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SC का CBI पर भरोसा क़ायमः ‘शारदा चिट-फंड घोटाले’ की जाँच पर निगरानी की याचिका ख़ारिज

सुप्रीम कोर्ट ने शारदा चिट-फंड घोटाले की सीबीआई जाँच की निगरानी करने से इनकार कर दिया। मुख्य न्यायधीश रंजन गोगोई और न्यायमूर्ति संजीव खन्ना की पीठ ने मामले पर सुनावाई करते हुए यह फै़सला दिया। अपनी रकम गवाँ चुके कुछ निजी निवेशकों ने यह याचिका दायर करते हुए सुप्रीम कोर्ट से जाँच के निगरानी की माँग की थी।

पीठ ने कहा, “हम चिटफंड घोटाले की जाँच पर नज़र रखने के लिए निगरानी समिति गठित करने के इच्छुक नहीं हैं।” इससे पहले न्यायालय ने घोटाले की जाँच वर्ष 2013 में सीबीआई को हस्तांतरित कर दी थी। कोर्ट ने साफ़ कर दिया कि घोटाले में निगरानी करने की कोई आवश्यकता नहीं है।

क्या जाँच में ख़लल डालने की हुई कोशिश

ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली टीएमसी सरकार इस घोटाले की जाँच को लेकर अब तक बेचैन नज़र आई है। बीते दिनों शारदा चिट-फंड घोटाले की जाँच के लिए सीबीआई की टीम पश्चिम बंगाल के पुलिस कमिश्नर राजीव कुमार से पूछताछ करने गई थी, लेकिन तब ममता बनर्जी पुलिस कमिश्नर की सुरक्षा के लिए धरने पर बैठ गई थीं।

बता दें कि ममता जिनके लिए धरने पर बैठी थीं, उन पर शारदा चिट-फंड घोटाले के अपराधियों के ख़िलाफ़ अहम सबूत मिटाने का आरोप है। उनके धरने के दौरान विपक्ष के कई सारे नेता भी ममता के समर्थन में आ गए थे। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए पुलिस कमिश्नर को शिलांग में सीबीआई दफ़्तर में पूछताछ के लिए हाज़िर होने का आदेश दिया था।

क्या है शारदा चिट फंड घोटाला?

शारदा चिटफंड घोटाला एक बड़ा आर्थिक घोटाला है। NDTV के अनुसार यह घोटाला ₹4000 करोड़, फ़र्स्ट पोस्ट के अनुसार ₹10,000 करोड़ और अमर उजाला के अनुसार ₹40,000 करोड़ का है। मतबल कोई निश्चित आँकड़ा नहीं। निश्चित आँकड़ा इसलिए नहीं क्योंकि इस घोटाले के तार न सिर्फ़ पश्चिम बंगाल बल्कि निकटवर्ती राज्य ओडिशा, असम, झारखंड और त्रिपुरा तक से जुड़े हैं।

इस घोटाले में TMC सहित कई बड़े नेताओं, उनकी बीवियों और ऑफिसरों के नाम भी जुड़े हैं। तृणमूल सांसद कुणाल घोष और श्रीजॉय बोस, पश्चिम बंगाल के पूर्व पुलिस महानिदेशक रजत मजूमदार, पूर्व खेल और परिवहन मंत्री मदन मित्रा और पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम की पत्नी नलिनी – ये कुछ हाई प्रोफ़ाइल नाम हैं। और यह कोरी-कल्पना नहीं है। शारदा समूह के अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक सुदीप्त सेन ने 23 अप्रैल, 2013 को अपनी गिरफ़्तारी के बाद इन लोगों की संलिप्तता क़बूल की थी।

Hello… चंद्रबाबू नायडू, मोदी की बजाय स्वयं से पूछें- Who Are You?

आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री दिल्ली आए हुए हैं। वह दिल्ली प्रधानमंत्री से मिल कर अपने राज्य की समस्याएँ बताने नहीं आए हैं। न ही वे दिल्ली में आंध्र प्रदेश पर्यटन को बढ़ावा देने आए हैं। चंद्रबाबू नायडू सिर्फ़ और सिर्फ़ अपनी राजनीतिक रोटी सेंकने के लिए दिल्ली आए हैं। ममता बनर्जी द्वारा शुरू की गई मुद्दाविहीन धरने की परंपरा को नया रुख देने दिल्ली आए हैं। वह दिल्ली आए हैं, ताकि यह दिखा सकें कि विपक्षी नेताओं के जमावड़े का खेल वह भी खेल सकते हैं। उन्हें दिखाना है कि जो काम कोलकाता में ममता बनर्जी और हैदराबाद में कुमारस्वामी कर सकते हैं, वही काम वह दिल्ली में कर के दिखा सकते हैं।

ऐसा करने में वो सफल भी हुए। डॉक्टर मनमोहन सिंह, राहुल गाँधी, फ़ारुक़ अब्दुल्ला सहित कई नेता धरनास्थल पर पहुँचे और नायडू के धरने को समर्थन दिया। अरविन्द केजरीवाल और ममता बनर्जी सहित अन्य नेताओं ने भी सोशल मीडिया के माध्यम से नायडू के प्रति अपने समर्थन को प्रदर्शित किया। इस खेल में जो सबसे ज़्यादा चर्चा का विषय बनेगा- बिना भाजपा सरकार बनने की स्थिति में उसकी पीएम पद की दावेदारी उतनी ही पक्की होगी।

नायडू का पीएम से सवाल- ‘हू आर यू?’

दिल्ली के आंध्र भवन में उपवास और धरने पर बैठे नायडू ने इस दौरान समाचार चैनल एनडीटीवी (NDTV) को दिए साक्षात्कार में कहा:

“मुझे लोकेश के पिता, देवांश के दादा और भुवनेश्वरी के पति होने पर गर्व है, मैं आपसे (नरेंद्र मोदी से)पूछ रहा हूँ- आप कौन हैं?”

