यूपी में नकल माफियाओं पर शिकंजा कसने के बाद बोर्ड की परीक्षाओं में बैठने वाले छात्रों के आँकड़ों में काफ़ी ज्यादा फर्क देखने को मिला है। 2017 में जहाँ बाहरी छात्रों की संख्या 1.15 लाख थी वह 2018 में 1.12 लाख हुई और 2019 में इन छात्रों की संख्या केवल 6300 ही रह गई है।
यूपी में बोर्ड की परीक्षाएँ शुरू हो चुकी हैं। शिक्षा विभाग की सख्ती के कारण नकल माफियाओं ने परीक्षा से दूरी बनाई हुई हैं। परिणाम, अबतक दसवीं और बाहरवीं के क़रीब 6 लाख से ज्यादा छात्र परीक्षा छोड़ चुके हैं। यूपी बोर्ड की 10वीं और 12वीं की परीक्षाएँ 7 फरवरी से शुरू होकर 2 मार्च को खत्म होने वाली हैं।
यूपी बोर्ड सचिव नीना श्रीवास्तव का कहना है कि पहले के मुकाबले इस साल नेपाल और आसपास के कई राज्यों से होने वाले पंजीकरण में कमी आई है। उनका कहना है कि ये लोग नकल के कारण यहाँ पर आते थे, लेकिन सख़्ती होने की वजह से इन छात्रों की संख्या में भारी गिरावट हुई।
इस साल यूपी बोर्ड परीक्षा के लिए कुल 58,06,922 छात्रों ने अपना पंजीकरण कराया था। इनमें 10वीं के ही 31,95,603 छात्र हैं। और परीक्षा छोड़ने वाले अधिकतर छात्र भी 10वीं के ही हैं।
बता दें कि पिछले कुछ वर्षों में नकल के इतिहास को देखते हुए 21 फीसदी परीक्षा केंद्रों को संवेदनशील और अतिसंवेदनशील घोषित किया गया था। इस साल परीक्षा विभाग की कड़ी निगरानी, उत्तर प्रदेश एसटीएफ के कड़े पहरे और बारकोड कॉपियों के बावजूद भी शुरूआती 9 दिनों में ही क़रीब 252 नकल करने वाले पकड़े गए हैँ।
इस सप्ताह के वो झूठ जो स्क्रॉल, रॉयटर्स से लेकर राजदीप सरदेसाई, राहुल गाँधी और कविता कृष्णन ने फैलाई। देखें इस वीडियो में कैसे किया गया हर एक झूठ का पर्दाफाश:
जम्मू-कश्मीर लिबरल फ्रंट के अध्यक्ष यासीन मलिक को बीते शुक्रवार (फरवरी 22, 2019) की रात मायसूमा स्थित आवास से हिरासत में लिया । इसके बाद यासीन को पहले कोठीबाग ले जाया गया और फिर वहाँ से सेंट्रल जेल में भेज दिया गया। खबरें हैं कि आज (फरवरी 23,2019) यासीन को राज्य से बाहर भी भेजा जा सकता है।
पुलिस को आशंका है कि पुलवामा हमले के बाद अलगाववादी कश्मीर के माहौल को और भी खराब कर सकते हैं। इसलिए एहतियात बरतते हुए यासीन को गिरफ्तार किया गया है। हालाँकि अभी किसी अन्य नेता को हिरासत में लिए जाने की ख़बर सामने नहीं आई है। इसके अलावा प्राप्त जानकारी के अनुसार अनुच्छेद 35-ए पर सुप्रीम कोर्ट में सोमवार (फरवरी 25, 2019) को सुनवाई शुरू होगी।
Jammu Kashmir Liberation Front Chief Yasin Malik was detained from his residence in Srinagar last night, ahead of hearing on Article 35A in Supreme Court which is likely to take place on Monday. pic.twitter.com/S8c9QFhG1e
पुलवामा हमले के बाद सरकार ने अलगाववादी नेताओं के ख़िलाफ़ सख्त रुख अपनाते हुए घाटी के 18 हुर्रियत नेताओं और 155 राजनीतिज्ञों से सुरक्षा वापस ले ली थी। इन अलगाववादी नेताओं में मौलवी अब्बास अंसारी, एसएएस गिलानी, यासीन मलिक, सलीम गिलानी, शाहिद उल इस्लाम, जफर अकबर भट, अगा सैयद मौसवी, नईम अहमद खान, फारुख अहमद किचलू, मसरूर अब्बास अंसारी, अब्दुल गनी शाह, अगा सैयद अब्दुल हुसैन, मोहम्मद मुसादिक भट और मुख्तार अहमद वजा के नाम भी शामिल हैं। इनकी सुरक्षा के लिए सौ से ज्यादा गाड़ियाँ और 1000 पुलिसकर्मियों को तैनात किया गया था।
Security cover of 18 separatist leaders and 155 Jammu and Kashmir politicians has been withdrawn in the aftermath of the Pulwama attack. https://t.co/iOqEYgqOFx
हमले के बाद से श्रीनगर में कानून व्यवस्था को बनाए रखने के लिए पुलिस सुरक्षा के कड़े प्रबंध कर रही है। इसी दिशा में एक सप्ताह के बाद यह कार्रवाई की गई है। बता दें कि कल शुक्रवार को मलिक ने सरकार द्वारा अलगाववादी नेताओं को दी सुरक्षा को झूठा करार दिया था। यासीन ने कहा था कि पिछले 30 साल से उन्हें कोई सुरक्षा नहीं मिली है, ऐसे में जब सुरक्षा मिली ही नहीं है तो वह किस वापसी की बात कर रहे हैं।
यासीन ने एक तरफ जहाँ सुरक्षा वापस लेने वाले फैसले को बेईमानी बताया है वहीं पर सैयद अली शाह गिलानी ने सुरक्षा वापस लेने वाली खबर को बेहद हास्यास्पद बताया।
क्या है 35-ए, जिस पर सुप्रीम कोर्ट में शुरू होगी सुनवाई?
