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नूरबानो ने कहा- ताश मत खेलो, पति मोहम्मद सुंदरलाल ने कहा- तलाक, तलाक तलाक… और फिर मिली लाश

पश्चिम बंगाल के उत्तर दिनाजपुर जिले से तीन तलाक और हत्या का एक मामला सामने आया है। जानकारी के मुताबिक यहाँ रायगंज ब्लॉक की गौरी ग्राम पंचायत में 28 वर्षीय नूर बानो को उसके पति मोहम्मद सुंदरलाल ने बुधवार (जुलाई 31, 2019) को तीन तलाक बोला और गुरुवार (अगस्त 1, 2019) की सुबह महिला की लाश झाड़ियों में पड़ी मिली।

नूरबानो की मौत के बाद उसके घरवालों ने मोहम्मद सुंदरलाल पर आरोप लगाया है कि उसने ताश खेलने का विरोध करने पर पहले नूर बानो को तीन तलाक दिया और बाद में फाँसी लगाकर उसे मार डाला। महिला के घरवालों का कहना है कि इस पूरी घटना को अंजाम देने में महिला के सास-ससुर ने भी उसके पति का पूरा सहयोग किया।

शिकायत मिलने के बाद पुलिस मामले की जाँच में जुटी है। महिला की लाश घर से कुछ दूरी झाड़ियों में पाई गई है। घटना से इलाके में सनसनी है। महिला के ससुरालवाले और उसका पति फिलहाल फरार चल रहे हैं, पुलिस उनकी छानबीन में लगी है।

मीडिया खबरों की मानें तो इटाहार थाने के डामडोलिया गाँव की रहने वाली नूरबानो का निकाह 4 साल पहले रायगंज के गौरी ग्राम पंचायत के दक्षिण बिष्णुपुर गाँव निवासी मोहम्मद सुंदरलाल से हुआ था।

मो. सुंदरलाल की जुए खेलने की आदत को लेकर हमेशा पति-पत्नी में झगड़ा होता रहता था। जिसके चलते वह नूरबानो से मारपीट भी करता था। जैसे-जैसे दिन बीत रहे थे नूरबानो को हर दिन तरह-तरह की प्रताड़नाओं से गुजरना पड़ता था।

जानकारी के अनुसार मो. सुंदरलाल एक बार उसे पहले ही तीन तलाक दे चुका था, जिसकी जानकारी नूर ने अपने माता-पिता को भी दी थी। उसने कई बार अपने घर पर फोन करके घरवालों बताया था कि उसका पति और ससुराल वाले उसे मारने की कोशिश कर रहे हैं।

ऐसे में गुरुवार की सुबह जब बानो के रिश्तेदार उसके घर पहुँचे तो वहाँ कोई नहीं था। ढूँढने पर नूर की लाश झाड़ियों में मिली। पड़ोसियों ने बताया कि उनके पति और उनके बीच रोजाना लड़ाई होती थी। इस दौरान उन्हें पिटाई की आवाज़ें भी आती थीं। पड़ोसी बताते हैं कि उन्हें पता लगा था कि पति ने नूर को तीन तलाक दे दिया है।

28000 अतिरिक्त जवानों की J&K में तैनाती, आर्मी-IAF हाई ऑपरेशनल अलर्ट मोड में: स्कूल-कॉलेजों में छुट्टी

जम्मू-कश्मीर घाटी में सुरक्षाबल के 28000 अतिरिक्त जवानों की तैनाती की जा रही है। जानकारी के मुताबिक इन सुरक्षाबलों को शहर के अतिसंवेदनशील इलाकों तथा घाटी की अन्य जगहों पर तैनात किया जा रहा है। इनमें अधिकतर सीआरपीएफ कर्मी हैं।

शहर के सभी प्रवेश और बाहर निकलने के रास्तों को केंद्रीय सशस्त्र अर्धसैनिक बलों को सौंप दिए जाने की खबर सामने आ रही है। कहा जा रहा है स्थानीय पुलिस की महज प्रतीकात्मक उपस्थिति है।

मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो गुरुवार (अगस्त 1, 2019) को हुई इस तैनाती का कोई कारण नहीं बताया गया है जबकि कुछ का कहना है कि सुरक्षाबलों की ये तैनाती सरकार के निर्णय पर आने वाले ‘संभावित विरोध’ के ख़िलाफ़ की गई है। फोर्स को यहाँ हाई अलर्ट पर रखा गया है।

इस दौरान कुछ छिटपुट धर्मस्थलों से सुरक्षा हटा ली गई है, क्योंकि खूफिया जानकारी मिली है कि विदेशी आतंकवादी वहाँ पुलिस कर्मियों को निशाना बनाने की योजना बना रहे हैं।

राज्य में शिक्षण संस्थानों में पहले ही गर्मियों की छुट्टियों का ऐलान कर दिया गया था लेकिन बृहस्पतिवार को बताया गया कि स्कूल-कॉलेज 10 दिन तक और बंद रहेंगे। इस दौरान अमरनाथ के कुछ लंगरों को भी बंद करवा दिया गया है।

10,000 सुरक्षाबलों की तैनाती के बाद बृहस्पतिवार को सेना की 280 कंपनियों की खबर सुनकर स्थानीय कुछ भी अंदाजा नहीं लगा पा रहे हैं। मीडिया खबरों की मुताबिक वहाँ स्थानीय बहुत घबराए हुए हैं। उन्होंने कानून-व्यवस्था बिगड़ने की आशंका के मद्देनजर जरूरी सामान खरीदना शुरू कर दिया है।

बता दें कि अभी कुछ दिन पहले केंद्र सरकार ने कश्मीर में 10,000 अतिरिक्त जवानों को तैनात करने का फैसला लिया था, क्योंकि सुरक्षा और खुफिया एजेंसियों को जवानों पर बड़े हमले की साजिश रचे जाने का इनपुट मिले थे। जिसके मद्देनजर राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) अजीत डोवाल ने पिछले दिनों जम्मू-कश्मीर में आतंकरोधी ग्रिड के अधिकारियों के साथ बैठक कर घाटी में सुरक्षा-व्यवस्था का जायजा भी लिया था। इसी इनपुट के आधार पर सरकार ने एहतियातन अतिरिक्त जवानों को तैनात करने का फैसला किया है और खुद डोवाल हालात पर नजर बनाए हुए हैं।

कश्मीर के मौजूदा हालात को देखते हुए भारतीय वायु सेना और आर्मी को हाई ऑपरेशनल अलर्ट पर रखा गया है। CRPF और पारा-मिलिटरी की तुरंत तैनाती के लिए वायुसेना के C-17 हेवी लिफ्ट प्लेन को भी ऑपरेशनल मोड में रखने का आदेश है।

