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भारत आते ही जिस ‘मिशनरीज ऑफ चैरिटी’ में गए US के विदेश मंत्री मार्को रूबियो, वो लगातार विवादों में रहा: जानिए ‘मदर टेरेसा’ की संस्था से जुड़े विवाद

अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो (United States Secretary of State – Marco Rubio) की 4 दिवसीय भारत यात्रा ने देश के राजनीतिक और सामाजिक हलकों में एक नया भूचाल ला दिया है। पिछले 14 वर्षों में यह पहला मौका है जब अमेरिका के किसी विदेश मंत्री ने दिल्ली से इतर सीधे कोलकाता की धरती पर लैंड किया है। इससे पहले साल 2012 में हिलेरी क्लिंटन सीधे कोलकाता पहुँची थीं। लेकिन रुबियो की इस यात्रा में सबसे ज्यादा ध्यान उनके एक बेहद विवादित और सोचे-समझे कदम ने खींचा है।

कोलकाता पहुँचते ही वे किसी आधिकारिक या रणनीतिक कार्यक्रम के बजाय सीधे मदर टेरेसा द्वारा स्थापित ‘मिशनरीज ऑफ चैरिटी’ के मुख्यालय (मदर हाउस) पहुँच गए।

यह वही संस्था है जो पिछले कुछ वर्षों से भारत सरकार की सख्त निगरानी, विदेशी फंडिंग पर रोक और गंभीर कानूनी आरोपों के केंद्र में रही है। मार्को रुबियो का भारत आते ही सबसे पहले यहाँ जाना और संस्था के पदाधिकारियों के साथ बंद कमरे में मुलाकात करना महज एक कूटनीतिक शिष्टाचार नहीं है। कूटनीतिक गलियारों में इसे भारत की संप्रभुता को चुनौती देने और इन विवादित ईसाई मिशनरियों को वैश्विक स्तर पर मजबूती देने के एक ठोस और रणनीतिक अमेरिकी प्रयास के रूप में देखा जा रहा है।

इस पूरे घटनाक्रम को समझने के लिए ‘मिशनरीज ऑफ चैरिटी’ के उन काले अध्यायों और विवादों का गहरा विश्लेषण जरूरी है जो इंटरनेट से लेकर अदालतों तक में गूँज रहे हैं।

फंडिंग पर सरकारी चाबुक यानी एफसीआरए से जुड़ा विवाद

मिशनरीज ऑफ चैरिटी और भारत सरकार के बीच सबसे बड़ा प्रशासनिक और वित्तीय टकराव दिसंबर 2021 में सामने आया था। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेग्युलेशन एक्ट (FCRA) के तहत संस्था के विदेशी फंडिंग लाइसेंस के नवीनीकरण को पूरी तरह रोक दिया था। गृह मंत्रालय के पास इस बात के पुख्ता इनपुट्स थे कि चंदे के नाम पर विदेशों से आने वाले अकूत धन का इस्तेमाल उन गतिविधियों में हो रहा था जो राष्ट्रहित के खिलाफ थीं।

इसके साथ ही संस्था ने ऑडिट के लिए जरूरी वित्तीय दस्तावेज और खातों का ब्योरा समय पर मुहैया नहीं कराया था, जिससे उनकी वित्तीय पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए थे।

इस प्रशासनिक कार्रवाई के सामने आते ही देश के भीतर एक बड़ा राजनीतिक बवंडर खड़ा हो गया था। पश्चिम बंगाल की तत्कालीन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और कॉन्ग्रेस सहित तमाम विपक्षी दलों ने केंद्र सरकार पर अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने का बेबुनियाद आरोप लगाया था।

सरकार ने इस पर सख्त रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया था कि उसने कोई खाता फ्रीज नहीं किया है, बल्कि भारतीय स्टेट बैंक को खुद संस्था ने ही अपने खातों पर रोक लगाने का अनुरोध भेजा था। बाद में जनवरी 2022 में जब संस्था ने चौतरफा घिरने के बाद आवश्यक दस्तावेज और स्पष्टीकरण सरकार के सामने जमा किए, तब जाकर उनका पंजीकरण बहाल किया गया था।

सेवा की आड़ में जबरन धर्मांतरण और हिंदू भावनाओं पर आघात

इस संस्था पर लंबे समय से ‘सेवा’ और ‘मदद’ के मुखौटे के पीछे बेहद शातिराना तरीके से गरीब हिंदुओं का धर्मांतरण कराने के आरोप लगते रहे हैं। गुजरात के वडोदरा स्थित संस्था के एक बाल गृह (शेल्टर होम) का मामला इसका सबसे जीवंत और डरावना उदाहरण बनकर सामने आया था।

दिसंबर 2021 में जिला सामाजिक सुरक्षा अधिकारी मयंक त्रिवेदी और बाल कल्याण समिति ने मकरपुरा क्षेत्र में स्थित लड़कियों के बाल गृह का औचक निरीक्षण किया था। इस जाँच में जो तथ्य सामने आए, उसने प्रशासनिक अधिकारियों के साथ-साथ पूरे हिंदू समाज को झकझोर कर रख दिया था।

जाँच दल ने पाया कि बाल गृह में रहने वाली बेसहारा हिंदू लड़कियों को जबरन ईसाई मजहब की पुस्तकें (बाइबल) पढ़ने के लिए विवश किया जा रहा था। इन मासूम बच्चियों को ईसाई प्रार्थनाओं में भाग लेने और उनके गले में जबरन क्रॉस बाँधने के लिए मजबूर किया जाता था। इस मामले में गुजरात धर्म स्वतंत्रता अधिनियम 2003 के तहत हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं को आहत करने और प्रलोभन देकर धर्म परिवर्तन कराने के आरोप में मकरपुरा थाने में एफआईआर दर्ज की गई थी। सेवा के नाम पर चल रहे इस घिनौने खेल का पर्दाफाश तब हुआ जब अधिकारियों को पता चला कि संस्था इन बच्चियों के मूल धर्म को मिटाने पर तुली थी।

जाँच समिति की रिपोर्ट में यह भी चौंकाने वाला खुलासा हुआ कि एक हिंदू लड़की की शादी उसकी मर्जी के खिलाफ जबरन एक ईसाई परिवार में कराने का तगड़ा दबाव बनाया गया था। इसके अलावा हिंदू लड़कियों की धार्मिक आस्था को भ्रष्ट करने के उद्देश्य से उन्हें भोजन में जबरन मांसाहारी (मांस) परोसा जाता था।

हालाँकि मिशनरीज ऑफ चैरिटी के प्रवक्ताओं ने इन सभी आरोपों को हमेशा की तरह बेबुनियाद और झूठा बताते हुए खारिज कर दिया। लेकिन पुलिस और जिला कलेक्टर द्वारा गठित कई विभागों की संयुक्त जाँच टीम ने इन आरोपों को सही पाया था, जिसके बाद ही कानूनी शिकंजा कसा गया था।

नवजात बच्चों की खरीद-फरोख्त से जुड़ा ह्यूमन ट्रैफिकिंग का घिनौना चेहरा

मिशनरीज ऑफ चैरिटी पर केवल जबरन धर्मांतरण कराने के ही नहीं, बल्कि नवजात बच्चों को पैसों के लिए बेचने जैसे जघन्य और अमानवीय अपराध के आरोप भी लग चुके हैं। यह काला सच साल 2018 में झारखंड के रांची स्थित संस्था के एक शेल्टर होम से सामने आया था।

वहाँ पुलिस ने मिशनरीज ऑफ चैरिटी की दो सिस्टर्स (नन) को नवजात बच्चों की अवैध खरीद-फरोख्त के आरोप में रंगे हाथों गिरफ्तार किया था। इस घटना ने मदर टेरेसा द्वारा स्थापित इस संस्था के तथाकथित ‘पवित्र’ और ‘दयालु’ चेहरे के पीछे छिपे भयानक कुरुप सच को दुनिया के सामने ला दिया था।

इस मामले की गंभीरता को देखते हुए राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) ने सीधे सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था। आयोग ने देश की सर्वोच्च अदालत से गुहार लगाई थी कि इन ईसाई मिशनरी संस्थाओं द्वारा चलाए जा रहे शेल्टर होम्स से बच्चों के रहस्यमयी तरीके से लापता होने और उन्हें बेचे जाने की जाँच के लिए सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में एक विशेष जाँच दल (SIT) का गठन किया जाए।

आयोग का आरोप था कि झारखंड के तत्कालीन सरकारी अधिकारियों ने इस संवेदनशील मामले में बेहद ढुलमुल रवैया अपनाया और इस बड़े रैकेट की जाँच को दबाने के लगातार प्रयास किए गए थे।

आयोग की गहन जाँच के दौरान जो आँकड़े सामने आए, वे बेहद डराने वाले और चौंकाने वाले थे। साल 2015 से 2018 के बीच रांची के इस शेल्टर होम में लगभग 450 असहाय और गरीब गर्भवती महिलाएँ भर्ती हुई थीं। लेकिन जब रिकॉर्ड खंगाला गया, तो वहाँ केवल 170 बच्चों का ही कानूनी ब्योरा दर्ज मिला।

बाकी बचे 280 नवजात शिशुओं के बारे में संस्था के पास कोई जानकारी नहीं थी कि वे कहाँ गए और उनका क्या हुआ। इसी तस्दीक के बाद सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड, पश्चिम बंगाल, असम और बिहार सहित देश के 9 राज्यों की सरकारों को नोटिस जारी कर इस मानव तस्करी के तारों की जाँच करने का आदेश दिया था।

मदर टेरेसा का काला सच- छलावा, पाखंड और ‘कलकत्ता की पिशाच’

भारत का संविधान देश के प्रत्येक नागरिक में वैज्ञानिक दृष्टिकोण और तार्किकता की भावना विकसित करने की बात करता है। लेकिन मदर टेरेसा को वेटिकन द्वारा ‘संत’ की उपाधि दिए जाने की पूरी प्रक्रिया घोर अंधविश्वास, पाखंड और चिकित्सा विज्ञान के सीधे अपमान पर टिकी थी।

टेरेसा को संत बनाने के लिए उनके नाम पर वेटिकन ने यह हास्यास्पद दावा किया कि उनके चित्र को छूने मात्र से लोगों के असाध्य कैंसर और ट्यूमर रातों-रात ठीक हो गए। भारत के डॉक्टरों और बुद्धिजीवियों ने इसे जनता को गुमराह करने वाला सरासर जादू-टोना और अंधविश्वास को बढ़ावा देने वाला कृत्य बताया था।

मशहूर ब्रिटिश लेखक क्रिस्टोफर हित्चेंस ने अपनी चर्चित किताब ‘द मिशनरी पोजीशन’ में मदर टेरेसा की इस पाखंडी छवि की धज्जियाँ उड़ाई थीं। उन्होंने अपनी किताब में टेरेसा को सीधे ‘घोउल ऑफ कोलकाता’ यानी ‘कलकत्ता की पिशाच‘ के नाम से संबोधित किया था। हित्चेंस का अकाट्य तर्क था कि टेरेसा का संस्थान पीड़ितों का आधुनिक इलाज करने के लिए नहीं था, बल्कि वह बीमार और मरते हुए लोगों को आधुनिक दवाओं से महरूम रखकर तड़पने के लिए छोड़ देता था। बीमारों से कहा जाता था कि यह दर्द उनके पापों के लिए ईश्वरीय दंड है, जिसे उन्हें बिना किसी शिकायत के चुपचाप झेलना चाहिए।

इस संस्था के घिनौने सच को उजागर करने में अनिवासी भारतीय डॉक्टर अरूप चटर्जी का शोध सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। उन्होंने लगभग 25 वर्षों तक इस संस्था के कामकाज पर जमीनी शोध किया और अपनी प्रामाणिक किताब ‘Mother Teresa: The Untold Story’ में इसके सारे काले कारनामे उजागर किए।

उन्होंने प्रामाणिक रूप से बताया कि दुनिया भर से इस संस्था को चंदे के रूप में करोड़ों-अरबों रुपए मिलते थे, लेकिन कोलकाता के उनके केंद्रों में मरीजों को बुनियादी चिकित्सा सुविधाएँ, साफ-सुथरी सुइयाँ और दर्द निवारक दवाएँ तक नसीब नहीं होती थीं। चंदे का यह भारी-भरकम पैसा आखिर कहाँ गायब हो जाता था, इसका कोई हिसाब भारत सरकार को नहीं दिया जाता था।

वैश्विक ताकतों का समर्थन और विवादास्पद राजनीतिक सांठगांठ

मदर टेरेसा की पूरी जिंदगी विवादों, कट्टरपंथी बयानों और दुनिया के बड़े-बड़े अपराधियों व भ्रष्टाचारियों से चंदा लेने की कहानियों से भरी पड़ी है। साल 1979 में जब उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार से नवाजा गया था, तब उन्होंने अपने भाषण में दुनिया को चौंकाते हुए कहा था कि वैश्विक शांति के लिए सबसे बड़ा खतरा परमाणु हथियार या युद्ध नहीं, बल्कि ‘गर्भपात’ है। उनके इस घोर रूढ़िवादी और महिला विरोधी बयान की आधुनिक समाज और दुनिया भर के महिला अधिकार संगठनों ने तीखी भर्चना की थी, जिससे उनका संकीर्ण धार्मिक एजेंडा साफ दिखाई देता था।

साल 1984 में जब भारत के भोपाल में भीषण गैस त्रासदी हुई और हजारों बेगुनाह लोग मारे गए, तब मदर टेरेसा वहाँ सांत्वना देने पहुँची थीं। लेकिन वहाँ पहुँचकर उन्होंने पीड़ितों को न्याय की लड़ाई लड़ने के बजाय कॉरपोरेट अपराधी कंपनी ‘यूनियन कार्बाइड’ को चुपचाप माफ कर देने की आत्मघाती सलाह दी थी।

आलोचकों का साफ मानना है कि वे हमेशा पश्चिमी देशों की कॉरपोरेट ताकतों और रोनाल्ड रीगन व मार्गरेट थेचर जैसी सरकारों की एजेंट के रूप में काम कर रही थीं। इसके अलावा उन्होंने अमेरिका के कुख्यात वित्तीय घोटालेबाज चार्ल्स कीटिंग से 1.25 मिलियन डॉलर का चंदा लिया और बाद में अदालत में उस अपराधी को बचाने के लिए पैरवी तक की थी।

ईसाई मिशनरियों को ऑक्सीजन देने का अमेरिकी प्रयास

इन तमाम घिनौने विवादों, मुकदमों और मानव तस्करी जैसे गंभीर आरोपों के बीच अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो का भारत आते ही सबसे पहले मिशनरीज ऑफ चैरिटी जाना एक सोची-समझी राजनीतिक पटकथा का हिस्सा है। अंतरराष्ट्रीय मामलों के विश्लेषकों का स्पष्ट मानना है कि अमेरिका हमेशा से ‘धार्मिक स्वतंत्रता’ और ‘मानवाधिकार’ के झूठे मुखौटे का इस्तेमाल करके विकासशील देशों पर अपना रणनीतिक दबाव बनाने की कुटिल नीति अपनाता रहा है।

रुबियो की यह यात्रा असल में भारत सरकार के कड़े रुख के कारण वित्तीय और सामाजिक रूप से कमजोर पड़ चुकी इन मिशनरियों को वैश्विक स्तर पर नैतिक और राजनीतिक ऑक्सीजन देने का एक खुला प्रयास है।

जिस संस्था पर भारत की अदालतों में जबरन धर्मांतरण, बच्चों की खरीद-फरोख्त और वित्तीय हेराफेरी के संगीन कानूनी मुकदमे चल रहे हों, वहाँ अमेरिकी विदेश मंत्री का खुद चलकर जाना भारत की न्याय प्रणाली और आंतरिक सुरक्षा को ठेंगा दिखाने जैसा है। वाशिंगटन इस यात्रा के जरिए यह संदेश देना चाहता है कि वह भारत में काम कर रहे इन ईसाई नेटवर्क की ढाल बनकर खड़ा है।

कांसमंडी किले को लेकर पासी समाज और मुस्लिम आमने-सामने: जानें इस्लामी आक्रांता सालार मसूद गाजी से कनेक्शन, जिसे महाराजा सुहैल देव ने गाजर-मूली की तरह काटा

विश्वप्रसिद्ध और रसीले दशहरी आमों के लिए खास पहचान रखने वाला लखनऊ का मलिहाबाद क्षेत्र आज एक अत्यंत संवेदनशील ऐतिहासिक, धार्मिक और सामाजिक विवाद का मुख्य केंद्र बन चुका है। अयोध्या, काशी, मथुरा, संभल और धार की भोजशाला के बाद अब लखनऊ का ‘कांसमंडी’ इलाका देश और प्रदेश की सांस्कृतिक व राजनीतिक बहसों के केंद्र में आ गया है। इस पूरे विवाद के केंद्र में एक ऐसा ऐतिहासिक नाम है, जिसे लेकर एक बार फिर इतिहास के पन्नों को पलटा जा रहा है और वह नाम है सैय्यद सालार मसूद गाजी का।

