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टॉइम्स का मेगा पोल: प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी हैं 84% जनता की पहली पसंद

जल्द ही देश में लोकसभा चुनाव के कारण राजनीति और अधिक गरमाने वाली है। हर किसी में उत्सुकता है कि इस साल चुनाव के क्या परिणाम आएँगे। ऐसे में टाइम्स मेगा ऑनलाइन पोल के नतीजों में सामने निकल कर आया है कि जनता पीएम के रूप में एक बार फिर नरेंद्र मोदी को चाहती है।

इस ऑनलाइन पोल के नतीजों में नरेंद्र मोदी को दोबारा बड़ा समर्थन मिलता दिखाई दे रहा है। इस सर्वेक्षण में हिस्सा लेने वाले 84% पाठकों ने मोदी को ही अपनी पहली पसंद बताया है और लगभग इतने ही लोगों का मानना है कि पीएम मोदी के नेतृत्व में ही केंद्र में एनडीए की सरकार बनेगी।

बता दें कि इस सर्वे में करीब पाँच लाख से अधिक पाठकों ने हिस्सा लिया लेकिन टॉइम्स ने सिर्फ़ उन्हीं यूजर्स के मत गिने जो ईमेल आईडी से लॉग-इन कर सर्वे का हिस्सा बने। दरअसल, यह लॉग-इन की शर्त टाइम्स ने इसलिए रखी ताकि कोई भी एक यूजर एक से ज्यादा बार वोटिंग न कर सके। इस पोल को 11 से 20 फरवरी के बीच कराया गया था। साथ ही लोगों की निष्पक्ष वोटिंग जानने के लिए रिजल्ट को साथ-साथ नहीं दर्शाया गया था।

प्रधानमंत्री पद के लिए मोदी लोकप्रियता में सबसे आगे

पोल में सामने आए नतीजे बताते हैं कि नरेंद्र मोदी लोकप्रियता के मामले में अपने प्रतिद्वंद्वियों से बहुत आगे हैं। इसलिए लगभग 84% यूज़र्स ने बताया कि अगर आज की तारीख़ में चुनाव होते हैं तो वे पीएम के तौर पर मोदी को चुनेंगे।

पोल के नतीजों की लिस्ट में राहुल गांधी दूसरे स्थान पर हैं। सर्वे में शामिल 8.33% पाठकों ने उन्हें पीएम के रूप में अपनी पहली पसंद बताया जबकि ममता बनर्जी को केवल 1.44% पाठकों ने और मायावती को सिर्फ़ 0.43% पाठकों ने पीएम के रूप में अपनी पहली पसंद बताया। इसके अलावा 5.92% लोग चाहते हैं कि कोई और नेता पीएम बने।

राफेल विवाद से एनडीए को चुनाव में होगा कोई नुकसान?

इस पोल में यह भी पूछा गया कि राफेल विवाद से एनडीए को लोकसभा चुनाव में नुकसान होगा? लगभग 74.59% ने इस फैक्टर को नकार दिया और 17.51% लोगों ने इससे सहमति जताई, 7.9% लोगों ने इसपर कुछ नहीं कहा।

2014 के मुकाबले राहुल की लोकप्रियता?

क्या राहुल गांधी 2014 के मुकाबले ज्यादा लोकप्रिय हैं? इस सवाल पर 31% लोग सहमत हुए जबकि 63% लोग राहुल को आज भी लोकप्रिय नहीं मानते हैं।

एनडीए-2 के पाँच साल की समीक्षा

बीते पाँच सालों में एनडीए के कार्यकाल की समीक्षा करते हुए 22.29% यूजर्स ने इसे बढ़िया और 59.51% ने इसे बहुत बढ़िया बताया है। 8.25% लोगों ने मोदी सरकार के कार्यकाल को एवरेज बताया जबकि 9.9 % यूजर्स की नजरों में बेहद खराब रहा।

मोदी सरकार की सबसे बड़ी सफलता और विफलता?

इस पोल में मोदी सरकार की सबसे बड़ी सफलता और विफलता के बारे में भी पूछा गया था। इस सवाल की प्रतिक्रिया पर 34.39% लोगों ने कहा कि मोदी ने गरीबों की योजनाओं के विस्तार के लिए में सबसे अच्छा काम किया। जबकि 29% लोग GST लागू कराने को सबसे बड़ी सफलता मानते हैं। इसके अलावा मोदी सरकार की विफलता की बात करें तो 35.72% लोग राम मंदिर के मुद्दे पर कोई प्रगति न होने को सबसे बड़ी विफलता मानते हैं, वहीं 29.5% यूज़र्स रोजगार के मुद्दे पर मोदी सरकार को विफल मानते हैं।

लोकसभा चुनाव में सबसे बड़ा मुद्दा?

सर्वेक्षण में 2019 में लोगों से लोकसभा चुनाव का सबसे बड़े मुद्दे के बारे में पूछा गया तो 40.2% लोगों ने रोज़गार को सबसे बड़ा मुद्दा बताया। वहीं 21.8% लोग किसानों के संकट को सबसे बड़ा मुद्दा मानते हैं। इसके अलावा राम मंदिर पर लोग भले मोदी सरकार की आलोचना करें लेकिन सिर्फ 10% लोग ही इसे लोकसभा चुनाव में बड़ा मुद्दा मानते हैं।

बीते पाँच सालों में अल्पसंख्यक कितने असुरक्षित?

मोदी सरकार में अल्पसंख्यकों के असुरक्षित होने के सवाल पर 65.5% लोगों ने कहा कि उन्हें ऐसा नहीं लगता कि मोदी सरकार में अल्पसंख्यक सुरक्षित नहीं हैं। वहीं 24.2% लोगों का यह मानना है कि मोदी सरकार में अल्पसंख्यक असुरक्षित महसूस करते हैं।

आर्थिक रूप से पिछड़ों को आरक्षण के सवाल पर 72.6% लोगों ने कहा कि इस कदम से बीजेपी को चुनावों में फायदा पहुँचेगा। इस पोल में कुछ लोगों का यह भी कहना था कि 2019 में UPA और NDA के समर्थन वाली गठबंधन वाली सरकार बनेगी।

बता दें हिंदी और अंग्रेज़ी के अलावा टाइम्स के अन्य सात अन्य भाषाओं (गुजराती, मराठी, बंगाली, कन्नड़, तेलुगू, तमिल और मलयालम) की वेब साइट्स के संपादकों ने इस पोल के लिए 10 सवाल तय किए ताकि उन सवालों के जवाब से लोकसभा चुनावों के लिए देश की जनता के मूड का अनुमान लगाया जा सके। टाइम्स द्वारा कराया गया यह पोल सिर्फ ऑनलाइन यूजर्स के लिए ही था और इसके परिणाम सभी वर्ग के भारतीयों मतदाताओं का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं।

जैश की एक और ख़तरनाक योजना का ख़़ुलासा, पुलवामा हमले से भी बड़ा हमला करने की साज़िश

पुलवामा में CRPF के काफिले पर आत्मघाती हमला करने के बाद जैश-ए-मोहम्मद (JeM) ने एक और बड़े फिदायीन हमले को अंजाम देने की योजना बनाई थी। ख़ुफ़िया जानकारी के अनुसार पता चला है कि 16-17 फ़रवरी को JeM के पाकिस्तानी लीडरों और कश्मीर स्थित आतंकवादियों के बीच बातचीत हुई थी।

टाइम्स ऑफ़ इंडिया द्वारा गोपनीय रूप से जुटाई गई जानकारी से पता चला है कि जैश के आतंकवादियों ने भारतीय सुरक्षा बलों को बड़े पैमाने पर हताहत करने के लिए एक और हमले को अंजाम देने का संकल्प लिया था। टाइम्स ऑफ़ इंडिया को किसी उच्च पदस्थ इंटेलिजेंस अधिकारी द्वारा जानकारी मिली है कि जम्मू या जम्मू-कश्मीर के बाहर एक बड़ा हमला हो सकता है। टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने 19 फरवरी को जानकारी दी थी कि तीन फिदायीन समेत समेत 21 जैश आतंकियों ने पिछले साल दिसंबर में कश्मीर में घुसपैठ की थी।

यह भी पता चला है कि जैश-ए-मुहम्मद, पुलवामा आत्मघाती बम विस्फोट की तैयारियों का वीडियो भी जारी करने वाला है। खुफिया विश्लेषकों ने कहा कि वीडियो जारी करने का इरादा 20 वर्षीय आदिल अहमद डार का महिमामंडन करना है, जिसने अपनी विस्फोटक से भरी मारुति ईको वैन CRPF के क़ाफ़िले में शामिल बस से टकरा दी थी, जिसके कारण 14 फ़रवरी को 40 जवान वीरगति को प्राप्त हुए थे। एक विश्लेषक के अनुसार जैश-ए-मोहम्मद द्वारा जारी होने वाले वीडियो से कश्मीरी युवाओं को आत्मघाती बम बनाने वाले मिशन में भर्ती करने में मदद मिल सकती है।

