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विवेक अग्निहोत्री ने ‘पक्षकार’ राजदीप को याद दिलाई पत्रकारिता, उसकी अजेंडाबाज़ी को किया एक्सपोज़

पत्रकारिता के नाम पर आजकल कुछ वामपंथी या कॉन्ग्रेस पोषित पत्रकार किस तरह से खुलेआम ‘पक्षकार’ होने के बावजूद भी निष्पक्ष पत्रकार बने हुए हैं। इसकी बानगी देखिए, इंडिया टुडे के सेलिब्रिटी टीवी पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जीवन पर आधारित उनकी आगामी बायोपिक के बारे में अभिनेता विवेक ओबेरॉय का साक्षात्कार लेते हुए लाइव टेलीविज़न शो पर कई जगह सवाल पूछने के नाम पर विपक्ष के नाम से वह सारे सवाल किए, जो उनके एजेंडा को शूट करते हैं, वो भी बिना फिल्म का ट्रेलर देखे ही।

फिर भी कमाल की बात ये है कि अपने ही शो में राजदीप विवेक ओबेरॉय द्वारा कई बार बेचैन और निःशब्द किए गए। एक जगह सरदेसाई ने विवेक से पूछा अपने दिल पर हाथ रख के कहिए कि क्या इस फिल्म को बनाने के लिए किसी भी राजनीतिक पार्टी से पैसा मिला है? विवेक ने तो इसका जवाब ना में दे दिया, प्रॉसेस भी समझा दिया। लेकिन क्या राजदीप जानते हुए भी ये सवाल उन तमाम पक्षकारों, लेखकों या अन्य खुले-तौर पर प्रोपेगेंडा बाजों से पूछने की हिम्मत कर सकते हैं? जवाब नहीं है, खुलेआम एजेंडा चलाते राजदीप को कई बार धरा गया है। लेकिन इसके बाद भी उनकी पक्षकारिता निष्पक्षता के चोंगे में लिपटी सुरक्षित है।

इसी इंटरव्यू में, जब राजदीप ने पीएम मोदी की बायोपिक पर अपनी राय और घृणा विपक्ष के कंधों पर बन्दूक रख के चलानी चाही तो उनकी सड़ाँध बाहर आते देर नहीं लगी। साथ ही राजदीप ने विवेक अग्निहोत्री द्वारा निर्देशित आगामी फिल्म ‘द ताशकंद फाइल्स’ और अनुपम खेर स्टारर ‘द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ जैसी अन्य फिल्मों पर भी पूर्वग्रह ग्रसित कमेंट किया।

साक्षात्कार के इस विशेष भाग में, राजदीप सरदेसाई ने विवेक ओबेरॉय से कहा कि वह राजनीतिक दलों के बीच रस्साकशी के बीच फँसे हुए हैं क्योंकि फिल्म के रिलीज़ का समय संदिग्ध है। इससे पहले जब चुनाव के समय किसान आंदोलन प्रायोजित किए गए, अवॉर्ड वापसी का पूरा नाटक चला वो भी चुनाव से पहले ही था तब उन्हें उसमें प्रोपेगेंडा और किसी एक व्यक्ति के प्रति दुराग्रह नज़र नहीं आया और अब जब 200 लेखक खुलेआम बीजेपी को वोट न देने की अपील कर रहे हैं तो राजदीप को उसमें न दुराग्रह नज़र आ रहा, न पक्षकारिता, न लोकतंत्र की हत्या, न प्रोपेगेंडा।

राजदीप ने कहा कि अन्य फिल्मों, जैसे ताशकंद फाइल्स, को भी रिलीज़ किया जा रहा है जिससे ‘कॉन्ग्रेस नेतृत्व’ पर सवाल उठाए जा रहे हैं। शायद यहाँ राजदीप ये भूल गए कि कहाँ गया उनका वह आदर्श कि सवाल पूछे जाने चाहिए। क्या यहाँ वह यह कहना चाहते हैं जब सवाल कॉन्ग्रेस या वामपंथियों पक्षकारों से हो तो मुँह पर ताला लगा लेना चाहिए?

बता दें कि फिल्म द ताशकंद फाइल्स के निर्देशक विवेक अग्निहोत्री की फिल्म भारत के महान सपूत लाल बहादुर शास्त्री की रहस्यमयी मौत पर आधारित है। राजदीप को तो खुद कॉन्ग्रेस या उससे जुड़े सभी पक्षों से सवाल करना चाहिए। खैर, राजदीप सरदेसाई के इस कॉन्ग्रेस नेतृत्व पर सवाल वाले सेगमेंट का जवाब देने के लिए भी ट्विटर पर विवेक अग्निहोत्री ने खुद ही मोर्चा संभाला कि आपका आरोप है कि ताशकंद फाइल्स कॉन्ग्रेस नेतृत्व पर सवाल उठा रही है।

उन्होंने ट्विटर पर लिखा कि जब से राजदीप सरदेसाई ने उन्हें ब्लॉक किया है, उनके पास नोट ट्वीट करने के अलावा उनसे संवाद करने का कोई दूसरा तरीका नहीं है। नोट में, राजदीप के इस आरोप का जवाब देते हुए कि फिल्म ‘कॉन्ग्रेस नेतृत्व पर सवाल उठाती है’, उन्होंने पूछा कि राजदीप को कैसे पता चल गया कि फिल्म में कॉन्ग्रेस पार्टी पर सवाल उठाया गया है कि जबकि आपने अभी फिल्म देखी भी नहीं है।

विवेक अग्निहोत्री ने राजदीप से पूछा कि जब आपने फिल्म नहीं देखी है और पहले से ही इस बारे में झूठी अफवाह फैला रहे हैं तो क्या यह नहीं माना जाए कि आप द ताशकंद फाइल्स के खिलाफ दुष्प्रचार कर रहे हैं क्योंकि वह उनके खिलाफ राजनीतिक रूप से पूर्वग्रह से प्रेरित हैं।

इसके बाद विवेक अग्निहोत्री ने राजदीप से पूछा कि चूँकि आपने फिल्म को बिना देखे ही यह घोषणा कर दी कि फिल्म कॉन्ग्रेस नेतृत्व पर सवाल उठाती है। तो क्या सरदेसाई यह स्वीकार कर रहे हैं कि कॉन्ग्रेस पार्टी वास्तव में लाल बहादुर शास्त्री की रहस्यमय मौत में शामिल थी?

इस मामले पर ऑपइंडिया से बात करते हुए, विवेक ने कहा कि राजदीप संभवतः फिल्म के ट्रेलर को भी देखे बिना ही स्वघोषित जज के रूप में फैसले दे रहे हैं।

यह एक फिल्म को दुष्प्रचारित और उसके प्रति पक्षपात पूर्ण नजरिया रखने का एक स्पष्ट मामला है। चूँकि, राजदीप भारत के एक प्रमुख पत्रकार हैं, इसलिए उन्हें निष्पक्ष होना चाहिए। ऐसा पूर्वग्रह ग्रसित रवैया रखना ठीक नहीं है। ताशकंद फाइल्स एक ऐसी कहानी है, जिसमें शास्त्रीजी की मृत्यु के आसपास की सभी संभावनाओं का पता लगाया जा रहा है। पात्रों में से एक वास्तव में किसी भी साजिश या हत्या के कोण को दृढ़ता से खारिज करता है। यह फिल्म के ट्रेलर में ही स्पष्ट है।

सवाल उठाने के मुद्दे पर विवेक ने कहा, “विडंबना यह है कि यह काम एक पत्रकार को करना चाहिए कि किसी भी बात की सभी संभावनाओं को तलाशना। न कि बिना देखे खुद जज बनकर ये घोषित करना कि कोई फिल्म प्रोपेगेंडा है या नहीं।”

उन्होंने आगे कहा कि अगर राजदीप वास्तव में फिल्मों और चुनावों को जोड़ना ही चाहते हैं, तो उन्हें वास्तव में उन फिल्मों के बारे में बात करनी चाहिए, जिन्होंने सेना को नकारात्मक भूमिका में चित्रित किया है, खासकर कश्मीर में।