चंद्रबाबू नायडू ने प्रधानमंत्री के व्यक्तिगत जीवन पर कटाक्ष करते हुए सिर्फ़ राजनीतिक नैतिकता को ही ताक़ पर नहीं रखा है, बल्कि एक व्यक्ति के तौर पर अपनी हीन भावना का भी परिचय दे रहे हैं। वह अपने परिवार, राज्य और समाज को बदनाम कर रहे हैं। नायडू के दिल्ली आगमन के कारण भले ही पूरी तरह राजनीतिक हों, लेकिन उन्होंने यह बयान देते समय याद भी नहीं रखा कि वह आंध्र के मुख्यमंत्री हैं। जब वह दिल्ली आते हैं तो अपने समाज के साथ ही राज्य का भी प्रतिनिधित्व करते हैं, सिर्फ़ अपनी पार्टी का ही नहीं।

नायडू की टिप्पणी लाखों लोगों का अपमान

एक आँकड़े के मुताबिक़ भारत में 60-64 उम्र समूह के बीच आने वाली 70 लाख महिलाएँ सिंगल हैं, क्या नायडू उन से भी पूछ्ना चाहते हैं- ‘हू आर यू?’ ऐसे लाखों पुरुष भी हैं जो विधुर हैं, ऐसी लाखों महिलाएँ हैं जो अपने पति को खो चुकी हैं, ऐसे लाखों जोड़े हैं जिन्होंने स्वेच्छा से तलाक़ ले रखा है, ऐसे लाखों व्यक्ति हैं जिन्होंने जीवन में शादी ही नहीं की- क्या नायडू उन उन सभी का चरित्र प्रमाण पत्र देखना चाहते हैं? क्या स्वेच्छा से अलग रहने वाले जोड़े किसी के नहीं होते? क्या समाज उनका और वो समाज के नहीं होते? क्या अब इन्हे अपने व्यक्तिगत च्वॉइस सम्बन्धी निर्णय लेने के लिए भी नायडू की अनुमति लेनी होगी?

नायडू अगर पीएम मोदी से यह पूछते कि आप प्रधानमंत्री आवास में क्यों रहते हैं, तो चल जाता। अगर नायडू यह भी पूछते कि आपने फलां रैली में फलां बयान क्यों दिया, यह भी चल जाता। लेकिन, चंद्रबाबू ने अंध-विरोध की पराकाष्ठा को पार करते हुए उन लाखों लोगों का अपमान किया है जो स्वेच्छा से अपना जीवन जीते हैं। नायडू ने ऐसे लोगों की व्यक्तिगत च्वॉइस को निशाना बना कर एक ख़ुद को झूठी नैतिकता का झंडाबरदार बताने की कोशिश की है।

पत्नी, बेटा और पोते का नाम लेकर कोई महान नहीं बनता

चंद्रबाबू नायडू ने अपनी पत्नी, बेटे और पोते का नाम लेकर मोदी पर निशाना साधा। नायडू के अनुसार, जिनकी पत्नी, बेटे और पोते नहीं हैं- उनकी कोई पहचान नहीं है। अगर परिवार से ही किसी की पहचान होती है तो भी मोदी अकेले नहीं हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी पत्नी भले ही स्वेच्छा से अलग-अलग रहते हों, लेकिन मोदी के पास माँ है, उनके चार भाई हैं, एक बहन है। मोदी अपने भाषणों में हमेशा से कहते आए हैं कि सवा सौ करोड़ देशवासी ही उनका परिवार है।

चंद्रबाबू नायडू को शायद यह याद नहीं कि दुनिया में हर एक व्यक्ति जो आज अस्तित्व में है, भले ही उनकी पत्नी और बच्चे न हों- लेकिन हर कोई अपनी माँ के कोख से ही जन्म लेता है, वो किसी न किसी का पुत्र हो सकता है, किसी की पुत्री हो सकती है। पत्नी और बच्चे होना किसी की पहचान का प्रमाण नहीं है। किसी की पहचान उसके आचरण, व्यवहार और लोकप्रियता से बनती है, सिर्फ़ बीवी-बच्चों होना ही पहचान का प्रमाण नहीं होता।

चंद्रबाबू नायडू जी, सहवास तो कुत्ते-बिल्ली भी करते हैं, कीड़े-मकोड़े भी करते हैं। बच्चे तो इंसान छोड़िए, पशु-पक्षी के भी होते हैं। नायडू को समझना चाहिए कि अपने बीवी-बच्चों के नाम का बखान कर और किसी के व्यक्तिगत जीवन पर भद्दी टिप्पणी कर वह अपनी पहचान साबित नहीं कर सकते। अगर ऐसा है तो 10 बच्चे और 5 बीवियों वाले पकिस्तान के मौलवी साहब भी नायडू से पूछ सकते हैं- ‘हू आर यू?

₹1850 में दिल्ली से वाराणसी: 15 फरवरी से ‘वन्दे भारत एक्सप्रेस’ आपकी सेवा में

भारत की पहली नई दिल्ली से वाराणसी के बीच सेमी हाई स्पीड ट्रेन “वन्दे भारत एक्सप्रेस” लॉन्चिंग के लिए तैयार है। इस ट्रेन की आने जाने की दरों में मामूली अंतर है। दिल्ली से वाराणसी तक की सेमी हाई स्पीड ट्रेन “वन्दे भारत एक्सप्रेस” के एयर कंडीशन चेयरकार की टिकेट 1850 रुपए और एग्जीक्यूटिव क्लास की टिकेट 3520 रुपए रिर्धारित की गई है, जिसमें कैटरिंग चार्ज भी शामिल है।

वापसी में वाराणसी से दिल्ली आते वक़्त चेयर कार की दर 1795 रुपए और एग्जीक्यूटिव क्लास का टिकेट 3470 रुपए तय की गई है। सेमी हाई स्पीड ट्रेन का किराया शताब्दी से थोड़ा ही ज़्यादा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 15 फ़रवरी को इस ट्रेन को हरी झंडी दिखाएँगे।

