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इंडियन एक्सप्रेस ने दिया सड़क पर हुई मारपीट को साम्प्रदायिक रंग, क्योंकि पिटने वाला मुस्लिम था

गुजरात के दहेज, भरूच में हुई रोड-रेज की घटना को इंडियन एक्सप्रेस ने साम्प्रदायिक रंग दे दिया है। उनके अनुसार पीड़ित को (केवल) मुस्लिम होने के लिए पाँच लड़कों द्वारा पीटा गया। वहीं पुलिस ने ऑपइंडिया से हुई बातचीत में मामले के किसी भी साम्प्रदायिक एंगल से इंकार किया है।

फैसल खान के अनुसार शनिवार (27 जुलाई, 2019) को वह जोलवा गाँव में टायरों का निर्माण करने वाली अपनी कंपनी के दफ़्तर से कुछ खरीदारी करने निकले थे। ऑफ़िस से 100 मीटर ही वह आगे बढ़े थे कि उन्होंने पाँच लड़कों को एक दूसरे लड़के से बहस करते देखा। वह ध्यान न दे साइड से आगे बढ़ने वाले थे कि उन पाँचों में से एक ने उन्हें पकड़ लिया और नाम-पता पूछने लगे।

उन्होंने जब अपनी कम्पनी का नाम बताया तो उन लोगों ने फैसल के साथ हिंसा शुरू कर दी। विरोध करने और कारण पूछने पर और भी मारा। “मैं वहाँ से किसी तरह निकल भागा क्योंकि मेरी बाइक चालू थी, मैं थोड़ी दूर जा कर छिप गया और अपने सहकर्मी इम्तियाज़ शेख को घटना के बारे में बताया।”

इसके थोड़ी देर बाद जब वह उन गुण्डों को गया हुआ समझ कर लौटने लगे तो दो गुण्डे वहीं मौजूद थे। उन्होंने फिर से फैसल की पिटाई शुरू कर दी और अपने तीनों बाकी साथियों के साथ फैसल को उनकी कंपनी के गेट की तरफ भागते हुए रोक कर अगवा कर लिया, और पास के एक स्थान पर ले जाकर उनके साथ और मारपीट की। उसके बाद वे गुण्डे फैसल को वहीं छोड़ कर भाग खड़े हुए। उनके सहकर्मी उनके फ़ोन करने पर वहाँ पहुँचे और उन्हें अस्पताल ले गए। अस्पताल में अस्पताल वालों ने पुलिस को इत्तला कर दी।

निश्चय ही यह गलत ही नहीं, बहुत ही घृणित हरकत है। और उन गुण्डों को कड़ी-से-कड़ी सज़ा मिलनी भी चाहिए। लेकिन यह समझ पाना मुश्किल है कि इंडियन एक्सप्रेस ने इसमें साम्प्रदायिकता का एंगल कैसे तलाश लिया। ऑपइंडिया ने जब दहेज पुलिस स्टेशन में फ़ोन कर घटना के बारे में जानना चाहा तो वहाँ के पुलिस अफसर ने घटना में साम्प्रदायिकता का पुट होने से इंकार किया। बकौल पुलिस, यह रोड रेज की घटना थी और अज्ञात हमलावरों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया गया है।

इंडियन एक्सप्रेस का इसमें साम्प्रदायिकता का एंगल अविष्कृत कर लेना कोई नई बात नहीं है। मेनस्ट्रीम मीडिया यही करता ही आ रहा है। इसके पहले भी गुरुग्राम में हुई निंदनीय लेकिन गैर-साम्प्रदायिक मारपीट की घटना को TOI ग्रुप ने साम्प्रदायिक रंग दे दिया था। यही नहीं, जुनैद खान मामले में तो जब तक अदालत का फैसला नहीं आ गया, पत्रकारिता का समुदाय विशेष सीट के झगड़े को लेकर हुई इस हत्या के साम्प्रदायिक कारणों से हुए होने का दावा करता ही रहा।

‘द वायर’ वालो, JNU-छाप माओवंशी वामभक्तों के ज़हर को छाप कर कब तक दुकान चलाओगे?

‘Subjective’ का मतलब होता है विषयनिष्ठ, यानी जो हर इंसान के लिए अलग-अलग हो। ‘Objective’ होता है वस्तुनिष्ठ, यानी जिसे कोई भी इंसान, किसी भी दृष्टिकोण से देखे, तो वह एक जैसा ही दिखे। जेएनयू के अध्यापक अविजित पाठक The Wire में छपे लेख ‘JNU: The Story of the Fall of a Great University’ में अपने सब्जेक्टिव ‘दर्द’ के ऑब्जेक्टिव कारण गिनाते हैं। माने उनके दर्द से भले आप सहमत हों या न हों (क्योंकि वह ऑब्जेक्टिव नहीं है, निजी है), लेकिन उसका कारण ऑब्जेक्टिव है- उससे असहमति की गुंजाईश ही नहीं हो सकती।

अपने लेख की शुरूआत में ही अविजित स्टाइलिश ओपनिंग देने और सहानुभूति लूटने के लिए बताते हैं कि जेएनयू टीचर्स एसोसिएशन के द्वारा किए गए प्रदर्शन में हिस्सा लेने के लिए उनका नाम चार्जशीट में है। लेकिन इसमें शायद वह सिक्के का दूसरा पहलू वह भूल गए कि जब उनके खिलाफ चार्जशीट फाइल है, तो ज़ाहिर सी बात है चार्जशीट फाइल करने वालों के खिलाफ कही गई उनकी किसी बात में पूर्वग्रह की गुंजाईश से इंकार नहीं किया जा सकता। और यह पूर्वग्रह, यह पक्षपात उनके पूरे लेख में दिखता है।