आज ही के दिन की थी आइंस्टीन ने एक पत्र लिखकर ऐसी गलती, जिसका उन्हें मौत तक अफ़सोस रहा

शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति हो जो अल्बर्ट आइंस्टीन के नाम को न जानता हो। लेकिन एक बात, जिससे हर कोई शायद ही परिचित हो, वो ये है कि आइंस्टीन ने भी अपने जीवन में कुछ गलतियाँ की थीं। हालाँकि, गलतियाँ करना इस बात का प्रमाण हैं कि महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन भी एक ‘मानव’ ही थे। क्या आप जानते हैं कि जर्मन मूल के आइंस्टीन ने जर्मनी के ही खिलाफ अमेरिका को आगाह किया था? लेकिन ऐसा करने के पीछे उनके पास पर्याप्त तर्क और कारण थे।

अल्बर्ट आइंस्टीन (जर्मन उच्चारण आइनश्टाइन) का जन्म, मार्च 14, 1879 को तत्कालीन जर्मन साम्राज्य के उल्म शहर में रहने वाले एक यहूदी परिवार में हुआ था। जर्मनी के अलावा वे उसके पड़ोसी देशों, स्विट्ज़रलैंड और ऑस्ट्रिया में भी वहाँ के नागरिक बन कर रहे। वर्ष 1914 से 1932 तक बर्लिन में रहने के दौरान हिटलर की यहूदियों के प्रति घृणा को समय रहते भाँप कर आइंस्टीन अमेरिका चले गए थे।

इस बीच जर्मनी ने आइंस्टीन की लिखी तमाम पुस्तकों की होली जलाई और ‘जर्मन राष्ट्र के शत्रुओं’ की सूची बनाते हुए आइंस्टीन को मारने वाले के नाम पर इनाम भी रखा। तमाम शोध और बौद्धिक रचनाओं के बीच अल्बर्ट आइंस्टीन के नाम को जिस एक चीज़ ने अमर बना दिया, वह था उनका सापेक्षता का सिद्धांत यानी थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी (The theory of relativity)।

यूँ तो आइंस्टीन के अपने पुत्र हांस अल्बर्ट और बहन माया, को ईश्वर-धर्म से संबंधित लिखे गए पत्र भी खूब चर्चा का विषय रहते हैं। लेकिन, इन सबके साथ ही अल्बर्ट आइंस्टीन ने अमेरिका के राष्ट्रपति फ़्रैंकलिन रूज़वेल्ट के नाम भी एक खत लिखा था।

दरअसल, दूसरा विश्व युद्ध शुरू होने से कुछ ही दिन पहले, अगस्त 1939 में, आइंस्टीन ने अमेरिका में रह रहे हंगेरियाई परमाणु वैज्ञानिक लेओ ज़िलार्द के कहने में आ कर एक पत्र पर दस्तखत कर दिए थे। यह पत्र अमेरिकी राष्ट्रपति फ़्रैंकलिन रूज़वेल्ट के नाम लिखा गया था। इसमें रूज़वेल्ट से कहा गया था कि नाज़ी जर्मनी एक बहुत ही विनाशकारी ‘नए प्रकार का बम’ बना रहा है या संभवतः बना चुका है। इसमें उन्होंने रूजवेल्ट को परमाणु बम विकसित करने की सलाह दी थी और साथ ही उन्होंने रूजवेल्ट को आगाह किया था कि शायद जर्मनी न्यूक्लियर बम विकसित कर रहा है। 2 अगस्त, 1939 को लिखी गई यह चिट्ठी प्रेजिडेंट रूजवेल्ट को 11 अक्टूबर को मिली थी।

अमेरिकी गुप्तचर सूचनाएँ भी कुछ इसी प्रकार की थीं, इसलिए अमेरिकी परमाणु बम बनाने की ‘मैनहटन परियोजना’ को हरी झंडी दिखा दी गई। अमेरिका के पहले दोनों बम 6 और 9 अगस्त 1945 को जापान के हिरोशिमा और नागासाकी शहर पर गिरे।

रूजवेल्ट को लिखे गए इस पत्र के 6 साल बाद 6 और 9 अगस्त, 1945 को अमेरिका ने हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराया था। इतिहास और आइंस्टीन दोनों को यह अफ़सोस हमेशा रहा कि इस महान त्रासदी की नींव पर कुछ Best Brains के भी हस्ताक्षर थे।

इस पत्र को अमेरिका में नाभिकीय हथियारों की दौड़ की शुरुआत का महत्वपूर्ण कारक माना जाता है। यह पत्र लियो स्ज़िलार्ड ने आइंस्टीन की तरफ़ से लिखा था। वैज्ञानिक लियो स्ज़िलार्ड ने नाभिकीय श्रंखला अभिक्रिया की खोज की थी। हालाँकि आइंस्टीन ने इस पत्र के सभी परिणामों की पूरी ज़िम्मेदारी स्वीकार की थी। आइंस्टीन ने इस पत्र को अपने जीवन की सबसे बड़ी ग़लती माना था।

इस घटना से आइंस्टीन को काफ़ी आघात पहुँचा। इस घटना के बारे में उन्होंने अपने एक मित्र को पत्र में लिखा था। अपने एक पुराने मित्र लाइनस पॉलिंग को 16 नवंबर 1954 को लिखे अपने एक पत्र में खेद प्रकट करते हुए आइंस्टीन ने लिखा, “मैं अपने जीवन में तब एक बड़ी ग़लती कर बैठा, जब मैंने राष्ट्रपति रूज़वेल्ट को परमाणु बम बनाने की सलाह देने वाले पत्र पर अपने हस्ताक्षर कर दिए। हालाँकि, इसके पीछे यह औचित्य भी था कि जर्मन एक न एक दिन उसे बनाते।”

पढ़िए, आइंस्टीन द्वारा लिखा गया वो पत्र

(यह अनुवाद jankipul.com से लिया गया है)

अल्बर्ट आइन्स्टीन
ओल्ड ग्रोव रोड
नासाऊ प्वाइन्ट
पेकोनिक,
लोन्ग आइस-लैन्ड
२ अगस्त, १९३९

सेवा में,

फ़्रेंकलिन डी. रूज़्वेल्ट
राष्ट्रपति, संयुक्त राज्य अमेरिका,
ह्वाइट हाउस
वाशिन्गटन, डी.सी.

