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‘चमगादड़ काटते हैं बिजली’: गोभक्त कमलनाथ के अफसरों ने ढूँढ निकाले बिजली कटौती के मुख्य अभियुक्त

मध्य प्रदेश में जनता रोजाना होने वाली बिजली कटौती से परेशान है। ऐसे में कमलनाथ सरकार के अफसरों ने बिजली कटौती को लेकर बेहद अजीबोगरीब बयान दिया है। सरकार का कहना है कि बिजली आपूर्ति की उनकी सारी कोशिशों पर चमगादड़ पानी फेर रहे हैं। कमलनाथ सरकार के अफसरों की मानें तो बिजली की कटौती के लिए चमगादड़ जिम्मेदार हैं।

राज्य में खस्ताहाल बिजली व्यवस्था और अपने निकम्मेपन का दोष चमगादड़ों के सर मढ़कर कमलनाथ सरकार ने अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने की कोशिश की है। भीषण गर्मी में मध्य प्रदेश के लोगों को बिजली की कटौती से जूझना पड़ रहा है। इसको लेकर कमलनाथ सरकार पर लगातार सवाल भी उठ रहे हैं।

इससे पहले कमलनाथ सरकार ने बिजली की कटौती के लिए शिवराज सरकार में खरीदे गए खराब ट्राँसफॉर्मर्स को जिम्मेदार बताया था। अब कमलनाथ सरकार के अधिकारियों ने अपनी नाकामी को छिपाने के लिए बिजली कटौती के लिए पेड़ों में लटकने वाले चमगादड़ोंं को जिम्मेदार बता रहे हैं।

कमलनाथ सरकार का कहना है कि भोपाल के कमला पार्क के पास तालाब के किनारे बहुत पेड़ हैं, जिन पर सालों से चमगादड़ों का बसेरा है। इन्हीं पेड़ों के नीचे से बिजली की लाइनें निकलती हैं। अक्सर चमगादड़ इन बिजली की लाइनों से टकरा जाते हैं और इस वजह से लाइन में खराबी आ जाती है।

कॉन्ग्रेस सरकार का मानसिक संतुलन बिगड़ गया है- शिवराज सिंह

वहीं, मीडिया से बातचीत में पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा है, “पहले कॉन्ग्रेस सरकार बोल रही थी कि शिवराज सिंह चौहान ने घटिया ट्राँसफॉर्मर खरीदे और अब बोल रही है कि चमगादड़ की वजह से बिजली कट रही है। इनका मानसिक संतुलन बिगड़ गया है।”

बिजली संकट से परेशान होकर जब मध्य प्रदेश के ऊर्जा मंत्री प्रियव्रत सिंह ने बिजली विभाग के अधिकारियों की बैठक बुलाई, तो बिजली विभाग के अफसरों ने बताया कि चमगादड़ बिजली के तारों पर उल्टा लटकते हैं, जिसकी वजह से बिजली के तार आपस में चिपक जाते हैं और फॉल्ट हो जाते हैं। लेकिन अधिकारियों की ये बात आम लोगों के गले नहीं उतर रही है और न ही उनके मंत्रालय के मंत्री प्रियव्रत सिंह के।

कमलनाथ सरकार में ही पैदा हुए हैं चमगादड़

कमलनाथ से पहले पिछले 15 साल से मध्य प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की सरकार थी। इस दौरान बिजली की इतनी गंभीर समस्या कभी भी देखने को नहीं मिली थी। ऐसे में कॉन्ग्रेस की कमलनाथ सरकार में अचानक बिजली संकट बढ़ने की वजह से अधिकारी इस समस्या के पीछे की असली वजह का पता नहीं लगा पा रहे हैं और नए-नए तर्क देकर बचने की कोशिश कर रहे हैं।

MP में कॉन्ग्रेस सरकार के दौरान ही होती है बिजली समस्या

मध्य प्रदेश में इस तरह से बिजली कटौती कमलनाथ सरकार के लिए सिरदर्द बन गई है। साल 2003 में भी मध्य प्रदेश में कॉन्ग्रेस की सरकार थी और उस समय भी बिजली आपूर्ति एक बड़ा मुद्दा बन गई थी, जिस कारण जनता ने कॉन्ग्रेस सरकार को सत्ता से ऐसे उखाड़ फेंका था कि 15 साल तक कॉन्ग्रेस सत्ता में नहीं आ पाई और अब कॉन्ग्रेस के फिर से सत्ता में आते ही बिजली की समस्या पैदा हो गई है।

अपने निकम्मेपन को छिपाने के लिए राबड़ी को बिहार का नेहरू बना रहे हैं सुशील मोदी

सुशील कुमार मोदी- एक ऐसा नाम, जो बिहार में तब से प्रासंगिक है, जब से लालू-नीतीश-रामविलास का उद्भव हुआ। सुशील मोदी भी इन्हीं तीनों की तरह जेपी आंदोलन की उपज हैं, लम्बे समय से राजनीति में सक्रिय हैं, छात्र राजनीति से निकले हैं, बिहार की गठबंधन सरकार में दूसरे नंबर के नेता हैं और लालू परिवार के ख़िलाफ़ अदालत जाने के लिए भी इन्हें जाना जाता है। तमाम उपलब्धियों के बावजूद अगर इतने बड़े स्तर का नेता अपने निकम्मेपन का ठीकरा उस लालू-राबड़ी सरकार पर फोड़े, जिसके बारे में जानने को कुछ नया न बचा हो, जिसकी कारस्तानियाँ पूरा बिहार जानता हो, तो यह अजीब है। सुशील मोदी अपनी, अपने गठबंधन सरकार की, अपनी पार्टी की और अपने सहयोगियों के निकम्मेपन को छिपाना चाह रहे हैं।

प्रेस कॉन्फ्रेंस में टाल गए सवाल, जवाबदेही से भागने का कारण क्या?

