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चिदंबरम के ख़िलाफ़ लुकआउट सर्कुलर जारी, देश छोड़ कर नहीं भाग सकेंगे

कॉन्ग्रेस नेता पी चिदंबरम के ख़िलाफ़ प्रवर्तन निदेशालय ने लुकआउट सर्कुलर जारी कर दिया है। वह विदेश नहीं भाग पाएँगे। उनकी अग्रिम जमानत याचिका ख़ारिज होने के बाद से अब तक सीबीआई की टीम कई बार उनके आवास पर जा चुकी है लेकिन चिदंबरम का कोई अता-पता नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट से भी चिदंबरम को झटका मिला है। उनके वकील कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि जब तक अंतरिम जमानत पर सुनवाई ना हो जाए, चिदंबरम को गिरफ्तार नहीं किया जाना चाहिए। इसके बाद जस्टिस रमन्ना की पीठ ने सीजेआई को मामला भेज दिया।

आईएनएक्स मीडिया केस में चिदंबरम की सरकारी एजेंसियाँ तलाश कर रही हैं। सुप्रीम कोर्ट की कॉन्स्टीट्यूशन बेंच अभी अयोध्या मामले की सुनवाई में व्यस्त है, इसलिए चिदंबरम को तुरंत रहत मिलने की कोई उम्मीद नहीं है।

बंगाल: ‘कट मनी’ वापस माँगने पर TMC के मोहम्मद बुलबुल ने 3 साथियों के साथ महिला से किया गैंगरेप

पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी में कट मनी वापस माँगने पर महिला के साथ गैंगरेप हुआ। आरोपित का नाम मोहम्मद बुलबुल आलम है। आलम तृणमूल कॉन्ग्रेस की स्थानीय पंचायत का सदस्य है। महिला की शिकायत के मुताबिक आलम के अलावा 3 अन्य लोगों के खिलाफ मामला दर्जा किया गया है। इनकी पहचान जैदुल इस्लाम, जैनल अबेदिन और अफिदुल हक के रूप में हुई हैं।

घटना 14 अगस्त की है। लेकिन, मोयानगरी पुलिस थाने में इसकी शिकायत बीते सोमवार (अगस्त 19, 2019) को दर्ज हुई। पुलिस ने बताया कि अभी कोई गिरफ्तारी नहीं हुई। सभी आरोपित फरार हैं। पुलिस उनकी तलाश कर रही है।

जानकारी के मुताबिक मोहम्मद बुलबुल आलम ने कथित तौर पर महिला को गीतांजली आवास योजना के तहत घर देने का वादा किया था। जिसके लिए उसने महिला से 7 हजार की कट मनी भी ली थी। लेकिन महिला को न तो घर मिला और न ही पैसे। वो आलम पर पैसे वापस करने का दबाव बनाने लगी।

इसके कारण 14 अगस्त को आलम ने महिला को मिलने के लिए बुलाया और अपने तीन साथियों के साथ मिलकर उसके साथ बलात्कार किया। महिला को मुँह बंद रखने की धमकी भी दी।

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक जलपाईगुड़ी के वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने बताया, “हमें शिकायत मिल चुकी है। हम मेडिकल रिपोर्ट का इंतजार कर रहे हैं। साथ ही आरोपितों की तलाश भी की जा रही है।”

शशि थरूर ने पाकिस्तानी पत्रकार को लिखा ‘मेरी प्रियतम’…सुनंदा पुष्कर के शरीर पर चोट के 15 निशान

दिल्ली की रोज़ एवेन्यू अदालत में सुनंदा पुष्कर मामले की सुनवाई के दौरान शशि थरूर पर घरेलू हिंसा के आरोप लगाए गए। बताया गया कि मौत के समय सुनंदा के शरीर पर मारपीट के छोटे-बड़े मिलाकर 15 निशान थे, जो कम से कम 12 घंटा और अधिक से अधिक 4 दिन पुराने थे।