अपना ‘डर’ डर है, अपनी बेइज़्ज़ती चुभती है…

लेख के पहले खंड की शुरूआत अविजित उसी “डर का माहौल” टेम्पलेट से करते हैं, जो आजकल चरम-वामपंथियों का आखिरी सहारा बचा है। आँकड़े उनके खिलाफ हैं, जनता का मूड उनके खिलाफ है, दशकों की मेहनत से खड़े किए नैरेटिव झूठ के पुलिंदे साबित हो रहे हैं, चारु मजूमदार और किशनजी से लेकर माओ और लेनिन तक उनके हीरो देश के ही नहीं, इंसानियत के भी विलेन निकल रहे हैं। तो ऐसे में हवाई “डर का माहौल” ही उनके पास सबसे ठोस आधार बच रहा है।

वह बताते हैं कि “डर का माहौल” इसलिए है क्योंकि ‘एकतरफ़ा’ अकादमिक काउन्सिल में वरिष्ठ प्रोफ़ेसरों की कथित बेइज़्ज़ती हो रही है। इस एक वाक्य में कितने सारे विरोधभास हैं! आप तो वामपंथी हैं न, अविजित साहब? या कम-से-कम एंटी-राइट? तो आप तो हायरार्की, वरिष्ठ-कनिष्ठ जैसी चीज़ों के खिलाफ हुए न? आपके हिसाब से तो यह शोषकों द्वारा शोषण के लिए गढ़े गए फ़र्ज़ी वर्गीकरण हैं! तो वरिष्ठता का हवाला कैसे दे सकते हैं?

और अगर बात बेइज़्ज़ती की करनी है तो जेएनयू में, जो वामपंथियों का गढ़ है, ज़रा दक्षिणपंथी, एंटी-वामपंथी, ABVP/संघ-परिवार समर्थक शिक्षकों और छात्रों से मिलकर पूछिए उन्हें कितनी ज़िल्लत आपके वामपंथी देते हैं, और कितने पहले से देते थे। आप तो इतनी जल्दी घबरा गए, उन लोगों की सोचिए जो सालों नहीं, दशकों से ऐसे ही माहौल में आते थे, किसी तरह पढ़-लिखकर निकल जाते थे।

आप वरिष्ठों के होते हुए कनिष्ठ और युवा प्रोफ़ेसर को स्कूल ऑफ़ सोशल साइंसेज का डीन बनाए जाने का विरोध करते हैं। क्यों? केवल इसलिए कि वह युवा है? वामपंथ तो युवा खून का समर्थक रहा है न? उम्र और वरिष्ठता जैसे चीज़ें तो बूढ़े और दकियानूसी दक्षिणपंथ की परिचायक हैं न?

आप उद्धरण चिह्नों (‘ ‘) के भीतर competent authority को रखते हैं। केवल authority (प्राधिकार) नहीं, competent authority को। यानी आप competence (योग्यता) को भी प्रश्नचिह्नों में रखते हैं, जो कि आपकी वामपंथी विचारधारा है- कि योग्यता महज़ एक सामाजिक छलावा है। तो अगर योग्यता छलावा है, प्राधिकार के खिलाफ वामपंथी होने के कारण अंध-विरोध में खड़े ही रहना है, तो बन जाने दीजिए किसी को भी! क्या दिक्कत है?

बदरंग दीवारें और हत्यारा शे गुवेरा ही हैं आपके ‘aesthetics’?

आप अगला मुद्दा दीवारों से पोस्टर हटाने का उठाते हैं, और बताते हैं कि वह पोस्टर बड़े ही एस्थेटिक (कलात्मक) थे। इससे बड़ी हास्यास्पद विडंबना क्या हो सकती है कि एक तरफ़ आप बात ‘कलात्मकता’ और सुरुचिपूर्णता की कर रहे हैं, और दूसरी ओर आपके ही लेख में जो मुख्य तस्वीर लगी है, उसमें घोर अरुचि पैदा करने वाली, बदरंग दीवार की तस्वीर है। और उसे बदरंग किसी पोस्टर ने ही किया है।

इसके अलावा आप शे गुवेरा का पोस्टर लगाते हैं। वही शे, जो समलैंगिकता को ‘बुर्जुआओं की नौटंकी’ मानता था और समलैंगिकों को नाज़ियों जैसे लेबर कैम्प में भेज देता था। वही जो शेखी बघारता था कि क्रांति के लिए बंदूक चलाते समय बेगुनाहों के बारे में नहीं सोचा जा सकता, जो सामने हो भून दो। जो आपके पसंदीदा नारे ‘free speech’ और आज़ाद प्रेस का दुश्मन था। इसी ‘रुचिपूर्ण’ कलात्मकता के खो जाने का मातम मना रहे हैं?

बायोमेट्रिक से डर क्यों?

आप बताते हैं कि बायोमेट्रिक हाजिरी से जेएनयू के अध्यापक डरे हुए हैं? क्यों? क्या इसलिए कि आप लोग अभी तक अपनी मनमर्जी से कभी मन हुआ तो क्लास लेने आए, नहीं मन हुआ तो छात्रों को पार्ट-टाइम एक्टिविस्ट बना कर किसी भी मुद्दे पर धरना देने भेज दिया? यह तो कामचोरी है, हराम का खाना यानी हरामखोरी है! और अगर आप यह नहीं कर रहे, अगर आप हराम की सैलरी नहीं ले रहे, तो बायोमेट्रिक से किस चीज़ का डर?

