केंद्र सरकार ने आतंकी संगठन जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट पर प्रतिबंध लगा दिया है। केंद्रीय गृह सचिव राजीव गाबा ने प्रेस से बात करते हुए बताया कि सरकार ने यह निर्णय गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम, 1967 (UAPA) के तहत लिया है। गौरतलब है कि लगभग 40 वर्षों तक JKLF पर प्रतिबंध नहीं लगाया जा सका था इस दृष्टि से अलगाववाद को रोकने के लिए उठाया गया यह बहुत ही महत्वपूर्ण कदम है।
It took India almost 50 years to ban Kashmir’s first major terror group #JKLF, which was at the forefront of massacring Pandits & driving them out of their homes! From hijacking of IA plane in 1971 to assassinating diplomat Ravindra Mhatre in 1984, JKLF was pioneer in terrorism.
जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट पर यह कार्रवाई पुलवामा आतंकी हमले के बाद कश्मीर के अलगाववादियों पर सरकार की जीरो-टॉलरेन्स नीति का परिणाम है। गत 14 फरवरी को हुए इस हमले में 40 CRPF जवान वीरगति को प्राप्त हुए थे। हमलावर आदिल अहमद डार कश्मीर का ही रहने वाला था, और हमले की जिम्मेदारी जैश-ए-मोहम्मद ने ली थी।
यासीन मलिक एक आतंकी है और ‘अलगाववादी नेता’ के रूप में प्रचारित किया जाता रहा है। वह जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट का चीफ भी है। जेकेएलएफ मूलतः एक आतंकवादी संगठन है जिसकी स्थापना 1977 में की गई थी। सन 1989 में इसी संगठन के आतंकियों ने हाई कोर्ट के जस्टिस नीलकंठ गंजू समेत कई कश्मीरी पंडितों की हत्या की थी। दिसंबर 1989 में JKLF द्वारा मुफ़्ती मुहम्मद सईद की बेटी रुबैया सईद का अपहरण किया गया था जिसके बदले में पाँच आतंकियों को छोड़ा गया था।
दिसंबर 8, 1989 को रुबैया सईद के अपहरण के बाद पंद्रह दिनों तक ड्रामा चला था जिसके बाद वी पी सिंह सरकार द्वारा अब्दुल हमीद शेख़, शेर खान, नूर मोहम्मद कलवल, अल्ताफ अहमद और जावेद अहमद जरगर नामक आतंकियों को जेल से छोड़ा गया था। चौदह साल बाद जेकेएलएफ के जावेद मीर ने रुबैया सईद के अपहरण की बात कबूल की थी।
अगले साल जनवरी 25 जनवरी 1990 को जेकेएलएफ ने भारतीय वायु सेना के पाँच अधिकारियों की हत्या कर दी थी। खुद यासीन मलिक ने भी बीबीसी को दिए इंटरव्यू में यह स्वीकार किया था कि उसने ड्यूटी पर जा रहे 40 वायुसैनिकों पर गोलियाँ चलाई थीं। कुछ समय पहले ही सीबीआई ने यासीन मलिक पर शिकंजा कसा था। प्रवर्तन निदेशालय ने भी कई अलगाववादी नेताओं समेत मलिक की सम्पत्ति जब्त की थी।
जिस जेकेएलएफ और यासीन मलिक पर महबूबा मुफ्ती की बहन के अपहरण का आरोप है, महबूबा उसी के समर्थन में खड़ी हो गईं हैं। ट्वीट करते हुए उन्होंने कहा कि यासीन मलिक ने हिंसा कब की छोड़ दी है। उनके अनुसार उसके संगठन को प्रतिबंधित करने से कुछ हासिल नहीं होगा, बल्कि कश्मीर खुली जेल में तब्दील हो जाएगा।
हाल ही में ऑपइंडिया ने राहुल गाँधी और HLपाहवा के बीच जमीनों की खरीद-फ़रोख्त के माध्यम से लम्बी हेराफेरी का खुलासा किया था जिसके तार आर्म डीलर संजय भंडारी से भी जुड़ते हैं। पूरा खुलासा इस बारे में था कि कैसे राहुल, प्रियंका और वाड्रा की तिकड़ी ने संजय भंडारी और CC थम्पी के साथ मिलकर औने-पौने दाम पर जमीन खरीद कर उन्ही को कई गुना अधिक दाम पर बेच देते थे। इससे इनकी आय तो लगातार बढ़ रही थी लेकिन सवाल अपनी जगह था कि भला कोई अपनी ही जमीन कम दाम में बेचकर कई गुना अधिक दाम में क्यों खरीदेगा। यहाँ दाल में काला नहीं बल्कि पूरी दाल ही काली नज़र आ रही है।
जमीनों की इस खरीद का जिक्र राहुल के 2009 के इलेक्शन एफिडेविट में भी है। जिसे कॉन्ग्रेस ने भी अपने बयान में स्वीकार किया है कि हाँ जमीन की डील हुई थी। लेकिन कॉन्ग्रेस ने आर्म डीलर संजय भंडारी से कनेक्शन पर कमेंट करने से इनकार किया।
इस पूरी कहानी के बाहर आने और कॉन्ग्रेस के इस पर कमजोर रेस्पॉन्स के कारण ये सवाल गहरा गया कि आखिर कहाँ से राहुल गाँधी इतने पैसे बना रहे हैं। राहुल गाँधी के एसेट्स पिछले कई सालों में बेतहाशा तरीके से बढ़े हैं। जिसका पता उनके 2004, 2009 एवं 2014 के इलेक्शन एफिडेविट से भी चलता है।
राहुल गाँधी की संपत्ति 2004 में 55,38,123 रुपए से बढ़कर 2009 में 2 करोड़ और आखिरकार, 2014 में 9 करोड़ रुपए से अधिक हो गई। यहाँ यह भी बताना ज़रूरी है कि 2011-12 में, राहुल गाँधी आय से अधिक इनकम के एक मामले में आरोपित थे। राहुल को AJL के माध्यम से 155 करोड़ रुपए के मामले में, आईटी विभाग ने राहुल गाँधी और सोनिया गाँधी को 100 करोड़ रुपए का टैक्स नोटिस भेजा था।
कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल के आय में इस तरह की खगोलीय वृद्धि देखकर, हर कोई आश्चर्यचकित है कि राहुल गाँधी की आय का स्रोत क्या है? यह देखते हुए कि उनके सार्वजनिक रिकॉर्ड के अनुसार एकमात्र वैध आय उनके द्वारा संसद सदस्य के रूप में निकाला गया वेतन है और वह ब्याज जो उन्हें उनके द्वारा जमा राशि से मिलता है।
हालाँकि, हलफनामे में आय के स्रोत का खुलासा नहीं किया गया है, राहुल गाँधी राजनीति में आने से पहले न तो पेशेवर थे और न ही उनके किसी वैध व्यवसाय में उनकी हिस्सेदारी हैं।
हमने राहुल की आय का स्रोत क्या हो सकता है के बारे में पड़ताल की तो…
2013 में राहुल और प्रियंका ने दिल्ली में 4.69 एकड़ के फार्महाउस को 6.7 लाख प्रति महीने की दर से FTIL (Financial Technologies (India) Ltd.) को रेंट पर दिया। 8 महीने 22 दिन (1 फ़रवरी 2013 से 22 अक्टूबर 2013) के रेंट से जो आय हुई उस पर इनकम टैक्स भी चुकाया गया, ऐसा रणदीप सुरजेवाला ने अपने बयान में जिक्र भी किया।
2013 में ही NSEL (National Spot Exchange Ltd) स्कैम बाहर आया। मार्च 2018 में CBI ने FTIL के मुम्बई मुख्यालय पर रेड मारा, साथ ही जिग्नेश शाह और उनके एक सहयोगी के ऑफिस और घर पर भी रेड डाला गया। जून 2013 में जब NSEL स्कैम बाहर आया, तब ये पता चला कि तब तक FTIL से राहुल और प्रियंका गाँधी मुनाफा कमा रहे थे और इसके एवज में कॉन्ग्रेस ने कंपनी को खुली छूट दे रखी थी।
2007-08 से 2012-13 के फाइनेंसियल ईयर के बीच, एक दूसरे औद्योगिक समूह से 3 करोड़ रुपए रेंट के रूप में राहुल और प्रियंका को प्राप्त हुआ। मजेदार बात ये है कि ये प्रॉपर्टी राहुल गाँधी के एफिडेविट में 9 लाख की प्रॉपर्टी के रूप में लिस्टेड है। अब यहाँ प्रमुख सवाल ये है कि जो प्रॉपर्टी मात्र 9 लाख की है उसको राहुल और प्रियंका ने 4-9 गुना अधिक रेंट पर कैसे दे दिया। एक और महत्पूर्ण बात ये कि इन औद्योगिक समूहों ने कभी भी इन सम्पत्तियों का, जिसका वे किराया दे रहे हैं, कभी पजेशन नहीं लिया। अर्थात उसका कोई उपयोग ही नहीं किया।
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, 2G स्कैम के आरोपी Unitech से अक्टूबर 2010 में एक 1.44 करोड़ रुपए और दूसरा 5.36 करोड़ रुपए (टोटल- 6.8 करोड़ रुपए) की संपत्ति खरीदी, ये दोनों संपत्ति गुरुग्राम के सिग्नेचर टावर-II में है। यह प्रॉपर्टी Unitech की ही थी। यहाँ खास बात यह भी है कि जब सरकारी कम्पनियाँ घाटे में थी तो उस समय Unitech फायदे में चल रहा था।
टाइम्स नाउ की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2010-2011 में राहुल ने अपनी इनकम 68 लाख रुपए डिक्लेअर की थी। अब यहाँ प्रश्न ये उठता है कि राहुल के पास प्रॉपर्टी खरीदने के लिए, वो भी मात्र 18 महीने में 6 करोड़ रुपए कहाँ से आए?
