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Fact Check: पुलवामा के बाद मोदी को फोटो से घेरने वाले राहुल खुद नाच रहे थे

पुलवामा आत्मघाती हमले के बाद देश में आक्रोश और मातम का माहौल पसरा हुआ है। जहाँ एक तरफ देश की जनता अपने 40 CRPF के जवानों को खो देने के ग़म में है वहीं दूसरी तरफ कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को गुजरात के किसी कार्यक्रम में नाचते हुए देखा गया। हालाँकि कॉन्ग्रेस ने उस वीडियो को हटाने का भरसक प्रयास किया।

जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क में जहाँ प्रधानमंत्री गए थे, उस जगह को लेकर कॉन्ग्रेस ने झूठ फैलाया कि वहाँ नरेंद्र मोदी सेल्फी क्लिक कर रहे थे। कॉन्ग्रेस ने ट्विटर के जरिए प्रधानमंत्री मोदी के ख़िलाफ़ प्रोपेगंडा फ़ैलाने के लिए एक प्रेस कॉन्फ्रेंस का भी आयोजन किया। ख़बर सामने आने पर ऑपइंडिया ने इस झूठ की तह तक जाकर सच का पता लगाया।

बता दें कि कॉर्बेट राष्ट्रीय पार्क में मोदी की यात्रा की तस्वीरें दोपहर 2 बजे के आसपास मीडिया द्वारा प्रकाशित की गई थीं, जिसका अर्थ है कि तस्वीरें वास्तव में 2 बजे से पहले ली गई थीं। जबकि पुलवामा हमले की घटना 3 बजे के बाद की है। प्रधानमंत्री मोदी ने वहाँ वन क्षेत्र में लगभग आधे घंटे का समय बिताया, इसका मतलब यह है कि हमले की सूचना मिलने से पहले ही वो अपनी वन यात्रा से लौट आए थे। इसलिए यह स्पष्ट होता है कि कॉन्ग्रेस के आरोप मनगढ़ंत और बेबुनियादी है।

राहुल गाँधी द्वारा फैलाए गए झूठ और पुलवामा आतंकी हमले पर राजनीति करने के बाद, कॉन्ग्रेस ने एक ट्वीट को हटा दिया है।

4:45 बजे, कॉन्ग्रेस के आधिकारिक ट्विटर हैंडल ने राहुल गाँधी के गुजरात में अपनी राजनीतिक रैली के बाद डांस करने और जश्न मनाने का एक वीडियो ट्वीट किया। इस वीडियो को पोस्ट करने के साथ ही कॉन्ग्रेस ने ट्वीट में लिखा कि वाह @RahulGandhi जी आपने तो दिल जीत लिया। इस वीडियो में राहुल का न सिर्फ़ कपटी चेहरा सामने आया बल्कि वो लोगों के साथ नाचते हुए जश्न मनाते नज़र आए।

ऑपइंडिया ने इस बात का पता लगाया कि राहुल गाँधी का भाषण कब शुरू हुआ था। कई स्रोतों से पता चला कि राहुल गाँधी का भाषण दोपहर 3 बजे के बाद शुरू हुआ था।

इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, रैली में राहुल गाँधी का भाषण लगभग 3:18 बजे शुरू हुआ।


ANI ने 3:14 बजे अपनी वलसाड रैली में राहुल गाँधी को चूमती एक महिला से संबंधित ट्वीट किया था। इस गतिविधि का ज़िक्र राहुल गाँधी द्वारा रैली में बोलने से पहले शुरू हुई थी और मंच पर बैठी हुई थी।

बता दें कि इससे पहले भी राहुल गाँधी की संवेदनहीनता तब सामने आई थी जब मुंबई में 26/11 के आतंकी हमले के बाद राहुल गाँधी कथित रूप से अपने दोस्तों के साथ दिल्ली फार्महाउस में पार्टी में मशगूल थे

प्रधानमंत्री के ख़िलाफ़ कॉन्ग्रेस के झूठ का पर्दाफ़ाश होने के बाद, कॉन्ग्रेस ने बड़ी सफ़ाई से नाचने और जश्न मनाने वाले उस ट्वीट को ही डिलीट करने का प्रयास किया। लेकिन सोशल मीडिया के सामने उनकी यह चालाकी नहीं चली और गुजरात के कॉन्ग्रेस के ऑफिशियल ट्विटर हैंडल पर अभी भी यह वीडियो मौजूद है।

कॉन्ग्रेस और उसके अध्यक्ष राहुल गाँधी की इस हरक़त पर कई राजनीतिक पंडितों ने टिप्पणी की।

यह बड़े शर्म की बात है कि कॉन्ग्रेस और राहुल गाँधी हमेशा से ही प्रधानमंत्री मोदी पर बेवजह ही हमलावर रहते हैं बावजूद इसके कि वो ख़ुद ऐसी भयंकर ग़लतियाँ करते हैं जो माफ़ी के भी लायक नहीं होती।