जैश ने यह भी दावा किया है कि उसके पूर्व ऑपरेशनल कमांडर मोहम्मद वकास डार ने पिछले हफ़्ते राजौरी के नौशेरा सेक्टर में IED लगाई थी जिसमें सेना के मेजर चित्रेश बिष्ट की मृत्यु हो गई थी। हालाँकि, पुलिस अधिकारियों ने कहा कि जैश आतंकवादियों के बीच हुई बातचीत भारत को आतंकित करने के लिए लक्षित एक ‘मानसिक ऑपरेशन’ जैसा लगता है। लेकिन जब से पुलिस ने जैश आतंकियों की बातचीत ख़ुफ़िया रूप से सुनना शुरू किया है, वे इसे अनदेखा नहीं कर सकते। एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने कहा कि वे हाई अलर्ट पर हैं और अन्य माध्यमों से भी ख़तरे को कम करने की कोशिश कर रहे हैं।

केसरी की असली कहानी: जब 21 सिखों ने 10000 इस्लामी आक्रांताओं को चटाई थी धूल

यह बलिदान की गाथा है। यह मातृभूमि की रक्षा के लिए सर्वस्व समर्पण करने वाले वीरों की कहानी है। यह त्याग का माहात्म्य है। यह महज़ 21 शूरवीर सिखों द्वारा हज़ारों इस्लामी आक्रांताओं से भारत-भूमि को सुरक्षित रखने की कथा है। इसका नाम है- सारागढ़ी का युद्ध। एक ऐसा युद्ध, जिसे अंग्रेजों ने तो याद रखा लेकिन अपने ही देशवासियों ने भुला दिया। आज जब इतिहास से जुड़ी फ़िल्में बन रही हैं, समय आ गया है कि हम उन सिख जांबाजों की वीरता को फिर से याद करें। आज अक्षय कुमार अभिनीत फ़िल्म ‘केसरी’ का ट्रेलर भी आया, जो इसी युद्ध पर आधारित है। फ़िल्म में अक्षय के लुक्स को लेकर पहले ही काफ़ी चर्चा हो चुकी है। आइए समझते हैं केसरी की असली कहानी।

कठिन एवं अशांत भौगोलिक परिस्थितियाँ

12 सितंबर 1897 का दिन था। दुनिया के सबसे बड़े साम्राज्यों में से एक ब्रिटिश साम्राज्य ने भारतीय राज्यों की आपसी लड़ाई का फ़ायदा उठा कर देश को पहले ही परतंत्र बना लिया था। लेकिन उस दिन कुछ ऐसा हुआ, जिसने शक्तिशाली ब्रिटिश को भी भारतीय जवानों की शौर्य गाथा गाने को मजबूर कर दिया। ब्रिटिश संसद की कार्यवाही चल रही थी लेकिन उसे अचानक बीच में ही रोक दिया गया। सारे ब्रिटिश सांसदों ने खड़े होकर उन 21 सिखों को ‘Standing Ovation’ दिया, जिन्होंने दुनिया के युद्ध इतिहास में सबसे पराक्रमी ‘Last Standing’ का उदाहरण पेश किया था।

इतिहास समझने के लिए भूगोल को समझना पड़ता है

इस युद्ध की परिस्थितियों को समझने के लिए उस क्षेत्र की भौगोलिक स्थितियाँ समझनी पड़ेंगी क्योंकि उसकी प्रासंगिकता आज भी उतनी ही है, जितनी उस समय थी। अविभाजित भारत का उत्तर-पश्चिमी प्रांत आज भी एक अशांत क्षेत्र है। पाकिस्तान में पल रहे आतंकवादी, अफ़ग़ानिस्तान स्थित आतंकी संगठन तालिबान और कश्मीर में पाकिस्तान द्वारा चलाए जा रहे आतंकी अभियान के कारण यह इलाक़ा आज भी रोज़ ख़ूनी संघर्ष का गवाह बनता है। ख़ैबर पख़्तूनख़्वा आज पाकिस्तान के 4 प्रांतों में से एक है लेकिन तब यह अविभाजित भारत का हिस्सा हुआ करता था।

अंग्रेजों ने वर्ष 1897 में उत्तर-पश्चिमी सीमा पर सूचनाओं के आदान-प्रदान के लिए एक छोटी सी चौकी स्थापित की थी। यह चौकी उस प्रान्त में स्थित दो किलों के बीच संचार का माध्यम थी। ये किले थे- गुलिस्तान और लॉकहार्ट। यह संघर्ष उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रान्त के बंजर पहाड़ों में लड़ा गया था। एक तरफ थे मुट्ठी भर सिख तो दूसरी तरफ उत्तर-पश्चिमी भारत के हिन्दुकुश पर्वत निवासी अफ़ग़ानी जनजातीय कबीले थे। इनकी संख्या हज़ारों में थी। ये कबीले सदियों से युद्धरत थे और ख़ूनी भी।

सारागढ़ी दोनों किलों के बीच स्थित था। इन किलों को सिख इतिहास के सबसे पराक्रमी एवं सफल योद्धाओं में से एक- रणजीत सिंह द्वारा बनवाया गया था। इस क्षेत्र में अफ़रीदी व ओरकज़ई जनजातीय समूहों ने ब्रिटिश साम्राज्य के विस्तार का विरोध शुरू कर दिया था। 1897 के सितंबर महीने में इन दोनों ही किलों पर हमले किए गए। कर्नल जॉन हॉटन के आदेशानुसार 36वें सिख (36th Sikh infantry) को यहाँ तैनात किया गया था।

Bravest Battle: केसरी का पोस्टर

सारागढ़ी की चौकी एक दुर्गम स्थान पर स्थित थी। पथरीली पहाड़ी पर स्थापित की गई इस चौकी की सुरक्षा की व्यवस्था भी की गई थी। यहाँ पर दोनों किलों में संकेतों के आदान-प्रदान के लिए एक टावर भी था। रात को प्रकाश के माध्यम से संकेत दिए जाते थे।

ख़ूनी इस्लामिक कबीलों का हमला और युद्ध की शुरुआत

1897 के दिन कबाइलियों ने लॉकहार्ट और सारागढ़ी में डेरा डाल दिया ताकि दोनों के बीच के संपर्क को भंग कर सेना की आवाजाही रोकी जा सके। कबाइलियों ने उचित समय देख कर हमला बोल दिया। जैसा कि इस्लामी आक्रांताओं का इतिहास रहा है, उन्हें न युद्ध के नियम की परवाह होती थी और न ही वे मानवीय तौर-तरीकों में विश्वास रखते थे। इसीलिए, उनसे इन किलों को बचाना ज़रूरी था। अगर वे इन किलों में घुसने में सफल हो जाते तो पूरे इलाक़े को तबाह कर सकते थे। यही नहीं, अपने इतिहास के अनुरूप वे इन किलों को आग के हवाले भी कर सकते थे।

बहादुर सिख जिनकी गाथा हमें याद रखनी चाहिए

10,000 के आसपास कबाइलियों ने सारागढ़ी में युद्ध की शुरुआत कर दी। सेपॉय गुरुमुख सिंह ने हॉटन को इसकी जानकारी दी लेकिन उधर से जो जवाब आया, वह निराशाजनक था। हॉटन ने कहा कि वह तुरंत किसी भी प्रकार की मदद भेजने में असमर्थ हैं। टुकड़ी के कमांडर हवलदार ईशर सिंह ने अंतिम साँस तक लड़ कर चौकी को बचाने का निर्णय लिया। यही सिख युद्धनीति की परम्परा थी। यही उनकी रेजिमेंट की पहचान भी थी। आज भी सिख रेजिमेंट बहादुरी की उसी मिसाल को क़ायम रखे हुए है।

दो बार सारागढ़ी की चौकी पर हमला किया गया लेकिन दोनों ही बार उसे विफल कर दिया गया। लॉकहार्ट किले से सैन्य मदद भेजने की कोशिश की गई लेकिन कबाइलियों की संख्या इतनी ज्यादा थी और वो इतनी तैयारी के साथ आए थे कि सैन्य टुकड़ी चौकी तक पहुँच भी नहीं पाई। ऐसा नहीं था कि सिखों के पास बचने के रास्ते नहीं थे। स्वयं कबाइली कमांडर गुल बादशाह ने उन्हें निकलने के लिए रास्ता देने की पेशकश की थी। ईशर सिंह को कबाइलियों ने आत्मसमर्पण कर कोहट चले जाने को कहा। उसने वचन दिया कि उनकी बात मानने के बाद वो सिखों को कोई हानि नहीं पहुँचाएँगे।