इसके बाद यूनाइटेड किंगडम का Backops Private Limited और उसकी तीन यूरोपीय अकाउंट का भी एक मामला है, जिसका 2004 के राहुल के हलफनामे में जिक्र भी है। यह वही फर्म है जिसमे राहुल गाँधी लिस्टेड हैं एक ब्रिटिश नागरिक के रूप में, यह भी आरोप है कि राहुल इस ब्रिटिश बेस्ड कंपनी में निदेशक और सचिव भी थे। राहुल की Backops में 83% हिस्सेदारी है। बाद में प्रियंका वाड्रा भी इसमें एक डायरेक्टर हुई। सवाल यहाँ ये भी है कि राहुल गाँधी के उस 83% हिस्सेदारी का क्या हुआ?
रेडिफ की जून 2004 के एक रिपोर्ट में उल्लेख है कि Backops सर्विसेज की स्थापना भारत में मई 2002 में एक फेमिली फ्रेंड मनोज मुत्तु (Manoj Muttu) द्वारा की गई थी, जिसमें राहुल को एक डायरेक्टर बनाया गया था। 25 मार्च 2009 को एफिडेविट भरे जाने से कुछ दिन पहले प्रियंका गाँधी वाड्रा इसकी डायरेक्टर बनाई गई। यहाँ एक सवाल ये भी है कि जब 2009 में ही Backops Private Limited UK स्थित कंपनी HSBC- UK में डिजॉल्व हो चुकी थी तो भारत में 31 मार्च 2010 तक कैसे चलती रही।
इसके अलावा, जून 2004 के रेडिफ के एक रिपोर्ट में यह बताया गया था कि फर्म के पास 25 लाख रुपए की अधिकृत शेयर पूँजी थी, जो 100 रुपए के 25,000 इक्विटी शेयरों में विभाजित थी। और राहुल गाँधी 2,500 शेयरों के साथ सबसे बड़े शेयरधारक थे। लेकिन 2004 के अपने चुनावी हलफनामे से कुछ महीने पहले, गाँधी ने उल्लेख किया कि फर्म में उनका 83% हिस्सा था। इसलिए, कुछ महीनों के दौरान उनके स्वामित्व वाले 83% शेयरों का क्या हुआ? अगर उन्होंने अपने शेयर बेच दिए, तो 2009 के चुनावी हलफनामे में इसका कोई उल्लेख क्यों नहीं है?
कुछ सवाल जिसका जवाब राहुल गाँधी को देना चाहिए
1. 2004 से 2014 के बीच राहुल गाँधी की संपत्ति मात्र 55 लाख से 9 करोड़ रुपए तक कैसे पहुँची? जबकि उनकी एकमात्र वैध आय एमपी की सैलरी थी और वह राजनीति से बाहर कभी अपने आप में पेशेवर नहीं थे?
2. कथित मानदंड के उल्लंघन के लिए FTIL द्वारा प्रमोटेड कंपनी नेशनल स्पॉट एक्सचेंज लिमिटेड (NSEL) को कारण बताओ नोटिस जारी किए जाने के महज 10 महीने बाद राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी ने अपने फार्महाउस को FTIL को लगभग 9 महीने के लिए किराए पर क्यों दिया? चूँकि, कॉन्ग्रेस सरकार ने एफटीआईएल को इस घोटाले में मदद करने के लिए कई रियायतें दी थीं, क्या राहुल गाँधी और उनके परिवार को घोटाले के बारे में पता था? यदि उन्होंने ऐसा किया तो उनका रोल कितना था?
3. एफटीआईएल को फार्महाउस किराए पर दिया गया था, जबकि जाँच जारी थी। आरोप यह भी हैं कि एनएसईएल घोटाले के अभियुक्तों पर मुकदमा चलाने में कॉन्ग्रेस सरकार धीमी रही। क्या राहुल गाँधी और एफटीआईएल के बीच व्यापारिक लेन-देन भी एक कारण था?
4. FTIL से पहले, राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी ने अपने फार्महाउस को दूसरे औद्योगिक घराने को किराए पर दे दिया था। राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी ने 9 लाख के मूल्य वाले फार्महाउस से इतना किराया कैसे कमाया जो फार्महाउस के मूल्य का 4 से 9 गुना था? क्या यह क्रोनी कैपिटलिज्म की ओर इशारा करता है?
5. जब राहुल गाँधी ने यूनिटेक लिमिटेड से दो सम्पत्तियाँ खरीदीं, एक की कीमत 1.44 करोड़ रुपए और दूसरा 5.36 करोड़ की दो सम्पत्तियाँ गुरुग्राम के सिग्नेचर टावर्स- II में स्थित थीं, जो यूनिटेक के स्वामित्व में थे, क्या उन्होंने इस संपत्ति का पूरा भुगतान किया? यदि नहीं, और यदि यह सच है कि केवल 4 करोड़ रुपए ही चुकाए गए। तो बाकी का पैसा क्यों नहीं चुकाया गया?
6. यूनिटेक 2-जी घोटाले में आरोपित था। अक्टूबर 2009 में, सीबीआई ने 2-जी स्पेक्ट्रम के आवंटन में कथित अनियमितताओं का मामला दर्ज किया। 8 अक्टूबर 2010 को, सुप्रीम कोर्ट ने इस घोटाले पर नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्ट पर तत्कालीन यूपीए सरकार से जवाब माँगा। उसी साल अक्टूबर में, राहुल गाँधी ने गुरुग्राम के सिग्नेचर टावर्स-II में दो व्यावसायिक प्रॉपर्टी खरीदीं, जो यूनिटेक के स्वामित्व में थी। जबकि 2G घोटाले पर CAG की रिपोर्ट पर SC ने कॉन्ग्रेस सरकार से जवाब माँगा था, इसके बावजूद यूनिटेक लिमिटेड से संपत्ति क्यों खरीदी गई थी?
