें तो वहाँ जैन के तृतीया तीर्थकर पद्मप्रभ की मूर्ति विराजमान है। वहाँ प्रसाद के रूप में सुकड़ी चढ़ाया जाता रहा है लेकिन परंपरा रही है कि प्रसाद को मंदिर के प्रांगण से बाहर नहीं ले जाया जा सकता। मंदिर में घंटाकर्ण महावीर की भी एक प्रतिमा है, जो महान क्षत्रिय राजा हुए हैं। वह आतताइयों से कन्याओं की रक्षा किया करते थे।

The Wire को भारत की हर चीज़ से दिक्कत है, चाहे वो झंडा हो, मंगलयान हो, या ISRO पर फिल्म हो

जब कश्मीर से उसका ‘विशेष झंडा’ छीन तिरंगे के नीचे लाया गया, The Wire को तब भी समस्या होती है, और जब संघ कथित तौर पर तिरंगे की बजाय भगवा पसंद करता है तब भी। उन्हें मंगलयान की टीम में मौजूद महिलाओं की ‘शोर के साथ’ बड़ाई से भी दिक्कत है, और अक्षय कुमार के किरदार के चुप और शांत रहने से भी। वे साड़ी वाली महिलाओं द्वारा घर-बाहर दोनों संभाल लेने के विद्या बालन के किरदार की उपलब्धि से भी नाराज़ होते हैं, और तापसी पन्नू के किरदार के कार न चला पाने से भी। इन सबमें समान बात केवल यह है कि उन्हें भारत से जुड़ी, भारतीयता के प्रति गर्व उतपन्न करने वाली हर चीज़ से एलर्जी है।

गोलवलकर, तिंरगा, मोदी

आज वायर में एक लेख छपा जिसका मजमून कुल इतना ही था कि ‘संघी’ मोदी तिरंगा झंडा फ़हराए तो न देशभक्ति जाग सकती है न देश के लिए सम्मान। क्यों? क्योंकि किसी समय गोलवलकर ने तिरंगे का विरोध कर भगवा झंडे की वकालत की थी, और 2001 में जबरन घुस कर अपने मुख्यालय पर तिरंगा फ़हराने वालों के ख़िलाफ़ RSS ने मुकदमा किया था।

गोलवलकर ने उस समय वह बात किस संदर्भ में, किस ‘frame of mind’ में कही थी, उनका पूर्ण मंतव्य क्या था, इसपर एक पंक्ति या अनुच्छेद में बात नहीं हो सकती- यह अपने आप में एक लेख में भी समाने वाला नहीं, एक पूरी किताब का विषय है। इस पर फ़िलहाल इतना कहना पर्याप्त है कि ठीक है, ऐसा गोलवलकर का मानना था, लेकिन हर स्वयंसेवक उनके हर विचार को पूरी तरह आत्मसात करने के लिए मजबूर नहीं है। गोलवलकर “ऊपर वाले का अंतिम संदेशवाहक” नहीं थे कि उनकी बातों से नाइत्तेफ़ाक़ी रखने वालों का सर कलम हो जाएगा संघ में।

आप मोदी की बात कर रहे हैं तो मोदी के बारे में बात करिए। क्या मोदी के 18 वर्षों के सरकारी, कर उसके भी पहले दशकों के राजनीतिक जीवन में किसी ने तिरंगे के ख़िलाफ़ उनके उद्गार सुने हैं? नहीं सुने होंगे। मकसद दरअसल मोदी नहीं, मोदी के बहाने तिरंगे झंडे और भारत की सम्प्रभुता को पदच्युत करना है। यही मकसद पहले भी था, और आज जब ठसक के साथ तिरंगा कश्मीरी जिहादियों के सीने पर मूँग दल रहा है, बिना अपनी सम्प्रभुता फ़र्ज़ी कश्मीरी झंडे के साथ साझा किए, तो वायर से ऐसे लेखों की उल्टियाँ बढ़-बढ़कर हो रहीं हैं।

और मज़े की बात यह कि 2001 में संघ के मुख्यालय पर तिरंगा फ़हराए जाने पर तालियाँ पीटने वाला वायर कश्मीर में तिरंगे की सम्प्रभुता पर उसी साँस में सवाल खड़े कर रहा है! दोगलेपन की ऐसी सानी मिलना मुश्किल है।