ऑब्जेक्टिव और MCQ आपका भेदभाव रोकने के लिए हैं

इसे विडंबना ही कहेंगे कि एक ओर आप अपने सब्जेक्टिव डर के कारणों को सत्यता देने के लिए उन्हें ‘ऑब्जेक्टिव कारण’ बताते हैं, और दूसरी ओर आप आगामी फ्रेशर्स के बैच के लिए छद्म-रूप से अपमानजनक ‘MCQ generation’ का इस्तेमाल करते हैं। आपको MCQ से दिक्क्त है, समझ में आता है। वामपंथी नैरेटिव गेम में स्ट्रॉन्ग हैं, लेकिन तथ्यों के मामले में कमज़ोर पड़ जाते हैं।

आज तक आप सब्जेक्टिव इम्तिहान लेकर (शायद) केवल अपनी राजनीतिक सोच से मेल खाने वाले या वैचारिक रूप से ढाले जा सकने वाले लोगों को ही प्रवेश देते थे। अब MCQ के ज़रिए वो छात्र भी प्रवेश पाएँगे जो वामपंथियों के झूठे नैरेटिव, और झूठे तथ्यों को चुनौती देंगे। इसीलिए आप दुःखी हैं?

आपका काम पढ़ाना है, एक्टिविस्ट तैयार करना नहीं

अविजित पाठक दुःख जताते हैं कि अब वह होने छात्रों में एक्टिविस्ट तैयार नहीं कर सकते। 29 साल (उनका ही दिया हुआ आँकड़ा) पढ़ाने के बाद भी उन्हें समझ नहीं आया कि शिक्षक का काम शिक्षा देना होता है, उस शिक्षा को किसी एक राह पर ही इस्तेमाल करने के लिए छात्र को धकेलना या बरगलाना नहीं। और जेएनयू ने यही किया है- ईमानदार विचारक और बौद्धिक कम, बौद्धिकता और विचारधारा को हथियार बनाकर एक्टिविज़्म करने वाले एक्टिविस्ट, या नक्सली आतंकी, ज़्यादा तैयार किए हैं।

और अंत में आपको उसी इंसान का लेखन याद दिलाना चाहूँगा, जिसे आप उद्धृत करते हैं- दोस्तोवस्की। ‘नोट्स फ़्रॉम द अंडरग्राउंड’ से लेकर ‘क्राइम एंड पनिशमेंट’ और ‘द डेविल्स’ तक अपने हर मशहूर उपन्यास में वह ‘एक्टिविस्ट-टाइप’, यूटोपिया के पुजारी आदर्शवादियों का खोखलापन ज़ाहिर करते हैं। केवल उन्हें उद्धृत करने की बजाय अविजित पाठक और उनके एक्टिविस्ट अकादमिक साथी दोस्तोवस्की को पढ़ना और ईमानदारी से उनके लेखन के आलोक में आत्म-चिंतन करना शुरू कर दें तो बेहतर होगा।

तीन तलाक: ‘रविशंकर जी कुछ भी कर लो मुसलमान शरियत को ही मानेगा’

राज्यसभा में तीन तलाक बिल पर तीखी बहस के बाद ये बिल पास हो चुका है। ये बिल 26 जुलाई को लोकसभा से पास हो चुका था। इस बिल में तीन तलाक को गैर कानूनी बनाते हुए 3 साल की सजा और जुर्माने का प्रावधान है। इस बिल के ज़रिए जहाँ सत्ता पक्ष मुस्लिम महिलाओं को न्याय दिलाने के प्रतिबद्ध है। वही विपक्ष इसका हर तरह से विरोध कर रहा है जिसका मुख्य मकसद वोट बैंक की राजनीति है। सदन में तीन तलाक बिल पर बोलते हुए नेता प्रतिपक्ष गुलाम नबी आजाद ने कहा कि मुस्लिम परिवारों को तोड़ना इस बिल का असली मकसद है।

आज आपके लिए ये जानना ज़रूरी है कि जन सरोकार और महिला मुद्दों पर भी किस तरह वोट बैंक और मजहब के नाम पर राजनीति होती है। इस बिल के विरोध में आजाद ने यह भी कहा, “कई इस्लामी देशों में तो गर्दन काटने का भी कानून है, आप वहाँ से वो कानून भी लेकर आएँगे क्या? उन्होंने कहा कि हमारा मुल्क किसी मुस्लिम मुल्क का मोहताज नहीं है और न ही किसी मुस्लिम के कहने से चलता है। देश के मुस्लिमों को देश पर गौरव है और हजारों सालों से साथ मिलकर रहते हैं। न हम मुस्लिम देशों की नकल करते हैं और न उनकी सोच रखते हैं।”

राज्य सभा में जारी बहस के दौरान, सदन के नेता प्रतिपक्ष गुलाम नबी आजाद ने कहा, “विधेयक शादी पर अधिकारों की सुरक्षा के लिए है, लेकिन इसका असली मकसद परिवारों का विनाश करना है। उन्होंने कहा कि यह राजनीतिक रूप से प्रेरित बिल है। पति-पत्नी अपने-अपने लिए वकील हायर करेंगे। वकील को पैसे देने के लिए जमीन बेची जाएगी। जेल का समय खत्म होने पर दोनों दिवालिया हो जाएँगे।

आज़ाद ने कहा कि सरकार मुस्लिम महिलाओं के नाम मुसलमानों को निशाना बना रही है। न रहेगा बाँस, न बजेगी बाँसुरी। अब इस बिल के जरिए सरकार घर के चिराग से ही घर में आग लगाना चाहती है। घर भी जल जाएगा और किसी को आपत्ति भी नहीं होगी।

गुलाम नबी आजाद ने कहा कि जब वे सजा काटकर जेल से बाहर आएँगे वे या तो आत्महत्या कर लेंगे या चोर और डकैत बन जाएँगे। इस बिल के प्रति आपकी यही मंशा है। सदन में बोलते हुए गुलाम नबी आजाद ने कहा कि किसी धर्म को खत्म करने के लिए कानून नहीं बनना चाहिए, बल्कि देश के लिए कानून बनना चाहिए।

