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अमर सिंह के ‘चौकीदार’ बनने के बाद, जया प्रदा हो सकती हैं BJP में शामिल

लोकसभा चुनाव की घोषण के साथ ही राजनीतिक पार्टियाँ अपने उम्मीदवारों की फ़ेहरिस्त को वास्तविक रूप देने में जुटी हुई है। तमाम नेता एक पार्टी छोड़ दूसरी पार्टी का दामन थामने में लगे हुए हैं। इसी कड़ी में समाजवादी पार्टी से निष्काषित नेता जया प्रदा के भाजपा में शामिल होने की ख़बर आ रही है। साथ ही रामपुर लोकसभा सीट से चुनाव लड़ने के कयास भी लगाए जा रहे हैं। बता दें कि अगर ऐसा हुआ तो चुनावी मैदान में वो आज़म ख़ान को टक्कर देंगी।

इससे पहले 2014 में भाजपा ने रामपुर लोकसभा सीट से नेपाल सिंह को मैदान में उतारा था। उस समय उन्होंने एसपी के क़द्दावर नेता आज़म ख़ान के प्रत्याशी नसीर अहमद ख़ान को हराया था।

जया प्रदा ने सपा में शामिल होने से पहले टीडीपी (तेलुगू देशम पार्टी) के साथ अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत की थी और 2009 में रामपुर की महत्वपूर्ण लोकसभा सीट जीती थी। 2010 में सपा में गुटबाज़ी और आज़म ख़ान के साथ उनके बिगड़ते रिश्तों के चलते उन्हें पार्टी से निकलना पड़ा। बाद में 2014 में, उन्होंने बिजनौर से रालोद (राष्ट्रीय लोक दल) के टिकट पर लोकसभा चुनाव लड़ा, जिसमें उन्हें हार का सामना करना पड़ा था।

जया प्रदा और आज़म खान के बीच आपसी ज़ुबानी जंग लंबे समय तक जारी थी। हाल ही में, एक कार्यक्रम में बोलते हुए, जया प्रदा ने ख़ुलासा किया था कि आज़म ख़ान ने उन पर एसिड हमले का प्रयास किया था। उन्होंने यह भी कहा था कि ख़ान की वजह से उन्हें एक बार अपनी जान का ख़तरा भी हो गया था जिससे वो सदमें में चली गई थी।

समाजवादी पार्टी ने इस बार कॉन्ग्रेस के साथ गठबंधन करने की बजाए बहुजन समाज पार्टी से गठबंधन किया। 2014 में, सपा और बसपा को केवल 5 और 0 सीटें मिली थीं, जबकि भाजपा ने यूपी के साथ-साथ देश में भी ऐतिहासिक जनादेश हासिल करते हुए 71 सीटें जीती थीं।

मुझे हिंदी आती तो ऐश्वर्या राय के साथ ‘रेप’ करने का मौक़ा मिलता: एक्टर का विवादित बयान

तमिल के मशहूर अभिनेता राधा रवि को अभिनेत्री नयनतारा के बारे में विवादित बयान देना इस बार बहुत महँगा पड़ गया। एक तरफ़ जहाँ लोगों ने उन्हें सोशल मीडिया पर ट्रोल करना शुरू किया, वहीं DMK पार्टी ने भी चुनाव के नज़दीक होने के कारण तुरंत फैसला लिया और राधा रवि को पार्टी से निलंबित कर दिया। बता दें कि यह पहला मौक़ा नहीं था जब राधा रवि को महिलाओं के बारे में अभद्र टिप्पणी का इस्तेमाल करते सुना गया। इससे पहले भी वह अपने विवादित बयानों के कारण आलोचनाओं का हिस्सा बन चुके हैं।

नयनतारा पर विवादित टिप्पणी करने के बाद खबरों में राधा रवि का एक पुराना बयान भी चर्चा में आ गया है। दरअसल, इस बयान को स्वराज्यमैग के सीईओ प्रसन्ना विश्वनाथन द्वारा ट्विटर पर शेयर किया गया है। वे लिखते हैं कि राधा रवि ने एक बार बयान दिया था, “अगर मुझे सिर्फ़ हिंदी आती तो मुझे ऐश्वर्या के साथ रेप सीन करने का मौक़ा मिल सकता था। लेकिन दुर्भाग्यवश मैं हिंदी नहीं सीख पाया।”

नयनतारा पर दिए विवादित बयान के बारे में याद दिला दें कि कुछ दिन पहले राधा रवि ने अपनी आने वाली फिल्म कोलाईयुथिर कालम ट्रेलर लॉन्च पर अभिनेत्री नयनतारा के किरदार पर निशाना साधते हुए कहा था कि वे एक भूत के तौर पर काम करती हैं और फिर सीता की भी भूमिका निभाती हैं। राधा का कहना था कि पहले लोग सीता की भूमिका देने के लिए केवी विजया जैसे लोगों को चुनते थे लेकिन अब किसी को भी सीता बनने के लिए ले लिया जाता है। सीता के रोल के लिए ऐसे लोगों को लेना चाहिए, जिनको देखते ही मन में श्रद्धा जागे, न कि उनकी जो लोगों के साथ सोती फिरती हों।

