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सबरीमाला के पास की 5 एकड़ जमीन चर्च के कब्जे में, हिंदुओं की आस्था पर केरल सरकार की चोट

केरल की कम्युनिस्ट सरकार की कथित मदद से ईसाई चर्च पर अब सबरीमाला मंदिर से जुड़े ‘पवित्र वनों’ का अतिक्रमण करने का आरोप लगा है। न्यूज़ पोर्टल ऑर्गनाइज़र के अनुसार, केरल में इस स्थान को ‘पूनकवनम’ कहा जाता है।

ऑर्गनाइज़र के अनुसार, मलयालम अख़बार जन्मभूमि की एक ख़बर बताती है कि इडुक्की ज़िले के सबरीमाला जंगलों के एक हिस्से पांचालिमेडु के पास वनभूमि का बड़े पैमाने पर अतिक्रमण हुआ है। पर्यावरण संरक्षण अधिनियम के तहत इस पूरे क्षेत्र को ऐसा माना गया था जिसे पारिस्थितिक रूप से संरक्षण की आवश्यकता है।

पांचालिमेडु (Panchalimedu), स्थानीय हिंदुओं के लिए एक पवित्र स्थान है, जिसका नाम पांचाली/ द्रौपदी के नाम पर रखा गया है। ऐसा माना जाता है कि 12 साल के वनवास के दौरान वो पांडवों का निवास स्थान था। त्रावणकोर देवास्वोम बोर्ड के तहत एक प्राचीन भुवनेश्वरी मंदिर भी अतिक्रमित भूमि के पास स्थित है। ऐसा माना जाता है कि चर्च कथित तौर पर राज्य के समर्थन से कब्ज़ा करके सरकार और वनभूमि को ज़ब्त करने की अपनी सामान्य रणनीति को दोहरा रहा है।

चिंताजनक मुद्दा यह है कि चर्च ने पहले से ही एक बोर्ड स्थापित कर रखा है और वन क्षेत्र में एक आर्कियन भी है जो यह दावा करता है कि यह स्थान ईसाई तीर्थस्थल है। रिपोर्टों से पता चलता है कि इसका केंद्र बिंदु सबरीमाला मंदिर है, जो पिछले सात वर्षों से धर्मांतरण लॉबी के रडार पर है।

चार दशक पहले, ईसाई संगठनों ने नीलक्कल में सबरीमाला भूमि को हड़पने का प्रयास किया था, जिसमें दावा किया गया था कि उन्होंने 57 A.D में यीशु के प्रचारक संत थॉमस द्वारा स्थापित एक पत्थर का पता लगाया था। पुजारी (ईसाई) ने साइट पर एक ईसाई चर्च बनाने का प्रस्ताव पेश करते हुए अपने दावे पर ज़ोर दिया। इस पर हिंदुओं के कड़े विरोध के बावजूद, सरकार ने कैथोलिक चर्च को लगभग 5 एकड़ जमीन मुफ़्त में सौंप दी।

केरल की कम्युनिस्ट सरकार ने इस मुद्दे पर अनिश्चित रूप से अब तक चुप्पी साधे रखी है, जबकि सबरीमाला के विरोध के दौरान यह बात स्पष्ट हो गई थी कि यह मुद्दा हिंदुओं से जुड़ा हुआ है। कथित तौर पर, मुन्नार में Pappathichola से इसी तरह के अतिक्रमण की सूचना मिली है, लेकिन राजस्व अधिकारियों ने इसे हटा दिया। इतना होने के बावजूद, राज्य सरकार ने एक बार फिर से अपने क़दम आगे बढ़ाए और मुख्यमंत्री विजयन व अन्य सीपीएम नेताओं के हस्तक्षेप के बाद वहाँ क्रॉस को फिर से स्थापित कर दिया गया।

जेल में बंद नक्सलियों को निर्दोष बताने वाले फादर स्टेन स्वामी के घर छापेमारी

भीमा कोरेगाँव हिंसा मामले में पुलिस ने नई कार्रवाई की है। झारखण्ड की राजधानी राँची स्थित नामकुम बगीचा में कथित सामाजिक कार्यकर्ता फादर स्टेन स्वामी के ठिकाने पर छापेमारी की। यह कार्रवाई महाराष्ट्र पुलिस और एटीएस ने की। छापेमारी टीम ने फादर के ठिकाने से कंप्यूटर हार्ड डिस्क सहित कई अन्य कागजात भी ज़ब्त किए। इस मामले में उनके यहाँ दूसरी बार छापा पड़ा है। उससे पूछताछ भी की गई है। इससे पहले 28 अगस्त, 2018 को भी फादर स्टेन स्वामी के घर में छापेमारी हुई थी। ताज़ा कार्रवाई के लिए मंगलवार (जून 11, 2019) की शाम ही महाराष्ट्र पुलिस की टीम राँची पहुँच गई थी। बुधवार के दिन सुबह होते ही छापेमारी शुरू कर दी गई।

छापेमारी के दौरान स्थानीय पुलिस भी मौके पर मौजूद थी। मीडिया को फादर के घर के बाहर ही रोक दिया गया था। इससे पहले पिछले वर्ष जब फादर के यहाँ छापेमारी की गई थी, तब उसके घर से एक लैपटॉप, दो टैब और कुछ सीडीज बरामद की गई थीं। इन सबके अलावा कुछ अहम दस्तावेज भी पुलिस के हाथ लगे थे। फादर ने छापेमारी टीम के सामने काफ़ी नखरे दिखाए थे। जब पुलिस ने उन्हें सर्च वारंट थमाया था, तब उन्होंने उस पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया था। फादर का कहना था कि यह सर्च वारंट मराठी में है और उसे मराठी नहीं आती। इसके बाद पुलिस को सर्च वारंट का अनुवाद करना पड़ा था, तब उसने हस्ताक्षर किए थे।