7. SC ने 2017 में कहा था कि 2-जी मामले में पेश किए जाने वाले किसी भी साक्ष्य के लिए उन्होंने 7 साल तक इंतजार किया लेकिन सरकार ने कभी भी इस पर अमल नहीं किया। इस मामले का अधिकांश हिस्सा कॉन्ग्रेस सरकार के अधीन था। जहाँ तक यूनिटेक का संबंध है, क्या यह एक परस्पर लेन-देन व्यवस्था थी?
8. यूके स्थित Backops Pvt 2009 में भंग कर दिया गया था, जबकि 31 मार्च, 2010 तक भारत में Backops Services का अस्तित्व बना रहा। 2009 में ही, प्रियंका गाँधी को डायरेक्टर के रूप में राहुल गाँधी द्वारा अपना हलफनामा दाखिल करने से कुछ ही दिन पहले फर्म में पदस्थापित किया गया। राहुल गाँधी के स्वामित्व वाले 83% शेयरों का क्या हुआ?
9. 2004 के चुनावी हलफनामे में, राहुल गाँधी ने अपनी कुल संपत्ति 55,38,123 घोषित की थी। और उनकी देनदारियाँ शून्य थीं। 2009 में, राहुल गाँधी ने दिल्ली के मेट्रोपॉलिटन मॉल साकेत में 2 दुकानें खरीदीं। 1,63,95,111 रुपए में यह पैसा कहाँ से आया? इस आय का स्रोत क्या था?
10. राहुल गाँधी ने 2011-12 में अपने इसी संपत्ति से आय के रूप में 68 लाख रुपए दिखाए। उस समय मार्केट दर 150 रुपए प्रति वर्ग फीट था। राहुल गाँधी के पास जो संपत्ति थी वह 514 वर्ग फीट और 996 वर्ग फीट थी। अब इस दर से कितना भी गणित लगा लें, उन दो संपत्तियों से राहुल 68 लाख रुपए किराए के रूप में नहीं कमा सकते। तो बाकी पैसे कहाँ से आए? उनकी आय पर विचार करने के लिए 2009 के हलफनामे में सूचीबद्ध केवल यही दो सम्पत्तियाँ थीं।
11.ऑपइंडिया द्वारा राहुल गाँधी के खुलासे के बाद, कॉन्ग्रेस ने स्वीकार किया था कि राहुल गाँधी ने एचएल पाहवा से जमीन खरीदी थी। हालाँकि, उन्होंने कहा था कि भूमि तब प्रियंका गाँधी वाड्रा को उपहार में दी गई थी। प्रियंका के पास एचएल पाहवा के साथ कई जमीन सौदे और भी हैं जो प्रियंका को कम दाम पर जमीन बेचता था और फिर उसी जमीन को बहुत ऊँचे मूल्य पर खरीद लेता था। Backops की डायरेक्टरशिप भी उस समय प्रियंका गाँधी को हस्तांतरित की गई थी। क्या प्रियंका गाँधी वाड्रा 2019 में चुनाव इसलिए नहीं लड़ रही हैं, क्योंकि चुनाव शपथ पत्र में ये सारी बातें बाहर आ जाएँगी?
OpIndia (English) की एडिटर नुपुर शर्मा के मूल लेख का अनुवाद रवि अग्रहरि ने किया है।
इतिहासकार रामचंद्र गुहा, पत्रकार आशुतोष (गुप्ता, वही आम आदमी पार्टी वाले), कॉन्ग्रेस पार्टी (व उसका वृहत्तर इको-सिस्टम), बॉलीवुड, 80%+ भारतीय बौद्धिक वर्ग, और (प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राज्यारोहण के बाद से) भाजपा-संघ- इन सब में क्या समानता है?
मोहनदास करमचंद गाँधी इन सब के मानक (model) हिन्दू हैं।
अगर इनमें से किसी को भी अपने विरोधी के हिन्दू होने पर प्रश्न उठाना होता है तो वे फटाक से “अगर महात्मा गाँधी होते तो क्या वे आपकी इस बात का समर्थन करते?” की मिसाइल दाग देते हैं। गोया गाँधी जी की शाबाशी ही हर हिन्दू के जीवन का अंतिम ध्येय है!
गाँधी जी का भारत राष्ट्र-राज्य के निर्माण में योगदान निःसंदेह महत्वपूर्ण है। सत्य के प्रति उनका आग्रह यानि सत्याग्रह की बेशक भारत की आज़ादी में भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। पर ‘कोबिगुरू’ रबीन्द्रनाथ टैगोर से ‘महात्मा’ की उपाधि पाने वाले गाँधी का दर्शन भारतीय प्रचलन, आध्यात्म, और परम्पराओं से उतना ही दूर है जितना तेल पानी की प्रकृति से दूर होता है।
आधुनिक हिन्दू की आत्मा और उसके विश्वदर्शन को वेदों-उपनिषदों-महापुराणों, पतंजलि के योग सूत्रों, श्रीकृष्ण की गीता आदि से जोड़ने वाले गाँधी जी नहीं, श्री ऑरोबिन्दो और स्वामी विवेकानंद थे। और प्रमुखतम विषयों पर उनके विचारों का गाँधी जी से कोई साम्य नहीं था- दूर-दूर तक नहीं।
अहिंसा
गाँधी जी ने जितना दुरूपयोग ‘अहिंसा’ शब्द का किया, भारतीय राजनीति में उतना दुरुपयोग शायद ही, कभी भी, किसी भी शब्द या सिद्धांत का हुआ होगा। अहिंसा को उसके भावार्थ और परिप्रेक्ष्य के बिना literally प्रयोग करना शुरू कर दिया। न केवल खुद किया बल्कि दूसरे (केवल) हिन्दुओं के लिए भी अनिवार्य कर दिया। यहाँ तक कि जिस भगवद्गीता का उद्देश्य ही अर्जुन को युद्ध और धर्मोचित वध के लिए प्रेरित करना था, उसे भी गाँधी जी ने पता नहीं किस कोण से तोड़-मरोड़कर उसमें भी हिंसा को हर परिस्थिति में नकारने की सीख तलाश ली। और खुद के लिए ही नहीं तलाशी, बल्कि हिन्दुओं के गले भी जबरन बाँधने लगे।
नतीजन हिन्दुओं में जहाँ यथोचित हिंसा के लिए भी घृणा उत्पन्न हुई, वहीं दूसरे समुदाय (खासकर कि मुस्लिम) हिन्दुओं में इसी पलटवार की क्षमता के ह्रास के बल पर बढ़ते चले गए। इसी बढ़त की चरम परिणति थी 1947 का नरसंहार।
इसी के उलट थे श्री ऑरोबिन्दो और स्वामी विवेकानंद के विचार।
स्वामी विवेकानंद से जब अहिंसा के बारे में उनके विचार पूछे गए तो उन्होंने साफ कहा कि शत-प्रतिशत अहिंसा केवल सन्यासियोंके लिए उचित है; गृहस्थ के लिए आत्मरक्षा सर्वोपरि है। जीएस बाणहट्टी की किताब ‘लाइफ एण्ड फ़िलॉसॉफ़ी ऑफ़ विवेकानंद’ के अनुसार विवेकानंद से जब पूछा गया कि यदि कमज़ोर को ताकतवर के हाथों शोषित देखें तो क्या करना चाहिए, तो उन्होंने कहा, ‘(शोषक को) पीटना चाहिए, और क्या?’