कांसमंडी में स्थित एक विशाल, प्राचीन और ऊँचे टीलेनुमा परिसर को लेकर पासी समाज और मुस्लिम समुदाय आमने-सामने हैं। लाखन आर्मी, पासी समाज और विभिन्न हिंदू संगठनों का दृढ़ दावा है कि वर्तमान समय में जिस परिसर को मुस्लिम पक्ष द्वारा मस्जिद, मजार या पारंपरिक कब्रिस्तान बताया जा रहा है, वह वास्तव में 11वीं शताब्दी के महान चक्रवर्ती राजपासी शासक राजा कंस का ऐतिहासिक अजेय किला है।

पासी समाज का आरोप है कि इस किले के भीतर स्थित प्राचीन महादेव (शिव) मंदिर को दबाकर इसका इस्लामीकरण किया गया है। वहीं मुस्लिम पक्ष इसे वक्फ रिकॉर्ड में दर्ज सदियों पुरानी मस्जिद और मकबरा घोषित कर रहा है। लेकिन इस पूरे विवाद की सुलगती आग के पीछे सालार मसूद गाजी का वह क्रूर इतिहास है, जिसने 11वीं शताब्दी में भारत की धरती को लहूलुहान किया था।

कौन था सालार मसूद गाजी? जानें उसकी क्रूरता का इतिहास

सैय्यद सालार मसूद गाजी को स्थानीय लोककथाओं और कुछ धार्मिक परंपराओं में ‘गाजी मियाँ’ के नाम से भी जाना जाता है। लेकिन इतिहास की किताबों और ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, उसका परिचय एक अत्यंत क्रूर और बर्बर विदेशी आक्रांता के रूप में होता है। वह भारत के प्रसिद्ध मंदिरों को तोड़ने और अपार धन-दौलत लूटने वाले अफगान हमलावर महमूद गजनवी का सगा भाँजा था। सालार मसूद के पिता सालार साहू, महमूद गजनवी की सेना के प्रमुख सेनापति थे। मसूद बचपन से ही अपने मामा गजनवी की छत्रछाया में पला-बढ़ा था, इसलिए उसके भीतर भी भारत की धन-संपदा को लूटने और तलवार के बल पर इस्लाम का प्रचार करने का वही क्रूर जनून सवार था जो गजनवी में था।

17वीं शताब्दी में जहाँगीर के शासनकाल के दौरान अब्दुर रहमान चिश्ती द्वारा फारसी भाषा में लिखी गई किताब ‘मिरात-ए-मसूदी’ में सालार मसूद के जीवन और उसके सैन्य अभियानों का विस्तार से उल्लेख मिलता है। इस किताब के तथ्य बताते हैं कि सालार मसूद ने भारत में कई बड़े सैन्य अभियान चलाए। उसका एकमात्र उद्देश्य भारत के समृद्ध हिंदू राज्यों को नष्ट करना, उनके पवित्र मंदिरों को लूटना और यहाँ की आबादी का जबरन धर्म परिवर्तन कराना था।

अपने इस एजेंडे को पूरा करने के लिए उसने क्रूरता की सारी हदें पार कर दीं। उसने दिल्ली, मेरठ और कन्नौज जैसे बड़े क्षेत्रों को लूटा और वहाँ के हिंदुओं का बड़े पैमाने पर कत्लेआम किया। कन्नौज को तबाह करने के बाद उसने अवध (वर्तमान लखनऊ और आसपास के क्षेत्र) की तरफ अपने कदम बढ़ाए, जहाँ उसका सामना इस मिट्टी के वीर योद्धाओं से हुआ।

सोमनाथ मंदिर की लूट से मसूद का संबंध

सालार मसूद गाजी का नाम भारत के सबसे पवित्र और समृद्ध मंदिरों में से एक गुजरात के सोमनाथ मंदिर की लूट से भी गहराता से जुड़ा हुआ है। हालाँकि इस बात को लेकर इतिहासकारों में कुछ मतभेद जरूर हैं कि क्या वह सीधे तौर पर उस मुख्य सेना का हिस्सा था, लेकिन कई महत्वपूर्ण ऐतिहासिक तथ्य और दस्तावेज यह प्रमाणित करते हैं कि उसने अपने मामा महमूद गजनवी के साथ भारत के मंदिरों पर हुए भीषण हमलों में सक्रिय रूप से भाग लिया था।

गजनवी की सेना जब सोमनाथ के शिवलिंग को खंडित कर रही थी और मंदिर के सोने-चाँदी को लूट रही थी, तब सालार मसूद उस जेहादी सेना को वैचारिक और सैन्य नेतृत्व दे रहा था। भारत के सांस्कृतिक प्रतीकों को नष्ट करना और हिंदुओं की आस्था पर चोट करना सालार मसूद की युद्ध नीति का एक मुख्य हिस्सा था। यही कारण है कि भारतीय जनमानस और हिंदू संगठनों में सालार मसूद गाजी की छवि एक धर्मरक्षक की नहीं, बल्कि एक क्रूर मंदिर लुटेरे और हत्यारे की रही है।

11वीं शताब्दी के अवध में महाराजा कंस पासी की हुंकार

जब सालार मसूद गाजी अपनी विशाल और उन्मादी सेना लेकर दिल्ली और कन्नौज को मटियामेट करता हुआ अवध के क्षेत्र में दाखिल हुआ, तो उसे लगा था कि आगे का रास्ता भी उतना ही आसान होगा। लेकिन उसे यह अंदाजा नहीं था कि अवध की पावन धरती पर उसका सामना राजपासी समाज के उन वीर योद्धाओं से होने वाला है जो अपनी मातृभूमि और धर्म की रक्षा के लिए प्राणों की आहुति देने से कभी पीछे नहीं हटते थे।

लखनऊ गजेटियर के आधिकारिक और ऐतिहासिक रिकॉर्ड में यह स्पष्ट रूप से दर्ज है कि 11वीं शताब्दी के अंतिम दौर में काकोरी, मलिहाबाद और उसके आसपास का पूरा क्षेत्र राजा कंस पासी के मजबूत राजनीतिक, सामाजिक और सैन्य प्रभाव में था। महाराजा कंस पासी एक बेहद स्वाभिमानी और रणनीतिक रूप से कुशल शासक थे। जब सालार मसूद की सेना मलिहाबाद और काकोरी की सीमाओं पर पहुँचकर गांवों को जलाने और मंदिरों को तोड़ने लगी, तब राजा कंस ने विदेशी दासता स्वीकार करने या आत्मसमर्पण करने के बजाय युद्ध का बिगुल फूँक दिया। उन्होंने अपने सभी सामंतों और सैनिकों को इकट्ठा किया और इस विदेशी आक्रांता को अपनी धरती से खदेड़ने की प्रतिज्ञा ली।

कांसमंडी के रक्तरंजित युद्ध में सालार के सेनापतियों का वध

अंग्रेजी हुकूमत के दौरान तैयार किए गए लखनऊ गजेटियर के अनुसार, कांसमंडी और काकोरी का यह संपूर्ण क्षेत्र सालार मसूद गाजी की विदेशी आक्रमणकारी सेना और स्थानीय हिंदू पासी राजाओं के बीच हुए अत्यंत भीषण और रक्तरंजित संघर्ष का मुख्य रणक्षेत्र बन गया। सालार मसूद के पास घुड़सवारों और आधुनिक हथियारों से लैस एक बड़ी सेना थी, लेकिन राजा कंस पासी ने अपनी भौगोलिक स्थिति और छापामार युद्ध नीति (गोरिल्ला वॉरफेयर) का शानदार उपयोग किया। उन्होंने कांसमंडी के अपने ऊँचे और अजेय किले को अपनी रक्षा और हमले का मुख्य केंद्र बनाया।

इस युद्ध के दौरान एक ऐसी ऐतिहासिक घटना घटी जिसने सालार मसूद की सेना की रीढ़ तोड़ दी। गजेटियर में इस बात का विशेष रूप से उल्लेख है कि युद्ध के मैदान में राजपासी राजा कंस और उनके वीर सैनिकों ने अदम्य साहस का परिचय देते हुए सालार मसूद गाजी के दो सबसे प्रमुख, भरोसेमंद और खूंखार सेनापतियों सैय्यद हातिम और सैय्यद खातिम को इसी कांसमंडी के मैदान में मार गिराया था।

इन दोनों सेनापतियों की मृत्यु कोई साधारण घटना नहीं थी; वे मसूद के अभियान के दो मुख्य स्तंभ थे। उनकी मौत से विदेशी सेना में हड़कंप मच गया और मसूद का जो अभियान अब तक अजेय लग रहा था, वह अवध की इस धरती पर आकर बेहद कमजोर और पस्त पड़ गया। राजा कंस पासी की इस बहादुरी ने सालार मसूद के विजयी रथ को ऐसा झटका दिया कि वह मलिहाबाद और लखनऊ के क्षेत्र में पूरी तरह पैर नहीं जमा सका।

बहराइच की ऐतिहासिक लड़ाई में सालार मसूद का अंत

मलिहाबाद और कांसमंडी में राजा कंस पासी से लोहा लेने के बाद सालार मसूद गाजी की सेना काफी कमजोर हो चुकी थी और उसके आधे से ज्यादा सैनिक मारे जा चुके थे। लेकिन अपने बचे-खुचे सैनिकों के साथ वह आगे बढ़ता रहा। इस कहानी का सबसे निर्णायक और अंतिम अध्याय बहराइच की ऐतिहासिक लड़ाई से जुड़ा है। साल 1034 ईस्वी में जब मसूद बहराइच के क्षेत्र में पहुँचा, तो वहाँ के महान शासक महाराजा सुहेलदेव के नेतृत्व में स्थानीय हिंदू राजाओं ने एक बड़ा गठबंधन तैयार कर लिया था।

महाराजा सुहेलदेव और राजा कंस पासी एक ही कालखंड के समकालीन योद्धा थे। बहराइच की प्रसिद्ध चित्तौरा झील के आसपास दोनों सेनाओं के बीच वह अंतिम और ऐतिहासिक महायुद्ध लड़ा गया। महाराजा सुहेलदेव की सेना ने सालार मसूद की फौज को चारों तरफ से घेर लिया। पासी समाज और स्थानीय राजाओं के संयुक्त पराक्रम के सामने विदेशी सेना टिक नहीं सकी।

महाराजा सुहेलदेव ने युद्ध के मैदान में सालार मसूद गाजी को गाजर-मूली की तरह काट डाला और उसे मिट्टी में मिला दिया। मसूद की पूरी सेना का समूल नाश कर दिया गया। मौत के बाद सालार मसूद को उसी बहराइच की धरती पर दफनाया गया, जहाँ बाद में फिरोज शाह तुगलक के शासनकाल के दौरान उसकी मजार को एक बड़ी दरगाह का रूप दे दिया गया, जिसे आज गाजी मियाँ की दरगाह कहा जाता है।

वर्तमान विवाद की जमीनी हकीकत, किला बनाम मस्जिद

अब सवाल यह उठता है कि सदियों पुराने इस इतिहास की गूँज आज मलिहाबाद के कांसमंडी में दोबारा क्यों सुनाई दे रही है? दरअसल, विवाद की जड़ें उसी प्राचीन ऊँचे टीलेनुमा परिसर से जुड़ी हैं। पासी समाज का यह दृढ़ तर्क है कि जिस स्थान पर आज मुस्लिम पक्ष दावा कर रहा है, वह असल में महाराजा कंस पासी का मूल किला है। पासी समाज का आरोप है कि इतिहास की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जिन विदेशी आक्रांताओं और उनके सेनापतियों (हातिम और खातिम) को राजा कंस ने इसी मैदान में मारकर अपनी धरती को गौरवान्वित किया था, आज उन्हीं की कथित मजारों और कब्रों के नाम पर राजा कंस के अपने ही किले पर अवैध कब्जा कर लिया गया है।

स्थानीय हिंदू संगठनों और पासी समाज के नेताओं का कहना है कि इस किले के मूल ऐतिहासिक स्वरूप को ‘जमीन जिहाद’ के माध्यम से धीरे-धीरे नष्ट किया गया है। उनके अनुसार, परिसर के भीतर एक अत्यंत प्राचीन महादेव (शिव) मंदिर स्थापित था, जिसे दबा दिया गया और अब वहाँ नमाज पढ़ी जा रही है।

इसके साथ ही परिसर के भीतर जानबूझकर नई कब्रें और उर्दू के शिलापट लगाकर इस पूरी सनातनी विरासत का इस्लामीकरण करने का प्रयास किया जा रहा है। पासी समाज इस बात से बेहद आक्रोशित है कि उनके गौरवशाली पूर्वजों के इतिहास को मिटाकर वहाँ एक आक्रांता के सहयोगियों का महिमामंडन किया जा रहा है।

पासी समाज के प्रमुख नेता सूरज पासी ने ऑपइंडिया से बातचीत में कहा, “हम किसी भी समुदाय की वैध या कानूनी धार्मिक संपत्ति के खिलाफ बिल्कुल नहीं हैं, लेकिन हमारे पूर्वज महाराजा कंस पासी की महान विरासत को मिटाने की किसी भी साजिश को हम कतई बर्दाश्त नहीं करेंगे। लखनऊ गजेटियर इस बात का चश्मदीद गवाह है कि यह स्थान राजा कंस का किला था और यहीं उन्होंने विदेशी आक्रांताओं के सेनापतियों को धूल चटाई थी। हमारे आराध्य भगवान शिव के प्राचीन मंदिर को इस कब्जे से मुक्त कराना हमारी आस्था, हमारी संस्कृति और हमारे आत्मसम्मान का विषय है और हम इसके लिए कानूनी और सामाजिक रूप से अंतिम सांस तक लड़ेंगे।”

पासी समाज का यह भी कहना है कि राजपासी राजा कंस के बाद इस क्षेत्र में महाराजा बिजली पासी जैसे महान शासक रहे, जिनके नियंत्रण में उस समय 12 विशाल किले थे। इस समाज का भारत के रक्षा इतिहास में एक गौरवशाली स्थान रहा है, जिसे जानबूझकर इतिहास की मुख्यधारा की किताबों से गायब कर दिया गया।

मलिहाबाद के कांसमंडी में उपजा यह विवाद केवल एक जमीन के टुकड़े की लड़ाई नहीं है, बल्कि यह इतिहास के उन दबे हुए, धूल धूसरित पन्नों को दोबारा पलटने जैसा है, जहाँ 11वीं शताब्दी के स्थानीय राजाओं का शौर्य, विदेशी आक्रांताओं का क्रूर और रक्तरंजित इतिहास और आज के दौर की धार्मिक-सांस्कृतिक अस्मिता आपस में सीधे टकरा रही हैं।

बंगाल में जिसे ‘चोर बाजारी’ बता रहे थे राहुल गाँधी, वही केरल में कर रही उनकी कॉन्ग्रेस सरकार: VD सतीशन ने केरल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी को बनाया अपना सचिव

राजनीति में दूसरों पर कीचड़ उछालना बहुत आसान काम है। लेकिन जब वही कीचड़ खुद के दामन पर गिरता है, तो चेहरे का रंग उड़ जाता है। कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी के साथ भी ठीक ऐसा ही हुआ है। 10 दिन पहले राहुल गाँधी ने पश्चिम बंगाल में चुनाव आयोग से जुड़े अधिकारी की नियुक्ति पर बड़ा हंगामा खड़ा किया था। उन्होंने देश की सबसे बड़ी संवैधानिक संस्था चुनाव आयोग और बीजेपी पर बेहद गंभीर आरोप लगाए थे।

लेकिन अब केरल से एक ऐसी खबर आई है जिसने राहुल गाँधी के दावों की धज्जियाँ उड़ा दी हैं। केरल में कॉन्ग्रेस की सरकार है। वहाँ के कॉन्ग्रेस मुख्यमंत्री ने ठीक वही काम किया है, जिसे राहुल गाँधी 10 दिन पहले ‘चोरी’ और ‘इनाम’ बता रहे थे। अब जब उनकी खुद की पार्टी ने वही कदम उठाया है, तो राहुल गाँधी और उनकी पूरी टीम ने चुप्पी साध ली है।

राहुल गाँधी का वह पोस्ट: ‘जितनी बड़ी चोरी, उतना बड़ा इनाम’

सबसे पहले बात करते हैं कि 10 दिन पहले ऐसा क्या हुआ था जिस पर राहुल गाँधी ने आसमान सिर पर उठा लिया था। दरअसल, पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्य चुनाव अधिकारी मनोज अग्रवाल को वहाँ का मुख्य सचिव बनाया गया था। इसके साथ ही एक और चुनाव अधिकारी सुब्रत गुप्ता भी शुभेंदु अधिकारी की टीम का हिस्सा बने थे।

इस खबर के सामने आते ही राहुल गाँधी ने बिना सोचे-समझे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर एक पोस्ट कर लिखा, “BJP-EC के ‘चोर बाजार’ में – जितनी बड़ी चोरी, उतना बड़ा इनाम।” राहुल गाँधी का सीधा आरोप था कि इन चुनाव अधिकारियों ने चुनाव के दौरान BJP की मदद की यानी ‘वोटों की चोरी’ की। इसलिए BJP सरकार ने उन्हें मुख्य सचिव जैसा बड़ा पद देकर इसका ‘इनाम’ दिया है। राहुल गाँधी ने चुनाव आयोग जैसी निष्पक्ष संस्था को भी ‘चोर बाजार’ कह दिया था।

अब केरल में कॉन्ग्रेस सरकार ने क्या खेल किया?