सुशील मोदी ने जब प्रेस कॉन्फ्रेंस किया तो पत्रकारों ने उनसे मुजफ्फरपुर में Acute Encephalitis Syndrome (AES) से लेकर सवाल पूछे लेकिन उन्होंने जवाब देने से मना कर दिया। उन्होंने कहा कि ये मीडिया ब्रीफिंग बैंकिंग कमिटी के सम्बन्ध में बुलाई गई है और वह मुजफ्फरपुर त्रासदी से जुड़े सवालों के जवाब नहीं देंगे। अगर कोई अन्य मंत्री या विधायक ऐसी बात करता तो यह क्षम्य था लेकिन बिहार गठबंधन के सबसे बड़े सूत्रधार और बीच के 4 वर्षों को छोड़ दें तो 2005 से लगातार बिहार सरकार में मुख्यमंत्री के बाद सबसे बड़े नेता की ज़िमेम्दारी निभाने वाले व्यक्ति को यह बात शोभा नहीं देती कि वह इस तरह के सवालों से भागे।

सवाल सुशील मोदी से बनता है, सवाल नीतीश कुमार से बनता है कि 2005 से लेकर अब तक पिछले 15 वर्षों में बिहार में स्वास्थ्य सिस्टम में बदलाव लाने के लिए क्या किया गया है? 49 वर्षों पहले बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री के नाम पर स्थापित किया गया मुजफ्फरपुर का SKMCH, मेडिकल के पोस्ट ग्रेजुएट कोर्स से आज भी क्यों महरूम है? लालू-राबड़ी पर हमें जो बहस करना था कर चुके, जनता को जो हिसाब करना था वह कर चुकी और अदालत भी न्याय कर रही है- लेकिन, अगर 1990 से 2005 तक लालू-राबड़ी ने बिहार का कबाड़ा किया तो 2005 से आज तक के समय में 14 में से 9 साल शासन करने वाली राजग गठबंधन ने क्या किया और पूरे 14 साल से सत्ता पर काबिज़ जदयू ने क्या किया?

सोचिए, अगर आज मुजफ्फरपुर के सबसे महत्वपूर्ण अस्पताल में पीडियाट्रिक्स (बाल चिकित्सा) विभाग में पोस्ट ग्रेजुएट की 10 सीटें भी होतीं तो स्थिति में कितना सुधार होता? शायद तब मुजफ्फरपुर में आसपास के जिलों से डॉक्टर नहीं बुलाने पड़ते। अब मीडिया में बात आने व इतनी संख्या में मौतों के होने के बाद अब नीतीश ने अस्पताल प्रशासन को इस सम्बन्ध में योजना तैयार करने को कहा है। इन छोटी-छोटी चीजों से बदलाव लाया जा सकता है, राबड़ी की आलोचना करने से नहीं। राबड़ी देवी को बिहार का नेहरू बनाने की ज़रूरत नहीं है। राबड़ी और लालू काल जा चुका है, उसके बाद हमने शासन को ट्रैक पर चलते भी देखा है, इसीलिए अब भी इस चीज के लिए लालू-राबड़ी की आलोचना करने का अर्थ है अपने निकम्मेपन को छिपाना।

लम्बे समय तक राज्य का वित्त मंत्री रहने के बावजूद ऐसी निष्क्रियता?

सुशील मोदी ने वो तमाम चीजें गिनाई जिनसे इस रोज के उन्मूलन का कोई लेना-देना नहीं है। उन्होंने कहा कि रोगियों को अस्पताल लाने का ख़र्च सरकार दे रही है, मुफ़्त में इलाज कर रही है, मृतकों के परिजनों को 4 लाख रूपए दिए जा रहे हैं और स्कूल-कॉलेज गर्मी के कारण बंद करा दिए गए। इनमें से कौन-सा ऐसा क़दम है जो इस बात की तस्दीक करता हो कि अगले वर्ष फिर से मासूमों की जानें नहीं जाएगी? इतना ही नहीं, सुशील मोदी ने उल्टा राजद से सवाल दागे कि राबड़ी काल में अस्पतालों को आवारा पशुओं का तबेला बना दिया गया था एवं मेडिकल कॉलेजों की दुर्दशा की गई थी। सुशील मोदी से बस एक सवाल, अगर किसी सरकार ने बिहार के स्वास्थ्य सेवा सिस्टम का कबाड़ा कर भी रखा था तो उसे ठीक करने में कितने दिन लगते हैं?

सुशील मोदी को जीएसटी के कार्यान्वयन के समय वित्त मंत्रियों की समिति का अध्यक्ष बनाया गया था, कई बजट पेश कर चुके मोदी को इसकी सभी बारीकियाँ पता हैं और योजनाओं के क्रियान्वयन को लेकर फंडिंग के सिस्टम को समझने वाला उनसे बेहतर शायद कोई न हो। इतना सब कुछ समझने के बावजूद सुशील मोदी ने आज तक कितनी बार केंद्रीय वित्त मंत्री के साथ बैठकों में बिहार के अस्पतालों का मुद्दा उठाया? 2014 में भी इस बीमारी से 400 के लगभग बच्चों की जानें गई थी। उसके बाद 4 वर्षों में नीतीश सरकार ने क्या कोई ऐसी योजना पेश की, जिसके आधार पर केंद्र से फंडिंग ली जा सके और व्यवस्था को चुस्त-दुरुस्त किया जा सके? 2017 में फिर से वित्त मंत्री बने मोदी ने क्या 2018 बजट के दौरान केंद्र से इस सम्बन्ध में बात की?

सुशील मोदी और बिहार त्रासदी से जुड़ी गंभीर बातों को आगे बढ़ाने से पहले एक छोटी-सी कहानी बिलकुल संक्षेप में जान लीजिए। भस्मासुर नामक राक्षस ने तपस्या कर के शिव को प्रसन्न कर दिया और यह वर माँगा कि वह जिसके भी सिर पर अपना हाथ रख दे, वह जल कर राख हो जाए। वर मिलने के बाद वह बदनीयत से शिव की ओर ही दौड़ पड़ा। इसके बाद रास्ते में एक मोहिनी ने उसे आकर्षित किया उसके साथ और नृत्य करते-करते ऐसे स्टेप्स तैयार किए जिससे भस्मासुर ने ख़ुद के ही सिर पर हाथ रख डाला। परिणाम- वह अपने ही वरदान का शिकार होकर राख में तब्दील हो गया। अब वापस लौटते हैं वास्तविक चर्चा पर।

राजद और उनके नेताओं की निष्क्रियता पारम्परिक रही है

जवाबदेह लालू-राबड़ी नहीं हैं। लालू की अनुपस्थिति में पार्टी के सर्वेसर्वा बने तेजस्वी यादव का कोई अता-पता नहीं है। वरिष्ठ राजद नेता रघुवंश प्रसाद सिंह अंदेशा जताते हैं कि वह वर्ल्ड कप का मैच देखने गए होंगे। पप्पू यादव कई दिनों से मुजफ्फरपुर में बैठ कर बहती गंगा में हाथ धो रहे हैं और अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेंक रहे हैं। तेजस्वी कहाँ हैं? 80 विधायकों के साथ भी अगर कोई पार्टी निष्क्रिय हो कर बैठी हुई है तो ज़रूर उसका अंत निकट है। अब जिसका अंत निकट है, उसपर आरोप लगाना सक्षम सत्ता का कार्य नहीं है। केंद्र में राजग की सरकार है, राज्य में राजग की सरकार है और बिहार से गिरिराज सिंह, रामविलास पासवान, अश्विनी कुमार चौबे, रविशंकर प्रसाद, नित्यानंद राय और आरके सिंह मोदी मंत्रिमंडल का हिस्सा हैं।