सुनवाई के दौरान सुनंदा केस की जाँच में जुटी दिल्ली पुलिस की ओर से वकील अतुल श्रीवास्तव ने पूरे मामले में सबूतों का हवाला दिया। उन्होंने सुनंदा पुष्कर के साथ घरेलू हिंसा पर सबका ध्यान खींचा। उन्होंने आशंका जताई कि हो सकता है वह समय-समय पर ऐसी हिंसा का शिकार होती रही हों।

वकील ने दावा किया कि मानसिक परेशानियों और शारीरिक हिंसा के कारण सुनंदा पुष्कर आत्महत्या करने पर मजबूर हुईं। इसलिए आत्महत्या के लिए उकसाने और घरेलू हिंसा करने के आरोप में कॉन्ग्रेस नेता शशि थरूर के ख़िलाफ़ केस फाइल हो।

कोर्ट में सुनंदा पुष्कर की मेडिकल रिपोर्ट का हवाला देते हुए थरूर पर आरोप लगे, कि सुनंदा की मौत से 4 दिन पहले दोनों पति-पत्नी में लड़ाई हुई थी, जिसके कारण पुष्कर ने सुसाइड की। अभियोजन पक्ष ने यह भी कहा कि सुनंदा के साथ थरूर के व्यवहार और संबंध दोनों ठीक नहीं थे। अदालत में थरूर और पाकिस्तानी पत्रकार मेहर तरार के बीच के संबंधों का भी जिक्र हुआ।

बताया गया कि कॉन्ग्रेस नेता शशि थरूर और पाकिस्तानी पत्रकार मेहर तरार के कथित तौर पर संबंध थे। दोनों एक-दूसरे को खत भेजते थे जिसमें प्यार भरी भाषा का इस्तेमाल होता था। अभियोजन पक्ष ने दावा किया कि शशि थरूर द्वारा तरार को लिखे पत्र में मेहर के नाम की जगह ‘मेरी प्रियतम’ कहकर संबोधित किया गया था। ये सब कुछ सुनंदा के लिए किसी प्रताड़ना से कम नहीं था।

इसके अलावा अभियोजन ने इस बात पर भी कोर्ट का ध्यान दिलवाया कि थरूर और सुनंदा दोनों की शादी को 3 साल 4 महीने हुए थे, दोनों की ये तीसरी शादी थी। ऐसे में पुष्कर की इस तरह असामान्य मौत संदिग्ध है।

उल्लेखनीय है कि 17 जनवरी 2014 को दिल्ली के होटल लीला में 51 वर्षीय सुनंदा पुष्कर मृत मिली थीं। उनकी मौत के बाद से पुलिस ने थरूर के खिलाफ़ आईपीसी की धारा 498-A और धारा -306 के तहत मामला दर्ज किया। फिलहाल वह जमानत पर हैं।

पहले नौकरी लो फिर डिग्री जुगाड़ो: मायावती ने गिफ्ट में दी नौकरियाँ, योगी ने दिए जाँच के आदेश

बसपा सुप्रीमो मायावती जब उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री थीं तो नोएडा प्राधिकरण में योग्यता को नजरंदाज कर नियुक्तियॉं हुई। सिफारिशों के आधार पर उपहार में नौकरी दी गई। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इन भर्तियों की जाँच के आदेश दिए हैं। योगी सरकार ने यह कार्रवाई ग्रेटर नोएडा के विधायक धीरेंद्र सिंह द्वारा मुख्यमंत्री कार्यालय में दाखिल की गई शिकायत के आधार पर की है।

बताया जाता है कि मायावती के शासनकाल में ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण के तत्कालीन वरिष्ठ अधिकारियों ने मैनेजर पद पर भर्ती के दौरान योग्यता को ताक पर रखते हुए नेताओं के टेलीफोनिक सिफारिश पर उम्मीदवारों का चयन किया था। जब इन उम्मीदवारों का इंटरव्यू लिया गया तो उनके पास एमबीए की डिग्री नहीं थी। बावजूद इसके उन्हें मैनेजर पद के लिए चुना गया और उन्हें सुझाव दिया गया कि मैनेजर का पदभार संभालने के बाद वो एमबीए में दाखिला ले और फिर डिग्री जमा करें।