चेयरकार और एग्जीक्यूटिव क्लास में सुबह का चाय, नाश्ता और लंच की दर दोनों श्रेणियों के लिए अलग-अलग है। दिल्ली से वाराणसी की यात्रा में एग्जीक्यूटिव क्लास के लिए यह 399 रुपए है जबकि चेयर कार के लिए यह 344 रुपए। वाराणसी से नई दिल्ली की यात्रा में यह दर घट कर 349 रुपए और 288 रुपए ही है। कम दूरी की यात्रा जैसे नई दिल्ली से कानपुर और प्रयागराज तक के लिए यह दर क्रमशः 155 रुपए और 122 रुपए है। उपरोक्त सभी दरें किराए में शामिल हैं।

ज्ञात हो कि वन्दे भारत एक्सप्रेस के निर्माण में करीब सौ करोड़ रुपये खर्च हुए हैं और इसे महज डेढ़ साल में ही तैयार कर लिया गया है। पिछले दिनों दिल्ली-प्रयागराज रूट पर इसका ट्रायल रन सफल रहा। याद हो कि इसी महीने इसका दिल्ली-आगरा रूट पर भी ट्रायल रन किया गया था जिस दौरान कुछ असामाजिक तत्वों ने पत्थर फेंक कर इसे नुकसान पहुँचाया था और खिड़कियाँ तोड़ दी थी।

ट्रेन 18 अर्थात वन्दे भारत एक्सप्रेस एक लक्ज़री ट्रेन है जिसमे यात्रा के दौरान वाई-फाई, जीपीएस आधारित यात्री सूचना प्रणाली, स्पर्श मुक्त जैव शौचालय, एलईडी लाइट, मोबाइल चार्जिंग प्‍वाइंट और उपस्थित यात्रियों तथा मौसम के अनुसार तापमान को कम ज्यादा करने में सक्षम मौसम नियंत्रण प्रणाली जैसी सुविधाएँ उपलब्ध रहेंगी। इस ट्रेन के बीच में दो एक्जिक्यूटिव कंपार्टमेंट भी होंगे, प्रत्येक में 52 सीट होंगी, वहीं सामान्य कोच में 78 सीटें होंगी। पहले इस ट्रेन का नाम ट्रेन 18 रखा गया था क्योंकि इसे रेलवे ने 2018 में लॉन्च किया था। अब इसे वन्दे भारत एक्सप्रेस नाम दिया गया है।

जज़्बे को सलाम: जवानों ने -7 डिग्री तापमान में गर्भवती महिला को कराया भर्ती, जुड़वाँ बच्चियों को दिया जन्म

जम्मू-कश्मीर में सेना के जवानों की मानवता और उनके द्वारा पेश की गई बहादुरी की मिसाल ने सबका दिल जीत लिया है। दरअसल प्रदेश में भारी बर्फ़बारी के कारण जन-जीवन अस्त-व्यस्त हो गया है, जिससे गाड़ियों का आवागमन भी प्रभावित है।

इसी बीच बीते 8 फ़रवरी को बांदीपुर में थलसेना की पनार शिविर के कंपनी कमांडर को एक ग्रामीण ने फोन करते हुए सेना से अपनी गर्भवती पत्नी गुलशाना बेग़म को अस्पताल पहुँचाने की मदद माँगी थी। जिसके बाद सेना के जवानों ने सही समय पर महिला की मदद करते हुए उसे उत्तर कश्मीर के बांदीपुर ज़िला अस्पताल में भर्ती कराया।

-7 डिग्री तापमान में जवानों ने की महिला की मदद

ख़बर की मानें तो भारी बर्फ़बारी होने के कारण मौसम काफ़ी ख़राब था और तापमान शून्य से सात डिग्री सेल्सियस कम। बर्फ़बारी के कारण सड़कें बर्फ़ से पूरी तरह ढक गई थी। इससे गाड़ियों की आवाजाही नहीं हो पा रही थी।

ऐसे में राष्ट्रीय राइफ़ल्स के जवानों ने भारी बर्फ़बारी और सड़कों पर मुश्किल हालात का सामना करते हुए गर्भवती महिला को ढाई किलोमीटर तक स्ट्रेचर पर ले जाकर अस्पताल में भर्ती कराया। हालात गंभीर होते हुए भी कमर तक पहुँची बर्फ़ को पार करते हुए वे आगे बढ़ते रहे।

अस्पताल में भर्ती कराने के बाद पता चला कि महिला को ऑपरेशन की सख़्त ज़रूरत थी। ऐसे में उन्हें समय पर अस्पताल लाना आवश्यकता था। जवानों का अथक प्रयास सफल हुआ और महिला ने जुड़वाँ बच्चियों को जन्म दिया।

जमानत पर चल रहे रॉबर्ट वाड्रा का पत्नी प्रियंका के नाम ‘अश्रुपूरित’ पोस्ट

कॉन्ग्रेस के पूर्वी उत्तर प्रदेश मामलों की प्रभारी महासचिव नियुक्त की गई रॉबर्ट वाड्रा की पत्नी प्रियंका गाँधी वाड्रा ने आज लखनऊ में पहला रोड शो किया। इसी बीच जमानत पर चल रहे उनके पति रॉबर्ट वाड्रा ने उनके नाम एक बेहद भावुक फेसबुक पोस्ट लिख कर उन्हें शुभकामनाएँ दी हैं।

रॉबर्ट द्वारा फेसबुक पर किए गए इस पोस्ट में उन्होंने अपनी पत्नी प्रियंका गाँधी वाड्रा को अपनी सबसे अच्छी दोस्त और परफेक्ट पत्नी बताया है। फेसबुक पोस्ट पर उन्होंने लिखा, “भारत के लोगों की सेवा और यूपी में कार्य करने की नई यात्रा के लिए ‘P’ तुम्हें मेरी शुभकामनाएँ। तुम मेरी सबसे अच्छी दोस्त, परफेक्ट पत्नी और हमारे बच्चों के लिए सबसे बेहतरीन माँ हो। देश के राजनैतिक माहौल की स्थिति अच्छी नहीं है। लेकिन, मैं जानता हूँ देश की सेवा करना उनका (प्रियंका) कर्तव्य है। अब हमने उन्हें देश के लोगों को सौंप दिया है, प्लीज़ उन्हें सुरक्षित रखना।”