जिस राज्य से 6 मंत्री देश की प्रचंड बहुमत वाली सरकार का हिस्सा हों, सवाल भी उनसे ही पूछा जाएगा। सुशील मोदी शायद अब केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के साथ होने वाली बैठक में बिहार के अस्पतालों का मुद्दा उठाने वाले हैं। शुक्रवार (जून 21, 2019) को सीतारमण ने सभी राज्यों के वित्त मंत्रियों की बैठक बुलाई है और उसमें सुशील मोदी इन्सेफ़्लाइटिस से हो रही मौतों का मुद्दा उठा कर अतिरिक्त सहायता की माँग करेंगे। इस बैठक में प्रखंड स्तर पर बच्चो के लिए आईसीयू और वायरल शोध केन्द्र स्थापित करने के लिए केन्द्रीय मदद की माँग की जाएगी। आख़िर यह सब पहले क्यों नहीं हुआ? क्या लगभग एक दशक की समयावधि तक राज्य का उपमुख्यमंत्री और वित्त मंत्री रहा नेता इसके लिए जवाबदेह नहीं है, राबड़ी हैं?

सुशील मोदी ने मौत के आँकड़ों को मनगढ़ंत बताया है। क्या इस त्रासदी का स्तर गिनने का मापदंड अब मृत मासूमों की संख्या रह गई है? कितनी गंभीरता से काम किया जाना है, वो इस बात पर निर्भर करेगा कि 200 बच्चों की मौतें हुई हैं या फिर 300 की? इससे क्या फ़र्क पड़ता है? अगर कोई बीमारी फ़ैल रही है तो उससे बच्चों की एक भी मौत हुई या नहीं हो, उसके उन्मूलन के लिए सरकार ने ज़रूरी क़दम क्यों नहीं उठाए? वो भी तब, जब यह सिलसिला दशकों से चला आ रहा हो। जितनी बच्चों की मौतें हुई हैं, असल आँकड़ा निश्चित ही उससे ज्यादा है क्योंकि कई सारे ऐसे भी होंगे जो अस्पताल तक पहुँच भी नहीं पाए होंगे। सुशील मोदी को राबड़ी को बिहार का नेहरू बनाने की बजाए बिहार का योगी आदित्यनाथ बन कर काम करना चाहिए और जैसे गोरखपुर व आसपास के 14 जिलों में एइएस को नियंत्रित किया गया, उसी तरह की इच्छाशक्ति यहाँ भी दिखानी चाहिए

भविष्य की सोचें अब, क्या अगले साल भी मौतें होंगी?

अगर अब भी कोई योजना बनती है तो सुशील मोदी को जनता को इस बात की गारंटी देनी चाहिए कि जितने बेड के अस्पताल बनाने का निर्णय लिया जाएगा, जब वह बन कर तैयार होगा तो उसमें उतने ही बेड होंगे। सुशील मोदी इस बात की कड़ी मॉनिटरिंग करें कि सभी प्रस्तावित प्रोजेक्ट्स तय समयसीमा के भीतर पूरे होंगे। यह सब करने में वह और उनकी सरकार अभी तक बुरी तरह से विफल रही है। अगर आगे यह सब हो भी जाता है तो भी सरकार को इन मौतों के लिए माफ़ नहीं किया जा सकता। राबड़ी देवी का नाम जपना बंद किया जाए, विस्तृत कार्य-योजना बना कर केंद्र से फंडिंग माँगी जाए, केंद्र में किसी विपक्षी दल की भी सरकार नहीं है कि आप आरोप प्रत्यारोप का खेल खेलें।

केंद्र सरकार चाह कर भी कुछ नहीं कर सकती जब स्थानीय जनप्रतिनिधि निकम्मे और उदासीन बने रहें। समान गठबंधन की केंद्र व राज्य में सरकार होने का फायदा अगर आप नहीं उठा पा रहे हैं तो इसकी जवाबदेही लालू-राबड़ी-तेजस्वी पर डालने से कोई फायदा नहीं। जनता ने नरेन्द्र मोदी और उनके विकास मॉडल के नाम पर वोट दिया है, वरना आपके नाम पर पार्टी का 2015 विधानसभा चुनाव में क्या हाल हुआ था, यह किसी से छिपा नहीं है।

इसीलिए सुशील मोदी द्वारा राजद को चुनाव परिणाम को लेकर धमकी देना एक बचकानी हरकत है। यह लूडो का खेल नहीं है जिसमें बच्चे बहस करते रहें कि कौन जीता, यह देश के सबसे बड़े लोकतंत्र के चुनाव की बात है। राजद पर एक भी सांसद नहीं होने का तंज कस कर आप अपनेआप को और ज्यादा निकम्मा साबित कर रहे हैं क्योंकि सीटों की संख्या बढ़ने के साथ ही जवाबदेही, जिम्मेदारी और उत्तरदायित्व भी बढ़ता है, वो भी चक्रवृद्धि दर से।

बंगाल में हिंसा जारी, दो गुटों में झड़प, 1 की मौत, धारा 144 लागू

पश्चिम बंगाल में हिंसक घटनाओं का दौर अभी भी जारी है। ताज़ा समाचार राज्य के भाटपारा क्षेत्र से है जहाँ गुरुवार (20 जून) को दो गुटों के बीच हुई आपसी झड़प में एक व्यक्ति की मौत और चार अन्य के घायल होने की ख़बर सामने आई है। भाटपारा और जगतदल के अधिकारियों ने क्षेत्र में बढ़ते तनाव के चलते चार से अधिक व्यक्तियों के इकट्ठा होने पर प्रतिबंध लगाते हुए धारा 144 लागू कर दी है। मृतक की पहचान रामबाबू शॉ के रूप में हुई है।