गुलाम नबी आजाद ने कहा कि आपने हमारी आपत्तियों को हटाया नहीं है, थोड़ी-बहुत सर्जरी जरूर की है। उन्होंने कहा कि इस्लाम में शादी सिविल अनुबंध है, जिसे आप क्रिमिनल शक्ल दे रहे हैं। वॉरंट के बैगर पुलिस को जेल में डालने का हक दे रहे हैं। साथ ही तीन साल की सजा, भत्ता और बच्चों-बीवी का ख्याल रखने का प्रावधान भी आपने बिल में डाल दिया है। अगर किसी पति को सजा होती है तो क्या महिलाओं को सरकार अपनी तरफ से पैसा देगी, लेकिन सरकार इसके लिए राजी नहीं है। आप एक पैसा नहीं देंगे, लेकिन उसके पति को जेल में डालने के लिए तैयार हैं।

इस मुद्दे पर और भी नेताओं ने विरोध दर्ज़ कराया साथ ही तमाम मुस्लिम नेताओं, मौलवियों ने भी देश के कानून के ऊपर शरियत के कानून को ही वरीयता देने की बात कही। गरीब नवाज फाउंडेशन के अंसार रज़ा ने कहा,
“पार्लियामेंट में तीन तलाक़ का मुद्दा बार बार उठाना ये हल नही चाहते ये कुछ हिंदुओं को ख़ुश करने के लिए है कि देखो मुसलमानों को हमने डरा दिया, रविशंकर जी कुछ भी करलो मुसलमान शरियत की ही मानेगा।”

बीजेपी के नेता रविशंकर प्रसाद ने सभी के आरोपों का विधिवत जवाब देते हुए तमाम कट्टरपंथियों के साथ ही कॉन्ग्रेस और नेता प्रतिपक्ष गुलाम नवी आज़ाद को भी आड़े हाथों लिया।

राज्यसभा में तीन तलाक बिल पर हुई चर्चा का जवाब देते हुए रविशंकर प्रसाद ने चर्चा में हिस्सा लेने वाले सभी सांसदों का आभार जताया। उन्होंने कहा कि पैगम्बर साहब ने हजारों साल पहले इसे गलत बता दिया था लेकिन हम इस पर 2019 में बहस कर रहे हैं। विपक्षी के लोग ‘लेकिन’ के साथ तीन तलाक को गलत बता रहे हैं क्योंकि ये लोग इसे चलने देना चाहते हैं। प्रसाद ने कहा कि गुलाब नबी जी अपनी पार्टी के अच्छे काम भी भूल गए। उन्होंने कहा कि दहेज कानून को गैर जमानती बनाया तब किसी के जेल जाने की चिंता क्यों नहीं हुई। आपकी ओर से प्रगतिशील कानून लाए गए उनका विरोध नहीं हुआ लेकिन शाहबानो के मामले में कॉन्ग्रेस के पैर क्यों हिलने लगते हैं, इसका जवाब आजाद साहब को देना चाहिए।

तमाम बहसों और विपक्षी नेताओं और शरीयत के हिमायतियों के विरोध के बाद भी तीन तलाक़ बिल राज्य सभा में पास हो चुका है। देश की मुस्लिम महिलाओं में इस बिल के पास होने पर ख़ुशी का माहौल है। अब उन्हें तीन तलाक़ के क्रूर चक्र से मुक्ति मिलने के आसार नज़र आने लगे हैं।

इस बिल को मुस्लिम महिला (महिला अधिकार संरक्षण कानून) बिल 2019 का नाम दिया गया है।

‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ व्हाट्सएप ग्रुप बनाकर देशविरोधी पोस्ट करने वाला सद्दाम कुरैशी गिरफ्तार

‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ नामक व्हाट्सएप ग्रुप बनाकर धार्मिक भावना भड़काने वाले और देशविरोधी पोस्ट करने वाले सद्दाम कुरैशी को नगर पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है और पूछताछ के बाद उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया है। दरअसल, बिहार के बेतिया में एक शख्स ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ के नाम से एक व्हाट्सएप ग्रुप चला रहा था और इस ग्रुप का एडमिन सद्दाम ग्रुप में धार्मिक भावना भड़काने वाला और देशविरोधी पोस्ट किया करता था। साथ ही इसमें अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल करते हुए आपत्तिजनक पोस्ट किए जा रहे थे।

नगर पुलिस को सूचना मिली कि एक व्यक्ति अपने सेलफोन पर पाकिस्तान जिंदाबाद नाम से व्हाट्सएप ग्रुप बनाकर धार्मिक भावना भड़काने के लिए अनाप-शनाप पोस्ट कर रहा है। इसकी सूचना पर थानाध्यक्ष ने प्राथमिकी दर्ज कर वरीय पदाधिकारी को इससे अवगत कराया। बाद में पुलिस की टेक्नीकल डिपार्टमेंट की सहायता से ग्रुप एडमिन को ट्रेस किया गया और लोकेशन के आधार पर संतघाट इलाके से शहर के नाजनी चौक निवासी सद्दाम कुरैशी को गिरफ्तार किया गया। उसके पास से ओपो कंपनी का सेलफोन और सिमकार्ड भी जब्त किया गया है।

मामले में पुलिस ने पाकिस्तान जिंदाबाद नाम से व्हाट्सएप ग्रुप बनाने, धार्मिक भावना भड़काने, देश की एकता अखंडता पर ठेस पहुँचाने के आरोप के तहत प्राथमिकी दर्ज कर करवाई शुरू कर दी है। सद्दाम के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 153 ए, 153 बी और 258 के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई है। पुलिस ने ये पूरी कार्रवाई बेतिया एसपी जयंतकांत के नेतृत्व में स्पेशल टीम बनाकर की। गिरफ्तार सद्दाम कुरैशी के पाकिस्तान से सम्बन्ध होने की आशंका के मद्देनजर अन्य पहलुओं पर भी जाँच की जा रही है।