मुंबई फ़िल्म सिटी से बैन हुए पाकिस्तानी कलाकार और सिद्धू

मुंबई फ़िल्म सिटी में शूटिंग करने से पाकिस्तानी कलाकारों को बैन करने का निर्णय लिया गया है। पुलवामा आतंकी हमले के बाद पाकिस्तान का बचाव करने वाले सिद्धू ‘द कपिल शर्मा शो’ से पहले ही निकाले जा चुके हैं। अब मुंबई फ़िल्म सिटी में भी उनकी एंट्री प्रतिबंधित कर दी गई है। यह निर्णय फेडरेशन ऑफ वेस्टर्न इंडिया सिने इम्पलोयी (FWICE) द्वारा लिया गया।

फेडरेशन ने गोरेगाँव के दादा साहब फाल्के फ़िल्म सिटी के प्रबंधक को लिखे गए पत्र में कहा कि वह अपने स्टूडियो में नवजोत सिंह सिद्धू और पाकिस्तानी कलाकारों एवं गायकों के प्रवेश पर पूरी तरह रोक लगाएँ और उन्हें वहाँ किसी भी प्रकार की शूटिंग करने की अनुमति न दें। बता दें कि यह एक बड़ा संगठन है जिसके अंतर्गत कुल 29 यूनियन हैं। इन यूनियन के सदस्यों की सँख्या लाखों में है।

सिद्धू द्वारा पाकिस्तान की पैरवी करने के बाद उनका सोशल मीडिया से लेकर राजनैतिक गलियारे तक, हर जगह विरोध किया गया। लोगों ने सोनी चैनल का बायकॉट करने की धमकी दी, जिसके बाद चैनल से सिद्धू को शो से बाहर निकाल दिया।

FWICE के अलावा फ़िल्म डिविजन बोर्ड ने भी पाकिस्तानी कलाकारों को बैन करने का निर्णय लिया है। फ़िल्म सिटी और फ़िल्म बोर्ड के उपाध्यक्ष और राज्यमंत्री अमरजीत मिश्रा ने पाकिस्तानी कलाकारों को भारतीय फ़िल्मों में लेने पर कड़ी आपत्ति जताई। साथ ही, उन्होंने सभी फ़िल्म निर्माताओं और निर्देशकों को पाकिस्तानी कलाकारों के साथ काम ना करने की सलाह दी।

कुप्रेक: वामपंथ के इश्क़ में ज़हर होना

पुलवामा में हुए आतंकी हमले के बाद पिछले कुछ दिनों में लगा था कि देश शायद तमाम राजनीतिक पूर्वग्रहों, विचारधारा के मनमुटावों से ऊपर उठकर एकजुट होने का निर्णय ले चुका है। लेकिन हम सबने एक-दूसरे को निराश कर दिया। हम उन ‘चराक्षर’ और ‘गराक्षर’ के दानव को आतंकवाद से ऊपर लाकर भारत माता को समर्पित करने लगे जो जनता ने हमें हमारे कारनामों के लिए हमें पुरस्कार स्वरुप सौंपे। हमारे विरोध के तरीके बदल चुके हैं। TRP की कुंठा में हम सब आत्मग्रस्त हो चुके हैं। हमने साबित कर दिया है कि हमारी विषैली विचारधारा का योगदान बलिदान हुए 40 सैनिकों के योगदान से कहीं बढ़कर है।

व्हाट्सएप्प पर भेजी जाने वाली जननांग की तस्वीर से लोगों की राष्ट्रभक्ति पहचान ली गई हैं, सैनिकों के आरक्षण पर डिबेट को हवा दे दी जा चुकी है, ताकि हम चुपके से उस मानसिकता को कोसने से बच जाएँ, जो आतंकवाद को जन्म देती है। यह शायद इस मीडिया गिरोह के अनुसार इस चर्चा का सबसे उपयुक्त समय है। ‘कश्मीरियत’ की दंगाई, उपद्रवी हरकतों और उनके पत्थरबाजों के प्रति अश्रुपूरित सत्संग लिखे जा चुके हैं।

सांप्रदायिक भेदभाव और उन्माद बढ़ाने के लिए मौके की तलाश में बैठे वामपंथी गिरोहों ने जता दिया कि सैनिकों का बलिदान सिर्फ और सिर्फ अपनी विषैली मानसिकता के बीजारोपण का एक सुन्दर अवसर है। पुलिस के स्पष्टीकरण के बावजूद मीडिया में इन गिरोहों ने ये कहकर खूब तांडव मचाया कि कश्मीरी युवाओं को परेशान किया जा रहा है। फिर भी इन गिरोहों का एक अच्छा खासा वर्ग समाज में पनप रहा है और तंदुरुस्त हो रहा है।

कारवाँ के एजाज़ अशरफ़ ने ऐसे समय में सैनिकों की जाति ढूँढ निकाली, जिस समय सारा देश बलिदानी सैनिकों के शोक में डूबा था। ये वही कारवाँ है, जिसका ज़िक्र अपने प्राइम टाइम से लेकर फेसबुक पोस्ट तक में रवीश कुमार ‘सनसनीखेज खुलासों’ के लिए किया करते हैं। मीडिया गिरोह की इन षड्यंत्रकारी घातक टुकड़ियों के झूठ के बाजार और इनकी विश्वसनीयता के बारे में हम पहले भी बता चुके हैं।