फादर स्टेन स्वामी ख़ुद को एक सामाजिक कार्यकर्ता बताता है और आदिवासी क्षेत्रों में वह अक्सर सक्रिय रहता है। पिछले कई दशकों से वह आदिवासियों के बीच सक्रिय रहा है। वह मानवाधिकार की बातें भी करता है और इसे लेकर सरकारों को घेरता रहा है। वह नक्सलियों का प्रखर समर्थक है। वह ख़ुद दावा करता रहा है कि लगभग 3000 निर्दोष लोगों को जेल में नक्सली बता कर बंद रखा गया है और उसके लिए उसनें अदालत में पीआईएल दाखिल कर रखी है। भीमा कोरेगाँव मामले में पुलिस ने कई नक्सलियों व उनके समर्थकों को गिरफ़्तार किया था। इनमें कई ऐसे थे, जो ख़ुद को सामाजिक कार्यकर्ता बताते हैं।

बताते चलें कि वर्ष 2018 में पेशवा बनाम अंग्रेज युद्ध के 200वें साल का जश्न मनाने के लिए भारी संख्या में दलित समुदाय के लोग जमा हुए थे। जश्न के दौरान दलित और मराठा समुदाय के बीच हिंसक झड़प हो गयी थी, जिसके बाद हिंसा भड़क गई थी। स्टेन स्वामी व अन्य कथित सामाजिक कार्यकर्ताओं ने उस दौरान भड़काऊ भाषण दिया था, इसी मामले में फादर स्टेन के खिलाफ देशद्रोह का मामला भी दर्ज किया गया था। स्टेन स्वामी पर महाराष्ट्र के नक्सली संगठन अलगार परिषद को समर्थन देने के भी आरोप लगे हैं।

आज़म चड्डी खान की ज़रूरत है इस देश को, ऐसे लोगों को ज़िंदा रखा जाना चाहिए

आज़म खान और असदुद्दीन ओवैसी, दोनों ही, कथित तौर पर पढ़े लिखे लोग माने जाते हैं। माने ही जाते हैं, क्योंकि इनके बयानों से लगता तो नहीं कि वास्तव में पढ़े-लिखे हैं। एक विरोधी नेत्री के अंडरवेयर का रंग बताने से लेकर ग़ैरक़ानूनी उर्दू गेट को ढाहने पर मजहब को बीच में ले आता है, दूसरे की तो पूरी राजनीति ही यह झूठ बताने में जाती है कि सरकारी नीतियों का लाभ ख़ास समुदाय को नहीं मिल रहा है।

हाल ही में दोनों ने बड़े अजीब बयान दिए हैं। पहले आज़म खान की बात करते हैं जिनका दिमाग ज़्यादा ढीला मालूम पड़ता है। अपनी और अपने पार्टी के अस्तित्व को बचाने के लिए, मुस्लिम ध्रुवीकरण की राजनीति का वर्षों से सहारा लेकर बचने वाले आज़म खान, जो हर इस्लामी आतंकी द्वारा किए गए हमले पर चुप रहते हैं, आज मदरसों के उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा का उदाहरण देते हुए कहा है कि मदरसों से गोडसे और प्रज्ञा जैसे लोग नहीं निकलते।

ये बिलकुल सही बात है क्योंकि मदरसों में अमूमन हिन्दू धर्म को मानने वाले नहीं जाते, तो वहाँ से गोडसे या प्रज्ञा जैसे प्रकृति तो छोड़िए, नाम वाले भी निकल आएँ तो आश्चर्य की ही बात होगी। फिर मदरसों में जाते कौन हैं? क्या मदरसों में ‘अल्लाहु अकबर’ का नारा बुलंद करते हुए बाज़ारों में फटने वाले लोग जाते हैं? क्या मदरसों में सड़कों पर 500 रुपए के लिए शुक्रवार की नमाज़ के बाद पत्थरबाज़ी करने वाले सात-आठ साल के बच्चे जाते हैं? क्या सेना की गाड़ियों पर पत्थर, डंडे, रॉड से लेकर बम और रॉकेट लॉन्चर से हमला करने वाले मदरसों में जाते हैं?

मैं बता नहीं रहा, मैं पूछ रहा हूँ कि आज़म खान जैसे नेता जब पूरे इतिहास से दो नाम निकाल पाते हैं, और उन्हें किसी मजहबी स्कूली व्यवस्था से जोड़ने की कोशिश करते हैं, तो आप ऐसे चुटकुलों पर हँस भी नहीं सकते क्योंकि ये चुटकुला कोई कुणाल कामरा टाइप का सस्ता कॉमेडियन नहीं मार रहा, ये चुटकुला एक क़द्दावर नेता मार रहा है जो 30 साल से ज़्यादा समय उत्तर प्रदेश की विधायिका का सदस्य या कैबिनेट मंत्री बन कर गुज़ार चुका है।

अगर आज़म खान की बात करें और मदरसों को ले आएँ तो आज़म खान पहले यही बता दें कि ऐसी कौन सी शिक्षा मदरसों में दी जाती है, या नहीं दी जाती है कि ख़ास समुदाय की मात्र एक प्रतिशत लड़कियाँ बारहवीं के बाद ग्रेजुएशन कर पाती हैं? क्या इसे ख़ास समुदाय पर फेंका जाए या फिर मदरसों को तंत्र पर जहाँ के बाद आज के दौर में भी लड़कियों को ग्रेजुएशन तक नहीं करने दिया जाता?

ये सारे आतंकी क्या आरएसएस के स्कूलों में पढ़ते थे जिनके गुनाह साबित हो गए और जिन्हें फाँसी मिल गई? ये मजहबी उन्माद क्या हार्वर्ड में पढ़ाया जाता है कि काले झंडे पर इस्लाम का नाम लिखने वाले लोग भारत की गलियों में उगते और डूबते रहते हैं? ये मजहबी शिक्षा क्या रामकृष्ण मिशन या सरस्वती शिशु मंदिर में मिलती है जहाँ एक समुदाय के अल्लाह और पैग़म्बर के नाम पर बेगुनाहों की जान लेने में आतंकी हिचकिचाते नहीं?