रॉबर्ट वाड्रा ने अपने इस पोस्ट में प्रियंका गाँधी वाड्रा को ‘P’ कहकर संबोधित किया है। इससे पहले भी जब प्रियंका गाँधी वाड्रा ने राजनीति में कदम रखा था, तब रॉबर्ट वाड्रा ने उन्हें ‘P’ कहकर ही शुभकामनाएँ दी थी।

बता दें कि प्रियंका गाँधी वाड्रा को लोकसभा चुनाव में पूर्वी उत्तर प्रदेश की कमान सौंपी गई है। प्रियंका के जिम्मे राज्य की 80 में से 42 सीटें हैं। कॉन्ग्रेस की महासचिव होने के नाते उनके पास काफ़ी बड़ी चुनौती है क्योंकि पूर्वी यूपी में भाजपा के कई बड़े नेताओं के निर्वाचन क्षेत्र भी आते हैं। इसमें यूपी सीएम योगी आदित्यनाथ और पीएम मोदी का क्षेत्र भी शामिल है।

अब यह देखना दिलचस्प होगा कि रॉबर्ट वाड्रा द्वारा मिली शुभकामनाओं के साथ प्रियंका गाँधी वाड्रा अपने लक्ष्य के कितने निकट पहुँच पाती हैं। पिछले चुनावों में कॉन्ग्रेस पूरे देश में केवल 44 सीटों पर ही सिमट गई थी। उत्तर प्रदेश की बात करें तो मोदी लहर के कहर में कॉन्ग्रेस वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में सिर्फ़ अपनी परंपरागत सीटें यानी अमेठी और रायबरेली ही बचा सकी थी।

ट्विटर के भूत बातों से नहीं मानते, संसदीय समिति ने कहा ‘जाओ अपने मालिक को लेकर आओ’

ट्विटर इंडिया के प्रतिनिधियों सहित ट्विटर टीम आज इन्फर्मेशन टेक्नॉलजी के मुद्दे पर संसदीय समिति के समक्ष पेश होने के लिए संसद पहुंची। इससे पहले शॉर्ट नोटिस का हवाला देते हुए ट्विटर ने संसदीय समिति के समक्ष पेश होने से मना कर दिया था।

रिपोर्ट्स के अनुसार इन्फर्मेशन टेक्नॉलजी के मुद्दे पर संसदीय समिति ने सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित किया है कि वे ट्विटर के किसी भी अधिकारी से तब तक नहीं मिलेंगे जब तक कि समिति के समक्ष कोई वरिष्ठ सदस्य या ट्विटर ग्लोबल टीम के सीईओ पेश न हों। इसके लिए ट्विटर को 15 दिन की डेडलाइन दी गई है। 

ट्विटर के सीईओ जैक दोरजी ने संसद की समिति के सामने पेश होने से इनकार कर दिया था। खबरों के मुताबिक, बीजेपी सांसद अनुराग ठाकुर की अध्यक्षता वाली सूचना-प्रौद्योगिकी से जुड़ी संसदीय समिति ने 1 फरवरी को ट्विटर सीईओ के लिए समन जारी किया था। समन में उनसे अगली बैठक में पेश होने को कहा गया था। बता दें कि सोशल मीडिया पर भारतीय नागरिकों के अधिकारों की सुरक्षा के मसले पर जवाब-तलब के लिए उन्हें बुलाया गया था।

मेरे प्यारे PRIME MINISTER: खुले में शौच पर रोकथाम, स्वच्छता अभियान की मुहीम को आगे बढ़ाएगी यह फ़िल्म

सामाजिक मुद्दों पर पिछले कई वर्षों से एक से बढ़कर एक फ़िल्में रिलीज़ हो रही हैं। इसी कड़ी में डायरेक्टर राकेश ओमप्रकाश मेहरा की खुले में शौच, स्वच्छता जैसे विषयों को छूती फ़िल्म ‘मेरे प्यारे प्राइम मिनिस्टर’ का ट्रेलर रिलीज़ हो गया है। इस ट्रेलर को देखकर फ़िल्म की कहानी दिल को छू जाने वाली लग रही है।

फ़िल्म ‘मेरे प्यारे प्राइम मिनिस्टर’ की कहानी शौचालय की समस्या को एक अलग नज़रिए से समझाती नज़र आ रही है। दो दिन पहले रिलीज़ पोस्टर में एक छोटा सा लड़का अपनी माँ के साथ खड़ा है और दीवार पर लिखा है, “Meri Arzi Sunlo Zara”। और अब ट्रेलर देखकर लग रहा है कि फ़िल्म की कहानी इस 8 साल के बच्चे की अर्ज़ी की कहानी है जो अपनी माँ के लिए टॉयलेट बनवाना चाहता है।

फ़िल्म के ट्रेलर को देखकर ऐसा लग रहा है कि खुले में शौच, बलात्कार, यौन उत्पीड़न और ग़रीबी जैसे कई मुद्दों को इसमें भावनात्‍मक तरीके से उठाया गया है। इसके अलावा बाल मनोविज्ञान और भेदभाव जैसे सामाजिक मुद्दों को भी पूरी संवेदनशीलता और संजीदगी से उठाया गया है।

मेरे प्यारे प्राइम मिनिस्टर ट्रेलर

ट्रेलर की शुरुआत दिल्ली के राजपथ पर राष्ट्रपति भवन से होती है, जहाँ कुछ बच्चे प्रधानमंत्री से मिलने के लिए पहुँचे हैं। उन बच्चों में से कन्हैया गार्ड से पूछता है कि क्या पीएम यहीं रहते हैं? संजीदगी के साथ हँसी-मज़ाक के पलों को भी समेटती फ़िल्म के ट्रेलर में अरिजीत सिंह की आवाज़ में टाइटल ट्रैक चलता रहता है।