अब नया मुद्दा इन मीडिया गिरोहों का कंगना रानौत की देशभक्ति है। अपनी बात खुलकर कहने और अपने साहसी बयानों के कारण चर्चा में रहने वाली कंगना रानौत को एक ऐसे गुट से निशाना बनाया जा रहा है, जो सीमा पर मरने वाले जवानों पर बनाए जाने वाले चुटकुलों पर हँसता आया है। कॉमेडी के नाम पर ऐसे चुटकुलों को दिशा देने वाले AIB समूह की दुकान आज व्हाट्सएप्प पर ‘न्यूड’ माँगने और महिला उत्पीड़न के मामलों के कारण बंद हो चुकी है। ख़ास बात ये है कि इनसे सहानुभूति रखने वाला अभी भी एक बड़ा वर्ग समाज में इन्हें सम्मान की नज़र से देखता है।

ये करिश्माई प्रतिभा हो सकती है कि जो आतंकवाद को आतंकवाद कहने से हिचकिचाते हैं, जो धर्म के नाम पर पनप रहे जिहाद को आज तक जिहाद नहीं बता पाए, उन्होंने व्हाट्सएप्प पर मिलने वाले जननांग की तस्वीर और शूटिंग के लिए इस्तेमाल होने वाले घोड़े से राष्ट्रवाद को तुरंत पहचान लिया।

कंगना रानौत की हाल ही में आई फ़िल्म मणिकर्णिका को दर्शकों को खूब सराहा है। लेकिन 1857 की क्रांति को स्वतंत्रता की पहली क्रांति न मानने वालों की आपत्ति का कारण सिर्फ यही नहीं है। पुलवामा आतंकी घटना के बाद कंगना रानौत ने कहा था, “विपक्ष वाले फ़र्ज़ी शोक न मनाएँ, उन्हें तो गधे पर बिठाकर थप्पड़ मारा जाना चाहिए।” अक्सर सामाजिक और राजनीतिक घटनाक्रमों पर बेबाकी से अपने विचार रखने वाली कंगना रानौत के साहसिक यानी ‘बोल्ड’ अंदाज के कारण उनको निशाना बनाया जा रहा है। आप सोचिए कि ये वही लोग हैं जो अक्सर स्वरा भास्कर पर फिल्माए गए हस्तमैथुन के दृश्यों को महिला सशक्तिकरण का पहला चरण बताते हैं। इसके लिए सहारा लिया जा रहा है उनकी फिल्म मणिकर्णिका की शूटिंग के दौरान फ़िल्माए जा रहे एक ऐसे दृश्य से जिसमें वो नकली घोड़े पर सवार हैं।

किसी की अभिव्यक्ति के अधिकार को छीनने के लिए और उसके मनोबल को गिराने के लिए इस तरह के सस्ते हथकंडों का इस्तेमाल करना इन मीडिया गिरोहों को और भी ज्यादा हास्यास्पद बनाता है और उससे भी ज्यादा हास्यास्पद इस वीडियो को कंगना रानौत की देशभक्ति (नेश्नलिज़्म) से जोड़ना है। आप कह सकते हैं कि और कितना गिरोगे भाई Scroll ?

जाहिर सी बात है कि फिल्मों के किसी भी दृश्य में जानवरों का इस्तेमाल प्रतिबंधित है और असली घोड़े का इस्तेमाल ना ही कँगना कर सकती हैं, ना शाहरुख खान और ना ही प्रियंका चोपड़ा! लेकिन शूटिंग के दौरान बनाए गए इस  वीडियो को लेकर न्यूज़ बना देना यही दर्शाता है कि इन मीडिया गिरोहों के पास प्रोपेगैंडा फैलाने का ‘कच्चा सामान’ दिनों-दिन कम पड़ता जा रहा है।

कुंठित ट्विटर ट्रॉल्स को उन्हीं की भाषा में जवाब देने के लिए ‘@squintneon’ नाम के यूज़र ने आमिर खान की धूम फिल्म की शूटिंग के दौरान की वीडियो क्लिप पोस्ट कर सवाल पूछा है कि अगर कंगना के वीडियो से उसके नेश्नलिज़्म का पता चल जाता है तो फिर इस वीडियो के माध्यम से आमिर खान को असहिष्णुता का सिपाही बताकर दिखाइए।

ज़ाहिर सी बात है कि राष्ट्रवाद से घृणा में यह ट्रॉल-दल इतना कुंठित हो चुका है कि इसके हाथ जो कुछ लग रहा है ये उसी को जरिया बनाकर अपनी भड़ास निकाल रहा है। शायद कंगना रानौत के खिलाफ यह मुहिम सिर्फ इस वजह से भी है कि वो AIB जैसे समूहों के घटिया चुटकुलों का हिस्सा न बनकर देश और समाज के विषयों में रूचि रखती हैं। उम्मीद है कि ‘राष्ट्रवाद से नफरत’ की मानसिकता के कारण इस तरह की मुहिम चलाने वालों के भी कभी अच्छे दिन जरूर आएँगे, जब ये यकीन करना शुरू कर देंगे कि जुरासिक पार्क की फिल्मों के लिए असली डायनासौर और सुपरमैन फिल्म बनाने के लिए असली सुपरमैन की सहायता नहीं ली गई थी। तब तक हम इनके लिए प्रार्थना कर सकते हैं कि इन्हे एक विपरीत विचारधारा और राष्ट्रवाद से नफरत में इन्हे अपनी बात रखने के लिए इतने ‘सस्ते तरीकों’ का सहारा नहीं लेना पड़ेगा।

फैक्ट चेक: क्या पुलवामा आतंकी हमले के बाद पीएम नरेंद्र मोदी उत्तराखंड में फोटो शूट करवा रहे थे?