अब कहानी में एक बड़ा ट्विस्ट आता है। राहुल गाँधी के इस बयान को अभी 10 दिन भी नहीं बीते थे कि केरल से एक बड़ी सरकारी नियुक्ति की खबर सामने आई। केरल में इस समय कॉन्ग्रेस के मुख्यमंत्री वीडी सतीशन की सरकार है। केरल सरकार ने एक आदेश जारी किया। इस आदेश के मुताबिक, डॉ रतन यू केलकर को मुख्यमंत्री का सचिव नियुक्त कर दिया गया है।

अब चौंकने वाली बात यह है कि डॉ रतन यू केलकर कोई साधारण अधिकारी नहीं हैं। वे केरल के ‘मुख्य चुनाव अधिकारी’ के पद पर तैनात थे। यानी जिस समय केरल में चुनाव हो रहे थे, उस समय पूरी चुनावी व्यवस्था की कमान इन्हीं के हाथों में थी। अब कॉन्ग्रेस के मुख्यमंत्री ने चुनाव खत्म होते ही उन्हें अपना सबसे खास और करीबी सचिव बना लिया है।

खुद की बारी में ‘मजबूरी’ और दूसरों की बारी में ‘चोरी’?

अब यहाँ सबसे बड़ा सवाल राहुल गाँधी और कॉन्ग्रेस पार्टी के इस दोगले रवैये पर खड़ा होता है। लोग यह पूछ रहे है कि अगर BJP या कोई गैर-कॉन्ग्रेसी सरकार किसी पूर्व चुनाव अधिकारी को उसकी योग्यता के आधार पर कोई पद दे, तो वह ‘चोर बाजार’ और ‘वोट चोरी का इनाम’ कैसे हो जाता है?

जब केरल में कॉन्ग्रेस की अपनी सरकार ठीक वही काम करती है, एक सिटिंग चुनाव अधिकारी को सीधे मुख्यमंत्री का सचिव बना देती है, तो वह ‘ईमानदार नियुक्ति’ कैसे बन जाती है? क्या राहुल गाँधी अब केरल के मुख्यमंत्री को भी पत्र लिखेंगे?

क्या वे अपनी ही सरकार के इस फैसले को ‘चोर बाजार’ का हिस्सा मानेंगे? जाहिर है कि वे ऐसा कभी नहीं करेंगे। यही राजनीति का वह दोहरा चेहरा है जिसे देश की जनता अब अच्छे से समझने लगी है।

बिना सबूत के रोना: विपक्ष और कॉन्ग्रेस का पुराना पैंतरा

इस पूरे विवाद के पीछे एक और बहुत बड़ी सच्चाई छिपी है, जिसे समझना बेहद जरूरी है। कॉन्ग्रेस पार्टी और पूरा विपक्ष पिछले कई सालों से लगातार एक ही राग अलाप रहा है। जब भी वे कोई चुनाव हारते हैं, तो अपनी कमियों को सुधारने के बजाय सीधे चुनाव आयोग पर ठीकरा फोड़ देते हैं। वे हर बार चिल्लाते हैं कि चुनाव में धांधली हुई है, वोट चोरी हुए हैं, ईवीएम (EVM) में गड़बड़ी की गई है और चुनाव आयोग निष्पक्ष नहीं है।

लेकिन देश गवाह है कि आज तक कॉन्ग्रेस या किसी भी विपक्षी दल ने अदालत या जनता के सामने अपनी इन बातों का एक भी पुख्ता सबूत पेश नहीं किया है। सुप्रीम कोर्ट तक ने कई बार इनके दावों को खारिज किया है और फटकार लगाई है। सच्चाई यह है कि जब ये चुनाव जीत जाते हैं (जैसे केरल या अन्य राज्यों में), तब चुनाव आयोग बिल्कुल सही काम कर रहा होता है। लेकिन जब ये हार जाते हैं, तो उसी चुनाव आयोग को बदनाम करने की साजिश शुरू कर देते हैं।

सबसे ऊँची चोटी पर वर्ल्ड रिकॉर्ड तो बना, लेकिन माउंट एवरेस्ट का ‘जाम’ कितना खतरनाक?: 2 भारतीयों की मौत से उठते सवाल

दुनिया की सबसे ऊँची चोटी माउंट एवरेस्ट पर इस साल इतिहास का सबसे बड़ा ‘ट्रैफिक जाम’ लगा है। नेपाल के रास्ते एक ही दिन में रिकॉर्ड 274 पर्वतारोहियों ने एवरेस्ट पर चढ़कर नया विश्व रिकॉर्ड बनाया है। लेकिन इस भारी भीड़ और जाम के बीच एक बहुत ही दुखद खबर आई है।

एवरेस्ट की चोटी से नीचे उतरते समय दो भारतीय पर्वतारोहियों की तबियत अचानक बिगड़ गई। इस वजह से उन दोनों की मौत हो गई है। मरने वाले भारतीयों के नाम अरुण कुमार तिवारी और संदीप आरे हैं। चोटी के पास पर्वतारोहियों की बहुत लंबी कतार लगी थी। विशेषज्ञों का मानना है कि इस जाम में फँसने के कारण ऑक्सीजन की कमी हो गई। साथ ही वहाँ अत्यधिक ठंड थी, जिसे इस बड़े हादसे की मुख्य वजह माना जा रहा है।

दो भारतीय पर्वतारोहियों ने गँवाई अपनी जान

नेपाल के इस पर्वतारोहण सीजन में भारी भीड़ लगी है। इस भीड़ के बीच 2 भारतीय पर्वतारोहियों की मौत हो गई है। इस दुखद खबर ने सबको झकझोर दिया है। एवरेस्ट पर यात्रा कराने वाली एजेंसी ‘द पायनियर एडवेंचर्स’ ने इस बात की पुष्टि की है।

पहले भारतीय पर्वतारोही का नाम अरुण कुमार तिवारी था। उनकी मौत चोटी के ठीक नीचे मशहूर ‘हिलारी स्टेप’ के पास हुई। वे चोटी से नीचे उतर रहे थे। तभी वे अचानक बहुत बीमार पड़ गए। चार शेरपा गाइडों ने उन्हें बचाने की बहुत कोशिश की। लेकिन उनकी जान नहीं बचाई जा सकी। डॉक्टर्स को शक है कि ज्यादा ऊँचाई की वजह से उनके फेफड़ों में पानी भर गया था।

दूसरी मौत 46 साल के संदीप आरे की हुई। संदीप ने 20 मई को एवरेस्ट की चोटी पर कामयाबी से तिरंगा फहराया था। लेकिन नीचे उतरते समय वे बर्फीले अंधेपन का शिकार हो गए। उन्हें अचानक कुछ भी दिखना बंद हो गया था। इसके बाद पाँच शेरपा गाइडों ने मिलकर उन्हें साउथ समिट से बचाया। उन्हें किसी तरह कैंप-2 तक लाया गया। लेकिन वहाँ पहुँचते ही उन्होंने दम तोड़ दिया।

एवरेस्ट की चोटी पर 5 किलोमीटर लंबा जाम

इस साल एवरेस्ट पर चढ़ने वालों की बहुत भारी भीड़ है। भीड़ के मामले में इस बार सारे पुराने रिकॉर्ड टूट गए हैं। चोटी के रास्ते पर पर्वतारोहियों की करीब 5 किलोमीटर लंबी लाइन देखी गई है। सोशल मीडिया पर इस भीड़ की तस्वीरें खूब वायरल हो रही हैं। इस साल चीन ने तिब्बत की तरफ से चढ़ाई करने की इजाजत नहीं दी थी।

इस वजह से दुनिया भर के सभी लोग नेपाल के रास्ते ही एवरेस्ट चढ़ने पहुँच गए। पहाड़ पर चढ़ने के लिए अच्छा मौसम सिर्फ कुछ दिनों के लिए ही रहता है। इसलिए सैकड़ों लोग एक साथ चोटी की तरफ निकल पड़े। इसी वजह से रास्ते में यह भयानक जाम लग गया है।

एक ही दिन में 274 लोगों का नया रिकॉर्ड

नेपाल के पर्यटन विभाग ने एक बड़ी जानकारी दी है। बुधवार को सुबह तड़के 3 बजे से ही पहाड़ पर चढ़ाई शुरू हो गई थी। यह चढ़ाई लगातार 11 घंटे तक चलती रही। इस दौरान कुल 274 पर्वतारोहियों ने एवरेस्ट की चोटी पर अपने कदम रखे। नेपाल के रास्ते एक ही दिन में चढ़ने वालों की यह अब तक की सबसे बड़ी संख्या है।

इससे पहले 22 मई 2019 को एक दिन में 223 लोग चोटी पर पहुँचे थे। वैसे दुनिया भर में एक दिन में सबसे ज्यादा 354 लोगों के चढ़ने का रिकॉर्ड है। यह रिकॉर्ड 23 मई 2019 को नेपाल और तिब्बत दोनों तरफ के रास्तों को मिलाकर बना था। इस बार तिब्बत का रास्ता बंद था। इसके बावजूद सिर्फ नेपाल के रास्ते से ही एक नया रिकॉर्ड बन गया है।

एवरेस्ट की दौड़ में भारत तीसरे नंबर पर

इस साल एवरेस्ट पर चढ़ने के लिए भारत से बहुत सारे लोग पहुँचे हैं। नेपाल सरकार ने इस सीजन में कुल 494 विदेशी पर्वतारोहियों को पहाड़ पर चढ़ने की इजाजत (परमिट) दी थी। इसमें सबसे ज्यादा 109 परमिट चीन के लोगों को मिले।

दूसरे नंबर पर अमेरिका रहा, जिसके 77 नागरिकों को यह इजाजत मिली। भारत इस सूची में तीसरे स्थान पर है। भारत के 61 पर्वतारोहियों को इस बार परमिट मिला था। इसके अलावा ब्रिटेन के 32 और रूस के 18 लोगों ने भी इस बार एवरेस्ट पर चढ़ाई की है।

जाम से क्यों आ जाती है मौत की नौबत?

एवरेस्ट की चोटी के पास का हिस्सा ‘डेथ जोन’ कहलाता है। यह इलाका समुद्र तल से 8,000 मीटर से भी ज्यादा ऊँचा है। इतनी ऊँचाई पर हवा में ऑक्सीजन बहुत कम होती है। इसलिए, इंसान का शरीर यहाँ ज्यादा देर तक जिंदा नहीं रह सकता है। जब रास्ते में भीड़ होती है, तो पर्वतारोहियों को लाइन में खड़ा होना पड़ता है।

ज्यादा देर इंतजार करने से उनका ऑक्सीजन सिलेंडर खत्म होने लगता है। कड़ कड़ाती ठंड में खड़े रहने से उनका शरीर ठंडा पड़ जाता है। हाथ-पैर जमने लगते हैं। ऑक्सीजन की कमी और ठंड के कारण लोग अचानक बीमार हो जाते हैं। थकावट की वजह से कई बार नीचे उतरते समय उनका ध्यान भटक जाता है और वे हादसे का शिकार हो जाते हैं।

ऑक्सीजन की चोरी ने बढ़ाई मुश्किलें

एवरेस्ट पर भीड़ बढ़ने से एक और बड़ी परेशानी शुरू हो गई है। यहाँ ऊँचाई पर पर्वतारोहियों की मदद के लिए पहले से ऑक्सीजन सिलेंडर रखे जाते हैं। अब इन सिलेंडरों की चोरी होने लगी है। कई पर्वतारोहियों ने बताया कि उनके हिस्से के सिलेंडर गायब मिलते हैं।

इतनी ऊँचाई पर किसी की ऑक्सीजन चुराना उसकी जान लेने जैसा है। इसके अलावा, कई ऐसे लोग भी एवरेस्ट चढ़ने आ रहे हैं जो शारीरिक रूप से फिट नहीं हैं। वे रास्ते में बहुत धीरे-धीरे चलते हैं। इस वजह से उनके पीछे चल रहे बाकी लोगों के लिए भी खतरा बढ़ जाता है।

नेपाल सरकार की बंपर कमाई

इस साल नेपाल सरकार ने एवरेस्ट चढ़ने की फीस बढ़ा दी थी। इसे 11,000 डॉलर से बढ़ाकर 15,000 डॉलर (करीब 12 लाख रुपए) कर दिया गया। फीस बढ़ने के बाद भी एवरेस्ट पर आने वाले लोग कम नहीं हुए।

इस सीजन में नेपाल ने 30 अलग-अलग चोटियों के लिए 1,181 पर्वतारोहियों को परमिट दिए। इससे नेपाल सरकार को 1.25 अरब रुपए से ज्यादा की कमाई हुई। इसमें से अकेले माउंट एवरेस्ट से ही सरकार को 1.07 अरब रुपए से अधिक मिले हैं।

कुछ आयोजकों का दावा: भीड़ को संभाला जा सकता है

एक तरफ विशेषज्ञ इस भीड़ को गलत बता रहे हैं। दूसरी तरफ, कुछ ट्रिप प्लानर्स का मानना है कि इस भीड़ को संभाला जा सकता है। ऑस्ट्रिया की एक मशहूर कंपनी का कहना है कि अगर टीमों के पास पूरी ऑक्सीजन हो और सही प्लानिंग हो, तो खतरा कम किया जा सकता है।

उनका कहना है कि यूरोप के आल्प्स पहाड़ों पर एक दिन में 4,000 लोग चढ़ते हैं। एवरेस्ट तो उससे 10 गुना बड़ा है, इसलिए यहाँ 274 लोगों की संख्या बहुत ज्यादा नहीं है। लेकिन, वे एक बड़ी बात भूल जाते हैं। आल्प्स और एवरेस्ट के ‘डेथ जोन’ के मौसम में जमीन-आसमान का अंतर होता है। एवरेस्ट का मौसम बहुत ज्यादा खतरनाक होता है।

रिकॉर्ड्स का भी बना नया इतिहास

इस मुश्किल समय में जहाँ कुछ दुखद मौतें हुईं, वहीं कुछ ऐतिहासिक रिकॉर्ड भी बने। नेपाल के मशहूर गाइड कामी रीता शेरपा ने 32वीं बार एवरेस्ट पर चढ़कर अपना ही पुराना वर्ल्ड रिकॉर्ड तोड़ दिया। वहीं, 52 साल की ल्हाकपा शेरपा ने 11वीं बार चोटी पर कदम रखा। वे दुनिया में सबसे ज्यादा बार एवरेस्ट चढ़ने वाली महिला बन गई हैं।

इसके अलावा, रूस के 34 साल के रुस्तम नबीव ने सबको हैरान कर दिया। उनके दोनों पैर नहीं हैं। उन्होंने बिना नकली पैरों के, सिर्फ अपने हाथों के दम पर एवरेस्ट फतह किया। लेकिन इन बड़ी सफलताओं के बाद भी सुरक्षा के इंतजामों पर सवाल उठ रहे हैं।

डार्क वेब से शुरू हुआ ऑपरेशन, मोहसिन मुलानी से जुबैर पोपटिया तक पहुँचा: पढ़ें- गुजरात पुलिस ने कैसे पकड़ा हमास कनेक्शन वाला ₹226 करोड़ का क्रिप्टो-टेरर नेटवर्क?