ट्रेलर देखकर अभी इतनी कहानी समझ आ रही है कि 8 साल का एक लड़का कन्हैया अपनी माँ के साथ मुंबई की स्लम एरिया में रहता है। माहौल वैसा ही है जैसा आमतौर पर स्लम में होता है लेकिन उनकी ज़िदगी में बड़ा बदलाव तब आता है। जब खुले में शौच के लिए जाने पर उसकी माँ के साथ रेप हो जाता है। शौचालय की समस्या को दूर करने के लिए कन्हैया प्रधानमंत्री के नाम लिखी चिट्ठी जिसमें व्यथा का जिक्र करते हुए शौचालय बनवाने की अपील होती है।

सरगम अपने बेटे कनु से ये वादा करवाती है कि ‘बोल लाइफ में कभी गंदे काम नहीं करेगा” प्राइम मिनिस्टर को लिखे ख़त में कनु का एक मासूस सवाल है “आप तो देश के प्रधानमंत्री हैं अगर आपकी माँ के साथ ऐसा होता तो आपको कैसा लगता?” जो शौचालय न होने से महिलाओं को किन ख़तरों से गुजरना होता है, उस पर सोचने को विवश कर देता है।

ट्रेलर में एक जगह एक तंज भी है जब कन्हैया नोट को ध्यान से अपने दोस्तों को दिखाते हुए कहता है “माँगने से कुछ नहीं होता, करने से होता है और वह सिर्फ़ एक ही आदमी कर सकता है- गाँधी जी।

इस फ़िल्म में मुख्य भूमिकाओं में नेशनल अवॉर्ड विनिंग ऐक्ट्रेस अंजलि पाटिल, मकरंद देशपांडे, रसिका अगाशे, सोनिया अलबिजूरी और नचिकेत पूर्णपत्रे हैं। फिल्म 15 मार्च 2019 को रिलीज़ होगी। फ़िल्म  में अंजलि पाटिल ने कन्हैया की माँ सरगम का रोल निभाया है। अतुल कुलकर्णी फ़िल्म में एक सरकारी अधिकारी के रोल में है। फ़िल्म का म्यूज़िक शंकर, एहसान और लॉय ने दिया है।

इससे पहले राकेश ओमप्रकाश मेहरा की आख़िरी फ़िल्म ‘मिर्जिया’ थी, जो साल 2016 में आई थी। मेहरा को ‘रंग दे बसंती’ और ‘भाग मिल्खा भाग’ जैसी फ़िल्मों के लिए जाना जाता है।

इस फ़िल्म का आईडिया भी राकेश को ‘भाग मिल्खा भाग’ की शूटिंग से लौटते हुए एक स्लम एरिया से गुज़रते हुए आया, जहाँ रास्ते के किनारे खुले में शौच करने को मज़बूर महिलाएँ गाड़ी की लाइट देखते ही खड़ी हो जाती हैं।

इससे पहले ‘टॉयलेट एक प्रेम कथा’ जैसी फ़िल्म भी खुले में शौच जैसे मुद्दे को गंभीरता से उठा चुकी है। उम्मीद है ‘मेरे प्यारे प्राइम मिनिस्टर’ फ़िल्म भी शौचालय और स्वच्छता जैसी मूलभूत ज़रूरतों के प्रति लोगों का ध्यान आकर्षित करेगी।

प्रियंका गाँधी रोड-शो के राजनीतिक मायने: राहुल के लिए ख़तरा, सिंधिया बनेंगे बलि का बकरा

प्रियंका गाँधी ने आज सोमवार (फरवरी 11, 2019) को उत्तर प्रदेश में पदार्पण के साथ ही अपनी आधिकारिक राजनीतिक सक्रियता का आग़ाज़ कर दिया। अध्यक्ष राहुल गाँधी, उनकी बहन प्रियंका गाँधी और मध्य प्रदेश के उप मुख्यमंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया- पार्टी के तीनो बड़े नेताओं ने उत्तर प्रदेश में कार्यकर्ताओं में जोश भरा। हालाँकि, इस रैली से कार्यकर्ताओं में नई ऊर्जा का संचार हुआ, इस से इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन अगर कार्यकर्ताओं के मूड विश्लेषण किया जाए तो राहुल गाँधी के पक्ष में कुछ पॉजिटिव निकलता नज़र नहीं आ रहा। हाँ, उनके लिए बुरी ख़बर ज़रूर है।

प्रियंका गाँधी की इस रैली के साथ ही पार्टी, कार्यकर्ताओं व नेताओं की रणनीति काफ़ी हद तक साफ़ होती नज़र आ रही है। आइए एक-एक कर कॉन्ग्रेस के नए आग़ाज़ के हर एक पहलू का विश्लेषण कर यह समझने की कोशिश करते हैं कि यूपी के इस शक्ति प्रदर्शन के पीछे क्या रणनीति है और से पार्टी को इस से क्या नफ़ा-नुक़सान होने की उम्मीद है। प्रियंका गाँधी के सक्रिय राजनीति में आने के पीछे के 6 प्रमुख कारणों को हम पहले ही गिना चुके हैं।

कार्यकर्ताओं के नारों से राहुल गायब

ढोल-नगाड़ों के साथ कार्यकर्ताओं ने प्रियंका गाँधी के स्वागत में कोई कमी नहीं की। उत्साहित कॉन्ग्रेसीयों ने पार्टी के नए चेहरे को सिर-आँखों पर बिठाया लेकिन राहुल गाँधी के लिए उनके मन में कोई ख़ास उत्साह नहीं दिखा। कम से कम उनके द्वारा लगाए जा रहे नारों को देख कर तो यही कहा जा सकता है। कार्यकर्ताओं ने उनके जयकारे लगाने से लेकर उन्हें ‘बदलाव की आँधी’ तक करार दिया लेकिन राहुल गाँधी को लेकर ऐसे कोई ख़ास नारे नहीं लगे। हाँ, राफ़ेल ज़रूर छाया रहा।