ख़बर के अनुसार, इस झड़प के दौरान दोनों गुटों ने एक-दूसरे पर कच्चे बम फेंके और गोलियाँ भी बरसाई। स्थिति पर नियंत्रण के लिए जवाबी कार्रवाई में पुलिस ने आँसू गैस के गोले दागे। फ़िलहाल घायलों को इलाक़े के एक निजी अस्पताल (बीएन बोस) में भर्ती कराया गया है। पश्चिम बंगाल सरकार के गृह सचिव, अलपन बंदोपाध्याय ने मीडिया को बताया, “इन क्षेत्रों में कुछ असामाजिक और आपराधिक तत्व सक्रिय रहे हैं। कुछ बाहरी तत्व भी स्थानीय असामाजिक तत्वों में शामिल हो गए। सरकार इन घटनाओं को गंभीरता से असाधारण मानती है।”

गृह सचिव, अलपन बंदोपाध्याय ने बताया, “आईपीएस, एडीजी संजय सिंह को दक्षिण बंगाल को तत्काल प्रभाव से बैरकपुर पुलिस आयुक्तालय का विशेष प्रभार सौंपा गया है। बैरकपुर आयुक्तालय के एडीजी प्रभारी जल्द ही घटनास्थल पर पहुँच रहे हैं। सीआरपीसी की धारा 144 को भाटपारा और जगतदल पुलिस थाना क्षेत्रों में लागू किया गया है।

चुनाव के बाद की हिंसा को ध्यान में रखते हुए, बैरकपुर पुलिस आयुक्तालय ने क़ानून और व्यवस्था की स्थिति को नियंत्रण में लाने के लिए भाटापारा में एक नया पुलिस स्टेशन स्थापित करने का निर्णय लिया था। इस सुविधा का उद्घाटन होना अभी बाक़ी है।

इससे पहले 18 जून को पश्चिम बंगाल के कूच बिहार ज़िले में बीजेपी की युवा शाखा के कार्यकर्ता आनंद पाल (28 वर्षीय) की हत्या कर दी गई थी। इसके लिए बीजेपी ने तृणमूल को ज़िम्मेदार ठहराया था। इससे पहले बंगाल के बशीरहाट में बीजेपी कार्यकर्ता सरस्वती दास की हत्या की ख़बर भी सामने आई थी। वहीं, उत्तर परगना ज़िले के संदेशखली में TMC और बीजेपी कार्यकर्ताओं के बीच हुई हिंसक झड़पों में दो बीजेपी और एक TMC कार्यकर्ता की मौत हो गई थी।

फ़िलहाल, इलाक़े में तनाव की स्थिति को देखते हुए रैपिड एक्शन फोर्स को तैनात किया गया है। पश्चिम बंगाल में लोकसभा चुनाव के समय से ही हिंसात्मक गतिविधियाँ जारी हैं, और अब दिन-प्रतिदिन हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं।

‘द वायर’ ने बर्खास्त, बेआबरू पुलिस अफसर संजीव भट्ट की उम्रकैद में भी घुसा दी अपनी मोदी-घृणा

‘The Wire’ मामला कुछ भी हो पर अजेंडाबाजी से कभी पीछे नहीं हटता। ऐसे पोर्टल न कोर्ट की सुनते हैं, न मानते हैं और न कानून की इन्हें परवाह है। तभी तो 30 साल पुराने मामले में एक आरोपित पूर्व आईपीएस, आरोप सिद्ध होने के बाद उम्र कैद की सजा पाता है, तो ‘अजेंडा परमो धर्मः’ की राह पर चलने वाला Wire बड़ी चालाकी से अपने हैडलाइन में लिखता है, “IPS Officer Who Questioned Modi’s Role in Gujarat Riots Gets Life in 30-Year-Old Case” जैसे कोर्ट ने अपराधी संजीव भट्ट को उम्र कैद की सजा उसके 30 साल पुराने अपराध के कारण नहीं बल्कि ‘मोदी के गुजरात दंगों शामिल’ होने की बात कहने के लिए दिया गया है।

जबकि ‘लायर’ The Wire को अच्छी तरह पता है कि किस मामले में संजीव भट्ट को सजा हुई है और वो भी 30 साल पुराने मामले में, जहाँ न्याय की जल्द से जल्द दरकार थी। खैर, यहाँ प्रोपेगेंडा पोर्टल Wire का न्याय से कोई मतलब नहीं है, मतलब है तो बस अपने अजेंडे से और अजेंडा एकसूत्री है- येन-केन-प्रकारेण मोदी विरोध। सुप्रीम कोर्ट द्वारा मोदी के गुजरात दंगों के मामले में सभी आरोपों से बरी होने के बाद भी, ऐसे प्रोपेगेंडा पोर्टल के स्वघोषित जज बार-बार ऐसा दिखाने और लिखने का प्रयास करते हैं जैसे सुप्रीम कोर्ट का फैसला इन्हें आज भी मान्य नहीं है क्योंकि वह इनके नैरेटिव को सूट नहीं कर रहा। इससे इनके अजेंडाबाजी में बाधा उत्पन्न हो रही है।

जबकि इसी वायर ने अपने हिंदी साइट पर ऐसी हरकतों से बचा है। वहाँ पर जो खबर है वही रिपोर्ट हुई है। लेकिन The Wire अपने अजेंडे पर कायम है। खैर,यह पहली बार नहीं है जब The Wire ने इस तरह की रिपोर्टिंग की हो। पहले भी सत्ता विरोध के नाम पर कई बार ये फेक न्यूज़ या भड़काऊ आर्टिकल पोस्ट करते नज़र आए हैं।

चलिए जान लीजिए कि पूरा मामला क्या है, क्यों यहाँ जानबूझकर The Wire ट्विस्ट दे रहा है। गुजरात के बरख़ास्त आईपीएस अधिकारी संजीव भट्ट को कोर्ट ने उम्रकैद की सज़ा दी जो कि कस्टोडियल डेथ के मामले में सुनाई गई। यह 1990 का मामला है और यह घटना जोधपुर की है। हिरासत में हुई मौत का यह मामला 30 साल पुराना है। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने संजीव भट्ट से पूछा था कि उन्होंने हाई कोर्ट के 16 अप्रैल के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में पहले क्यों चुनौती नहीं दी? सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि इस मामले में निचली अदालत ने फ़ैसला सुरक्षित रख लिया है और फैसला सुनाने की तारीख़ तय कर दी है। आज वही निर्णय निचली अदालत ने सुनाया।