विवेक अग्निहोत्री ने राजदीप से सवाल किया, “कॉन्ग्रेस ने अपने घोषणा पत्र में कश्मीर में AFSPA में संशोधन करने का वादा करते हुए कॉन्ग्रेस ने लगभग भारतीय सेना पर बलात्कारी होने का आरोप लगाया है। इससे पहले सेंसर बोर्ड के सदस्य के रूप में, आप भी इस कहानी को जानते हैं कि कैसे मैंने एक फिल्म निर्माता से विश्वसनीय प्रमाण माँगे, जब वह भारतीय सेना को ऐसे ही अत्याचार में लिप्त दिखाना चाहता था। मुझे आश्चर्य है कि क्या राजदीप ऐसी फिल्मों को कभी प्रोपेगेंडा कहेंगे।”

यह पहली बार नहीं है जब राजदीप की हिप्पोक्रेसी पकड़ी गई है। हाल ही में, राजदीप ने राहुल गाँधी द्वारा हिंदू-अल्पसंख्यक वाले क्षेत्र वायनाड से लड़ने के बारे में प्रधानमंत्री मोदी के बयान को ट्विस्ट कर उसे सांप्रदायिक रंग दे दिया और पकडे जाने पर भी राजदीप ने अपनी दुर्भावनापूर्ण रिपोर्टिंग के लिए कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया।

ऐसा लगभग हर वामपंथी पत्रकार, लेखक, समर्थक कर रहा है। वह खुलेआम मतदाताओं को भड़का रहा है। उनकी राय को प्रभावित करने के लिए उन पर दबाव डाल रहा है। खुलेआम कॉन्ग्रेस के समर्थन और बीजेपी विरोध में बयानबाजी और एजेंडा परोसने के बाद भी निष्पक्ष है और देश से ऐसी ही चाटुकारिता भरे व्यवहार की उम्मीद लगाए बैठा है। पर जनता इन्हें हर जगह से खदेड़ रही है। अब न इनके पत्रकारों के गिरोह को जनता सिरियसली ले रही है न इनके लेखकों-प्रोफेसरों के अर्बन-नक्सल टुकड़ी को, बौखलाहट में इन्होने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। जनता इनकी खीझ का मजा ले रही है और इनकी खिसियाहट बढ़ती जा रही है।

अब देखना ये है कि लोकसभा चुनाव तक ये पूरा गिरोह और कौन-कौन से रंग दिखाता है? कितना नीचे गिरता है? कौन-कौन सी संस्थाओं पर आरोप मढ़ता है? खुद जज बनकर फैसले सुना, उनका असर न होता देख क्या-क्या हरकत करता है? खैर, जनता तो इनके पूरे मजे लेने को तैयार है।

370 हटा तो कश्मीर भारत से अलग हो जाएगा, हाथ काट देंगे: महबूबा मुफ़्ती

जम्मू कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती ने आज हिंदुस्तान के एक और बँटवारे की धमकी दी है। लोकसभा चुनावों के लिए अनंतनाग से नामांकन दाखिल करने के दौरान उन्होंने धमकी दी है कि यदि भाजपा या किसी ने संविधान की धारा 370 हटाई तो जम्मू कश्मीर हिंदुस्तान से अलग हो जाएगा

यह विरोधाभास का ही चरम कहा जाएगा कि महबूबा ने यह बात उस समय कही जब वह लोकसभा सदस्यता के लिए हो रहे चुनावों का पर्चा भर रहीं थीं- यदि वे यह चुनाव जीत जातीं हैं तो उन्हें हिंदुस्तान के संविधान से प्रतिबद्धता की शपथ लेनी होगी, और संविधान में कश्मीर को हिंदुस्तान का अविभाज्य अंग होने की बात कहना ही उन्हें ठेंगा दिखाएगा।

अमित शाह के बयान पर दे रहीं थीं प्रतिक्रिया

भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने यह कहा था कि संविधान की धारा 370 और 35-A को हटा कर जम्मू कश्मीर का पूर्ण विलय भाजपा की देशवासियों के प्रति पुरानी प्रतिबद्धता है, जिसे 2020 में राज्यसभा में बहुमत मिलने के बाद पूरा किया जाएगा।

उसके जवाब में महबूबा मुफ़्ती ने न केवल इस वादे की खिल्ली उड़ाते हुए इसे दिवास्वप्न बताया बल्कि यह धमकी भी दी कि जो कोई 370 और 35-A को हटाने की कोशिश करेगा, उसके हाथ काट दिए जाएँगे

नहीं हैं राज्य की प्रतिनिधि किसी भी प्रकार से  

हिंसा और विभाजन की धमकी देने वाली महबूबा मुफ़्ती शायद यह भूल रहीं हैं कि वे राज्य के किसी भी संवैधानिक पद पर नहीं हैं- यानि कि वे किसी भी प्रकार राज्य के हवाले से यह निर्णय नहीं ले सकतीं कि राज्य हिंदुस्तान का हिस्सा रहेगा या नहीं।

कोलकाता की झुग्गियों से भोजपुरी के फलक तक, असाधारण है मृदुभाषी निरहुआ का सफर और व्यक्तित्व

दिनेश लाल यादव निरहुआ- एक ऐसा नाम जिसके इर्द-गिर्द पिछले एक दशक से पूरी भोजपुरी सिनेमा इंडस्ट्री घूमती है। उत्तर भारत के अन्य हिस्सों में जिन्होंने निरहुआ की फ़िल्म नहीं देखी है, उन्हें भी उनका नाम पता है। निरहुआ के स्टारडम का आलम यह है कि अगर यूपी-बिहार में वो कहीं निकल जाते हैं तो वहाँ उतनी ही भीड़ जमा होती है, जितनी अजय देवगन जैसे बड़े बॉलीवुड अभिनेताओं को देखने के लिए आमतौर पर जुटा करती है। अगर हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री में ख़ान तिकड़ी और अक्षय, अजय हैं, मलयालम में मोहनलाल, मामूट्टी और जयराम हैं, तमिल में रजनीकांत, कमल हासन और विजय हैं, पंजाबी में जिमि शेरगिल और दिलजीत दोसांझ हैं, मराठी में रितेश देशमुख और स्वप्निल जोशी हैं, तेलुगु में महेश बाबू, पवन कल्याण और एनटीआर हैं, कन्नड़ में सुदीप और उपेंद्र हैं, तो भोजपुरी इंडस्ट्री में भी मनोज तिवारी और रवि किशन के बाद निरहुआ ही निरहुआ हैं।

निरहुआ के शुरुआती दिनों का वीडियो, जब वो बिरहा गायक हुआ करते थे

भोजपुरी फ़िल्मों की एक ख़ासियत रही है कि यहाँ आमतौर पर वही बड़ा अभिनेता बनता है, जिसकी आवाज़ अच्छी हो और जो अच्छा गा सकता हो। मनोज तिवारी ने भी छठ के गीतों के साथ अपना सफ़र शुरू करते हुए ‘ससुरा बड़ा पइसा वाला’ के रूप में पहली ब्लॉकबस्टर भोजपुरी फ़िल्म दी। काफ़ी तेज़ी से सीढियाँ चढ़ते हुए तिवारी ने अमिताभ बच्चन जैसे कलाकारों तक से भी भोजपुरी सिनेमा में पदार्पण करवाया। रवि किशन ने अपनी दमदार आवाज़ के कारण मज़बूत उपस्थिति दर्ज कराई। पवन सिंह भी गायक से अभिनेता बने। निरहुआ को जानने जानना होगा कि ‘बिरहा’ क्या होता है?