फिर गोडसे का नाम क्यों? गोडसे ने जो किया, उसे उसकी सजा मिली। साध्वी प्रज्ञा पर केस चल रहा है, और अगर वो गुनहगार है तो उसे इसी देश की कोर्ट सजा देगी जिसने सुबह के चार बजे तक अपने दरवाज़े आतंकी की फाँसी रोकने के लिए खोले हैं। और कोई नाम है तो आज़म खान ले आएँ, उसका भी समुचित जवाब दिया जाएगा।

लेकिन आज़म खान अपनी भी घटिया शिक्षा का उद्गम स्थल बता देते ताकि हमें पता तो चलता कि कारगिल को फ़तह करने वाले सैनिकों में मजहब लाने के पीछे की पढ़ाई किस जगह पर होती है। वो बता देते कि किस मदरसे में उन्होंने ऐसी बेहतरीन शिक्षा पाई जहाँ बच्चों की आँखें और विचार इतने बौने हो जाते हैं कि वो स्त्रियों के अंडरवेयर का कलर तक मालूम कर लेते हैं। वो बता देते कि किस मजहबी शिक्षा की जड़ें इतनी खोखली हैं जो मजहबी बयानबाजी में इतना आगे निकल जाता है कि संभल की रैली में समुदाय विशेष को मुज़फ़्फ़रनगर दंगों का बदला लेने को उकसाता है?

आज़म खान की पहचान ही इस बात से है कि वो निहायत ही घटिया बातें बोलते हैं। वो अगर बेहूदगी न करें तो देश को पता भी न चले कि खुद को समुदाय विशेष का ज़हीन नेता मानने वाला, और प्रोजेक्ट करने वाला, ये आदमी किस दर्जे का धूर्त है। ये वही आदमी है जो प्रधानमंत्री मोदी और उनकी पत्नी के अलग-अलग रहने को लेकर घृणित बयान देता है कि जो अपनी पत्नी के साथ न रह सका वो देश के साथ कैसे रहेगा।

अब ये तो पता चले कि ये मदरसा छाप हैं या फिर संघ के विद्यालयों में इनकी ऐसी घटिया सोच विकसित हुई है। आज़म खान जैसे नेता ही मजहब विशेष के प्रति फैली दुर्भावना के लिए ज़िम्मेदार हैं। ये व्यक्ति पेरिस में हुई इस्लामी आतंकी घटना को ज़ायज ठहराता है क्योंकि कहीं और किसी दूसरे देश ने पहले समुदाय विशेष को ऐसा करने को उकसाया।

ऐसे आदमी सिर्फ इसलिए खुले में घूम रहे हैं क्योंकि ये नेता हैं और हमारी सरकारी व्यवस्था में ऐसे लोग इस तरह से बोल सकते हैं। ये वैचारिक दंगाई है जो मज़हब के नाम पर लोगों को उकसाता है, और चाहता है कि दंगे हों ताकि इनकी दुकानें चलें। अगर ऐसा नहीं है तो सरकार द्वारा मदरसों को मुख्यधारा की शिक्षा से जोड़ने को लिए बनाई जा रही नीति का स्वागत करने की जगह ये महामूर्ख इसमें गोडसे और प्रज्ञा कहाँ से ले आता है?

आज़म खान जैसे लोग कभी नहीं चाहते कि उनका समुदाय बेहतर शिक्षा पाए क्योंकि मदरसों में अगर दुनिया के समानांतर शिक्षा मिलने लगेंगी तो कोई क्यों पत्थर लेकर सड़क पर खड़ा हो जाएगा? कोई शरीर में बम बाँध कर मज़हब के नाम पर खुद को क्यों उड़ा देगा? शिक्षा बेहतर सोच विकसित करती है। शिक्षा का उद्देश्य मानवता की भलाई होता है, लेकिन उसी शिक्षा के नाम पर अगर मजहबी उन्माद की धीमा ज़हर छोटे बच्चों में डाला जाए तो वो कट्टरपंथी बनेगा और उसे एक मशीन की तरह, अपने कुत्सित विचारों को अमल में लाने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।

अगर ऐसा नहीं होता तो पत्थरबाज़ी का कलंक किसी एक मज़हब के लोगों के सर पर नहीं होता। अगर ऐसी शिक्षा नहीं दी जाती तो सात साल के बच्चों के चेहरे पैलट गन के छर्रों से नहीं बंधे होते। अगर मजहबी उन्माद न बोया जा रहा होता तो आरडीएक्स से भरी गाड़ी सीआरपीएफ़ के क़ाफ़िले से अब्दुल अहमद डार नहीं मिलता। अगर इस्लाम की हुकूमत लाने की पढ़ाई इन मदरसों में नहीं दी जा रही होती तो हर साल लगभग दो सौ की दर से ‘अल्लाहु अकबर’ के नारे और ख़िलाफ़त की राह में इस्लामी आतंकी नहीं मर रहे होते।

गोडसे और प्रज्ञा तो दो नाम हैं। मेरे पास तो इसी शिक्षा पद्धति से जुड़े लोगों के इतने नाम हैं कि उन्हें व्यक्तिवाचक संज्ञा की जगह जातिवाचक रूप में बताना पड़ रहा है। लेकिन आज़म खान जैसों का रहना बहुत ज़रूरी है इस देश में। ये लोग अगर नहीं रहेंगे तो समाज के वो नकारात्मक आदर्श गायब हो जाएँगे जिन्हें देख कर माँ-बाप अपने बच्चों को कह सकेंगे कि देखो बच्चे, ऐसा इन्सान मत बनना।