अपने ग्रन्थ ‘एसेज़ ऑन गीता’ (गीता पर निबंध) में श्री ऑरोबिन्दो लिखते हैं (अनूदित), “यदि आपका केवल आत्म-बल आसुरिक शक्ति को रोकने के लिए पर्याप्त नहीं है और इसके बाद भी आप शारीरिक प्रतिरोध नहीं करते, तो असुर बिना किसी विरोध के मनुष्यों और राष्ट्रों को कुचलता आगे बढ़ता है, विनाश करता है, हत्याएँ करता है, सब कुछ बहुत आसानी से नष्ट-भ्रष्ट कर देता है, और आपकी अहिंसा दूसरों की हिंसा जैसी ही तबाही करती है।”
हिन्दू-मुस्लिम सम्बन्ध
गाँधी जी हिन्दुओं और सम्प्रदाय विशेष को अपनी दो आँखें कहते थे, यह तो बड़ी अच्छी थी, पर जब एक आँख दूसरी आँख के विनाश को आमादा थी तो गाँधी जी का हिन्दुओं के प्रति सौतेला व्यवहार घोर निराशाजनक था।
न्यूयॉर्क टाइम्स में छपी खबर के अनुसार गाँधी जी ने हिन्दुओं से कहा कि वे (दंगों से बचने के लिए) नोआखली छोड़ दें या क़त्ल हो जाएँ। 6 अप्रैल, 1947 को नई दिल्ली की एक प्रार्थना सभा में उन्होंने कहा, “…अगर मुस्लिम हम सभी (हिन्दुओं) की हत्या कर देना चाहते हैं तो हमें ‘वीरतापूर्वक’ मृत्यु स्वीकार कर लेनी चाहिए। यदि वे हम सबको मारकर अपना राज स्थापित करना चाहते हैं तो हम अपने प्राणों को उत्सर्ग कर उन्हें एक नई दुनिया में पहुँचाएँगे…” (Collected Works of Mahatma Gandhi, Vol. 94 page 249)
क्या कोई बता सकता है कि उन्होंने मुस्लिमों को भी ऐसी ही कोई सलाह दी हो?
वहीं श्री ऑरोबिन्दो ऐसी कोई अव्यवहारिक राय नहीं रखते थे। हिन्दू-मुस्लिम एकता के प्रश्न पर उन्होंने कहा(अनूदित), “जिस मज़हब/पंथ के सिद्धांत में सहिष्णुता हो, उसके साथ (बेशक) शांति के साथ रहा जा सकता है। पर उनके साथ शांति के साथ रह पाना कैसे संभव है जिनका सिद्धांत ही ‘मैं तुम्हें (अपने से भिन्न ईश्वर के तुम्हारे विचारों को) नहीं सहूँगा’ है? ऐसे व्यक्तियों के साथ एकता कैसे संभव है?”
‘प्रबुद्ध भारत’ पत्रिका के संपादक से वार्तालाप में स्वामी विवेकानंद ने भी साफ कहा कि वह इस्लाम के पैगम्बर मुहम्मद से बहुत प्रभावित नहीं हैं। वह मुहम्मद के प्रशिक्षित योगी न होने की भी बात कहते थे, और कहते थे कि चरमपंथी तरीकों से नुकसान ही अधिक हुआ है।
ऐसा नहीं है कि ऑरोबिन्दो-विवेकानंद व्यक्तिगत मुस्लिमों से व्यक्तिगत हिन्दुओं के संघर्ष का समर्थन करते थे- वे दोनों इसके खिलाफ थे। पर वे इस्लाम और हिंदुत्व में निहित नैसर्गिक विरोधाभासों को साफ-साफ देखते समझते थे (गाँधी जी के उलट), और हिन्दुओं को केवल इसके प्रति सदा सजग रहने की सलाह देते थे।
आंतरिक दमन व ‘हिंसा’ पर था गाँधी जी का जोर
गाँधी जी के आत्मकथ्यों को यदि कोई निष्पक्ष भाव से पढ़े तो यह साफ हो जाएगा कि स्व-दमन ही गाँधी जी के सारे अजीबोगरीब सिद्धांतों का मूल था। और यह क्रूर था, निष्ठुर था, बलात् था। खुद को हिन्दू मानते हुए भी हिन्दुओं से कट जाने की अपील भी इसी दमन का बाह्य, सार्वजनिक अभिव्यक्ति थी- और उनके अन्य ‘प्रयोग’, जिनमें विवाहित युगलों को शारीरिक सम्बन्ध न बनाने की सीख शामिल हैं, इसी विचार के अन्य व्यक्त स्वरूप थे। यह नैतिकता का चरमपंथ था।
और, स्व-दमन व चरमपंथी नैतिकता कभी भी हिन्दू दर्शन नहीं रहे। विवेकानंद सन्यासी होते हुए भी धूम्रपान करते थे, मटन खाते थे– उनके गुरू श्री रामकृष्ण परमहंस भोजन के शौकीन थे। हिन्दू दर्शन बाह्य, जबरिया, इच्छा होते हुए भी स्थायी त्याग का कभी नहीं रहा। स्थायी त्याग तभी किया जाता था जब इच्छा (वासना) समाप्त हो जाती थी।
समय है बदलाव का
उपरोक्त उदाहरण केवल राजनीति पर आधारित हैं- यदि राजनीति छोड़ और गहरे जाएँगे तो गाँधी जी का दर्शन और भी अहिंदू होता जाता है। इसका यह अर्थ नहीं कि भारत के राजनीतिक इतिहास में गाँधी जी का एक विशेष, महत्वपूर्ण स्थान नहीं है। बिलकुल है। सौ बार है।
पर समय आ गया है कि गाँधी जी के मापदण्ड पर हिन्दुओं का, या किसी के हिंदुत्व का, आकलन बंद किया जाए। यदि किसी के हिंदुत्व का आकलन होना ही है तो वह श्री ऑरोबिन्दो और स्वामी विवेकानंद के मानक पर किया जाए।
भाजपा के ख़िलाफ़ एक अजीब आरोप में, कॉन्ग्रेस नेता रणदीप सुरजेवाला ने कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा पर अपने कार्यकाल के दौरान वरिष्ठ भाजपा नेताओं को भुगतान करने का आरोप लगाते हुए एक डायरी शेयर की है। सुरजेवाला ने एक पेपर की फोटोकॉपी शेयर की, जिसमें हाथ से लिखे हुए नोट थे। इस प्रकार के नोट के लिए दावा किया गया कि यह नोट येदियुरप्पा द्वारा लिखे गए हैं जिस पर उनके हस्ताक्षर थे। इसमें येदियुरप्पा द्वारा भाजपा के वरिष्ठ नेताओं को दी गई राशि का उल्लेख किया गया।
एक नोट जिसे लेकर कॉन्ग्रेस ने दावा किया कि वह बीएस येदियुरप्पा ने लिखा है
बता दें कि बीएस येदियुरप्पा को फँसाने की कोशिश में कॉन्गेस ने इस तरह के नोट को माध्यम बनाया है। सोशल मीडिया पर तमाम यूज़र्स ने इस नोट की चौतरफा आलोचनाएँ की और इस बेतुकी हरक़त के जवाब में उन्होंने कॉन्ग्रेस को आईना भी दिखाया।
Yeah I also sign in my secret diary after noting down my crimes. Just trying to be helpful to any investigator who may catch hold of the diary at a later stage https://t.co/eavDwlMsqt
कुछ लोगों ने कॉन्ग्रेस की ‘डायरी’ के आरोपों का मजाक उड़ाने और उसके जवाब के लिए ख़ुद के लिखे नोट को शेयर करना शुरू कर दिया।
Snapshot of our diary entry detailing payments made to various folks – placed at an easy-to-find location in our office for convenience of income tax officials who may want to raid us pic.twitter.com/dKQ3pE1CBq
जैसा कि ऊपर देखा जा सकता है ऑपइंडिया के सीईओ राहुल रौशन पर आरोप लगाया गया था कि उन्हें UnReal Times द्वारा ₹25 करोड़ का भुगतान किया गया। इन आरोपों से लैस, शुभचिंतकों ने रोशन के ख़िलाफ़ विद्रोह करने के मक़सद से ऑपइंडिया के कर्मचारियों को न सिर्फ़ उकसाने का प्रयास किया बल्कि उन्हें टैग करना भी शुरू कर दिया कि राहुल रौशन ₹25 करोड़ में से किसी को एक पैसा नहीं देंगे।
हालाँकि, ऑपइंडिया के कर्मचारियों ने बताया था कि उनके सीईओ राहुल रौशन वास्तव में अपने कर्मचारियों से पैसे लेते हैं ताकि वे उन्हें नौकरी दे सकें।
बीएस येदियुरप्पा को फँसाने की लिए जिस डायरी का इस्तेमाल किया जा रहा है बीजेपी ने उसे फ़र्ज़ी करार देते हुए येदियुरप्पा के असल हस्ताक्षर और लिखावट को सोशल मीडिया पर शेयर किया, जो कॉन्ग्रेस की फ़र्ज़ी डायरी से बिल्कुल मेल नहीं खाते।
Randeep Surjewala just wasted good amount of media personals time talking absolute nonsense & releasing fake diary written & scripted by Congress themselves
Handwriting & the signature on the dairy released by @INCIndia is as fake as the diary itself.
