पुलवामा में 14 फ़रवरी को हुए आत्मघाती हमले को ध्यान में रखकर गृह मंत्रालय ने केंद्रीय अर्ध सैन्य बलों के जवानों के हित में बड़ा फ़ैसला लिया है। जानकारी के अनुसार अब जवानों को हवाई जहाज़ से आने-जाने की सुविधा उपलब्ध होगी। गृह मंत्रालय ने केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (CAPF) के सभी जवानों को दिल्ली से श्रीनगर व श्रीनगर से दिल्ली के अलावा जम्मू से श्रीनगर और श्रीनगर से जम्मू की हवाई यात्रा पर स्वीकृति दे दी है।
अर्ध सैन्य बलों के जवानों को मिली हवाई यात्रा से आवागमन की सुविधा
गृह मंत्रालय द्वारा उठाए गए इस सराहनीय क़दम से CAPF बलों के उन लगभग 7,80,000 जवानों को लाभ मिल सकेगा जिन्हें पहले यह सुविधा प्राप्त नहीं थी। बता दें कि इनमें कॉन्स्टेबल, हेड कॉन्स्टेबल और एएसआई रैंक के जवान और अधिकारी शामिल हैं। इसलिए यह फैसला इन सभी जवानों को काफ़ी राहत पहुँचाने वाला है। बता दें कि गृह मंत्रालय द्वारा लिया गया यह फ़ैसला तत्काल काल से प्रभावशाली है। इसलिए अब जवानों को छुट्टी पर घर जाने और वापस ड्यूटी ज्वॉइन करने के लिए किसी प्रकार की असुविधा का सामना नहीं करना पड़ेगा।
The decision will immediately benefit approximately 780,000 personnel of the CAPFs in the ranks of Constable, Head Constable & ASI who were otherwise not eligible earlier. This includes journey on duty and journey on leave, i.e; while going on leave from J&K to home and return.
आपको बता दें कि इससे पहले भी हमले के तुरंत बाद गृह मंत्रालय ने ऐलान किया था कि जब सेना का क़ाफ़िला किसी रास्ते से गुजर रहा होगा, तो वहाँ आम लोगों को आवाजाही की अनुमति नहीं दी जाएगी। और सेना के जवानों के क़ाफ़िले के नियमों में कई बदलाव किए गए हैं। केंद्र सरकार ने पुलवामा हमले के बाद जम्मू-कश्मीर में रह रहे अलगाववादी नेताओं को दी गई सुरक्षा भी वापस ले ली है।
केंद्रीय जल संसाधन नदी विकास एवं गंगा संरक्षण मंत्री नितिन गडकरी ने बड़ा ऐलान किया है। गडकरी ने कहा कि पाकिस्तान जाने वाले पानी को रोक कर अब यमुना में लाया जाएगा। उन्होंने बताया कि भारत के अधिकार में जो 3 नदियाँ हैं, उनके लिए प्रोजेक्ट्स तैयार कर लिया गया है। दिल्ली-आगरा से इटावा तक जलमार्ग तैयार किया जाएगा, जिसके लिए डीपीआर (Detailed Project Report) तैयार कर लिया गया है। गडकरी ने बागपत को रिवर पोर्ट बनाने का भी ऐलान किया है। किसान अपनी फसल चक्र बदलें और चीनी मिलें गन्ने के रस से एथनॉल बनाएं, तो रोज़गार और आमदनी भी बढ़ेगी।
Under the leadership of Hon’ble PM Sri @narendramodi ji, Our Govt. has decided to stop our share of water which used to flow to Pakistan. We will divert water from Eastern rivers and supply it to our people in Jammu and Kashmir and Punjab.
अभी हाल ही में हुए पुलवामा आतंकी हमले के बाद भारत सरकार ने पाकिस्तान पर चहुँओर से शिकंजा कसना शुरू कर दिया है। भारत सरकार ने पाकिस्तान को दिया गया ‘मोस्ट फेवर्ड नेशन‘ का दर्जा भी वापस ले लिया है। अब गडकरी के ताज़ा ऐलान के बाद पहले से ही आर्थिक परेशानी से जूझ रहे पाकिस्तान पर संकट के नए बादल मँडराने लगे हैं। भारत में नदी विकास को लेकर चल रही अन्य परियोजनाओं के बारे में चर्चा करते हुए गडकरी ने कहा:
All the above Projects are declared as the National projects.