नयनतारा पर इस तरह की टिप्पणी के बाद अभिनेत्री तापसी पन्नू अभिनेता विग्नेश शिवन ने भी राधा रवि की जमकर निंदा की। तापसी पन्नू ने राधा रवि के बयान पर कहा कि ये इतना घटिया है कि इसे शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता।

तापसी ने ट्वीट के जरिए रवि के बयान के बारे में पूछा कि ये होता कौन है यह कहने वाला कि फिल्म में किसे कास्ट किया जाए और किसे नहीं, ये क्या कैरेक्टर सर्टिफिकेट एसोसिएशन का प्रेजिडेंट है? तापसी ने कहा कि यह बयान एक मेहनती एक्ट्रेस के खिलाफ आया है और ये सभी के बारे में ऐसा ही कहता होगा।

भारतीय धरोहर ‘शारदा पीठ’ कॉरिडोर को खोलने की मंज़ूरी, 5000 साल पुराने मंदिर के दर्शन करना होगा संभव

पाकिस्तान ने हिन्दुओं के पवित्र धर्मस्थल शारदा पीठ के कॉरिडोर को खोलने की मंज़ूरी दे दी है। पाक अधिकृत कश्मीर (PoK) में स्थित शारदा पीठ मंदिर किसी पहचान की मोहताज नहीं है। यह माँ सरस्वती के निवास स्थान के रूप में विश्वभर में प्रसिद्ध है। कश्मीर के कुपवाड़ा से क़रीब 22 किलोमीटर दूर यह मंदिर महाराज अशोक के द्वारा 237 ईसा पूर्व में बनवाया गया था।

बता दें कि कश्मीरी पंडितों की तरफ से इस कॉरिडोर को खोलने के लिए लंबे समय से माँग की जा रही थी। अनंतनाग में रह रहे कश्मीरी पंडितों ने माँ सरस्वती के निवास के रूप में विख्यात शारदा देवी मंदिर में दर्शन करने के लिए रास्ता निकालने को लेकर अनेकों बार प्रदर्शन किए थे, जिसका समर्थन पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (PDP) ने भी किया था। न्यूज़ एजेंसी ANI ने पाकिस्तानी मीडिया के हवाले से इस ख़बर को शेयर किया है।

शारदा पीठ के संबंध में ब्राहम्ण ऑर्गनाइजेशन ऑफ़ इंडिया के अध्यक्ष रमेश किचलू ने मुंबई मिरर से बातचीत में कहा था कि यदि पुराने समय की बात करें तो छठी और बारहवीं सदी के बीच शारदा पीठ अध्ययन करने का एक बड़ा केंद्र हुआ करता था।

शारदा पीठ के इतिहास में एक लोक प्रचलित कहानी है, जिसमें एक चिड़िया अपनी चोंच से पत्थरों पर अक्षर लिखती है… इस बारे में अधिक जानने के लिए यहाँ क्लिक करें

शारदा पीठ को लेकर एक मान्यता यह भी है कि ऋषि पाणिनि ने यहाँ अपने अष्टाध्यायी की रचना की थी। यह श्री विद्या साधना का महत्वपूर्ण केन्द्र था। शैव सम्प्रदाय की शुरुआत करने वाले आदि शंकराचार्य और वैष्णव सम्प्रदाय के प्रवर्तक रामानुजाचार्य दोनों ने ही यहाँ महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ प्राप्त की थीं। शंकराचार्य यहीं सर्वज्ञपीठम पर बैठे तो रामानुजाचार्य ने यहाँ ब्रह्म सूत्रों पर अपनी समीक्षा लिखी थी।

वायु सेना में शामिल हुआ ‘चिनूक’ हेलिकॉप्टर, IAF प्रमुख ने बताया गेमचेंजर

लंबे समय के इंतज़ार के बाद चिनूक हेलिकॉप्टर को भारतीय वायु सेना में शामिल कर लिया गया है। इससे भारतीय वायु सेना को और अधिक मज़बूती मिल गई है। चंडीगढ़ में एयर फोर्स चीफ बीएस धनोआ की मौजूदगी में आज 4 चिनूक हेलिकॉप्टर के पहले यूनिट को वायु सेना में शामिल किया गया। इस चिनूक का नाम CH-47 एफ है।

इस मौक़े पर धनोआ ने कहा कि देश इस वक्त सुरक्षा के स्तर पर कई चुनौतियों का सामना कर रहा है। विभिन्न क्षेत्रों में हमें इसके लिए अलग-अलग क्षमता से भरपूर उपकरणों की ज़रूरत है। चिनूक को कुछ विशेष क्षमताओं से लैस किया गया है। यह राष्ट्र के लिए धरोहर है। इसके साथ ही चिनूक हेलिकॉप्टर की ताक़त और उपयोगिता को बताते हुए वायु सेना प्रमुख ने कहा कि चिनूक हेलिकॉप्टर सैन्य अभियानों में प्रयोग किया जा सकता है। इसका प्रयोग सिर्फ़ दिन में ही नहीं बल्कि रात में भी हो सकता है। इसकी दूसरी यूनिट पूर्व में दिनजान (असम) में होगी। चिनूक को वायु सेना में शामिल करना ठीक वैसे ही गेमचेंजर साबित होगा, जैसे फाइटर क्षेत्र में राफ़ेल को शामिल करना।