पुलवामा में हुए आतंकी हमले के बाद भारत की ओर से पाकिस्तान पर आतंक के खिलाफ कार्रवाई करने को लेकर जो अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाया गया था, उसका असर अब दिखने लगा है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान को आखिरकार बोलना पड़ा कि उनके देश में ‘जिहादी संगठनों’ और ‘जिहादी कल्चर’ के लिए कोई जगह नहीं है।
मीडिया से बातचीत करते हुए इमरान खान ने कहा कि पाकिस्तान शांतिप्रिय देश है। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान दुनिया को यह भरोसा दिलाना चाहता है कि वह केवल शांतिप्रिय देश ही नहीं है, बल्कि वह लघुकालीन और दीर्घकालीन नीतियों से इस ‘जिहादी कल्चर’ एवं आंतकवाद को समाप्त करने को लेकर भी ईमानदार है। इसके साथ ही FATF (Financial Action Task Force) द्वारा प्रतिबंधित किए जाने के डर से इमरान खान ने बयान देते हुए कहा कि हम ब्लैकलिस्टेड नहीं होना चाहिए।
पाकिस्तान के PM का ये बयान ऐसे वक्त आया है, जब पाकिस्तान पर मोदी सरकार की कूटनीतिक पहलों द्वारा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आतंक के खिलाफ सख्त कार्रवाई नहीं किए जाने के कारण दबाव बनाया जा रहा है। हाल ही में अमेरिकी सचिव माइकल आर पोम्पेओ ने भी भारत में हुए पुलवामा हमले को लेकर चेतावनी देते हुए कहा कि अगर दूसरी बार भारत में आतंकी हमला हुआ तो पाकिस्तान के लिए काफी दिक्कत हो सकती है।
हालाँकि, इमरान खान ने पोम्पेओ के इस बयान पर सीधे तौर पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है, लेकिन उन्होंने कहा, “भारत बेवजह ही पाकिस्तान पर आरोप लगा रहा है। उनका कहना है कि जैश ने हमले की जिम्मेदारी ली है, इसका ये मतलब नहीं कि पाकिस्तान का इसमें कोई हाथ है। साथ ही ईरान भी हम पर आरोप लगा रहा है कि आतंकवादी आतंक फैलाने के लिए हमारी जमीन का इस्तेमाल कर रहे है।”
इमरान खान ने देश में कानून-व्यवस्था के बारे में कहा कि प्रतिबंधित संगठनों को बहुत पहले ही नष्ट कर दिया जाना चाहिए था, लेकिन यह उनकी सरकार है जो ऐसे संगठनों के खिलाफ कार्रवाई कर रही है। उन्होंने कहा कि उनकी सरकार उन्हें मुख्यधारा में लाने के लिए भारी धन खर्च कर रही है।
जम्मू-कश्मीर में बीते 24 घंटों में चार अलग-अलग जगहों पर हुई मुठभेड़ में छह आतंकी मारे गए हैं। बांदीपोरा में 2 आतंकियों के मरने की खबर है। पुलिस ने बताया कि यह दोनो आतंकी लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े हुए थे। इनमें से एक लश्कर-ए-तैयबा का कमांडर भी था। वहीं शोपियाँ जिले में हुई मुठभेड़ में भी दो आतंकी मारे गए हैं। इसके अलावा सोपोर के वारपोरा में हुई मुठभेड़ में भी दो आतंकी मारे गए हैं। इस बीच दो पुलिसकर्मियों के घायल होने की भी खबर है।
पुलिस का कहना है कि बांदीपोरा में मुठभेड़ अब खत्म हो चुकी है, लेकिन अन्य दो जगहों पर अभी मुठभेड़ चालू हो रखी है। सोपोर में सुरक्षा के लिहाज से सभी शैक्षिक संस्थानों को बंद किया हुआ है और एहतियात के लिए इंटरनेट सेवा को भी बंद कर दिया गया है।
SSP Bandipora Rahul Malik: Two terrorists were eliminated in Hajin encounter, both were affiliated to LeT. One of the terrorists was involved in many civilian killings. We have recovered arms and ammunition. #JammuAndKashmirpic.twitter.com/YJugy7klTo
बांदीपोरा में गुरुवार (मार्च 21, 2019) की शाम को एनकाउंटर तब शुरू हुआ, जब एक घर में दो आतंकियों के छिपे होने की खबर आई। घर में दो सिविलियनों समेत एक 11 साल के बच्चे को आतंकियों द्वारा बंधक बनाया गया था। जिसमें बुजुर्ग तो आतंकियों की पकड़ से बच निकला, लेकिन बच्चा उन्हीं की गिरफ्त में रहा। सुरक्षाबल द्वारा रात भर चलाए गए इस ऑपरेशन में आतंकवादी और नाबालिग मारा गया।
वहीं खबरों के मुताबिक एक आधिकारी ने बताया है कि दक्षिण कश्मीर में शोपियाँ के इमामसाहिब इलाके में आतंकवादियों की मौजूदगी की सूचना मिली, जिसके बाद सुरक्षाबलों ने इलाके को घेर लिया और तलाश अभियान शुरू किया। उन्होंने बताया कि पहले आतंकवादियों ने सुरक्षाबलों पर गोलियाँ चलानी शुरू की जिसके बाद सुरक्षाबलों ने जवाबी कार्रवाई की और मुठभेड़ शुरू कर दी। इसमें 2 आतंकियों के मरने की खबर आई है।
इसके अलावा इंडिया टीवी की खबर के अनुसार पुलिस अधिकारी ने बताया है कि उत्तर कश्मीर के बारामूला में भी मुठभेड़ चालू हो रखी हैं। बता दें कि सुरक्षाकर्मियों द्वारा दिल्ली में भी जैश का एक आतंकी सज्जाद गिरफ्तार हुआ है, जो पुलवामा के मास्टरमाइंड मोहम्मद भाई के लगातार संपर्क में था और दिल्ली में भी बड़ा हमले करने की फिराक में था।