“सड़कों के साथ-साथ जलमार्ग पर सरकार काम कर रही है। हरियाणा और पश्चिम उत्तर प्रदेश के लोग दिल्ली से आगरा जलमार्ग से जा सकेंगे। इसके बाद रिवर पोर्ट भी बागपत में यमुना किनारे बनाए जाने की तैयारी है। पोर्ट से चीनी बांग्लादेश और म्यांमार तक भेजी जाएगी, इसमें ख़र्च कम होगा। प्रयागराज से वाराणसी तक जलमार्ग तैयार है, जल्द ही इसमें रिवर बोट चलेगी। एक बोट में 14 लोग बैठे सकेंगे। गंगा के साथ यमुना, हिंडन, काली समेत अन्य नदियों और नालों के पानी को नमामि गंगे योजना से साफ किया जाएगा।”
बालैनी स्थित श्रीकृष्ण इंटर कॉलेज में केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी, उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य और केंद्रीय मानव संसाधन विकास राज्यमंत्री डॉ. सत्यपाल सिंह ने मेरठ बाईपास से हरियाणा बॉर्डर तक डबल लेन हाईवे और बागपत में यमुना के वाटर ट्रीटमेंट प्लांट का शिलान्यास किया। इसी मौके पर बोलते हुए गडकरी ने उक्त बातें कही।
केन्द्रीय मंत्री नितिन गडकरी पहले भी दावा कर चुके हैं कि दिल्ली और मथुरा में यमुना की सफाई के लिए जिस गति से काम हो रहा है, उसके पूरा होने पर सवा साल के भीतर नदी का पानी पीने योग्य हो जाएगा। गडकरी गंगा नदी को साफ़ करने की दिशा में भी कार्य कर रहे हैं।उन्होंने कहा था कि गंगा भारत की संस्कृति एवं इतिहास का अंग है।
पिछले दिनों अपने बागी रवैये के कारण पार्टी के भीतर का माहौल बिगाड़ने वाले एक्टर-कम-नेता शत्रुघ्न सिन्हा सुर्खियों में रहने लगे हैं। कभी लोकतंत्र को बचाने के नाते उन्होंने पार्टी के ख़िलाफ़ जाकर ममता का हाथ थामा तो कभी ‘इंदिरा जिंदा होतीं तो आज मैं कॉन्ग्रेस में होता‘ जैसे बयान दिए। लेकिन लोकसभा चुनावों के नज़दीक आते ही उनके सुर बदलने लगे। पार्टी के ख़िलाफ़ बगावत पर उतरे शत्रुघ्न सिन्हा अब पार्टी के समर्थन में बात करते हुए फैसलों की तारीफ़ कर रहे हैं। ऐसे में उनके पिछले बयानों को और वर्तमान स्थिति को मद्देनज़र रखते हुए इस बयान पर सवाल उठना बेहद लाजमी है।
बरौनी में प्रधानमंत्री मोदी द्वारा पटना मेट्रो की आधारशिला रखने के बाद शत्रुघ्न सिन्हा ने ट्वीट किया कि बिहार को विकास की राह पर ले जाने के लिए यह एक बड़ा कदम है। शत्रुघ्न ने अपने ट्वीट में लिखा कि मेट्रो परियोजनाओं के साथ 35 करोड़ की विकास परियोजनाओं का ऐलान एक बेहद सराहनीय कदम है। इस फ़ैसले की प्रशंसा होनी चाहिए।
I welcome the honourable Prime Minister @narendramodi and CM of Bihar @NitishKumar for the Patna metro project. Great move forward in terms of development and progress in Bihar along with other projects worth Rs 35000 crores. Highly appreciated and applauded.Jai Bihar, Jai Hind!
हालाँकि उनके द्वारा की गई तारीफ को सार्वजनिक रूप से सराहा जाना चाहिए लेकिन फिर भी इस बयान पर सवाल उठने की ज़मीन खुद शत्रुघ्न सिन्हा ने तैयार की है। बीते समय में वह लगातार बीजेपी के हर कार्य पर सवाल उठाते आए हैं। फिर ऐसा क्या हुआ कि वह बीजेपी के कार्य की प्रशंसा करने लगे?