बता दें कि चिनूक एक मल्टीमिशन श्रेणी का हेलिकॉप्टर है। जिसका इस्तेमाल सैनिकों, हथियारों, उपकरण और ईंधन ढोने में किया जाता है। यह 9.6 टन वज़न उठा सकता है, जिसकी वजह से यह भारी मशीनरी, तोप और बख्तरबंद गाड़ियाँ लाने-ले जाने में सक्षम है। इसका उपयोग मानवीय और आपदा राहत अभियानों में भी किया जाता है। राहत सामग्री पहुँचाने और बड़ी संख्या में लोगों को बचाने में भी इसका प्रयोग किया जा सकता है। भारतीय वायु सेना के बेड़े में अब तक रूसी मूल के भारी वजन उठाने वाले हेलिकॉप्टर ही रहे हैं, लेकिन पहली बार वायु सेना को अमेरिका निर्मित हेलिकॉप्टर मिले हैं।

ग़ौरतलब है कि भारत ने सितंबर 2015 में विमान निर्माता कंपनी बोइंग से 15 ‘CH-47 एफ’ चिनूक हेलिकॉप्टर ख़रीदने के सौदे को अंतिम रूप दिया था। इसके साथ ही भारतीय वायु सेना के हेलिकॉप्टर के पायलटों को पिछले साल अक्टूबर में अमेरिका के डेलावर में चिनूक हेलिकॉप्टरों को उड़ाने का प्रशिक्षण लेने के लिए भी भेजा गया था।

दहेज में नहीं मिली बाइक और रुपए तो पति ने WhatsApp पर दिया तीन तलाक़

केंद्र सरकार द्वारा तीन तलाक़ का अध्यादेश लाए जाने के बावजूद तीन तलाक़ का मामला थमने का नाम नहीं ले रहा। आए दिन ऐसी घटनाएँ सामने आती रहती हैं जिससे साफ़ ज़ाहिर होता है कि तीन तलाक़ को लेकर समाज में अभी भी जागरुकता नहीं आ रही। इसी कड़ी में तीन तलाक़ से जुड़ा एक मामला सामने आया है, जिसमें पति ने पत्नी को व्हाट्सएप के ज़रिए तलाक़ दे दिया।

बता दें कि ये मामला गाज़ियाबाद के सिंभावली क्षेत्र के गाँव का है। यहाँ के एक युवक की शादी तक़रीबन दो साल पहले दिल्ली के सीलमपुर क्षेत्र में रहने वाली लड़की से हुई थी। युवक ने दहेज में बाइक व दो लाख रुपए की माँग की थी, जिसके ना दिए जाने पर उसने 16 मार्च 2019 को पत्नी को व्हाट्सएप पर तलाक़ दे दिया।

इतना ही नहीं, तलाक़ देने के बाद महिला के ससुराल वालों ने उसे बंधक बना लिया था। मगर किसी तरह से मौका पाकर महिला ने अपने मायके वालों को ख़बर की, जिसके बाद महिला के परिजनों ने पुलिस की मदद से अपनी बेटी को ससुरालवालों की क़ैद से आज़ाद करवाया। महिला के परिजनों ने थाने में कहा कि दहेज की रक़म ना दे पाने की वजह से उनकी बेटी को तलाक़ की सज़ा दी गई है।

इस मामले पर एसओ (थाना प्रभारी) नीरज कुमार का कहना है कि शिक़ायत के आधार पर परिजनों के साथ पहुँची पुलिस महिला को मुक्त कराकर थाने ले आई थी। महिला के परिजनों का कहना है कि वो क़ानूनी सलाह लेने के बाद ही किसी तरह की कार्रवाई करेंगे। फ़िलहाल परिजन तलाक़शुदा महिला को उसकी बच्ची समेत अपने साथ घर ले गए हैं।

गौरतलब है कि कुछ दिनों पहले भी हैदराबाद से एक ऐसी ही ख़बर सामने आई थी, जिसमें 22 वर्षीय महिला फराह फातिमा को उनके शौहर यासीर सिद्दकी ने व्हाट्सएप्प मैसेंजर के जरिए तीन तलाक़ दे दिया था, बता दें कि इनका निक़ाह फोन पर हुआ था।

‘मेरे पिता लाल बहादुर शास्त्री की तरह मोदी ने भी भारतीयों का मस्तक गर्व से ऊँचा उठाया’