राजनीति सबके बस की बात नहीं। और जो व्यक्ति बदलाव की राजनीति करने आया हो उसके बस की बात तो बिलकुल भी नहीं। क्योंकि राजनीति की दशा और दिशा में तो बदलाव संभव है लेकिन बदलाव की राजनीति ऐसी प्रक्रिया है जो हो ही नहीं सकती। कारण यह है कि चिंतन की किसी भी धारा में बदलाव एक सतत और नैसर्गिक प्रक्रिया है जिसे धरने के मंच से चिल्लाकर नहीं किया जा सकता।
लोकतंत्र में राजनीति कोई ‘एकल दिशा मार्ग’ नहीं बल्कि बहुआयामी व्यवस्था है जिसमें जनता राज्य को अपने ऊपर शासन करने की शक्ति प्रदान करती है और बदले में लोक कल्याण सहित सुरक्षा की गारंटी की मांग करती है। जबकि परिवर्तन एक लीनियर प्रोसेस है, इतिहास में एक समय में राजनीति के किसी एक आयाम में ही परिवर्तन हुआ है। सब कुछ एक ही दिन में या एक रात में नहीं बदल जाता।
अरविन्द केजरीवाल जिस बदलाव की राजनीति करने आए थे वह कभी संभव ही नहीं थी। इसीलिए मैंने एक बार इस व्यक्ति के लिए लिखा था कि इसकी हरकतें राजनीति और शासन व्यवस्था के लिए घातक हैं। निरंतर प्रधानमंत्री मोदी को लक्षित कर गालियाँ देना, अराजक माहौल उत्पन्न करना, लेफ्टिनेंट गवर्नर के अधिकारों से टकराना जैसे कृत्य कोई बदलाव तो नहीं ला सके अलबत्ता व्यवस्था परिवर्तन के नारों को बाबा भारती का घोड़ा जरूर बना दिया।
अरविन्द केजरीवाल के कारनामों का ताजा उदाहरण है उनका एक ट्वीट जिसमें एक प्रतीकात्मक चित्र में झाड़ू लिया हुआ व्यक्ति ‘स्वस्तिक’ चिह्न को खदेड़ कर भगा रहा है। केजरीवाल के अनुसार यह चित्र किसी ने उन्हें मोबाइल पर भेजा लेकिन इस संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि इस प्रकार का हिन्दू विरोधी चित्र केजरीवाल की टीम ने खुद बनाया हो। चित्र से जो संदेश निकलकर सामने आ रहा है वह स्पष्ट है कि आम आदमी पार्टी का झाड़ू एक दिन हिन्दू संस्कृति के प्रतीक स्वस्तिक को खदेड़कर भगा देगा।
प्रश्न यह नहीं कि इस प्रकार के चित्र से केजरीवाल क्या दिखाना चाहते हैं, सवाल यह है कि नगरों में रहने वाली आम जनता- जिसके प्रतिनिधि के रूप में केजरीवाल ने खुद को प्रोजेक्ट किया- के मस्तिष्क में स्वस्तिक का क्या अर्थ छिपा हुआ है। आमतौर पर मांगलिक कार्यों जैसे विवाह इत्यादि समारोह में ही शहरी जनता स्वस्तिक का चिह्न देखती है। दिल्ली जैसे नगर की जनता स्वस्तिक का सही अर्थ न जानती है न जानना चाहती है।
देश का युवा वर्ग जो कि आज वोटरों का भी सबसे बड़ा हिस्सा है उसके दिमाग में हॉलीवुड सिनेमा ने यही भर दिया है कि स्वस्तिक नाज़ी विचारधारा के जनक हिटलर का ‘निशान’ है। अंग्रेज़ी मीडिया में भी हिटलर की नाज़ी पार्टी के चिह्न के लिए स्वस्तिक शब्द का प्रयोग किया जाता रहा है जिसके कारण लोग स्वस्तिक का वास्तविक अर्थ भूलकर उसकी फासिस्ट व्याख्या को ही सच मान बैठे हैं।
पहली बात तो यह है कि भारतीय संस्कृति में स्वस्तिक चिह्न का प्रयोग शुभ एवं मंगल कामनाओं के लिए किया जाता है यह किसी राजनैतिक विचारधारा का प्रतीक नहीं है। वैदिक मंत्रों में स्वस्ति वाचन की परंपरा है। स्वस्ति का शाब्दिक अर्थ है ‘मंगल हो’ (सु+अस्ति)। ‘स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः’ आदि मंत्रों में भी इंद्र और पूषा जैसे देवताओं से मंगल कामनाएँ की जाती हैं। उपनिषदों के प्रारंभ और अंत में शांति मंत्रों का उच्चारण किया जाता है ताकि त्रिविध तापों की शांति हो। यह मंत्र गृह प्रवेश से लेकर बच्चे के जन्म, उपनयन संस्कार और विवाह तक में प्रयोग होते हैं। स्वस्तिक का चिह्न ऐसी सुंदर परंपरा का वाहक है।
इतिहास में देखें तो हिटलर ने कभी नाज़ी पार्टी के चिह्न को स्वस्तिक शब्द से संबोधित नहीं किया। नाज़ी जिस प्रतीक चिह्न का प्रयोग करते थे उसे वे Hakenkreuz कहते थे। यह उल्टा स्वस्तिक भले ही दीखता हो लेकिन हिन्दू सनातनी परंपरा से इसका कोई संबंध नहीं था। द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात कुछ पश्चिमी स्कॉलरों ने Hakenkreuz को उल्टा स्वस्तिक कहना प्रारंभ किया जिसके कारण विमर्श में यह शब्द आ गया। विडंबना यह है कि आज भारत के शहरी युवाओं का एक बड़ा वर्ग स्वस्तिक चिह्न का गलत अर्थ जानता है। इस अज्ञानता का लाभ लेकर केजरीवाल जैसे घाघ नेता सांकेतिक रूप से भारत की संस्कृति पर कीचड़ उछालने से बाज नहीं आते।
आज समय आ गया है कि जनता केजरीवाल से पूछे कि हिन्दू सनातनी संस्कृति पर कीचड़ उछालने से कौन सी ‘बदलाव की राजनीति’ हो रही है। माना कि मोदी केजरीवाल के राजनैतिक प्रतिद्वंद्वी हैं, लेकिन भारत की सांस्कृतिक परंपराओं से केजरीवाल का क्या अहित होता है? भाजपा को फासिस्ट सिद्ध करने के और भी हथकंडे और मुद्दे हैं जिनका प्रयोग किया जा सकता था। लेकिन जिस जनता से पूछकर केजरीवाल हर काम करते हैं क्या उन्होंने उस जनता से जाकर पूछा कि उसके लिए स्वस्तिक चिह्न के क्या मायने हैं?