शत्रुघ्न सिन्हा का लोकसभा चुनाव के नज़दीक आते पलट जाना बताता है कि उनके भीतर का एक्टर और राजनेता दोनों एक साथ जाग गया जो यह जानता है कि मौकापरस्ती क्या है। लेकिन वो भूल रहे हैं कि जिस तरह कमान से निकला तीर वापस नहीं आता है उसी तरह से एक बार मुँह से निकला बयान जनता के मन में घर कर जाता है। शायद इसलिए इस बयान के बाद बिहार के भाजपा अध्यक्ष नित्यानंद राय ने मीडिया से हुई बातचीत में कहा कि वो सच कहने के लिए शत्रुघ्न के आभारी हैं लेकिन पार्टी में बने रहना और इस तरह यू-टर्न लेना सिन्हा को टिकट की गारंटी नहीं देता है।
जाहिर है, भाजपा के कार्यकाल में लगातार अपने बयानों से पार्टी की छवि खराब करने वाले शत्रुघ्न सिन्हा अगर लोकसभा चुनाव के नज़दीक आते ही इस तरह प्रशंसा करते नज़र आएँगे तो हर किसी के मन में सवाल आएगा। आइए आपको हाल ही में कुछ ऐसे मौक़ों के बारे में बताएँ जब शत्रुघ्न बीजेपी के ख़िलाफ़ प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से खड़े नजर आए।
ममता की रैली में शामिल
शत्रुघ्न सिन्हा बीते कुछ समय से लगातार बीजेपी के ख़िलाफ़ जाकर बयान भी दे रहे हैं और कदम भी उठा रहे हैं। इसका सबसे हालिया उदाहरण तब का है जब ममता की रैली में शामिल होकर उन्होंने कहा, “यह रैली लोकतंत्र को बचाने के लिए आयोजित हुई है और वो इस रैली में ‘राष्ट्र मंच’ संस्था के प्रतिनिधि बनकर शामिल होंगे।” बता दें कि राष्ट्र मंच की शुरूआत भाजपा के पूर्व नेता यशवंत सिन्हा ने की है। अपनी इस हरकत पर सफाई देते हुए उन्होंने कहा कि भाजपा के नेता भी तो राष्ट्रीय स्वयंसंवक संघ के कार्यक्रमों में शामिल होते हैं। इसलिए रैली में शामिल होने से उनकी वफादारी पर सवाल न उठाए जाएँ।
लालू यादव से मुलाकातें और तेजस्वी की तारीफ़
इसके अलावा भाजपा के कट्टर विरोधी और राष्ट्रीय जनता दल अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव के साथ भी वो मुलाकातें करते रहे हैं। शत्रुघ्न सिन्हा लालू के बेटे तेजस्वी के बारे में कह चुके हैं कि उन्हें तेजस्वी में भविष्य का नेता दिखाई देता है। इतना ही नहीं शत्रुघ्न सिन्हा नीतीश कुमार से भी उस दौरान लगातार मेल-जोल करते रहे थे जब वो भाजपा के विरोध में महागठबंधन में थे।
मंत्री न बनने पर बेबुनियादी इल्ज़ाम
आज पार्टी द्वारा उठाए कदम की सराहना करने वाले शत्रुघ्न सिन्हा समय-समय पर प्रधानमंत्री समेत कई भाजपा नेताओं की आलोचना लगातार करते रहे हैं। उनका कहना है कि लालकृष्ण आडवाणी के साथ रहने के कारण उन्हें सरकार में मंत्री नहीं बनाया गया। हालाँकि उनका यह भी कहना है कि उन्हें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। बता दें कि अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में वह केंद्रीय मंत्री रह चुके हैं।
‘राहुल गांधी में जबरदस्त सुधार’- शत्रुघ्न सिन्हा
मोदी पर लगातार तंज कसने वाले शत्रुघ्न सिन्हा ने विपक्ष में बैठे राहुल गांधी की तारीफों के पुल बाँधते हुए भी नजर आ चुके हैं। उन्होंने राहुल की तारीफ़ करते हुए कहा था कि बहुत कम समय में राहुल गांधी ने स्वयं में बहुत जबरदस्त सुधार किया है।