दिवंगत पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के बेटे सुनील शास्त्री ने ‘द ताशकंद फाइल्स’ लॉन्च के दौरान खुल कर अपनी बातों को सामने रखा। सुनील शास्त्री ने बेबाक तरीके से हर सवाल का जवाब देते हुए फ़िल्म निर्माता विवेक अग्निहोत्री की प्रशंसा की। प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान ऑपइंडिया के सवालों का जवाब देते हुए सुनील शास्त्री ने कहा कि जिस तरह उनके पिता लाल बहादुर शास्त्री ने हर भारतीय का मस्तक गर्व से ऊँचा किया, ठीक उसी तरह आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी हर भारतीय का मस्तक गर्व से ऊँचा करने वाला कार्य कर रहे हैं। हालाँकि, उन्होंने राजनीति से जुड़े कई सवालों को टाल दिया लेकिन पीएम मोदी और अपने पिता के बीच समानता ढूँढने वाले प्रश्न पर वे ख़ामोश नहीं रह सके और अपनी बात रखी।

बाएँ से दाएँ (लाल बहादुर शास्त्री के बेटे सुनील शास्त्री, नाती संजय नाथ सिंह और फ़िल्म निर्माता विवेक अग्निहोत्री)

इस दौरान उत्तर प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे सुनील शास्त्री ने एक बहुत ही जबरदस्त वाक़या सुनाया। ऑपइंडिया के सवालों का जवाब देते हुए उन्होंने एक ऐसी घटना का जिक्र किया, जिस से आप न सिर्फ़ लाल बहादुर शास्त्री की हाज़िरजवाबी के कायल हो जाएँगे बल्कि उनकी बुद्धिमत्ता की भी प्रशंसा करेंगे। हुआ यूँ कि युद्ध के दौर से गुज़र रहे भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध विराम के समझौते के लिए दोनों देशों के नेताओं के बीच ताशकंद में समझौता होना तय हुआ। उस समय जनरल अयूब ख़ान पाकिस्तान के राष्ट्रपति थे। ऊँची क़द-काठी के अयूब ख़ान की शख़्सियत बहुत ही डील-डौल वाली थी। जब उनके और लाल बहादुर शास्त्री के बीच समझौता होना निश्चित हुआ, तब किसी ने शास्त्री का इस तरफ़ ध्यान दिलाया।

लाल बहादुर शास्त्री से किसी ने कहा कि वे तो इतने सीधे-सादे व्यक्ति हैं और धोती-कुर्ता में रहते हैं, ऐसे में भारी क़द-काठी वाले अयूब ख़ान के साथ वे एक फ्रेम में कैसे जँचेंगे? इस सवाल का शास्त्री ने काफ़ी हाज़िरजवाबी ढंग से जवाब दिया। लाल बहादुर शास्त्री ने कहा कि अगर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री मेरे से ऊँची क़द-काठी वाले हैं तो ये और भी अच्छी बात है क्योंकि भारत अपना मस्तक उठा कर बात करेगा और पाकिस्तान अपना सर झुका कर बात करेगा। उन्होंने इस बात से यह साबित कर दिया कि आदमी अपनी क़द-काठी से नहीं बल्कि अपने व्यवहार से अपने व्यक्तित्व का निर्माण करता है।

अभिनेत्री पल्लवी जोशी और सुनील शास्त्री के साथ फ़िल्म से जुड़े अन्य लोग

इस दौरान भावुक हुए सुनील शास्त्री ने कहा कि उन्हें आशा है कि ‘द ताशकंद फाइल्स’ की रिलीज के बाद उनके पिता की मृत्यु का सच बाहर आएगा। उन्होंने पुराने दिनों को याद करते हुए बताया कि कैसे लाल बहादुर शास्त्री के पर्सनल डॉक्टर और असिस्टेंट का एक्सीडेंट करा दिया गया था। उसके अस्सिस्टेंट रामनाथ को सुनील शास्त्री एक भाई की तरह मानते थे। उनसे जब भी शास्त्री जी के बारे में पूछा जाता, वो रो उठते थे। उनका दो बार एक्सीडेंट हुआ, जिसमें उनका एक पैर जाता रहा और उनके दिमाग पर भी बुरा असर पड़ा। इसी तरह उनके डॉक्टर की पुत्र सहित एक दुर्घटना में मृत्यु हो गई। बकौल सुनील शास्त्री, ये सब सिर्फ़ एक संयोग नहीं था।

भावुक सुनील शास्त्री को ढाढस बँधाते हुए अभिनेत्री पल्लवी जोशी ने कहा कि क्या एक बेटे को यह जानने का हक़ नहीं है कि उनके पिता की मृत्यु कैसे हुई? सुनील शास्त्री ने और भी कई रोंगटे खड़े कर देने वाली बातें बताई, जिसे सुन कर आप भी यह सोचने को मज़बूर हो जाएँगे कि आखिर वो कौन लोग थे, जिन्हें शास्त्री जी की मृत्यु का राज़ खुलने का भय था?