गुजरात पुलिस के साइबर सेंटर ऑफ एक्सीलेंस (CCOE) और CID क्राइम की टीमों ने मिलकर 226 करोड़ रुपए के एक बड़े अंतरराष्ट्रीय क्रिप्टोकरेंसी और आतंकी फंडिंग रैकेट का खुलासा किया है।

जाँच में सामने आया कि यह गिरोह सिर्फ वित्तीय अपराध ही नहीं बल्कि ड्रग्स सप्लाई, मानव तस्करी, सोने की तस्करी और दुनिया भर के आतंकी संगठनों तक पैसा पहुँचाने का काम भी कर रहा था।

इस बड़े काले कारोबार का खुलासा डार्क वेब की निगरानी के दौरान हुआ। साइबर सेंटर की तकनीकी टीम लगातार डार्क वेब पर नजर रख रही थी। ब्लॉकचेन जाँच के दौरान एक भारतीय IP एड्रेस सामने आया, जो artemislabs.cc नाम की वेबसाइट से सीधे डिजिटल पैसे ले रहा था। यह वेबसाइट डार्क वेब की बड़ी अवैध ड्रग्स मार्केट मानी जाती है।

डिजिटल ट्रांजैक्शन और खातों की जाँच करते हुए पुलिस अहमदाबाद के दानिलिम्दा इलाके तक पहुँची। जाँच में पता चला कि यह संदिग्ध क्रिप्टो वॉलेट अहमदाबाद निवासी मोहसिन सादिक मुलानी का था। उसके डिजिटल रिकॉर्ड और लेनदेन की गहराई से जाँच की गई तो देश के अलग-अलग हिस्सों से जुड़े 9 और संदिग्ध वॉलेट सामने आए।

DGP डॉ के लक्ष्मी नारायण राव और DIG बिपिन अहीर के मार्गदर्शन में यह बड़ा ऑपरेशन चलाया गया। इसके बाद साइबर सेंटर के SP डॉ राजदीपसिंह झाला, संजय केशवाला और विवेक भेड़ा की अगुवाई में 10 फील्ड टीमें और 3 तकनीकी खुफिया यूनिट्स बनाई गईं। करीब साढ़े चार महीने तक चले अभियान के बाद पुलिस ने पूरे गिरोह को पकड़ लिया।

जाँच से हमास से संबंध का खुलासा हुआ

इस मामले में सबसे बड़ा खुलासा तब हुआ जब जब्त किए गए क्रिप्टो अकाउंट्स का संबंध गाजा के आतंकी संगठन हमास के अल-काहिरा नेटवर्क से जुड़ा मिला। साल 2025 में इजरायल सरकार ने अदालत के आदेश पर उन क्रिप्टो खातों को ब्लैकलिस्ट किया था, जिनसे तुर्की के रास्ते हमास को पैसा भेजा जा रहा था।

जाँच में पता चला कि वही प्रतिबंधित खाते इस मामले के मुख्य आरोपित मोहम्मद जुबैर पोपटिया तक पैसा पहुँचा रहे थे। जाँच आगे बढ़ने पर जुबैर पोपटिया के वॉलेट से अमेरिकी न्याय विभाग और OFAC द्वारा प्रतिबंधित आतंकी नेटवर्कों के साथ सीधे लेनदेन मिलने लगे।

इस नेटवर्क का संबंध यमन के हाउथी आतंकियों, ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (IRGC-QF) और रूस के प्रतिबंधित क्रिप्टो एक्सचेंज गारेंटेक्स से भी मिला। जुबैर इन आतंकी फंड्स को भारतीय वॉलेट्स में ट्रांसफर करता था, फिर कई हिस्सों में बाँटकर हवाला नेटवर्क के जरिए नकदी में बदल देता था।

जाँच एजेंसियों से बचने के लिए गिरोह ने सामान्य क्रिप्टोकरेंसी की जगह मोनरो जैसी बेहद गुप्त डिजिटल करेंसी का इस्तेमाल किया। मोनरो में भेजने वाले, पैसा लेने वाले और रकम की जानकारी छिपी रहती है। पुलिस ने ऐसे दो खास मोनरो वॉलेट जब्त किए हैं, जिनमें 193 करोड़ रुपए से ज्यादा के संदिग्ध लेनदेन मिले हैं।

कुल रकम का 40 प्रतिशत हिस्सा अवैध क्रिप्टो से आया

वरिष्ठ साइबर अधिकारियों के मुताबिक 226 करोड़ रुपए के इस पूरे नेटवर्क में करीब 30 से 40 प्रतिशत पैसा ड्रग्स, तस्करी और आतंकी गतिविधियों से आया था। बाकी रकम पीयर-टू-पीयर ट्रेडिंग, फ्यूचर्स ट्रेडिंग और हवाला नेटवर्क के जरिए सिस्टम में घुमाई गई थी।

यह गिरोह ऑनलाइन और डिजिटल फ्रॉड के जरिए आम लोगों से भी पैसे ठगता था। जिन बैंक खातों का इस्तेमाल क्रिप्टो को नकदी में बदलने के लिए किया गया, वे राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल (NCCRP) में दर्ज 935 साइबर फ्रॉड FIR से जुड़े मिले। यानी भारतीयों से ठगा गया पैसा भी इस नेटवर्क के जरिए ड्रग्स और आतंकवाद तक पहुँचाया गया।

यह पूरा नेटवर्क कब शुरू हुआ?

इस आपराधिक नेटवर्क की शुरुआत कोविड-19 के बाद हुई थी। भारत में साथ रहने के दौरान मोहम्मद जुबैर पोपटिया, सलमान अंसारी और मोहसिन मुलानी ने मिलकर ब्रिटेन के ड्रग मार्केट में क्रिप्टोकरेंसी और USDT स्टेबलकॉइन के जरिए बड़ा अवैध कारोबार शुरू करने की योजना बनाई।

धीरे-धीरे इस गिरोह ने अहमदाबाद, मुंबई, दुबई और लंदन तक अपना नेटवर्क फैला लिया। गिरोह का काम करने का तरीका बेहद प्रोफेशनल था। अहमदाबाद में बैठा मोहसिन मुलानी एन्क्रिप्टेड टेलीग्राम चैनलों और डार्क वेब फोरम के जरिए ब्रिटिश ग्राहकों से ड्रग्स के ऑर्डर लेता था।

इसके बाद जानकारी दुबई में बैठे सरगना जुबैर पोपटिया और ब्रिटेन में लॉजिस्टिक्स संभाल रहे सलमान अंसारी को भेजी जाती थी। फिर ड्रग्स को ब्रिटेन के कूरियर नेटवर्क और रॉयल पार्सल सर्विसेज के जरिए ग्राहकों तक पहुँचाया जाता था और भुगतान क्रिप्टो वॉलेट में लिया जाता था।

सलमान अंसारी को ब्रिटिश अदालत ने सजा सुनाई थी

जाँच में यह भी सामने आया कि अक्टूबर 2024 में ब्रिटेन की अदालत ने सलमान अंसारी को ड्रग्स तस्करी और मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में 6 साल की सजा सुनाई थी। लेकिन खुफिया रिपोर्ट और डिजिटल सबूत बताते हैं कि सलमान मार्च 2026 तक ब्रिटेन की हाई सिक्योरिटी जेल के अंदर से ही टेलीग्राम और दूसरे डिजिटल माध्यमों से पूरे नेटवर्क को चला रहा था।

ब्रिटेन के ड्रग कारोबार से कमाया गया पैसा अंतरराष्ट्रीय हवाला और गुजरात के अंगड़िया नेटवर्क के जरिए अहमदाबाद भेजा जाता था। मोहसिन मुलानी यह रकम लेकर सलमान के जेल में बंद पिता गुलाम सादिक अंसारी तक पहुँचाता था। गुलाम सादिक इस सिंडिकेट का कैश एंकर था और वह इस पैसे को प्रॉपर्टी और दूसरे वैध कारोबारों में लगाता था।

साइबर सेंटर ऑफ एक्सीलेंस की जाँच में यह भी पता चला कि डिजिटल युग और क्रिप्टोकरेंसी आने से पहले यानी 2016 से 2021 के बीच आरोपित वेस्टर्न यूनियन जैसी मनी ट्रांसफर सर्विस (MTSS) के जरिए विदेशों से पैसा मँगाते थे। इस दौरान करीब 9 देशों से 80 लाख रुपए से ज्यादा के लेनदेन की जाँच भी पुलिस कर रही है।

अब तक कुल 9 आरोपितों को गिरफ्तार किया गया

गुजरात पुलिस ने इस ऑपरेशन में अब तक 9 मुख्य आरोपितों को गिरफ्तार किया है। गिरफ्तार लोगों में अहमदाबाद के मोहम्मद सादिक मुलानी, ऐजाज असलम खान पठान, मोहम्मद जैद सिद्दीकी, नावेद अयूब खान पठान, फैज अहमद चिश्ती, सलमान हबीब खान पठान और गुलाम सादिक अंसारी शामिल हैं।

इसके अलावा मुंबई के जीशान सिराज मोतीवाला और हरियाणा के करनाल निवासी लवप्रीत सिंह को भी पकड़ा गया है। सभी आरोपितों पर IPC की धारा 111, 153 और 61 के साथ IT Act 2008 की गंभीर धाराओं में केस दर्ज किया गया है।

इन पर देश की आंतरिक सुरक्षा को खतरे में डालने और आतंकी साजिश में शामिल होने के आरोप लगाए गए हैं। मामले का मुख्य आरोपित मोहम्मद जुबैर पोपटिया फिलहाल दुबई में बताया जा रहा है और उसे भारत लाने के लिए प्रत्यर्पण प्रक्रिया शुरू कर दी गई है।

पुलिस और केंद्रीय एजेंसियाँ इस नेटवर्क से जुड़ी करोड़ों रुपए की बेनामी संपत्तियों और बैंक खातों को जब्त करने की कार्रवाई कर रही हैं। आने वाले दिनों में और गिरफ्तारियाँ होने की संभावना है।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट गुजराती में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

पाकिस्तानी ने एडिट किया ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ का Wikipedia पेज? PAK-बांग्लादेशी फॉलोअर्स के आरोपों के बीच ‘साउथ एशियन’ लेखक पर भी सवाल

कॉन्ग्रेस पार्टी द्वारा नोएडा में औद्योगिक मजदूरों के विरोध प्रदर्शन के हिंसक होने पर भारत में ‘हलचल’ शुरू होने की बात कहकर खुशी जताने के कुछ हफ्तों बाद, BJP विरोधी राजनीतिक दलों को अब नेपाल या बांग्लादेश जैसी Gen-Z ‘क्रांति’ भड़काने की एक नई उम्मीद मिल गई है।

‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) नाम की इस तथाकथित ‘क्रांति’ ने सोशल मीडिया पर अचानक तेजी से लोकप्रियता हासिल की है। हालाँकि, सामने आया है कि इंस्टाग्राम से लेकर विकिपीडिया तक, CJP के कई ‘तिलचट्टे’ यानी समर्थकों में पाकिस्तानी और बांग्लादेशी लोगों और बॉट्स की भी बड़ी मौजूदगी है।

16 मई 2026 को भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अदालत में बेरोजगार युवाओं, वकीलों, पत्रकारों और RTI एक्टिविस्ट्स पर की गई टिप्पणी के जवाब में व्यंग्य (सटायर) के तौर पर बनाई गई ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ का अब अपना विकिपीडिया पेज भी बन चुका है।

हालाँकि, CJP के अंग्रेजी विकिपीडिया पेज को एडिट करने वालों में एक कथित पाकिस्तानी व्यक्ति का नाम सामने आया है। इस पेज को काफी हद तक सलीम बिन यूसुफ नाम के एक यूजर ने एडिट किया जिसने अपने विकिपीडिया लेखक प्रोफाइल में खुद को ‘कश्मीर, दक्षिण एशिया’ का निवासी बताया है।

यह बात पहले भी सामने आती रही है कि कई पाकिस्तानी लोग अपनी पहचान छिपाने के लिए ‘साउथ एशिया’ का इस्तेमाल करते हैं। ऐसा या तो अपनी राष्ट्रीयता छिपाने के लिए किया जाता है या फिर भारतीय बनकर भारत के सामाजिक और राजनीतिक मामलों में दखल देने के लिए। नोएडा हिंसा के दौरान भी यह देखा गया था कि कई पाकिस्तानी X (पूर्व ट्विटर) यूजर्स ने हिंदू नामों वाले अकाउंट बनाकर और लोकेशन में ‘दक्षिण एशिया’ लिखकर खुद को भारतीय दिखाने की कोशिश की थी ताकि भारत में माहौल बिगाड़ा जा सके।

भारतीय बनकर सोशल मीडिया पर सक्रिय होने, मुद्दों को हवा देने, समाज में मौजूद मतभेदों का फायदा उठाने, लोगों की राय प्रभावित करने और हिंसा भड़काने की ऐसी घटनाओं को देखते हुए यह अटकलें लगाई जा रही हैं कि सलीम बिन यूसुफ पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर (PoJK) का निवासी हो सकता है।

हालाँकि, यह संभावना भी जताई जा रही है कि यूसुफ कश्मीर का रहने वाला हो और अलगाववादी विचारधारा का समर्थक हो।

फिलहाल, यूसुफ को आंशिक रूप से ब्लॉक कर दिया गया है और अब उसका नाम ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के विकिपीडिया ‘रिवीजन हिस्ट्री’ में दिखाई नहीं देता। CJP के टॉक पेज के अनुसार, 21 मई को सलीम बिन यूसुफ और अन्य एडिटर्स के बीच CJP के लोगो को बार-बार बदले जाने को लेकर चर्चा भी हुई थी।

इससे पहले भी सलीम बिन यूसुफ द्वारा बनाए गए कई पेज और किए गए कई एडिट्स को हटाने (डिलीट) के लिए नॉमिनेट किया जा चुका है। इनमें कई कश्मीरियों से जुड़े पेज और एडिट्स शामिल हैं। इसके अलावा, गवर्नमेंट डेंटल कॉलेज श्रीनगर, श्री महाराजा हरि सिंह अस्पताल और पाकिस्तान की कई चर्चित हस्तियों से जुड़े पेज भी इसमें शामिल रहे हैं।

CJP और इसके पाकिस्तानी, बांग्लादेशी व तुर्की के इंस्टाग्राम फॉलोअर्स?

CJP को BJP विरोधी राजनीतिक दलों का तेजी से समर्थन मिल रहा है। इनमें कई पूर्व मुख्यमंत्री, मौजूदा सांसद जैसे महुआ मोइत्रा और BJP विरोधी राजनीति करने वाले चेहरे शामिल हैं। ऐसे दलों द्वारा खुद को ‘एंटी-एस्टैब्लिशमेंट’ बताने वाले किसी तथाकथित आंदोलन का समर्थन करना कोई नई बात नहीं है। लेकिन मामला तब गंभीर हो जाता है, जब भारत के विरोधी पड़ोसी देशों की कथित भूमिका और समर्थन के आरोप सामने आने लगें।

सोशल मीडिया पर कई यूजर्स ने स्क्रीनशॉट और रिकॉर्डिंग साझा कर दावा किया है कि कॉकरोच जनता पार्टी के इंस्टाग्राम फॉलोअर्स की संख्या में आई अचानक भारी बढ़ोतरी पूरी तरह ‘ऑर्गेनिक’ नहीं है। हालाँकि, CJP के संस्थापक अभिजीत दिपके ने इन दावों को खारिज करते हुए कहा है कि उनके 94% फॉलोअर्स भारत से हैं।

इसके बावजूद, कई लोगों का दावा है कि CJP के करीब 2 करोड़ (20 मिलियन) फॉलोअर्स में पाकिस्तानी, बांग्लादेशी और तुर्की अकाउंट्स की संख्या भी काफी ज्यादा है।

CJI सूर्यकांत की टिप्पणी पर सटायर से शुरू हुई CJP, बनी BJP विरोधी प्रयोगशाला?

CJP का इंस्टाग्राम हैंडल तेजी से लोकप्रिय हुआ और X (पूर्व ट्विटर) पर भी चर्चा का विषय बन गया। लेकिन जल्द ही उसका ‘निष्पक्ष’ होने का दावा कमजोर पड़ता दिखा जब कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दिपके का बीजेपी विरोधी एजेंडा सामने आने लगा।

कई लोगों के मन में सवाल उठा कि एक ऐसा मंच जो CJI सूर्यकांत जैसे गैर-राजनीतिक व्यक्ति की टिप्पणी पर व्यंग्य के रूप में शुरू हुआ तो वह अचानक बीजेपी के साथ इंस्टाग्राम फॉलोअर्स की होड़ का दावा करने और फिर पूरी तरह बीजेपी विरोधी राजनीतिक मंच में कैसे बदल गया?