दूसरे राज्य का कोई भी व्यक्ति जम्मू-कश्मीर का स्थाई निवासी नहीं बन सकता है।
जम्मू-कश्मीर के बाहर का कोई भी व्यक्ति यहाँ पर अचल संपत्ति नहीं खरीद सकता।
इस राज्य की लड़की अगर किसी बाहरी लड़के से शादी करती है, तो उसके सारे प्राप्त अधिकार समाप्त कर दिए जाएँगे।
राज्य में रहते हुए जिनके पास स्थायी निवास प्रमाणपत्र नहीं हैं, वे लोकसभा चुनाव में मतदान कर सकते हैं लेकिन स्थानीय निकाय चुनाव में वोट नहीं कर सकते हैं।
इस अनुच्छेद के तहत यहाँ का नागरिक सिर्फ़ वहीं माना जाता है जो 14 मई 1954 से पहले के 10 वर्षों से राज्य में रह रहा हो या फिर इस बीच में यहाँ उसकी पहले से कोई संपत्ति हो।
पुलवामा आतंकी हमले के बाद कॉन्ग्रेस आई टी सेल दिन-रात भाजपा सरकार को घेरने के लिए झूठी ख़बरों का सहारा लेता दिख रहा है। कॉन्ग्रेस के प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने बृहस्पतिवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस में दावा किया कि केंद्रीय पर्यटन राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) के जे अल्फोंस ने अंतिम संस्कार से पहले शहीद के पार्थिव शरीर के साथ सेल्फी ली। कॉन्ग्रेस नेता ने मीडिया को बुलाकर एक तस्वीर भी प्रेस कॉन्फ्रेंस में दिखाई, जिसे सुरजेवाला ने अल्फोंस की सेल्फी बताया।
प्रेस कॉन्फ्रेंस में सुरजेवाला ने कहा, “मोदी जी के पर्यटन मंत्री ने तो बेशर्मी की सब हदें तोड़ डालीं, सेल्फी विद डेड बॉडी ऑफ ए शहीद। क्या इससे भी ज्यादा दर्दनाक कोई बात हो सकती है और शर्मसार करने वाली?”
अल्फोंस की वास्तविक तस्वीर में देखा जा सकता है कि अल्फोंस के दोनों हाथ नीचे हैं, जबकि कॉन्ग्रेस की समस्या थी कि यह सेल्फ़ी ले रहे थे। कॉन्ग्रेस ने अपने झूठे दावे को हवा देने के लिए तस्वीर को क्रॉप कर इस तरह से मीडिया के सामने रखा जैसे यह अल्फोंस द्वारा ली गई सेल्फ़ी हो। सुरजेवाला ने तस्वीर से एक हाथ गायब किया है क्रॉपिंग के द्वारा ताकि लगे कि वो सेल्फी है। जबकि हक़ीक़त ये है कि तस्वीरों से यह साफ होता है कि वायरल हो रही अल्फोंस की तस्वीर सेल्फी नहीं बल्कि मीडिया के कैमरे से खींची गई तस्वीर है।
लगातार प्रयासरत रहने के बावजूद भी भाजपा सरकार के खिलाफ सुबूत जुटाने में नाकाम रहने वाली कॉन्ग्रेस पार्टी अपनी विश्वसनीयता खोती जा रही है और उलजुलूल हथकंडे अपना रही है। कभी यह पार्टी अपनी रैली में भीड़ जुटाने के लिए फोटोशॉप का सहारा लेती नजर आ रही है तो कभी तस्वीरों को क्रॉप कर पूरी मीडिया में झूठ की खेती कर रही है। राफेल डील से लेकर सेल्फ़ी प्रकरण तक, सब जगह कॉन्ग्रेस के दावे झूठे साबित होते आ रहे हैं।
एक पार्टी, जिसका अध्यक्ष राहुल गाँधी स्वयं झूठ के कारोबार में लिप्त है उन पार्टी प्रवकता से और क्या उम्मीद की जा सकती है।पार्टी का दिनों-दिन गिरता हुआ यह स्तर ही चुनाव के बाद अपनी हार के लिए EVM को दोषी ठहराता है।
पी चिदंबरम की मुश्किलें बढ़ने वाली हैं। आईएनएक्स मीडिया मामले में पूर्व वित्त मंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी चिदंबरम के ख़िलाफ़ मुक़दमा चलाने के लिए CBI को सरकार से अनुमति मिल गई है। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार पूर्व वित्त मंत्री के ख़िलाफ़ जल्द ही चार्जशीट दायर की जाएगी। कुछ दिन पहले कानून मंत्रालय ने भी इस मामले में मुक़दमा चलाने की मंजूरी दी थी।
बता दें कि सीबीआई ने 21 जनवरी को इस संबंध में एक अनुरोध पत्र भेजा था। बीते 8 फरवरी को आईएनएक्स मीडिया से जुड़े मनी लांड्रिंग के मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम से लंबी पूछताछ की थी। चिदंबरम पर आरोप है कि नियमों को ताक पर रखकर आईएनएक्स मीडिया को विदेशी निवेश की मंजूरी दी गई और इसके बदले करोड़ों रुपये की घूस ली गई।
दरअसल यह पूरा मामला 2007 का है, जब पी चिदंबरम वित्त मंत्री थे। आरोप है कि कार्ति चिदंबरम ने अपने पिता के जरिए आईएनएक्स मीडिया को विदेशी निवेश प्रमोशन बोर्ड से विदेशी निवेश की मंजूरी दिलाई थी। ज्ञात हो कि आईएनएक्स मीडिया को 305 करोड़ रुपए का विदेशी निवेश हासिल हुआ था।