निरहुआ की पहली सबसे चर्चित फ़िल्म निरहुआ रिक्शावाला का एक दृश्य

बिरहा यूपी-बिहार के गाँवों में मनोरंजन का एक माध्यम है जो अब धीरे-धीरे विलुप्त होता जा रहा है। बिरहा भोजपुरी ‘Folk Music’ है, जिसे गानेवाले लोग पीढ़ियों से इसी से अपना व्यवसाय चलाते आ रहे हैं। वैसे तो गाँवों में बिरहा ज्यादा प्रसिद्ध है और शादी-विवाह के मौसमों में आज भी इसका प्रयोग होता है लेकिन शहरों में अब यह मंदिरों में होने वाले पूजा-पाठ कार्यक्रम तक ही सीमित है। ऐसे ही एक बिरहा खानदान गाज़ीपुर में था। इसे बिरहा घराना कह लीजिए। नहीं, निरहुआ के पिता बिरहा गाकर गुज़र-बसर नहीं करते थे। लेकिन हाँ, इसका खानदान ज़रूर बिरहा परिवार से था। निरहुआ का बचपन तो कोलकाता की झुग्गियों में ही बीता।

निरहुआ हिंदुस्तानी को आधुनिक भोजपुरी के सबसे हिट फ़िल्मों में से एक में गिना जाता है, इसके तीन पार्ट बन चुके हैं

कोलकाता की गलियों में बड़े हो रहे निरहुआ के पिता उधर ही एक फैक्ट्री में काम करते थे। यूपी-बिहार का ये वो दौर था, जब हर घर से किसी न किसी को कमाने के लिए पंजाब, गुजरात, बंगाल और दिल्ली जाना ही जाना पड़ता था। बेरोज़गारी की चरम सीमा यूपी-बिहार ने देखी है। शिक्षा से वंचित लोगों को कोई इज़्ज़त वाली नौकरी भी नहीं मिलती थी। इन राज्यों के कॉलेजों की डिग्रियों की बात ही छोड़ दीजिए। उनका मोल किसी काग़ज़ के टुकड़े से ज़्यादा नहीं था। संघर्ष के उस दौर में निरहुआ के पिता भी बंगाल में थे। कोलकाता के उन्हीं कस्बों में स्थित विद्यालय में निरहुआ की शिक्षा-दीक्षा भी पूरी हुई। अब आपको बताते हैं कि हमने बिरहा का ज़िक्र क्यों किया?

निरहुआ का बयान उन्ही के शब्दों में, पढ़ें क्यों उन्हें पीएम मोदी पर है भरोसा

विजय लाल यादव अपने इलाक़े में लोकप्रिय बिरहा गायक हुआ करते थे। उनके भाई प्यारे लाल यादव गाने लिखकर उनका साथ दिया करते थे। ये दोनों अभी भी हैं, लेकिन फ़िल्मों में ज़्यादा सक्रिय हैं। ये दोनों ही निरहुआ के चचेरे भाई हैं। विजय लाल को ‘बिरहा सम्राट’ भी कहा जाता था। विजय-प्यारे की केमिस्ट्री से लोगों का ख़ूब मनोरंजन होता था। निरहुआ की अधिकतर फ़िल्मों की सफलता में इन दोनों की म्यूजिकल जुगलबंदी का हाथ हुआ करता है, आज भी। जब भोजपुरी सिनेमा से मनोज तिवारी युग जा रहा था और वो अलग अलग प्रोजेक्ट्स में व्यस्त हो रहे थे, ऐसे में भोजपुरी फ़िल्म इंडस्ट्री में एक शून्य पैदा हुआ, जिसे भर पाना सबके बूते की बात नहीं थी।

बिहार में आज भी वो कहानी चलती है कि कैसे ‘ससुरा बड़ा पइसा वाला’ के समय 21वीं सदी के शुरुआती दौर में गाँव के घर-घर से औरतें झोला भर-भर कर दूर कस्बों और शहरों में स्थित सिनेमाघरों में मनोज तिवारी को देखने गई थीं। भोजपुरी फ़िल्म इंडस्ट्री में ऐसा क्रेज फिर कभी देखने को नहीं मिला। लेकिन, 2008 में ऐसा कुछ हुआ, जिस से भोजपुरी फ़िल्म इंडस्ट्री की दशा एवं दिशा बदल गई। हालाँकि, बॉक्स ऑफिस और कंटेंट के मामले में भोजपुरी सिनेमा आज कन्नड़ वालों से भी काफ़ी पीछे है लेकिन इसमें भोजपुरी सिनेमा में कई गायकों व अभिनेताओं द्वारा द्विअर्थी अश्लील गानों और डायलॉग्स का योगदान था।

वाराणसी: आप भी देखें निरहुआ को लेकर लोगों का क्रेज

2008 में एक ऐसा गाना आया, जिसने भोजपुरी बोलने वालों को फिर से अपनी पहचान पर घमंड खाने का मौक़ा दिया। इसके बोल कुछ इस तरह थे:

“भोजपुरिया जवान, नाही सहेला गुमान…
बा ई बात के चारु ओरी हाला…
निरहुआ रिक्शावाला… निरहुआ रिक्शावाला…”

इसका अर्थ हुआ कि भोजपुरी बोलने वाले लोग किसी की गीदड़-भभकी को बर्दाश्त नहीं करते और इस बात की चारो तरफ चर्चा है। इसके बाद उस फ़िल्म का टाइटल- निरहुआ रिक्शावाला। जैसे आज नरेंद्र मोदी के अभियान से चौकीदारों की एकाएक चर्चा बढ़ गई है और उन्हें अपने अस्तित्व को नए सिरे से गढ़ने और अपनी महत्ता का एहसास हो रहा है, थी वैसा ही कुछ आज से एक दशक पहले हुई था। बॉलीवुड से लेकर भोजपुरी तक बड़े अभिनेताओं ने ऑटो ड्राइवर के रोल तो किए थे लेकिन रिक्शा वाला का रोल शायद ही किसीने इस तरह मुख्य रूप से किया हो। कहते हैं, इस फ़िल्म के रिलीज की ख़बर सुनते ही रिक्शा वालों ने इसे थिएटर में देखने के लिए पैसे बचाने शुरू कर दिए थे।

यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ दिनेश लाल यादव निरहुआ

इसके बाद निरहुआ की एक से एक फ़िल्म आई। उन्होंने भोजपुरी बोलने वाले दर्शकों के एक ऐसे वर्ग को आकर्षित किया जो डाली था, ग़रीब था, माध्यम वर्ग का युवा था, यूपी-बिहार से बाहर नौकरी कर रहा समूह था। मनोज तिवारी के गाँव वाले इमेज को एक क़दम आगे ले जाते हुए निरहुआ ने अपनी फ़िल्मों को उन्हें विलेन दर्शाया जो विधायक थे, मुखिया थे, दबंग थे, औरतों से अच्छा व्यवहार नहीं करते थे और ग़रीबों का शोषण करते थे। विलेन का एक भरा-पूरा खानदान होता था, जिसके क्रूर सदस्यों को एक-एक कर निरहुआ द्वारा ‘सैंत’ दिया जाता था। उनकी प्रेमिका किसी दबंग की बहन-बेटी ही होती थी, जिसके लिए वो कुछ भी कर गुज़रते थे।

कपिल शर्मा के शो में निरहुआ, आम्रपाली और खेसारी लाल

भोजपुरी सिनेमा बॉलीवुड के 80 के दशक को फिर से जी रहा था और दर्शक उसमे पूरी रुचि ले रहे थे। अगर औरतें मनोज तिवारी की ‘मंगलसूत्र’ देखने जा रही थी तो बच्चे-बूढ़े ‘निरहुआ हिन्दुस्तानी’ देख कर तालियाँ पीट रहे थे। ये फ़िल्म सीरीज आज भी चल रही है। अब निरहुआ का अपना अलग प्रोडक्शन हाउस है, उनकी फ़िल्म ‘बॉर्डर’ को बॉक्स ऑफिस पर अच्छी सफलता मिली है और आगे भी वो फ़िल्म निर्माण में और सक्रिय होने वाले हैं। निरहुआ अपनी फ़िल्मों के प्रोमोशन के लिए भी अलग-अलग तरीके आज़माते हैं कभी वो मोतिहारी में क्रिकेट मैच खेलने निकल जाते हैं तो कभी साइकल से सैर पर निकल लेते हैं। बिहार के इन इलाक़ों में उनके पहुँचने की ख़बर सुनते ही हज़ारों की भीड़ जुटती हैं, जिनमे युवतियाँ भी होती हैं।