आपको शर्म मंगलयान के नहीं, अपने सस्तेपन पर आनी चाहिए

मंगलयान पर बनी फ़िल्म ‘मिशन मंगल’ की समीक्षा में द वायर के लेखक सीधे-सीधे कहते हैं कि NASA के मंगल मिशन MAVEN (Mars Atmosphere and Volatile Evolution) की ₹6,000 करोड़ लागत के मुकाबले मंगलयान के ₹400 करोड़ में सम्पन्न हो जाने की बात का ज़िक्र उन्हें ‘लज्जित’ करता है। इसमें शर्म की आखिर कौन सी बात है? विकासशील देशों में किसी भी चीज़ की लागत निर्णय के पैमानों में हमेशा ही महत्वपूर्ण पैमाना होती है, और किसी अमीर/विकसित देश के मुकाबले कम में काम कर लेने में शर्म कैसी?

इसके अलावा वह फिल्म में महिलाओं के लगभग हर रूप में प्रदर्शन पर आपत्ति ही जताते हैं। विद्या बालन घर संभालने से लेकर प्रोजेक्ट का निर्देशन तक सब कुछ कर ले रहीं हैं, तो उसमें भी आपत्ति, और तापसी पन्नू को साइंटिस्ट होते हुए भी कार चलाना सीखने में संघर्ष करता दिखाया जा रहा है, तो उसमें भी आपत्ति। साड़ी वाली महिलाओं को बौद्धिक रूप से अग्रणी दिखाया जा रहा है तो उसमें भी वह न जाने कहाँ से ‘स्टीरियोटाइपिंग’ ढूँढ़ लाते हैं, जबकि साड़ी को तो उन्हीं के पत्रकारिता और मीडिया वाले समुदाय विशेष ने ‘पिछड़ी, दबी-कुचली भारतीय महिला का पहनावा’ के रूप में स्टीरियोटाइप किया था।

जब महिला किरदार खाना पकाती दिखे तो उससे भी आपत्ति है, और जब किसी महिला वैज्ञानिक का पति उसके काम की सेना से तुलना कर सम्मान प्रदर्शित करे तो भी आपत्ति। अक्षय कुमार का किरदार धीर-गंभीर, कुछ-कड़क कम बोलने वाले पुरुष का है तो भी आपत्ति, और शरमन जोशी का शर्मीले, सोनाक्षी सिन्हा को ‘इम्प्रेस’ करने की कोशिश कर रहे पुरुष का किरदार है तो भी आपत्ति।

सबसे बड़ी आपत्ति आखिरी वाक्य में- कि अपने अंदर-ही-अंदर, गुमसुम-सी रहने वाली ख़ुशी की बजाय ‘आक्रामक’ होकर भारत की उपलब्धियों का जश्न क्यों मनाना। यही वायर की असली मानसिकता है, यही है इस फ़िल्म से चिढ़ने की असली वजह, कि अगर भारत की उपलब्धि पर चूड़ियाँ तोड़ कर विलाप नहीं कर सकते तो कम-से-कम उसका बखान कर हमारे घावों पर नमक तो मत रगड़ो।

झंडा हो या मंगलयान, असली दुश्मन भारत नहीं हिन्दू हैं

सवाल यह उठता है कि जिस थाली में वायर खा रहा है, उसमें छेद के लिए इतना उतावला क्यों है। तो जवाब यह है कि वायर की असली जलन भारत से नहीं, भारत के बहुसंख्यक हिन्दू समुदाय से है। यह भारत-विरोधी कम, हिन्दू-विरोधी अधिक है। इसीलिए यह तिंरगे झंडे के मामले में बिना किसी प्रासंगिकता के भगवा झंडे खींच लाता है, ताकि ज़हर यह भरा जा सके कि भारत की बहुसंख्यक हिन्दू आबादी तिरंगे की आड़ में भगवा झंडा कश्मीर पर थोप रही है। जबकि सच इसका उल्टा है। ‘सेक्युलर’ झंडे की सम्प्रभुता हिन्दू-बहुल शेष-भारत को तो मंज़ूर थी, लेकिन कश्मीर को नहीं।