इस सवाल का जवाब CJP के संस्थापक अभिजीत दिपके की राजनीतिक पृष्ठभूमि में मिलता है। दिपके फिलहाल अमेरिका में रहते हैं और बॉस्टन यूनिवर्सिटी में पढ़ाई कर रहे हैं। खुद को गैर-राजनीतिक और नाराज Gen-Z युवा के रूप में पेश करने की कोशिश के बावजूद यह किसी ने छिप ना सका कि उनका संबंध आम आदमी पार्टी (AAP) के चुनावी और सोशल मीडिया अभियानों से जुड़ा रहा है।

2020 के दिल्ली विधानसभा चुनाव के दौरान एक मीडिया रिपोर्ट में उन्हें पुणे के 23 वर्षीय ऐसे युवक के रूप में बताया गया था जो AAP के सोशल मीडिया बदलाव के पीछे का चेहरा था। रिपोर्ट में कहा गया था कि AAP, अरविंद केजरीवाल को प्रमोट करने और BJP-कॉन्ग्रेस पर हमला करने के लिए बढ़िया वन-लाइनर, पैरोडी वीडियो, छोटे क्लिप और मीम्स का इस्तेमाल कर रही थी।

अभिजीत दिपके ने उस दौरान कहा था कि मिलेनियल्स और पहली बार वोट देने वालों तक राजनीतिक संदेश पहुँचाने के लिए मीम्स और वीडियो के जरिए बात को सरल बनाना जरूरी है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया था कि वह AAP के IT मीडिया प्रमुख अंकित लाल को रिपोर्ट करते थे।

कुछ विश्लेषणों में दावा किया गया है कि हास्य और व्यंग्य के पीछे CJP विपक्षी राजनीतिक नैरेटिव को आगे बढ़ाता है, जिसमें न्यायपालिका, चुनाव आयोग, कॉर्पोरेट जगत, मीडिया और दल बदलने वाले नेताओं को निशाना बनाया जाता है। हाल के वर्षों में पाकिस्तान के कॉन्ग्रेस और अन्य बीजेपी विरोधी दलों के प्रति सहानुभूति दिखाने की चर्चाएँ भी होती रही हैं।

(यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं)

जिस जगह श्रीकृष्ण ने पढ़ाया सद्भाव का पाठ, उस मथुरा में क्यों फैलाया जा रहा जातीय भेदभाव: कौन हैं नरहौली में समाज को बाँटने वाले ‘कंस’, फैला रहे प्रोपेगेंडा

मथुरा जिले के नरहौली गाँव में 21 मई 2026 की रात एक शादी होनी थी। लेकिन शादी के बजाय माहौल को इस कदर अराजक बना दिया गया कि समाज दो फाड़ हो गया। ये घटना गुस्से में नहीं बल्कि जानबूझकर और सुनियोजित तरीके से अंजाम दी गई। उद्देश्य था- क्षेत्र के दो समुदायों को आपस में भिड़ाकर हिंदुओं में मनमुटाव पैदा करना।

बरसाना के भरना कलां गाँव के रहने वाले नेमचंद के दो बेटे अशोक और कुलदीप अपनी बारात लेकर नरहौली पहुँचे थे। यहाँ भगवान दास उर्फ बुल्ला की दो बेटियाँ लक्ष्मी और पूनम उनसे विवाह करने वाली थीं। दोनों दलित (जाटव) परिवार थे। लेकिन जैसे ही बारात ठाकुर बाहुल्य इलाके से गुजरी, कुछ अराजक तत्वों ने उन्हें रोकने की कोशिश की।

मामला यहाँ रुका नहीं बल्कि पत्थरबाजी शुरू हो गई, मारपीट हुई, महिलाओं और बच्चों पर हमला हुआ। आरोप है कि बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर की तस्वीर तक तोड़ दी गई। 70 वर्षीय एक महिला घायल हुई।

पुलिस पहुँची तो दोनों पक्ष आमने-सामने आ गए। एसडीएम, इंस्पेक्टर और चौकी इंचार्ज तक चोटिल हुए। महिलाओं ने लाठियाँ लेकर पुलिस पर धावा बोल दिया। शादी की जगह पूरा गाँव रणभूमि में बदल गया।

19 घंटे तक शादी रुकी रही। भारी पुलिस बल, सीआरपीएफ और पीएसी की तैनाती के बाद 22 मई शाम को सात फेरे पूरे कराए गए। बाराती भूखे-प्यासे लौटे, खाना बर्बाद हो गया। पूरा गाँव दहशत और तनाव में डूबा रहा।

एसएसपी श्लोक कुमार ने क्राइम ब्रांच ने जाँच के आदेश दिए। दोनों पक्षों से सैकड़ों लोगों पर एफआईआर दर्ज हुईं। यह घटना मथुरा जैसे संवेदनशील क्षेत्र में जातीय सद्भाव को चोट पहुँचाने के लिए काफी थी।

हालाँकि इससे ज्यादा यह बताती है कि कुछ बाहरी ताकतें छोटी-छोटी घटनाओं को जातीय रंग देकर समाज को किस कदर बाँटने पर तुले हैं।

हमेशा से ही जातीय संवेदनशीलता का केंद्र रहा मथुरा

मथुरा और ब्रज क्षेत्र केवल भगवान कृष्ण की लीला भूमि नहीं है। यह लंबे समय से जातीय तनावों का गढ़ रहा है। छोटी-छोटी बातें जैसे घोड़े पर चढ़ना, डीजे बजाना, रास्ता या संगीत बड़े संघर्ष में बदल जाती हैं।

2016 में चामुहा गांव में पानी के बँटवारे को लेकर दलित और ठाकुर समुदाय में हिंसक झड़प हुई थी। दो लोग घायल हुए। 2025 में होली के मौके पर जाटव और ठाकुरों के बीच रंग फेंकने को लेकर बवाल हुआ। 74 लोगों पर मुकदमा दर्ज हुआ, पत्थर चले, लाठियाँ चलीं और आगजनी की घटनाएँ हुईं।

फरवरी 2025 में मथुरा के भुरेका गाँव में एक दलित दूल्हे को बग्गी पर चढ़ने पर हमला किया गया। 25-30 ठाकुर/जाट युवकों ने बारात रोकी, दूल्हे को घसीटा, जातिसूचक गालियाँ दीं और डीजे तोड़ दिया।

इसी साल करनावल गाँव में दो दलित बहनों की शादी ट्रैफिक विवाद में फँस गई। यदव समुदाय के लोगों ने बारातियों पर हमला किया, दुल्हनों को घसीटा और शादी रद्द कर दी गई। भीम आर्मी पार्टी के मुखिया चंद्रशेखर आजाद ने इसे ‘दलितों पर योजनाबद्ध आतंक’ बताया।

2017 का सहारनपुर कांड तो पूरे देश में चर्चित रहा। महाराणा प्रताप शोभा यात्रा के दौरान ठाकुरों और दलितों में टकराव हुआ। 25 दलितों के घर जलाए गए। ऐसी घटनाएँ मथुरा, सहारनपुर, आगरा, अलीगढ़ में बार-बार दोहराई जाती हैं।

2025 में आगरा में एक दलित दूल्हे को घोड़े से उतारकर पीटा गया। अलवर और दमोह में भी इसी तरह की घटनाएं हुईं जहां दूल्हे को घोड़े पर चढ़ने का अधिकार छीना गया।

ये उदाहरण साफ दिखाते हैं कि मथुरा में जातीय संवेदनशीलता नई नहीं। लेकिन हर बार छोटी घटना को बड़ा चेहरा देकर कुछ तत्व राजनीतिक फायदा उठाते हैं।

इतिहास सिखाता है कि ऐसे संघर्ष किसी की जीत नहीं लाते। वे पूरे गांव को आर्थिक, सामाजिक और भावनात्मक रूप से कमजोर करते हैं। पर्यटन, कृषि और रोजगार पर असर पड़ता है।

नरहौली घटना में साजिश की परतें

नरहौली गाँव की इस घटना में विदाई में दुल्हनें रो पड़ीं। उनका ये कहते हुए वीडियो वायरल हुआ कि ‘किसी की शादी में ऐसा न हो।’ दलित पक्ष ने आरोप लगाया कि ठाकुरों ने पहले पत्थर मारे, महिलाओं पर हमला किया, घरों में घुसकर सामान तोड़ा और बाबा साहेब की तस्वीर ईंटों से कुचल दी।

सोशल मीडिया पर दोनों पक्षों के एक-दूसरे पर आरोप लगाने के वीडियो सामने आए। कुछ संगठनों ने इसे ‘ठाकुर आतंक’ बताया। लेकिन सच्चाई यह है कि यह छोटा विवाद था, जिसे जातीय रंग देकर बड़ा बनाया गया।

पुलिस ने दोनों पक्षों पर सैकड़ों एफआईआर दर्ज कीं। सीसीटीवी फुटेज से दोषी पहचाने जा रहे हैं। लेकिन सवाल यह है-कौन सी ताकतें इस छोटी घटना को पूरे समाज में अविश्वास फैलाने का हथियार बना रही हैं?

समाज में अविश्वास के बीज और विभाजन की साजिश

नरहौली की घटना बताती है कि कुछ अराजक तत्व जानबूझकर छोटी बात को जातीय युद्ध में बदलना चाहते हैं। वीडियो वायरल करना, आरोप-प्रत्यारोप, बाहरी संगठनों का हस्तक्षेप-ये सद्भाव तोड़ते हैं।

ग्रामीण क्षेत्रों में जहाँ लोग रोज खेती-मजदूरी में साथ काम करते हैं, वहाँ ऐसे बवाल से पूरा गाँव प्रभावित होता है। पानी का बँटवारा, रास्ते, स्कूल, अस्पताल-सब साझे मुद्दे हैं। लेकिन अविश्वास बढ़ने से विकास रुक जाता है। इसके अलावा युवा पीढ़ी नफरत सीखती है। मथुरा जैसे पर्यटन और कृषि वाले क्षेत्र में यह घातक है।

गाँव की जिंदगी में दलित, क्षत्रिय, पिछड़े सभी एक-दूसरे पर निर्भर हैं। किसान मजदूरों की मदद लेते हैं। मजदूर किसानों के खेतों पर काम करते हैं। शादी-ब्याह में एक-दूसरे की मदद चाहिए। फसल कटाई, त्योहार, आपदा समेत हर सुख-दुःख में सहयोग जरूरी है।

अब बात आती है कि नरहौली जैसे गाँव में अगर बदला बढ़ा तो खेती कैसे चलेगी? मजदूरी कौन करेगा? बच्चे स्कूल कैसे जाएँगे? जिम्मेदार लोग-पंच, सरपंच, बुजुर्ग, दोनों समुदायों के प्रतिनिधि-बैठकर बात करें। प्रशासन से पहले खुद समाधान निकालें। बाहरी हस्तक्षेप समस्या बढ़ाता है, हल नहीं।

भीम आर्मी जैसे संगठनों के उकसावे और बाँटने का खेल

भीम आर्मी जैसी संस्थाएँ दलित अधिकारों की बात तो करती हैं, लेकिन उनके तरीके अक्सर समाज को बाँटने वाले साबित होते हैं। 2017 के सहारनपुर कांड में भीम आर्मी ने महाराणा प्रताप यात्रा के विवाद को बड़ा बनाया। दलित-ठाकुर टकराव हुआ, 25 घर जलाए गए।

भीम आर्मी ने महापंचायत बुलाई, प्रदर्शन किए जो पुलिस-दलित झड़प में बदल गए। आरोप लगा कि वे उकसावा फैलाते हैं, छोटी- छोटी घटनाओं को जातीय युद्ध बना देते हैं। चंद्रशेखर आजाद ने कई बार दलितों को ‘ठाकुरों के खिलाफ एकजुट’ होने का आह्वान किया, जिसकी वजह से नफरत बढ़ी।

मथुरा में भी हाल की घटनाओं (भुरेका, करनावल) में भीम आर्मी नेता पहुँचे, मुआवजे की माँग की, लेकिन स्थानीय संवाद की बजाय उग्रता फैलाई गई। नरहौली जैसी घटना में अगर वे तुरंत हस्तक्षेप करते हैं तो स्थिति और बिगड़ती है।

मथुरा में भी बवाल होते ही भीम आर्मी के नेता घटनास्थल पर पहुँच गए। (साभार- अमर उजाला)

वे दलित युवाओं को बताते हैं कि ऊपरी जातियाँ दुश्मन हैं। लेकिन हकीकत यह है कि वे राजनीतिक फायदा उठाते हैं। वोट बैंक बनाते हैं। छोटे विवाद को ‘दलित उत्पीड़न’ का चेहरा देकर सोशल मीडिया पर वायरल करते हैं।

इसका नतीजा ये निकलता है कि गाँव में स्थायी दुश्मनी पैदा होती है और क्षेत्र के पुलिस-प्रशासन पर दबाव बढ़ता है। इससे कहीं न कहीं विकास भी प्रभावित होता है।

भीम आर्मी जैसे संगठन दलितों की आवाज बनने का दावा करते हैं, लेकिन असल में वे उन्हें ऊपरी जातियों के खिलाफ खड़ा करके अपना राजनीतिक साम्राज्य बनाते हैं। यह समाज को बांटने का खेल है।

एकता ही प्रगति, बँटवारा नहीं

नरहौली की घटना ने दिखाया कि कुछ तत्व समाज को बाँटने के लिए बीज बो रहे हैं। लेकिन मथुरा का इतिहास सिखाता है कि सद्भाव से ही प्रगति होती है। दलित और क्षत्रिय-दोनों भाई हैं। ग्रामीण जीवन में उनका सहयोग अनिवार्य है।

भीम आर्मी जैसे संगठनों से सतर्क रहें, न कि उनके उकसावे में आएँ। जिम्मेदार लोग आगे आएँ, संवाद करें, समझें और सख्ती बरतें। समाज को बांटने वाले बीजों को उखाड़ फेंकें। नरहौली की दुल्हनों के आंसू हमें याद दिलाते हैं-शांति ही सबसे बड़ी शादी है। एकता से ही मथुरा, उत्तर प्रदेश और पूरा देश आगे बढ़ेगा।

जहाँ पहले होते थे दंगे-हत्या, उस UP में कानून-व्यवस्था की बेहतर हुई तस्वीर: NCRB 2024 के आँकड़ों में दिखा बंगाल-तमिलनाडु-केरल-पंजाब से बेहतर माहौल

कुछ समय पहले तक उत्तर प्रदेश का नाम लिया जाता था तो साथ ही इसे एक असुरक्षित प्रदेश के तौर पर भी याद किया जाता था। यहाँ दंगे, अराजकता, हत्या और महिलाओं के लिए सिर्फ असुरक्षा का माहौल था। हालाँकि योगी सरकार के शासन में कानून व्यवस्था की तस्वीर काफी हद तक बदली है।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की 2024 ‘भारत में अपराध’ (Crime in India 2024) रिपोर्ट में उत्तर प्रदेश की एक अलग और अधिक संतुलित तस्वीर सामने आती है। यह रिपोर्ट बताती है कि राज्य ने अपराध दर, चार्जशीटिंग, पुलिस-कार्रवाई और सुरक्षा समेत कई प्रमुख सूचकांकों पर उल्लेखनीय सुधार किया है।

यहाँ ये समझना जरूरी है कि किसी राज्य की कानून-व्यवस्था का मूल्यांकन केवल दर्ज मामलों की संख्या से नहीं किया जा सकता। देश के बड़े राज्यों में शिकायत दर्ज करने के प्रति जागरूकता, पुलिस तक पहुँच, जनसंख्या का आकार, शहरीकरण और रिपोर्टिंग की संस्कृति भी महत्वपूर्ण होती है।

उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में जनसंख्या बहुत अधिक है। वहाँ अपराधों की दर, जाँच की गुणवत्ता, चार्जशीट दाखिल करने की गति और पुलिस निपटान जैसे संकेतक ज्यादा मायने रखते हैं। NCRB 2024 के आंकड़े इन क्षेत्रों में उत्तर प्रदेश के बेहतर प्रदर्शन की ओर इशारा करते हैं।

समग्र अपराध दर में उत्तर प्रदेश की स्थिति

NCRB की रिपोर्ट के अनुसार, 2024 में देशभर में कुल 35,44,608 IPC/BNS अपराध दर्ज हुए। राष्ट्रीय स्तर पर यह दर 252.3 प्रति लाख जनसंख्या रही। इसके मुकाबले उत्तर प्रदेश की अपराध दर 180.2 प्रति लाख रही, जो राष्ट्रीय औसत से काफी कम है।

1981 से 2024 के बीच हुए अपराध के आँकड़े (NCRB)

यह तथ्य अपने आप में अहम है, क्योंकि राज्य की आबादी देश में सबसे अधिक होने के बावजूद अपराध दर का राष्ट्रीय औसत से नीचे रहना प्रशासनिक और पुलिस व्यवस्था की बेहतर स्थिति को दिखाता है।

उत्तर प्रदेश में 2024 के दौरान कुल 4,30,552 IPC/BNS अपराध दर्ज हुए, जबकि 2023 में यह संख्या 4,28,794 थी। संख्या में बहुत बड़ा उछाल नहीं है, लेकिन दर के आधार पर देखें तो स्थिति स्थिर और नियंत्रित दिखाई देती है।

अपराध दर्ज होने की बढ़त को हमेशा कानून-व्यवस्था की गिरावट नहीं माना जा सकता, क्योंकि कई बार यह बेहतर रिपोर्टिंग, ज्यादा जागरूकता और पुलिस व्यवस्था तक आसान पहुँच का संकेत भी होती है।

यह भी उल्लेखनीय है कि अपराध की संख्या के साथ-साथ जाँच और अभियोजन की गुणवत्ता भी महत्वपूर्ण होती है। उत्तर प्रदेश की चार्जशीटिंग दर 76.7% रही, जो राष्ट्रीय औसत 72.1% से बेहतर है।

इसका अर्थ यह है कि राज्य की पुलिस दर्ज मामलों में अपेक्षाकृत अधिक प्रभावी ढंग से जाँच पूरी कर मामलों को अदालत तक पहुँचा रही है। यही कारण है कि उत्तर प्रदेश को केवल अपराध के आँकड़ों से नहीं, बल्कि पुलिस की दक्षता और प्रक्रिया-आधारित सुधारों के आधार पर भी परखा जाना चाहिए।