रैली के दौरान कार्यकर्ताओं ने ‘प्रियंका गाँधी- देश की दूसरी इंदिरा गाँधी’ और ‘देश के सम्मान में- प्रियंका जी मैदान में’ जैसे अनेक नारे लगाए। इसे देख कर कहा जा सकता है कि कार्यकर्ताओं के उत्साहवर्द्धन में सफल हुई प्रियंका को ही कॉन्ग्रेसीयों ने अपना नया नेता मान लिया है, राहुल गाँधी अध्यक्ष होने के बावजूद अब उनके लिए दूसरे स्थान पर आ गए हैं। पार्टी में प्रियंका का क़द इस कदर बढ़ना राहुल गाँधी के लिए बैकफायर करता नज़र आ रहा है। प्रियंका का आधिकारिक एलिवेशन राहुल का अप्रत्यक्ष डिमोशन बनता दिख रहा है।

पोस्टरों में प्रियंका की प्रमुख उपस्थिति, राहुल पीछे छूटे

कॉन्ग्रेस तिकड़ी की रोड-शो में एक और प्रमुख बात जिसने हमारा ध्यान खींचा, वो है पोस्टरों में प्रियंका गाँधी को राहुल से ज्यादा तवज्जोह दिया जाना। यहाँ तक कि रैली की बसों में लगे अधिकतर पोस्टर भी प्रियंका के ही गुणगान करते दिखे और राहुल को उनकी बहन से कम स्पेस मिला।

पोस्टरों में प्रियंका की राहुल के मुक़ाबले मज़बूत उपस्थिति

नीचे इस पोस्टर में आप देख सकते हैं कि कैसे प्रियंका गाँधी को एकदम बीचो-बीच रखा गया है और साथ ही बाईं तरफ उनको पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के बैकग्राउंड के साथ अलग से जगह दी गई है। जबकि, राहुल, सिंधिया और बब्बर को उनके दोनों तरफ रखा गया है। ये प्रदेश के नेताओं का मूड बताता है। प्रदेश कॉन्ग्रेस यह जान गई है कि अगर वोट बटोरने हैं तो प्रियंका और इंदिरा के बीच समानता दर्शानी होगी और इसके लिए प्रियंका को ही केंद्र में रखना होगा।

केंद्र में प्रियंका, बाईं तरफ इंदिरा-प्रियंका

इसी तरह जिस बस पर प्रियंका सवार थी (और अन्य कई बसों पर भी, जिसमे सवार होकर कार्यकर्ता रोड शो में हिस्सा लेने पहुँचे), उस पर भी प्रियंका गाँधी को केंद्र में रख कर उनका बड़ा सा चित्र लगाया गया, जबकि राहुल को तो कई पोस्टरों में तो जगह तक नहीं मिली। इन पोस्टरों को लोकल नेताओं और प्रदेश कॉन्ग्रेस ने छपवाया था।

कई पोस्टरों से पार्टी अध्यक्ष राहुल ही गायब

कुल मिला कर देखा जाए तो आपको इस रोड-शो ऐसे पोस्टर्स तो दिखेंगे जिस से राहुल गायब हों, लेकिन ऐसे पोस्टर्स शायद ही दिखें जिसमे प्रियंका न हो। प्रदेश कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं का मूड शायद राहुल गाँधी के लिए अच्छा न हो। इस शक्ति-प्रदर्शन से प्रियंका की इमेज तो बन रही है- राहुल का पता नहीं। तो क्या अब कॉन्ग्रेस ने यह मान लिया है कि कम से कम उत्तर प्रदेश में उनका चेहरा राहुल नहीं, बल्कि सिर्फ़ प्रियंका हैं।

सिंधिया को यूपी में व्यस्त रखना कॉन्ग्रेस की मजबूरी?

इस रैली में ज्योतिरादित्य सिंधिया की उपस्थिति ने कइयों का ध्यान खींचा और कई लोगों को तो ये तक समझ नहीं आया कि उत्तर प्रदेश में जरा सा भी जनाधार न रखने वाले सिंधिया को पश्चिमी यूपी की कमान कैसे दे दी गई। ना तो वहाँ के कार्यकर्ताओं में उनकी पैठ है और न ही वहाँ कार्य करने का उनका कोई पुराना अनुभव। ऐसे में, विश्लेषकों का मानना है कि मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री कमलनाथ को पूर्ण स्वतन्त्रता देने और निर्बाध कार्य करने के लिए ऐसा किया गया है। माना जा रहा है कि एमपी में कमलनाथ के साथ-साथ दिग्विजय भी परदे के पीछे से सक्रिय हैं और सिंधिया की उपस्थिति इन दोनों के लिए सिरदर्द साबित हो रही थी।

जब यह सन्देश देने की ज़रूरत पड़ी थी की मध्य प्रदेश कॉन्ग्रेस में सब ठीक-ठाक है

मध्य प्रदेश में सीएम को लेकर कितनी माथापच्ची हुई थी, वो सबने देखी थी। राहुल को कमलनाथ और सिंधिया के साथ फ़ोटो शेयर कर यह सन्देश तक देने की ज़रूरत पड़ गई कि एमपी में सबकुछ ठीक-ठाक चल रहा है। एक कारण यह भी हो सकता है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पूरी तरह से डूबी हुई कॉन्ग्रेस की अगर हार होती है तो सिंधिया को बलि का बकरा बनाया जा सकता है। सिंधिया द्वारा उप-मुख्यमंत्री के पद को पहले ठुकराने और फिर स्वीकार करने को उनके बढ़ते क़द से जोड़ कर देखा जा रहा है। यह भी हो सकता है कि वंशवाद की परंपरा को क़ायम रखने के लिए उनका क़द छोटा करने के प्रयास किए जा रहें हों।