जम्मू-कश्मीर के पुलवामा में सीआरपीएफ के काफ़िले पर हुए भयानक आतंकवादी हमले के एक हफ्ते बाद, राहुल गाँधी ने एक ट्वीट पोस्ट किया जिसमें दावा किया गया कि हमले के 3 घंटे बाद पीएम नरेंद्र मोदी फोटो शूट में भाग ले रहे थे। कॉन्ग्रेस अध्यक्ष ने 14 फ़रवरी को मोदी की कॉर्बेट नेशनल पार्क की यात्रा की तस्वीरें भी पोस्ट कीं, और एक फोटो में दिखाया गया है कि मोदी एक कैमरामैन द्वारा फोटो खिंचवा रहे हैं।

इसी आरोप को कॉन्ग्रेस के प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला ने भी उठाया। कल (फ़रवरी 21, 2019) को सुरजेवाला ने दावा किया कि 14 फ़रवरी को 3:10 बजे जिस समय आतंकी हमला हुआ था, नरेंद्र मोदी डिस्कवरी चैनल के कैमरा क्रू के साथ नाव की सवारी का आनंद ले रहे थे। उसके बाद, कॉन्ग्रेस समर्थक सोशल मीडिया पेजेज और कॉन्ग्रेस समर्थकों के द्वारा आरोप-प्रत्यारोप का खेल शुरू हुआ, इस खेल को हवा देने में कॉन्ग्रेस समर्थक कुछ प्रमुख पत्रकार भी शामिल रहें।

यहाँ असली सवाल ये है कि क्या मोदी वास्तव में पुलवामा आतंकी हमले के तीन घंटे बाद तक फोटो शूट करवा रहे थे जैसा कि राहुल गाँधी ने दावा किया? आइए उन सभी के दावों  की सत्यता की जाँच करें।

पुलवामा आत्मघाती हमला लगभग 3:10 बजे हुआ और दावे के हिसाब से मोदी शाम 6 बजे के बाद तक भी फोटो खिंचवा रहे थे। अगर हम मोदी की फोटो खींचते हुए देंखे, तो हम साफ़ देख सकते हैं कि जब यह फोटो ली गई है यह दिन का समय है, क्योंकि फोटो की पृष्ठभूमि में खिली हुई धूप और साफ नीला आकाश देखा जा सकता है। अगर ये शाम की होती तो क्या बैकग्राउंड में इतनी खिली धूप होती? जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क में सूर्यास्त का समय टाइम एंड डेट वेबसाइट के अनुसार 14 फ़रवरी को शाम 6:02 बजे था। इसका मतलब यह है कि अगर हमले के 3 घंटे बाद भी शूटिंग जारी होती तो बैकग्रॉउंड में अंधेरा हो गया होता। यहाँ तो ये स्पष्ट है कि जब ये तस्वीर ली गई है वह समय सूर्यास्त से पहले का है। न कि हमले के 3 घंटे बाद का समय था।

चलिए ठीक से उस दिन का पूरा घटनाक्रम समझते हैं, यहीं से इस वाकये का सच भी समझ आएगा। पहला सवाल ये है कि उस दिन वास्तव में मोदी राष्ट्रीय उद्यान में कब पहुँचे? प्रधानमंत्री 14 फ़रवरी को दोपहर 3 बजे उत्तराखंड के रुद्रपुर में एक रैली को संबोधित करने वाले थे। इसके लिए, वह लगभग 7 बजे सुबह देहरादून के जॉली ग्रांट हवाई अड्डे पर पहुँचे, जहाँ से उन्हें हेलीकॉप्टर द्वारा आगे की यात्रा करनी थी। लेकिन खराब मौसम के कारण हेलीकॉप्टर उड़ान नहीं भर सका। इसलिए मोदी ने वहाँ करीब तीन घंटे इंतजार किया। वहाँ से उनका हेलिकॉप्टर सुबह 11:15 बजे कालागढ़ के लिए रवाना हुआ और वहाँ से सड़क के रास्ते जिम कॉर्बेट टाइगर रिजर्व के ढिकाला जोन जाना था। वह दोपहर लगभग 12 बजे टाइगर रिज़र्व पहुँचे थे और ग्लोबल टाइगर रिजर्व की बैठक में भाग लिया। बैठक के बाद, उन्होंने लगभग 1 बजे जंगल के ढिकाला क्षेत्र में पहुँचने के लिए एक नाव पर सवार होकर रामगंगा नदी को पार किया। क्योंकि उसके कुछ ही समय बाद उनके आगमन की सूचना मीडिया द्वारा दी गई थी।