श्रीमान,
ए. फ़र्मी और एल. स्ज़िलार्ड के द्वारा किया गया कुछ नवीनतमकार्य, जो कि मुझे पान्डुलिपि के रूप में प्रेषित किया गया है, मुझे आशान्वित करता है, कि यूरेनियम तत्व, निकट भविष्य में ऊर्ज़ा के नवीनतम और महत्वपूर्ण स्रोत के रूप में परिवर्तित किया जा सकेगा। इस बीच उभरकर सामने आई परिस्थितियों के कुछ पहलू, आँखें खुली रखने और आवश्यकता पड़ने पर प्रशासन की ओर से त्वरित प्रतिक्रिया की पुकार करते प्रतीत होते हैं। अत: मुझे विश्वास है, कि निम्नलिखित तथ्यों और सिफ़ारिशों की ओर आपका ध्यान खींचना मेरा कर्तव्य है।
पिछ्ले चार महीनों में, फ़्राँस के जुलियट और अमेरिका के फ़र्मी और स्ज़िलार्ड के शोध कार्य के ज़रिए यह सम्भव हो चुका है कि यूरेनियम के अत्यधिक द्रव्यमान में नाभिकीय अभिक्रिया स्थापित करना सम्भव है। जिसके द्वारा अत्यधिक मात्रा में ऊर्जा और रेडियम जैसे तत्व उत्पन्न हो सकेंगे। प्रतीत होता है, कि ऐसा निकट भविष्य मे संभव हो सकेगा।
यह नया तथ्य (परमाणु) बमों के निर्माण का रास्ता तैयार करेगा और ये कल्पनीय है (यद्यपि बहुत कम निश्चित) कि अत्यधिक, अप्रत्याशित क्षमता वाले नई तरह के बमों का निर्माण भी किया जा सकेगा। नाव के द्वारा ले जाकर, किसी बन्दरगाह पर यदि इस तरह के केवल एक बम का विस्फ़ोट किया जाए, तो यह बन्दरगाह और उसके आस-पास की कुछ बस्तियों को बहुत अच्छी तरह से ध्वस्त कर सकता है। हाँलाकि, ये बम हवाई यातायात के लिए काफ़ी भारी सिद्ध होंगे।
संयुक्त राष्ट्र के पास युरेनियम के अयस्क अत्यधिक घटिया और काफ़ी कम मात्रा में हैं। कनाडा और पूर्व चेकोस्लोवाकिया में (यूरेनियम के) कुछ अच्छे अयस्क हैं, जबकि युरेनियम का सबसे महत्वपूर्ण स्रोत बेल्ज़ियन कॉन्गो है।
परिस्थिति को ध्यान में रखते हुए आप ऐसी आशा कर सकते हैं कि प्रशासन और अमेरिका में काम कर रहे भौतिकविदों के समूह में आपसी रिश्ते स्थाई रहेंगे। इस स्थिति को प्राप्त करने का, आपके लिए एक सम्भव रास्ता यह हो सकता है, कि इस कार्य से सम्बन्धित एक व्यक्ति को, यह कार्य सौंप दें, जिस पर आपको भरोसा हो और जो कार्यालयी क्षमता से परे अपनी सेवाएँ दे सके। उसके कार्यों में कुछ कार्य यह भी हो सकते हैं :-
(क) सरकारी विभागों से सम्बन्ध रखकर तात्कलिक प्रगति के बारे में उन्हें अवगत रखना, सरकारी क्रियाकलापों के लिए सिफ़ारिश करना; विशेष रूप से संयुक्त राष्ट्र का युरेनियम अयस्क की पूर्ति की सुरक्षा की समस्या की ओर ध्यान आकर्षित करना।
(ख) विश्वविद्यालयी प्रयोगशालाओं में सीमित बज़ट के साथ हो रहे प्रायोगिक कार्य (अनुसन्धान) की गति को तेज़ करना। यदि इस तरह के फ़न्ड की आवश्यकता है तो आपके और उसके व्यक्तिगत सम्बन्धों के द्वारा, जो लोग इस समस्या के लिए सहयोग के इच्छुक हैं, उनसे फ़न्ड उपलब्ध कराना और इसके साथ ही उन औद्योगिक प्रयोगशालाओं की सहकारिता को भी प्राप्त करना, जिनके पास आवश्यक उपकरण उपलब्ध है॑।
मैं समझता हूँ कि जर्मनी, वास्तव में चेकोस्लोवाकिया की खदानों से यूरेनियम की बिक्री बन्द कर चुका है, जिन पर कि उसने पहले कब्ज़ा किया था। उसके (जर्मनी) इस ज़रूरी कदम को इस तरह समझा जाना चाहिए, कि जर्मनी के प्रति (उप) राष्ट्र सचिव का पुत्र वॉन वीज़सेकर (प्रसिद्ध और अत्यन्त प्रतिभाशाली नाभिकीय भौतिकविद) कैसर-विल्हेम इन्स्टीट्यूट, बर्लिन से सम्बन्धित है। जहाँ युरेनियम पर अमेरिका में किया गया कुछ (शोध) कार्य पुनः दोहराया जा रहा है।

आपका आत्मीय
(अल्बर्ट आइन्स्टीन)

इस पत्र के जवाब में अक्टूबर 19, 1939 के दिन रूजवेल्ट ने कहा, “इसके मद्देनजर हमें तुरंत कुछ करना चाहिए।”

परमाणु हमले की घटना ने आइंस्टीन को गहरा आघात पहुँचाया था

अल्बर्ट आइंस्टीन को जब जापान पर एटम बम से हमले की जानकारी मिली, तो उन्हें यकीन ही नहीं हुआ। ये ऐसी हकीकत थी वो जिसे मानने को तैयार ही नहीं थे। वो अपार दुख और क्षोभ से भर उठे। उन्हें गहरा धक्का लगा और वो बुदबुदाए- “भयानक… बहुत ही भयानक!” आइंस्टीन इतने आहत थे कि उन्होंने वर्ष भर इस घटना पर कोई टिप्पणी नहीं की। बाद में आइंस्टीन ने कहा, “अगर मैं जानता कि जर्मन एटम-बम कभी नहीं बना सकेंगे, तो मैं इस मुद्दे पर अपनी संस्तुति देना तो दूर, अपनी ऊँगली भी नहीं हिलाता।”