शहरी नहीं तो ग्रामीण जनता से ही पूछ लेते कि गाँवों में पुराने जमाने में मिट्टी के घरों की दीवारों पर कौन सा चिह्न बना होता था। आज भी भारत की जनता दीपावली पर पूजा की थाली में लाल रोली से स्वस्तिक चिह्न बनाकर ही गणेश लक्ष्मी की पूजा करती है। स्वयं केजरीवाल जिस बनिया समुदाय से आते हैं वे अपनी तिजोरी पर भी स्वस्तिक चिह्न बनाते हैं। हिन्दू के अतिरिक्त जैन और बौद्ध मतावलंबी भी धार्मिक आयोजनों पर स्वस्तिक का प्रयोग करते हैं।
भगोड़े हीरा कारोबारी नीरव मोदी की गिरफ्तारी के बाद भारत को एक और कामयाबी मिली है। बता दें कि गुजरात की फार्मा कंपनी स्टर्लिंग बायोटेक केस में भगोड़े हितेश पटेल को भी गिरफ्तार कर लिया गया है। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के अनुसार हितेश पटेल को अल्बानिया में हिरासत में लिया गया है, जो कि काफी दिनों से फरार चल रहा था।
ED Sources: Hitesh Patel is expected to be extradited to India soon. He is an accused in a Rs 5000 crore money laundering case, a prosecution complaint was filed by ED in special PMLA Court https://t.co/iHRvQ30vuU
दरअसल स्टर्लिंग बायोटेक मामले के आरोपी हितेश पटेल की भारतीय जाँच एजेंसियों को लंबे समय से तलाश थी। ईडी द्वारा विशेष पीएमएलए अदालत में अभियोजन की शिकायत दायर की गई थी और उसके खिलाफ 11 मार्च को रेड कॉर्नर नोटिस जारी किया गया था। जिसके बाद 20 मार्च को हितेश पटेल को अल्बानिया में राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो-तिराना द्वारा हिरासत में लिया गया। हितेश पटेल के जल्द ही भारत में प्रत्यर्पित किए जाने की उम्मीद है।
बता दें कि हितेश पटेल पर ₹5000 करोड़ के मनी लॉन्ड्रिंग का आरोप है। बैंक लोन धोखाधड़ी मामले में आपराधिक जाँच से बचने के लिए स्टर्लिंग ग्रुप के सभी चार प्रमोटर देश से फरार हो गए थे। इन आरोपियों में हितेश पटेल के अलावा नितिन संदेसरा, चेतन संदेसरा, दीप्ति संदेसरा, राजभूषण दीक्षित, चार्टर्ड अकाउंटेंट हेमंत हाथी और बिचौलिया गगन धवन शामिल है। स्टर्लिंग ग्रुप की कंपनियों में स्टर्लिंग बॉयोटेक लिमिटेड, पीएमटी मशींस लिमिटेड, स्टर्लिंग सेज ऐंड इंफ्रा लिमिटेड, स्टर्लिंग पोर्ट लिमिटेड, स्टर्लिंग ऑयल रिसोर्स लिमिटेड और 170 से ज्यादा शेल कंपनियाँ शामिल है।
Enforcement Directorate Sources: Hitesh Patel detained in Albania, a wanted fugitive in sterling Biotech Case. Red Corner Notice was issued on 11th March. He was detained by National Crime Bureau-Tirana in Albania on 20th March. pic.twitter.com/KvDBVApszp
गौरतलब है कि भारतीय जाँच एजेंसियों के दबाव के बाद ब्रिटेन की पुलिस ने मंगलवार (19 मार्च 2019) को पीएनबी स्कैम का आरोपी नीरव मोदी को गिरफ्तार किया। जिसके बाद उसे बुधवार (20 मार्च 2019) को वेस्टमिंस्टर मजिस्ट्रेट की जिला न्यायाधीश मैरी माल्लोन की अदालत में पेश किया गया। जहाँ अदालत ने नीरव मोदी को जमानत देने से इनकार करते हुए 29 मार्च तक के लिए हिरासत में भेज दिया है। इसी तरह ED ने मनी लॉन्ड्रिंग के आरोपी विजय माल्या को गिरफ्तार किया था, मगर बाद में जमानत मिल गई।
जम्मू-कश्मीर के अलागवावादी नेताओं पर भारतीय जाँच एजेंसियों का शिकंजा कसता जा रहा है। प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने घाटी के अलगाववादी नेता सैयद अली शाह गिलानी के खिलाफ फॉरेन एक्सचेंज मैनेजमेंट एक्ट (FEMA) के तहत ₹14.40 लाख रुपए का जुर्माना लगाया है। इसके अलावा ईडी ने 10 हजार डॉलर (करीब ₹7 लाख) जब्त किए हैं। यह रकम साल 2002 में गिलानी के श्रीनगर स्थित आवास पर आयकर विभाग द्वारा छापे के दौरान पकड़ी गई थी।
ED Sources: Enforcement Directorate will also impose a penalty and confiscate the illegal acquisition of foreign exchange recovered from Yasin Malik, former Chairman of JKLF. The adjudication proceedings against Yasin Malik are in progress https://t.co/LYnNQNmiMf
केंद्रीय जाँच एजेंसी ने 87 वर्षीय अलगाववादी आतंकवादी गिलानी को FEMA के अलग-अलग प्रावधानों के तहत नोटिस भेजा था। यही नहीं, JKLF के पूर्व चेयरमैन यासीन मलिक के पास से मिली अवैध विदेशी मुद्रा को जब्त करने के साथ ही ED उस पर जुर्माना भी लगाएगा। मलिक के खिलाफ भी कानूनी कार्रवाई जारी है। बता दें कि NIA और अन्य एजेंसियाँ घाटी में टेरर फंडिंग की जाँच कर रही हैं। सुरक्षा एजेंसियों ने इस दौरान अलगाववादी नेताओं से पूछताछ की है।
पुलवामा में 14 फरवरी को हुए आतंकवादी हमले के बाद अलगावादी नेताओं के खिलाफ भारत सरकार ने अपने तेवर कड़े कर लिए हैं। सरकार ने अलगाववादी नेताओं को दी गई सुरक्षा भी वापस ले ली है। हुर्रियत नेता घाटीमें रहने वाले पाकिस्तान समर्थक हैं, जो कश्मीर घाटी में अलगाववादी भावनाओं को भड़काने के साथ-साथ सुरक्षाबलों पर पत्थर फेंकने के लिए युवाओं को पैसे देते हैं और उकसाते हैं।
सुरक्षा एजेंसियों ने घाटी में कार्रवाई करते हुए कुछ समय पहले मीर वाइज उमर फारूक के घर से हॉट लाइन बरामद की थी। बताया जाता है कि मीर वाइज इस हॉट लाइन का इस्तेमाल पाकिस्तान में बैठे अपने आकाओं से बातचीत करने के लिए करता था।
भारतीय जनता पार्टी ने आगामी लोकसभा चुनाव के लिए 20 अलग-अलग राज्यों में चुनाव लड़ने के लिए 184 उम्मीदवारों की अपनी पहली सूची जारी कर दी है। सूची की घोषणा केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने की। 2014 के चुनावों में चुनाव लड़ने वाले अधिकांश कैबिनेट मंत्रियों और भाजपा के वरिष्ठ नेताओं ने अपने निर्वाचन क्षेत्र को बरक़रार रखा गया है और पार्टी कुछ दिग्गज नेताओं को आराम दिया गया है।
दिग्गज नेताओं की जगह नए उम्मीदवारों को चुनाव का हिस्सा बनाने की रणनीति
भाजपा अध्यक्ष अमित शाह इस साल अपना लोकसभा चुनाव गुजरात के गांधीनगर निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़ेंगे। बता दें कि इस सीट से भाजपा वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी को आराम दिया गया है। अमित शाह 2017 में गुजरात के लिए राज्यसभा के सांसद चुने गए। इससे पहले, वह 1997 से 2017 तक गुजरात विधानसभा में विधायक थे। वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करीबी सहयोगी हैं और गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में वे राज्य सरकार में कई प्रमुख पदों पर रहें हैं।