सुनील शास्त्री कह चुके हैं कि पीएम मोदी को वैसा ही मान-सम्मान मिलता है, जैसा उनके पिता को मिला करता था। बता दें कि नरेंद्र मोदी पहले ऐसे प्रधानमंत्री हैं, जिन्होंने पद पर रहते हुए लाल बहादुर शास्त्री के पैतृक आवास का दौरा किया था। सुनील शास्त्री मोदी को लाल बहादुर की तरह ही मेहनती मानते हैं।

धर्म नहीं, क्रिकेट का झगड़ा था गुरुग्राम में हुए हमले का कारण – पुलिस ने कर दिया कंफर्म

हाल ही में सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हुआ जिसमें एक भीड़ ने मुस्लिम परिवार के घर में घुसकर लाठियों से खूब मारपीट की। सोशल मीडिया पर इस हमले को तुरंत साम्प्रदायिक करार दे दिया गया, क्योंकि वीडियो में पीड़ित दुसरे समुदाय से था और हमलावरों की पहचान हिंदुओं के रूप में की गई। इस घटना के बाद राहुल गाँधी और कुछ अन्य लोगों ने बिना हक़ीकत का पता लगाए भाजपा और आरएसएस पर निशाना साधा। ऐसे लोगों ने जानने की भी कोशिश नहीं कि क्या वाकई ये हमला आरएसएस और भाजपा की विचारधारा से प्रेरित था?

दरअसल, यह हमला किसी साम्प्रदायिक घृणा का नतीज़ा नहीं था बल्कि क्रिकेट पर हुई लड़ाई इसका कारण थी। ऑपइंडिया ने जब गुरुग्राम की पुलिस से इसके बारे में बात की तो यह तथ्य सामने निकलकर आए। गुरुग्राम पुलिस द्वारा दिए बयान में यह साफ़ हुआ कि इस पूरी घटना का साम्प्रदायिकता से कोई वास्ता नहींं था।

सुभाष बोकन (पुलिस) ने बताया कि यह झगड़ा क्रिकेट के कारण शुरू हुआ था, जिसमें एक बच्चे को गेंद लग गई। और इसी बात पर उनका झगड़ा हो गया। क्रिकेट खेल रहे लड़को ने अपने दोस्तों को बुला लिया। जब उन्हें एहसास हुआ कि वे (पीड़ित परिवार) संख्या में कम हैं, तो वे घर में भाग गए। फिर, लड़को की यह पूरी भीड़ पीड़ित परिवार घर में घुसी और सबके साथ मारपीट की। पुलिस ने बताया कि यह कोई साम्प्रदायिक मामला नहीं है। यहाँ तक कि पीड़ित परिवार का भी कहना था कि यह सांप्रदायिकता नहीं है, वे लंबे समय से इस क्षेत्र में रह रहे हैं।

अब इसके बाद जब यह सुनिश्चित हो गया कि यह मामला घृणा से संबंधित अपराध का न होकर क्रिकेट पर हुई एक लड़ाई का है, तो कुछ मीडिया हाउस इस घटना को साम्प्रदायिक विवाद बनाने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसी मीडिया रिपोर्टों का दावा है कि पीड़ित पक्ष को हमलावरों की ओर से ‘पाकिस्तान जाओ’ जैसी बातें कही गई। लेकिन जब सुभाष बोकन (पुलिस) से इसके बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि पीड़ित पक्ष की ओर से ऐसी कोई शिक़ायत नहीं दर्ज कराई गई।

इसके अलावा पीड़ितों ने एबीपी न्यूज़ को दिए एक इंटरव्यू में अपनी आपबीती भी सुनाई, और उस इंटरव्यू में भी उन्होंने कहीं भी इस बात का ज़िक्र नहीं किया कि हमलावरों ने उन्हें पाकिस्तान जाने के लिए कहा। अब इससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि मीडिया के एक वर्ग द्वारा ख़बर को ऐसा एंगल सिर्फ़ सनसनीखेज़ बनाने के लिए जोड़ा गया था, जबकि वास्तव में हमलावरों ने ऐसा कुछ भी नहीं कहा था।

इससे यह भी स्पष्ट हो जाता है कि पूरे मामले में जिस एंगल के साथ आरएसएस और भाजपा को टारगेट किया जा रहा था, वो पूर्ण रूप से निराधार था। इस घटना को बिना आपराधिक प्रवृति का बताए, कुछ तथाकथित सेकुलरों द्वारा सांप्रदायिक एंगल देकर केवल इसलिए पेश किया गया, ताकि समुदाय विशेष को पीड़ित के रूप में चित्रित किया जा सके।

अल-क़ायदा और IS कर सकते हैं हमला, गोवा समेत दिल्ली, मुंबई में अलर्ट जारी

भारत की ख़ुफ़िया एजेंसियों ने गोवा, मुंबई और दिल्ली में अल-क़ायदा और इस्लामिक स्टेट (IS) द्वारा आतंकी हमला होने की संभावना जताई है। इस संभावना के चलते स्थानीय पुलिस प्रशासन को अलर्ट भी जारी कर दिया गया। गोवा पुलिस ने कहा कि राज्य में इज़रायली पर्यटकों पर इस्लामिक आतंकवादियों द्वारा ‘संभावित बदले’ के रूप में हमला किया जा सकता है।

एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि उन्हें इज़रायल के पर्यटकों के अलावा उत्तरी गोवा में एक प्रार्थना घर को भी सुरक्षित रखना होगा। यह आतंकी हमला इस्लामिक स्टेट या अल-क़ायदा द्वारा न्यूज़ीलैंड की मस्जिद में हुई हत्याओं का बदला लेने के लिए किया जा सकता है।

ख़बर के अनुसार, वर्तमान में कई दर्जन इज़रायली यहूदी गोवा में लंबे समय तक वीजा पर हैं और वे अक्सर उत्तरी गोवा के छाबड़ हाउस में प्रार्थना करने के लिए इकट्ठे होते हैं।

कथित तौर पर अन्य राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को भी अलर्ट जारी किया गया है, जिसमें यहूदी आराधनालयों समेत वो जगह भी शामिल हैं जहाँ इज़रायली पर्यटक निवास करते हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया के अनुसार, चाकू को भी एक हथियार के तौर पर हमले के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। ख़ुफ़िया एजेंसियों ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि मुंबई में इज़रायली दूतावास, महावाणिज्यिक दूतावास के अलावा छाबड़ हाऊस की सुरक्षा और निगरानी तत्काल प्रभाव से बढ़ाई जाए।

हाल के दिनों में, इस्लामी आतंकवादी समूहों से जुड़े आतंकवादियों ने लोगों को मारने के लिए वाहनों का उपयोग किया गया। पुलवामा आतंकी हमले में भी, आत्मघाती बम विस्फोट के लिए एक वाहन का ही इस्तेमाल किया गया था। यूरोप में, पैदल यात्रियों के ऊपर आतंकवादियों ने ट्रक चढ़ा दिए।

बता दें कि शुक्रवार (15 मार्च) की सुबह न्यूज़ीलैंड के क्राइस्टचर्च शहर के अल नूर मस्जिद में गोलीबारी हुई थी जिसमें कई लोगों के हताहत होने की ख़बर थी। इस घटना के बारे में न्यूज़ीलैंड पुलिस ने अपने बयान में क्राइस्टचर्च में गंभीर स्थिति पैदा होने की स्थिति को स्वीकारा था हमले से बिगड़ते हालात में शहर के सभी स्कूलों को बंद कर दिया गया था और भीड़भाड़ वाले इलाक़े से बचने की सलाह दी गई थी। इस आतंकी हमले में कम से कम 49 लोग मारे गए थे।

धोनी ने बेटी जीवा से 6 भाषाओं में किए सवाल, जीवा ने दिए सटीक जवाब, वीडियो वायरल

इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) का रोमांचक आग़ाज़ हो चुका है। एम एस धोनी के नेतृत्व वाली टीम चेन्नई सुपरकिंग्स के हौसले बुलंद हैं। सीएसके ने IPL-12 के पहले मुकाबले में विराट कोहली के नेतृत्‍व वाली रॉयल चैलेंजर्स बैंगलोर को सात विकेट से मात देकर अपने अभियान की विजयी शुरुआत की।

बता दें कि IPL में बिजी शेड्यूल के बावजूद धोनी अपनी फैमिली के साथ भी क्वालिटी टाइम स्पेंड कर रहे हैं। धोनी ने अपने आधिकारिक इंस्‍टाग्राम अकाउंट पर एक वीडियो शेयर किया है, जिसमें वो अपनी बेटी जीवा के साथ 6 भाषाओं में बातें करते नज़र आ रहे हैं। पापा धोनी ने बंगाली, गुजराती, तमिल, उर्दू, भोजपुरी समेत 6 भाषाओं में जीवा से पूछा कि “हाउ आर यू?” जीवा ने सभी भाषाओं में इसका सही सही और बेहद प्यारे अंदाज़ में जवाब दिया। खास बात यह है कि धोनी ने जीवा से जिस भाषा में सवाल पूछा, जीवा ने उसी भाषा में जवाब दिया। धोनी ने जीवा के जवाब को सुनकर ताली बजाकर उसका उत्साहवर्धन किया। धोनी के द्वारा शेयर किया गया वीडियो वायरल हो गया है। लोग वीडियो को लोग खूब पसंद कर रहे हैं।

हालाँकि धोनी सोशल मीडिया पर कम ही नज़र आते हैं, लेकिन जब भी वो कुछ पोस्ट करते हैं, तो उसमें उनकी बेटी जीवा जरूर होती है। हाल ही में जीवा का एक वीडियो सामने आया था, जिसमें वो एक रेस्‍टोरेंट में कॉकटेल का मज़ा लेते हुए दिख रही थीं। उन्‍होंने कुछ मेहमानों को अपनी कॉकटेल भी ऑफर की।

कॉन्ग्रेस के लिए देश है प्राइवेट लिमिटेड कम्पनी: ‘मालिक’ चाहेगा तो ‘मैनेजर’ हट जाएगा, संतान आ जाएगी

इन दिनों क्योंकि चुनावी सीजन चल रहा है, और राजनीति में मेरी मामूली सी दिलचस्पी भी है, तो अक्सर लेखन में राजनीति या राजनीति के किसी प्रसंग का पुट आ ही जाता है। और ऐसा ही एक प्रसंग मुझे फिलहाल याद आ रहा है, जिसे मैं कॉन्ग्रेसियों को समर्पित करना चाहूँगा।