कॉन्ग्रेस का समर्थन और भाजपा पर निशाना
पाँच राज्यों में हुई बीजेपी की हार के बाद शत्रुघ्न सिन्हा ने अपनी पार्टी यानी बीजेपी के ख़िलाफ़ जाकर कटाक्ष करते हुए अपनी पार्टी को अहंकारी बताकर दूसरे दलों की जीत को कठोर परिश्रम का परिणाम बताया था।
केजरीवाल को बताया छोटा भाई
आम आदमी पार्टी (AAP) की ओर से आयोजित ‘तानाशाही हटाओ, लोकतंत्र बचाओ सत्याग्रह’ में बीजेपी सांसद शत्रुघ्न सिन्हा भी विपक्ष की रैली में शामिल हुए थे। यहाँ जनता को संबोधित करने के दौरान शत्रुघ्न ने केजरीवाल को अपना छोटा भाई बताते हुए कहा कि वह बहुत दमदार हैं। उन्होंने कहा था कि साउथ के हीरो चन्द्रबाबू नायडू और ममता दीदी के इस महागठबंधन को पूरा समर्थन वह पूरा समर्थन देते हैं। रैली में उन्होंने देश और संविधान बचाने की भी बात की थी।
अपने ही बयानों से विरोधाभास की स्थिति खड़ा करने वाले शत्रुघ्न लगातार भाजपा में तानाशाही का आरोप मढ़ते रहते हैं साथ ही यह भी कहते हैं कि जो कुछ भी हो जाए पटना साहिब से ही चुनाव लड़ेंगे। बीते दिनों शत्रुघ्न के ऐसे रवैये से नाराज़ होकर बिहार के उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी ने उन्हें पार्टी छोड़ने की नसीहत तक दे दी थी। साथ ही यह भी कहा था कि शत्रुघ्न सिन्हा एक बार कॉन्ग्रेस या राजद से टिकट लेकर चुनाव लड़ें, फिर उन्हें अपनी लोकप्रियता का भ्रम दूर हो जाएगा।
सुशील मोदी की बात पर शत्रुघ्न ने उन्हें पहचानने से साफ़ मना करते हुए कहा था कि वो सिर्फ़ एक मोदी को जानते हैं जो देश के प्रधानमंत्री हैं। इन सब बातों के अलावा भी शत्रुघ्न सिन्हा मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद अनेकों बार भाजपा के ख़िलाफ़ बोलते नज़र आए हैं और रैलियों में शामिल होकर मंच पर चढ़कर विरोधियों के साथ खड़े नज़र आए हैं।
समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के गठबंधन पर नाराज़गी जताते हुए मुलायम सिंह यादव ने अपने बेटे अखिलेश पर तीखा हमला बोला। गुरूवार (फरवरी 21, 2019) को मुलायम सिंह यादव ने कहा कि एक बार अगर इस गठबंधन पर वह खुद बात करते तो बात कुछ समझ में आती लेकिन अब लोग उन्हें कह रहे हैं कि लड़का (अखिलेश) इस मामले पर बात करके चला गया।
गठबंधन पर नाराज़ मुलायम ने कहा कि समाजवादी पार्टी को आज उनके ही लोग खत्म कर रहे हैं। उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं को साफ तौर पर कहा कि उत्तरप्रदेश में सपा की लड़ाई सिर्फ़ भाजपा से ही है, इस लड़ाई में कोई और तीसरा दल शामिल नहीं है।
मुलायम सिंह यादव ने कहा कि अखिलेश ने बसपा के साथ गठबंधन कर लिया है, और सुनने में आया है कि सीटें आधी रह गईं हैं। उनका कहना है कि बसपा के साथ गठबंधन के कारण हमारे अपने लोग तो खत्म हो गए। उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी ने अपने दम पर तीन बार अकेले सरकार बनाई है, लेकिन अखिलेश ने तो इस बार लड़ने से पहले ही आधी सीटें बसपा को सौंप दी।