इस घोटाले में वरिष्ठ आईएएस व राज्य के प्रांतीय सिविल सेवा (पीसीएस) के अधिकारी शामिल हैं। धीरेंद्र सिंह ने इस घोटाले को उजागर करते हुए न्यूज़ एजेंसी आईएएनएस को बताया कि मैनेजर से लेकर चपरासी तक के पदों पर उम्मीदवारों का चयन करते समय नियमों और योग्यताओं को दरकिनार कर दिया गया था।

धीरेंद्र सिंह ने कहा कि ये घोटाला 2002 में शुरू हुआ और नेताओं के फोन पर भर्तियाँ की गईं। उस समय समाजवादी पार्टी (सपा) और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की सरकारें जाँच पर चुप रहीं। धीरेंद्र सिंह का कहना है कि दो महीने पहले उन्होंने सीएम योगी को भ्रष्ट अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए लिखा, जो घोटाले में शामिल थे।

इसके साथ ही धीरेंद्र सिंह ने नोएडा एक्सटेंशन में एक और गंभीर भ्रष्टाचार का मामला उठाया। उन्होंने बताया कि मैनेजर के पद के लिए उम्मीदवार की न्यूनतम पात्रता मानदंड एमबीए डिग्री धारक होना था। लेकिन, बिना एमबीए डिग्री वाले उम्मीदवारों को चयन किया गया। कई साल बाद चयनित उम्मीदवारों ने अपनी एमबीए की पढ़ाई पूरी की। विधायक ने कहा, “इसी तरह से श्रेणी-3 व श्रेणी-4 की नौकरियों में योग्यता स्तर को कम किया गया। 12वीं की बजाय 10वीं व 8वीं उत्तीर्ण उम्मीदवारों को सरकारी नौकरियाँ उपहार के तौर पर दी गईं।”

यूपी कैडर के एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी के मुताबिक, 58 से ज्यादा इस तरह की भर्तियाँ प्रकाश में आईं। जाँच फाइलों में उलझी रही, इनसे पता चलता है कि नियमों की अनदेखी की गई और अयोग्य उम्मीदवारों का चयन किया गया। अधिकारी ने खुलासा किया कि ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण के तत्कालीन अधिकारियों ने राजनेताओं के दबाव में काम किया।

2003 में जब मुलायम सिंह यादव ने मुख्यमंत्री का पदभार संभाला, तो उन्होंने ग्रेटर नोएडा के सीईओ बृजेश कुमार को भर्ती घोटाला को लेकर एक जाँच शुरू करने को कहा। जानकारी के मुताबिक, बृजेश कुमार ने जाँच करने के बाद भर्तियों को रद्द करने की सिफारिश की, 2007 में मायावती फिर से मुख्यमंत्री बन गईं। आरोप है कि मायावती के निर्देश पर घोटाले की फाइल को बंद कर दिया गया। घोटाले में शामिल वरिष्ठ अधिकारियों ने भी मामले पर चुप्पी बनाए रखने की कोशिश की।

बाप ने कहा बेटे की मदद करो, बेटे ने माँगे $10 लाख: इन्द्राणी-पीटर के बयानों से बुरे फँसे चिदंबरम

पूर्व केंद्रीय गृह मंत्री पी चिदंबरम की अग्रिम जमानत याचिका ख़ारिज किए जाने के बाद से उन पर गिरफ़्तारी की तलवार लटक रही है और वे ‘फ़रार’ हैं। कल मंगलवार (अगस्त 19, 2019) देर रात सीबीआई की टीम उनके निवास पर पहुँची लेकिन वह नहीं मिले। आज सुबह से ही सीबीआई की टीम उनके घर पर डटी हुई है। चिदंबरम पर आरोप है कि उन्होंने आईएनएक्स मीडिया को फॉरेन इन्वेस्टमेंट प्रमोशन बोर्ड (FIPB) से ग़ैर-क़ानूनी स्वीकृति दिलाने के लिए रिश्वत ली। यह 2007 का मामला है जब वह देश के वित्त मंत्री थे