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, मोदी ने वन क्षेत्र में केवल 30 मिनट बिताए, जहाँ से वह खिन्नौली वन विश्राम गृह गए। जिसका मतलब है कि पीएम ने पुलवामा में हमले से लगभग एक घंटे पहले ही अपनी वन यात्रा पूरी कर ली थी। उस दौरान कुछ फ़ोटोग्राफ़रों ने उनकी कुछ तस्वीरें लीं। गेस्ट हाउस में, उन्होंने अधिकारियों के साथ बाघ संरक्षण प्रयासों पर चर्चा की और बाद में रुद्रपुर में रैली को फोन से संबोधित किया क्योंकि मौसम में सुधार नहीं हुआ था। भाषण को डीडी न्यूज द्वारा लाइव किया गया था। और लाइव वीडियो के यूट्यूब मेटाडेटा विश्लेषण से, यह देखा जा सकता है कि भाषण का प्रसारण शाम 5:17 बजे शुरू हुआ। इसका मतलब है, हमले के 2 घंटे बाद, मोदी फोन करके रैली को संबोधित कर रहे थे, ताकि उन हजारों लोगों को निराश न करें जो उन्हें सुनने के लिए 5-6 घंटे से इंतजार कर रहे थे। यहाँ भी ये साफ है कि वह फोटो शूट नहीं करवा रहे थे।

कॉर्बेट राष्ट्रीय पार्क में मोदी की यात्रा की तस्वीरें पहले ही 2 बजे के आसपास मीडिया द्वारा प्रकाशित कर दी गई थीं, जिसका साफ अर्थ यह भी है कि तस्वीरें वास्तव में 2 बजे से पहले ली गई थीं। और जैसा कि मोदी ने वन क्षेत्र में लगभग आधे घंटे का समय बिताया, इसका मतलब यह है कि हमले के बारे में सत्यापित जानकारी पहुँचने से पहले ही वह अपनी वन यात्रा से लौट आए थे। इसलिए, नाहक सनसनी बनाकर ये आरोप लगाना कि पुलवामा हमले के बाद पीएम मोदी जिम कॉर्बेट पार्क में एक फोटोशूट करवा रहे थे, यह राहुल गाँधी, उनके ट्रोल सोशल मीडिया के यूजर और फुल टाइम प्रचारक पत्रकारों द्वारा प्रचारित एक और झूठ, उनकी कभी न खत्म होने वाली महाझूठ और प्रोपेगंडा का हिस्सा है। इस तरह से राहुल के इस झूठ को मीडिया गिरोह ने एक बार फिर फैलाकर अपनी विश्वसनीयता को कलंकित किया है।

देवबंद: जैश के आतंकी शाहनवाज़ और आक़िब गिरफ़्तार, ग्रेनेड बनाने में थे एक्सपर्ट

पुलवामा हमले के बाद से सुरक्षाबलों ने देश में आतंकियों को पकड़ने की धर-पकड़ तेज कर दी है। जगह-जगह पर सुरक्षा को मद्देनज़र रखते हुए सख़्ती से जाँच की जा रही है। इसी दिशा में यूपी के आतंक रोधी दस्ते (एटीएस) ने शुक्रवार (फरवरी 22, 2019) को पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सहारनपुर ज़िले के देवबंद से आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के दो संदिग्ध आतंकवादियों को गिरफ़्तार किया है।

इन संदिग्धों को पकड़ने की कार्रवाई देवबंद स्थित एक हॉस्टल में की गई। गिरफ़्तार हुए इन आतंकियों का नाम शाहनवाज़ अहमद तेली और आक़िब है। इनमें शाहनवाज़ को ग्रेनेड एक्सपर्ट बताया जाता है।

शाहनवाज़ जम्मू-कश्मीर के कुलगाम का रहने वाला है, जबकि आक़िब पुलवामा का है। यह दोनों आतंकी यूपी में उन लोगों की तलाश कर रहे थे जिनका ब्रेन वॉश करके जैश में शामिल कराया जा सके। इस सिलसिले में वो कई बार देवबंद और बाक़ी के ज़िलों में भी जा चुके हैं। इन आतंकियों के कब्जे से 32 बोर का पिस्टल और 30 कारतूस बरामद हुए हैं।

बताया जा रहा है कि इन आतंकियों को पुलवामा में हुए हमले की पूरी जानकारी थी। साथ ही इनके मोबाइल से जैश-ए-मोहम्मद सहित तमाम आतंकियों की वीडियो बरामद की गई। शुक्रवार (फरवरी 22, 2019) सुबह हुई कार्रवाई में एटीएस ने 11 कश्मीरी छात्रों को हिरासत में लिया था जिसमें 5 छात्र उड़ीसा के भी थे। जाँच के बाद जैश के इन दोनों आतंकियों को गिरफ़्तार किया गया।

12 करोड़ किसानों के बैंक में मोदी 1 क्लिक से भेजेंगे ₹25,000 करोड़

बजट सत्र में किसान सम्मान निधि योजना पर हुई घोषणा के बाद इसकी पहली किस्त सरकार द्वारा रविवार (फरवरी 24, 2019) को जारी करेंगे।