ओवैसी की बेहूदगी पर चर्चा दूसरे आर्टिकल में होगी

बूढ़े माँ-बाप के लिए नीतीश सरकार द्वारा कोई नया क़ानून नहीं, 2007 के अधिनियम में किया सिर्फ संशोधन

मीडिया में यह चलाया जा रहा है कि बिहार सरकार ने वरिष्ठ नागरिकों को लेकर नया कानून बनाया है, जिसमें पुत्र-पुत्री द्वारा उनका भरण-पोषण या देखरेख ठीक से न करने की स्थिति में उन पर कार्रवाई की जा सकेगी। आपको बता दें कि तकनीकी रूप से यह कोई नया कानून नहीं है। केंद्र सरकार द्वारा 2007 में लागू किए गए अधिनियम को ही नीतीश सरकार ने कुछ बदलावों के साथ लागू किया है। जैसे, पूर्व में बेटे या बेटियों द्वारा प्रताड़ित किए जाने वाले माता-पिता को न्याय के लिए जिलों के परिवार न्यायालय में अपील करने जाना होता था। वहाँ पर सुनवाई प्रधान न्यायाधीश के स्तर पर होती थी। नए नियमों के मुताबिक, अब माता-पिता जिलाधिकारी की अध्यक्षता में गठित अपील अधिकरण में अपील करेंगे। इसका अर्थ यह हुआ कि अब से डीएम ही मामले की सुनवाई करेंगे।

वर्ष 2007 में “माता–पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण पोषण तथा कल्याण अधिनियम 2007” को संसद में पारित किया गया था और उसी वर्ष दिसम्बर में राष्ट्रपति की मंज़ूरी के बाद इसे “भारत का राजपत्र (गैजेट ऑफ इंडिया)” में शामिल किया गया था। बिहार सरकार के अंतर्गत आने वाले राज्य समाज कल्याण विभाग ने इसमें कुछ संशोधन सुझाए थे, जिस पर अमल करने के बाद नीतीश कुमार ने इसे लागू करने की घोषणा की है। इससे पहले सितम्बर 2012 में बिहार सरकार ने अधिसूचना जारी करते हुए इस अधिनियम को लेकर बनाई गई नियमावली को राज्यपाल की मंज़ूरी के बाद लागू किया था।

इस अधिनियम के अंतर्गत अगर पुत्र या पुत्री अपने माता-पिता की देखरेख नहीं करते हैं तो शिकायत के बाद उन पर कार्रवाई की जा सकती है। अगर वो अपना पक्ष रखने के लिए उपस्थित नहीं होते हैं तो सम्बंधित अधिकारी एकपक्षीय कार्रवाई के लिए स्वतंत्र होंगे। इस अवसर पर नीतीश कुमार ने कहा, “आज के बदले सामाजिक परिवेश में अपने बच्चों को परवरिश देने वाले माता-पिता को सामाजिक के साथ-साथ क़ानूनी संरक्षण देना सरकार का भी कर्तव्य है। पूरे देश में बिहार संभवत: ऐसा पहला राज्य होगा जहाँ यह क़ानून लागू किया जा रहा है।

इसीलिए, जैसा कि मीडिया द्वारा कहा जा रहा है कि सज़ा का प्रावधान नया क़ानून बना कर किया गया है, ऐसा कुछ भी नहीं है। इस अधिनियम में कार्रवाई का प्रावधान पहले से ही था और यह अधिनियम 2007 से ही मौजूद है। नीतीश सरकार ने बस इसमें संशोधन किया है, जो समाज कल्याण विभाग द्वारा सुझाया गया था। अतः, इस अधिनियम की नियमावली में बिहार सरकार की तरफ़ से बदलाव किया गया है, इसे बिहार सरकार द्वारा नए सिरे से नहीं तैयार किया गया है। सामाजिक सुधार की दिशा में कार्य कर रहे नीतीश कुमार के लिए शराबबंदी, बाल विवाह रोकथाम, दहेज़ प्रथा पर प्रहार के बाद यह अगला क़दम है।

‘मदरसों में गोडसे और प्रज्ञा ठाकुर जैसी शख्सियत नहीं पैदा होती’

समाजवादी पार्टी के नेता आजम खान ने मंगलवार (जून 11, 2019) को मदरसों की शिक्षा प्रणाली में कंप्यूटर और गणित को शामिल करके उसे मुख्यधारा में लाने के फैसले पर विवादस्पद बयान दिया।

आजम खान ने महात्मा गाँधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे और भाजपा की नवनिर्वाचित सांसद प्रज्ञा सिंह का जिक्र करते हुए कहा, “मदरसों की प्रकृति गोडसे या प्रज्ञा सिंह ठाकुर जैसी शख्सियतें पैदा करने वाली नहीं हैं, अगर सरकार मदरसों की मदद करना चाहती है तो उनके लिए बिल्डिंग बनवाए और सुविधाएँ बढ़ाई जाएँ।”

गौरतलब है कि आजम खान का ये बयान सरकार के उस फैसले के बाद आया है जिसमें सरकार ने तय किया है कि देश भर के मदरसों में मुख्यधारा की शिक्षा को प्रोत्साहित करने के लिए मदरसों के शिक्षकों को विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों से प्रशिक्षण दिलवाया जाएगा, ताकि वे मदरसों में मुख्यधारा की शिक्षा हिंदी, अंग्रेजी, गणित, विज्ञान, कंप्यूटर आदि दे सकें।

मीडिया में आईं खबरों के मुताबिक आजम खान ने इस फैसले पर केंद्र को निशाने बनाते हुए कहा, “मदरसों में धार्मिक शिक्षा दी जाती है… साथ ही वहाँ अंग्रेज़ी, हिन्दी तथा गणित भी पढ़ाया जाता है। यह हमेशा से होता रहा है, अगर आप मदद करना चाहते हैं, उनका स्तर सुधारिए। मदरसों के लिए इमारतें बनवाइए, उन्हें फर्नीचर और मिड-डे मील उपलब्ध करवाइए।”