अन्य राज्यों से बेहतर स्थिति

उत्तर प्रदेश के प्रदर्शन को समझने के लिए इसका तुलना केरल, तमिलनाडु, पंजाब और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों से कर सकते हैं। 2024 में तमिलनाडु में 1,97,149 अपराध दर्ज हुए और अपराध दर 255.5 रही। ये उत्तर प्रदेश से अधिक है। केरल में दर 513.0 तक पहुँची जो उत्तर प्रदेश से लगभग तीन गुना है।

पंजाब और पश्चिम बंगाल की दरें कुछ मामलों में कम दिखती हैं, लेकिन उत्तर प्रदेश की चार्जशीटिंग दर और व्यापक पुलिस-प्रभावशीलता इन राज्यों से कई मानकों पर बेहतर दिखाई देती है। केरल जैसे छोटे और अधिक शहरीकृत राज्य में दर्ज अपराध दर का ऊँचा होना यह दिखाता है कि जनसंख्या घनत्व, रिपोर्टिंग की आदत और सामाजिक संरचना भी आँकड़ों को प्रभावित करता है।

उत्तर प्रदेश की खासियत यह है कि इतनी अधिक जनसंख्या, अलग-अलग सामाजिक-आर्थिक स्थितियों और बड़े प्रशासनिक ढाँचे के बावजूद वहाँ अपराध दर नियंत्रण में रही। इसी कारण यह कहना उचित होगा कि उत्तर प्रदेश ने कम-से-कम कुछ प्रमुख संकेतकों में दूसरे बड़े राज्यों की तुलना में बेहतर संतुलन बनाया है।

पश्चिम बंगाल और पंजाब के साथ तुलना करते समय भी एक अहम बात सामने आती है। केवल कुछ कैटेगरी में ही कम संख्या होना पर्याप्त नहीं होता। पुलिस कितनी तेजी से आरोपपत्र दाखिल करती है, कितने मामलों का निपटारा करती है, और कितनी प्रभावी जाँच करती है, यह भी उतना ही जरूरी है।

उत्तर प्रदेश की चार्जशीटिंग दर और पुलिस-डिस्पोजल प्रदर्शन यह दिखाते हैं कि राज्य पुलिस सिर्फ मामले दर्ज नहीं कर रही, बल्कि उन्हें निष्कर्ष तक भी पहुँचा रही है।

महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा

NCRB 2024 की रिपोर्ट में महिलाओं और बच्चों के खिलाफ अपराधों को लेकर कुछ सकारात्मक रुझान सामने आए हैं। उत्तर प्रदेश में कई प्रमुख श्रेणियों में गिरावट दर्ज की गई, जिनमें विशेष रूप से दहेज मृत्यु और अपहरण मामलों में भारी कमी शामिल है।

रिपोर्ट के अनुसार, दहेज मृत्यु के मामलों में 50.7% की गिरावट आई, जबकि अपहरण और किडनैपिंग मामलों में 62.8% की कमी दर्ज की गई। महिलाओं की सुरक्षा के संदर्भ में यह भी देखा जाना चाहिए कि उत्तर प्रदेश में महिला हेल्पडेस्क, 112 आपातकालीन प्रतिक्रिया प्रणाली, मिशन शक्ति, एंटी-रोमियो स्क्वॉड और बढ़ी हुई पेट्रोलिंग जैसी पहलों ने शिकायत-निवारण को अधिक सुलभ बनाया है।

जब शिकायत दर्ज करना आसान होता है और पुलिस प्रतिक्रिया तेज होती है, तो अपराधियों पर मनोवैज्ञानिक दबाव बढ़ता है। यही दबाव कई मामलों में दोबारा अपराध करने से रोकता है।

हालाँकि, ये बात भी सही है कि महिलाओं और बच्चों से जुड़े अपराधों में केवल दर्ज मामलों की संख्या देखकर पूरी तस्वीर नहीं बनती। कई बार बढ़ी हुई रिपोर्टिंग भी सकारात्मक परिवर्तन का संकेत होती है, क्योंकि पीड़ित अब अधिक आत्मविश्वास के साथ सामने आते हैं।

ऐसे में राज्य में दर्ज मामलों की संख्या का बढ़ना हमेशा नकारात्मक नहीं माना जा सकता। महत्वपूर्ण यह है कि शिकायत पर कितनी तेजी से कार्रवाई होती है, चार्जशीट कितनी जल्दी दाखिल होती है, और न्यायिक प्रक्रिया कितनी पारदर्शी रहती है।

बाल अपराध और किशोर न्याय

किशोरों से जुड़े मामलों में भी उत्तर प्रदेश की स्थिति कई अन्य राज्यों की तुलना में बेहतर दिखाई देती है। आँकड़ों के अनुसार, 2024 में उत्तर प्रदेश में 1,175 मामले दर्ज हुए और अपराध दर 1.4 प्रति लाख बाल जनसंख्या रही। यह राष्ट्रीय औसत 7.9 से काफी कम है। तुलना के लिए तमिलनाडु में यह दर 14.3 बताई गई है, जो उत्तर प्रदेश से कई गुना अधिक है।

किशोर अपराधों की कम दर यह बताती है कि राज्य में सामाजिक निगरानी, शिक्षा तंत्र, परिवार-समुदाय की भूमिका और पुलिस की प्रिवेंटिव पुलिसिंग में कुछ मजबूती है। बच्चों और किशोरों के लिए स्कूल-केंद्रित जागरूकता, पुनर्वास कार्यक्रम, बाल संरक्षण तंत्र और संवेदनशील थानों की मौजूदगी भी इस सुधार में योगदान देती है।

2023 की तुलना में 2024 में मामलों की संख्या कम होना भी इस दिशा में सकारात्मक संकेत है। जब किसी राज्य में किशोरों के मामले घटते हैं, तो इसका अर्थ केवल पुलिस की सख्ती नहीं, बल्कि सामाजिक ढाँचे में भी कुछ हद तक संतुलन का आना होता है। परिवारों, स्कूलों और स्थानीय संस्थानों की जागरूकता इस बदलाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

बुजुर्गों की सुरक्षा

वरिष्ठ नागरिकों के खिलाफ अपराधों में उत्तर प्रदेश का प्रदर्शन विशेष रूप से उल्लेखनीय है। आँकड़ें बताते हैं कि 2024 में राज्य में 379 मामले दर्ज हुए और अपराध दर 2.5 प्रति लाख रही। यह कई बड़े राज्यों की तुलना में काफी कम है।

इसी श्रेणी में उत्तर प्रदेश की चार्जशीटिंग दर 93.8% है, जो मजबूत अभियोजन और पुलिस की तत्परता को दिखाती है। वरिष्ठ नागरिकों की सुरक्षा केवल कानून-व्यवस्था का सवाल नहीं है, बल्कि सामाजिक संवेदनशीलता का भी मुद्दा है।

जब राज्य पुलिस ऐसे मामलों में तेज कार्रवाई करती है, तो यह समाज में यह संदेश देती है कि कमजोर और असुरक्षित वर्गों को प्राथमिकता दी जाएगी। उत्तर प्रदेश में हेल्पलाइन, बीट पुलिसिंग, वरिष्ठ नागरिक सहायता और स्थानीय स्तर पर निगरानी जैसी व्यवस्थाओं का लाभ इस क्षेत्र में दिखाई देता है।

तमिलनाडु और केरल जैसे राज्यों की तुलना में उत्तर प्रदेश के आँकड़े इसलिए भी उल्लेखनीय हैं क्योंकि बड़े और घने आबादी वाले राज्य में वरिष्ठ नागरिकों के लिए सुरक्षा बनाए रखना आसान नहीं होता। इसके बावजूद कम मामलों और अधिक चार्जशीटिंग दर यह दिखाते हैं कि पुलिस तंत्र इस वर्ग के प्रति अधिक सक्रिय है।

पर्यावरण संबंधी अपराध

पर्यावरण संबंधी अपराधों में भी उत्तर प्रदेश की स्थिति मजबूत बताई गई है। आँकड़ों के अनुसार, 2024 में 1,082 मामले दर्ज हुए और अपराध दर 0.5 प्रति लाख रही। यह राष्ट्रीय औसत से भी नीचे है। चार्जशीटिंग दर 94.6% बताई गई है, जो इस श्रेणी में काफी प्रभावी है।

2022 से 2024 के बीच हुए पर्यावरण संबंधी अपराध का आँकड़ा (NCRB)

यह श्रेणी अक्सर मुख्यधारा की चर्चा में कम आती है, लेकिन इसका महत्व बहुत अधिक है। जंगल कटाई, अवैध खनन, प्रदूषण, प्रतिबंधित पदार्थों का अनियंत्रित उपयोग और संबंधित कानूनों का उल्लंघन किसी राज्य की प्रशासनिक क्षमता को परखने का अच्छा पैमाना हैं। उत्तर प्रदेश में इस क्षेत्र में कम दर्ज मामले और ऊँची चार्जशीटिंग दर यह दिखाती है कि पर्यावरणीय उल्लंघनों पर भी सख्ती बरती जा रही है।

तमिलनाडु और केरल जैसी राज्यों में पर्यावरण संबंधी अपराधों की दर अधिक बताई गई है। इसका अर्थ यह नहीं है कि वहाँ केवल अपराध अधिक हैं, बल्कि यह भी कि रिपोर्टिंग और प्रवर्तन का पैटर्न अलग हो सकता है। फिर भी, उत्तर प्रदेश के आँकड़े इस बात की वकालत करते हैं कि राज्य में पर्यावरण कानूनों के पालन पर पर्याप्त ध्यान दिया गया है।

साइबर फ्रॉड और आर्थिक नुकसान करने अपराध

आज के समय में कानून-व्यवस्था को केवल पारंपरिक अपराधों तक सीमित नहीं रखा जा सकता। साइबर अपराध, आर्थिक धोखाधड़ी, नशीले पदार्थों से जुड़े मामले, शराब निषेध उल्लंघन और अन्य विशेष कानूनों के तहत अपराध भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।

NCRB रिपोर्ट और संबंधित रिपोर्टिंग के अनुसार, उत्तर प्रदेश ने इन क्षेत्रों में भी जाँच और प्रवर्तन को मजबूत बनाया है। साइबर अपराधों के मामले में देशभर में वृद्धि का रुझान देखा गया है, लेकिन उत्तर प्रदेश ने रिपोर्टिंग, हेल्पडेस्क, त्वरित दर्जीकरण और जाँच की व्यवस्था को बेहतर किया है।

2024 में राज्य में 11,073 साइबर अपराध दर्ज हुए, और चार्जशीटिंग दर लगभग 54% बताई गई। भले ही यह दर कुछ अन्य श्रेणियों की तुलना में कम हो, लेकिन राज्य इस नए तरह के अपराध से निपटने के लिए अपनी क्षमता लगातार बढ़ा रहा है।

आर्थिक अपराधों में भी यूपी पुलिस की सक्रियता बढ़ी है। ऑनलाइन शिकायत, डिजिटल ट्रैकिंग, बैंक-समन्वय, ठगी के मामलों में त्वरित प्रतिक्रिया और संपत्ति जब्ती के कदम यह दर्शाते हैं कि पुलिस अब पारंपरिक गश्त से आगे बढ़कर तकनीकी और वित्तीय जाँच की दिशा में भी काम कर रही है। SLL श्रेणी के अपराधों में भी, खासकर अवैध नशीले पदार्थों, शराब और प्रतिबंधित सामान के खिलाफ कार्रवाई में राज्य ने सख्ती दिखाई है।

पुलिस सुधार और प्रशासनिक दक्षता

उत्तर प्रदेश की कानून-व्यवस्था में आए सुधार केवल आँकड़ों का खेल नहीं हैं, बल्कि पुलिस सुधारों, तकनीक-आधारित निगरानी और शासन की प्राथमिकताओं का परिणाम हैं। ऑनलाइन FIR, महिला हेल्पडेस्क, 112 आपातकालीन सेवाएँ, CCTV विस्तार, एंटी-रोमियो स्क्वॉड, मिशन शक्ति और तेज चार्जशीटिंग जैसी पहलों ने पुलिस प्रणाली को अधिक उत्तरदायी बनाया है।

जब पुलिस शिकायतों का जवाब तेजी से देती है, तो आम नागरिक का भरोसा बढ़ता है। यही भरोसा कानून-व्यवस्था की असली ताकत बनता है। उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में इस भरोसे को बनाए रखना आसान नहीं है, लेकिन राज्य ने लगातार प्रशासनिक सुधारों के जरिए यह संकेत दिया है कि अपराधियों पर सख्ती और नागरिकों की सुरक्षा दोनों प्राथमिकताएँ हैं।

पुलिस निपटान, गिरफ्तारी, जब्ती और अभियोजन की बेहतर व्यवस्था यह बताती है कि सिस्टम केवल कागजी नहीं रह गया है। ऐसी व्यवस्था का असर यह होता है कि अपराध का संदेश समाज में जाता है और अपराधियों पर दबाव बनता है। यही कारण है कि कई श्रेणियों में उत्तर प्रदेश के आँकड़े अपेक्षाकृत नियंत्रित दिखाई देते हैं।

आँकड़ों की व्याख्या

किसी भी राज्य की कानून-व्यवस्था को समझने के लिए सिर्फ ‘कुल मामले’ देखना पर्याप्त नहीं होता। उदाहरण के लिए, उत्तर प्रदेश में कुल मामले अधिक दिख सकते हैं क्योंकि राज्य की जनसंख्या बहुत बड़ी है और शिकायत दर्ज करने की प्रणाली भी बेहतर हुई है। लेकिन प्रति लाख अपराध दर, चार्जशीटिंग दर और संवेदनशील वर्गों की सुरक्षा जैसी बातें भी कहीं अधिक महत्वपूर्ण हैं। इन्हीं पर उत्तर प्रदेश कई क्षेत्रों में बेहतर स्थिति में दिखाई देता है।

यह भी समझना जरूरी है कि कुछ राज्यों में अपराध दर अधिक होने का एक कारण बेहतर रिपोर्टिंग प्रणाली हो सकता है इसलिए तुलना हमेशा बहुआयामी होनी चाहिए। उत्तर प्रदेश की ताकत यह है कि वह बड़ी आबादी के साथ भी अपराध दर को राष्ट्रीय औसत से नीचे रखने में सफल रहा है और जांच-निपटान प्रक्रिया को भी मजबूत कर पाया है।

तमिलनाडु, केरल, पंजाब और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों से तुलना करने पर यह स्पष्ट होता है कि उत्तर प्रदेश ने सिर्फ बड़ी जनसंख्या का दबाव नहीं झेला, बल्कि पुलिस सुधार, नागरिक-केंद्रित सेवाएं और कड़े प्रवर्तन के जरिए अपराध नियंत्रण की दिशा में ठोस कदम उठाए हैं।

विशेष रूप से चार्जशीटिंग, निपटान और शिकायत-प्रतिक्रिया के मोर्चे पर राज्य ने अपनी प्रशासनिक क्षमता को मजबूत किया है। इसलिए, उत्तर प्रदेश की कानून-व्यवस्था को केवल समस्याओं के चश्मे से देखना उचित नहीं होगा। NCRB 2024 के आंकड़े यह दिखाते हैं कि राज्य अपराध नियंत्रण, पुलिस दक्षता और संवेदनशील वर्गों की सुरक्षा में लगातार आगे बढ़ रहा है। यही वह दिशा है जो ‘अपराध-मुक्त उत्तर प्रदेश’ की परिकल्पना को साकार करने में मदद करती है।

100 हत्याएँ, 28 रेप, 95 मंदिरों में तोड़फोड़ और ईशनिंदा… बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों पर नहीं थम रहा जुल्म: 2026 के शुरुआती 4 महीनों में 505 वारदातें, HRCBM रिपोर्ट में खुलासा

बांग्लादेश में हिंदू और अन्य अल्पसंख्यक समुदायों के खिलाफ जारी हिंसा को लेकर एक बेहद चौंकाने वाली और डराने वाली रिपोर्ट सामने आई है। प्रमुख मानवाधिकार संगठन ‘ह्यूमन राइट्स कॉन्ग्रेस फॉर बांग्लादेश माइनॉरिटीज’ (HRCBM) ने अपनी राष्ट्रीय रिपोर्ट जारी की है।

HRCBM की रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2026 के शुरुआती चार महीनों (जनवरी से अप्रैल) के भीतर ही अल्पसंख्यकों के खिलाफ प्रताड़ना और हिंसा की 505 दर्दनाक घटनाएँ दर्ज की जा चुकी हैं। रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि बांग्लादेश में सत्ता बदलने के बावजूद हिंदुओं और अन्य कमजोर समुदायों की स्थिति रत्ती भर भी नहीं सुधरी है और वे लगातार हिंसक हमलों, हत्याओं और डकैती का शिकार हो रहे हैं।