मामला कुछ यूँ है कि कार्ति चिदंबरम ने ही आईएनएक्स मीडिया की प्रमोटर इंद्राणी मुखर्जी और पीटर मुखर्जी को पी चिदंबरम से मिलवाया था। इसके बदले कार्ति चिदंबरम ने घूस के तौर पर करोड़ो रुपए लिए थे। जबकि ऐसे मामलों में स्पष्ट निर्देश है कि विदेशी निवेश के लिए कैबिनेट की आर्थिक मामलों की सलाहकार समिति की इजाज़त लेना जरूरी है।
बता दें कि इस मामले में पी चिदंबरम पर आरोप है कि उन्होंने वित्त मंत्री (साल 2007) रहते हुए गलत तरीके से विदेशी निवेश को मंजूरी दी थी। उन्हें 600 करोड़ रुपए तक के निवेश की मंजूरी देने का अधिकार था, लेकिन यह सौदा करीब 3500 करोड़ रुपए निवेश का था। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने अपने अलग आरोप पत्र में कहा है कि कार्ति चिदंबरम के पास से मिले उपकरणों में से कई ई-मेल मिली हैं, जिनमें इस सौदे का जिक्र है।
इसी मामले में पूर्व टेलिकॉम मंत्री दयानिधि मारन और उनके भाई कलानिधि मारन भी आरोपित हैं। सीबीआई ने 2017 में मुक़दमा दर्ज किया था और कार्ति चिदम्बरम की गिरफ़्तारी भी हुई थी। हालाँकि बाद में कीर्ति चिदंबरम को ज़मानत मिल गई थी। फिर ईडी ने मनी लॉड्रिंग का केस दर्ज कर जाँच शुरू की और कार्ति चिदम्बरम की करीब 54 करोड़ रुपए की संपत्ति अटैच कर ली।
इतना ही नहीं इस मामले में इंद्राणी मुखर्जी, पीटर मुखर्जी और कार्ति के सीए भी सह आरोपी हैं। इंद्राणी मुखर्जी कोर्ट के सामने सरकारी गवाह बनने की इच्छा भी ज़ाहिर कर चुकी हैं।
पुलवामा में हुए आतंकी हमले के बाद भारत सरकार के सख्त रुख को देखते हुए पाकिस्तान सरकार ने आतंकवादी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के बहावलपुर स्थित मुख्यालय को अपने कब्जे में ले लिया है। यह जानकारी पाकिस्तान के आंतरिक मंत्रालय ने शुक्रवार (फरवरी 22, 2019) शाम को दी। पाकिस्तान सरकार की इस कार्रवाई को वहाँ की राष्ट्रीय सुरक्षा समिति के आदेश का असर माना जा रहा है। भारत और अंतरराष्ट्रीय दबाव के चलते पाकिस्तान सरकार ने बहावलपुर स्थित जैश-ए-मोहम्मद के हेडक्वार्टर के साथ ही एक मदरसे और मस्जिद को भी कब्जे में ले लिया।
The Government of Punjab has taken over the control of a campus comprising Madressatul Sabir and Jama-e-Masjid Subhanallah in Bahawalpur: Spokesman of the Ministry of Interior
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने राष्ट्रीय सुरक्षा समिति के साथ कल बैठक की थी।पाकिस्तान के आंतरिक मंत्रालय की ओर से कहा गया कि पंजाब सरकार ने बहावलपुर में मदरसातुल साबिर और जामा-ए-मस्जिद सुभानल्लाह के परिसर को अपने नियंत्रण में ले लिया है। इसके साथ वहाँ स्थिति नियंत्रित करने के लिए एक व्यवस्थापक की नियुक्ति की गई है।बयान में बताया गया है कि इस परिसर में 70 शिक्षक हैं और वर्तमान में यहाँ 600 छात्र पढ़ रहे हैं। परिसर में सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखने के लिए पंजाब पुलिस तैनात है।
जैश-ए-मोहम्मद के फिदायीन ने 14 फरवरी को CRPF के काफिले पर हमला किया था। इस हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान को अलग-थलग करने के लिए कई कड़े कदम उठाए हैं। इमरान खान CRPF जवानों पर हुए इस हमले में पाकिस्तान का हाथ होने से इनकार कर चुके हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, POK में 40 गाँव खाली कराए गए और 127 गाँवों में अलर्ट जारी किया गया है।
पुलवामा में हुई आतंकी घटना के बाद प्रोपेगैंडा-परस्त मीडिया के प्रपंचों की वजह से जनता और मीडिया तंत्र का ध्यान देहरादून जैसे छोटे शहरों में कश्मीरी युवकों की मौजूदगी पर केंद्रित हो गया है। लोग सोचने लगे हैं कि देहरादून में इतने कश्मीरी छात्र कहाँ से आ गए? पहले तो ऐसा नहीं था। फिर अचानक कौन सी लहर आई? क्या है ये सारा मामला?