आजम खान के मुताबिक मदरसों को हमेशा मिड-डे मील से महरूम रखा गया है। उनका कहना है कि सरकार आधुनिक मदरसे की बात करती है। वजीफा देने की बात तो करती है, लेकिन साथ ही सरकार इंस्टीट्यूशन को खत्म कर रही है। अपनी बातचीत में उन्होंने जौहर यूनिवर्सिटी का जिक्र किया, उन्होंने कहा कि ले-देकर एक अल्पसंख्यक संस्थान बचा है और बीजेपी सरकार उसके पीछे पड़ी हुई है कि किस तरह उसे बर्बाद किया जाए।

आजम खान का कहना है कि मदरसों में गोडसे और प्रज्ञा ठाकुर जैसी शख्सियत पैदा नहीं की जाती। पहले सरकार को इन्हें रोकना चाहिए। सरकार को इस बात का ऐलान करना चाहिए कि गोडसे की विचारों को आगे बढ़ाने वाला लोकतंत्र का दुश्मन माना जाएगा।

‘मैं टूट गया हूँ’: अहमद और खान के परिवार को ₹1-1 करोड़, अंकित के पिता को दिया वादा तोड़ा केजरीवाल ने!

दिल्ली के एक फ़ोटोग्राफर थे – अंकित सक्सेना। पिछले साल फरवरी में उनकी मुस्लिम गर्लफ्रेंड के परिवार द्वारा निर्मम हत्या कर दी गई थी। दरअसल, अंकित जिस लड़की से विवाह करना चाहते थे वो मुस्लिम सम्प्रदाय से थीं और उनकी प्रेमिका के घरवाले इस विवाह के ख़िलाफ़ थे। इसके चलते अंकित की बड़ी बेरहमी से हत्या कर दी गई थी। तब यह मामला बहुत जोर-शोर से उछला था, राजनीतिक रोटियाँ भी सेंकी गई थी। इस मामले में ताज़ा समाचार यह है कि अंकित के पिता यशपाल सक्सेना ने दिल्ली सरकार के ख़िलाफ़ अपनी निराशा व्यक्त की है, क्योंकि वो अपने वादे पर खरी नहीं उतरी।

समाचार एजेंसी ANI से बात करते हुए, अंकित के पिता ने कहा कि उन्हें दिल्ली सरकार से कोई भी मुआवज़ा नहीं मिला। अंकित की हत्या हो जाने के बाद उन्हें बताया गया था कि उन्हें क़ानूनी और वित्तीय सहायता मिलेगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। सबसे पहले दिल्ली सरकार द्वारा उन्हें 5 लाख रुपए मुआवज़ा देने का वादा किया गया था। बाद में, दिल्ली के सीएम ने मुआवज़ा बढ़ाने का वादा किया था, लेकिन अरविंद केजरीवाल कहीं नज़र नहीं आ रहे हैं। इस पर अंकित के पिता ने कहा, “मैं टूट गया हूँ।”

यशपाल सक्सेना ने कहा कि दिल्ली सरकार को कई रिमाइंडर भेजने के बावजूद केजरीवाल सरकार ने अब तक अपना वादा पूरा नहीं किया। उन्होंने सवालिया होते हुए पूछा, “मुझे मुआवज़ा नहीं दिया जा रहा है, क्योंकि मैंने घटना को सांप्रदायिक नहीं होने दिया? मैं दो समुदायों के बीच प्रेम और सद्भाव क़ायम करना चाहता था। क्या मुझे इसके लिए दंडित किया जा रहा है?”

दिल्ली के एक फ़ोटोग्राफर अंकित सक्सेना की उनकी मुस्लिम प्रेमिका के परिवार द्वारा बेरहमी से हत्या कर दी गई थी क्योंकि मुस्लिम परिवार ने उनके अंतर-धार्मिक प्रेम संबंध को अस्वीकार कर दिया था। इसके बाद, लड़की की माँ, मामा और नाबालिग भाई को इस क्रूर अपराध के लिए गिरफ़्तार कर लिया गया था।

दिल्ली पुलिस ने इस मामले में दायर चार्जशीट में यह स्पष्ट किया कि हत्या पूर्व नियोजित थी। इस बात का भी पता चला कि लड़की का परिवार हिंदू लड़के से प्रेम करने के कारण उसके साथ सख़्ती से पेश आ रहा था। ग्राउंड रिपोर्ट में भी लड़की के परिवार की धार्मिक कट्टरता को उजागर किया गया है, जिसमें लड़की की माँ एक कट्टर मुस्लिम महिला है, जो अंतर-धार्मिक संबंध के ख़िलाफ़ थी।

यह मामला भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 303 (हत्या), 323 (स्वेच्छा से चोट पहुँचाने) और 34 (आम इरादे) के तहत अंकित की प्रेमिका के पिता अकबर अली, छोटे भाई, मामा मोहम्मद सलीम और अकबर अली की पत्नी शहनाज़ के ख़िलाफ़ यह मामला दर्ज किया गया था।

इस घटना ने देश को झकझोर दिया था। अंकित और उसके परिवार के लिए देश के विभिन्न हिस्सों से संवेदनाएँ भेजी गई थीं। दिल्ली में एक शोक समारोह आयोजित की गई थी, जिसमें एक प्रार्थना सभा भी शामिल थी। इसमें दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने भाग लिया था। हालाँकि, जब परिवार ने अपने घर के एकमात्र कमाऊ इंसान को खो देने की भरपाई करने के लिए उनसे मुआवज़े की माँग की, तो केजरीवाल प्रार्थना सभा को बीच में ही छोड़ कर चल दिए थे।

ऊपर कपिल मिश्रा के वीडियो में आप देख सकते हैं कि केजरीवाल ने पूर्व में मृत एनआईए अधिकारी तंजील अहमद और एनडीएमसी के कानूनी सलाहकार एमएम खान के परिवार के सदस्यों को 1 करोड़ रुपए का मुआवज़ा देने की घोषणा की थी। ऐसे में उनके लिए अंकित के परिवार को मुआवजा देना कोई नई बात नहीं होती। लेकिन ऐसा नहीं किया गया। इससे यह सवाल उठता है कि दिल्ली के मुख्यमंत्री अंकित सक्सेना के परिवार से अपना वादा निभाने के लिए तैयार क्यों नहीं हैं?