पूरे बांग्लादेश में फैला है नफरत का जाल

यह रिपोर्ट बांग्लादेश के मौजूदा हालात का सबसे बड़ा और पुख्ता दस्तावेज है। संगठन ने बताया कि अल्पसंख्यकों के खिलाफ हुई ये 505 वारदातें किसी एक छोटे इलाके या कस्बे तक सीमित नहीं हैं। यह पूरी तरह से एक सोची-समझी साजिश के तहत पूरे देश में फैलाई जा रही नफरत का नतीजा है।

यह हिंसा बांग्लादेश के सभी 8 प्रशासनिक विभागों और कुल 64 जिलों में से 62 जिलों में फैल चुकी है। यानी देश का शायद ही कोई ऐसा कोना बचा है, जहाँ अल्पसंख्यक समाज सुरक्षित महसूस कर सके। इसमें ग्रामीण इलाकों से लेकर बड़े शहर तक शामिल हैं, जहाँ रहने वाले हिंदू परिवार हर पल खौफ के साए में जी रहे हैं।

100 हत्याएँ और 144 अपहरण: रोंगटे खड़े कर देने वाले आँकड़े

इस चार महीने की रिपोर्ट में जो आँकड़े सामने आए हैं, वे किसी के भी रोंगटे खड़े कर सकते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, जनवरी से अप्रैल 2026 के बीच 100 लोगों की हत्या और संदिग्ध मौत के मामले सामने आए हैं, जो कि 47 अलग-अलग जिलों में हुए।

इसके अलावा, अगवा करने (किडनैपिंग) और बेरहमी से मारपीट करने की 144 वारदातें 49 जिलों में दर्ज की गईं। डराने वाली बात यह है कि ये आँकड़े केवल वे हैं जिनकी स्वतंत्र रूप से पहचान और पुष्टि हो सकी है। असल संख्या इससे कहीं ज्यादा हो सकती है, क्योंकि बहुत से लोग डर और सामाजिक दबाव के कारण पुलिस के पास शिकायत दर्ज कराने ही नहीं जाते।

बहू-बेटियों पर अत्याचार और जमीनों पर अवैध कब्जा

अल्पसंख्यक समुदाय की महिलाओं और बच्चियों को इस हिंसा के दौरान सबसे ज्यादा निशाना बनाया जा रहा है। रिपोर्ट में महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा, बलात्कार और सामूहिक बलात्कार (गैंगरेप) की 28 खौफनाक घटनाओं का जिक्र किया गया है, जो 23 अलग-अलग जिलों में हुईं।

इसके साथ ही, हिंदुओं और स्वदेशी (आदिवासी) समुदायों की संपत्तियों को नष्ट करने, उनकी पुश्तैनी जमीनों पर जबरन कब्जा करने, घरों में आगजनी करने और लूटपाट की 132 बड़ी घटनाएँ सामने आई हैं। पैसे और ताकत के दम पर आर्थिक रूप से कमजोर अल्पसंख्यक परिवारों को बेघर किया जा रहा है ताकि वे देश छोड़ने पर मजबूर हो जाएँ।

95 मंदिरों पर हमला और ईशनिंदा के झूठे आरोप

बांग्लादेश में धार्मिक स्वतंत्रता पूरी तरह खतरे में नजर आ रही है। केवल चार महीनों के भीतर हिंदू मंदिरों और धार्मिक स्थलों पर हमले व तोड़फोड़ की 95 वारदातें दर्ज की गई हैं। उपद्रवी भीड़ सरेआम मंदिरों को निशाना बना रही है और पवित्र मूर्तियों को खंडित कर रही है।

इसके अलावा, अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को फँसाने के लिए ‘ईशनिंदा’ (ब्लास्फेमी) का सहारा लिया जा रहा है। कुल 6 ऐसे मामले दर्ज किए गए हैं जहाँ लोगों पर झूठे आरोप लगाकर भीड़ को भड़काया गया और उनके खिलाफ हिंसा की गई।

सरकार बदली लेकिन नहीं बदला हिंदुओं का दर्द

इस रिपोर्ट का सबसे महत्वपूर्ण विश्लेषण यह है कि बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन का अल्पसंख्यकों की सुरक्षा पर कोई असर नहीं पड़ा है। साल 2025 में मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार के 18 महीनों के कार्यकाल में भी हिंदुओं पर भीषण अत्याचार हुए थे, जिसने पूरी दुनिया को झकझोर दिया था।

इसके बाद साल 2026 में जब नई चुनी हुई सरकार सत्ता में आई, तो उम्मीद थी कि हालात सुधरेंगे। लेकिन बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) सरकार के तहत भी यह हिंसा उसी रफ्तार से जारी है। इससे साफ होता है कि यह संकट किसी एक राजनीतिक दल का नहीं, बल्कि वहां के सिस्टम की गहरी नाकामी का नतीजा है।

प्रशासन की चुप्पी और कानून का मजाक

रिपोर्ट में बांग्लादेश की कानून व्यवस्था और पुलिस प्रशासन पर बेहद गंभीर सवाल उठाए गए हैं। पीड़ित परिवारों का आरोप है कि जब भी उन पर हमला होता है, तो पुलिस या तो बहुत देर से पहुँचती है या फिर मामले की जांच को कमजोर कर देती है।

अपराधियों को सजा न मिलने के कारण उनके हौसले सातवें आसमान पर हैं। पीड़ितों और गवाहों को डराया-धमकाया जाता है ताकि वे अदालत का दरवाजा न खटखटाएँ। इस तरह की संस्थागत नाकामी के कारण अल्पसंख्यक समाज पूरी तरह टूट चुका है और भारी मानसिक तनाव में जी रहा है।

अन्य संगठनों की रिपोर्ट भी दे रही गवाही

HRCBM के अलावा बांग्लादेश के अन्य मानवाधिकार संगठन भी इन दावों की पुष्टि कर रहे हैं। इससे पहले ‘बांग्लादेश हिंदू बौद्ध ईसाई एकता परिषद’ ने भी एक रिपोर्ट जारी की थी, जिसमें जनवरी से मार्च के बीच ही 133 सांप्रदायिक घटनाओं का जिक्र था।

उस रिपोर्ट में 25 हत्याएँ, महिलाओं के खिलाफ अत्याचार और 35 मंदिरों में लूटपाट की बात कही गई थी। इन सभी रिपोर्टों का कुल मिलाकर यही निष्कर्ष निकलता है कि यदि बांग्लादेश सरकार ने तुरंत कड़े कदम नहीं उठाए और दोषियों को सजा नहीं दी, तो आने वाले दिनों में अल्पसंख्यक आबादी का वहाँ टिके रहना नामुमकिन हो जाएगा।

मलिहाबाद में राजा कंस के किले पर मुस्लिमों का कब्जा, मंदिर गायब कर मस्जिद में पढ़ी जा रही नमाज: जानें- इसका इतिहास और गजेटियर में क्या है दर्ज

अपने विश्वप्रसिद्ध दशहरी आमों के लिए खास पहचान रखने वाला उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ का मलिहाबाद क्षेत्र अब एक अत्यंत संवेदनशील ऐतिहासिक और धार्मिक विवाद का मुख्य केंद्र बन चुका है। अयोध्या में श्री राम जन्मभूमि, काशी में ज्ञानवापी, मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मभूमि, संभल की जामा मस्जिद (हरिहर मंदिर दावा), भोजशाला में वाग्देवी मंदिर के बाद अब लखनऊ का ‘कांसमंडी’ (Kasmandi) इलाका देश और प्रदेश की सांस्कृतिक व राजनीतिक बहसों के केंद्र में आ गया है।

विवाद की जड़ें मलिहाबाद के कांसमंडी क्षेत्र में स्थित एक विशाल, प्राचीन और ऊँचे टीलेनुमा परिसर से जुड़ी हैं। लाखन आर्मी, पासी समाज और विभिन्न हिंदू संगठनों का दृढ़ दावा है कि वर्तमान समय में जिस परिसर को मुस्लिम पक्ष द्वारा मस्जिद, मजार या पारंपरिक कब्रिस्तान बताया जा रहा है, वह वास्तव में 11वीं शताब्दी के महान चक्रवर्ती राजपासी शासक राजा कंस का ऐतिहासिक अजेय किला है।

पासी समाज का आरोप है कि इस किले के मूल ऐतिहासिक स्वरूप को ‘जमीन जिहाद’ के माध्यम से नष्ट किया गया है, इसके भीतर स्थित प्राचीन महादेव (शिव) मंदिर को दबाया गया है और परिसर के भीतर से बाहर नई कब्रें तथा उर्दू के शिलापट लगाकर इस पूरी विरासत का इस्लामीकरण करने का प्रयास किया जा रहा है। दूसरी ओर मुस्लिम समाज और स्थानीय वक्फ प्रबंधन इन दावों को पूरी तरह से काल्पनिक और आधारहीन बताते हुए इसे वक्फ तथा सरकारी राजस्व रिकॉर्ड (Revenue Records) में दर्ज सदियों पुरानी मस्जिद और मकबरा घोषित कर रहा है।

उर्दू नाम पट हाल ही में लगाया गया

इस बीच, शुक्रवार (जुमे की नमाज- 22 मई 2025) के दिन पासी समाज द्वारा नमाज रोकने के ऐलान और उसके बाद उत्पन्न हुए भारी सांप्रदायिक तनाव ने स्थानीय प्रशासन के हाथ-पाँव फुला दिए। पूरे कांसमंडी इलाके को छावनी में तब्दील करना पड़ा और पुलिस के कड़े सुरक्षा घेरे में नमाज तो संपन्न हो गई, लेकिन पर्दे के पीछे सुलग रही यह चिंगारी अब एक बड़े कानूनी मुकदमे और देशव्यापी आंदोलन का रूप धारण करने जा रही है।

राजपासी राजा कंस के किले से जुड़ा क्या है ये पूरा विवाद

कांसमंडी में स्थित यह विवादित स्थल भौगोलिक रूप से एक ऊँचे टीले पर निर्मित है, जो दूर से ही किसी प्राचीन गढ़ या किले जैसा प्रतीत होता है। इस परिसर के भीतर वर्तमान में एक मस्जिद, कुछ प्राचीन व आधुनिक मकबरे (कब्रें) और एक कब्रिस्तान स्थित है।

पासी समाज के स्थानीय युवाओं और राष्ट्रीय स्तर के नेताओं का कहना है कि वे इस स्थान को सदियों से अपने पूर्वजों की विरासत के रूप में देखते आए हैं, लेकिन पिछले कुछ दशकों में योजनाबद्ध तरीके से इसके स्वरूप को पूरी तरह बदलने का प्रयास किया गया है। उनकी आपत्तियों में ये बाते काफी अहम हैं-

  • प्राचीन किले की दीवारों और बुर्जों के अवशेष: हिंदू पक्ष का दावा है कि इस टीले की नींव और कुछ ढहे हुए हिस्सों को ध्यान से देखने पर साफ पता चलता है कि यह मध्यकालीन या आधुनिक काल की मस्जिद की स्थापत्य कला नहीं है, बल्कि यह 11वीं सदी की भारतीय दुर्ग निर्माण शैली (Fort Architecture) का हिस्सा है, जिसे राजा कंस पासी ने बनवाया था।
  • महादेव (शिव) मंदिर का अस्तित्व: लाखन आर्मी का दावा है कि किले के ठीक मध्य में राजा कंस के आराध्य भगवान शिव का एक अत्यंत प्राचीन मंदिर था। राजा कंस पासी कुल के शासक थे और शिव के परम भक्त थे। उनका आरोप है कि विदेशी आक्रांताओं और बाद के शासकों ने इस मंदिर को खंडित किया और उसी के मलबे या उसी स्थान पर वर्तमान मजहबी ढाँचे को खड़ा कर दिया गया।
  • नई कब्रों का निर्माण और भूमि विस्तार: स्थानीय हिंदू निवासियों का आरोप है कि इस परिसर के आसपास की जमीनों पर लगातार नई कब्रें बनाई जा रही हैं ताकि इसके क्षेत्रफल को बढ़ाया जा सके और इसे एक बड़े कब्रिस्तान के रूप में दिखाकर हिंदुओं के प्रवेश को पूरी तरह प्रतिबंधित किया जा सके।
  • उर्दू शिलापटों पर आपत्ति: किले के मुख्य प्रवेश द्वार और बाहरी दीवारों पर बीते कुछ सालों में उर्दू और अरबी भाषा में बड़े-बड़े शिलापट (साइनबोर्ड) लगा दिए गए हैं। पासी समाज के अनुसार, यह इस ऐतिहासिक स्थल की प्राचीन भारतीय और पासी राजाओं की पहचान को मिटाकर इसे विशुद्ध रूप से एक इस्लामी स्थल साबित करने की प्रशासनिक व सामाजिक साजिश है।
  • जुमे की नमाज पर विरोध: पासी समाज का कहना है कि इस स्थल पर पहले स्थानीय स्तर पर बेहद सीमित लोग आते थे, लेकिन अब जानबूझकर बाहर से भारी भीड़ जुटाकर हर शुक्रवार को यहाँ नमाज पढ़ी जाती है, जो कि हमारी आस्था और ऐतिहासिक धरोहर का अपमान है।

लखनऊ ब्रिटिश गजेटियर में राजा कंस से जुड़े ऐतिहासिक साक्ष्य

इस पूरे विवाद में पासी समाज का पक्ष केवल मौखिक लोक-कथाओं या सुनी-सुनाई बातों पर निर्भर नहीं है। आंदोलनकारियों ने अपने दावों को पुख्ता करने के लिए ब्रिटिश औपनिवेशिक काल के सबसे प्रामाणिक सरकारी दस्तावेजों ‘लखनऊ जिला गजेटियर’ (Lucknow District Gazetteer) और प्राचीन ऐतिहासिक संदर्भों को सामने रखा है। इन दस्तावेजों का गहन अध्ययन करने पर इस क्षेत्र के विषय में कई महत्वपूर्ण ऐतिहासिक कड़ियाँ जुड़ती नजर आती हैं।

कांसमंडी का नामकरण और राजपासी राजवंश

इतिहासकारों और अंग्रेजी गजेटियर के विवरणों के अनुसार, मलिहाबाद का यह विशेष क्षेत्र जिसे आज ‘कांसमंडी’ कहा जाता है, इसका नामकरण ही सीधे तौर पर राजा कंस के नाम से हुआ है। मध्यकालीन भारत की शुरुआत में, विशेषकर 10वीं से 12वीं शताब्दी के दौरान, अवध (वर्तमान मध्य उत्तर प्रदेश) के एक विशाल भू-भाग पर पासी राजवंशों का शासन था। इन्हें ‘राजपासी’ या ‘नागवंशी पासी’ शासक कहा जाता था। राजा कंस इसी गौरवशाली राजवंश के एक अत्यंत शक्तिशाली और न्यायप्रिय राजा थे, जिन्होंने कांसमंडी को अपने साम्राज्य की राजधानी या एक प्रमुख सैन्य छावनी (गढ़) के रूप में विकसित किया था।

गजेटियर में कासमंडी
गजेटियर में कांसमंडी के बारे में जानकारी

11वीं शताब्दी का अवध और सालार मसूद गाजी का आक्रमण

लखनऊ गजेटियर में स्पष्ट रूप से उल्लेख मिलता है कि 11वीं शताब्दी के अंतिम दौर में काकोरी, मलिहाबाद और उसके आसपास का पूरा क्षेत्र राजा कंस के मजबूत राजनीतिक और सैन्य प्रभाव में था। यह वह समय था जब भारत के उत्तर-पश्चिमी हिस्सों से विदेशी इस्लामी आक्रांताओं के आक्रमण गंगा-यमुना के मैदानी इलाकों की तरफ बढ़ रहे थे।

इसी क्रम में सुल्तान महमूद गजनवी का भांजा सैय्यद सालार मसूद गाजी (जिसे स्थानीय इतिहास में गाजी मियाँ भी कहा जाता है) एक विशाल जेहादी सेना लेकर दिल्ली और कन्नौज को लूटता हुआ अवध के क्षेत्र में दाखिल हुआ। उसका मुख्य उद्देश्य इस क्षेत्र के समृद्ध हिंदू राज्यों को नष्ट करना, मंदिरों को लूटना और जबरन धर्म परिवर्तन कराना था। जब सालार मसूद गाजी की सेना मलिहाबाद और काकोरी की सीमाओं पर पहुँची, तब राजा कंस ने विदेशी दासता स्वीकार करने या आत्मसमर्पण करने के बजाय अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए युद्ध का बिगुल फूँक दिया।

कांसमंडी का ऐतिहासिक युद्ध और सेनापतियों का वध

गजेटियर के अनुसार, कांसमंडी और काकोरी का यह संपूर्ण क्षेत्र सालार मसूद गाजी की विदेशी आक्रमणकारी सेना और स्थानीय हिंदू पासी राजाओं के बीच हुए अत्यंत भीषण और रक्तरंजित संघर्ष का मुख्य रणक्षेत्र (Battlefield) बन गया। राजा कंस ने छापामार युद्ध नीति और अपने किले की भौगोलिक स्थिति का लाभ उठाकर सालार मसूद गाजी की सेना को भारी क्षति पहुँचाई।