विवादित आईपीएस अधिकारी संजीव भट्ट का आरोप था कि इस घटना में 300 गवाह थे जबकि पुलिस ने सिर्फ़ 32 गवाहों को ही बुलाया। दरअसल, 1990 में भारत बंद के दौरान गुजरात के जामनगर में भी हिंसा हुई थी। उस समय संजीव भट्ट वहाँ पर एएसपी के रूप में पदस्थापित थे। उस दौरान पुलिस ने 133 लोगों को गिरफ़्तार किया था, जिसमें से 25 घायल हुए थे और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था। उस दौरान प्रभुदास नामक व्यक्ति की हिरासत में ही मौत हो गई थी।

बता दें कि संजीव भट्ट सोशल मीडिया पर विवादित ट्वीट्स करने के लिए भी कुख्यात हैं। उनके ट्वीट्स अक़्सर विवाद का विषय बनते थे। उनकी पत्नी ने उनके जेल जाने के बाद मोदी सरकार पर बदले की भावना से कार्रवाई करने का आरोप लगाया था। उनका कहना था कि मोदी के पीएम बनने के बाद से ही उन पर कार्रवाई शुरू हो गई।

वैसे, चाहे जितनी बार, The Wire जैसे पोर्टल बदनाम क्यों न हो जाए लेकिन अजेंडेबाज़ी से बाज आ जाएँ तो करेंगे क्या? यही प्रमुख कारण है कि ऐसे पोर्टल अपनी विश्वश्नीयता खोते जा रहे हैं।

घर के अंदर कब्र और वहीं खाना-पीना-सोना: UP के छह पोखर गाँव के मुस्लिम आबादी की स्थिति दयनीय

सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास – लोकसभा में दूसरी बार जीत कर पहुँचे पीएम मोदी के इस नारे को उत्तर प्रदेश प्रशासन को जरूर सुनना चाहिए। और न सिर्फ सुनना चाहिए बल्कि इस पर अमल भी करना चाहिए। ऐसा इसलिए क्योंकि छह पोखर गाँव की मुस्लिम आबादी को विश्वास में लेना बहुत जरूरी है। छह पोखर आगरा में है। और यहाँ के लोग अपने घरों में ही मृतक परिवार वालों को दफनाने के लिए मजबूर हैं।

छह पोखर गाँव के लोग कब्रों के साथ रहने को मजबूर हैं। किसी के घर में चूल्हे के पास कब्र है तो किसी के बरामदे में। गाँव में अधिकांश लोग गरीब और भूमिहीन हैं। नवभारत टाइम्स में प्रकाशित खबर में रिंकी बेगम बताती हैं कि उनके घर के पीछे पाँच लोगों को दफनाया गया है, इनमें उनका दस महीने का बेटा भी है। इसी गाँव की गुड्डी कहती हैं, “हम गरीब लोग इज्‍जत की मौत भी नहीं मर सकते। हमें कब्रों के ऊपर ही बैठना और चलना पड़ता है। घर में जगह की कमी है।”

यहाँ रहने वाले अधिकांश मुस्लिम परिवार गरीब और भूमिहीन हैं। बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं के अभाव में ऐसे घरों में एक से ज्यादा (खासकर बच्चे) मौतें होती हैं। गाँव में कब्रिस्तान के नहीं होने से लगभग हर घर में एक से ज्यादा लोगों की कब्रे हैं। जगह की कमी की समस्‍या के कारण घर में ताजा बनी कब्रों को सीमेंट से पक्‍का नहीं किया जाता क्‍योंकि इससे ज्‍यादा जगह घिरती है। एक कब्र को दूसरी कब्र से अलग दिखाने के लिए उनके ऊपर छोटे-बड़े पत्‍थर रख दिए जाते हैं।

फोटो साभार: वन इंडिया

छह पोखर गाँव में कब्रिस्तान है ही नहीं। गाँव वालों ने कुछ समय पहले जब प्रशासन से इस बाबत अनुरोध किया था तो ‘पूर्णतः सरकारी ढंग’ से कब्रिस्तान के लिए जगह आवंटित कर दी गई थी। ‘पूर्णतः सरकारी ढंग’ इसलिए लिखना पड़ा क्योंकि जो जमीन कब्रिस्तान के लिए आवंटित की गई थी, वो एक तालाब के बीचोबीच पड़ती है।

इस समस्या को लेकर कई बार धरने-प्रदर्शन भी हुए। लेकिन नतीजा आज तक सामने नहीं आया। 2017 में इसी गाँव के मंगल खान की मौत हो गई थी। उनके परिवार के लोगों ने मृत शरीर को दफनाने से तब तक इनकार कर दिया, जब तक गाँव को कब्रिस्‍तान के लिए जमीन आवंटित नहीं करा दी जाती। अधिकारियों ने तब आश्वासन भी दिया था, परिवार वालों को समझा-बुझा के मंगल खान को तालाब के किनारे दफनवा भी दिया था। लेकिन तब से लेकर अब तक वो सरकारी आश्‍वासन खोखला ही साबित हुआ है।

जब इस बात की जानकारी जिलाधिकारी रविकुमार को मिली तो उन्‍होंने कहा, “मैं अधिकारियों की एक टीम गाँव में भेजूंगा। कब्रिस्‍तान के लिए आवश्‍यक जमीन का ब्‍यौरा मँगवा कर देखूँगा और उचित निर्णय लूँगा।” उम्मीद है जिलाधिकारी का यह आश्वासन भी पिछले कई वादों की तरह खोखली न साबित हो।

सरफराज पर हो सकती है अंदरूनी ‘सर्जिकल स्ट्राइक’, वर्ल्ड कप के बीच में ही जा सकती है कप्तानी

भारत से हार के बाद पाकिस्तान के सेमीफाइनल में पहुँचने की राह काफी मुश्किल हो गई है। वर्ल्ड कप 2019 में पाकिस्तान की यह लगातार दूसरी हार थी और वह अब तक कुल तीन मैच हार चुका है। पाकिस्तान को अगर सेमीफाइनल में पहुँचना है तो बाकी के सभी चार मैच जीतने होंगे।

लेकिन मीडिया में आ रही ख़बरों से ऐसा लगता है कि पाकिस्तान टीम के इस ख़राब प्रदर्शन का नुकसान कप्तान सरफराज को हो सकता है। भारत से मिली करारी हार के बाद से ही पाकिस्तानी क्रिकेट टीम में अंदरूनी कलह और विवाद की ख़बरें आ रही हैं। इसका नतीजा यह हो सकता है कि कप्तान सरफराज को टूर्नामेंट के बीच में ही कप्तानी छोड़नी पड़े।