और आज मोदी ने वही करके दिखाया कि कश्मीर का मजहबी समुदाय बाकी देश के हिन्दुओं के बराबर में आ गया है। कश्मीर में बिना किसी और झंडे से सर्वोच्चता साझा किए फ़हरा रहा तिरंगा इसी का द्योतक है। यही घाटी के समुदाय विशेष के भी असंतोष का कारण है, और यही भावना भगवा-तिरंगा को गड्ड-मड्ड करके वायर और भड़काना चाहता है।

मिशन मंगल के मामले में भी यही है। दिक्कत असली यह है कि इसे अंजाम देने वाली महिलाएँ साड़ी-चूड़ी-बिंदी वाली थीं, बुर्के-हिजाब वाली नहीं। यह उस नैरेटिव की पटकथा के विपरीत था, जिसमें साड़ी ‘पिछड़ी, दबी-कुचली हिन्दू महिला’ का पहनावा थी। इसीलिए उनकी उपलब्धि पर बनी फिल्म में सौ खोट न होते हुए भी ‘ढ़ूँढ़ निकालने’ की कोशिश हो रही है, ताकि साड़ी पहनने वाली, हिन्दू रीति-रिवाजों और मूल्यों पर चलने वाली महिलाओं की सफ़लता को, मीडिया में उसके गान को अवैध करार दिया जा सके; ताकि नैरेटिव ज़िंदा रहे।

बालाकोट एयरस्ट्राइक: पाकिस्तान के F-16 लड़ाकू विमान को मार गिराने में मिंटी अग्रवाल ने निभाई थी अहम भूमिका

IAF (भारतीय वायु सेना) के बालाकोट हवाई अड्डे पर पाकिस्तान की जवाबी कार्रवाई के दौरान उड़ान नियंत्रक के रूप में काम करने वाली मिंटी अग्रवाल भारत की पहली महिला हैं जिन्हें युद्ध सेवा मेडल से सम्मानित किया गया है। एयरस्ट्राइक को याद करते हुए मिंटी अग्रवाल ने बताया कि 26 फरवरी को उन्होंने आतंकी शिविरों पर एयर स्ट्राइक के मिशन को सफलतापूर्वक अंजाम दिया था। 

उन्होंने बताया कि उन्हें लग रहा था कि पाकिस्तान एयरस्ट्राइक का जवाब तुरंत देगा, जिसके लिए उनकी टीम पूरी तरह से तैयार थी। पाकिस्तान ने कई घंटों बीत जाने के बाद बम गिराने की नाकाम कोशिश की। इसके लिए LoC के पास पहले से ही लड़ाकू विमान तैनात कर दिए गए थे।

स्क्वॉड्रन लीडर मिंटी अग्रवाल ने कहा, “एफ-16 को विंग कमांडर अभिनंदन ने मार गिराया था। वह अचानक लड़ाई का वक्त थ। स्थिति बेहद फ्लेक्सिबल थी। वहाँ दुश्मन देश के कई विमान तैनात थे। हमारे विमान उनके हमलों का जवाब दे रहे थे। हर तरफ से पाकिस्तानी विमानों से हम अपनी रक्षा कर रहे थे।’’

उन्होंने कहा,“26 फरवरी को हमने ग़ैर-सैन्य शिविरों में बालाकोट मिशन को सफलतापूर्वक अंजाम दिया। हमें प्रतिशोध की उम्मीद थी, उसके लिए पहले से तैयार थे और उन्होंने मात्र 24 घंटे में जवाबी कार्रवाई की।”

ग़ौरतलब है कि वायु सेना के विंग कमांडर वर्धमान अभिननंदन ने पाकिस्तान के एफ-16 लड़ाकू विमान मार गिराया था। उनकी इस वीरता में उनकी सहयोगी मिंटी अग्रवाल ने अहम भूमिका निभाई थी। उस समय वो वायु सेना के रडार कंट्रोल स्टेशन पर तैनात थीं। जब पाकिस्तान लड़ाकू विमानों ने उनके एयरबेस से उड़ान भरी और Pok के रास्ते भारतीय वायु सेना में प्रवेश करने के लिए आगे बढे, तभी उन्होंने श्रीनगर स्थित वायु सेना के एयरबेस को सूचित कर दिया, जहाँ विंग कमांडर अभिनंदन सहित कई भारतीय लड़ाकू विमान हाई अलर्ट पर थे।