अंग्रेजी गजेटियर में इस युद्ध की एक ऐतिहासिक घटना का विशेष रूप से उल्लेख है कि युद्ध के दौरान राजपासी राजा कंस और उनके वीर सैनिकों ने अदम्य साहस का परिचय देते हुए सालार मसूद गाजी के दो सबसे प्रमुख और खूंखार सेनापतियों सैय्यद हातिम और सैय्यद खातिम को इसी कांसमंडी के मैदान में मार गिराया था। इन दोनों सेनापतियों की मृत्यु से विदेशी सेना में हड़कंप मच गया था।

स्थानीय लोक परंपराओं, वीर रस के गीतों (आल्हा) और क्षेत्रीय लिखित इतिहास में राजा कंस को अवध की पावन धरती पर विदेशी आक्रांताओं का प्रतिरोध करने वाले एक महान राष्ट्रभक्त योद्धा और धर्मरक्षक के रूप में पूजनीय स्थान प्राप्त है। राजा कंस महाराजा सुहैल देव के समकालीन रहे हैं। उनके बलिदान के बाद ही इस्लामी फौज बहराइच की तरफ बढ़ पाई, हालाँकि उन्होंने और उनके योद्धाओं ने मसूद की आधी फौज खत्म कर दी थी। इसके बाद महाराजा सुहैल देव ने मसूद समेत उसकी पूरी फौज को गाजर-मूली की तरह काट डाला और उसे मिट्टी में मिला दिया था।

गजेटियर में राजा कंस का जिक्र

पासी समाज का तर्क है कि जिन सेनापतियों (हातिम और खातिम) को राजा कंस ने युद्ध में मारकर अपनी धरती को गौरवान्वित किया था, आज उन्हीं की कथित मजारों और कब्रों के नाम पर राजा कंस के अपने ही किले पर कब्जा कर लिया गया है, जो इतिहास की सबसे बड़ी विडंबना है। खास बात ये है कि राजपासी राजा कंस के बाद रहे महाराजा बिजली पासी से जुड़े तमाम तथ्य भी सामने हैं, जिनके कब्जे में उस समय 12 किले रहे थे।

पीछे हटने के मूड में नहीं है हिंदू समाज, आर-पार की लड़ाई का ऐलान

कांसमंडी किले के इस विवाद ने उत्तर प्रदेश के राजनीतिक और सामाजिक गलियारों में एक बड़ा तूफान खड़ा कर दिया है। विभिन्न संगठनों के नेताओं की बयानबाजी से स्पष्ट है कि यह मामला आने वाले समय में कानूनी और राजनैतिक रूप से बेहद पेचीदा होने वाला है।

इस पूरे आंदोलन को जमीन पर उतारने और पासी समाज के युवाओं को एकजुट करने का श्रेय लाखन आर्मी के अध्यक्ष सूरज पासी को जाता है।

सूरज पासी ने ऑपइंडिया से बातचीत में कहा कि मुझे 1 दिन पहले ही हाउस अरेस्ट कर लिया गया और प्रशासनिक देखरेख में नमाज अदा कराई गई। उन्होंने कहा कि मैं बीते 24 घंटों से अपने कार्यालय में ही कैद हूँ। मेरे घर और कार्यालय को किले में तब्दील कर दिया गया। सूरज ने कहा, “अगर मुझे नजरबंद नहीं किया जाता, तो इस बार जुमे की नमाज हमारे मंदिर पर नहीं हो पाती।”

सूरज पासी की नजरबंदी के खिलाफ प्रदर्शन करते हिंदू युवा

उन्होंने सोशल मीडिया पर ऐतिहासिक साक्ष्यों और गजेटियर की प्रतियों को सार्वजनिक करते हुए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को एक आधिकारिक पत्र भेजा है।

अपने पत्र और बयानों में सूरज पासी ने कहा, “हम किसी भी समुदाय की वैध धार्मिक संपत्ति के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन हमारे पूर्वज महाराजा कंस पासी की विरासत को मिटाने की किसी भी कोशिश को हम बर्दाश्त नहीं करेंगे। लखनऊ गजेटियर इस बात का चश्मदीद गवाह है कि यह स्थान राजा कंस का किला था और यहाँ उन्होंने विदेशी आक्रांताओं के सेनापतियों को धूल चटाई थी। हमारे आराध्य भगवान शिव के प्राचीन मंदिर को मुक्त कराना हमारी आस्था और हमारे आत्मसम्मान का विषय है।”

लाखन आर्मी द्वारा सीएम को लिखा गया पत्र

सूरज पासी ने कहा, “हम इस मामले को पूरी कानूनी तैयारी के साथ न्यायालय (Court) में लेकर जा रहे हैं। जिस तरह अयोध्या, काशी, मथुरा और संभल के ऐतिहासिक सत्यों को अदालत के माध्यम से दुनिया के सामने लाया जा रहा है, उसी तरह कांसमंडी के सच को भी उजागर किया जाएगा। इसके लिए हमारी संस्था ‘लाखन आर्मी’ पूरे उत्तर प्रदेश के पासी समाज और समस्त न्यायप्रिय हिंदू जनमानस को जागरूक कर रही है। हम बहुत जल्द एक विशाल शांतिपूर्ण आंदोलन की तारीखों की घोषणा करेंगे।”

अखिल भारत हिंदू महासभा ने इस विवाद में बेहद आक्रामक रुख अपनाते हुए पासी समाज को अपना पूर्ण और खुला समर्थन देने की घोषणा की है।

हिंदू महासभा के राष्ट्रीय प्रवक्ता शिशिर चतुर्वेदी ने सीधे तौर पर जिला प्रशासन और राज्य सरकार को अल्टीमेटम देते हुए कहा, “लखनऊ के मलिहाबाद में जो कुछ हो रहा है, वह कुछ और नहीं बल्कि शुद्ध रूप से ‘जमीन जिहाद’ (Land Jihad) का एक और घिनौना उदाहरण है। एक महान हिंदू राजा के किले पर, जहाँ कभी हर-हर महादेव के जयघोष गूँजते थे, वहाँ आज चादरें बिछाकर, जबरन नई कब्रें खोदकर और उर्दू के बोर्ड लगाकर उसे पूरी तरह से हड़पने की साजिश की जा रही है।”

अखिल भारत हिंदू महासभा के राष्ट्रीय प्रवक्ता शिशिर चतुर्वेदी ने कहा, “हिंदू महासभा पासी समाज के भाइयों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी है। हमारी प्रशासन से स्पष्ट माँग है कि इस विवादित परिसर में शुक्रवार को होने वाली बाहरी लोगों की नमाज को तुरंत और स्थाई रूप से रोका जाए।”

उन्होंने आगे कहा, “अगर प्रशासन ने समय रहते इस अवैध कब्जे को नहीं हटाया और हिंदुओं की आस्था का सम्मान नहीं किया तो हिंदू महासभा के हजारों कार्यकर्ता स्वयं मौके पर कूच करेंगे और अपने हाथों से महाराजा कंस पासी की इस पावन विरासत की रक्षा करेंगे। इसके बाद उत्पन्न होने वाली किसी भी कानून-व्यवस्था की स्थिति की जिम्मेदारी सीधे तौर पर स्थानीय प्रशासन की होगी।”

मुस्लिम पक्ष और स्थानीय वक्फ कमेटी का क्या कहना है?

इस पूरे मामले में मलिहाबाद के स्थानीय मुस्लिम प्रतिनिधियों, धर्मगुरुओं और वक्फ बोर्ड से जुड़े पदाधिकारियों ने हिंदू संगठनों के इन सभी दावों को सिरे से खारिज कर दिया है। उनका कहना है कि इस प्रकार के दावे केवल और केवल सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करने और क्षेत्र के पुराने शांतिपूर्ण माहौल को खराब करने के उद्देश्य से किए जा रहे हैं।

मुस्लिम पक्ष के प्रतिनिधियों ने अपने संयुक्त बयान में कहा, “यह पूरा परिसर ऐतिहासिक रूप से एक पंजीकृत वक्फ संपत्ति (Waqf Property) है। संभल और अन्य जगहों की घटनाओं के बाद अब मलिहाबाद के भाईचारे को निशाना बनाया जा रहा है। हम मुख्यमंत्री और उत्तर प्रदेश पुलिस से माँग करते हैं कि ऐसे अफवाह फैलाने वाले और माहौल बिगाड़ने वाले असमाजिक तत्वों के खिलाफ सख्त से सख्त कानूनी कार्रवाई (FIR) की जाए और हमारी इबादतगाहों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए।”

ग्राउंड जीरो की रिपोर्ट: शुक्रवार का तनाव और छावनी में बदला मलिहाबाद

जब लाखन आर्मी और पासी समाज ने शुक्रवार (22 मई 2026) को कांसमंडी किला परिसर में होने वाली जुमे की नमाज का पुरजोर विरोध करने और वहाँ जाकर हनुमान चालीसा का पाठ करने या प्रदर्शन करने का ऐलान किया, तो पूरे लखनऊ जिले के प्रशासनिक अमले में हड़कंप मच गया। संभल में हुई हालिया हिंसक घटनाओं से सबक लेते हुए लखनऊ पुलिस कमिश्नरेट ने स्थिति को संभालने के लिए तत्काल कड़े कदम उठाए।

इसके लिए प्रशासन ने सुरक्षा व्यवस्था पुख्ता करते हुए-

  • भारी पुलिस बल की तैनाती: शुक्रवार की सुबह से ही मलिहाबाद, काकोरी और कांसमंडी को जोड़ने वाले सभी मुख्य मार्गों पर भारी संख्या में उत्तर प्रदेश पुलिस के जवान, प्रांतीय सशस्त्र कांस्टेबुलरी (PAC) की टुकड़ियाँ और त्वरित कार्य बल (RAF) के जवानों को तैनात कर दिया गया।
  • त्रिस्तरीय बैरिकेडिंग: विवादित टीले (किले) की ओर जाने वाली सभी पतली गलियों और मुख्य सड़कों पर लोहे तथा कंक्रीट की मजबूत त्रिस्तरीय बैरिकेडिंग की गई। किसी भी बाहरी व्यक्ति या हिंदू संगठनों के कार्यकर्ताओं को उस क्षेत्र में प्रवेश करने की अनुमति नहीं दी गई।
  • ड्रोन और सीसीटीवी से निगरानी: पूरे परिसर और उसके आसपास के संवेदनशील रिहायशी इलाकों की निगरानी के लिए आधुनिक ड्रोन कैमरों का उपयोग किया गया। स्थानीय पुलिस की खुफिया इकाई (LIU) के सादे कपड़ों में दर्जनों जवान भीड़ पर नजर रखने के लिए तैनात रहे।
  • सड़क चेकिंग और नाकाबंदी: मलिहाबाद आने वाले वाहनों की सघन चेकिंग की गई ताकि बाहर से कोई भी प्रदर्शनकारी भीड़ का हिस्सा न बन सके।

पासी समाज और हिंदू संगठनों के कड़े आक्रोश और अल्टीमेटम के बीच, जिला मजिस्ट्रेट (DM) और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) खुद स्थिति की कमान संभाले रहे। प्रशासन ने मुस्लिम पक्ष के स्थानीय मुतवल्लियों से बात करके यह सुनिश्चित किया कि केवल स्थानीय लोग ही नमाज में शामिल हों और किसी भी प्रकार की भड़काऊ बयानबाजी न हो। इस बीच सूरज पासी को उनके दफ्तर में ही नजरबंद कर दिया गया।

विवादित स्थल की ओर जाने वाले रास्तों की नाकाबंदी

भारी पुलिस बल के कड़े पहरे और साये के बीच शुक्रवार की नमाज शांतिपूर्वक संपन्न हो गई। हालाँकि जमीन पर नमाज भले ही हो गई हो, लेकिन मलिहाबाद के स्थानीय हिंदू और मुस्लिम निवासियों के बीच एक गहरा मानसिक विभाजन और तनाव साफ महसूस किया जा सकता है। बाजारों में आम दिनों जैसी चहल-पहल गायब थी और लोग किसी भी अनहोनी की आशंका से डरे हुए दिखाई दिए।

कानूनी विकल्प और सामाजिक चुनौतियाँ

मलिहाबाद का यह ‘कांसमंडी किला विवाद’ अब केवल एक स्थानीय विवाद नहीं रह गया है, बल्कि यह आने वाले समय में उत्तर प्रदेश की राजनीति और न्यायपालिका के सामने एक नया बड़ा मामला बनने जा रहा है। पासी समाज के नेताओं द्वारा उठाए जा रहे कदमों से यह स्पष्ट है कि इस विवाद का समाधान अब सड़कों के बजाय अदालत के कमरों में ही तलाशा जाएगा।

  • अदालत में सिविल सूट (Civil Suit): लाखन आर्मी और पासी समाज के कानूनी सलाहकार बहुत जल्द लखनऊ की दीवानी अदालत (Civil Court) में एक याचिका दायर करने की योजना बना रहे हैं। इस याचिका में ‘प्लेस ऑफ वर्शिप एक्ट, 1991’ (Places of Worship Act) की सीमाओं और अपवादों को ध्यान में रखते हुए यह तर्क दिया जा सकता है कि चूँकि यह मूल रूप से एक ऐतिहासिक किला और प्राचीन स्मारक है, इसलिए इसकी वास्तविक स्थिति और स्थापत्य की जाँच होनी चाहिए।
  • ASI सर्वे की माँग: ज्ञानवापी और भोजशाला की तर्ज पर हिंदू पक्ष अदालत से यह माँग कर सकता है कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के माध्यम से इस पूरे टीले की रडार (GPR System) और वैज्ञानिक खुदाई/जाँच कराई जाए ताकि यह पता चल सके कि वर्तमान ढाँचे के नीचे 11वीं सदी के किले की दीवारें और मंदिर के अवशेष मौजूद हैं या नहीं।
  • राजस्व रिकॉर्ड की चुनौती: हिंदू पक्ष सरकार से माँग कर रहा है कि इस भूमि के मालिकाना हक से जुड़े उन सभी पुराने रिकॉर्ड्स की दोबारा उच्च स्तरीय जाँच कराई जाए, जिनके आधार पर इस ऐतिहासिक किले को वक्फ संपत्ति के रूप में दर्ज किया गया था।

बहरहाल, प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती इस बेहद संवेदनशील मामले की जाँच के दौरान क्षेत्र में अमन-चैन बनाए रखने की है। मलिहाबाद और काकोरी का इलाका ऐतिहासिक रूप से सांप्रदायिक सौहार्द का प्रतीक रहा है, जहाँ दोनों समुदायों के लोग दशकों से मिलकर रहते आए हैं। लेकिन इस विवाद के बाद दोनों पक्षों के बीच अविश्वास की खाई चौड़ी हो गई है।

मलिहाबाद के कांसमंडी में उपजा यह विवाद इतिहास के उन दबे हुए पन्नों को दोबारा पलटने जैसा है, जहाँ 11वीं शताब्दी के स्थानीय राजाओं का शौर्य, विदेशी आक्रांताओं का क्रूर इतिहास और आज के दौर की धार्मिक-सांस्कृतिक अस्मिता आपस में टकरा रही हैं। जहाँ पासी समाज अपने गौरवशाली इतिहास और महाराजा कंस पासी की विरासत को वापस पाने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार है, वहीं मुस्लिम पक्ष अपने वर्तमान धार्मिक अधिकारों और कानूनी दस्तावेजों के संरक्षण के लिए प्रतिबद्ध है।

अब यह देखना अत्यंत महत्वपूर्ण होगा कि उत्तर प्रदेश सरकार और देश की न्यायपालिका इस ‘इतिहास बनाम कानून’ के पेचीदा मामले को किस प्रकार सुलझाती है, ताकि इतिहास के सत्यों का सम्मान भी हो सके और समाज का ताना-बाना भी सुरक्षित रहे। आने वाले दिनों में यह देखना भी बेहद महत्वपूर्ण होगा कि क्या इस मामले में भी कोर्ट के आदेश पर एएसआई (ASI) सर्वे जैसी कोई कार्रवाई अमल में लाई जाती है या नहीं।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चूँकि पासी समाज उत्तर प्रदेश में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और बड़ी राजनीतिक ताकत (Voter Base) है, इसलिए कोई भी राजनीतिक दल इस मुद्दे पर खुलकर पासी समाज की माँगों को नजरअंदाज नहीं कर सकता। वहीं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को लिखे गए पत्र के बाद राज्य सरकार के सांस्कृतिक और पुरातत्व विभाग पर भी इस बात का दबाव बढ़ गया है कि वे लखनऊ गजेटियर में दर्ज ऐतिहासिक तथ्यों के आलोक में कांसमंडी की इस धरोहर का आधिकारिक सर्वे कराएँ।