केसरी 21 मार्च को रिलीज़ होने वाली है

लेकिन, सिख पीछे हटने वालों में से न थे। ब्रिटिश-भारतीय रेजिमेंट की उस टुकड़ी को ‘36 सिख‘ के नाम से जाना जाता था। इन्हें बाद में 11वें सिख रेजिमेंट की चौथी बटालियन बना दिया गया। आज़ादी के बाद ये भारतीय सेना का हिस्सा बने। रेजिमेंट के वीर जवानों को ब्रिटिश आर्मी आज भी याद करती है।

वो युद्ध जिसे भारतीयों ने ही भुला दिया

ईशर सिंह ने पहाड़ी से नीचे उतर कर दुश्मनों से लड़ने का निर्णय लिया। उन्हें पता था कि हज़ारों कबाइलियों के सामने पत्थर और मिट्टी की दीवारों एवं लकड़ी के दरवाज़ों की कोई औकात नहीं है। उनके नीचे उतरने के फ़ैसले के पीछे सिर्फ़ वीरता, शौर्य और साहस ही नहीं था बल्कि रणनीति भी थी। उन्हें पता था कि वो इस युद्ध को जीत नहीं पाएँगे। संख्या बल में मुट्ठी भर सिखों की योजना थी- किसी तरह उन दरिंदों को रोके रखना। सिख जानते थे कि अगर वे कुछ देर भी दुश्मन का सामना करने में क़ामयाब हो गए तो वहाँ सैन्य मदद पहुँचने तक अफ़ग़ानों को रोका जा सकता है।

सिखों के नीचे उतरते ही दुश्मन भी एक पल के लिए काँप गया। उन्हें तो विश्वास ही नहीं हुआ कि 21 लोग 10,000 दुश्मनों का सामना करने के लिए उन पर निर्भयतापूर्वक टूट पड़ेंगे। भगवान सिंह इस युद्ध में वीरगति को प्राप्त होने वाले पहले सैनिक बने। नाइक लाल सिंह और सेपॉय जीवा सिंह ने उनके पार्थिव शरीर को किसी तरह दुश्मनों के चंगुल से बचा कर पोस्ट के अंदर ले जाकर रखा। कबाइलियों के लगातार हमले विफल होते गए लेकिन अंततः उन्होंने दीवार पार करने में सफलता पा ली।

सारागढ़ी मेमोरियल गुरुद्वारा

सिखों के हथियार ख़त्म हुए जा रहे थे लेकिन उनके जज़्बे का कोई तोड़ न था। हवलदार ईशर सिंह ने असीम वीरता का परिचय देते हुए अपने सैनिकों को अंदर जाने का आदेश दिया और स्वयं बाहर आकर अफ़ग़ानों से लड़ने लगे। लेकिन, बाकी सिखों को यह गवारा न था। वो सभी अफ़ग़ानों पर बाज की तरह टूट पड़े और इस तरह से एक-एक कर सिख सैनिकों ने मातृभूमि की रक्षा के लिए बलिदान दिया। सिपाही गुरुमुख सिंह चौकी से ही बटालियन के मुख्य कार्यालय को इस भीषण युद्ध की पल-पल की जानकारी देते रहे। उन्हें अपनी सुरक्षा की चिंता नहीं थी। चिंता थी तो बस किले को बचाने की।

जो बोले सो निहाल… सत श्री अकाल…

हथियार ख़त्म हो चुके थे। ताक़त जवाब दे रही थी। लेकिन, साहस अभी भी कम नहीं हुआ था। हथियारों के जवाब देने पर मल्ल्युद्ध का सहारा लिया गया। वाहेगुरु का नाम लेकर भारतीय सैनिकों ने हाथ से युद्ध करना शुरू कर दिया। लेकिन संख्या और हथियार- दोनों मामलों में सिखों व अफ़ग़ानों में ज़मीन-आसमान का अंतर था।

जब युद्ध अपनी चरम सीमा पर पहुँच गया, तब गुरुमुख सिंह ने मुख्यालय से युद्ध में जाने की आज्ञा माँगी। मुख्यालय से आदेश मिलते ही उन्होंने संकेत देने वाले हैलियोग्रफिक यंत्रों को बैग में बंद कर संगीनों को चढ़ाना शुरू कर दिया। उनके अलावा बाकी सारे सिख जवान वीरगति को प्राप्त हो चुके थे। मातृभूमि की रक्षा करते और अपना फर्ज़ निभाते हुए वीरगति को प्राप्त सिखों ने एक ऐसी अमर गाथा लिख दी थी, जिसे हर एक भारतीय के मुख पर होना चाहिए था। लेकिन, दुर्भाग्य से ऐसा न हो सका। हाँ, तो हम युद्ध की बात कर रहे थे। सारागढ़ी के युद्ध का अंतिम क्षण। वो क्लाइमेक्स जो आप फ़िल्म में देख कर अभिभूत हो जाएँगे। वो दृश्य शायद आपकी आँखों में आँसू ला दे।

युद्ध को दर्शाती एक पेंटिंग

जब अफ़ग़ानों को अपनी विजय का एहसास होना शुरू हुआ, तभी चौकी ‘वाहेगुरु जी दा खालसा, वाहेगुरु जी दी फ़तेह’ के नारों से गूँज उठी। यह बुलंद आवाज गुरुमुख की थी। मानों रणजीत सिंह स्वयं युद्ध में प्रकट हो गए हों। ऊँचे टावर से हमला कर एक अकेले गुरुमुख ने हज़ारों दुश्मन को थर्रा दिया। देखते ही देखते उन्होंने 20 अफ़ग़ानों को मार गिराया। गुरुमुख को मारने के लिए पूरे पोस्ट को जला दिया गया। चौकी को आग के हवाले कर दिया गया और उसी आग में समा गया उस युद्ध का अंतिम सिख योद्धा।

जरा याद करो क़ुर्बानी

ब्रिटेन ने आज भी इस युद्ध से जुड़े दस्तावेजों को सहेज कर रखा है। सारे सैनिकों को मरणोपरांत ‘इंडियन ऑर्डर ऑफ मेरिट’ दिया गया। यह आज के परमवीर चक्र के बराबर था। यह सैन्य इतिहास की एक अनोखी घटना है क्योंकि एक साथ इतने सैनिकों को ये सम्मान मिलने का और कोई अन्य उदाहरण कहीं भी नहीं है। इस युद्ध को फ्रांस के कई पाठ्य पुस्तकों में शामिल किया गया। मात्र 21 सिखों ने क़रीब 200 दुश्मनों को मार गिराया था, कइयों को घायल किया था।

केसरी फ़िल्म की झलकियाँ (साभार: धर्मा प्रोडक्शंस)

दुश्मन को इतनी भारी क्षति की उम्मीद सपने में भी नहीं थी। कुछ लोगों ने इस युद्ध को अंग्रेजों के लिए लड़ा गया युद्ध बताया लेकिन यह वाहेगुरु और देश का नाम लेकर लड़ रहे उन सिखों का अपमान होगा। उन्होंने देश की सुरक्षा करते हुए जान दी थी, सिख विरासत को बचाने के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर किया था। अगर वे सिर्फ़ ब्रिटिश के लिए लड़ रहे होते तो आत्मसमर्पण कर के अपनी जान बचा सकते थे।

12 सितंबर को ‘सारागढ़ी दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। महारानी विक्टोरिया ने भी इन जवानों की प्रशंसा की है। पंजाब के फ़िरोज़पुर में जनता ने धन इकठ्ठा कर इन वीरों की समाधि बनवाई है। इस कार्य के लिए महारानी विक्टोरिया ने भी धन उपलब्ध कराया था। वीरगति को प्राप्त होने वाले अधिकतर जवान फ़िरोज़पुर के ही थे। इसीलिए, यहीं पर स्मारक बनाने का निर्णय लिया गया। इस युद्ध का प्रभाव इतना था कि चीन से लड़ाई के दौरान भी सिख बटालियन के कमांडर ने अपने सन्देश में कहा था कि उन्हें सारागढ़ी का इतिहास दोहराना है।

References:

  1. Bharatiya Sena Ke Shoorveer By Maj Gen Shubhi Sood
  2. Kargil War 1999 By L.N. Subramanian

Thank You सुरक्षाबल – आपके बच्चों को परीक्षा सेंटर में बदलाव की छूट: CBSE का अनोखा धन्यवाद

केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) ने सैनिक व अर्धसैनिक बलों के जवानों के बच्चों को राहत देते हुए उन्हें अपने परीक्षा केंद्र बदलने की छूट दी है। सीबीएसई ने एक नोटिस जारी कर इस बाबत जानकारी दी। सीबीएसई की आधिकारिक वेबसाइट पर जारी नोटिस में कहा गया है कि आतंकवाद, वामपंथी कट्टरवाद इत्यादि से लड़ने वाले सशस्त्र बलों, सेना व अर्धसैनिक बलों के जवानों के बच्चों को कुछ राहत दी जाएगी। जो जवान अपना कर्त्तव्य निभाते हुए मातृभूमि के लिए वीरगति को प्राप्त हो गए, उनके बच्चों को भी ये छूट दी जाएँगी। इन बच्चों को निम्नलिखित रियायतें दी जाएँगी:

  1. वर्ग 10वीं व 12वीं की फाइनल परीक्षा में शामिल होने वाले विद्यार्थी अगर समान शहर में अपने परीक्षा केंद्र में बदलाव करना चाहते हैं, तो वे ऐसा कर सकते हैं।
  2. वर्ग 10वीं व 12वीं की फाइनल परीक्षा में शामिल होने वाले विद्यार्थी अगर किसी अन्य शहर में अपने परीक्षा केंद्र में बदलाव करना चाहते हैं, तो वे ऐसा कर सकते हैं।
  3. अगर उन्होंने किसी कारणवश अपनी प्रैक्टिकल परीक्षाएँ नहीं दी हैं तो उनके लिए 10 अप्रैल तक उनके स्कूल में ही ये परीक्षाएँ आयोजित की जाएँगी।
  4. अगर वे दिए गए विषयों की परीक्षा बाद में देना चाहते हैं, तो वो ऐसा कर सकते हैं।
CBSE द्वारा जवानों के बच्चों को दी गई राहत

सीबीएसई के इस सर्कुलर में कहा गया है कि अभ्यर्थी अगर इन सुविधाओं का लाभ लेना चाहते हैं तो उन्हें इसके लिए अपने स्कूल से निवेदन करना होगा। इसके बाद स्कूल उस रिक्वेस्ट को सम्बंधित क्षेत्रीय अधिकारी के पास भेजेगा। इसके लिए 28 अप्रैल, 2019 तक की समय-सीमा तय की गई है ताकि समय रहते सीबीएसई द्वारा कार्यवाही की जा सके।

शाह फ़ैसल सहित 160 J&K नेताओं की सुरक्षा खत्म: 100 गाड़ी, 1000 से ज्यादा सुरक्षाबल पर करोड़ों की बचत

सरकार ने बड़ा निर्णय लेते हुए 18 हुर्रियत नेताओं व 160 से भी अधिक अन्य कश्मीरी नेताओं की सुरक्षा वापस ले ली है। इस से पहले सरकार ने कड़ा क़दम उठाते हुए 4 प्रमुख हुर्रियत नेताओं की सुरक्षा वापस ले ली थी। पुलवामा हमले के तुरंत बाद यह निर्णय लिया गया था। बुधवार को हुई ताज़ा कार्रवाई के बाद अब सभी 22 अलगाववादियों की सुरक्षा वापस हो गई है। जिन अलगाववादियों की सुरक्षा वापस ली गई है, उनमे से कुछ के नाम एसएएस गिलानी, अगा सैयद मौसवी, मौलवी अब्बास अंसारी, यासीन मलिक और सलीम गिलानी हैं।

इन अलगाववादियों व अन्य कश्मीरी नेताओं की सुरक्षा में 100 से भी अधिक गाड़ियाँ व हज़ार से अधिक सुरक्षाकर्मी लगे थे। हुर्रियत ने सरकार द्वारा सुरक्षा वापस लेने पर टिप्पणी करते हुए कहा कि उसने कभी सुरक्षा की माँग ही नहीं की थी। जम्मू में गृह विभाग की बैठक में लिए गए इस निर्णय के बाद अब इन अलगाववादियों व कश्मीरी नेताओं की सुरक्षा पर ख़र्च होने वाले करोड़ों रुपयों की बचत होगी।

बैठक की अध्यक्षता राज्यपाल के सलाहकार विजय कुमार ने की। इस उच्च स्तरीय बैठक में मुख्य सचिव, जिला प्रशासन और गृह विभाग के कई अधिकारी उपस्थित रहे। हुर्रियत ने कहा है कि सुरक्षा वापस लेने से ज़मीनी स्तर पर कोई बदलाव नहीं आएगा। साथ ही उन्होंने अपने रुख में बदलाव करने से भी साफ़ इनकार कर दिया। हुर्रियत ने अपने बयान में कहा कि उन्होंने कई बार स्वयं ही सुरक्षा वापस करने की पेशकश की थी। हुर्रियत ने कहा कि सरकार द्वारा सुरक्षा इसीलिए दी गई थी ताकि हुर्रियत नेताओं की गतिविधियों पर नज़र रखी जा सके।

राजनीतिक पार्टियों के जिन नेताओं की सुरक्षा वापस ली गई है, उनमे पूर्व IAS शाह फ़ैसल भी शामिल है। सरकार ने यह भी साफ़ कर दिया है कि अब किसी भी अलगाववादी को भविष्य में सुरक्षा प्रदान नहीं की जाएगी। साथ ही, इन्हें मिल रही अन्य सुविधाएँ भी छीन ली जाएँगी। केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह पुलवामा हमले के बाद जब कश्मीर दौरे पर गए थे, तभी उन्होंने अलगाववादियों की सुरक्षा हटाने के संकेत दिए थे। उन्होंने कहा था कि पाकिस्तान और आईएसआई के पैसों से पोषित कुछ लोगों की दी गई सुरक्षा छीन ली जाएगी। उन्होंने बिना नाम लिए इन अलगाववादियों के आईएसआईएस व अन्य आतंकी संगठनों से संपर्क होने की बात भी कही थी।

फैक्ट चेक: राष्ट्रीय सुरक्षा पर NDA सरकार के ट्रैक रिकॉर्ड के बारे में आपटार्डों के पेज का फर्ज़ीवाड़ा

पुलवामा आतंकी हमले के बाद एक तरफ़ जहाँ पूरा राष्ट्र भारतीय सुरक्षा बलों और शहीद हुए लोगों के परिवार के समर्थन में एक साथ आगे आया, वहीं भारतीय राजनीति और तथाकथित उदारवादी वर्ग के कुछ वर्गों द्वारा पूरे मामले का राजनीतिकरण करने का हर संभव प्रयास किया गया।

उस पर भी विडम्बना ये कि कुछ यह भी आरोप लगाने से नहीं चूके कि भारत सरकार ने राजनीतिक लाभ पाने के लिए हमारे ही सैनिकों की हत्या की साजिश रची, दूसरों ने कश्मीर में जनमत संग्रह कराने का भी आह्वान कर डाला।

अब, सोशल मीडिया पर एक आम आदमी समर्थक पेज द्वारा एक तस्वीर सर्कुलेट की जा रही है। उसमें जानबूझकर फर्ज़ी आंकड़ों से एनडीए सरकार के दौरान नेशनल सिक्योरिटी पर झूठे दावे किये जा रहे हैं।

तस्वीर में दावा किया गया है कि यूपीए के दूसरे कार्यकाल के दौरान 109 आतंकवादी हमले हुए, जिसमें 139 जवान बलिदान हुए, 12 नागरिक मारे गए और 563 संघर्ष विराम उल्लंघन हुए, जबकि एनडीए सरकार के लिए समान संख्या 626, 483, 210 और 5596 हैं। तस्वीर में आम आदमी समर्थक पेज़ का दावा है कि यह डेटा दक्षिण एशिया आतंकवाद पोर्टल (SATP) से लिया गया है।

हालाँकि, अगर हम जम्मू और कश्मीर में SATP वेबसाइट के आँकड़ों को देखें तो UPA के दूसरे कार्यकाल में 146 नागरिक हताहत हुए थे। एनडीए के तहत, अब तक 205 नागरिक हताहत हुए हैं। UPA-II के दौरान सुरक्षा बलों में हताहतों की संख्या 242 थी जबकि NDA सरकार के दौरान 346 थी। यह सच है कि पिछली सरकार की तुलना में एनडीए शासन के दौरान अधिक जवान बलिदान हुए हैं। लेकिन पूरा सच ये भी है कि इस दौरान अधिक आतंकवादियों को भी समाप्त कर दिया गया है। UPA-II के दौरान यह आँकड़ा जहाँ 752 थी वहीं NDA शासन के दौरान यह 859 थी। यह डेटा 3 फरवरी, 2019 तक का है, इसलिए इसमें पुलवामा टेरर अटैक के हताहतों और आतंकवाद विरोधी हमलों में शामिल बलिदानियों को शामिल नहीं किया गया है।