सीबीआई और ईडी, दोनों ही इस मामले की जाँच कर रहे हैं। क्या आपको पता है कि चिदंबरम के ख़िलाफ़ इस मामले की जाँच में पीटर मुखर्जी और इन्द्राणी मुखर्जी के बयानों का अहम योगदान है? मुखर्जी दम्पति आईएनएक्स मीडिया के प्रमोटर थे और फिलहाल जेल में बंद हैं। इन्द्राणी ने प्रवर्तन निदेशालय को दिए बयान में बताया कि फॉरेन इन्वेस्टमेंट प्रमोशन बोर्ड के पास आईएनएक्स मीडिया ने अर्जी भेजी थी और उसकी स्वीकृति दिलाने के लिए उन्होंने कम्पनी के एक वरिष्ठ अधिकारी के साथ चिदंबरम से उनके दफ्तर में मुलाक़ात की थी।

इस बातचीत में पीटर मुखर्जी भी शामिल थे। उन्होंने चिदंबरम को बताया कि आईएनएक्स मीडिया ने एफडीआई के लिए एफआईपीबी के पास अर्जी भेजी है। पीटर ने उस अर्जी की एक प्रति चिदंबरम को सौंपी। इसके बाद चिदंबरम ने जो कहा, वह जाँच एजेंसियों के लिए एक अहम कड़ी साबित हुई। चिदंबरम ने मुखर्जी दम्पति से कहा कि वह आईएनएक्स मीडिया को एफआईपीबी से मंजूरी दिला देंगे लेकिन बदले में उनलोगों को उनके बेटे कार्ति चिदंबरम के व्यापार में मदद करनी होगी।

यह बयान चार्जशीट में भी शामिल हुआ और कोर्ट में इसे सबूत के रूप में भी पेश किया गया। इन्द्राणी मुखर्जी ने चिदंबरम को रिश्वत भी दी लेकिन इसकी रक़म कितनी थी, अभी इसका खुलासा नहीं हुआ है। इसके बाद 2008 में एफआईपीबी की मंजूरी में कुछ दिक्कतें आईं तो मुखर्जी दम्पति ने ‘उचित सलाह’ के लिए तत्कालीन केंद्रीय वित्त मंत्री पी चिदंबरम के बेटे कार्ति चिदंबरम से मुलाक़ात की। कार्ति ने मुखर्जी दम्पति से 10 लाख डॉलर रिश्वत के रूप में माँगे।

मार्च 2018 में कार्ति चिदंबरम को मुखर्जी दम्पति के सामने बिठा कर पूछताछ की गई थी। इस तरह पीटर-इन्द्राणी के बयानों से सीबीआई और ईडी को आईएनएक्स मीडिया केस में अहम जानकारियाँ मिलीं। पी चिदंबरम और उनके वकील अब सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी में हैं। कॉन्ग्रेस इस पूरे प्रकरण को ‘बदले की राजनीति’ बता रही है।

आर्टिकल 370 पर फैसले के बाद कश्मीर में पहला Encounter, 1 आतंकी ढेर

जम्मू-कश्मीर के बारामूला में मंगलवार (अगस्त 20, 2019) देर रात आतंकवादियों और सुरक्षा बल के बीच मुठभेड़ हुई। मुठभेड़ में एक आतंकी मारा गया। एक एसपीओ (स्पेशल पुलिस ऑफिसर) को भी अपनी जान गँवानी पड़ी।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक आतंकियों के छिपे होने की खबर मिलते ही सुरक्षा बलों ने इलाके को घेर लिया। इसके बाद आतंकियों ने गोलीबारी शुरू कर दी।