गोरखपुर में राष्ट्रीय किसान सम्मेलन के मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक क्लिक में देश के 12 करोड़ किसानों के खाते में ₹25,000 करोड़ की रकम ट्रांस्फर करेंगे।

यह योजना किसानों को प्रत्यक्ष रूप से आर्थिक मदद देने के लिए अब तक की सबसे अहम योजना है। इस पूरी योजना पर ₹75,000 करोड़ खर्च आने का अनुमान है। इसके तहत किसानों को सालाना ₹6,000 तीन किस्तों में दिए जाएँगे।

खबरें थी कि चुनाव के प्रचार शुरू होने से पहले ही इस योजना की पहली किस्त किसानों के खातों में डाल दी जाएगी। इसी दिशा में प्रधानमंत्री पहली किस्त रविवार को जारी करेंगे। बता दें कि यह राशि छोटे और सीमांत किसानों को दी जा रही है।

नवभारत में छपी ख़बर के अनुसार उनके सहयोगी टाइम्स ऑफ इंडिया से बात करते हुए बीजेपी सांसद और किसान मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष वीरेंद्र सिंह ने सूचना दी है कि इस योजना का ग्राउंड वर्क पूरा हो चुका है।

किसान मोर्चा अध्यक्ष राजा वर्मा ने कहा कि किसानों के लिए यह अपनी तरह की पहली स्कीम है, जो देश विकास के लिए रीढ़ है। अकेले यूपी में ही 90 लाख छोटे और मझोले किसानों को इस स्कीम से लाभ होने वाला है।

AMU छात्र मोहम्मद तालिब की जमानत याचिका ख़ारिज, छात्रों ने किया 3 घंटे तक विरोध प्रदर्शन

निचली अदालत ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (AMU) के छात्र मोहम्मद तालिब की ज़मानत याचिका ख़ारिज कर दी गई है। बता दें कि मोहम्मद तालिब पर 12 फरवरी को कैंपस में हिंसा के दौरान बर्बरता और शत्रुता को बढ़ावा देने के आरोप थे।

इस याचिका पर अतिरिक्त न्यायिक मजिस्ट्रेट कुलदीप सिंह ने सुनवाई की। ज़मानत याचिका ख़ारिज होने के बाद, बड़ी संख्या में छात्र बाब-ए-सैयद गेट पर जमा हो गए और विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया जो लगभग तीन घंटे तक जारी रहा। अभियोजन अधिकारी इंद्रजीत पाल जो तालिब की जमानत याचिका का विरोध कर रहे थे, ने कहा, “मैंने उसकी जमानत याचिका का विरोध किया, क्योंकि अपराध की प्रकृति गंभीर थी।”

बता दें कि तालिब, B.A के द्वितीय वर्ष का छात्र है जिसे रविवार (17 फ़रवरी 2019) की रात को पुलिस ने गिरफ़्तार किया था। छात्र संघ के सदस्य तालिब की गिरफ़्तारी के बाद विरोध में उतर आए थे और पुलिस स्टेशन को घेर लिया था। हालाँकि, पुलिस द्वारा उसकी गिरफ़्तारी के सबूत दिखाए जाने के बाद वे लौट गए थे। छात्र संघ के उपाध्यक्ष हमज़ा सूफ़ियान ने कहा कि वे ज़िला प्रशासन के अधिकारियों से मिलेंगे जिन्होंने तालिब की जल्द रिहाई का आश्वासन दिया था।

AMU के कुछ छात्रों ने कथित रूप से पत्रकार नलिनी शर्मा सहित रिपब्लिक टीवी क्रू को परेशान किया था जो परिसर से लाइव रिपोर्टिंग कर रही थीं। पत्रकार ने आरोप लगाया था कि एएमयू के छात्रों ने उनके उपकरण भी छीन लिए थे।

लेफ्टिनेंट जनरल डीएस हुड्डा ने कॉन्ग्रेस में शामिल होने की ख़बरों का किया खंडन

सितंबर 2016 में LoC पार की गई सर्जिकल स्ट्राइक में महत्वपूर्ण रोल निभाने वाले लेफ्टिनेंट जनरल डीएस हुड्डा (सेवानिवृत्त) ने कॉन्ग्रेस में शामिल होने ख़बरों का खंडन किया है। बता दें कि गुरुवार (21 फ़रवरी 2018) को ऐसी ख़बरें सामने आईं थीं जिनके मुताबिक कॉन्ग्रेस ने रिटायर्ड जनरल हुड्डा को पार्टी में शामिल करते हुए उन्हें बड़ी ज़िम्मेदारियाँ सौंपी गई।

इसके अलावा यह बात भी प्रचारित और प्रसारित हो रही थी कि जनरल डीएस हुड्डा ने अपनी ज़िम्मेदारी स्वीकार कर ली है और कॉन्ग्रेस ने इसके लिए टास्क फोर्स का भी गठन कर लिया है। कॉन्ग्रेस के सभी दावों को ख़ारिज करते हुए जनरल हुड्डा ने कहा कि कॉन्ग्रेस में शामिल होने की सभी ख़बरे बेबुनियादी हैं और उन्होंने पार्टी ज्वॉइन नहीं की है।