भारत से हार के बाद इस तरह की खबरें भी सुनाई देने लगीं हैं कि पाकिस्तानी टीम में ही कई गुट बन गए हैं और कप्तान सरफराज बिल्कुल अलग-थलग पड़ गए हैं। हालाँकि पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड ने इसे महज अफवाह बताया है और कहा है कि पूरी टीम सरफराज के साथ खड़ी है।

दबंग इंजमाम उल हक़ का हो सकता है बड़ा रोल

पाकिस्तान क्रिकेट टीम के मुख्य चयनकर्ता इंजमाम उल हक़ और कप्तान सरफराज अहमद के बीच भी सम्बन्ध नाजुक चल रहे हैं और यह विवाद की एक और वजह हो सकती है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, टीम के चयन में इंजमाम उल हक़ की बात का ज्यादा वजन रहता है और वो अपने रुतबे का पूरा इस्तेमाल करते हैं।

इंजमाम अपनी मौजूदगी का एहसास हमेशा कराते हैं लेकिन सवाल ये है कि मुख्य चयनकर्ता के तौर पर पाकिस्तान की टीम को उनका कितना फायदा मिल रहा है? पाकिस्तानी मीडिया का कहना है कि मुख्य चयनकर्ता के तौर पर इंजमाम का वर्ल्ड कप की टीम में काफी दखल रहा है। जब भारत से हार के बाद पाकिस्तान में कप्तान सरफराज अहमद, कोच मिकी आर्थर और कई खिलाड़ियों के लिए अपमानजनक बातें कही जा रही हैं ऐसे में अब इंजमाम की भूमिका पर भी सवाल उठने लगे हैं।

पाकिस्तान के चैनलों की टीवी रिपोर्ट में सवाल पूछे जा रहे हैं कि इंजमाम को जवाब देना चाहिए कि बुरी तरह से फ्लॉप रहे शोएब मलिक को वर्ल्ड कप के लिए क्यों चुना गया? वो इंग्लैंड में पाकिस्तान की टीम के साथ हैं और अहम फैसलों में उनका दखल है। जियो टीवी की रिपोर्ट के अनुसार सरफराज और मिकी ऑर्थर में वैसी दंबगई नहीं है कि इंजमाम को नियंत्रण में रख पाएँ इस वजह से इंजमाम खुलकर मनमानी करते हैं।

वर्ल्ड कप के लिए पाकिस्तान के प्लेइंग इलेवन में जिन लोगों को शामिल किया है उससे लोग नाखुश हैं। इस टीम में इंजमाम उल हक के भतीजे इमाम उल हक भी शामिल हैं जो भारत के खिलाफ बुरी तरह से फ्लॉप रहे।

PCB भी है कप्तान सरफराज से नाराज

वहीं, पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड ने भी कप्तान सरफराज अहमद को जमकर लताड़ लगाई है। PCB का कहना है कि सरफराज अहमद टीम को सही दिशा में नेतृत्व और खिलाड़ियों को प्रेरित करने में नाकाम रहे हैं। ऐसे में अगर पाकिस्तान की टीम दक्षिण अफ्रीका और न्यूजीलैंड के खिलाफ होने वाले आगामी मैचों में भी हारती है तो सरफराज अहमद को कप्तान के पद से हटाया जाना तय है।

सेमीफाइनल में जगह बनाने के लिए पाकिस्तान के लिए बाकी के चार मैच जीतना आसान नहीं है। पाकिस्तान का अगला मैच 23 जून को दक्षिण अफ्रीका से है। हालाँकि दक्षिण अफ्रीका इस बार कमजोर टीम दिख रही है। दक्षिण अफ्रीका इंग्लैंड, बांग्लादेश और भारत से हार चुका है।

इसके बाद पाकिस्तान बर्मिंघम में 26 जून को न्यूजीलैंड के साथ खेलेगा। पाकिस्तान के लिए यह सबसे मुश्किल मुकाबला है। न्यूजीलैंड ने अब तक सारे मैच जीते हैं बस भारत से मैच बारिश के कारण नहीं हो पाया था। पाकिस्तान को न्यूज़ीलैंड को हराने के लिए बेहतरीन खेलना होगा।

पाकिस्तान के बाकी दो मैच लीड्स में अफगानिस्तान से और लॉर्ड्स में बांग्लादेश से हैं। अफगानिस्तान को पाकिस्तान हरा सकता है, लेकिन पाकिस्तान वॉर्मअप मैच में अफगानिस्तान से हार चुका है। पाकिस्तान का आखिरी मैच बांग्लादेश से है जो कि बढ़िया खेल रही है और उसने 17 जून को वेस्टइंडीज को 322 रन चेज करके हराया है, इसलिए पाकिस्तान के लिए बांग्लादेश को हराना भी आसान नहीं होगा।

इंटरनेशनल राड़ा: ईरानी सेना ने मार गिराया अमेरिका का RQ-4 ग्लोबल हॉक ड्रोन, बढ़ सकता है तनाव

ईरान ने बृहस्पतिवार (जून 20, 2019) को अमेरिका का ड्रोन मार गिराया है। न्यूक्लियर डील पर जारी तनाव के बीच दोनों देशों के बीच मतभेद और बढ़ना तय है। हालाँकि, मामले पर अमेरिका की सेना ने अब तक कोई जवाब नहीं दिया है। इस घटना के बाद अमेरिका और ईरान के रिश्तों में तनाव बढ़ सकता है। ईरान की समाचार एजेंसी का कहना है कि रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) (ईरानी सेना) ने अमेरिकी ड्रोन को मार कर गिरा दिया है।

ईरान के रिवॉल्युशनरी गार्ड कॉर्प्स ने अमेरिका के आरक्यू-4 ग्लोबल हॉक ड्रोन को मारा गिराया। ईरान के पैरामिलिट्री रिवॉल्यूशनरी गार्ड, जो केवल सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खमेनी के प्रति जवाबदेह हैं, ने कहा कि अमेरिकी ड्रोन पर उस वक्त हमला किया गया जह वह दक्षिणी ईरान के होर्मोजोअन प्रांत के कौमोबारक जिले के पास ईरानी हवाई क्षेत्र में घुस रहा था। कौमोबारक तेहरान से लगभग 1,200 किलोमीटर (750 मील) दक्षिण-पूर्व में होमरुज स्ट्रेट के करीब है।