संघर्ष विराम उल्लंघन के रूप में, LOC पर 2009-2014 के बीच 335 उल्लंघन हुए। और 2015-2018 के बीच 576। दिए गए आँकड़ों से, यह स्पष्ट है कि नरेंद्र मोदी सरकार के दौरान अधिक संघर्ष विराम उल्लंघन हुए हैं।  फिर भी यह संख्या तस्वीर में उल्लिखित सँख्या के आस-पास भी नहीं हैं।

यह स्पष्ट नहीं है कि आतंकी हमलों की संख्या कहाँ से प्राप्त हुई क्योंकि हमें SATP वेबसाइट पर ऐसा कोई आँकड़ा नहीं मिला। स्पष्ट है कि केवल झूठ फ़ैलाने के लिए ऐसे ही एक बड़ी संख्या चुनी गई ताकि सुरक्षा के मामले में NDA को कमज़ोर साबित किया जा सके।

निष्कर्ष बिल्कुल स्पष्ट है, जब आतंकवादियों को ख़त्म करने की बात आती है तो एनडीए का रिकॉर्ड यूपीए के दूसरे कार्यकाल से बेहतर रहा है। हालाँकि, अधिक सुरक्षाकर्मी बलिदान हुए हैं, लेकिन इसका कारण भारतीय सेना द्वारा किए गए आतंकवाद विरोधी अभियानों की अधिक संख्या भी हो सकता है। संसद में स्पष्ट बहुमत वाली सरकार के कार्यकाल के दौरान भारत को अस्थिर करने की पाकिस्तान की इच्छा भी इतनी ज़्यादा संघर्ष विराम उल्लंघन की वजह है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि तस्वीर में सर्कुलेट किए जा रहे आँकड़ों में केंद्र सरकार द्वारा वामपंथी उग्रवाद को समाप्त करने के लिए उठाए गए कदमों को शामिल नहीं किया गया है। जबकि तथ्य ये है कि नरेंद्र मोदी सरकार की नक्सल आतंकवादियों पर कठोर कार्रवाई के कारण, निकट भविष्य में देश में माओवादी हिंसा के अंत की कल्पना करना बहुत आसान हो गया है।

इतना अफ़सोस है तो 40 को सौंप दीजिए पब्लिक में मारने के लिए: मुफ़्ती से JNU प्रोफ़ेसर

घाटी के बाहर कश्मीरियों के ख़िलाफ़ हमलों और “सांप्रदायिक घृणा” के ख़बरों के बीच, पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) ने अब जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर के ख़िलाफ़ “मनगढ़ंत कहानियाँ और हास्यास्पद आरोप” लगाने के लिए कार्रवाई की माँग की है।

पुलवामा मामले पर JNU की लॉ गवर्नेंस एवं आपदा अध्ययन की प्रोफ़ेसर अमिता सिंह ने महबूबा मुफ़्ती को ट्वीट करते हुए कहा कि यदि पुलवामा पर उनको ज़्यादा अफ़सोस है तो वो अपने 40 लोग सार्वजानिक तौर पर मारने के लिए दे सकती हैं।

इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, अमिता सिंह ने अपने बयान में ये भी कहा कि महबूबा मुफ़्ती के आदेश पर तीन चेकिंग बैरियर हटाए गए थे जिससे RDX लिए वह आतंकी पकड़ में नहीं आ सका और इतना बड़ा हमला करने में सफल रहा। अमिता सिंह के बयान पर महबूबा मुफ़्ती का कहना है कि वह उन पर केस करेंगी।

पीडीपी ने ट्वीट किया, “JNU को प्रोफ़ेसर महबूबा मुफ़्ती पर मनगढंत कहानियाँ और बेबुनियाद आरोप लगा रही हैं और 40 लोगों के सार्वजानिक फाँसी की माँग कर रही हैं। हम इसकी कड़ी निंदा करते हैं। दिल्ली पुलिस को यह मामला संज्ञान में लेना चाहिए।”

जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि शिक्षा देने वाला कोई शख़्स ऐसा कैसे हो सकता है? अगर वह वाकई शिक्षित हैं तो? या फिर जानबूझकर कश्मीरियों को कष्ट पहुँचाना चाहती हैं। विडंबना यह है कि वह लॉ गवर्नेंस की अध्यापिका हैं।

फ़ेक न्यूज़ तलाशने के लिए एलियंस के व्हाट्सएप्प ग्रुप से जुड़े पतित सिन्हा, UNESCO ने दिया बेस्ट खोजी का अवार्ड

दुकान चलाने के लिए तरह-तरह के फ़ेक न्यूज़ वाले व्हाट्सएप्प ग्रुप से ‘प्लीज़ ऐड मी’ रिक्वेस्ट भेजकर सर्वाधिक व्हाट्सएप्प ग्रुप्स से जुड़ने का विश्व रिकॉर्ड बनाने के लिए कुख़्यात फ़ॉल्ट न्यूज़ के सहसंस्थापक पतित सिन्हा ने आज अपने ज़ज़्बे को एक नई ऊँचाई दे डाली। फ़ॉल्ट न्यूज़ के सूत्रों के अनुसार ‘व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी’ ने पतित सिन्हा को इस ऐतिहासिक उपलब्धि के लिए सभी व्हाट्सएप्प ग्रुप्स का मॉनिटर और WR (व्हाट्सएप्प रेप्रेज़ेंटेटिव) की उपाधि देने का ऐलान कर दिया है। इस बात पर नम आँखों से पतित सिन्हा ने कहा कि वो बचपन से ही WR बनना चाहते थे।

सिर्फ सूँघकर ही ख़बरों को झूठी बना देने का दावा करने वाले ‘फ़ेक न्यूज़ के चितेरे’ पतित सिन्हा ने उस वक़्त सबको चौंका दिया जब दुकान चलाने के लिए व्हाट्सएप्प ग्रुप्स से जुड़ने के उनके इस जज्बे ने उन्हें एलियन्स के रिश्तेदारों के व्हाट्सएप्प ग्रुप से जोड़ दिया। इस पर उन्होंने कहा, “मैं अकेले ही चला था व्हाट्सएप्प-ए-यूनिवर्सिटी मगर, भगत साथ आते गए, मैं एलियन्स से जुड़ता रहा।”

इस घटना से जहाँ एक ओर चटपटी ख़बरों के शौक़ीन फ़ॉल्ट न्यूज़ की भगत मंडली में उत्साह की लहर है, वहीं UNESCO ने पतित सिन्हा को इस बड़ी क़ामयाबी के लिए ने उन्हें पृथ्वी ग्रह की ‘धरोहर’ घोषित कर दिया है। साथ ही नींद में भी ‘वायरल’ शब्द बड़बड़ाने पर UNESCO ने पतित सिन्हा को ‘वायरल’ शब्द को परिभाषित करने के लिए भी प्रेरित किया है।

जैसा कि पृथ्वी निवासी जानते हैं कि फ़ॉल्ट न्यूज़ वालों के लिए ‘वायरल’ शब्द की सही व्याख्या करना एक दुरूह कार्य रहा है। ज्ञात हो कि कभी-कभी पतित सिन्हा की टीम पर खुद ही केन्या के प्रॉक्सी सर्वर से फॉल्ट न्यूज़ के ऑफ़िस में ही फेक इमेज फोटोशॉप करने के बाद, 10-12 लोगों से जबरदस्ती शेयर कराकर उसे वायरल घोषित करने का आरोप लगता रहा है। यही नहीं इस कार्य में ज़ू के बीयर तक से पतित सिन्हा ने ‘विचारधारा के नाम पर’ टच स्क्रीन छुआ कर शेयर कराया है।

चूँकि ये सारी बातें अब वृहद् जनमानस की चर्चा का हिस्सा बन चुकी हैं तो UNESCO ने अवार्ड देते हुए पतित सिन्हा से गुज़ारिश की, “अब तो सच बोल दे… (ध्यान रहे UNESCO वैसी बात नहीं कहता जो आप पढ़ना चाह रहे हैं) …कि वायरल होना कितने लाइक और शेयर पर माना जाए।”

लेकिन यह पता चलने पर कि एलियंस के रिश्तेदारों वाले ग्रुप पर फ़ेक न्यूज़ की जगह सिर्फ़ ‘हेल्लो जी सुबह की नमस्ते’ जैसी तस्वीरें ही ‘वायरल’ हो रही हैं, पतित सिन्हा को गमगीन हालत में देखा गया।