स्क्वॉड्रन लीडर मिंटी अग्रवाल से सूचना मिलते ही अभिनंदन ने उड़ान भरी और अपनी वायु सीमा पर पहुँच गए। इस बीच, स्क्वॉड्रन लीडर मिंटी अग्रवाल अभिनंदन को हर पल पाकिस्तान जेट की स्थिति से लगातार अवगत कराती रहीं, जिससे वो इस ऑपरेशन को सफलतापूर्वक पूरा करने में सफल हुए।

11वीं सदी के मंदिर में किया कई बार बलात्कार, रंगे हाथ पकड़ा गया कुतुबुद्दीन अहमद

एक चौंकाने वाली घटना में, असम के ढेकियाजुली में एक मंदिर में एक लड़की के साथ बलात्कार की घटना सामने आई है। यह घटना बुधवार (14 अगस्त) को ढेकुकुली के सिंगोरी क्षेत्र में विश्वकर्मा मंदिर के परिसर में हुई। आरोपित कुतुबुद्दीन अहमद को पुलिस ने पकड़ लिया है।

ख़बर के अनुसार, कुतुबुद्दीन पास के मिसामारी के एराबारी से लड़की को किसी बहाने से प्राचीन मंदिर के परिसर में लाया। वहाँ उसने उसे कुछ नशीली दवा खिला दी और फिर कई बार उसका बलात्कार किया। लेकिन, कुतुबुद्दीन की इस हरक़त को मंदिर परिसर की देखरेख करने वालों ने दो लोगों ने देख लिया। उन्होंने कुतुबुद्दीन को पकड़ लिया और उसे पुलिस के हवाले कर दिया। देखरेख करने वालों ने कुतुबुद्दीन की इस शर्मनाक़ हरक़त को सबूत के तौर पर रिकॉर्ड भी किया है।

पीड़िता ने भी पुलिस को घटना की पूरी जानकारी देत हुए आरोपित के ख़िलाफ़ शिक़ायत दर्ज कराई है। FIR के आधार पर, कुतुबुद्दीन अहमद को पुलिस ने गिरफ़्तार कर लिया है और मामले की जाँच शुरू कर दी है।

आपको बता दें कि सिंगोरी पहाड़ी एक प्राचीन विश्वकर्मा मंदिर के खंडहर का स्थान है, जो 11वीं-12वीं शताब्दी का है। यह असम में सोनितपुर ज़िले में सिंगोरी टी एस्टेट के अंदर स्थित है।

हाउस नंबर 677 में गिरी 20 लाशें: कभी भारतीय कर्नल के कारण भाग खड़े हुए थे पाकिस्तानी फौजी

बांग्लादेश की राजधानी ढाका का धनमंडी। धनमंडी के रोड नंबर 32 का हाउस नंबर 677। 15 अगस्त 1975 को इस घर में एक के बाद एक 20 लोगों की हत्या कर दी गई।

इस नरसंहार से पहले 1971 में धनमंडी के इस घर को पाकिस्तानी फौजियों ने घेर रखा था। एक परिवार करीब नौ महीने से घर में बंधक बना हुआ था। किसी भी वक्त उस परिवार के हर सदस्य मौत के घाट उतारे जा सकते थे। लेकिन एक भारतीय कर्नल ने अपने तीन जवानों के साथ मिलकर उस परिवार को सुरक्षित बाहर निकाल लिया।

यह परिवार था बांग्लादेश के संस्थापक, उसके पहले राष्ट्रपति ‘बंगबंधु’ शेख मुजीब-उररहमान का। बंगबंधु के साथ उनके परिवार को बचाने वाले भारतीय कर्नल थे अशोक तारा

लेकिन, 15 अगस्त 1975 को बांग्लादेश की सेना के ही कुछ बागी अफसरों ने बंगबंधु सहित उनके पूरे परिवार को मौत के घाट उतार दिया। केवल उनकी दो बेटियॉं बांग्लादेश की मौजूदा प्रधानमंत्री शेख हसीना और शेख रेहाना जीवित बचीं, क्योंकि दोनों उस वक्त जर्मनी में थीं।