दिल्ली प्रदेश भाजपा अध्यक्ष मनोज तिवारी के साथ निरहुआ

निरहुआ को अपनी माँ से ख़ास लगाव है। एक बार जब एक फ़िल्म की शूटिंग कर के घर पहुँचे तो उनकी माँ से उनसे कहा ‘ऐ बबुआ, तू हेतना ज्यादा पैसा कमालिस लेकिन अभियो फाटल जीन्स काहे पेन्हले बारे?‘ अर्थात, तुम इतना ज्यादा रुपया कमाते हो, फिर भी तुमने ये फ़टी हुई जींस क्यों पहन रखी है? दरअसल, आजकल ‘Ripped Jeans’ का चलन है और निरहुआ इसे ही पहने हुए थे, जिसे उनकी माँ से फटा कपड़ा समझ लिया। इस वाकये से आप समझ सकते हैं कि आज के दौर में भोजपुरी के जुबली स्टार कहा जाने वाला व्यक्ति कितनी सीधी और ज़मीन से जुड़ी पारिवारिक पृष्ठभूमि से आता है। 2007 में निरहुआ ही थे, जिन्होंने अंतरर्राष्ट्रीय स्तर पर शो और कार्यक्रम कर के विदेश में रह रहे उत्तर भारतीयों को भोजपुरी सिनेमा के नए उत्थान से रूबरू करवाया था।

निरहुआ के पुराने दिन, बिरहा स्टाइल के गाने

अपनी फ़िल्मों को लोकप्रियता मिलते देख निरहुआ ने कई अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम किए, विदेशी डिस्ट्रीब्यूटर्स से बात कर अपने गानों को विदेशों में भी रिलीज करवाया। ये सब आज से एक दशक से भी पहले की बात है। अब निरहुआ भोजपुरी की पहली वेब सीरीज ‘हीरो वर्दी वाला’ की रिलीज के लिए तैयार हैं और जल्द ही एकता कपूर के साथ ये उनका पहला कोलैबोरेशन है। आज प्रति फ़िल्म 40 लाख रुपया लेने वाला कभी पाँच भाई-बहनों के साथ एक छोटे से घर में रहा करता था। निरहुआ भोजपुरी स्टार हैं, आप उनका मज़ाक बना सकते हैं लेकिन आपको पता होना चाहिए कि वो भोजपुरी दर्शकों को वो देते हैं, जो उन्हें चाहिए। अब निरहुआ ने भोजपुरी से अश्लीलता मिटाने का संकल्प लिया है और उन्होंने इसके लिए सभी अभिनेताओं-गायकों सहित ख़ुद को भी दोष दिया।

मोतिहारी में बॉर्डर के प्रमोशन के लिए क्रिकेट मैच खेलने पहुँचे निरहुआ, भीड़ के कारण मैच पूरा नहीं हो सका

असल ज़िन्दगी में निरहुआ कितने सीधे-सादे हैं, ये देखने के लिए कपिल शर्मा के वो एपिसोड्स देखें, जिनमें भोजपुरी कलाकारों का जमावड़ा लगा था। जहाँ एक तरफ मनोज तिवारी वक्ता हैं, विचारों को आवाज़ देना जानते हैं, निरहुआ आज भी एक बच्चे की तरह व्यवहार करते हैं, उन्हें तुरंत प्रतिक्रया देना नहीं आता, वो कई स्टारों की तरह बड़बोले नहीं हैं और वाद-विवाद में उतनी रूचि नहीं रखतेव् हालाँकि, समय और स्टारडम बढ़ने के साथ उन्होंने सार्वजनिक मंचों पर खुल कर बोलने की कला धीरे-धीरे विकसित कर ली है। वो बिग बॉस का भी हिस्सा रह चुके हैं, उसमे उनपर ज्यादा ड्रामेटिक होने के आरोप लगे थे। उन्होंने बताया था कि वो बिग बॉस में इसीलिए गए थे ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग उनके बारे में जान सकें।

नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में विश्वास जताने वाले निरहुआ को आजमगढ़ से उतारा है। अब देखना यह है कि भोजपुरी सिनेमा के फलक पर चमक रहे निरहुआ राजनीति में कहाँ तक पहुँचते हैं। आजमगढ़ से उनका मुक़ाबला यूपी के दिग्गज नेता व पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से है। अखिलेश से उनके अच्छे रिश्ते हुआ करते थे, ऐसे में ये मुक़ाबला देखने दिलचस्प होगा।

ब्रिटिश संसद में 312 सालों में पहली बार कपड़े उतार कर हुआ नग्न विरोध प्रदर्शन

312 साल पुरानी ब्रिटेन की संसद के इतिहास में सोमवार (अप्रैल 01, 2019) को पहली बार लगभग नग्न होकर प्रदर्शन किया गया। ये कार्यकर्ता ब्रेक्जिट करार की शर्तों में क्लाइमेट चेंज के मुद्दा शामिल नहीं करने पर नाराज थे और इस बात से नाराज पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने अन्तःवस्त्रों में प्रदर्शन किया।

एक्सिंटशन रेबेलियन ग्रुप के 11 कार्यकर्ताओं ने संसद (हाउस ऑफ़ कॉमन्स) पब्लिक गैलरी में 20 मिनट तक अर्धनग्न होकर प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारी गैलरी में बनी काँच की दीवार से सटकर खड़े थे और इनकी पीठ सांसदों की तरफ थी। इनकी छाती पर ‘सबकी जिंदगी के लिए’ (For All Life) जैसे नारे लिखे थे। पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को सार्वजनिक स्थल की गरिमा भंग करने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया।

1978 में घोड़े की लीद फेंक कर हुआ था प्रदर्शन

जुलाई 1978 में माल्टा के पूर्व प्रधानमंत्री डोम मिन्टॉफ की बेटी याना ने स्कॉटिश होम रूल पर बहस के दौरान गैलरी से सांसदों पर घोड़े की लीद से भरे बैग फेंके थे। ये बैग फट गए थे और गंदगी बेंच व सांसदों पर फैल गई थी। इस तरह से एक बार साल 2004 में प्रदर्शनकारियों द्वारा बैंगनी आटा फेंका गया था। फादर्स फॉर जस्टिस के कार्यकर्ताओं ने तत्कालीन प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर पर पर्पल फ्लोर (बैंगनी आटा) फेंका था। प्रदर्शनकारी तलाकशुदा पिता की बच्चों से मुलाकात के कानून को लचीला बनाने की माँग कर रहे थे।

1707 में बनी थी ब्रिटेन की संसद

ध्यान रहे कि ब्रिटेन की संसद 1707 में बनी थी। दुनिया के कई लोकतंत्रों के लिए यह उदाहरण है, इसलिए इसे मदर ऑफ पार्लियामेंट भी कहा जाता है।

फेसबुक का न्यूज़ टैब: क्वालिटी कंटेंट या न्यूज़ के नाम पर वामपंथी ज़हर को फीड में घुसाने की कोशिश?