दरअसल एक दौर आया था वर्ष 2006 के आस-पास, जब इंजीनियरिंग और पैरामेडिकल की पढ़ाई अचानक से डिमांड में आ गई थी। उस समय देहरादून में कुकुरमुत्तों की तरह प्राइवेट कॉलेज खुले। क्वालिटी हो या नहीं, कॉलेजों में जमकर एडमिशन हुआ करते थे। सीटें फुल और कॉलेज के मालिकों की जेबें भी भरी रहा करती थीं। सब मजे में चल रहा था। फिर आया साल 2008 की मंदी का दौर। जनता को भी समझ आ गया कि भेड़-बकरियों की तरह डिग्री लेने से कोई फायदा नहीं होने वाला।
प्राइवेट कॉलेज में आई इस मंदी के दौर में इंस्टीटूट्स में एडमिशन कम होने लगे। कल तक जिन कॉलेज मालिकों की जेबें ठसा-ठस भरा करती थीं, उन्हें एक-एक सीट पर एडमिशन के लाले पड़ने लगे। शिक्षकों को सेलरी तक देने के लिए बगलें झाँकनी पड़ रही थीं।
ऐसे में किसी मास्टरमाइंड ने सुझाव दिया कि क्यों न कश्मीर के छात्रों को फ़ार्मा और इंजीनियरिंग की सीटों का प्रलोभन दिया जाए। इसमें कॉलेज वालों के कई फायदे थे। सीटें तो भरनी ही थीं। साथ ही कश्मीरी छात्रों से फीस की मशक्कत भी इन्हें नहीं करनी थी। कश्मीरी छात्रों के लिए प्रावधान है कि यदि वे कोई प्रोफेशनल कोर्स करते हैं, तो उनकी फीस में सहायता केंद्र सरकार करती है।
बस, ये आइडिया चल निकला। शिक्षकों से कहा जाने लगा कि सेलरी चाहिए तो सीटों पर एडमिशन करवाओ। ‘एजेंट्स’ श्रीनगर भेजे जाने लगे। इंजीनियरिंग और फार्मा सेक्टर में बेहतरीन जॉब के सपने बेचे जाने लगे।
जो लड़के-लड़कियाँ कश्मीर में सेना पर पत्थर फेंका करते थे, उन्हें फ्री की डिग्री लेने में भला क्या हर्ज होता। छात्र चाहे आसमानी किताब पढ़ें या एनाटॉमी पढ़ें, कॉलेज प्रशासन को उससे फर्क पड़ने वाला नहीं था।
खैर, सीटें भरने लगीं। मास्टरों को तनख्वाह भी मिलने लगी। सख्त हिदायत जाने लगी थी कि सभी को पास करना है। किसी की ‘इयर बैक’ न लगे। कॉलेज कैम्पस के बागों में बहार घुल गई। कॉलेज के आस-पास के लोगों को बढ़े हुए रेट पर किरायेदार मिलने लगे।
कीमत क्या चुकानी पड़ेगी, किसी ने भी नहीं सोचा। आज देहरादून में यही छात्र देश-विरोधी नारे लगा रहे हैं। फार्मा कंपनियों को इन ‘गुड फ़ॉर नथिंग’ एम्प्लॉईज को ‘एन्टी-नेशनल’ नोटिस भेजना पड़ रहा है। कौन जानता है कि IMA जैसे संस्थानों पर भी ये शांतिदूत नजरें रखे हुए हों और आर्मी की गतिविधियों की सूचना कहीं भेजते हों। देहरादून में ही DRDO और आयुध निर्माण फ़ैक्ट्री भी हैं, जिन्हें बेहद संवेदनशील माना जाता है।
मुझे याद है कि मेरे एक मित्र ने नवोदय विद्यालय में पंजाब से माइग्रेशन से लौटने के बाद बताया था कि किस तरह साल 2002-03 के आस-पास पंजाब के नवोदय विद्यालय में माइग्रेशन पॉलिसी के तहत आए एक कश्मीरी छात्र ने बाथरूम में विस्फोटक रख दिया था। खतरा किस कदर है, इस एक उदाहरण से ही आप गंभीरता का अंदाजा लगा सकते हैं। ऐसा भी नहीं है कि हर कश्मीरी यही करता है, लेकिन ऐसे उदहारण मिलते हैं तो आम जनता का रवैया बदल ही जाता है।
अगर देहरादून में देश विरोधी तत्वों की कोई भी हरकत होती है, तो ऐसे छात्रों को एडमिशन देने वाले कॉलेज प्रशासन की भी जवाबदेही सुनिश्चित की जानी चाहिए। साथ ही उन मकान-मालिकों पर भी गाज गिरनी चाहिए, जो बिना किसी वेरिफिकेशन के देश-विरोधी तत्वों को पनाह देते हैं।
पोस्ट को फर्जी सेकुलर मीडिया अन्यथा न ले, इसलिए कुछ बातों को स्पष्ट किया जाना अति आवश्यक है:
इस लेख का उद्देश्य यह नहीं है कि किसी भी व्यक्ति को धर्म, जाति या स्थान के आधार पर वर्गीकृत किया जाए। शिक्षा सबका अधिकार है। यहाँ सिर्फ नीयत पर सवाल उठाए हैं। सवाल उठाने के पीछे इन ‘विद्यार्थियों’ का इतिहास और दैनिक क्रियाकलाप ही जिम्मेदार भी हैं।
इस लेख में कॉलेज प्रशासन पर सवाल उठाए गए हैं। क्या उनकी नीयत शिक्षा देने की है? कॉलेज प्रशासन को सिर्फ फीस से मतलब होता है। ये पूछा जाना भी आवश्यक है कि क्या वे सही में क्वालिटी एजुकेशन दे रहे हैं।
सबसे मुख्य हिस्सा अब आता है। यदि आप शिक्षक हैं, और आपसे कहा जाए कि जो फेल भी हो रहा है, उसे किसी भी हाल में पास करो। कैसा लगेगा आपको? उन विद्यार्थियों को कैसा लगेगा जो मेहनत करते हैं और जिनके माता-पिता किसी तरह मुश्किल से फीस का जुगाड़ कर पाते हैं?