‘द वॉर इज वन, बट पीस इज नॉट।’ इस व्याख्यान में आइंस्टीन ने कहा-

“इस नए हथियार को विकसित करने में हमने मदद की, क्योंकि हम नहीं चाहते थे कि इंसानियत के दुश्मन इसे हमसे पहले हासिल कर लें। कल्पना से परे तबाही और बर्बादी मचाना और शेष विश्व को अपना गुलाम बनाना ही हमेशा से नाजियों की मानसिकता रही है। हमने ये नया हथियार अमेरिकी और ब्रिटिश जनता के हाथों में, उन्हें संपूर्ण मानवजाति का प्रतिनिधि और शांति तथा स्वाधीनता का संरक्षक मानते हुए सौंपा है। लेकिन शांति तथा स्वाधीनता की वो गारंटी, जिसका वादा अटलांटिक चार्टर के देशों से किया गया था, हमें अब तक देखने को नहीं मिली है। जंग जरूर जीत ली गई है… लेकिन शांति नहीं… दुनिया को भय से मुक्ति दिलाने का वादा किया गया था, लेकिन असलियत में जब से जंग खत्म हुई है, डर कई गुना और बढ़ गया है। दुनिया से वादा किया गया था कि रोजमर्रा की चीजों की तमाम किल्लतें-तमाम दिक्कतें सब खत्म हो जाएँगी। लेकिन दुनिया का ज्यादातर हिस्सा भुखमरी का शिकार है, जबकि दूसरे जरूरत से ज्यादा चीजों का लुत्फ उठा रहे हैं।”

अपने जीवन के अंतिम दिनों में आइंस्टीन ने 10 अन्य बहुत प्रसिद्ध वैज्ञानिकों के साथ मिल कर, अप्रैल 11, 1955 को, ‘रसेल-आइंस्टीन मेनीफ़ेस्टो’ कहलाने वाले एक आह्वान पर हस्ताक्षर किए। इस पत्र में मानवजाति को निरस्त्रीकरण के प्रति संवेदनशील बनाने का आग्रह किया गया था। इसके 2 दिन बाद ही, जब वे इजराइल के स्वतंत्रता दिवस के उपलक्ष्य में एक भाषण लिख रहे थे, उनका स्वास्थ्य बिगड़ गया और 18 अप्रैल को 76 वर्ष की अवस्था में वे दुनिया से चल बसे।

बंधक बना नाबालिग से रेप, मीट खाने को किया मजबूर, भांजे के साथ सद्दाम गिरफ्तार

शादी का झांसा देकर नाबालिग को अगवा करने और उसके साथ दुष्कर्म करने के आरोपी सद्दाम को पुलिस ने हरियाणा के पानीपत से गिरफ्तार किया। सद्दाम ने लड़की को करीब 12 दिनों तक बंधक बनाकर रखा और हवस का शिकार बनाया। इतना ही नहीं पीड़िता को सद्दाम की बहन ने मीट खाने के लिए मजबूर किया। मंगलवार की सुबह पुलिस ने अंबाला कैंट से पीड़िता को बरामद किया था।

पीड़िता के घर पहुॅंच महिला आयोग की सदस्य नम्रता गौड़ ने मामले के बाबत जानकारी ली। पीड़िता दसवीं कक्षा की छात्रा है। उसने बताया कि उसके माता-पिता के काम पर जाने के बाद सद्दाम उसके घर आता था। करीब 15 दिन पहले सद्दाम ने उसे मोबाइल फोन दिया। लेकिन, उसकी मॉं ने यह देख लिया मोबाइल छीनकर फेंक दिया। 19 जुलाई को सद्दाम बहला-फुसलाकर उसे अंबाला के एक होटल में ले गया और जबर्दस्ती की।

तीन दिन तक होटल में रखने के बाद सद्दाम उसे अपनी बहन के घर ले गया। यहॉं सद्दाम की बहन ने उसे मीट खाने के लिए मजबूर किया। साथ ही धमकी दी कि यदि उसने सद्दाम को फॅंसाया तो तो वह उनके परिजनों को नहीं छोड़ेगी।

वकील मनोज शर्मा ने बताया कि सद्दाम आजाद नगर में सैलून चलाता है। उनके मुताबिक लड़की के परिजनों ने पुलिस से शिकायत की थी। लेकिन, पुलिस ने अपहरण की बजाए गुमशुदगी का मामला दर्ज किया। साथ ही शिकायत में लड़की की उम्र 19 साल दर्ज कर दी। उन्होंने इसकी शिकायत पुलिस महानिदेशक, आईजी, एसपी और महिला आयोग की अध्यक्ष से की।

इसके बाद महिला आयोग से नम्रता गौड़ थाने पहुॅंची और लापरवाही के लिए पुलिस को फटकार लगाई। गौड़ ने कहा कि यदि पुलिस पहले ही दिन हरकत में आती तो लड़की को सद्दाम के हवस का शिकार नहीं बनती।

पुलिस ने इस मामले में सद्दाम के भांजे फरमान और राहिल खान को भी गिरफ्तार किया है। पुलिस का कहना है कि पीड़िता के माँ-बाप को अपनी बेटी के सद्दाम के साथ संबंध की पहले से खबर थी। पुलिस का दावा है कि वह जल्द ही कुछ और खुलासे करेगी। पुलिस का यह भी कहना है कि पीड़िता के पिता ने ही उसकी उम्र 19 साल बताई थी। वह नाबालिग है यह बात उसने 28 जुलाई को बताई।

मायावती के विधायक बोले- पैसे देकर मिलता है बसपा में टिकट, देखें वीडियो

राजस्थान विधानसभा में आज बसपा के एक विधायक ने बसपा सुप्रीमो मायावती को लेकर लोगों की वर्षों पुरानी शंका का समाधान कर दिया। बीएसपी के विधायक राजेंद्र गुढ़ा ने बेहद सरल और स्पष्ट शब्दों में स्वीकार किया कि उनकी पार्टी में टिकट पैसा देने पर मिलता है।

राजेंद्र गुढ़ा ने राजस्थान विधानसभा में कहा, “हमारी पार्टी में पैसे लेकर टिकट दिया जाता है। टिकट की खरीद-फरोख्त में जो शख्स सबसे ज्यादा पैसे देता है, उसे टिकट दे दिया जाता है और यह सिलसिला उस शख्स पर जाकर ठहर जाता है जो सबसे ज्यादा रकम अदा करता है।” गुढ़ा ने कहा कि एक तरह से आप कह सकते हैं कि टिकटों के लिए बोली लगती है, जो शख्स सबसे बड़ी बोली लगाता है वो टिकट का स्वभाविक हकदार बन जाता है।

‘पैसे लेकर टिकट दिए जाने की समस्या का समाधान’ विषयक एक सेमिनार में राजेन्द्र ने कहा, “बीएसपी में पैसे लेकर टिकट दिया जाता है। कोई ज्यादा पैसे देता है तो पहले का टिकट काटकर दूसरे को दे दिया जाता है। कोई तीसरा उससे भी ज्यादा पैसे दे देता है तो दोनों का टिकट कट जाता है।”