अब ‘सुबह की नमस्ते’ वाली तस्वीरों का होगा भांडाफोड़, इस तस्वीर के फैक्ट चेक से करेंगे सिन्हा सुबह की शुरुआत

फिलहाल इस मोटिवेशनल लाइन को सुनने के बाद स्थिति नियंत्रण में है और पतित सिन्हा ने इसकी जानकारी अपने सहयोगी और भाड़े के पत्थरबाज़ ‘चिड़ियाघर के भालू’ को दे दी है। नाम न बताने की शर्त पर फ़ॉल्ट न्यूज़ के ही एक पत्रकार ने बताया कि पतित सिन्हा अभी एलियंस की कुछ ऐसी तश्वीरों के इन्तजार में हैं जिन्हें वो अपनी महिला मित्र से साझा कर के पता कर सकेंगे कि एलियंस की यह प्रजाति राष्ट्रवादी है या गैर-राष्ट्रवादी। फ़ॉल्ट न्यूज़ भगत मंडली से उन्होंने वादा किया है कि इस काम को अंजाम देने से पहले वो एलियंस के व्हाट्सएप्प ग्रुप को नहीं छोड़ेंगे। इस पर भगत मंडली ने कहा “एक ही तो दिल है सिन्हा जी, कितनी बार जीतोगे?”

‘लायर’ के श्रीयुत वेणु जी, जैसा कि माओवंशी कहा करते हैं, ‘थोड़ा पढ़िए मुद्दे पर’, घाघपना तो चलता रहेगा

श्रीयुत वेणु जी एक बहुत बड़े पत्रकार माने जाते हैं। उम्र ज़्यादा है, तो अनुभव भी उसी हिसाब से होगा, ऐसा माना जाता है। लेकिन अनुभव के साथ-साथ घाघपन भी उसी अनुपात में आ जाता है क्योंकि तब आप बहुत कुछ जानकर, उस स्थिति में आ जाते हैं कि अपनी बुद्धि का प्रयोग बातों को बताने, छुपाने और मरोड़ने में लगा देते हैं। 

श्रीयुत वेणु जी ने अपने लेटेस्ट आर्टिकल की हेडलाइन ही इतनी मारक दे दी है कि ‘द लायर’ जैसे स्थापित प्रोपेगेंडा पोर्टल पर लाखों में शेयरिंग हो जाती, लेकिन विष की मात्रा कम रहने से 882 तक ही पहुँच पाई। ख़ैर, नंबर से क्या लेना-देना, क्वालिटी और तर्क भी कुछ चीज होते हैं। तो, हेडलाइन है कि आने वाले लोकसभा चुनावों में कश्मीर मुद्दा (पढ़ें पुलवामा आतंकी हमला) पूरी तरह से पोलिटिसाइज किया जाएगा। 

वेणु जी के हेडलाइन से आपको लगेगा कि आदमी जादूगर भी है जो भविष्य देख लेता है। न, न, आप इसे विश्लेषण मत कहिए, क्योंकि ये विश्लेषण नहीं विकृत मानसिकता और अंधविरोध में सना विषवमन मात्र है, जिसका एक मात्र उद्देश्य यह बताना है कि मोदी कितना गिरा हुआ आदमी है कि बलिदानों को चुनावों में भुनाएगा। 

श्रीयुत वेणु के दूसरे पैराग्राफ़ में घाघपने की बदबू आ जाती है जब वो लिखते हैं कि प्रधानमंत्री ने ‘संघ परिवार के संगठनों (बजरंग दल) द्वारा कश्मीरी छात्रों को को धमकाने पर चुप्पी साधी हुई है। आगे लिखते हैं कि वही प्रधानमंत्री तमाम रैलियों में बहुत ही ‘कोडेड भाषा’ में पाकिस्तान से बदला लेने की बात करते हैं। उसके बाद बेचारे लिबरल वेणु का अजेंडा छलक कर बाहर आ जाता है जब वो लिखते हैं कि मोदी के इस ‘बदले’ की बात बहुसंख्यक लोगों द्वारा अपने ही देश के लोगों (कश्मीरियों) की तरफ जा रहा है। 

ऐसा है वेणु जी कि, मैं आपकी बात मान लेता अगर आपने एक-दो हाइपरलिंक लगा रखे होते अपनी बात को कहने के लिए। आप सही मायनों में एक बहुत ही निम्न स्तर के ट्रोल हैं जो 240 कैरेक्टर के पोस्ट की जगह 1500 शब्दों का लेख लिखता है। कितने बेशर्म हैं आप कि जिस बहुसंख्यक जनता पर घृणा का आरोप लगा रहे हैं, उसके नाम आपके द्वारा कथित कश्मीरी छात्रों को मारने-पीटने-धमकाने की ख़बर नहीं। अगर है, तो पता कीजिए कि वो लोग आग ताप रहे थे और उन्हें घेरकर लोगों ने मारा या फिर वो पाकिस्तान ज़िंदाबाद और पुलवामा के वीरों की श्रद्धांजलि का अपने शैतानी अट्टहास और अश्लील कमेंट्स कर रहे थे तो पुलिस ने उन पर कार्रवाई की?

आपसे नहीं हो पाएगा, क्योंकि आपके वश की बात है नहीं। आप जैसे लम्पट बुद्धिजीवियों को ये घमंड है कि आप ज़हर का अजेंडा टेबल पर बैठकर लिख देंगे, और उसे सार्वभौमिक सत्य मान लिया जाएगा। लेकिन ऐसा नहीं है। अग़र ज्ञानेन्द्रियाँ काम नहीं कर रहीं, चीज़ों का संदर्भ पता नहीं चल रहा, तो काम छोड़ दीजिए, समाज को बाँटने का अजेंडा क्यों फैला रहे हैं? 

वामपंथी चोरकट बुद्धिजीवियों की, खासकर जो अंग्रेज़ी में लिखते हैं, आदत रही है कि पूरी दुनिया बदल जाए, ये लोग ‘जॉब क्रिएशन‘ नहीं हो रहा और ‘अग्रेरियन क्राइसिस’ पर अटके रहते हैं। जबकि सच्चाई इनके फ़ैंसी फ्रेजेज से बिलकुल अलग कुछ और ही है। नौकरियाँ लगातार बढ़ी हैं, और किसानों की हालत पहले से बेहतर है। ये बात और है कि वेणु जी वायर ही पढ़ते हैं, वायर पर ही लिखते है, वायर से ही बिजली पाते हैं, और वायर से ही इस तरह के फर्जी आर्टिकल से शॉर्ट सर्किट करके आग लगाते हैं। यही कारण है कि सत्य से बहुत दूर रहते हैं क्योंकि प्रोपेगेंडा पोर्टल पर तथ्य तो कोने में छुपा रहता है। 

ये एक प्रचलित तरीक़ा है माओ को जबरदस्ती अपना बाप बनाने वाले माओवंशी कामपंथियों का कि हर बात को वो ऐसे दिखाना चाहते हैं कि ‘ये बात करते हुए मोदी फलाने बातों से ध्यान भटकाना चाहता है’। अरे चचा, मत भटकाओ अपना ध्यान, वो तो तुम्हारे क़ब्ज़े में है ना? इनकी आदत है कि ये स्टूडियो और ऑफिस में बैठकर सरकार और कैबिनेट चुनना चाहते हैं, जबकि लोकतंत्र में असली हक़ जनता का है जिसे ये लोग मूर्ख मानकर चलते हैं। 

सच तो यह है कि यही पुलवामा हमला अगर सितम्बर में हुआ होता तो ‘चुनावों का माहौल’ वेणु के आर्टिकल के हिसाब से अभी वाला ‘दो महीना’ न होकर अक्टूबर से ही शुरु हो जाता। यही ताक़त है घाघ होने की। ‘जब जागो, तभी चुनाव’ टाइप का लॉजिक लेकर हर बात भविष्य में फेंकने वाले वेणु अभी आँख पर टिन का चश्मा और कान में ढक्कन लगाकर लिख रहे हैं क्योंकि मोदी हर दिन दो से तीन जगह जा रहा है, रैलियाँ हो रही हैं, और कहीं भी ऐसी बातें नहीं कर रहा है कि कहा जाए मोदी इसे भुना रहा है।