यह हमला ऐसे वक्त पर हुआ है जब कुछ दिनों पहले ही अमेरिका इरान पर उनके ड्रोन पर मिसाइल हमला करने का आरोप लगा चुका है। बीते हफ्ते जून 13, 2019 को ओमान की खाड़ी में दो तेल टैंकरों पर भी हमले किए गए थे लेकिन यह हमले किसने किए थे इसके बारे में साफ नहीं हो सका। हालाँकि अमेरिका ने हमले के लिए ईरान को जिम्मेदार ठहराया था। इससे पहले भी अमेरिका ने पिछले महीने इस रणनीतिक समुद्री इलाके में ऐसे ही हमलों को लेकर इस्लामिक गणराज्य से आपत्ति जताई थी।

ईरान-अमेरिका के सम्बन्ध अच्छे नहीं चल रहे हैं

अमेरिका और ईरान के बीच पिछले एक साल से तनावपूर्ण माहौल जारी है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान से एक साल पहले परमाणु समझौता वापस ले लिया था। ईरान ने हाल ही में कहा था कि वह कम समृद्ध यूरेनियम के उत्पादन को बढ़ाएगा और उसने हथियार-ग्रेड स्तर के करीब इसके संवर्धन को बढ़ावा देने की धमकी दी थी। जिससे कि यूरोप पर 2015 डील के लिए दबाव बनाया जा सके।

विगत कुछ समय में अमेरिका ने एक विमानवाहक पोत को मध्य पूर्व में भेजा है और इस क्षेत्र में पहले से ही 10 हजार सैनिक तैनात हैं इसके बावजूद हजारों अतिरिक्त सैनिकों की तैनाती की गई है। रहस्यमय हमलों ने तेल टैंकरों को भी निशाना बनाया क्योंकि ईरान-सहयोगी हौती विद्रोहियों ने सऊदी अरब में बम से लैस ड्रोन लॉन्च किए। इससे आशंका बढ़ गई है कि दोनों देशों के बीच संघर्ष हो सकता है। ऐसे में अगर तनाव बढ़ता है और युद्ध के हालात बनते हैं तो ऐसा ईरान की इस्लामिक क्रांति के 40 साल बाद होगा। ईरानी सेना का यहाँ तक कहना है कि वो युद्ध के लिए भी तैयार हैं।

AN-32 विमान हादसा: अरुणाचल प्रदेश में मिले 6 शव, 7 के पार्थिव अवशेष

असम में जोरहाट से उड़ान भरने के बाद अरुणाचल प्रदेश की पहाड़ियों में क्रैश हुए भारतीय वायु सेना के विमान AN-32 में सवार 13 वायु सैनिकों में से छ: के शव और सात के पार्थिव अवशेष बरामद हुए हैं। यदि मौसम ठीक रहा तो शव और पार्थिव अवशेष जोरहाट लाए जा सकेंगे। ख़बर के अनुसार, अधिकारी ने बताया कि ख़राब मौसम के चलते पिछले तीन दिनों में MI-17, चीता और ALH समेत कोई भी हेलीकॉप्टर घटनास्थल पर उतरने में क़ामयाब नहीं हो सका था। उन्होंने बताया कि एक टीम घटनास्थल पर पैदल चलकर पहुँची। इस टीम में गरुड़ कमांडो, भारतीय सेना के विशेष दल, पोर्टर और शिकारी शामिल थे। राहत एवं बचाव दल ने इस रूसी विमान का कॉकपिट वायस रिकॉर्डर (CVR) और उड़ान डेटा रिकॉर्डर (FDR) बरामद किए थे।

इस विमान के बारे में बता दें कि 3 जून को 12:25 मिनट पर AN-32 ने असम के जोरहाट से मेंचुका एडवांस लैंडिंग ग्राउंड के लिए उड़ान भरी थी, लेकिन 1 बजे के आसपास इसका सम्पर्क कंट्रोल रूम से टूट गया था। तभी से यह विमान लापता था, इसमें पायलट समेत 13 लोग सवार थे।

AN-32 विमान हादसे का शिकार हुए 13 यात्रियों में से 8 क्रू मेंबर थे

  • विंग कमांडर जीएम चार्ल्स
  • स्कवाड्रन लीडर एच विनोद
  • फ्लाइट लेफ्टिनेंट आर थापा
  • फ्लाइट लेफ्टिनेंट ए तंवर
  • फ्लाइट लेफ्टिनेंट एस मोहंती
  • फ्लाइट लेफ्टिनेंट एमके गर्ग
  • वारंट ऑफिसर के के मिश्रा
  • सार्जेंट अनूप कुमार
  • कॉरपोरल शेरिन
  • लीडिंग एयरक्राफ्ट मैन एसके सिंह
  • लीडिंग एयरक्राफ्ट मैन पंकज
  • नॉन कॉम्बैंटेट (ई) पुतली
  • नॉन कॉम्बैंटेट (सी) राजेश कुमार

ख़बर के अनुसार, भारतीय वायु सेना के AN-32 विमान का मलबा जिस जगह पर मिला था वो अरुणाचल प्रदेश में विमान के उड़ान मार्ग से क़रीब 15-20 किलोमीटर उत्तर की ओर है। वायु सेना के बयान के अनुसार, क़रीब 12,000 फ़ीट पर एक छोटे से गाँव लिपो के पास AN-32 विमान का मलबा मिला था।

लिपो गाँव के घने जंगलों में AN-32 विमान का मलबा मिला था, इसके बाद वायु सेना द्वारा इसकी तस्वीरें जारी कर दी गई थी। जारी की गई तस्वीरों में स्पष्ट नज़र आ रहा है कि जिस जगह AN-32 का मलबा था वहाँ आसपास के पेड़ जले हुए थे जिससे यह संभावना जताई जा रही थी कि विमान के दुर्घटनाग्रस्त होने के बाद वहाँ आसपास के पेड़ों में आग लग गई होगी।

BJP में जा सकते हैं TDP के 6 में से 4 राज्यसभा सांसद, नायडू को बड़ा झटका: रिपोर्ट

तेलुगू देशम पार्टी (टीडीपी) के 6 में से 4 राज्यसभा सांसद जल्द ही अपना इस्तीफा सौंप कर भाजपा में शामिल होने वाले हैं। न्यूज़ 18 ने सूत्रों के हवाले से ख़बर देकर बताया है कि पूर्व केंद्रीय मंत्री वाईएस चौधरी, टीडीपी के प्रवक्ता सीएम रमेश और टीजी वेंकटेश राज्यसभा के सभापति वेंकैया नायडू को अपना इस्तीफा सौंपने वाले हैं। लोकसभा और विधानसभा चुनाव में भारी हार का सामना करने वाले नायडू के लिए यह बहुत बड़ा झटका होगा क्योंकि राष्ट्रीय राजनीति में अपने लिए बड़ी ज़मीन बनाने की उनकी सारी कोशिशें ध्वस्त हो चुकी हैं। कुछ दिनों पहले सीबीआई ने वाईएस चौधरी के ठिकानों की तलाशी ली थी।