फिर से प्रश्न उठता है कि क्या देश की सुरक्षा की जिम्मेदारी सिर्फ सेना की है? जब भी आपकी या हमारी जिम्मेदारी पर सवाल उठाए जाते हैं, तब हम बगलें झाँकने लगते हैं या फिर अतार्किक प्रश्न करने लगते हैं।
यहाँ पर सिर्फ सिचुएशन की समीक्षा की गई है। लेख यह नहीं कहता है कि कॉलेज किसी खास व्यक्ति या समुदाय को एडमिशन न दे या फिर कश्मीरियों को पढ़ने का अधिकार नहीं है।
देश में सबको बराबर अधिकार हैं, लेकिन देश के खिलाफ बोलने वाले अवांछित तत्वों को बाहर किया जाना भी जरूरी है।
देश की एकता और अखंडता को हानि पहुँचाने वाले मीडिया गिरोह और सूँघकर प्रोपेगैंडा बना लेने की क्षमता रखने वाले लोग बहुत ही बड़े स्तर पर अपनी विषैली मानसिकता के प्रचार-प्रसार में जुटे हुए हैं। पुलवामा आतंकी हमले के बाद देहरादून पुलिस ने ऐसे कुछ ‘विद्यार्थियों’ की धर-पकड़ शुरू की, जो भारतीय सैनिकों के बलिदान पर उत्सव मना रहे थे।
लेकिन JNU की फ्रीलॉन्स प्रोटेस्टर शहला राशिद ने अपने मीडिया गिरोह की घातक टुकड़ियों की मदद से अपने प्रोपेगैंडा को नया रंग दे दिया। मीडिया के इस समुदाय विशेष ने देहरादून जैसे छोटे शहर की हवा में भी जहर घोलने का काम किया और इस अफ़वाह को राष्ट्रीय खबर बना कर पेश किया कि देहरादून में कश्मीरी छात्रों पर जुर्म किए जा रहे हैं। अफ़वाह फैलाने और भीड़ को उकसाने को लेकर शहला रासिद के ख़िलाफ़ FIR भी दायर की गई। लेकिन वो वामपंथी ही क्या जिसकी पूँछ सीधी हो जाए!
पूरे देश मे देहरादून की छवि एक बेहद पढ़े-लिखे संपन्न और ‘हेट्रोजिनस कल्चर’ वाले शहर की रही है। भारत देश के सबसे शानदार शैक्षणिक संस्थानो के अलावा दूसरे बेहद महत्वपूर्ण सरकारी संस्थान भी यहाँ पर मौजूद हैं। पूरे देश से पढ़ाई की खातिर लोग देहरादून जाते हैं, जिससे काफी हद तक यहाँ की अर्थव्यवस्था को भी सहारा मिलता है। देहरादून के निवासी का इन प्रोपेगैंडा-परस्त गिरोहों से सिर्फ एक निवेदन है कि वो इस शहर की बेदाग छवि को ख़राब करने की कोशिशों को रोक दें।
भारत की कूटनीतिक पहल से पाकिस्तान, चीन और सऊदी अरब तीनों की बेचैनी बढ़ने लगी है। बढ़ना लाज़मी भी है, आख़िर कब तक आतंक पर दोहरी नीति अपनाई जाती रहेगी? पुलवामा आत्मघाती हमले की जिम्मेदारी पाकिस्तान स्थित आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के लेने के बावजूद भी उसका प्रमुख मौलाना मसूद अज़हर खुलेआम पाकिस्तान में वहाँ के सुरक्षा बलों के साये में घूम रहा है। पुलवामा आतंकी हमले के बाद से ही भारत ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कूटनीतिक दबाव बनाने की शुरुआत कर दी थी और अब भारत को अपेक्षित सफलता मिलती नज़र आ रही है।
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत को बड़ी कूटनीतिक सफलता मिली है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) ने आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद का नाम लेते हुए पुलवामा आतंकी हमले की कड़ी निंदा की है। सुरक्षा परिषद ने अपने बयान में इसे एक जघन्य और कायराना हरकत करार दिया है। साथ ही, सुरक्षा परिषद ने कहा कि इस निंदनीय हमले के जो भी दोषी हैं, उन्हें दंड मिलना चाहिए। इसे पाकिस्तान के लिए तगड़ा झटका माना जा रहा है। सुरक्षा परिषद ने अपने बयान में कहा:
“इस घटना के अपराधियों, षडयंत्रकर्ताओं और उन्हें धन मुहैया कराने वालों को इस निंदनीय कृत्य के लिए जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए और उन्हें दंड मिलना चाहिए । सुरक्षा परिषद के सदस्य 14 फरवरी 2019 को जम्मू-कश्मीर में जघन्य और कायराना तरीके से हुए आत्मघाती हमले की कड़ी निंदा करते हैं जिसमें भारत के अर्धसैनिक बल के 40 जवान शहीद हो गए थे और इस हमले की जिम्मेदारी जैश-ए-मोहम्मद ने ली थी।”