अंकित की मुस्लिम प्रेमिका के परिवार वालों को इन दोंनों के अंतर-धार्मिक संबंध स्वीकार नहीं था। लेकिन अंकित सक्सेना के पिता, यशपाल सक्सेना तब सांप्रदायिक सौहार्द्र का चेहरा बन गए थे, जब उन्होंने सभी से अपील की थी कि उनके बेटे की मुस्लिम प्रेमिका के परिवार द्वारा हत्या को सांप्रदायिक रंग न दिया जाए। इतना ही नहीं, उन्होंने पिछले साल रमजान के दौरान एक अंतर-धार्मिक इफ्तार पार्टी का आयोजन किया था, जिसमें कई सारे ‘सामाजिक कार्यकर्ताओं’ ने भाग लिया था। हालाँकि, इतना सब कुछ सहने के डेढ़ साल बाद, वह अभी भी न्याय का इंतजार कर रहे हैं।

14 करोड़ घरों में पहुँचेगा ‘नल से जल’: मोदी सरकार का नया मिशन लॉन्च

मोदी सरकार अपने दूसरे कार्यकाल में वो हर कार्य पूरा करने की मुमकिन कोशिश में जुटी है जिसे वह पिछले 5 सालों में पूरा नहीं कर पाए। इस दिशा में मोदी सरकार हर घर पेयजल उपलब्ध कराने को प्राथमिकता दे रही है।

आंकड़ों के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों में अब भी 80 प्रतिशत घर ऐसे हैं जहाँ पानी की सप्लाई नल के जरिए नहीं होती। ऐसे में मोदी सरकार ने मंगलवार को इस बात की घोषणा की है कि वो नए मिशन ‘नल से जल’ के जरिए ये सुनिश्चित करेगी कि आने वाले पाँच सालों में हर घर में पानी पहुँचे।

केंद्रीय जल शक्ति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने सभी राज्यों (बंगाल को छोड़कर) के प्रतिनिधियों के साथ बैठक करने के बाद कहा कि जल जीवन मिशन 14 करोड़ घरों में पानी की आपूर्ति के लिए लॉंच किया गया है। इस मिशन का लक्ष्य 2024 तक 100 फीसद घरों में सप्लाई जल पहुँचाना है, जो अभी सिर्फ़ 18 फीसद घरों में पहुँचता है।

केंद्रीय मंत्री के मुताबिक अभी सिर्फ़ सिक्किम ही ऐसा राज्य है जहाँ पर 99 प्रतिशत घरों में सप्लाई का पानी भेजा जाता है। जबकि उत्तर प्रदेश, बिहार, उड़ीसा, छत्तीसगढ़ और झारखंड ऐसे राज्य हैं जहाँ ये आंकड़े 5 प्रतिशत से भी कम है।

उनका कहना है कि आने वाले कुछ सालों में जल की उपलब्धता और उसकी जरूरत के बीच हमें 43% घाटा हो सकता है। ऐसे में जल जीवन मिशन की लक्ष्य प्राप्ति के लिए भूमि और उसकी सतह पर मौजूद पानी का इस्तेमाल किया जाएगा। केंद्रीय पेयजल सचिव परमेश्वरन अय्यर के मुताबिक जिन गाँवों में पानी की गुणवत्ता अच्छी है वहाँ नल के जरिए पानी को मुहैया करवाया जाएगा, लेकिन जहाँ पानी की गुणवत्ता खराब है वहाँ पर ट्रंक वाटर की सुविधा उपलब्ध करवाई जाएगी।

स्वच्छ भारत अभियान में मुख्य भूमिका निभाने वाले अय्यर के मुताबिक इस मिशन पर काम किया जा रहा है। उनका कहना है कि इस मिशन पर काम करते हुए उनका ध्यान केवल परिणामों पर रहेगा। उनकी कोशिश रहेगी कि इस कार्य में सरकार का अधिक पैसा खर्च न हो।

देश के अधिकांश क्षेत्रों में सूखे जैसी समस्या से निबटने के लिए की जाने वाली तैयारियों पर केंद्रीय मंत्री ने कहा कि इसके लिए राज्यों को अपना-अपना प्लान बनाकर तैयार रखने को कहा गया है, इन परिस्थितियों में केंद्र सरकार उनकी (राज्य की) हर मुमकिन सहायता करेगी।

150+ जवानों की मौत का जिम्मेदार नक्सली गिरफ़्तार: गढ़चिरौली से लेकर दंतेवाड़ा, हर कांड में था इसका हाथ

माओवादियों के ख़िलाफ़ लड़ाई में महाराष्ट्र पुलिस को बड़ी सफलता मिली है। पुलिस ने कुख्यात नक्सली किरण कुमार उर्फ़ किरण दादा को गिरफ़्तार कर लिया है। साथ में उसकी पत्नी अल्लूरी कृष्णा कुमारी उर्फ़ नर्मदाकक्को को भी धर दबोचा गया है। दोनों ही पति-पत्नी लम्बे समय से माओवादी गतिविधियों में सक्रिय थे और कई नागरिकों व पुलिस बलों की मृत्यु के पीछे इनका हाथ था। टाइम्स नाउ की रिपोर्ट के अनुसार, ये दोनों ही पिछले 20 वर्षों में 150 पुलिस वालों की मौत के लिए ज़िम्मेदार हैं। इन पर 20 लाख रुपए का इनाम था। इन्हें गिरफ़्तार करने के लिए पुलिस ने एक बड़ा और सुनियोजित ऑपरेशन चलाया।