राजग छोड़ कर विपक्षी एकता बनाने निकले नायडू को विधानसभा चुनाव में बड़ा झटका लगा और उनकी सीएम की कुर्सी खिसक गई। 176 सदस्यीय विधानसभा में उनकी पार्टी को महज 23 सीटें मिली। लोकसभा में और भी दुर्गति हुई। टीडीपी के बस 3 उम्मीदवार ही जीत दर्ज कर सके। जगन मोहन रेड्डी की पार्टी वाईएसआर कॉन्ग्रेस ने नायडू की पार्टी को हर स्तर पर चित कर दिया।

बता दें कि लोकसभा चुनाव के दौरान व उससे पहले नायडू लगातार भारत भ्रमण कर विपक्षी नेताओं से मिल कर एकजुटता के प्रयास में लगे हुए थे। उन्होंने लगभग सभी बड़े विपक्षी नेताओं से मुलाक़ात की थी और खंडित जनादेश की स्थिति में तैयारी हेतु योजना बनाई थी। लेकिन, भाजपा को पूर्ण बहुमत मिलते ही उनकी सारी योजनाएँ धराशाई हो गई और दिल्ली तो दूर की बात है, आंध्र में भी उनकी राजनीति पर ग्रहण लग गया। अब राज्यसभा में अगर उनके सांसद इस्तीफा देते हैं तो उनकी पार्टी के पास महज 2 राज्यसभा सांसद बच जाएँगे।

मैन इन भगवा: इंग्लैंड के खिलाफ केसरिया जर्सी पहनकर उतर सकती है टीम इंडिया- मीडिया रिपोर्ट्स

इस क्रिकेट वर्ल्‍ड कप में अब तक टीम इंडिया गहरे नीले रंग की जर्सी में नजर आई है। लेकिन खबर है कि नए नियमों के कारण भारतीय टीम के लिए ऑरेंज (केसरिया) रंग की दूसरी किट भी होगी। वर्ल्ड कप के कुछ मैचों में भारतीय टीम नीले रंग के बजाय ऑरेंज यानी भगवा रंग की जर्सी पहनकर उतर सकती है। भारतीय टीम का अब अगला मुकाबला 22 जून को अफगानिस्तान से होना है और इसके बाद 30 जून को उसकी भिड़ंत मेजबान इंग्लैंड से होगी। रिपोर्ट्स के अनुसार, आईसीसी ने दूसरी जर्सी के रूप में टीम इंडिया को कोई और रंग चुनने को कहा था। भारतीय टीम मैनेजमेंट ने ऑरेंज (केसरिया) रंग चुना है।

क्या है भगवाकरण का उद्देश्य?

दरअसल, अफगानिस्तान और इंग्लैंड दोनों टीमों के खिलाड़ियों की जर्सी का रंग नीला है। जबकि रिपोर्ट्स के अनुसार आईसीसी के नियमों के मुताबिक, किसी भी ऐसे मैच में, जिसका प्रसारण टीवी पर होता है, दोनों टीमें एक ही रंग की जर्सी पहनकर नहीं उतर सकती हैं।

ICC लाई है जर्सी में भी फुटबॉल कि तरह  ‘होम’ और ‘अवे’ नियम

यह नियम फुटबॉल के ‘होम और अवे’ मुकाबलों में पहनी जाने वाली जर्सी से प्रेरित होकर बनाया गया है। आईसीसी ने इस बार जर्सी को लेकर एक नया फैसला लिया है जिसमें फुटबॉल कि तरह ‘होम’ और ‘अवे’ यानी, ‘घरेलू सरजमीं से बाहर’ प्रणाली के तहत प्रत्येक टीम (मेजबान टीम को छोड़कर) दूसरी जर्सी में भी नजर आएगी।
वर्ल्‍ड कप 2019 में इंग्‍लैंड, भारत, अफगानिस्‍तान और श्रीलंका की टीमों की जर्सी नीले रंग की है। ऐसे में नए दर्शकों को टीम पहचानने में परेशानी न हो, इसलिए होम और अवे मैच की तर्ज पर टीमों की जर्सी अलग-अलग रंग की होगी।

भगवा रंग की जर्सी पर होगी नीली पट्टी

टीम इंडिया की जर्सी की रंग नीला है और उसमें कॉलर पर भगवा रंग की पट्टी है। ऐसे में माना जा रहा है कि यह इंग्लैंड के खिलाफ मैच में उल्टा हो सकता है। टीम इंडिया की जर्सी भगवा रंग की हो सकती है जिसमें नीले रंग की पट्टी कॉलर पर होगी। साथ ही, यह भी संभावना है कि इंग्लैंड के खिलाफ सभी वनडे मैचों में भारत की जर्सी का रंग बदला हुआ होगा।

हालाँकि टीम प्रबंधन से जुड़े सारे लोगों को इस पर अब भी जानकारी नहीं है कि टीम को नए रंग की जर्सी पहनने की जरूरत है या नहीं। भारतीय टीम की किट स्पॉन्सर कंपनी नाइक के प्रवक्ता ने इस बारे में कुछ भी कहने से इनकार कर दिया। ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और वेस्ट इंडीज को अपनी जर्सी का रंग बदलने की जरूरत नहीं होगी क्योंकि उनका रंग किसी भी टीम की जर्सी से मेल नहीं खाता है।

लिबेरपंथी और मीडिया गिरोह हो सकता है धुआँ-धुआँ

अगर टीम इंडिया मैदान में भगवा रंग की जर्सी पहनकर उतरती है, तो भगवा शब्द सुनते ही किलकारियाँ मारने वाला देश का एक बड़ा वर्ग खुद को कोड़े मारते हुए देखा जा सकता है। संसद से लेकर क्रिकेट वर्ल्डकप तक भगवाकरण होता देखना कुछ लोगों को जरूर दुःख दे सकता है। उनके लिए सलाह है कि वो आने वाले दिनों में सूती कपड़े पहनें, लम्बी साँसे लें, हाइड्रेटेड रहें, यात्रा करें और राहुल गाँधी के जन्मदिन पर चर्चा करें। वरना इमरजेंसी का माहौल हो सकता है और सेक्युलरिज़्म भी खतरे में पड़ सकता है।