जवाबी कार्रवाई में जवानों ने एक आतंकी को मौक़े पर ढेर कर दिया। सीआरपीएफ और एसओजी की संयुक्त टीम ने पूरे ऑपरेशन को अंजाम दिया।

बता दें आर्टिकल 370 के जम्मू-कश्मीर में निष्प्रभावी होने के बाद एनकाउंटर का यह पहला मामला है।

UP के बाबूराम यादव कैसे बने बाबूलाल गौर: मध्य प्रदेश के पूर्व CM का निधन

मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर का बुधवार (अगस्त 20, 2019) को भोपाल में ह्रदय गति रुकने के कारण निधन हो गया। वह पिछले कुछ दिनों से बीमार चल रहे थे। उनके निधन का समाचार सुनते ही अस्पताल के बाहर भाजपा के कार्यकर्ता जुटने लगे। बाबूलाल गौर पिछले 15 दिनों से नर्मदा अस्पताल में वेंटिलेटर सपोर्ट पर थे। उनकी किडनी भी पूरी तरह काम नहीं कर रही थी। हाल ही में दिल्ली में भी उनका इलाज हुआ था। 1946 से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े रहे गौर 1974 में जनता पार्टी के समर्थन से पहली बार निर्दलीय विधायक बने थे।

दिग्विजय सिंह के दूसरे मुख्यमंत्रित्व काल में बाबूलाल गौर मध्य प्रदेश विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष रहे थे और राज्य भाजपा के प्रमुख के रूप में वे अपनी पार्टी का अहम चेहरा बने रहे। बाद में उमा भारती जब मुख्यमंत्री बनीं तो गौर ने कई अहम मंत्रालय संभाला। वो मुख्यमंत्री भी काफ़ी कठिन परिस्थितियों में बने थे। 1994 स्वतंत्रता दिवस के दौरान कर्नाटक के हुबली में स्थित ईदगाह मैदान में उमा भारती ने राष्ट्रीय ध्वज फहराया था। उनके ख़िलाफ़ अदालत में मामला दर्ज किया गया था। बाद में कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार ने यह मामला फिर से खोल दिया, जिस कारण उमा भारती ने इस्तीफा दिया और गौर मुख्यमंत्री बने।

यह भी जानने लायक बात है कि बाबूलाल गौर का असली नाम बाबूराम यादव था और उनका जन्म उत्तर प्रदेश में हुआ था। एक बार स्कूल में एक शिक्षक ने कहा कि जो भी लड़का उनकी बात ध्यान से सुनेगा, उसके नाम में ‘गौर’ लगा दिया जाएगा। बाबूराम ने शिक्षक के सवालों को ध्यान से सुन कर उनका जवाब दे दिया और शिक्षक ने उनका नाम बाबूराम गौर रख दिया क्योंकि उन्होंने शिक्षक की बात ‘गौर’ से सुनी थी। इसके बाद धीरे-धीरे लोग
बाबूराम की जगह बाबूलाल कहने लगे। बाद में उन्होंने मध्य प्रदेश को अपनी राजनीतिक कर्मभूमि बनाया। उनके निधन के बाद पीएम मोदी और केंद्रीय मंत्री राजनाथ सिंह समेत तमाम नेताओं ने शोक जताया।

J&K: सुरक्षा परिषद में भद पिटवाने के बाद ICJ के देहरी पर Pak, पहले भी खा चुका है यहाँ ‘मार’

जम्मू-कश्मीर मामले में सुरक्षा परिषद में निराश होने के बाद पाकिस्तान ने अंतरराष्ट्रीय न्यायालय का रुख किया है। पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने इस आशय की जानकारी ARY न्यूज़ टीवी को दी। “कश्मीर का मुद्दा ICJ ले जाने का निर्णय सैद्धांतिक तौर पर ले लिया गया है।”