फ़ेसबुक के CEO मार्क ज़ुकरबर्ग ने हाल में जर्मनी और यूरोप के सबसे बड़े डिजिटल प्रकाशन हाउस एक्सेल स्प्रिंगर के सीईओ मैथियास डॉप्फ्नर से बात की। यह ज़ुकरबर्ग की उस संवाद श्रृंखला का हिस्सा है जिसमें वह कई सारे बिजनेस और टेक्नोलॉजी कम्पनियों के टॉप लीडर्स से तकनीक और समाज के भविष्य के बारे में वार्तालाप कर रहे हैं।

इसी दौरान ज़ुकरबर्ग ने खुलासा किया कि वे फ़ेसबुक ऐप पर न केवल उच्च-गुणवत्ता वाली ख़बरों के लिए एक अलग टैब बनाना चाहते हैं बल्कि वे इसके लिए उन समाचारों के प्रकाशकों को धनराशि भी देने के लिए तैयार हैं। यह फ़ेसबुक के समाचारों को लेकर पिछले स्टैंड से अलग है। पिछले वर्ष फ़ेसबुक ने यह घोषणा की थी कि वह अपने यूज़र्स की न्यूज़ फीड में ‘समाचार’ कम और उनकी फ्रेंडलिस्ट में जुड़े हुए लोगों की पोस्ट्स ज्यादा दिखाएगा।

इस बात का सामान्य यूज़र्स ने स्वागत किया था क्योंकि पिछले काफी समय से पाश्चात्य बौद्धिक जगत में फ़ेसबुक और ट्विटर न्यूज़ फीड के पूर्ण राजनीतिकरण को लेकर लोग खिन्न चल रहे थे। पर समाचार प्रकाशकों समेत डिजिटल कंटेंट के क्षेत्र में काम करने वाली कम्पनियों ने इसका विरोध किया था- खासकर कि मेनस्ट्रीम मीडिया ने यह निराशा जताई थी कि इससे उनकी कमाई के स्रोत और भी कम हो जाएँगे।

गौरतलब है कि मुख्यधारा के मीडिया की कमाई का सबसे बड़ा पारंपरिक स्रोत विज्ञापन होते थे, जो गूगल और फ़ेसबुक के आने के बाद से बहुत कम हो चुका है- यहाँ तक कि द गार्जियन जैसा पुराना अख़बार भी अब अपने हर लेख के नीचे अपने पाठकों से आर्थिक सहयोग की अपील करता है।

समाचारपत्रों को मिलेगी नई जान?

यूरोप की संसद में पहले ही एक ऐसे कानून पर बहस चल रही है, जिसके अंतर्गत सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स- जैसे फेसबुक, यूट्यूब आदि- को किसी कॉपीराइट वाली सामग्री के अपने प्लेटफ़ॉर्म पर इस्तेमाल के बदले लाइसेंस फीस चुकानी होगी। यहाँ तक कि यदि कोई यूज़र फ़ेसबुक पर कोई लिंक शेयर करता है और snippet/preview में कॉपीराइट के अंतर्गत आने वाली सामग्री है तो संभव है कि फ़ेसबुक को उस सामग्री के कॉपीराइट की लाइसेंस फ़ीस देनी पड़े

यदि समाचारपत्र और समाचार पोर्टल इस हद की तंगहाली से गुज़र रहे हैं तो जाहिर है कि उनके हिसाब से फ़ेसबुक का उनकी ख़बरें दिखाने के लिए उन्हें पैसे देना किसी संजीवनी से कम नहीं है।

इसके अलावा जो लोग समसामयिक ख़बरों में ज्यादा दिलचस्पी रखते हैं, उनके लिए भी फेसबुक की यह सेवा लाभदायक होने की उम्मीद है क्योंकि फ़ेसबुक प्रतिष्ठित प्रकाशनों की सामग्री छाँट कर उन तक पहुँचा देगी।

अपने राजनीतिक दबदबे और bias को और मजबूत करने की तैयारी?

सिक्के के दूसरे पहलू की और देखें तो फ़ेसबुक की इस योजना की स्याह संभावनाएँ भी कम नहीं हैं। फ़ेसबुक के सर्वेसर्वा मार्क ज़ुकरबर्ग अमेरिकी संसद से बात करते हुए यह मान चुके हैं कि उनकी संस्था वामपंथी झुकाव वाली है। यह झुकाव न ही केवल उनके लोगों का व्यक्तिगत मतदान झुकाव है, बल्कि यह आग्रह फ़ेसबुक की नीतियों से लेकर किसे बैन करना है, किसे चलने देना है जैसे निर्णयों तक फैला है। कुछ समय पहले यह खबर आई थी कि फेसबुक ने अमेरिका में दक्षिणपंथी झुकाव के मशहूर लोगों की पोस्ट्स पर गुप्त रूप से अड़ंगे लगाने शुरू कर दिए थे। हाल ही में भारत में फ़ेसबुक ने अकारण ही भाजपा समर्थक एक बड़े पेज The Third Eye और कॉन्ग्रेस समर्थक 600+ छोटे-मोटे पेजों को बैन कर दिया था।

ऐसे में यह अति महत्वपूर्ण सवाल है कि क्या फ़ेसबुक इस टैब में भी वामपंथी और अपने bias पर आधारित ख़बरें ही चलाएगा?

निकल जाओ यहाँ से, चले जाओ पाकिस्तान: पल्लवी जोशी ने नसीरुद्दीन और आमिर से कहा

पल्लवी जोशी आने वाली फिल्म ‘द ताशकंद फाइल्स’ में मुख्य भूमिका में नजर आएँगी। इसी फिल्म की प्रचार और तैयारी के दौरान उन्होंने उन सभी सितारों को लेकर रिएक्ट किया, जिन्होंने पिछले दिनों देश में ‘असुरक्षा का माहौल’ फैलने पर ‘देश छोड़ने’ की बात की थी। आमिर खान, नसीरुद्दीन शाह और आलिया भट्ट की माँ सोनी राजदान इस तरह के बयान देकर सुर्खियों में आ चुके हैं।

NBT को दिए एक इंटरव्यू में एक्ट्रेस पल्लवी जोशी ने आमिर और नसीरुद्दीन शाह के बारे में पूछे जाने पर कहा, “आप लोग जाइए पाकिस्तान, अगर आप वहाँ खुश हैं तो जरूर जाइए। अगर आप यहाँ अपने आप को असुरक्षित महसूस करते हैं तो जरूर जाइए। निकल जाइए यहाँ से।”

अपने इंटरव्यू में पल्लवी जोशी ने कहा, “मैं जानती हूँ कि देश में असुरक्षित महसूस करने वाली बात नसीरुद्दीन शाह ने कही थी। उन्हें लगता है कि वह भारत में सुरक्षित नहीं है। ऐसे में उन्हें वहाँ जाना चाहिए जहाँ वे सुरक्षित हैं। यह उनके विचार हैं, इसमें हम कुछ नहीं कह सकते।” पल्लवी जोशी की फिल्म ‘द ताशकंद फाइल्स’ में अभिनेता नसीरुद्दीन शाह भी हैं।

देश में असुरक्षित महसूस करने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की हानि को लेकर आमिर खान ने भी काफी चर्चा बटोरी थी। अपनी फिल्मों के प्रचार के लिए अनाप-शनाप बयान देने के लिए मशहूर आमिर खान ने कहा था कि देश का माहौल देखकर उन्हें लगने लगा है कि वो भारत से बाहर चले जाएँ। इसके अलावा, कुछ दिन पहले ही आलिया भट्ट की माँ और महेश भट्ट की पत्नी सोनी राजदान ने भी कहा था कि वह पाकिस्तान में ज्यादा खुश रहेंगी।

अपनी फिल्म ‘नो फादर्स इन कश्मीर’ के प्रमोशन के लिए उन्होंने पाकिस्तान जाकर रहने तक की बात बोल डाली थी। सोनी राजदान ने बयान दिया था कि जब भी वह कुछ बोलती हैं तो ट्रॉल का हिस्सा बन जाती हैं। उन्हें देशद्रोही कहा जाता है। इसलिए कभी-कभी वह सोचती हैं कि उन्हें पाकिस्तान ही चले जाना चाहिए, वह वहाँ पर ज्यादा खुश रहेंगी। 