उरी हमले का बदला लेने के लिए भारत ने LoC पार जाकर पाकिस्तानी आतंकियों पर सर्जिकल स्ट्राइक को अंजाम दिया था और अपने इस ऑपरेशन में कई आतंकवादियों को मार गिराया गया था। भारत की ओर से किए गए सर्जिकल स्ट्राइक के दौरान लेफ्टिनेंट जनरल डीएस हुड्डा की अहम भूमिका थी।

आपको बता दें कि उरी हमले में 19 सैनिक वीरगति को प्राप्त हुए थे। हमला करने वाले तीन आतंकवादियों को भारत ने तत्काल ही मार गिराया था।

मध्य प्रदेश सरकार से नाराज़ 25 कॉन्ग्रेसी विधायक हुए लामबंद, बनाया अपना ‘क्लब’

मध्य प्रदेश में सत्ताधारी कॉन्ग्रेस के लिए बड़ी मुसीबत खड़ी हो गई है। कमलनाथ सरकार से नाराज़ चल रहे क़रीब 25 कॉन्ग्रेसी विधायकों ने लामबंद होकर अपना एक अलग क्लब बना लिया है। ये विधायक राज्य सरकार के मंत्रियों से ख़फ़ा हैं। इस क्लब में कॉन्ग्रेसी विधायकों के अलावा कमलनाथ सरकार को समर्थन दे रहे निर्दलीय व अन्य दलों के विधायक भी शामिल हैं। कहा जा रहा है कि इनमे से अधिकतर ऐसे विधायक हैं जो पहली बार चुन कर आए हैं।

बसपा विधायक रामबाई ने मीडिया को बताया कि इस क्लब में 28-30 विधायक हैं। उन्होंने कहा, “एक बार लोकसभा चुनाव हो जाए, फिर काहे का समर्थन?” उन्होंने मध्य प्रदेश सरकार पर भेदभाव का आरोप लगाया। नाराज़ कॉन्ग्रेस विधायक सुरेंद्र सिंह शेरा ने समाचार चैनल आज तक से बात करते हुए बताया कि उन्होंने मुसीबत के समय कॉन्ग्रेस का साथ दिया लेकिन उन्हें वादे के मुताबिक़ मंत्रीपद नहीं दिया गया। उन्होंने कहा कि अब कोई भी उन्हें कॉन्ग्रेस में अहमियत नहीं देता। उन्होंने कहा कि मंत्री उनके फोन भी नहीं उठाते और विधायकों की कोई सुनवाई नहीं होती।

मीडिया में आ रही ख़बरों की मानें तो विधायक अधिकारियों के तबादले को लेकर नाराज़ हैं। उनका कहना है कि सरकार उन्हें भरोसे में लिए बिना उनके क्षेत्र के अधिकारियों का तबादला कर रही है। इसके अलावा भूमिपूजन व शिलान्यास कार्यक्रमों में भी विधायकों की उपेक्षा की जा रही है। राजधानी भोपाल के एक होटल में बैठक कर इन विधायकों ने आगे की रणनीति बनाई। वे मुख्यमंत्री कमलनाथ से जल्द ही मुलाक़ात करेंगे।

विधायकों ने बताया कि शिलान्यास-पट्टी में उनके नाम तक नहीं लिखे जा रहे हैं। उन्होंने माँग की कि उनके और सीएम के बीच में समन्वय बनाने के लिए किसी ऐसे व्यक्ति को नियुक्त कर दिया जाए जो इसमें सक्षम हो। मध्य प्रदेश की 231 सदस्यीय विधानसभा में कॉन्ग्रेस के 114 विधायक हैं जबकि बसपा के दो व सपा के एक विधायक हैं। इनके अलावा सरकार को 4 निर्दलीयों का भी समर्थन प्राप्त है। कुल मिलाकर कमलनाथ के नेतृत्व में चल रही सरकार के पास 121 विधायकों का समर्थन है।

जवानों के बलिदान को जाति और वर्ग में सीमित कर देने वाले नहीं समझेंगे राष्ट्रवाद की परिभाषा

पुलवामा हमले में बलिदान हुए जवानों पर पूरा देश शोक मना रहा है। देश की रक्षा करते हुए 40 जवान आज अपने पीछे अपने परिवार छोड़ गए हैं। परिवार में किसी के बूढ़े माँ-बाप हैं तो किसी के छोटे बच्चे हैं। घर के इन चिरागों के चले जाने से न केवल इनके परिवार में अंधेरा हुआ है बल्कि उनकी आर्थिक स्थिति भी डगमगा गई है।

ऐसी स्थिति में हमारे देश में एक तरफ कुछ ऐसे बुद्धिजीवी हैं जो इन परिवारों की मजबूरी पर अपनी विचारधारा की ज़मीन मजबूत करने में जुटे हुए हैं तो वहीं कुछ उदाहरण ऐसे हैं जो अपने जीवन की जमा-पूँजी से इन परिवारों की मदद करने में संकोच नहीं कर रहे हैं।