मुख्य रूप से 1994 से माओवादी गतिविधियों में सक्रिय यह दम्पति काफ़ी घातक माना जाता था और दोनों को ही गुरिल्ला युद्ध से लेकर अन्य हथकंडों में महारत हासिल है। इन्हें बारूदी सुरंग विष्फोट का भी मास्टरमाइंड कहा जाता है, जिसके कारण न जाने कितने ही पुलिस बल के जवान वीरगति को प्राप्त हुए। 1 मई को महाराष्ट्र के गढ़चिरौली में हुए बम विस्फोट में इसी दम्पति का हाथ था, जिसमें 15 पुलिस कमांडों के अलावा एक नागरिक की भी मृत्यु हो गई थी। इसके अलावा 9 अप्रैल को छतीसगढ़ के दंतेवाड़ा में भाजपा विधायक की हत्या में भी इस दम्पति का हाथ था।

ज्ञात हो कि महाराष्ट्र के गढ़चिरौली में नक्सलियों द्वारा घात लगाकर किए गए हमले में 15 जवान वीरगति को प्राप्त हो गए थे। नक्सलियों द्वारा किए गए आईईडी ब्लास्ट में क्विक रिस्पॉन्स टीम को ले जा रहा वाहन चपेट में आ गया था। इस हमले में निजी बस का ड्राइवर भी मारा गया था। इस घटना को अंजाम देने के लिए नक्सलियों ने 36 वाहनों को आग लगा दी थी, उसके बाद क्विक रिस्पॉन्स टीम के कमांडो घटनास्थल के लिए रवाना हुए थे। ये कमांडो नक्सलियों का पीछा करते हुए जंबुखेड़ा गाँव की एक पुलिया पर पहुंचे, जहाँ नक्सलियों ने विस्फोट किया।

ये भी याद दिलाते चलें कि दंतेवाड़ा जिले के कुआंकोडा इलाके में उस वक्त हमला हुआ था, जब भाजपा विधायक भीमा मंडावी का काफिला वहाँ से गुजर रहा था। आईईडी ब्लास्ट करके नक्सलियों ने विधायक के काफिले में शामिल सुरक्षाबलों के एक वाहन को निशाना बनाया था। हमले में भाजपा विधायक भीमा मंडावी की मौत हो गई थी। वहीं हमले में शामिल एस्कॉर्ट वाहन के ब्लास्ट की चपेट में आने से 1 ड्राइवर और सुरक्षा ड्यूटी में तैनात 3 जवान भी वीरगति को प्राप्त हो गए थे।

माओवादी कैडर किरण की पत्नी कृष्णा कुमारी की उम्र 60 वर्ष के करीब है। वह आंध्र प्रदेश स्थित गुडिवाडा से है। उच्च शिक्षा प्राप्त कृष्णा लगभग एक दशक से सीपीआई (माओवादी) के गढ़चिरौली डिवीजन में ऑपरेशन की प्रमुख के तौर पर काम करती आ रही थी। जब उसकी स्वास्थ्य बिगड़ने लगी तो प्रतिबंधित संगठन ने उसे कार्य से मुक्त कर दिया था। वहीं किरण कुमार CPI (माओवादी) के दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी (DKSZI) का सदस्य है। विजयवाड़ा का रहने वाला 57 वर्षीय किरण नक्सली मुखपत्र प्रभात मासिक पत्रिका भी चलाया करता था।

बेगूसराय: महादलित परिवार की महिलाओं के साथ Gang Rape का प्रयास, लड्डू मियाँ गिरफ़्तार

बिहार के बेगूसराय से एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसके राष्ट्रीय मीडिया में न आने के कारण वहाँ रह रहे एक हिन्दू परिवार को लगातार अत्याचार का सामना करना पड़ रहा है। ‘स्वराज्य’ में प्रकाशित एक ख़बर के अनुसार, पीड़ित परिवार ने पुलिस को दी गई शिकायत में कहा है कि 10 जून की रात अचानक से उसके घर में भीड़ घुस आई और घर की दो औरतों के साथ दुर्व्यवहार किया गया। आरोपितों ने पिस्तौल के दम पर बलात्कार करने की भी कोशिश की। यह घटना रिफाइनरी थाना क्षेत्र के नूरपुर की है। पीड़ित महादलित परिवार को न्याय दिलाने की माँग के साथ भाजपा व बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने विरोध प्रदर्शन भी किया।

‘स्वराज्य’ से बात करते हुए पीड़ित महादलित परिवार ने बताया कि इन घटनाओं के पीछे कुछ स्थानीय मुस्लिम हैं, जो उन्हें उनका घर बेचने को विवश कर रहे हैं। आरोपित धमकी देते हुए कहते हैं कि यहाँ काफ़ी कम हिन्दू हैं और इसीलिए वो लोग कुछ भी नहीं कर सकते। इसके अलावा आरोपित यह भी कहते हैं- “बजरंग दल भी तुम्हें नहीं बचा पाएगा।” महादलित परिवार ने अपनी शिकायत में कहा है कि रात के 1 बजे अचानक से कुछ लोग घर में घुस आए, जिनमें से एक व्यक्ति ने कपड़े नहीं पहन रखे थे। नंगे व्यक्ति ने घर की एक महिला के साथ बलात्कार करने की कोशिश की, वहीं दूसरे मास्क पहने हुए व्यक्ति ने महिला के वस्त्र फाड़ डाले।