फ्रीडम ऑफ स्पीच की बात करते हुए पल्लवी जोशी ने कहा, “जैसे मुझे अपने पूरे विचार रखने की आजादी है, वैसे उनको भी विचार रखने की आजादी है, जो उन्होंने रखे हैं और इसके बाद जिस तरह से लोगों ने उनके विचारों पर प्रतिक्रिया दी है, उन लोगों को भी अपने विचारों को रखने की आजादी है। फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन तो सबके लिए सब जगह है। अब ऐसा तो हो नहीं सकता कि मैं अपने विचार रखूँ और उसको लेकर लोग अपने विचार मुझे न सुनाएँ।” 

पल्लवी जोशी जल्द ही फिल्म ‘द ताशकंद फाइल्स’ में नजर आने वाली हैं। फिल्म देशभर के सिनेमाघरों में 12 अप्रैल को रिलीज हो रही है।

35% तक बढ़ेंगे हिंदू-ईसाई, 73% की बढ़ोत्तरी के साथ इस्लामी आबादी 2050 तक होगी हिंदुओं की दोगुनी

आज दुनिया सिकुड़ती और आबादी बढ़ती ही जा रही है, लोग जनसंख्या विस्फोट से त्रस्त हैं, इसके कारण समस्याएँ खड़ी होने लगी हैं। लेकिन कुछ हैं, जो आँखें मूँदे हुए हैं। इस्लामिक जगत पूरे विश्व में अन्य समुदायों की तुलना में 150% ज्यादा प्रजनन कर रहा है। यह हम नहीं, दुनिया के सबसे ‘लिबरल’ देश अमेरिका का fact-tank प्यू रिसर्च सेंटर कह रहा है। अपनी इस रिपोर्ट में उसने चेतावनी दी है कि जहाँ दुनिया के बाकी बड़े मज़हब महज 11% (स्थानीय उपासना पद्धतियाँ) से लेकर 34-35% (ईसाई और हिंदुत्व) तक की दर से बढ़ रहे हैं, और बौद्ध मतावलंबी तो 0.3% से घट रहे हैं, वहीं इस्लाम 73% से ज्यादा तेजी से बढ़ रहा है- वह भी ज्यादा बच्चे पैदा करके। दुनिया की जरूरतों के लिए वैसे ही कम पड़ रहे संसाधनों के बीच यह खबर अत्यंत निराशाजनक है।

मुस्लिमों की आबादी बाकियों से दोगुनी से ज्यादा रफ्तार से बढ़ रही है

2050 तक 9 अरब हो जाएगी दुनिया की आबादी

प्यू के शोधकर्ताओं को उम्मीद है कि दुनिया की आबादी आने वाले 30 वर्षों में बढ़ कर 930 करोड़ के करीब होगी। यह 2010 के आँकड़े से 35% अधिक होगा।

रिपोर्ट के आँकड़ों पर नज़र डालें तो कुछ मज़हब (यहूदी, बहाई आदि) दुनिया की औसत आबादी वृद्धि दर की आधी दर से अपनी आबादी बढ़ा रहे हैं। जबकि हिन्दू-ईसाई की आबादी औसत दर से ही बढ़ रही है। इसके उलट या यूँ कहें कि चिंताजनक स्थिति मुस्लिम समुदाय की है, जिनकी आबादी औसत दर की दोगुनी तेजी से बढ़ रही है।

प्रतिशत के अलावा संख्या की बात करें तो भी ईसाई साल 2010 के 216 करोड़ से बढ़कर 2050 में 290 करोड़ हो जाएँगे। वहीं हिन्दू 2010 में 103 करोड़ से 2050 में 138 करोड़ तक पहुँचेंगे। जबकि मुस्लिम 2010 में महज 159 करोड़ की जनसंख्या के मुकाबले 2050 में 276 करोड़ के आस-पास होंगे।

क्या दुनिया इतनी आबादी झेल पाएगी?

आदर्श दर 2.1, औसत दर 2.5, मुस्लिम बढ़ रहे @3.1

प्यू के अनुसार दुनिया की औसत fertility rate 2.5 के करीब है। fertility rate का अर्थ है किसी भी समुदाय या समूह में प्रति महिला कितने बच्चे पैदा होते हैं। दुनिया की आबादी स्थिर रखने के लिए ज्यादातर समाज शास्त्री मानते हैं कि आदर्श स्थिति में fertility rate 2.1 (2 के हल्का सा ऊपर) होना चाहिए- ताकि वे दो बच्चे आने वाले समय में अपने माँ-बाप की मृत्यु के उपरांत उनका स्थान लें और लम्बे समय में दुनिया पर अतिरिक्त बोझ न पड़े।

पूरे विश्व की औसत fertility rate 2.5 है। जो बढ़ती हुई आबादी को देखते हुए आदर्श दर से तो ज्यादा है, पर चिंताजनक स्तर पर नहीं है। यदि जनजागरण अभियान चला कर लोगों को बढ़ी आबादी के नुकसान के बारे में बताया जाए, और कुछ प्रतिशत युगलों (खासकर महिलाओं) को बच्चे पैदा न करने के लिए आर्थिक प्रोत्साहन दिया जाए, तो कुछ दशकों में 2.5 को 2.1 के पास तक खींच सकने की उम्मीद की जा सकती है। हिन्दुओं की fertility rate 2.4 है, यानी हिन्दू आबादी रोकथाम की ओर अग्रसर दिख रही है।

अब इस्लाम की ओर देखें तो मुस्लिमों की fertility rate 3.1 है- यानी दुनिया की जरूरत का 150%!! मतलब हर एक मुस्लिम युगल (पति-पत्नी) अपने बाद दो के बजाय तीन इंसान का बोझ दुनिया को दे जाता है।

(यहाँ गणितीय सरलता के लिए हम मुस्लिमों के बहु-विवाह सिद्धांत, जिसके अंतर्गत हर मुस्लिम पुरुष को इस्लाम 4 बीवियाँ तक रखने की इजाज़त देता है, को शामिल नहीं कर रहे। अगर करते तो गणितीय तौर पर यह आँकड़ा कहता कि एक मुस्लिम पुरुष और उसकी 4 पत्नियों की मृत्यु के बाद औसत तौर पर उनके 12 वंशज होते – यानी मरे 5 और आए 12)

प्रतीकात्मक चित्र

अलका लाम्बा ने AAP विधायक को कहा, थूक कर चाटना आपको शोभा नहीं देता!

आम आदमी पार्टी और उसके कार्यकर्ताओं की ग्रह दशा कुछ ठीक नहीं चल रही है, यही वजह है कि पार्टी प्रमुख अरविन्द केजरीवाल गठबंधन के लिए संघर्षरत नजर आ रहे हैं और पार्टी विधायक अलका लाम्बा केजरीवाल जी की अनदेखी से परेशान रहा करती हैं। इसी वजह से अलका लाम्बा ट्विटर पर हर दूसरे दिन किसी ना किसी नेता पर ‘अरविन्द केजरीवाल मॉडल’ पर भिड़ती हुई नजर आती हैं।

इस बार अटेंशन की कमी से जूझती AAP विधायक अलका लाम्बा ने अपनी पार्टी विधायक से ही बहस करते हुए बड़ी बात कह डाली। AAP के दोनों नेताओं के बीच विवाद मंगलवार (मार्च 03, 2019) को कॉन्ग्रेस की ओर से जारी किए गए घोषणापत्र के बाद हुआ।

दिल्ली में AAP और कॉन्ग्रेस के गठबंधन की अटकलों के बीच अलका लांबा ने ट्वीट किया और अपनी ही पार्टी की दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने की माँग पर सवाल उठा दिया। उन्होंने लिखा, “हर पार्टी का अपना घोषणा पत्र होता है, कॉन्ग्रेस के घोषणा पत्र में पॉन्डिचेरी को तो पूर्ण राज्य देने की बात है, पर दिल्ली को लेकर कोई बात नही है, साफ है कि कॉन्ग्रेस के लिए अब ‘दिल्ली-पूर्ण राज्य’ मुद्दा नही रहा। वहीं AAP इसी मुद्दे को अपना प्रमुख मुद्दा बना रही है, गठबंधन कैसे होगा?”