राजेंद्र कहते हैं कि अगर आप पहले की चुनावी प्रक्रिया को देखें तो टिकट हासिल करने का पैमाना किसी उम्मीदवार की काबिलियत पर निर्भर करता था कि वो अपने इलाके को कितना जानता है। लोगों के बीच उसकी लोकप्रियता कितनी है। लेकिन समय बदलने के साथ राजनीति के स्तर में गिरावट आई है। इसके लिए आप उन लोगों को जिम्मेदार मान सकते हैं जो धनबल के जरिए टिकट हासिल करने की जुगत में होते हैं। 

बीएसपी नेता राजेंद्र ने कहा कि पैसे से चुनाव प्रभावित हो रहे हैं। गरीब आदमी चुनाव नहीं लड़ सकता। पार्टियों में टिकट के लिए पैसे का लेन-देन होता है, हमारी पार्टी में भी होता है। इन बातों के बीच विधानसभा में मौजूद उप नेता प्रतिपक्ष राजेंद्र राठौड़ ने कहा इस पर तो मायावती ही स्पष्ट जवाब दे सकती हैं।

बसपा के राजस्थान में 6 विधायक हैं। गुढ़ा राजस्थान के सीएम अशोक गहलोत नजदीकी भी माने जाते हैं। गहलोत की कई मौकों पर वे प्रशंसा भी कर चुके हैं।

गौतस्करों ने 19 हिन्दुओं की हत्या की, लेकिन गोपाल की हत्या उसे तबरेज़ या अखलाक नहीं बना पाती

स्वराज्य पोर्टल पर आज एक खबर छपी है जहाँ उन्होंने यह बताया है कि 2018 से अब तक बीस लोगों की हत्याएँ हुई हैं गौतस्करों और बीफ माफिया द्वारा। इनमें किसान हैं, पुलिस वाले हैं, साधु हैं। ये इक्का-दुक्का हुआ हो, ऐसा भी नहीं। साल भर में अगर बीस लोग मरे हों, और मारने वालों के नाम मोनू खान, अमजद, इश्तियाक, मुनव्वर, रामनिवास, वाहिद, इम्तियाज, अब्दुल जब्बार, नूर अली, जफरुद्दीन, सलमान, नदीम, शहजाद, नदीम, जब्बार, नजीम, जीशान, मुमताज हों, तो आपको हवा भी नहीं लगती।

ऐसा क्यों होता है? क्योंकि ऐसे में एक बहुप्रचलित लिबरल आउटरेज फ्लो चार्ट काम में आता है। आउटरेज के लिए कीबोर्ड क्रांतिकारी तैयार बैठे रहते हैं, लेकिन उनके कुछ कंडीशन्स होते हैं। मरने वाला अगर हिन्दू है, तो वो खोजते हैं कि दलित है या नहीं। अगर दलित है, और मारने वाला भी दलित या विशेष मजहब से है, तो उसकी चर्चा बेकार है। उस दलित की हत्या का कोई मतलब नहीं। अगर दलित को किसी हिन्दू ने मारा, जो तथाकथित सवर्ण जाति से ताल्लुक रखता है तो, चाहे वो विवाद आपसी हो, उसमें फर्जी का नैरेटिव घुसाया जाता है कि हत्या में जातिवादी भेदभाव है।

फोटो साभार: cyber bully

वैसे ही, हत्या का शिकार समुदाय विशेष का है, और मारने वाले भी उसी मजहब से हैं, तो वो खबर नहीं बनती। हाँ, भले ही वो चोर हो, दंगाई हो, लेकिन अगर किसी हिन्दू नाम वाले ने उसकी हत्या की है तो उस एक आदमी के अपराध का बोझ पूरे हिन्दू धर्म के सर आ जाता है। कठुआ वाला केस सबको याद है, गाजियाबाद से लेकर, अलीगढ़ या कोई और भी नाम ले लीजिए, कोई मौलवी किसी बच्ची का बलात्कार करता मिल जाएगा, लेकिन उन मामलों में भारत की बेटी और इस्लाम शर्मिंदा नहीं होते।

ये जो बीस लोग मरे हैं उसमें एक किसान अकबर अली भी है, उसकी हत्या कई चोरों ने मिल कर की, जिसमें से अधिकतर भागने में सफल रहे, पर नूर अली पकड़ लिया गया। लेकिन अकबर अली पहलू खान नहीं बन पाया क्योंकि उसका हत्यारा नूर अली था जो कि सुनने में लगता है कि मजहब विशेष से है। तो, लिबरल आउटरेज चार्ट के अनुसार इन बीस हत्याओं में एक भी ऐसी हत्या नहीं थी जिस पर लिबरलों का हो-हल्ला हो सके।

नैरेटिव की ताकत

लेकिन आपको यह सब नहीं बताया जाता है। फर्जी के आँकड़े इकट्ठा करने वाली वेबसाइट से हेटक्राइम का डेटा उठाया जाता है, जिसमें सुविधानुसार हिन्दुओं की हत्याओं को छोड़ दिया जाता है, और समुदाय विशेष की सामाजिक अपराध के कारण हुई हत्याओं को भी मजहबी बता कर दिखाया जाता है। उसके बाद चिट्ठी-पत्री तो चलती ही है, सोशल मीडिया से लेकर मेनस्ट्रीम मीडिया तक इतना जबरदस्त इंतजाम होता है कि देश का प्रधानमंत्री झुक जाता है फेक नैरेटिव के आगे और उसे जवाब देना पड़ता है।

लेकिन देश का प्रधानमंत्री गोपाल, नरेश, देवीलाल, नवल सिंह, रामकिशन, सुहागिन, गोलू, निशा, मोनी, मोलू, समा देवी, जोगेन्द्र समेत पुलिसकर्मी प्रकाश मेशराम, संजीव गुर्जर, मनोज मिश्रा, विपिन और सुमेर के साथ तीन साधुओं की मौत पर नहीं झुकता। देश का प्रधानमंत्री सोशल मीडिया के इस फेक नैरेटिव के प्रेशर में गौरक्षकों पर तो बोलता है, लेकिन उन्हीं गौरक्षकों की गौतस्करों द्वारा की गई हत्याओं पर नहीं बोलता।

ये है नैरेटिव की ताकत। यहाँ पर मात खाता है तथाकथित दक्षिणपंथी। क्या ये पैटर्न नहीं है? क्या गायों को चुरा कर काटने वाले, लगातार किसानों से लेकर पुलिस वालों को नहीं मार रहे? जब एक तबरेज की हत्या को ऐसे दिखाया जाता है कि हर हिन्दू दूसरे समुदाय के हर आदमी को घेर कर मारने को उतारू है तो इतनी हत्याओं के बाद भी इस पर बात कैसे नहीं होती?