ये वही लोग हैं जो मोदी चुप रहता तो कहते कि कहाँ है छप्पन इंच का सीना, और बदले की बात कहते हुए मोदी देशवासियों की भावना को शब्द दे रहा है तो उसमें अजेंडा नज़र आ रहा है। वामपंथी चिरकुटों की ये पुरानी आदत रही है कि चित भी मेरी, पट भी मेरी (ये कई मायनों में इस्तेमाल होता है)। लेकिन जब जनता साथ हो तो इस तरह के अजेंडा को हवा देने वालों को वहीं तर्क से काटा जा सकता है। इसलिए वेणु जी, एनालिसिस कर रहे हैं, तो फ्यूचर टेन्स में मत घूमिए, तथ्यों पर रहिए। क्या मोदी ने किसी भी भाषण में इसको दो-चार वाक्यों से ज्यादा बोला है? पहले बयान के बाद बिलकुल नहीं। इसलिए आपकी ये घृणा फैलाने का अजेंडा वाली बात बेकार ही लगती है। 

इसके बाद श्रीयुत वेणु ने ‘गाय राग’ छेड़ दिया। आतंकी अहमद डार ने विडियो में अपनी घृणा हिन्दुओं को लेकर दिखाई तो उसका कारण भी अब हिन्दू ही हो गया है! मतलब, वेणु जी के हिसाब से, “अरे वो तो आतंकी है, उसका तो काम है बम फोड़ना, लेकिन देखो तो पहले वो आज़ादी के लिए बम फोड़ता था, अब हिन्दुओं को उड़ाने के लिए फोड़ता है। तो हिन्दू ही दोषी हुआ ना?” 

जी! और फिर वही पुरानी, घिसी-पिटी, कुतर्की बातें, जिसका कोई आधार नहीं कि समुदाय विशेष की लिंचिंग हो रही है तो अब कश्मीर के आतंकी आहत हो गए हैं, इसलिए उन्होंने आज़ादी छोड़कर मुस्लिमों के खिलाफ हो रहे हमलों का बदला लिया है! मतलब, मज़हब की हिंसक बातों में जन्नत खोजता आतंकी, चाहे वो आज़ादी की बात करे या गाय की, उसकी बातों में लॉजिक ढूँढकर पुलवामा हमले को जस्टिफाय करने के लिए अलग स्तर का विष चाहिए जो कि वेणु जी के रोम-रोम में है। 

हिन्दुओं की गाय चुराकर ले जाने वाले वही हैं, हिन्दुओं की गाय को बुलंदशहर में काटने वाले वही लोग, हिन्दुओं की गाय लेकर भागते हुए पुलिस वालों पर गाड़ी चढ़ा देने वाले वही कौम, हिन्दुओं को घेर मार देने वाले वही… ये लोग क्या जो भी करें, वो गिना नहीं जाएगा? सहिष्णुता की टोपी हिन्दुओं को क्यों पहनाते हैं? इस तरह की हत्या सामाजिक अपराध है और उसके लिए अगर पुलिस कार्रवाई न करे, तब आप स्टेट को ज़िम्मेदार ठहरा सकते हैं। समुदाय विशेष वाले गौ तस्कर गाय चुराना बंद कर दें, ऐसे अपराध स्वयं ही कम हो जाएँगे। क्या पता जैसा कुतर्क ऊपर किया है चचा ने, अब ये न कह दें कि हिन्दू गाय पालते ही क्यों हैं! 

आगे श्रीयुत वेणु पूछते हैं कि जिस कश्मीर में आज़ादी की बातें हुआ करती थीं, वो अब हिन्दुओं पर क्यों शिफ्ट हो रहा है! अब ऐसे ही मौक़ों के लिए हिन्दी में ‘क्यूटाचार’ शब्द का आविष्कार मैंने किया है। ऐसा है चचा, कश्मीर में आज़ादी की बातें तो होती थी, लेकिन उसकी जड़ में वही इस्लाम है, वही ख़िलाफ़त है, क्योंकि वो आज़ाद होकर समुदाय विशेष का कश्मीर होगा न कि धर्मनिरपेक्ष कश्मीर। इसलिए, हिन्दू-मुस्लिम ही तो है जड़ में, गाय-गोबर तो अब सामने आ रहा है क्योंकि आज़ादी में अब ISIS का झंडा भी आ गया है, और साल के 250 जहन्नुम पहुँच रहे हैं। कश्मीर का मसला ही इस्लाम का मसला है वरना कश्मीरी हिन्दू भी वहीं बसे होते। जैसा कि वामपंथी अक्सर डिबेट में ज्ञान देते हैं, मैं आपसे वही कहूँगा, “थोड़ा पढ़ा कीजिए, बहुत कुछ क्लियर हो जाएगा।” 

अंत में वेणु जी का पोलिटिकल एनालिसिस इतना ज़ोरदार है कि वो भाजपा के लिए उत्तर प्रदेश के महत्व के बारे में लिखते हुए ‘प्रोबेबली द मोस्ट क्रूसियल’ का इस्तेमाल करते हैं! ये पढ़कर मुझे लगा कि जो आदमी उत्तर प्रदेश के लिए ‘प्रोबेबली’ का इस्तेमाल करता है, उसका लेख मैंने पढ़ा ही क्यों। फिर याद आया कि हमरी पत्रकारिता का एक ही मक़सद है: माओवंशी वामपंथी अजेंडाबाज़ पत्रकारिता के समुदाय विशेष के लम्पटों को एक्सपोज करना। 

बाकी, श्रीयुत वेणु जी, गोली नहीं मारेंगे…

सिर्फ और सिर्फ जिहादी हिंसा का संरक्षक है आतंकवाद

14 फरवरी के दिन पुलवामा में हुई हिंसक आतकंवादी घटना में एक नौजवान सिर्फ इसलिए फिदायिनी हमले का रास्ता चुनता है, क्योंकि उसे गो-मूत्र पीने वालों से नफरत है? एक युवक जिसके सपनों में देश के संस्थानों का हिस्सा बनकर एक समुदाय विशेष के विरुद्ध बनी विचारधारा को झूठा साबित करने का होना चाहिए था, उसे इस हद तक ब्रेनवॉश किया जाता है कि वो कुछ देर में जन्नत में होने के ख्वाब देखता है? और इसका परिणाम क्या रहा?

40 सैनिक वीरगति को प्राप्त हो गए, खुद वो नवयुवक आज 72 हूरों को पाने तथाकथित जन्नत पहुँच चुका है और अपने पीछे लाखों लोगों के लिए एक अन्धकार छोड़कर अपना रास्ता चुन चुका है। क्या उसे अब फ़र्क़ पड़ता है कि पूरे होशोहवास में लिए गए उसके एक फैसले की वजह से अपने ही धर्म विशेष के लोगों को कितनी समस्या छोड़कर वो शख्स चला गया है? स्पष्ट है कि इस फिदायिनी को जश्न मनाने तक का मौका नहीं मिला, जबकि उसे इस आत्मघाती काम के लिए उकसाने वाले भारतीय सैनिकों की इस क्रूर हत्या पर जश्न मना रहे हैं। लेकिन फिर भी हालात ये हैं कि बुराई को स्वीकार करने के बजाय उसे तुरंत नकार दिया जाता है।

एक घटना मात्र इस देश की सभ्यता और संस्कृति के समीकरण को उधेड़कर रख देती है। डिप्लोमेटिक होकर कहने वाले कुछ भी कहें लेकिन हक़ीक़त ये है कि हर व्यक्ति अपने साथ वाले समुदाय विशेष के मित्र, कर्मचारी, सहयोगी को शंका की नजर से देखना शुरू कर देगा। आतंकवाद को आतंकवाद न कह पाने की हमारी झिझक का ही परिणाम है कि आज निर्दोष कश्मीरी विद्यार्थी भी पत्थरबाज़ों की श्रेणी में गिने जाने लगे हैं।

आप बात समझिए, ये आतंकवाद के पोषक किसी दबे, कुचले, शोषित और वंचित की लड़ाई नहीं लड़ रहे हैं। ये लड़ाई वही है जो आगाज के समय थी। तब शायद आक्रामकता और रक्तपात अलोकतांत्रिक और गैर संवेदनशील न माने जाते रहे हों। हालाँकि, किसी भी प्रकार का रक्तपात और बर्बरता किसी भी दौर में न्यायपूर्ण बताना मूर्खता से अधिक कुछ नहीं।

भारत देश में अंग्रेजों की गुलामी के अन्धकार के युग के दौरान तरह-तरह के समाज सुधार और धार्मिक सुधार आंदोलनों ने जन्म लिया। इस पुनर्जागरण से तत्कालीन युवा चिंतनशील और तत्पर हो उठा। तरुण और वृद्ध, सभी इस मसले पर सोचने के लिए मजबूर हुए। लगभग सभी लोगों ने धर्म, परंपराओं और रीति-रिवाजों को तर्क की कसौटी पर कसना आरम्भ किया। उस दौरान प्रचलित वाक्य थे कि ‘पुनर्जागरण के बिना कोई भी धर्म सम्भव नहीं हो पाएगा’।