99 Vs 84 मतों से राज्यसभा में पारित हुआ तीन तलाक बिल: 3 साल की सजा, जुर्माने का प्रावधान शामिल

राज्यसभा में आज मतदान के बाद ट्रिपल तलाक़ बिल पास हो गया है। राज्यसभा में तीन तलाक को अपराध बनाने वाले बिल को चर्चा के बाद वोटिंग के जरिए पास कर दिया गया है। इस बिल के पक्ष में 99 और विपक्ष में 84 वोट पड़े हैं। लोकसभा से बीती 26 जुलाई को ही इसे मंजूरी मिल चुकी थी। इस बिल में तीन तलाक को गैर कानूनी बनाते हुए 3 साल की सजा और जुर्माने का प्रावधान शामिल है। लोकसभा में आज उपभोक्ता संरक्षण बिल को चर्चा के बाद पास कर दिया गया।

अब मुस्लिम महिलाओं को व्हाट्सएप्प से लेकर अन्य ऐसे ही किइस माध्यम से तीन तलाक़ से निजात मिल सकेगी। इस कानून के पास होने के बाद अब मुस्लिम समुदाय में ट्रिपल तलाक़ की प्रथा कानूनन अपराध होगा।

मुस्लिम महिलाओं को तीन तलाक की कुप्रथा से मुक्ति दिलाने के मकसद से मंगलवार को राज्यसभा में पेश विधेयक पर हुई चर्चा में भाग लेते हुए विभिन्न दलों के सदस्यों ने इसे अपराध की श्रेणी में डालने के प्रावधान पर आपत्ति भी जताई और कहा कि इससे पूरा परिवार प्रभावित होगा।

हालाँकि सत्ता पक्ष ने इस विधेयक को राजनीति के चश्मे से नहीं देखे जाने की नसीहत देते हुए कहा कि कई इस्लामी देशों ने पहले ही इस प्रथा पर रोक लगा दी है। कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) विधेयक 2019 उच्च सदन में चर्चा के लिये पेश किया और कहा कि उच्चतम न्यायालय के एक फैसले में इस प्रथा को अवैध ठहराया गया। लेकिन उसके बाद भी तीन तलाक की प्रथा जारी है।

यह विधेयक लोकसभा में पिछले सप्ताह ही पारित हुआ है। विधेयक पर हुयी चर्चा में भाग लेते हुए कॉन्ग्रेस सदस्य अमी याज्ञनिक ने कहा कि महिलाओं को धर्म के आधार पर नहीं बाँटा जाना चाहिए। उन्होंने सवाल किया कि सभी महिलाओं के प्रति क्यों नहीं चिंता की जा रही है? उन्होंने कहा कि समाज के सिर्फ एक ही तबके की महिलाओं को समस्या का सामना नहीं करना पड़ता। उन्होंने कहा कि यह समस्या सिर्फ एक कौम में ही नहीं है। उन्होंने कहा कि वह विधेयक का समर्थन करती हैं लेकिन इसे अपराध की श्रेणी में डालना उचित नहीं है।

याज्ञनिक ने कहा कि जब उच्चतम न्यायालय ने पहले ही इसे अवैध ठहरा दिया तो फिर विधेयक लाने की क्या जरूरत थी। उन्होंने कहा कि विधेयक में इसे अपराध की श्रेणी में डाल दिया गया है। इससे महिलाओं को अपराधियों के साथ मजिस्ट्रेट की अदालत में पेश होना होगा। उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों की सुनवाई पारिवारिक (फैमिली) अदालत में होनी चाहिए न कि मजिस्ट्रेट अदालत में।

उन्होंने कहा कि विधेयक में प्रावधान किया गया है कि पति और पत्नी के अलावा तीसरा व्यक्ति भी अदालत का दरवाजा खटखटा सकता है। उन्होंने इस प्रावधान पर आपत्ति जताते हुए कहा कि किसी तीसरे व्यक्ति को पारिवारिक या निजी मामले में हस्तक्षेप की अनुमति कैसे दी जा सकती है? उन्होंने कहा कि कानून का मकसद न्याय और अंतत: गरिमा है लेकिन इसके प्रावधानों के तहत महिला को मजिस्ट्रेट अदालत में अपराधियों के साथ बैठने को बाध्य होना पड़ेगा। उन्होंने कहा कि महिलाओं को कानूनी सहायता का भी कोई प्रावधान नहीं किया गया है। उन्होंने कहा कि महिलाओं को तीन तलाक की समस्या से मुक्ति दिलाइए लेकिन ऐसा उनकी गरिमा के साथ होना चाहिए।

चर्चा में भाग लेते हुए जदयू के बशिष्ठ नारायण सिंह ने विधेयक का विरोध किया। उन्होंने कहा कि वह न तो विधेयक के समर्थन में बोलेंगे और न ही इसमें साथ देंगे। उन्होंने कहा कि हर पार्टी की अपनी विचारधारा होती है और उसे पूरी आजादी है कि वह उस पर आगे बढ़े। जद (यू) के सदस्यों ने विधेयक का विरोध करते हुए सदन से बहिर्गमन किया। इससे पूर्व माकपा सदस्य के के रागेश ने 21 फरवरी 2019 को जारी मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) अध्यादेश के खिलाफ अपना प्रस्ताव पेश किया।