आश्चर्य होता है कि एक ही देश में रहकर दो वर्गों के लोगों के विचारों में इतना अंतर कैसे हो सकता है। कल एक तरफ जहाँ ‘द कारवां’ के एजाज़ अशरफ ने पुलवामा जैसे संवेदनशील मामले में जाति और मज़हब को लाकर पत्रकारिता में निहित विश्वसनीयता और निष्पक्षता जैसे नैतिक मूल्यों को तिलांजलि दे दी है। वहीं दूसरी तरफ ख़बर आई कि भीख माँगकर अपना गुज़र बसर करने वाली एक औरत ने अपनी जमा पूंजी पुलवामा में बलिदान हुए जवानों के लिए दान दे दी है।

कल अशरफ ने अपने आर्टिकल में दावा करते हुए कहा कि पुलवामा हमले पर राष्ट्रवाद को लेकर केवल शहरी मध्यम वर्ग के ही लोग आक्रोषित है, जिसमें अधिकतर केवल उच्च जाति के लोग शामिल हैं। अब उन्हें कैसे बताया जाए कि यह मुद्दा ऐसा नहीं है जिसे जाति अथवा वर्गों में बाँटा जाए। सेना के जवानों की जाति खोज निकालने वाले अशरफ पढ़े-लिखे और समझदार मालूम होते हैं तभी उनकी सोच और भीख माँगकर जीवन जीने वाली बुजुर्ग महिला की सोच में आकाश-पाताल का अंतर है।

अशरफ जहाँ जवानों के परिजनों को फोन करके उनकी जाति का प्रमाण माँगकर एक विशेष विचारधारा का एंगल देने का प्रयास कर रहे थे, वहीं अजमेर में नंदिनी नाम की महिला की सारी संपत्ति उसकी आखिरी इच्छा के अनुसार संरक्षकों द्वारा सीआरपीएफ जवानों के नाम पर दान दे दी गई।

यहाँ बता दें कि पिछले साल आखिरी साँस लेने से पहले नंदिनी ने एक वसीयत छोड़ी थी, जिसमें उन्होंने अपनी अंतिम इच्छा जाहिर की थी कि उनके पैसों को देश और समाज के उपयोग में लगाया जाए। नंदिनी अजमेर के बजरंगगढ़ में स्थित अंबे माता मंदिर के बाहर भीख माँगती थीं और वहीं से उन्होंने ये पैसे इकट्ठा किए। वह अपने पैसे हर दिन बैंक में जमा करती थी और अपनी मौत के बाद इन पैसों का ख्याल रखने के लिए उन्होंने दो लोगों को अपना संरक्षक बना रखा था।

एक भीख मांगने वाली औरत के मन मे समाज और देश के लिए भावनाएँ हो सकती हैं लेकिन अशरफ जैसे बुद्धिजीवियों के मन मे ये भावनाएँ नहीं आ सकती। पुलवामा हमले में हत हुए जवानों के बलिदान को क्षेत्र और वर्ग में सीमित कर देने वाले यह कभी नहीं समझेंगे कि राष्ट्रवाद की परिभाषा वो नहीं है जिसका निर्माण वे कर रहे हैं, बल्कि वो है जो नंदिनी जैसी बुजुर्ग और गरीब महिलाएँ अपनी आखिरी इच्छाओं में प्रकट कर रही हैं।

प्रोपोगेंडा की गाड़ी में पेट्रोल भरने के लिए एयर कंडीशंड कमरों में बैठकर परिजनों से सवाल दागना जितना आसान है उनके मन में भीतर उतर कर उनकी मनःस्थिति समझना उतना ही कठिन है।

पत्रकारिता के दम पर जागरूकता फैलाने का ढोंग करने वाले अशरफ को इतना ही नहीं बरेली के प्राइवेट स्कूल की एक प्रिंसिपल किरण झगवाल तक से शिक्षा लेने की आवश्यकता है। जिन्होंने अपनी चूड़ियाँ बेचकर सीआरपीएफ जवानों के परिवार वालों की मदद करने के लिए 1,38,387 रुपए प्रधानमंत्री राहत कोष में भेजे।

इसके अलावा 14 फरवरी से अब तक 80,000 लोगों के सहयोग से करीब 20 करोड़ रुपए भारत के वीरों के नाम जमा किए जा चुके हैं जिसकी जानकारी सरकार ने दी है।

सोचने वाली बात है कि एक तरफ जहाँ पर देश के कोने-कोने से लोगों द्वारा वीरगति प्राप्त जवानों के लिए हर संभव मदद पहुँचाई जा रही हैं वहीं पत्रकारिता के समुदाय विशेष के कुछ लोग इसे अपनी विचारधारा में सराबोर कर रहे हैं। आज यही जवानों की ‘जाति पूछने वाले’ कल को ‘आतंकवाद का कोई मज़हब नहीं होता’ जैसे आर्टिकल लिखते नज़र आएँगे। मानवता के धरातल से उठकर और कुतर्कों की दुनिया में खो चुके इन बुद्धिजीवियों को अपने भीतर नंदिनी और किरण जैसी भावनाएँ जगाने में अरसा लग जाएगा।