लिंचिंग के लिए कानून बनाने की माँग उठती है, जब 49 तथाकथित सेलिब्रिटी लिखते हैं तब इधर के 61 की नींद खुलती है। ये तो प्रतिक्रिया है, क्योंकि आप तब जगे, जब सामने वाले ने कुछ किया। जबकि होना तो यह चाहिए कि प्रधानमंत्री से लेकर, सारे जवाबदेह नेताओं को हर ऐसी घटना पर पूछना चाहिए कि आखिर देश में गाय पालने वाला किसान बीफ माफिया से सुरक्षित क्यों नहीं है? आखिर बार-बार एक ही तरह की घटना क्यों हो रही है? आखिर क्या बात है कि मरने वाले लगभग हर बार हिन्दू होते हैं, और मारने वाले लगभग हर बार दूसरे खास मजहब के?

गौरक्षक अगर एक-दो बार कानून हाथ में ले कर गौतस्करों को पीट देता है तब खूब बवाल होता है लेकिन वही गौरक्षक गोपाल, गौतस्करों का पीछा करते हुए, उसे रोकने की कोशिश करता है, तो उसे गोली मारने वाला बीफ माफिया चर्चा से ही गायब हो जाता है। कितने लोग जानते हैं कि बीफ माफिया है भी इस देश में? लगातार एक ही तरह की घटनाएँ होती जा रही हैं, और हमें पता तक नहीं चलता।

इसके उलट, एक कथित चोर भीड़ से पिटता है, और चार दिन बाद कहीं मरता है, तो उस पर चर्चा होती है। जब चर्चा होती है तो दो खेमे बँट जाते हैं, जिसमें एक उसे लिंचिंग कहते हुए दोष हिन्दुओं पर डालता है, और दूसरा, ये कहने में व्यस्त हो जाता है कि ऐसा कहने वाले झूठ बोल रहे हैं। तबरेज ट्रेंड करने लगता है, हर आदमी उसकी बात करने लगता है। जबकि तबरेज कौन था? तबरेज कथित तौर पर चोरी करने आया हुआ एक लड़का था। आप देख लीजिए नैरेटिव की ताकत।

लेकिन गोपाल के केस में क्या हुआ? आपको पता भी नहीं है कि गोपाल कौन है। गोपाल तीन छोटी बच्चियों का पिता था। वो गायों को बचा रहा था, वही गाय जो हमारे और आपके लिए पूज्या है। वही गाय जिसे काटना असंवैधानिक और गैरकानूनी है। वही गाय जिस पर खूब बहस हुई है। वही गाय जो हिन्दुओं का प्रतीक है। हमारे और आपके आस्था के प्रतीक को बचाने के लिए एक हिन्दू अपनी जान दे देता है, लेकिन हम उसे अखलाख या तबरेज नहीं बना पाते।

अगर यही चलता रहा तो गोपाल को भी लोग भूल जाएँगे जैसे उन साधुओं को भूल गए जिन्हें सलमान, नदीम, शाहजाद, जब्बार और नजीम ने इसलिए हाथ और पाँव बाँध कर, गर्दन और शरीर पर लगातार छुरा भोंक कर मार दिया था क्योंकि उन्होंने पुलिस को गौतस्करी और गाय काटने वाले इन लोगों के बारे में सूचना दी थी। साधु तो अपना काम कर रहे थे। वो मार दिए गए। लेकिन हमें उनका नाम भी पता नहीं। हमें इस घटना की भी जानकारी नहीं।

हमने अपना काम नहीं किया

पुलिस तो अपना काम करेगी, लेकिन हमने अपना काम नहीं किया। हमने अपनी एकता कहाँ दिखाई किसी को! हमने इन धर्मरक्षकों को श्रद्धांजलि भी तो नहीं दी! वो तीन साधु जिस स्थिति में खाट से बँधे मिले, हर हिन्दू के भीतर रोष होना चाहिए, क्रोध आना चाहिए कि हमने अपने स्तर से कुछ नहीं किया। जबकि हमें, हर ऐसी खबर पर, अपने स्तर से लगातार लिखना और बोलना चाहिए।

अगर हम चुप रहेंगे तो हम ही पीड़ित भी होंगे, और हमें ही अपराधी भी बना दिया जाएगा। आप आस-पास देखिए कि माहौल क्या है। सौ करोड़ की हिन्दू आबादी वाले देश में जोमैटो ज्ञान देता है कि भोजन का कोई रिलीजन नहीं है लेकिन जब उससे यह सवाल किया जाता है कि एक ‘शांतिप्रिय’ को ‘हलाल किया मुर्गा’ क्यो नहीं मिला तो वो बताता है कि इस खराब अनुभव के लिए उन्हें खेद है। उस लड़के को रिलीजन पर ज्ञान देने की जगह जोमैटो यह भी कह सकता था कि डिलीवरी करने वाले कर्मचारी को उसके मजहब या धर्म के आधार पर बदलना कंपनी की नीतियों के खिलाफ है।

लेकिन जोमैटो ज्ञान देना चुनता है क्योंकि वो जानता है कि वो हिन्दुओं को ज्ञान दे कर मीडिया से ‘एपिक रिप्लाय’ और ‘किलर रिप्लाय’ वाले आर्टिकल लिखवा कर फ्री की पब्लिसिटी पा जाएगा। ऐसा ज्ञान वो मेनू में सूअर के मांस पर आपत्ति जताने वाले उपभोक्ता को नहीं दो सकता क्योंकि उसे पता है कि ऐसा ज्ञान किस रूप में बह जाता है।

याद होगा कि हनुमान के स्टिकर को देख कर ऊबर पर चढ़ने से एक लड़की ने इनकार कर दिया था और कहा था कि हनुमान की वह छवि मिलिटेंट हिन्दुवाद का परिचायक है! फिर लिबरलों को सामूहिक रूप से चरमसुख प्राप्त होने लगा था और वो इसी ऑर्गेज्मिक मोड में कई दिन रहे। तब ऊबर ने नहीं कहा था कि वो किसी ड्राइवर की कार पर लगे आस्था के चिह्नों का सम्मान करते हैं। तब इन दोमुँहे एक्टिविस्टों और चरमसुखवादियों ने ऐलान किया था कि वो ऐसी गाड़ियों पर नहीं चढ़ेंगे

आवाज लगाना, आवाज उठाना, आवाज सुनाना सीखो

तब ऊबर चुप था, लेकिन जहाँ बात एक हिन्दू द्वारा की गई मूर्खतापूर्ण हरकत पर आई, ऊबर ईट्स (जो कि ऊबर की ही ईकाई है) ने यह ऐलान किया कि जोमैटो, हम तुम्हारे साथ हैं। आप जोमैटो का इस्तेमाल करें या न करें, ये आपकी मर्जी है लेकिन ऐसे दोगलेपन पर भी आप चुप रहते हैं, अपने स्तर से कुछ नहीं करते तो फिर क्यों न एमेजॉन पर भगवान गणेश की तस्वीर वाले फ्लोर मैट बिकेंगे?