सिब्बल की अधिकारियों को धमकी: मोदी से नज़दीकी न रखें, जेटली का मजे़दार जवाब

पूर्व केंद्रीय मंत्री और वरिष्ठ कॉन्ग्रेस नेता कपिल सिब्बल ने सरकारी अधिकारियों को धमकी भरे लहज़े में चेतावनी देते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से ज़्यादा नज़दीकी न रखने की सलाह दी है। इतना ही नहीं, सिब्बल ने नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) राजीव महर्षि की भी जम कर आलोचना की। उन्होंने भविष्यवाणी करते हुए कहा कि महर्षि राजग सरकार को बचाने की पूरी कोशिश करेंगे। सिब्बल ने कहा कि पीएम मोदी से नज़दीकी रखने वाले सभी अधिकारियों पर उनकी पैनी नज़र है।

सिब्बल ने राजीव महर्षि पर राफ़ेल सौदे के मामले में ‘हितों के टकराव’ का आरोप मढ़ा। रविवार को कॉन्ग्रेस ने महर्षि को राफ़ेल लड़ाकू विमानों की ख़रीद के करार की ऑडिट प्रक्रिया से अलग रखने की माँग भी की। सिब्बल का कहना था कि महर्षि को इस मामले से इसीलिए अलग किया जाना चाहिए क्योंकि वह राफ़ेल सौदे के वक़्त केंद्रीय वित्त सचिव थे। सिब्बल ने अधिकारियों को धमकाया कि पीएम मोदी के प्रति ज़्यादा वफ़ादारी न दिखाएँ।

कॉन्ग्रेस नेता और वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा:

“CAG राजीव महर्षि अपनी रिपोर्ट में राजग सरकार को बचाने वाले हैं। पूरी राफ़ेल डील राजीव महर्षि की निग़रानी में ही हुई थी, क्योंकि उस समय वही वित्त सचिव थे। जब डील के लिए बातचीत शुरू हुई थी तो वित्त मंत्रालय भी उसका हिस्सा था। राजीव महर्षि ख़ुद अपने ख़िलाफ़ कार्रवाई कैसे कर सकते हैं, यह हितों का टकराव होगा। चूँकि तत्कालीन वित्त सचिव के तौर पर वह इस वार्ता का हिस्सा थे इसलिए उन्हें ऑडिट प्रक्रिया से ख़ुद को अलग कर लेना चाहिए। महर्षि द्वारा संसद में राफ़ेल पर रिपोर्ट पेश करना अनुचित होगा।”

केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कपिल सिब्बल के बयान को लेकर कॉन्ग्रेस पार्टी पर निशाना साधा। जेटली ने ट्विटर पर आश्चर्य व्यक्त करते हुए लिखा कि सरकार में दस साल रहने के बाद यूपीए के पूर्व मंत्रियों को अभी भी पता नहीं है कि वित्त सचिव केवल वित्त मंत्रालय में वरिष्ठतम सचिव को दिया गया ओहदा है।

सिलसिलेवार ट्वीट्स करते हुए जेटली ने लिखा:

“झूठ के आधार पर कॉन्ग्रेस द्वारा एक और संविधान संस्था CAG पर हमला किया जा रहा है। रक्षा मंत्रालय की फ़ाइलों को सचिव (व्यय) द्वारा निपटाया जाता है। रक्षा मंत्रालय की व्यय फ़ाइलों में सचिव (आर्थिक मामलों) की कोई भूमिका नहीं है।”

जेम्स बॉन्ड भी जुड़ेंगे ‘प्रियंका सेना’ से, अत्याधुनिक पिंक गैजेट्स से ‘लैस’ है यह सचल दस्ता

24 घंटे पति के साथ खड़ी रहने वाली रॉबर्ट वाड्रा की पत्नी प्रियंका वाड्रा आज से मिशन उत्तर प्रदेश पर हैं। मीडिया गिरोहों में फ़िल्म सिटी नोएडा से लेकर ग्रेटर कैलाश तक ख़ुशी की लहर देखी जा सकती है। ख़ुद कॉन्ग्रेस ने नहीं सोचा था कि चिरयुवा राहुल गाँधी की नेतृत्व क्षमता को नकारने से सारा कॉन्ग्रेस दल इस तरह जश्न मनाएगा।

आत्मबोध ऐसा शब्द है जो किसी भी उम्र, वर्ग और राजनीतिक दल में स्वीकार्य और ‘हाइली डिज़ायरेबल’ चीज है। लेकिन ऐसा तो नहीं हो सकता है कि देश की सबसे पुरानी पार्टी, जो अनुभव की धनी है, उसे अपने नेतृत्व को लेकर आत्मबोध न रहा हो। यानी स्पष्ट है कि कॉन्ग्रेस का मुख्य मर्म आत्मबोध नहीं बल्कि निर्णय ले पाने की असमर्थता है।

तो अब कॉन्ग्रेस निर्णय ले पाने की इस असमर्थता से पार पा चुकी है। राहुल गाँधी को बैकफुट पर डाल कर अब उसने जो सबसे ऐतिहासिक निर्णय लिया है वो है ‘प्रियंका सेना’ के गठन का।

अत्याधुनिक गैजेट्स और उपकरणों से ‘लैस’ है प्रियंका सेना

ऐसे में, जब कि फ़रवरी का महीना चल रहा है और हर ओर बागों में बहार ही बहार है, पिंक लिबास में रंगी इस सेना का अवतरण युवाओं में जोश भर देना वाला निर्णय साबित हो सकता है। जहाँ अब तक फ़रवरी के महीने युवा सिर्फ़ ‘बजरंग सेना’ और ‘हिन्दू राष्ट्र सेना’ जैसे कट्टर दलों के नाम ही सुनते आए थे, ऐसे में उनके सामने अब एक प्रियंका सेना का ‘क्यूट ऑप्शन’ भी आ गया है। उम्मीदें लगाई जा रही हैं कि जिस तरह की अत्याधुनिक सुविधाओं से ‘लैस’ यह प्रियंका सेना है, इसमें जेम्स बॉन्ड और IMF टीम भी अप्प्लाई करने वाली है।    