ख़ास बात ये है कि संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद (UNSC) ने इस हमले की निंदा की है जिसका अनुमोदन करने वालों में चीन भी शामिल है। चीन लंबे समय से मसूद अज़हर को वैश्विक आतंकवादी घोषित करने की भारत के प्रस्ताव का विरोध करता आ रहा था। लेकिन इस बार चीन ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में इस हमले की निंदा का विरोध नहीं करते हुए इस प्रस्ताव पर सहमति जताई। सुरक्षा परिषद द्वारा पाकिस्तानी आतंकी संगठन जैश का नाम लेना भी भारत के लिए बड़ी सफलता है क्योंकि जैश के सरगना मसूद अज़हर को सुरक्षा परिषद द्वारा प्रतिबंधित कराने की भारत की कोशिशें अब तक विफल रही हैं।
इस पूरे घटना क्रम में 1267 के प्रस्ताव की काफी चर्चा रही है जिसको लेकर इन दिनों पाकिस्तान, चीन, सऊदी अरब तीनों देश असहज हैं। क्यों? क्या है चीन के इस प्रस्ताव में शामिल होने का मतलब? आइए, इस प्रस्ताव के कौन से दूरगामी परिणाम हैं, क्यों हैं असहज़ आतंक पर दोहरी नीति अपनाने वाले देश? इन सभी विन्दुओं को विस्तार से देखते हैं।
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् (फाइल फोटो )
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पाँच स्थायी सदस्य हैं जो किसी भी संयुक्त राष्ट्र प्रस्ताव को वीटो कर ख़ारिज कर सकते हैं। इनमें चीन, अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन और रूस शामिल हैं। पुलवामा हमले के निंदा प्रस्ताव को चीन वीटो कर सकता था लेकिन इससे यह पुनः संदेश जाता कि वह आतंकवाद के ख़िलाफ़ नहीं है। वह पाकिस्तानी आतंक को बढ़ावा दे रहा है। इसीलिए मजबूरन उसे इस प्रस्ताव को सहमित देनी पड़ी। पाकिस्तान भी इस बात से वाकिफ़ है कि चीन इस बार निंदा प्रस्ताव में वीटो नहीं कर पाएगा।
पाकिस्तान को यह भी पता है कि इस समय कोई भी देश उसका खुलकर साथ नहीं दे पाएगा। खुद को अलग-थलग पड़ता हुआ देख, सुरक्षा परिषद की बैठक से पहले ही पाकिस्तान ने 2008 मुंबई हमले के मास्टरमाइंड हाफिज सईद के संगठन जमात-उद-दावा और उसकी सिस्टर संस्था फलाह-ए-इंसानियत फाउंडेशन पर एक बार फिर प्रतिबंध लगा दिया था। हैरत की बात ये है कि खुलेआम जिम्मेदारी लेने के बावजूद पाकिस्तान ने जैश-ए -मुहम्मद के सरग़ना मौलाना मसूद अज़हर पर कोई कार्रवाई नहीं की। वहीं चीन जो अब तक सुरक्षा परिषद के आतंक से सम्बंधित लगभग हर प्रस्ताव का विरोध करता रहा है जिसमें सुरक्षा परिषद की 1267 प्रतिबंध सूची में मसूद अज़हर को वैश्विक आतंकवादी घोषित करना भी शामिल है। इस बार बैकफुट पर है।
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का 1267 संकल्प, 15 अक्टूबर 1999 को परिषद ने आम सहमति से अपनाया था। उस समय उस लिस्ट में तालिबान, अलकायदा और दुनिया भर में फैले आतंकवादियों और आतंकी संगठनों को प्रतिबंधित करने के लिए उन्हें सूचीबद्ध किया गया था।
इस प्रस्ताव के तहत सुरक्षा परिषद किसी आतंकवादी या आतंकी संगठन को अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी या आतंकवादी संगठन घोषित कर सकती है और उस पर व्यापक प्रतिबंध लगा सकती है। इस सूची में नाम शामिल होते ही संयुक्त राष्ट्र के सभी देश उसे आतंकवादी या आतंकी संगठन के रूप में सत्यापित मानकर कठोर रवैया अपनाते हैं। भले ही ऐसे आतंकी या आतंकवादी संगठन दुनिया में कहीं भी स्थित क्यों न हों।
1267 के तहत संयुक्त राष्ट्र का कोई भी देश किसी आंतकवादी को वैश्विक आतंकवादी की सूची में शामिल करने का निवेदन कर सकता है, जिस पर सुरक्षा परिषद के स्थाई समिति का अनुमोदन करना जरूरी है। अगर सुरक्षा परिषद का कोई एक भी स्थाई सदस्य देश इस प्रस्ताव का वीटो करता है तो वह निवेदन पारित नहीं होगा। इससे पहले चीन भारत के इस प्रस्ताव को 2016 में वीटो कर चुका है।