मैं बस में लड़की छेड़ने के लिए चढ़ता था: कमल हासन के लिए यह मनोरंजक बात है

कमल हासन एक जाने माने अभिनेता हैं और समय-समय पर वो पृथ्वी लोक से लेकर आकाश-पाताल तक की घटनाओं पर ‘ज्ञान’ देते नजर भी आते हैं। लेकिन सही समय, सही मुद्दे और सही व्यक्ति को ज्ञान देते वक़्त वो अक्सर चूक जाते हैं। खासकर तब, जब कमल हासन एक ऐसे शो में, जिसके वो खुद होस्ट हैं, सार्वजानिक स्थानों पर लड़कियों को छेड़ने की बात पर ज्ञान देने की जगह तालियाँ बजाते, उत्साह वर्धन करते हुए और हँसते हुए देखे जा रहे हैं।

यह वायरल वीडियो इसलिए भी चर्चा का केंद्र बन चुका है क्योंकि हिन्दुओं को आजाद भारत का पहला आतंकवादी बताने और उनकी आस्था और प्रतीकों को अपमानित करने का बहना तलाशने वाले कमल हासन अपने सामने दिए जा रहे एक बेहद घटिया और महिला विरोधी बयान पर तालियाँ बजाते और हँसते हुए देखे जा रहे हैं।

आजकल TV पर ‘बिग बॉस 3 तमिल’ चल रहा है। इस शो को ‘साउथ के सुपरस्टार’ कमल हासन होस्ट कर रहे हैं। इस शो को लेकर एक बड़ी कंट्रोवर्सी सामने आई है। इस शो में एक कंटेस्टेंट हैं एक्टर सरवनन, जो कि
तमिल सिनेमा का जाना-माना नाम हैं। इस शो का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। इस वीडियो में सरवनन बताते हैं कि वह बस में लड़कियों को छेड़ा करते थे।

एक्टर सरवनन ने कहा कि वो कॉलेज के दिनों में बसों में इसलिए चलते थे कि लड़कियों के साथ छेड़छाड़ कर सके। सरवनन के इस बयान के बाद वहाँ बैठे सभी लोग हँसते हैं और तालियाँ बजाते हैं। सरवनन के बयान के बाद ऑडियंस तो सीटियाँ-तालियाँ बजा ही रही थी, लेकिन उनके साथ ही शो के होस्ट कमल हासन भी जोर-जोर से ठहाके लगाकर हँसते हैं, तालियाँ बजाते हैं।

सरवनन के बयान को मजाकिया अंदाज में लेते हुए कमल हासन कहते हैं, “बस में सफर करना बड़ी बात है। एक ओर लोग हैं जो ऑफिस टाइम से पहुँचने के लिए भगदड़ करते हैं और एक तरफ ऐसे लोग हैं जो सिर्फ लड़कियों से छेड़खानी के लिए बस में चढ़ते हैं।” इसके बाद फिर से शो ठहाकों और तालियों से गूँजने लगता है।

इस वीडियो के सोशल मीडिया पर वायरल होते ही ‘मीटू मूवमेंट’ (MeToo) के दौरान अपनी बात रखने वाली सिंगर चिन्मयी ने ट्विटर पर शो के इस वीडियो क्लिप को शेयर करते हुए कलाकार कमल हासन का विरोध करते हुए लिखा- “तमिल चैनल पर आने वाले एक शो में एक आदमी गर्व के साथ दावा कर रहा है कि उसने पब्लिक बस में महिला के साथ छेड़छाड़ की थी। दर्शक इस पर तालियाँ बजा रहे हैं। और ये मजाक है उस आडियंस के लिए, जो महिलाएँ तालियाँ बजा रही हैं उनके लिए, और उस मोलेस्टर के लिए!”

चिन्मयी के इस ट्वीट पर लोग खूब कमेंट कर रहे हैं और उनका साथ दे रहे हैं। चिन्मयी की ही तरह कई अन्य लोग भी कमल हासन के इस बर्ताव पर हैरानी जता रहे हैं और सवाल भी कर रहे हैं। कुछ लोगों को कमल हासन के इस बर्ताव से आपत्ति है तो कुछ लोगों का मानना है कि ऐसी बात कहने वाले एक्टर सरवनन को इस शो से तुरंत निकाल दिया जाना चाहिए।

हालाँकि, कमल हासन का इस पर अभी तक कोई स्पष्टीकरण नहीं आया है। कारन यह भी हो सकता है कि कमल हासन अपने मुद्दों को सोशल मीडिया पर कथित लिबरल्स से प्रेरित होकर ही उठाते हैं। इसलिए जब तक किसी उनके व्यक्तिगत सोर्स ने उनके कान में यह बात ना फूँकी हो कि कौन-सी बात समाज में क्या सन्देश दे सकती है तब तक शायद उन्हें या एहसास ना होता हो कि उन्हें किस तरह की प्रतिक्रिया देनी है।

हिन्दुओं को पहला आतंकवादी बताकर कमल हासन पहले भी खूब सस्ती लोकप्रियता बटोर चुके हैं। इसी तरह से जलीकट्टू त्यौहार को लेकर भी कमल हासन अक्सर समाचार में बने रहते हैं।

कमल हासन महाभारत को लेकर दे चुके हैं आपत्तिजनक बयान

वर्ष 2017 में कमल हासन द्रौपदी को ‘ऑब्जेक्ट’ की तरह इस्तेमाल किए जाने की बात कहकर महिलाओं के मुद्दों पर अपनी संवेदनशीलता का परिचय दे चुके हैं। कमल ने इंटरव्यू के दौरान पांडवों द्वारा जुए में द्रौपदी को दाँव पर लगाने पर कमेंट किया था। हासन ने एक क्षेत्रीय चैनल को इंटरव्यू देते हुए कहा था, “महाग्रंथ में पांचाली को पुरुषों की हाथ की कठपुतली बताया था, जिन्हें उनके पति दाँव पर लगाते हैं। देश आज भी ऐसी धार्मिक पुस्तक पढ़ता है, जिसमें एक महिला (द्रौपदी) को जुए के लिए इस्तेमाल किया गया।”

बिग बॉस में महिलाओं को छेड़ने की बात पर कमल हासन द्वारा बजाई तालियाँ इस बात का सबूत हैं कि उनकी संवेदनाएँ कितनी ‘सेलेक्टिव’ और ‘ऑकेजनल’ हैं।

महाराष्ट्र: विधानसभा चुनाव से पहले NCP-कॉन्ग्रेस के 4 विधायकों ने दिया इस्तीफा, BJP में होंगे शामिल!

महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव से पहले नेताओं के दल-बदल का सिलसिला शुरू हो गया है। राष्ट्रवादी कॉन्ग्रेस पार्टी (NCP) और कॉन्ग्रेस पार्टी के कई नेताओं का बीजेपी में शामिल होना जारी है। ताजा सियासी घटनाक्रम में कॉन्ग्रेस के 1 और एनसीपी के 3 विधायकों ने स्पीकर को अपना इस्तीफा सौंप दिया है। इनमें कॉन्ग्रेस के विधायक कालिदास कोलाम्बकर, NCP के विधायक शिवेन्द्र राजे भोसले, वैभव पिचाड और संदीप नाइक शामिल हैं। चारों ने स्पीकर हरिभाऊ बागड़े से मुलाकात कर अलग-अलग इस्तीफा सौंपा।

जानकारी के मुताबिक, चारों विधायक राज्य के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की अगुवाई में औपचारिक तौर पर बुधवार (जुलाई 31, 2019) को भारतीय जनता पार्टी में शामिल होंगे। कालिदास कोलाम्बकर ने पहले ही घोषणा कर दी है कि कि वह पार्टी छोड़कर बीजेपी में शामिल होंगे। इसके अलावा NCP के कद्दावर नेता और शरद पवार के करीबी माने जाने वाले मधुकर पिचाड के बेटे वैभव ने कहा कि उन्होंने अपने समर्थकों की एक बैठक बुलाकर उनकी राय जानने की कोशिश की थी। उनके ज्यादातर समर्थक चाहते हैं कि वो बीजेपी में शामिल हो जाएँ। 

गौरतलब है कि हाल ही में महाराष्ट्र में बीजेपी के वरिष्ठ नेता और जल संसाधन मंत्री गिरीश महाजन ने दावा किया था कि कॉन्ग्रेस और NCP के तकरीबन 50 विधायक उनके सम्पर्क में हैं और जल्द ही वो बीजेपी में शामिल होंगे। इससे पहले, 26 जुलाई को NCP की महिला विंग की अध्यक्ष चित्रा वाघ ने पार्टी के अंधकारमय भविष्य को देखते हुए इस्तीफ़ा दे दिया था और पार्टी के मुंबई प्रमुख सचिन अहीर ने पहले से ही शिवसेना का दामन थाम लिया है।

वहीं, पार्टी के नेताओं द्वारा लगातार दिए जा रहे इस्तीफे पर शरद पवार ने 28 जुलाई को कहा था कि बीजेपी उनकी पार्टी को तोड़ रही है, जो लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं है। उन्होंने फडणवीस और बीजेपी के अन्य मंत्रियों पर दूसरे दलों के नेताओं की खरीद-फरोख्त का आरोप लगाया था। साथ ही उन्होंने भाजपा पर जाँच एजेंसियों और सरकारी वित्तीय निकायों का दुरुपयोग कर नेताओं को अपनी पार्टी में शामिल होने के लिए मजबूर करने का भी आरोप लगाया। हालाँकि शरद पवार ने ये भी कहा था कि उनकी पार्टी से जो कोई नेता अलग होता है, वह दोबारा नहीं जीतता है।

राज्यसभा में JDU ने किया तीन तलाक का बहिष्कार, सदस्यों का वॉकआउट: बीजेपी की राह आसान?

राज्यसभा में मंगलवार (जुलाई 30, 2019) को तीन तलाक बिल पेश किए जाने के बाद भाजपा की सहयोगी जनता दल यूनाइटेड (JDU) ने सदन में इसका विरोध किया। जदयू की ओर से वशिष्ठ नारायण सिंह ने सदन में बिल के बहिष्कार का ऐलान किया और अपनी बात कहकर सदन से बाहर चले गए।

सदन में आज वशिष्ठ नारायण सिंह ने अपनी खराब तबीयत का हवाला देकर वैंकया नायडू से जल्द बोलने के लिए वक्त माँगा और उसके बाद उन्होंने बोलना शुरू किया

वशिष्ठ नारायण सिंह ने कहा, “विचार की यात्रा कभी खत्म नहीं होती है, जो सपना गाँधी-जयप्रकाश और लोहिया ने देखा था, उसे समाज आज पूरा करने की कोशिश कर रहा है।” उन्होंने सदन में तीन तलाक बिल पर विरोध दर्ज कराते हुए कहा कि तीन तलाक, बाल विवाह जैसी चीजें आज समाज में अपनी जड़े जमा चुकी हैं, लेकिन इन्हें दूर करने में समय लगता है। उन्होंने तीन तलाक को महज एक सवाल करार दिया और कहा कि इस पर बड़े पैमाने पर जागरूकता फैलाने की जरूरत है। इसके बाद उन्होंने कहा कि वे लोग तीन तलाक बिल के मौजूदा कानून का विरोध करते हैं, इसलिए वे सदस्य सदन से वॉकआउट कर रहे हैं।