पिंक मेट्रो के बाद पिंक सेना

युवाओं के मन में उमड़-घुमड़कर सवाल फूट रहे हैं। जैसे, क्या अब इस पिंक रंग के चलते रणवीर सिंह भी प्रियंका सेना में शामिल होंगे? क्या हर दूसरे दिन नाराज़ गर्लफ्रेंड को मनाने के लिए ‘पिंक पिलो’ और ‘पिंक टेड्डी बिअर’ ख़रीदने के लिए पिंक लाइन मेट्रो से सरोजिनी नगर का सफर करने वाले युवाओं को यह सेना अपनी भर्ती प्रक्रिया में आरक्षण देगी?

‘जनेऊ’ के बाद ‘सेना’ भी कहीं कॉन्ग्रेस का मास्टरस्ट्रोक तो नहीं?

कॉन्ग्रेस पिछले चार साल में जितनी ‘हिंदूवादी पार्टी’ बनकर उभरी है, उतना अन्य कोई दल आज़ादी के इतने सालों में नहीं हो सका है। अध्यक्ष श्री राहुल गाँधी गले में जनेऊ पहनकर घूम रहे हैं, मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री कमल नाथ भी कट्टर नव-गौ-भक्त बनकर उभर रहे हैं। इसी तरह से चुनावी मौसम में ‘सेनाओं’ के योगदान को देखते हुए अब कॉन्ग्रेस भी मैदान में उतर रही है, जिसका पहला सचल दस्ता आज सबके सामने आ चुका है।

सही खेल रहे हैं आप, कम्प्यूटर जी लॉक कर दीजिए

चौंकाने वाली बात यह है कि ‘सेना’, ‘दल’ और गौ-भक्त’ अब तक सिर्फ़ दक्षिणपंथियों के ही विशेषण हुआ करते थे, लेकिन अगर अब कॉन्ग्रेस भी ‘सेना’ और ‘दल’ के मुद्दों पर मोर्चा संभालने लगे तो स्टारबक्स में बैठकर, की-बोर्ड पटककर ‘गौ-भक्तों’ की जानकारी सार्वजनिक कर रहा आदर्श-लिबरल नामक क्रान्तिजीव तो सड़क पर ही आ जाएगा। क्या कॉन्ग्रेस उन लोगों के विचारों का सम्मान नहीं करती है, जो उसको लेकर सत्संगी माहौल बनाता है?

भाई साहब, किस लाइन में आ गए आप ?

‘प्रियंका सेना’ के कार्यकर्ताओं ने जो टीशर्ट पहनी है, उस पर लिखा है, ‘देश के सम्मान में प्रियंका जी मैदान में, मान भी देंगे, सम्मान भी देंगे, वक़्त पड़ेगा तो जान भी देंगे।’ अरे भाई साहब, ये मरने-मारने वाले जुनूनी काम तो आपके अनुसार दक्षिणपंथियों के नारे हुआ करते थे! आपका परिचय तो सत्संग है, आतँकवादियों और पत्थरबाज़ों की रिहाई में सुकून ढूँढना है, चाहे वो अफ़ज़ल गुरू हो या फिर फ़ारुक़ डार हो। इस तरह की सेना आपको शोभा नहीं देती है।

यह आदर्श लिबरल नामक जीव सोशल मीडिया से लेकर घरेलू चर्चा और शादी में जूता चुराई की रश्म तक में मौक़ा ढूँढते ही भाजपा और ख़ासकर हिन्दुओं को ‘ओल्ड स्कूल थिंग’ बताता फिरता है। वो तो मानता है कि ‘सेना’ शब्द गँवारपन का प्रतीक है। यह आदर्श सतसंगी गिरोह कहता है कि विशेष कारणों से ‘पिंक कलर’ चुनना या बोलना आपको ‘Sexist’ और ‘मिसोजेनिस्ट’ बनाता है। फिर भी कॉन्ग्रेस अपने भक्तों का दमन करते हुए लगातार ब्राह्मणवाद से लेकर ‘सेनावाद’ की ओर बढ़ती ही जा रही है।

यह गिरोह मोहल्ले के ग़रीब बच्चों के साथ फ़ोटो खींचकर सोशल मीडिया पर तो ख़ूब डालता है, लेकिन जनजाति की तुलना मोर से करने में कोताही नहीं बरतता है। अब जबकि कॉन्ग्रेस ‘पिंक प्रियंका सेना’ का आविष्कार कर चुका है, तो फिर ऐसे में ये आदर्श-लिबरल समूह किसे नीचा दिखाएगा? कॉन्ग्रेस ने इन आदर्श-लिबरलों का मुँह बंद करने के लिए प्रियंका सेना नाम का मास्टरस्ट्रोक खेलकर बड़ी बढ़त बना ली है। क्योंकि वो जानता है कि ये ‘बतोले लिबरल’ की-बोर्ड सेना से ज़्यादा कुछ नहीं है, ये वोट देने लाइन पर नहीं खड़ी होती है, न ही इसे राशन की कतारों में खड़ा होना पड़ता है।

प्रियंका सेना द्वारा ‘पिंक रंग’ को महिलाओं का रंग बताकर महिला सशक्तिकरण की ओर कॉन्ग्रेस ने बड़ा क़दम उठा लिया है। अभी देखना ये है कि पति के साथ हर वक़्त खड़े रहने का दावा करने वाली यह पार्टी इस ‘पिंक रंग सेना’ के साथ कब तक खड़ी रहती है। तब तक नाश्ते में प्रियंका गाँधी और डिनर में इंदिरा गाँधी की तस्वीरें दिखने वाले जादूगर मीडिया को देखते रहिए।