भारत 1267 के तहत कई आतंकियों को वैश्विक आतंकवादी घोषित करने में सफलता प्राप्त कर चुका है। जिसका पाकिस्तान विरोध भी कर चुका है। क्योंकि ज़्यादातर आतंकियों की शरण स्थली पाकिस्तान है, इससे पाकिस्तान की वैश्विक छवि आतंक को प्रश्रय देने वाले देश के रूप में और मजबूत होती जा रही है। मुंबई हमलों में भी हाफ़िज़ सईद के शामिल होने के बावजूद वह भी पाकिस्तान में खुलेआम घूमता रहा।
वहीं चीन की नीति दिखावे के लिए भारत के साथ होने के बावजूद, पाकिस्तान समर्थक की है। चीन, भारत और पाकिस्तान के बीच होने वाले लगभग हर विवाद में पाकिस्तान का साथ देता है। ऐसें में कई बार चीन ने 1267 प्रस्तावों में पाकिस्तान का साथ दिया है। चीन और पाकिस्तान का 1267 को लेकर सहज नहीं दिखाई देना उनकी नीति में साफ नज़र आता है। चीन के लिए 1267 का विरोध अब तक भारत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रोकने का एक जरिया है।
यहाँ तक की चीन खुलकर भारत की स्थायी सदस्यता का विरोध करता रहा है। इसके अलावा वह भारत के NSG (राष्ट्रीय सुरक्षा समूह) में शामिल होने पर भी खुल कर आपत्ति जताता रहा है, जबकि इस मामले में भारत को दुनिया के ज्यादातर देशों का समर्थन हासिल है।
हाल ही में पुलवामा हमले के बाद सऊदी अरब के युवराज मोहम्मद बिन सलमान ने पाकिस्तान की यात्रा की और वहाँ 20 बिलियन डॉलर का निवेश भी करने की घोषणा की। इसके अलावा दोनों देशों ने अपने संयुक्त बयान में यह कहा कि ‘संयुक्त राष्ट्र में किसी को आतंकवादी घोषित करने की प्रक्रिया का राजनीतिकरण से बचने की जरूरत है।’ इस बयान की सफाई में यह भी कहा जा रहा है कि सउदी अरब ने पाकिस्तान को खुश करने के लिए बयान दिया है। क्योंकि सऊदी अरब यमन के ख़िलाफ़ अपनी लड़ाई में पाकिस्तान का समर्थन चाहता है। हालाँकि, सऊदी अरब ने इस संयुक्त बयान में बड़ी सावधानी बरती है। उसने इस बयान में यह ध्यान रखा है कि ऐसा न लगे कि वह किसी आतंकवादी घटना के ख़िलाफ़ नहीं है।
भारत अगर इस प्रस्ताव को पारित करवाने में क़ामयाब होता है तो इससे पाकिस्तान को वैश्विक स्तर पर अलग-थलग कर, पाकिस्तान और उसकी आतंक की फैक्ट्री पर रोकथाम लगाने के लिए उठाए गए कठोर कदमों को वैश्विक समर्थन हासिल होगा।
पुलवामा हमले के बाद देश भर के लोगों के दिलों में पाकिस्तान पोषित आतंकियों के प्रति भारी आक्रोश है। क्या महानगर और क्या गाँव- हर जगह बलिदानी जवानों के लिए शोक सभाएँ आयोजित की जा रही हैं और साथ ही पाकिस्तान के ख़िलाफ़ नारे भी लगाए जा रहे हैं। इसी क्रम में छत्तीसगढ़ के एक ढाबे ने एक अनोखा ऑफर निकाला है। वहाँ जाने वाले ग्राहकों को ‘पाकिस्तान मुर्दाबाद’ बोलने पर चिकेन लेग पीस पर ₹10 की छूट दी जा रही है।
ढाबे ने दिया अनोखा ऑफर (वीडियो साभार: हिन्दुस्तान)
छत्तीसगढ़ स्थित जगदलपुर में फूड स्टॉल चलाने वाले अंजल सिंह ने ग्राहकों के लिए विशेष ऑफर रखा है। इतना ही नहीं, उन्होंने इस ऑफर की जानकारी देते हुए अपने फूड स्टॉल पर एक पोस्टर भी लगा रखा है। ‘पकिस्तान मुर्दाबाद’ लिखे इस पोस्टर को सोशल साइट्स पर काफ़ी शेयर किया जा रहा है और लोग इसके लिए अंजल सिंह की प्रशंसा कर रहे हैं। उनके ढाबे का नाम ‘झटका चिकेन तंदूर’ है।
Chhattisgarh: A food stall owner in Jagdalpur is offering a discount of ₹10 on chicken leg piece to customers who say ‘Pakistan Murdabad’. Anjal Singh, stall owner says,”Pak never valued humanity&they never will.That’s why everyone should say Pakistan Murdabad from their hearts” pic.twitter.com/ugEN8N5L5E