ऐसे में हिन्दूओं के आर्य समाज, ब्रह्म समाज ने तत्परतापूर्वक कुरीतियों के खिलाफ आंदोलन चलाए और धर्म में आवश्यक परिवर्तन कर, समाज के एक हिस्से को मजबूत नींव प्रदान की। वहीं हिंदुओं के धार्मिक सुधार और मुस्लिमों के अहमदिया और अलीगढ़ जैसे आंदोलन को आकार लेने में अन्य समुदायों की तुलना में अधिक समय लगा, जिसे एक बड़ी वजह माना जाता है कि मुस्लिम समुदाय शिक्षा और अन्य सामाजिक स्तरों पर पिछड़ गए और यही अंतराल आज तक चला आ रहा है। लेकिन वर्तमान में यदि इस प्रकार के उदाहरण देकर स्वयं को संतुष्ट करने का प्रयास कोई करता है, तो वह स्वयं से किया गया एक छलावा मात्र है।

यह युग विज्ञान और तकनीक का है, और ऐसे में हर हाल में धार्मिक शिक्षा का एक तार्किक युवा के निर्माण में बहुत कम प्रतिशत योगदान होगा। वर्तमान समय के साथ कदम मिलाने के लिए यह धर्म विशेष खुद कितना तैयार है इस पर आत्मविश्लेषण किया जाना चाहिए। लेकिन शायद ‘मालिक’ के स्मरण में ही रोजाना लोग इतना वक़्त बिता देते हैं कि आत्मविश्लेषण का समय नहीं मिल पाता है।

इस्लाम, धर्म और राजनीति का एक बेहतरीन केंद्र ऐसे समय में बनकर उभरा था, जब राजनीति और धर्म को एक ही परिधि में बिठाने की जद्दोजहद में समाज आडम्बर और द्वेष में जी रहा था। यह धर्म प्राकृतिक रूप से एक अच्छा विकल्प बनकर उभरा था, लेकिन इसकी सबसे बड़ी कमजोरी इसकी समय के साथ कदम ना मिलाने की कट्टरता है।

21वीं सदी में समाज दौड़ रहा है, परिस्थितियाँ तेजी से बदल रही हैं। हम संस्कृति और सभ्यता के उसूलों पर गर्व कर सकते हैं, लेकिन इसके आधार पर अपनी शिक्षा व्यवस्था से लेकर रहन-सहन में बदलाव को नकार दें, तो यह बात अतार्किक नजर आती है।

आप सोचिए, खुद को सुरक्षित और श्रेष्ठ साबित करने की इस लड़ाई के लिए आतंकवाद, बर्बरता और भय पैदा करने की ये नीति आखिरकार किन लोगों के लिए घातक साबित होती है?
स्पष्ट है, ये आतंकवाद सिर्फ वंचितों को ही प्रभावित करता है और हर कायरतापूर्ण घटना के बाद समाज में उनकी स्थिति को और कमजोर कर देता है ना कि आतंकवाद के प्रायोजकों को।

4 दोस्तों के समूह में 1 के समुदाय विशेष से होने से तब तक फ़र्क़ नहीं पड़ता है, जब तक धर्म के नाम पर की गई ऐसी कोई कोई ऐसी कायराना हरकत सामने नहीं आती है। नतीजा यह होता है कि अगले दिन हमारे मजहबी भाई वर्कप्लेस पर आने में संकोच महसूस करते हैं, दोस्तों के फ़ोन रिसीव करने में खुद को लज्जित महसूस करते हैं। सिर्फ उसी एक धर्म से जुड़े होने के कारण सोशल मीडिया पर लोगों को आतंकवादियों के कृत्य के लिए स्पष्टीकरण देते हुए देखना सबसे ज्यादा दुखद रहा है, जबकि हर कोई जानता है कि बारूद का ट्रक लेकर हिन्दुओं को सबक सीखने के मकसद से जिहाद करने वो लोग नहीं गए थे।

लेकिन शहीदों के शव देखने से ज्यादा दुखद घटना यह भी थी कि कुछ समुदाय विशेष के लोग ही सोशल मीडिया से लेकर तमाम जगहों पर जश्न मनाते देखे गए। हैरानी की बात यह थी कि ये लोग कोई विदेशी नहीं बल्कि इसी देश की सीमाओं के भीतर रहने वाले लोग हैं। ये इसी देश के संसाधनों का उपयोग करते हैं, यहीं के विद्यालयों में पढ़ते हैं, सरकार इन्हें अस्पताल से लेकर घर तक की सुविधाएँ देने के लिए लगातार प्रयासरत है, फिर भी 40 सैनिकों की निर्मम हत्या पर धार्मिक कारणों से संवेदनशीलता को नजरअंदाज करने से नहीं रुकते। विचार कीजिए कि क्या आपको ऐसे अवसरों पर स्वयं आगे आकर धर्म के नाम पर हो रहे इन कुकर्मों के ख़िलाफ़ आवाज नहीं उठानी चाहिए?

समुदाय विशेष से कुछ गिने-चुने ही ऐसे थे, जो सोशल मीडिया पर कुरीतियों और बुराइयों को स्वीकार कर उनका विरोध करते थे। लेकिन हालात ये हैं कि उनके एकाउंट को रिपोर्ट कर डिलीट करवा दिया गया। उनकी अभिव्यक्ति की आजादी ही छीन ली गई, सिर्फ इसलिए कि वो सुधार की बात करते हैं?

हिंसा और आतंकवाद, सहिष्णुता और साम्प्रदायिकता की खाई को बढ़ावा ही देता है। किसी भी उद्देश्य के लिए की गई क्रूरता किसी भी समय में निंदनीय है। हमें विचारधारा की लड़ाई के लिए पोषित किए जाने वाली इस संस्कृति के खिलाफ आवाज उठानी तो होगी। ठीक उसी तरह, जैसे एक महिला की समस्याओं और उनके अधिकारों के लिए एक महिला द्वारा चलाया गया अभियान अधिक प्रभावशाली होता है और आज नहीं तो कल वह अभियान सफल हो जाता है। ठीक उसी प्रकार धर्म के नाम पर उपज रही इस भय और आतंकवाद की क्रूरता के विरोध में उन्ही लोगों को आगे आना होगा, जो इससे सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले हैं और होते आए हैं।

पढ़ाई के उद्देश्य से घर से बाहर निकले निर्दोष कश्मीरी युवाओं को कश्मीर घाटी जाकर आतंकवाद के लिए उकसाने वाले गुटों को स्पष्ट सन्देश देना चाहिए कि वो बन्दूक और पत्थर नहीं बल्कि किताबें उठाना चाहते हैं। उन्हें बताना होगा कि ज़न्नत से पहले उन्हें इस धरती पर मानवता के लिए किए जाने वाले कार्यों से जुड़कर और समाज की मुख्यधारा में आकर अपने आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सुन्दर भविष्य तैयार करना उनकी ज़िम्मेदारी है।

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान से लोग उम्मीदें लगाए बैठे थे कि आतंकवाद जैसी मुद्दों पर शायद उनका बर्ताव कुछ और हो, लेकिन उनके द्वारा ज़ारी बयानों से स्पष्ट है कि ‘नकारने की प्रथा’ को ही वो आगे बढ़ाते नज़र आ रहे हैं। पाकिस्तान की हक़ीक़त ये हो चुकी है कि उनके राष्ट्र के नाम दिए जाने वाले सन्देश आतंकवादियों द्वारा भेजे गए ‘प्रेम पत्र’ से ज्यादा कुछ नहीं होते। यदि हम बदलाव चाहते हैं तो सबसे पहले हमें बुराई को स्वीकारना होगा। ठीक इसी तरह भारत देश का वर्तमान मीडिया गिरोह यह कभी स्वीकार नहीं करना चाहेगा कि वह वाकई में राजनीतिक पूर्वग्रहों के कारण इतना दूर निकल चुका है कि उसे सेना के त्याग को भी अवसरवाद में बदलते देर नहीं लगती।

याद रखिए कि मर गए लोग परिणाम की चिंता नहीं करते। ना ही किसी व्यक्ति की मृत्यु को समस्त संसार की वाह-वाही सही साबित कर सकती है। जीवन ऐसे उसूलों के लिए जिया जाए जो मानवता का कल्याण करें और अगर इसके आड़े धर्म आ जाए तो उसकी बाधाओं को त्याग दिया जाना चाहिए।