2006-07 की बात है। मैं दिल्ली में कॉन्ग्रेस के एक सीनियर नेता का पी.ए. हुआ करता था। उनकी सीनियरटी का अंदाज इससे लगा लीजिए कि वे इंदिरा गाँधी की कैबिनेट में भी कैबिनेट मंत्री हुआ करते थे। एक बार वह बीमार पड़ गए, और कुछ दिनों के लिए उन्हें हॉस्पिटल में एडमिट करना पड़ा। उनकी गैर मौजूदगी में अक्सर उनके दामाद उनके चैम्बर में बैठने आया करते थे। उनको ‘भला’ तो नहीं कहूँगा पर लगभग ‘सज्जन’ ही थे।

एक बार वे साहब के चैम्बर में बैठे हुए थे, और उन्होंने मुझे बजर देकर बुलाया। मैं जब उनके पास पहुँचा तो वे फोन पर किसी से बात करते हुए कह रहे थे, “अभी तो हम हॉस्पिटल में एडमिट हैं।” बात खत्म होने के बाद उन्होंने कुछ काम बताया और मैं बाहर आ गया। लेकिन उनके यह शब्द मेरे दिमाग में खटक रहे थे कि यह तो भले चंगे हैं, ये कहाँ एडमिट हैं, तो क्यों कह रहे हैं कि एडमिट हैं?

फितरतन जरूरी चीजों में बेशक दिमाग काम नहीं करता है, लेकिन ऐसी मिस्ट्री सुलझाने में दिमाग एकदम फ्रंट-फुट पर खेलने लगता है। और मैं बाद में, तमाम चिन्तन के बाद, इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि इसके दो मायने हैं- एक पर्सनल है, और दूसरा कॉन्ग्रेसी कल्चर का हिस्सा।

जैसे साहब के दामाद के कथन से यह अभिप्राय था कि उनका अपना कोई वजूद नहीं है, वे जो कुछ भी हैं साहब की वजह से हैं, जो कि सच भी था। और इसलिए अगर ‘साहब’ को बुखार है तो वे भी ‘क्रोसिन’ खाना शुरू कर देते हैं, साहब को अगर मलेरिया है तो वे भी अपना ब्लड टेस्ट करवा लेते हैं, साहब अगर खुश हैं तो वे नाचने लगते हैं, साहब अगर दुखी हैं तो वे रुदाली बन जाते हैं। क्योंकि उनका अपना कुछ भी नहीं है, वे जो कुछ भी हैं साहब की वजह से हैं।

यही हाल हूबहू कॉन्ग्रेसियों का है। उनका अपना कुछ भी नहीं है। वे जो कुछ भी हैं नेहरू-गाँधी परिवार की वजह से हैं और इसलिए वे जो कुछ भी करते हैं, वह इस परिवार विशेष को ही समर्पित होता है।

आपको याद होगा कि 2014 के चुनावों में, मोदी जी के पीएम पद का प्रत्याशी घोषित होने के बाद भी, मीडिया और विपक्ष के कई नेता इस अफवाह को हवा देते थे कि भाजपा के कुछ सीनियर नेता, मसलन आडवाणी, सुषमा स्वराज, अनंत कुमार, वेंकैया नायडू, राजनाथ सिंह, नितिन गडकरी इत्यादि, ‘मिशन 180’ पर काम कर रहे हैं- ताकि भाजपा 200 सीटों के भीतर सिमट जाए और मोदी की बजाय उनमें से ही कोई एक पीएम बन जाए। यह थ्योरी कुछ लोग अभी भी चला रहे हैं।

एकबारगी इस थ्योरी और अफवाह पर यकीन भी कर लिया जाए तो हमें भाजपा की इस बात के लिए दाद तो देनी पड़ेगी कि यहाँ कोई भी छोटा-बड़ा, साधारण और विशिष्ट नेता पीएम बनने की सोच सकता है।

पर क्या कॉन्ग्रेस में ऐसा मुमकिन हो सकता है? क्या कॉन्ग्रेस में किसी की मजाल है कि वे वह अपने माई-बाप यानि दस जनपथ परिवार की मर्जी के बिना एक पार्षद बनने तक का ख्वाब देख सके? ऐसा नहीं है कि सारी योग्यता और टैलेंट बीजेपी के ही नेताओं में है; मैं मानता हूँ कि कॉन्ग्रेस में भी योग्य नेताओं की कमी नहीं है।

लेकिन उनकी तमाम योग्यता तब धरी रह जाती है, जब वे किसी मजबूरी, स्वार्थ, अथवा सस्ती चालाकी के चक्कर में गाँधी परिवार की गुलामी का वरण कर लेते हैं और इसे सहर्ष स्वीकार भी करते हैं- जैसा कि आज राजस्थान के सीएम ने अपने बयान में कहा है कि कॉन्ग्रेस के लिए गाँधी परिवार का नेतृत्व इसलिए जरूरी है कि इसकी वजह से पार्टी में एका है। अगर कॉन्ग्रेसियों के सिर से गाँधी परिवार का ‘हाथ’ हट जाए तो यहाँ भगदड़ मच जाएगी।