अलका लांबा के इस ट्वीट के बाद AAP विधायक सौरभ भारद्वाज ने ट्वीट कर लिखा, “आप क्या चाहती हैं? पूर्ण राज्य या …..”

विधायक सौरभ भारद्वाज के इस ट्वीट के बाद अल्का ने ट्वीट कर लिखा, “मेरे चाहने ना चाहने से क्या फ़र्क पड़ता है…. वैसे भी यह पूछने का समय अब निकल चुका है… अब तो दिल्ली की जनता ही तय करेगी।”

इस पर सौरभ ने लिखा कि जनता को पता होना चाहिए, उनका नेता क्या चाहता है, तभी तो जनता अपने नेता के बारे में तय करेगी। इसके बाद अलका लाम्बा ने सीधा फ़्रंटफूट पर आकर जवाब दिया, “मेरी जनता मुझे बखूबी जानती है, 2020 आने पर पूरे 5 साल का जवाब-हिसाब और क्या सोचती हूँ, सब बता दूँगी, दूसरी बात मैं आप से उलट सोचती हूँ, जनता से अधिक नेता को पता होना चाहिए कि उसकी जनता क्या सोचती और चाहती है, नेता को वही करना चाहिए, ना कि जनता पर अपनी थोपनी चाहिए”

इस पर सौरभ ने उन्हें ट्रॉल करते हुए पूछा, “जनता से पूछना कि ‘कॉन्ग्रेस में चली जाऊँ?’ अगर जनता ‘हाँ’ कह दे, तो इसको साइन करके भेज देना, बाक़ी ज़िम्मेदारी आपके इस भाई की। अगर जनता ‘ना’ कहे तो अनुशासन से रहो, तब भी ज़िम्मेदारी इसी भाई की। अब सो जाओ, शुभ रात्रि।”

सौरभ के इस ट्वीट के जवाब में अलका ने लिखा, “छोटे भाई, धोखा मत दो बड़ी बहन को, यह आदत अब बदल लो, वचन दिया है, अब कल 3 बजे, जामा मस्जिद गेट नंबर 1 पर पहुँच जाना थूक कर चाटने की आदत तो भाजपाइयों की है, आप को यह शोभा नही देता। कल मुझे छोटे भाई सौरव का इंतज़ार रहेगा। शुभ रात्रि, जय हिंद !!!

इसके बाद अलका लाम्बा ने अरविन्द केजरीवाल का नाम लिए बिना उनकी तानाशाही की ओर इशारा करते हुए एक स्वरचित भावुक और सुंदर कविता को भी ट्विटर पर पोस्ट किया जिसके बोल हैं,
“जिसे हम #लोकतंत्र समझते थे,
आज #प्रश्न करने पर उन्हें वह #अनुशासनहीनता लगने लगी।
तानाशाही के दौर में,
लगता है उसे भी अब कुछ सुनना पसंद नही।
बड़े आये, बड़े चले गए,
ना कुछ लाया था साथ,
ना कुछ साथ ले जायेगा।
घमंड में कोई लंबा जिया नही।
कुर्सी तो आनी जानी है,
लालच इसका हमें नही !”

ट्विटर पर चल रही 2 खलिहर विधायकों की इस चकल्लस पर ट्विटर यूजर्स ने दोनों विधायकों को सलाह देते हुए कहा कि दोनों भाई-बहन कॉल कर के लड़ लो और घर के मामलों को इस तरह से सड़क पर मत लाओ।

‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ से कॉन्ग्रेस को सहानुभूति, कॉन्ग्रेस का हाथ, देशद्रोहियों के साथ: PM मोदी

कॉन्ग्रेस पार्टी के घोषणापत्र को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र ने पार्टी पर निशाना साधा है। बता दें कि कॉन्ग्रेस के घोषणापत्र में राजद्रोह की धाराएँ हटाने की बात की है। इस पर सवाल खड़े करते हुए प्रधानमंत्री ने कॉन्ग्रेस पार्टी को आड़े हाथों लिया। अरुणाचल प्रदेश स्थित पासीघाट में एक विशाल जनसभा को सम्बोधित करते हुए उन्होंने कॉन्ग्रेस के घोषणापत्र को झूठ का पुलिंदा बताते हुए नारा दिया, ‘कॉन्ग्रेस का हाथ, देशद्रोहियों के साथ’। पीएम ने कॉन्ग्रेस के घोषणापत्र को ढकोसला पत्र करार देते हुए कहा कि इसमें सिर्फ़ झूठ ही झूठ है। मोदी ने कहा कि पासीघाट पहले जंगल हुआ करता था लेकिन केंद्र सरकार ने कनेक्टिविटी बढ़ाने का कार्य किया है, जिससे यहाँ अब घर-घर में उजाला है।

इस दौरान पीएम ने सवालिया लहजे में कहा:

“कॉन्ग्रेस देश के साथ है या फिर देशद्रोहियों के साथ है? कॉन्ग्रेस ने देश को गाली देने वालों के लिए भी एक योजना बनाई है। भारत तेरे टुकड़े होंगे के नारे लगाने वाले, तिरंगा जलाने वाले और आंबेडकर की मूर्तियाँ तोड़ने वालों से भी कॉन्ग्रेस को सहानुभूति है। जो भारत के संविधान को नहीं मानते ऐसे लोगों के खिलाफ देशद्रोह का जो क़ानून है उसको खत्म करने का वादा कॉन्ग्रेस पार्टी ने किया है।”

बता दें कि कॉन्ग्रेस पार्टी ने आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पावर्स एक्ट, 1958 (AFSPA) में भी संशोधन करने की बात कही है। पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टेन अमरिंदर सिंह ख़ुद इससे छेड़छाड़ करने के विरोधी रहे हैं। ऐसे में क्या इस संवेदनशील एक्ट में संशोधित कर भारतीय सुरक्षा एजेंसियों को पंगु बना दिया जाएगा? राष्ट्रीय सुरक्षा पर कॉन्ग्रेस का घोषणापत्र असंवदेनशील है, सुरक्षा से खिलवाड़ करने वाला है, एनएसए जैसे अधिकारियों को नेताओं के बीच खड़ा करने वाला है और मानवाधिकार की आड़ में सुरक्षा बलों को पंगु बनाने वाला है। इस से देश की संवेदनशील सुरक्षा के मुद्दे भी सार्वजनिक हो जाएँगे। कॉन्ग्रेस ने मानवाधिकार के साथ यौन हिंसा का जिक्र कर सुरक्षा बलों को कठघरे में खड़ा करने का कार्य किया है।

केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने देशद्रोह को अपराध श्रेणी से खत्म करने वाली बात पर कहा कि जो पार्टी इस तरह की बातें करती है वो देश के एक भी वोट पाने की हकदार नहीं है। कॉन्ग्रेस के घोषणापत्र पर जेटली ने कहा कि इसमें माओवादियों और जेहादियों की रक्षा करने के लिए सीआरपीसी में बदलाव की बात हुई।

उधर नाराज़ सोनिया गाँधी ने न सिर्फ़ घोषणापत्र तैयार करने वाली समिति के सदस्य राजीव गौड़ा को फटकार लगाई बल्कि पी चिदंबरम से भी बात करके अपनी आपत्ति दर्ज कराई। ख़बर है कि सोनिया गाँधी कॉन्ग्रेस घोषणापत्र के कवर पेज पर अपने बेटे राहुल गाँधी के छोटे चित्र को लेकर नाख़ुश हैं। उन्होंने पार्टी नेताओं से पूछा कि राहुल की फोटो कवर पेज पर बड़ी क्यों नहीं रखी गई?