हिंदुस्तान ने पहले ही दे रखी है चेतावनी

हिंदुस्तान ने पहले ही अंतरराष्ट्रीय समुदाय को यह हिदायत दे दी थी कि कश्मीर उसका आंतरिक मसला है। अतः चाहे उसे पूर्ण राज्य से केंद्र-शासित प्रदेश में बदलना हो, या अनुच्छेद 370 के ज़रिए उसे मिले विशेष प्रावधानों को खत्म करना, हिंदुस्तान पूरे कश्मीर (POK और अक्साई चिन सहित) में किसी भी बाहरी शक्ति का हस्तक्षेप सहन नहीं करेगा। सुरक्षा परिषद में भी पाकिस्तान को किसी ने भाव नहीं दिया- सुरक्षा परिषद ने एक अनौपचारिक, अनाधिकारिक बैठक बुलाई, वह भी इसलिए कि हिन्दुस्तानी कार्रवाई लद्दाख में भी हुई, और लद्दाख पर चीन अपना दावा करता है। सुरक्षा परिषद की उस बैठक में भी मीडिया रिपोर्टों के अनुसार स्थायी सदस्यों में 5 में से 4 और अस्थायी सदस्यों में 10 में से 9 ने हिंदुस्तान का पक्ष लिया।

कुलभूषण मामले में मुँह की खा चुका है इसी ICJ में

इसी अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में पाकिस्तान ने पूर्व नेवी अफसर कुलभूषण जाधव के मामले में हार का सामना किया था। ईरान से अगवा कर पाक कुलभूषण को रॉ एजेंट के तौर पर फाँसी पर चढ़ाना चाहता था, ताकि उनके और हिंदुस्तान के सर अपने अंदर फैले जिहाद का ठीकरा फोड़ा जा सके। लेकिन उस मामले में भी ICJ ने हिंदुस्तान का पक्ष सुनने के बाद जाधव की मौत की सज़ा पर पुनर्विचार करने और जाधव को हिंदुस्तानी कॉन्सुलेट से सम्पर्क का अधिकार (कॉन्सुलर एक्सेस) देने का आदेश दिया था।

अगर चपरासी पूर्व-सांसद से ज्यादा कमाते हैं, तो कॉन्ग्रेसी कब करियर बदल रहे हैं?

कॉन्ग्रेस के राज्यसभा सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री आनंद शर्मा फायर हैं, कि मोदी भला पूर्व सांसदों को एक हफ्ते में बंगले खाली करने को कह रहे हैं। उनके हिसाब से यह ‘harsh, Arbitrary and discriminatory’ है। शिकायत कर रहे हैं कि पूर्व सांसद को तो पेंशन एक चपरासी से भी कम मिलती है। और सरकार के सचिवों को मकान खाली करने के लिए 6 महीने का समय मिलता है।

आगे वह मामले को राजनीतिक से नैतिक चाशनी में लपेटने का प्रयास करते हुए पूछते हैं कि क्या मोदी चाहते हैं कि भारतीय सांसद अमीर और भ्रष्ट हो जाएँ? लोगों की बजाय कॉर्पोरेट और मल्टीनेशल कंपनियों के प्रतिनिधि बनें? ईमानदार वालों को परिवार की चिंता करनी होती है।

कॉन्ग्रेस की हाल-फ़िलहाल की पूरी राजनीति की तरह यह भी बोगस तर्कों का एक पुलिंदा है, जिसमें जान केवल इसलिए दिख रही है कि एक साथ 4-5 कुतर्कों और कमज़ोर तर्कों का पुलिंदा आपने साथ बाँध दिया है, इस उम्मीद में कि क्या पता, एक-आधा तीर अँधेरे में ही निशाने पर लग जाए!