जैसा कि नरसिंह राव के दौर में हुआ था। जब राजीव गांधी रहे नहीं थे। सोनिया गाँधी सक्रिय राजनीति में उतरी नहीं थीं। तब देश की सबसे पुरानी पार्टी होने और आजादी की लड़ाई लड़ने का दंभ भरने वाले कॉन्ग्रेसियों ने तिवारी कॉन्ग्रेस, सिंधिया कॉन्ग्रेस, अर्जुन कॉन्ग्रेस, तमिल मनीला कॉन्ग्रेस, इसकी कॉन्ग्रेस, उसकी कॉन्ग्रेस जैसे तमाम दल बना लिए थे। फिर सोनिया जी ने कॉन्ग्रेस की बागडोर संभाली और सबको पुचकार के बुलाया तो सब फिर से दस जनपथ के वफादार बन गए।

भाजपा दूध की धुली नहीं है। दूध का धुला मैं भी नहीं हूँ। और दुनियादारी को दूध में धुले होने वाले मानकों से नापना भी नहीं चाहिए- खासकर राजनीति को तो कतई नहीं। पर इसके बाद जो पैमाने बच जाते हैं, उन सभी पैमानों पर भाजपा एक श्रेष्ठ पार्टी है, पार्टी विथ डिफ़रेंस है। और इसे कई प्रकार से समझा जा सकता है।

सितम्बर 2013, तब केंद्र में यूपीए की सरकार थी। राहुल गाँधी अपनी ही पार्टी के नेता अजय माकन की प्रेस कॉन्फ्रेंस में पहुँचते हैं। वहाँ अपनी ही सरकार के एक अध्यादेश को फाड़ कर फेंक देते हैं। अध्यादेश जो एक क़ानून होता है, जिसे प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली कैबिनेट पास करती है। पर राहुल गाँधी ऐसा कर देते हैं और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह न केवल गोंद पीकर रह जाते हैं, बल्कि जब उनका मुँह खुलता है तब वे कहते हैं कि राहुल जी जब चाहेंगे, तब वे अपने पद से हटने को तैयार हैं।

क्यों भई? यह लोकतांत्रिक देश है या कोई प्राइवेट लिमिटेड कम्पनी, कि ‘मालिक’ जब चाहेगा तब ‘मैनेजर’ को हटा देगा और अपनी संतान को कम्पनी सौंप देगा?

आज भाजपा में कोई नेता सरकार के किसी अध्यादेश को फाड़ कर दिखाने की हिम्मत कर सकता है; अगर कर भी दे तो क्या पार्टी में राहुल गाँधी सरीखे रुतबे के साथ राजनीति कर सकता है? आडवाणी जी पार्टी लाइन से इतर जिन्ना की मजार पर सेक्यूलरीज्म के फूल चढ़ा आए थे, जिसका हश्र यह हुआ कि उनकी बाकी राजनीति जिन्ना के भूत से पीछा छुड़ाने में गुजर गई। यही हश्र भाजपा के एक और कद्दावर नेता जसवंत सिंह के साथ हुआ। उन्होंने किताब लिखकर जिन्ना को सेकुलर होने का तमगा दिया और उनकी जीवन भर की राजनीति जिन्ना के वास्ते होम हो गई। यह सब एक राष्ट्रवादी और जीवंत संगठन में ही सम्भव हो सकता है।

यह अगर संभव नहीं हो सकता है तो कॉन्ग्रेस में, क्योंकि कॉन्ग्रेस कोई पार्टी-वार्टी नहीं है बल्कि एक प्राइवेट लिमिटेड कम्पनी है।

और इसीलिए यहाँ जो लोग अपने आपको नेता, कार्यकर्ता, पदाधिकारी कहते हैं, मुझे उन पर भी बड़ा तरस आता है, क्योंकि जहाँ कार्यकर्ता हो सकते हैं वह एकमात्र पार्टी सिर्फ भाजपा है, वरना कॉन्ग्रेस सहित जितने भी दल हैं, वहाँ कार्यकर्ता नहीं बल्कि ‘बाउंसर’ होते हैं। वे बाउंसर हैं सोनिया गांधी के, वे बाउंसर हैं राहुल गांधी के, और वे बाउंसर हैं मिसेज प्रियंका वाड्रा के।

खैर, फिलहाल इस चर्चा को यहीं विराम देना चाहिए। लिखने का उद्देश्य सिर्फ लेखक बनना नहीं होता बल्कि अपनी उन भावनाओं को भी अभिव्यक्ति देना होता है, जिनके बारे में आपको लगता है कि अब कह ही देना चाहिए। सही-गलत के सबके अपने-अपने पैमाने हो सकते हैं, पर कुछ मौके ऐसे आते हैं जहाँ ‘खामोश’ और ‘निष्पक्ष’ नहीं रहना चाहिए।