समाचार एजेंसी ANI से बात करते हुए अंजल सिंह ने कहा, “पाकिस्तान न तो कभी मानवता को महत्व देता है और न कभी देगा। इसलिए सभी को दिल से पाकिस्तान मुर्दाबाद के नारे लगाने चाहिए।” अंजल सिंह के अलावा ऐसे और भी लोग हैं जिन्होंने पाकिस्तान के विरोध का अलग-अलग तरीक़ा ईजाद किया है। उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरपुर में लोगों ने पाकिस्तान का बड़ा सा झंडा देहरादून जाने वाली सड़क पर बना दिया। उस झंडे पर लोगों ने चप्पल-जूते की बौछार कर दी। कुत्तों को लाकर पाकिस्तानी झंडे पर चलवाया गया।
हिंदुस्तान बोडर पे हो रहे जवान शहीद के समर्थन में 07.02.2018 को कमपनीबाग़, मुजफ्फरपुर में पाकिस्तान के विरूद इंसानियत मंच के तरफ से रैली निकाली, नारा लगाये और पाकिस्तान का झंडा जलाये। भारत के 4 के बदले, पाकिस्तान के 40 ले.. pic.twitter.com/tRMwkmjzx0
पूरे देश में इसी तरह का आक्रोश का माहौल है और लोग सरकार से इस हमले का बदला लेने की माँग कर रहे हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने भी एक रैली के दौरान कहा कि जो आग देशवासियों के दिलों में लगी है, वही आग उनके दिल में भी लगी है। उन्होंने भरोसा दिलाया कि दोषी छोड़े नहीं जाएँगे। उधर पाकिस्तान ने भी भारत द्वारा संभावित हमले की आशंका से अपने अस्पतालों को किसी आपात स्थिति में तैयार रहने के निर्देश दिए हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पाकिस्तान की ख़ूब किरकिरी हो रही है।
पुलवामा हमले के बाद भारत समेत विश्व के अधिकांश राष्ट्रों की नज़र पाकिस्तान पर लगातार बनी हुई है। भारत ने कई कड़े फैसलों के साथ अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान की घेराबंदी करनी भी शुरू कर दी है। इसी दिशा में अब फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (FATF) ने भी स्पष्ट किया है कि अगर साल 2019 के अक्टूबर तक पाकिस्तान ने आतंकवाद को फंडिंग के ख़िलाफ़ कार्रवाई नहीं की तो उसे ब्लैक लिस्ट में डाल दिया जाएगा। यह फैसला शुक्रवार (फरवरी 22, 2019) को पेरिस में 17 से 22 फरवरी तक चली बैठक के बाद लिया गया है। इस बैठक में 38 देशों के प्रतिनिधि शामिल हुए।
बता दें कि FATF की सूची में पाकिस्तान पहले से ही ग्रे लिस्ट में शामिल है और उसके पास अब अक्टूबर तक का समय है। अगर पाकिस्तान अक्टूबर तक कोई कदम उठाकर सुधार नहीं करता है तो उसे ब्लैक लिस्ट में डाल दिया जाएगा। फिलहाल उत्तर कोरिया और ईरान ब्लैक लिस्ट में शामिल हैं। पाकिस्तान को इससे बचने के लिए अभी 200 दिन का समय दिया गया है। पाकिस्तान को चेतावनी दी गई है कि आतंकी फंडिंग रोकने के एक्शन प्लान को वह मई तक पूरा कर ले, FATF जून और अक्टूबर में फिर से इसकी समीक्षा करेगा।
FATF की बैठक
अगर पाकिस्तान को ब्लैक लिस्ट कर दिया जाता है तो पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पर इसका बड़ा असर पड़ेगा। ब्लैक लिस्ट होते ही अंतर्राष्ट्रीय बैंक पाकिस्तान से बाहर चले जाएँगे और पाकिस्तान के राजस्व में जो घाटा हो रहा है वो और भी अधिक बढ़ जाएगा।
पुलवामा में हुए भयावह हमले के बाद पाकिस्तान द्वारा आतंकी गतिविधियों के लिए फंडिंग करने की बात और भी अधिक पुष्ट हुई थी। भारत द्वारा यह अपील की गई थी कि इस मामले में पाकिस्तान पर खासतौर से नज़र रखा जाए और सुनिश्चित हो कि पाकिस्तान इन आंतकियों को दी जाने वाली फंडिंग रोके।
इस माँग को उठाते समय भारत ने पुलवामा का हवाला दिया था जिसकी जिम्मेदारी स्वयं पाकिस्तान समर्थित जैश-ए-मोहम्मद संगठन ने ली। खबरें हैं कि भारत ने इस मामले में सबूत भी पेश किए कि कैसे पाकिस्तान आतंकी गतिविधियों को रोकने असफल रहा है।
FATF के बारे में आपको बता दें कि यह एक इंटर गवर्नमेंटल एजेंसी है। 1989 में इसका गठन किया गया था। 2001 में इस एजेंसी की शक्ति को बढ़ाते हुए मनी लॉन्ड्रिंग और आतंकी गतिविधियों के लिए होने वाली फंडिंग के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने के अधिकार भी दिए गए थे।