पेंशन का झूठ

सांसदों की पेंशन के बारे में आनंद शर्मा जी अर्धसत्य बोल रहे हैं। ₹25,000 मासिक पेंशन सुनने में बिलकुल कम लगती है, लेकिन यह केवल पहली बार सांसद बन कर अगला चुनाव हार जाने वालों की है। उसके बाद दूसरे संसदीय कार्यकाल से इसमें ₹2000 प्रति महीना की वृद्धि होती है। यानि कोई व्यक्ति अगर तीन लोकसभाओं का कार्यकाल पूरा करके रिटायर हो तो उसकी कुल पेंशन होगी ₹25,000 + (अगली दो लोकसभाओं के कार्यकाल के 120 महीने का ₹2000 X 120 = ₹2,40,000) यानि ₹2,65,000।

अगर कोई दूसरे लोकसभा कार्यकाल में एक साल पूरा करके भी त्यागपत्र दे दे तो उसकी पेंशन ₹25,000 + (12 X ₹2000 = ₹24,000) = ₹49,000 होगी। महज़ 6 साल काम करके ₹49,000 की पेंशन किस चपरासी या किस सचिव को मिलती है?

अब ज़रा सांसदों के वेतन की बात करें। 2017 में इंडिया टुडे पर प्रकाशित एक आकलन के मुताबिक एक सांसद को केवल मूल वेतन ₹16,80,000 सालाना था; और सारे खर्चे मिलाकर सरकारी खजाने से ₹35,02,000 सालाना प्रति सांसद का खर्चा था। आनंद शर्मा जी बताएँगे नौकरी के पहले ही साल से ₹35,02,000 किस चपरासी या कितने सचिवों को मिल जाती है? देश के सबसे ‘तगड़े पैकेज’ वाली MBA के बाद की कॉर्पोरेट नौकरी में भी पहले साल से ही ₹35 लाख सालाना पाने वाले महज़ 5-10% होते हैं।

और एक बात, 7 दिन का यह नोटिस दिए जाने के पहले पूर्व सांसदों को चुनाव हारे लगभग 2 महीने बीत चुके हैं। कम होते हैं 2 महीने बोरिया-बिस्तर समेटने के लिए? या पूर्व-सांसद संसद से ‘एग्जिट’ करते समय कोई कसम खाते हैं, जैसे घुसने के समय शपथ ली जाती है संविधान की, कि आखिरी नोटिस, आखिरी धक्का खा के ही खाली करेंगे?

ईमानदारी सांसदों की बपौती नहीं होती

इसके अलावा आनंद शर्मा अपने अगले ट्वीट में जो एजेंडा धकेलने की कोशिश करते हैं ईमानदार “बनाम” कॉर्पोरेट का, वही कॉन्ग्रेस के गर्त में गिरते जाने का सबसे बड़ा कारण है- खुद चुनिंदा अमीरों के साथ मिलकर 2G, कोयला घोटाला से लेकर उनकी पार्टी के किए हुए घोटालों की परतें अभी तक उखड़ रही हैं, और इस देश में सबसे बड़े आयकरदाता कॉर्पोरेट जगत को वह बेईमान घोषित करना चाहते हैं। उन्हें यह पता होना चाहिए कि न केवल मुट्ठी भर कंपनियों द्वारा दिया जाने वाला कॉर्पोरेट टैक्स सरकार के राजस्व का सबसे बड़ा स्रोत है, बल्कि कॉर्पोरेट हवा या मंगल ग्रह से नहीं आते- उन्हीं लाखों-करोड़ों आम शेयरधारकों से बनते हैं, जिनका प्रतिनिधित्व करने का कॉन्ग्रेस पार्टी दावा करती है।

आनंद शर्मा यूपीए में उद्योग और वाणिज्य मामलों के मंत्री थे। उद्योग जगत की समस्याएँ सुलझाने के लिए कॉन्ग्रेस सरकार ने उन्हें रखा था; जब वह कॉर्पोरेट जगत के लोगों से मिलते थे तो क्या ऐसे मिलते थे जैसे कोई थानेदार किसी चोर से मिलता है?