कैराना में सपा का विधायक कहता है कि हिन्दुओं की दुकानों से सामान मत खरीदो, थोड़ी दूर जा करखास सम्प्रदाय की दुकानों से खरीदो, ये लोग खुद ही चले जाएँगे जब नुकसान होगा। तब हमने क्या किया? हमें तो याद भी नहीं है कि किसी ने ऐसा किया। वो भी उस कैराना में जहाँ से हिन्दुओं को भगा दिया गया है। मेरठ में भी हिन्दुओं की बहू-बेटियों को छेड़ा जाता रहा ताकि वो स्वयं ही ग्लानि से, अपनी इज्जत बचाने के लिए कहीं और चले जाएँ। हमने उस मामले में क्या किया?

सौ करोड़ की आबादी, भाजपा समर्थित राजग के 45% वोट शेयर में आखिर किसके वोटर कार्ड हैं? फिर सवाल कौन पूछेगा इन हुक्मरानों से जिन्हें हमने इतनी भारी संख्या में वोट दे कर जिताया और आलम यह है कि योगी आदित्यनाथ के राज्य में, जहाँ तीन चौथाई विधायक भाजपा के हैं, हिन्दुओं को अपने घरों पर लिखना पड़ रहा है कि यह मकान बिकाऊ है!

अपने वोट की कीमत पहचानो। अपनी इज्जत की रक्षा करो। अपने धर्म को धर्म समझो और उसकी रक्षा में कम से कम जो कर सकते हो वो करो। लिख सकते हो तो लिखो, बोल सकते हो तो बोलो, किसी का बहिष्कार कर सकते हो तो करो। क्योंकि सत्ता में सरकार बिठाने मात्र से धर्म सुरक्षित नहीं हो जाता। सरकार चुन लेने से विचारधारा या राष्ट्रवाद सुरक्षित नहीं हो जाता। सरकारों को लगातार याद दिलाना होता है कि उन्हें हमने चुना है, और उन्हें ही हमारा काम भी करना होगा। अगली बार हटाने का विकल्प मत रखिए, सीखिए लम्पट लेनिनवंशी माओनंदन कामपंथी वामभक्तों से कि एक सुर में सियारों की तरह ‘हुआँ-हुआँ’ करने से भी छप्पन इंच की छाती वाले शेर को जवाब देना पड़ जाता है।

आपने अपने शेर को पिछली बार कब आवाज थी? एग्जेक्टली!

दॉंव पड़ा उलटा तो गिड़गिड़ाने लगा जोमैटो, कहा-हिन्दू डिलीवरी ब्वॉय भेजेंगे

जोमैटो के तथाकथित मूल्य कितने खोखले हैं, अलग-अलग समुदाय के ग्राहकों की शिकायतों पर उसकी प्रतिक्रिया में कितना विरोधाभास है, यह एक बार फिर सामने आ गया है। ‘खाने का कोई मजहब नहीं होता’ का प्रचार दॉंव उलटा पड़ने के बाद उसने कथित तौर पर एक ग्राहक से हिन्दू डिलीवरी ब्वॉय भेजने का वादा किया।

फेसबुक पर पोस्ट करते हुए एक व्यक्ति ने दावा किया है कि जोमैटो के कस्टमर केयर ने ऑर्डर किए जाने पर हिन्दू डिलीवरी बवॉय भेजने का वादा किया। दावे के समर्थन में इस व्यक्ति ने स्क्रीनशॉट और मोबाइल के स्क्रीन का वीडियो भी पोस्ट किया है।

स्क्रीनशॉट में जोमैटो का कस्टमर केयर ग्राहक से बार-बार माफी मॉंगता नजर आ रहा है। इस स्क्रीनशॉट की सत्यता की पुष्टि के लिए हमने जोमैटो के कार्यालय से कई बार संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला।

गौरतलब है कि जोमैटो के एक ग्राहक ने खाने की डिलीवरी लेने से मना कर दिया था, क्योंकि खाना पहुँचाने वाला मुस्लिम था और श्रावण के महीने में वह गैर-हिन्दू के हाथ से खाना स्वीकार नहीं करना चाहता था। इस पर जवाब देते हुए जोमैटो ने कहा था कि खाने का कोई मज़हब नहीं होता, बल्कि खाना अपने आप में मज़हब होता है।

Zomato विवाद: अमित शुक्ला का ट्वीट संविधान की भावना के खिलाफ, MP पुलिस भेजेगी नोटिस

ऑनलाइन फूड कंपनी जोमैटो (Zomato) विवाद पर अब मध्य प्रदेश पुलिस ने जबलपुर के रहने वाले युवक को नोटिस भेजने का फैसला लिया है। यह विवाद तब शुरू हुआ जब बुधवार (जुलाई 31, 2019) को जोमैटो पर खाना ऑर्डर करने के बाद मुस्लिम डिलिवरी ब्वॉय की वजह से अमित शुक्ला नामक एक युवक ने खाना कैंसिल कर दिया था। इसके बाद ट्विटर पर ट्वीट भी किया, जिसके बाद काफी विवाद हुआ।

जबलपुर के एसपी अमित सिंह ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि पंडित अमित शुक्ला को नोटिस भेजा जाएगा। साथ ही, उससे बॉन्ड भी साइन कराया जाएगा। इसके अलावा पुलिस अगले 6 महीने तक उसकी गतिविधियों पर नजर रखेगी। अगर वह ऐसी हरकत दोहराता है तो उसे हिरासत में भी लिया जाएगा।

रिपोर्ट्स के अनुसार, एसपी का कहना है कि अमित शुक्ला का ट्वीट संविधान की भावना के खिलाफ है। वहीं, एप बेस्ड फूड डिलिवरी सर्विस जोमैटो ने भी शुक्ला की शिकायत पर जवाब देते हुए ट्वीट किया था कि खाने का कोई धर्म नहीं होता और खाना खुद एक धर्म है।