जब घर में मौजूद एकलौते पुरुष सदस्य ने इसका विरोध किया, तो उसकी जम कर पिटाई कर दी गई। घर में घुस आए आरोपितों में से एक की पहचान पीड़ितों ने लड्डू आलम (लड्डू मियाँ) के रूप में की है। पुलिस ने लड्डू मियाँ को गिरफ़्तार कर लिया है। उसके पिता का नाम फ़िरोज़ आलम है। लड्डू मियाँ अक्सर पीड़ित परिवार को ज़मीन बेचने की धमकी देता था क्योंकि बगल में उसकी ही ज़मीन है। वह बार-बार धमकी देते हुए 16 लाख रुपयों में ज़मीन बेचने की धमकी दिया करता था। लड्डू मियाँ ने कई बार पीड़ित परिवार को जान से भी मारने की धमकी दी थी।

बजरंग दल के स्थानीय संगठन ने बताया कि एक माह पूर्व भी उक्त महादलित महिला की पिटाई की गई थी लेकिन पुलिस इस मामले में सुस्ती बरतती रही। जब पीड़िता इस बात की सूचना देने थाना पहुँची तो उसे गाली देकर भगा दिया गया था। पीड़िता लगातार कई दिनों से सुरक्षा की माँग कर रही है। बजरंग दल ने कहा कि नूरपुर को कश्मीर एवं कैराना बनाने की कोशिश हो रही है, जिससे हिन्दू यहाँ से पलायन कर जाएँ। संगठन का आरोप है कि अगर एक महीने पहले पुलिस ने सख्ती की होती तो बलात्कार का प्रयास वाली घटना नहीं होती। भाजपा के पूर्व जिलाध्यक्ष ने प्रशासन पर हिन्दुओं एवं दूसरे समुदाय को अलग-अलग चश्मे से देखने का आरोप लगाया।

क्षेत्र में भारी संख्या में पुलिस बल तैनात कर दिया गया है। पीड़ित महादलित परिवार के मुन्ना ने दावा किया कि जब उसके साथ पिटाई की गई थी, तब पुलिस ने मामले में समझौता करने की सलाह दी थी। इस घटना को लेकर स्थानीय ग्रामीणों में भी भारी आक्रोश है और उन्होंने विरोध प्रदर्शन की चेतावनी दी है।

कठुआ: ‘Crime Branch ने यातनाएँ दे कर जुर्म कबूलने को कहा, दी परिवार को बर्बाद करने की धमकी’

कठुआ रेप केस मामले में करीब एक साल जेल में रहने के बाद बरी हुए विशाल जंगोत्रा ने क्राइम ब्रांच पुलिस पर गंभीर आरोप लगाए हैं। विशाल ने कहा कि उससे हत्या की बात कबुल करवाने के लिए पुलिस ने सभी प्रयास किए। उसे यातनाएँ दी गईं। विशाल के अनुसार, उसने मेरठ में बीएससी (एग्रीकल्चर) के पेपर दिए थे और गिरफ़्तारी के समय उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले में स्थित मीरांपुर में मौजूद था। तभी घर पर क्राइम ब्रांच पहुँची और पीटना शुरू कर दिया।

विशाल ने आगे बताया कि फिर उसे मारपीट करते हुए ही मीरांपुर थाना ले जाया गया और वहाँ से गाड़ी में डाल कर कठुआ तक लाया गया। बकौल विशाल, उसे रास्ते में भी पीटा गया और कठुआ पहुँचने के बाद रात भर यातनाएँ दी गईं। विशाल ने और अधिक जानकारी देते हुए एक इंटरव्यू के दौरान बताया:

“क्राइम ब्रांच ने पूरे परिवार को बर्बाद करने की धमकी दी और लगातार दबाव बनाया कि बच्ची से दुष्कर्म और हत्या कबूल कर लो। क्राइम ब्रांच ने यातनाएँ देकर यह स्वीकार करने को कहा कि मैंने मेरठ में पेपर नहीं दिए, पेपर किसी और ने दिए थे।”

जब विशाल से यह पूछा गया कि आखिर पुलिस उसे ही क्यों फँसाना चाहती थी, इस पर उसने कहा कि क्राइम ब्रांच पूरे परिवार को तबाह करना चाहती थी और उसके भाई को भी फँसाने की साजिश रची जा रही थी। बरी होने के बाद विशाल अब मेरठ लौटने की तैयारी में लगा है, जहाँ वह अपनी पढ़ाई पूरी करेगा। विशाल ने बताया कि उसके दोस्तों को पीट कर कबूल करवाने की कोशिश की गई कि उसकी जगह उन्होंने परीक्षाएँ दीं और उसका सेलफोन भी उन्हीं लोगों के पास था। विशाल ने क्राइम ब्रांच पर वीडियो सबूत डिलीट करने के भी आरोप लगाए।

दरअसल, आरोपों से बरी किए गए विशाल जंगोत्रा ने दावा किया था कि जिस दिन जम्मू के कठुआ में बच्ची के साथ गैंगरेप की घटना हुई, उस दिन वह मेरठ में एग्जाम दे रहा था। हालाँकि, क्राइम ब्रांच का कहना था कि जंगोत्रा मेरठ में 15 जनवरी को परीक्षा देने नहीं गया था। आरोप-पत्र के मुताबिक घटना के दिन वह कठुआ के रासना गाँव में मौजूद था। ज्ञात हो कि कठुआ गैंगरेप एवं मर्डर केस में पठानकोट अदालत ने अहम फैसला सुनाते हुए 6 आरोपितों को तो दोषी करार दिया, लेकिन एक अन्य आरोपित विशाल जंगोत्रा को बरी कर दिया। विशाल ने इस मामले में कोर्ट के सामने कहा था कि वो घटना के दिन वहाँ मौजूद ही नहीं था।