अगर आनंद शर्मा जी को सच में लगता है कि एक सांसद की आर्थिक स्थिति किसी चपरासी से खराब होती है रिटायरमेंट के बाद, तो वे अपने बच्चों या अपने जानने वालों के बच्चों को “राजनीति में आने की बजाय चपरासी बनना बेहतर है” का चूरन चटाएंगे? और कोई नहीं, तो वे अपने भूतपूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी को क्यों नहीं कहते कि वे सांसदी-वांसदी छोड़ कर चपरासी ही बन जाएँ?

विंग कमांडर अभिनंदन को प्रताड़ित करने वाले पाक कमांडो अहमद खान को सेना ने किया ढेर

भारतीय वायुसेना के जाबांज पायलट विंग कमांडर अभिनंदन वर्थमान का बदला भारतीय सेना के जवानों ने पाकिस्तान से ले लिया है। पाकिस्तान में अभिनंदन के पकड़े जाने के बाद उन्हें प्रताड़ित करने वाले पाक कमांडो अहमद खान को सेना के जवानों ने मार गिराया है।

जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 के हटने के बाद से ही पाकिस्तान किसी भी तरह से जम्मू-कश्मीर की शांति को भंग करने की कोशिश कर रहा है। इसके लिए वह आतंकियों की एक बड़ी खेप भारतीय सीमा में भेजने के लिए लगातार प्रयास कर रहा है। इसी कड़ी में पाकिस्तानी कमांडो अहमद खान नियंत्रण रेखा पर घुसपैठ कराने की कोशिश कर रहा था।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तानी सेना के विशेष सेवा समूह के सूबेदार अहमद खान को भारतीय सेना ने 17 अगस्त को एलओसी के नैकल सेक्टर में मार गिराया था, जब वह भारत में घुसपैठियों को दाखिल कराने का प्रयास कर रहा था। बता दें कि बालाकोट एयर स्ट्राइक के बाद एक दूसरे ऑपरेशन में 27 फरवरी को विंग कमांडर अभिनंदन के मिग-21 क्रैश होने के पश्चात उन्हें पाकिस्तान द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया था।

27 फरवरी को पाक द्वारा अभिनंदन को कब्जे में लेने के बाद पाकिस्तान द्वारा जारी तस्वीरों में दाढ़ी वाले अहमद खान को IAF अधिकारी के पीछे देखा जा सकता है। अभिनंदन ने पाकिस्तान के एफ-16 विमान को मार गिराया था, लेकिन उनका मिग-21 बाइसन पाकिस्तान द्वारे दागे गए मिसाइल से क्षतिग्रस्त हो गया था, जिसके बाद उन्हें इजेक्ट करना पड़ा था। इजेक्ट करके वो पाक-सीमा में चले गए थे, जहाँ उन्हें बंधक बना लिया गया था। पाकिस्तान द्वारा करीब 60 घंटे बाद उन्हें वाघा बॉर्डर से रिहा किया गया था।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, अहमद खान ने कश्मीर में आतंकवादियों की घुसपैठ के लिए फारवर्ड पोस्ट पर जैश-ए-मोहम्मद के प्रशिक्षित आतंकवादियों को इकट्ठा किया था। 17 अगस्त को घुसपैठ कराने के लिए पाकिस्तान की सेना ने पुंछ के कृष्णाघाटी सेक्टर में मोर्टार से हमला किया। भारतीय सेना ने जिसका मुँहतोड़ जवाब देते हुए जवाबी कार्रवाई में पाकिस्तानी कमांडो अहमद खान को मारा गिराया।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, इससे पहले अहमद खान नौशेरा, सुंदरबनी और पल्लनवाला सेक्टरों में आतंकवादियों की भारत में घुसपैठ कराता रहा है। बताया जा रहा है कि घुसपैठ कराने के लिए पाकिस्तानी सेना ने उसे विशेष रूप से तैनात और प्रशिक्षित किया था। पाकिस्तान कश्मीर में एक बार से अपने आतंकी मॉड्यूल को सक्रिय करने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रहा है लेकिन मुस्तैद भारतीय सेना उसे हर मोर्चे पर खदेड़ रही है।