मलाला से सवाल पूछने वालों को भेजी जा रही प्राइवेट पार्ट्स की तस्वीरें, ये है Pak समर्थकों का असल चेहरा

विगत दिनों होली के दौरान पाकिस्तान में दो हिंदू लड़कियों के अपहरण और फिर उनकी जबरन अधेड़ मुस्लिम से शादी करवाने की खबर पर सोशल मीडिया पर खूब विरोध देखने को मिला था।

ट्विटर पर एक बड़े वर्ग ने पाकिस्तान से इस मामले पर कार्रवाई कर वहाँ पर रहने वाले हिन्दू अल्पसंख्यकों को न्याय दिलाने के लिए आवाज उठाई थी। यूँ तो पाकिस्तान जैसे देश से धार्मिक सहिष्णुता और सद्भाव की उम्मीद करना एक दिवास्वप्न देखने जैसा है, लेकिन बात जब महिला उत्पीड़न की आती है तो ऐसे में उन लोगों का समर्थन विशेष मायने रखता है, जिन्होंने अपने हौंसले से समाज में एक अलग पहचान बनाई है। स्वाभाविक सी बात थी कि इतने संवेदनशील विषय पर आम लोग ऐसे चेहरे से भी समर्थन और मदद की उम्मीद करते हैं।

ऐसे में नोबेल प्राइज विजेता मलाला यूसफ़जई को जब लोगों ने इस विषय पर आवाज उठाने की बात कही तो उन्होंने ख़ामोशी धारण कर ली और सवाल पूछने वालों को जवाब देने के बजाए ब्लॉक कर दिया।

असल कहानी इसके बाद शुरू हुई, जब मलाला से सवाल पूछने वाले लोगों के ट्विटर और फेसबुक इनबॉक्स में उन्हें अश्लील तस्वीरें भेजी जाने लगीं। मलाला से महिलाओं के अधिकार पर आवाज उठाने की माँग करने वाली लड़कियों के ट्विटर एकाउंट्स में अपने जननांगों की तस्वीरें भेजने वाले ये लोग पाकिस्तान और कश्मीर के युवा थे। भारतीय मीडिया गिरोह इन्हें भटके हुए युवाओं के नाम से जानता है, जो या तो किसी हेडमास्टर के बेटे निकल जाते हैं या फिर भारतीय सेना द्वारा सताए गए मजबूर युवा।

मलाला से सवाल पूछने पर कुछ भटके हुए युवाओं ने रोजगार की कमी के चलते ट्विटर यूजर के इनबॉक्स में रोजाना अश्लील तस्वीरें भेज रहे हैं

पुलवामा आतंकी हमले के दौरान भारतीय मीडिया गिरोह की प्रमुख अभियुक्त बरखा दत्त को भी कुछ लोगों ने परेशान करने और प्रताड़ित करने के उद्देश्य से अपने जननांग की तस्वीरें भेज डाले थे। बरखा दत्त ने इसके बाद कुछ लोगों के मोबाइल नम्बर सार्वजानिक कर दिए थे। हालाँकि, कुछ दिन बाद ही पुलिस उन्हें पकड़ने में कामयाब रही और कसाई शब्बीर गुरफान के साथ 3 लोग गिरफ़्तार कर लिए गए थे।

लेकिन ट्विटर पर मलाला से हिन्दू लड़कियों को इंसाफ दिलाने की बात करने वाली लड़की को मलाला ने ब्लॉक कर दिया और इसके बाद पाकिस्तान और शायद सम्प्रदाय विशेष के लोगों ने, एक साथ लड़की के इनबॉक्स में अपने जननांगों की फोटो भेजनी शुरू कर दी। फेसबुक और ट्विटर का हिन्दू और दक्षिणपंथियों के प्रति पूर्वग्रह और पक्षपात भी अब जगजाहिर है। इस युवती ने जब अपनी बात फेसबुक पर रखी तो उसके अकाउंट को सस्पेंड कर दिया गया और कम्युनिटी स्टैंडर्ड्स का हवाला दिया गया।

ये अश्लील तस्वीरें भेजने वाले लोगों में अधिकांश लोग पाकिस्तान के थे लेकिन हैरानी की बात ये है कि इनके साथ जम्मू कश्मीर के भी निवासी, जिनके नाम इसलिए नहीं लिए जाने चाहिए ताकि उनका मजहब का भेद न खुल जाए, इस ट्विटर यूज़र को अश्लील तस्वीरें भेजते जा रहे थे। वास्तव में किसी के नाम में उसका मजहब ढूँढ निकालना तार्किक है भी नहीं, लेकिन दिलचस्प बात ये है कि पुलवामा आतंकी हमले में बलिदानी सैनिकों पर हँसने वाले और महिला अधिकारों की बात करने पर लड़की को प्रताड़ित करने वाले लोगों के नाम एक जैसे ही नजर आते हैं, उनकी भौगोलिक सीमाएँ उनमें भेद करने में अक्षम हैं।

मामला सिर्फ अश्लील तस्वीरें भेजकर उसकी आवाज चुप करवाने तक सीमित नहीं है, जब इस लड़की ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट से इस बारे में राय रखी और फेसबुक पर मिलने वाली अश्लील तस्वीरें और भद्दे सन्देश शेयर किए तो लड़की के साथ वालों ने इसे घृणा और उपहास की नजर से भी देखना शुरू कर दिया। इनमें अधिकतर उसके साथ के वो युवा और ऑफिस के लोग हैं जिन्हें उसकी मदद करनी चाहिए।

इस लड़की ने अपने फेसबुक अकाउंट के जरिए अपनी बात रखने की कोशिश की है, जिसमें उसने कहा है कि वो अपनी बात करेगी और उन्हें जरूर जवाब देगी। ये हौसला सराहनीय है, इसका उपहास नहीं होना चाहिए, इस हौंसले को आवाज मिलनी चाहिए ताकि अश्लील तस्वीरें भेजने वालों को ये एहसास हो कि वो सिर्फ अपनी मानसिक विकृति का उदाहरण दे पा रहे हैं और इन तस्वीरों से ज्यादा उनके पास अभिव्यक्ति के लिए कुछ है भी नहीं, ये जननांग ही उनकी पहचान और उनका वास्तविक चेहरा है।    

हिन्दू महिलाओं के अपहरण और जबरन धर्म परिवर्तन की ये बात सार्वजानिक तब हुई थी, जब लड़कियों के पिता का एक वीडियो सोशल मीडिया पर शेयर किया जाने लगा। इस वीडियो में वो बेबस होकर दहाड़े मारकर रो रहे हैं और पुलिस के सामने अपनी शिकायत दर्ज कराने और दोषियों पर कार्रवाई करने की अपील करते हुए देखे गए, उनका कहना था कि उनकी दोनों बेटियों का अपहरण कर लिया गया और उनका धर्मांतरण कर निकाह करा दिया गया।

इसके बाद, केंद्रीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने जब लड़कियों के अपहरण पर विवरण मँगाया और पाकिस्तान में भारतीय उच्चायुक्त से घटना पर रिपोर्ट भेजने को कहा है तो पाकिस्तान के अधिकारीयों ने ट्विटर पर भारत को इस विषय पर उल्टा ज्ञान देते हुए देखा गया था कि भारत को उन्हें समझाने की जरुरत नहीं है।

पाकिस्तान जैसे देश मियाँ मिठ्ठू जैसे ठेके पर धर्म परिवर्तन कराने वाले लोगों को राजकीय सुरक्षा और सुविधाएँ देता है, उससे हिन्दुओं के अधिकारों पर चर्चा तो छोड़िए लेकिन महिलाओं के अधिकारों तक पर सवाल पूछना अतार्किक हो चुका है। फिर भी, हम कम से कम भारत में बैठे मीडिया से और नारीवादियों से ये उम्मीद तो कर ही सकते हैं कि इस विषय पर बात की जाए, ताकि महिलाओं के अधिकारों पर मुखर किसी लड़की को अपना एकाउंट डिएक्टिवेट कर के चुप ना बैठाया जा सके, ताकि महिलाओं के अधिकारों पर बात करने वालों को अपने कार्यस्थल और ऑफिस में लोगों की नजरों में शर्मिंदगी से न देखा जाए, बल्कि उसकी सराहना हो और अभिव्यक्ति की आजादी का नारा हमेशा बुलंद रहे।