अमित शुक्ला ने मुस्लिम युवक द्वारा डिलीवरी किए जाने पर आपत्ति जताई थी, जिसके बाद जोमैटो ने युवक की बात सुनने के बजाए अपनी कम्पनी की शर्तों का हवाला दिया था। हालाँकि, सोशल मीडिया पर अमित शुक्ला की बात का समर्थन भी किया गया क्योंकि उसे अपने सर्विस प्रदाता से अपनी इच्छानुसार सर्विस का ऑर्डर देने का अधिकार था।

अमित शुक्ला ने मुस्लिम डिलिवरी ब्वॉय को देखकर ऑर्डर कैंसल कर दिया था। साथ ही, उन्होंने दूसरे राइडर से खाना भिजवाने की माँग की थी। हालाँकि, कंपनी ने इसके लिए इनकार कर दिया और रिफंड देने से भी मना कर दिया था। इसके बाद कस्टमर ने कानूनी कार्रवाई करने की धमकी भी दी थी।

तीन तलाक का कानून इस्लाम पर हमला, नहीं करेंगे कबूल: ममता बनर्जी के मंत्री

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के कैबिनेट में शामिल सिद्दिकुल्लाह चौधरी ने एक साथ तीन तलाक को अपराध करार देने वाले कानून को इस्लाम पर हमला बताया है। उन्होंने इसे कबूल नहीं करने की बात कही है। चौधरी जमीयत उलेमा-ए-हिंद के पश्चिम बंगाल यूनिट के अध्यक्ष भी हैं।

उन्होंने कहा, “संसद से इस बिल का पास होना दुखद है। यह इस्लाम पर हमला है। हम तीन तलाक पर बने कानून को स्वीकार नहीं करेंगे।” उन्होंने कहा कि जमीयत की केंद्रीय कमिटी की बैठक के बाद हम आगे की कार्रवाई पर विचार करेंगे।

राज्यसभा ने मंगलवार को तीन तलाक को गैर कानूनी करार देने वाले विधेयक को मंजूरी दी थी। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने बुधवार रात इस पर दस्तख्त कर दिए। इसके साथ ही यह कानून देश में लागू हो गया है।

25000 रुपए ज़ुर्माना और 3 साल की क़ैद: ट्रैफिक का नियम तोड़ना अब पड़ेगा भारी

मोटर व्हीकल (संशोधन) विधेयक 2019 बुधवार (31 जुलाई 2019) को राज्यसभा में पारित हो गया। इस बिल के पक्ष में 108 मत और 13 मत विपक्ष में पड़े। अब ट्रैफिक रूल्स तोड़ने की सज़ा भारी होगी। इस बिल में जुर्माने की रक़म बढ़ाकर 10 गुना कर दी गई है। ग़ौरतलब है कि पिछली लोकसभा में इस बिल को पास किया गया था, लेकिन लोकसभा भंग होने के बाद नई सरकार ने इसे कुछ अन्य संशोधनों के साथ पुराने स्वरूप में ही 17वीं लोकसभा में पेश करने फ़ैसला किया।

बिल पेश करते हुए केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने यह स्वीकार किया और कहा, “हमारे देश में हर साल 5 लाख दुर्घटनाएँ होती हैं, जिससे हर साल 1.5 लाख लोगों की मौत होती है। हम दुनिया में दुर्घटनाओं में पहले नंबर पर हैं, अब हमें इसे ठीक करने का मौक़ा मिला है।

मीडिया से मुख़ातिब होते हुए उन्होंने बताया कि देश में 22 लाख ड्राइवर्स की कमी है, इसके लिए हम ड्राइविंग सेंटर्स खोल रहे हैं। और इस तरह देश में अच्छे और प्रशिक्षित ड्राइवर आएँगे। ट्रांसपोर्ट में नई तकनीक लाई जा रही है और सभी सिस्टम को करप्शन फ्री कर रहे हैं। परिवहन मंत्री ने बताया कि राज्य सरकार को भी साथ लेकर काम करना है। इसके लिए कोई भी रेवन्यू केंद्र सरकार नहीं लेगी। उन्होंने मोटर व्हीकल (संशोधन) विधेयक 2019 के बारे में कहा कि यह न केवल एक मोटर व्हीकल एक्ट है, बल्कि यह एक सड़क सुरक्षा बिल है। उन्होंने कहा, “मेरा मानना है कि इससे दुर्घटनाओं में कमी आएगी। इस विधेयक का पारित होना उन लोगों के लिए एक श्रद्धांजलि है, जिन्होंने दुर्घटनाओं में अपनी जान गँवाई।

मोटर व्हीकल संशोधन विधेयक में कई प्रावधान शामिल किए गए हैं। इसके अनुसार, हेलमेट न पहनने पर 100 रुपए के ज़ुर्माने को बढ़ाकर 1,000 रुपए कर दिया है। ओवर-स्पीडिंग के लिए पहले 500 रुपए का जुर्माना वसूला जाता था, लेकिन अब उसके लिए 5,000 रुपए देने पड़ेंगे। शराब पीकर गाड़ी चलाने के जुर्म में पहले 2,000 रुपए का ज़ुर्माना था जिसे बढ़ाकर 10,000 रुपए कर दिया गया है।

गाड़ी चलाते समय मोबाइल पर बात करना भी आपकी जेब पर भारी पड़ सकता है। पहले ऐसा करते पकड़े जाने पर 1,000 रुपए का ज़ुर्माना लगता था, लेकिन अब इसके लिए 5,000 रुपए कर दिया गया है। सीटबेल्ट न लगाने पर जो चालान मात्र 100 रुपए का था वो अब 1,000 रुपए कर दिया गया है। आपातकालीन सेवाओं के लिए रास्ता नहीं देने पर 10,000 रुपए का प्रावधान किया गया है। 

सरकारी बस में अगर कोई बिना टिकट यात्रा करते पकड़े गया तो अब धारा-178 के तहत 500 रुपए का ज़ुर्माना लगेगा जो कि पहले 200 रुपए था। वहीं, अगर कोई नाबालिग ड्राइविंग करते पकड़ा गया तो उसके लिए नाबालिग के माता-पिता या गाड़ी के मालिक को दोषी माना जाएगा। इसके लिए 25,000 रुपए का ज़ुर्माना और तीन साल की क़ैद भी हो सकती है।

फ़िलहाल, ड्राइविंग लाइसेंस 20 साल तक के लिए वैध होता है और अगर इस बिल को राष्ट्रपति की स्वीकृति मिल जाएगी तो यह वैधता 10 साल तक कम हो जाएगी। सड़क हादसे में मारे गए लोगों की मुआवज़ा राशि 5 लाख और गंभीर रूप से घायलों की 2.5 लाख की गई है।