उन्होंने स्पष्ट किया कि उनकी पार्टी इसके साथ नहीं है। पार्टी की विचारधारा का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि हर पार्टी की एक विचारधारा है और उसका पालन करने के लिए वह स्वतंत्र हैं।

इसके बाद राज्यसभा में मौजूद जेडीयू के सदस्य सदन से वॉकऑउट कर गए। उल्लेखनीय है कि इससे पहले भी लोकसभा में तीन तलाक बिल पेश किए जाने पर जेडीयू सदस्यों ने सरकार के पक्ष में वोटिंग करने की जगह वॉकआउट किया था।

मुस्लिम महिलाओं की उन्नति और सामाजिक-पारिवारिक साझेदारी के लिए लाए गए इस विधेयक पर चर्चा के दौरान जेडीयू सदस्य राजीव रंजन ने भी कहा कि उनकी पार्टी का मानना है कि इस बिल से समाज को नुकसान होगा।

गौरतलब है कि जेडीयू के वॉकआउट करने से ट्रिपल तलाक को राज्यसभा में पास कराने के लिए बीजेपी की राह आसान हो गई है। अभी तक जेडीयू इस बिल के विरोध में वोट देने की बात कर रही थी। ऐसे में भाजपा के लिए बिल पास करवा पाना मुश्किल हो जाता, लेकिन जेडीयू के वोटिंग में हिस्सा न लेने से भाजपा को राहत की साँस मिली होगी। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक भाजपा उम्मीद कर रही है कि उसे आरटीआई संशोधन बिल में समर्थन करने वाले कुछ अन्य दलों का भी समर्थन मिल सकता है। हालाँकि वाईएसआर कॉन्ग्रेस पार्टी ने ऐलान किया है कि वह इस बिल के विरोध में वोट करेगी।

गंगा के तेज वेग में बही जा रही थी गाय, रिटायर्ड फौजी ने जान पर खेलकर बचाया

तीर्थ नगरी ऋषिकेश के बैराज पुल के सामने एक दिल को छू जाने वाला नजारा देखने को मिला। यहाँ गंगा के तेज वेग में बहकर जा रही गाय को 63 वर्षीय रिटायर्ट फौजी ने अपनी जान पर खेलकर बचाया। रिटायर्ड फौजी का नाम सुरेश पहलवान है। वे अंतरराष्ट्रीय पहलवान लाभांशु के पिता हैं।

जानकारी के मुताबिक सुरेश कल (जुलाई 30,2019) दोपहर को करीब 2 बजे बैराजपुल के पास से गुजर रहे थे कि तभी उन्होंने देखा कि एक गाय जो बैराज पुल पर पानी पीने आई थी वो फिसलकर नदी में गिर गई है और गंगा की धारा उसे अपने बहाकर ले जा रही है।

गाय को तड़पता देख, उन्होंने वहीं किनारे में अपनी बाइक खड़ी की और जान की परवाह किए बिना नदी में कूद गए। 60 वर्षीय सुरेश की हिम्मत देख सड़क से गुजर रहे काँवड़ियों ने भी नदी में कूदकर गाय को बचाने के लिए अपनी ओर से कोशिश की और अंत में किसी तरह गाय को नदी से बाहर निकाल लिया गया।

आजम खान की यूनिवर्सिटी से 300 चोरी की किताबें बरामद: 1774 में बने मदरसे से चोरी हुई थीं ऐतिहासिक किताबें

भू-माफिया सपा सांसद आजम खान के ड्रीम प्रोजेक्ट मोहम्मद जौहर अली विश्वविद्यालय पर मंगलवार (जुलाई 30, 2019) दोपहर पुलिस का छापा पड़ा है। दरअसल मदरसा आलिया की 9,000 किताबें चोरी हुई थीं। जिसका इल्जाम जौहर यूनिवर्सिटी पर लगा था। इसी सिलसिले में आजम की जौहर यूनिवर्सिटी पर छापा पड़ा है। पुलिस ने विश्वविद्यालय की लाइब्रेरी में जाकर रामपुर के मदरसा आलिया से गायब हुई किताबों को लेकर छानबीन की।

एसपी डॉ अजय पाल ने बताया कि अभी तक तकरीबन 300 चोरी की किताबें मिल चुकी हैं। ये किताबें 100 से 150 साल पुरानी हैं। उन्होंने बताया कि 1774 में स्थापित रामपुर के आलिया मदरसे से चोरी की गईं प्राचीन किताबें भी जौहर यूनिवर्सिटी की लाइब्रेरी से बरामद हुई हैं। इस मामले में अब तक यूनिवर्सिटी के 4 कर्मचारियों को हिरासत में लिया गया है। फिलहाल, जाँच जारी है और कई अन्य लोगों से भी पूछताछ की जा सकती है। परिसर के बाहर भारी संख्या में पुलिस बल तैनात है।

यूनिवर्सिटी की मुमताज सेंट्रल लाइब्रेरी में पुलिस दस्तावेज़ों की तलाश कर रही है। बता दें कि जौहर यूनिवर्सिटी में यह छापा उस वक्त पड़ा है, जब पहले से ही आजम खान जमीन कब्जाने के मामले में कई केसों में घिरे हुए हैं। आजम खान पर पहले से ही अजीमनगर थाने में जमीन हड़पने को लेकर कुल 27 मुकदमे दर्ज हैं। वहीं, उत्तर प्रदेश सिंचाई विभाग ने आजम खान को रामपुर में लग्जरी रिसॉर्ट हमसफर के लिए सरकारी जमीन कब्जाने को लेकर नोटिस जारी किया है। दूसरी तरफ आजम खान के बेटे अब्दुल्ला आजम खान पर गलत और कोडेड दस्तावेजों के आधार पर पासपोर्ट बनवाने के आरोप में मामला दर्ज किया गया है।