बताते हैं कि भारतीय खुफिया एजेंसी रॉ को इसका अंदेशा पहले से ही था। हत्या से सात महीने पहले दिसंबर 1974 में रॉ के संस्थापक आरएन काव ने शेख मुजीब से मुलाकात कर उन्हें आगाह किया था। लेकिन बंगबंधु का जवाब था, “ये मेरे बच्चे हैं मुझे नुकसान नहीं पहुँचाएँगे।”

अशोक रैना की किताब ‘इनसाइड रॉ’ के मुताबिक आरएन काव ने उस वक्त शेख मुजीब से कहा था कि उनके पास पुख्ता सूचनाएँ हैं और वे इससे जुड़े विवरण उन्हें भेजेंगे। मार्च 1975 में रॉ के एक शीर्ष अधिकारी ने ढाका पहुॅंच कर शेख मुजीब को इस साजिश में शामिल अधिकारियों के बारे में विस्तार से जानकारी दी। लेकिन, वे फिर भी नहीं माने।

सलील त्रिपाठी ने अपनी किताब ‘द कर्नल हू वुड नॉट रिपेंट’ में बताया है कि बागी अधिकारियों के अपने मिशन पर निकलने के बावजूद शेख मुजीब को अंदाजा तक नहीं था कि उनकी हत्या का मिशन शुरू हो चुका है। बांग्लादेश के सेनाध्यक्ष जनरल शफीउल्ला को सेना की दो बटालियन के बिना किसी आदेश के शेख मुजीब के घर की ओर बढ़ने की सूचना मिली।

उन्होंने शेख मुजीब को फोन मिलाया, लेकिन लाइन व्यस्त थी। बहुत कोशिशों के बाद उनका शेख मुजीब से संपर्क हुआ। शेख मुजीब गुस्से में बोले, “शफीउल्ला तोमार फोर्स आमार बाड़ी अटैक करोछे। तुमि जल्दी फोर्स पठाओ (तुम्हारे फोर्स ने मेरे घर पर हमला किया है, जल्दी सेना भेजो)।” इसी दौरान पीछे से गोलियों की आवाज सुनाई पड़ी और पूरे परिवार का सफाया हो गया।

पूरे परिवार का सफाया (साभार: डेली स्टार)

एंथनी मैस्करेनहास अपनी किताब ‘बांग्लादेश ए लेगसी ऑफ ब्लड’ में इस घटना का जिक्र करते हुए लिखते हैं, “शेख मुजीब को देखते ही मोहिउद्दीन नर्वस हो गया। उसके मुॅंह से केवल इतना ही निकला, सर आपनी आशुन (सर आप आइए)। मुजीब ने चिल्ला कर कहा-क्या चाहते हो? क्या तुम मुझे मारने आए हो? भूल जाओ। पाकिस्तान की सेना ऐसा नहीं कर पाई। तुम किस खेत की मूली हो?”

तभी स्टेनगन लिए मेजर नूर ने प्रवेश किया और मोहिउद्दीन को धक्का देते हुए पूरी स्टेनगन खाली कर दी। मुजीब मुँह के बल गिरे। उनका पसंदीदा पाइप उनके हाथ में था।

‘द कर्नल हू वुड नॉट रिपेंट’ के मुताबिक एक नौकर शेख मुजीब को गोली लगने की खबर दौड़कर उनकी बीवी को देता है। पीछे से सैनिक भी वहॉं आ धमके और गोली चलानी शुरू कर दी। देखते-देखते सारे लोग मारे गए। तभी एक जीप शेख मुजीब के घर के सामने आकर रुकी और उसमें से मेजर फारूक रहमान बाहर निकला। मेजर हुदा ने उसके कान में फुसफुसाकर कहा ‘सब खत्म हो गए।’

2010 में कर्नल फारूक रहमान, मेजर हुदा सहित पॉंच हत्यारों को ढाका की केंद्रीय जेल में फॉंसी दी गई। सात हत्यारे अब भी फरार हैं। बांग्लादेश के इतिहास का ये सबसे लंबा चला मुकदमा है। अरसे तक इन हत्यारों पर मुकदमा ही नहीं चला। 1996 में आरोपियों के खिलाफ मुकदमा दायर किया गया।