अमित शाह ने 2014 के लोकसभा चुनावों में भाजपा की जीत सुनिश्चित करने में अपनी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। गांधीनगर से उनकी उम्मीदवारी की घोषणा पार्टी की रणनीति में एक बड़ी बदलाव का संकेत है। लालकृष्ण आडवाणी के अलावा बीसी खंडूरी को लोकसभा चुनाव लड़ने का टिकट नहीं दिया गया। वहीं कलराज मिश्र और भगत सिंह कोश्यारी जैसे वरिष्ठ नेताओं ने आगामी लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए अपनी अनिच्छा की घोषणा पहले ही कर दी थी। वहीं एक नाम विदेश मंत्री सुषमा स्वराज का भी जुड़ गया है जिन्होंने हाल ही में चुनाव न लड़ने की घोषणा की थी।
बीजेपी के दिग्गज नेताओं में एक नाम मुरली मनोहर जोशी का भी है, जो 2014 में कानपुर से जीते थे। फ़िलहाल उनके चुनाव लड़ने पर अभी भी संशय बरक़रार है। यह संशय इसलिए बरक़रार है क्योंकि बीजेपी ने जो पहली सूची जारी की है उसमें उनका नाम नदारद था।
बीजेपी के वरिष्ठ नेताओं को चुनावी मैदान से दूर रखने की मंशा नए उम्मीदवारों को जगह देने और उनकी नई सकारात्मक राजनीतिक सोच को सामने लाने के मक़सद से की गई जान पड़ती है। ये बात और है कि विपक्ष द्वारा ऐसा दुष्प्रचार किया जाता है कि बीजेपी वरिष्ठ नेताओं को नज़रअंदाज़ कर रही है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपने निर्वाचन क्षेत्र वाराणसी से जीत का पूरा भरोसा
अब बात प्रधानमंत्री मोदी की जिन्होंने आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल को 3,70,000 से अधिक मतों के अंतर से हराया था, इस बार भी वे वाराणसी निर्वाचन क्षेत्र से ही चुनाव लड़ेंगे। वाराणसी के अलावा उन्होंने गुजरात की वडोदरा सीट से भी चुनाव लड़ा था। इस सीट पर उन्होंने 5,70,000 से अधिक मतों के अंतर से जीत दर्ज की थी।
वाराणसी की सीट से पीएम मोदी के जीतने के कई कारण हैं जिसमें विशेष तौर पर वहाँ किया गया कायाकल्प है। उनके लगभग साढ़े चार साल के कार्यकाल में वहाँ 126 प्रोजेक्ट को पूरा करवाया गया। कुल 4679.79 करोड़ रुपए की लागत से वाराणसी के कायाकल्प में वे सभी आधारभूत सुधार शामिल हैं जिनसे आम जन-जीवन लाभान्वित हुआ।
वाराणसी में विकास के तहत नगर के इंफ्रास्ट्रकचर में ज़बरदस्त सुधार, मंडुआडीह रेलवे स्टेशन का भव्य पुनर्निर्माण, सड़कों का निर्माण, गलियों-चौराहों की बेहतरी, अंडरग्राउंड वायरिंग से बिजली के तारों को व्यवस्थित करना, पेयजल की व्यवस्था, सीवरेज व्यवस्था, नगर पहले से अधिक साफ़-सुथरा है, बीएचयू ट्रामा सेंटर, बुनकरों के लिए ट्रेड फेसिलिटेशन सेंटर, अस्सी घाटों की सफ़ाई, बैटरी रिक्शों का वितरण, काशी विश्वनाथ कॉरिडोर, गंगा सफ़ाई परियोजना, गंगा में सीवर जाना बंद किया गया, सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट लगाए गए और वंदे भारत एक्सप्रेस और बिजली व्यवस्था को दुरुस्त करने से लेकर तमाम ढाँचागत परियोजनाओं को समय पर पूरा किया गया।
अमेठी में स्मृति ईरानी और राहुल गाँधी के बीच होगा कड़ा मुक़ाबला
गाँधी परिवार का गढ़ माने जानी वाली अमेठी सीट पर इस बार भी केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी और राहुल गाँधी आमने सामने होंगे। बता दें कि साल 2014 के लोकसभा चुनाव में उन्हें राहुल गाँधी से हार का सामना करना पड़ा था। हार के बावजूद स्मृति ईरानी ने अमेठी पर लगातार अपनी नज़र बनाए रखी है और कॉन्ग्रेस के कारनामों को कई बार उजागर भी किया है।
ऐसे कई मौक़े आए जहाँ अनेकों बार अमेठी के विकास और लचर व्यवस्था की समस्याएँ सामने आईं हैं। हाल ही में जब पीएम मोदी ने कोरवा में रूस के सहयोग से आयुध निर्माणी प्रांगण में ही अत्याधुनिक राइफल फैक्ट्री की आधारशिला रखी, उसी दौरान राहुल गाँधी द्वारा पीएम मोदी को झूठा कहने पर स्मृति ईरानी ने उन्हें आड़े हाथों लिया। उन्होंने ट्विटर पर एक फोटो शेयर की जिससे पता चलता था कि राहुल ने आयुध निर्माणी में 2007 में शिलान्यास किया था। लेकिन पीएम मोदी को जो ट्वीट राहुल ने किया उसमें उन्होंने स्वीकारा कि वो शिलान्यास 2010 में किया था। इस पर स्मृति ईरानी ने चुटकी लेते हुए कहा कि राहुल गाँधी इन दिनों ख़ौफ में हैं जिन्हें अमेठी के विकास के बारे में सही-सही जानकारी नहीं है।
ऐसा ही एक मामला नवंबर 2018 में सामने आया था जब उत्तर प्रदेश के मंत्री श्रीकांत शर्मा ने राहुल गाँधी पर सवाल दागा था कि जो स्वयं अपने निर्वाचन क्षेत्र में 15 सालों से विकास करने में सक्षम नहीं थे वो मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के विकास का वादा कैसे कर सकते हैं। राहुल को अपने निर्वाचन क्षेत्र में विकास न करने पर जवाबदेही बनती है लेकिन वो इस पर आज तक चुप्पी लगाए हुए हैं।
उत्तर प्रदेश के ऊर्जा मंत्री ने कहा था कि अमेठी क्षेत्र कॉन्ग्रेस की विफलताओं का स्मारक है। वहाँ के 5,000 गाँव बिना बिजली के अँधेरे में जीने को मजबूर हैं। सवा लाख घरों तक बिजली नहीं पहुँचाई गई, इस पर राहुल की जवाबदेही बनती है। पीएम मोदी को चुनौती देने से पहले राहुल को अपने निर्वाचन क्षेत्र में फैले अँधेरे पर अपनी चुप्पी तोड़नी होगी।
इसके अलावा ऐसे कई मुद्दों को भी शामिल किया जिनके बारे में जनता को कुछ नहीं मालूम था, हाल ही में गाँधी-वाड्रा परिवार के वो घोटालों भी उजागर हुए जिनकी आँच रक्षा सौदों तक जाती थी। ऐसे में यदि गहनता से सोचा जाए तो राहुल ने विकास के नाम पर लोगों को केवल भ्रमित करने का काम किया है जिसकी बुनियाद केवल झूठ पर टिकी है। इसलिए आगामी लोकसभा चुनाव में स्मृति ईरानी को इसका लाभ निश्चित तौर पर मिलेगा।
बिहार BJP सूची में 17 उम्मीदवार तय, कई बड़े नामों के कटने की संभावना
लोकसभा चुनाव को लेकर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की तस्वीर लगभग साफ हो चली है। ऐसे कयास लगाए जा रहे हैं कि पार्टी इस बार पटना साहिब से सांसद शत्रुघ्न सिन्हा को चुनाव लड़ने से बाहर का रास्ता दिखा सकती है। यह भी कहा जा रहा है कि वो कॉन्ग्रेस की टिकट पर इसी सीट से चुनाव लड़ सकते हैं। वहीं बीजेपी के क़द्दावर नेता गिरिराज सिंह की निर्वाचन सीट बदलकर बेगूसराय करने की भी संभावना है। भागलपुर सीट के जेडीयू पाले में जाने के बाद से ही शाहनवाज़ हुसैन के चुनाव लड़ने पर जहाँ पहले भी संशय था वो जस का तस बना हुआ है।
इन सब बिंदुओं को देखने से पता चलता है कि जहाँ बाकी पार्टियाँ अभी तक मुद्दे डिसाइड नहीं कर पा रहीं वहीं भाजपा ने पहली सूची के माध्यम से अपना विज़न सामने रखा है जिसमें युवाओं को मौके देने से लेकर कॉन्ग्रेस के गढ़ में उसपर आक्रमण करना और वाराणसी के माध्यम से देश के सामने एक बेहतर संसदीय क्षेत्र का विकल्प देना शामिल है।