मुलायम ने बसपा-सपा के गठबंधन को गलत ठहराते हुए कहा कि उन्हें नहीं मालूम कि अखिलेश यादव ने किस आधार पर राज्य की आधी सीटें बसपा को सौंपीं हैं। साथ ही मुलायम ने कहा कि सपा अध्यक्ष सीटों पर प्रत्याशियों की घोषणा करने में देरी कर रहे हैं। सपा के पूर्व मुखिया ने कहा कि वह अखिलेश से ज्यादा अनुभवी हैं। ऐसे में उन्हें संरक्षक तो बनाया गया है लेकिन उनके पास कोई जिम्मेदारी नहीं है।
बता दें कि पिछले महीने ही लंबी लड़ाई के बाद करीब 25 साल बाद एक बार फिर से सपा-बसपा ने एक साथ चुनाव लड़ने का ऐलान किया। संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में अखिलेश ने बसपा सुप्रीमो मायावती के साथ चुनाव लड़ने की घोषणा की। 2019 के लोकसभा चुनाव पर यूपी की कुल 80 सीटों में 38-38 सीटों पर सपा-बसपा आगामी लोकसभा चुनाव लड़ेंगे।
झूठ, प्रोपेगंडा और मौक़ापरस्ती को आधार बना कर पत्रकारिता के सारे मानदंडों को धता बताने वाली कारवाँ पत्रिका ने अब भारतीय सेना को बदनाम करने का बीड़ा उठाया है। पुलवामा जैसे त्रासद आतंकी हमले में जाति और मज़हब को लाकर एजाज़ अशरफ़ ने लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ की विश्वसनीयता और निष्पक्षता पर थूक दिया है। दरअसल, कारवाँ में लिखे एक लेख में अशरफ़ ने पुलवामा आतंकी हमले में वीरगति को प्राप्त हुए 40 जवानों की जाति का जिक्र कर यह साबित करने की घिनौनी कोशिश की है कि इनमें ‘उच्च जाति’ वालों की कोई भागीदारी नहीं है। इस लेख में ऐसी दलीलें हैं जिसे पढ़ने के बाद आपको इनकी वास्तविकता पता चल जाएगी। इसने हमारे 40 वीर जवानों के शवों को अपने हथकंडे के घेरे में ले लिया है।
कारवाँ की घटिया हैडिंग और उस से भी घटिया लेख
बाकी संस्थानों को छोड़िए, यहाँ तक कि आज तक किसी ने क्रिकेट टीम के खिलाड़ियों से नहीं पूछा कि वे किस जाति के हैं। सचिन तेंदुलकर का बल्ला बोलता था, उनकी जाति नहीं। हरभजन सिंह की कलाइयों में जादू था, उनके धर्म में नहीं। मोहम्मद कैफ़ की फील्डिंग में ताक़त थी, वह धर्म के बल पर टीम में नहीं आए थे, धोनी विकेट के पीछे अपनी चपलता के कारण जाने जाते हैं, अपनी जाति की वजह से नहीं। इन सभी के करोड़ों फैंस हैं- आम आदमी इनकी योग्यता देखता है, जाति नहीं।
नीचता की भी हद होती है
स्वयं को स्वतंत्र मीडिया का ठेकेदार मानने वाले इन संस्थानों ने आज तक इसी बात का फ़ायदा उठाया है कि इनसे सवाल नहीं पूछे जाते थे। अब सोशल मीडिया और आधुनिकता के युग में जब परत दर परत इनकी पोल खुलती जा रही है, ये और भी नीचे गिरती जा रहे हैं। रीडरशिप और सब्सक्रिप्शन के इस दौर में ख़ुद का वजूद बचाने के लिए इन्होने लाशों पर प्रोपेगंडा का नंगा नाच करने की ठान ली है। यहाँ हम कारवाँ के लेख में कही गई बेतुकी और बेढंगी बातों का जिक्र करने के साथ ही आपके सामने उनकी असली सच्चाई लाएँगे ताकि भविष्य में आप भी ऐसे ज़हरीले कीड़ों से सावधान रहें।
सबसे पहले इस लेख के हैडिंग की बात करते हैं। इसने टाइटल में ही अपना एजेंडा साफ़ ज़ाहिर कर दिया है। इसने लिखा- ‘पुलवामा में मारे गए जवानों में हिंदुत्व राष्ट्रवाद को बढ़ावा देने वाले शहरी उच्च-जाति के लोगों का प्रतिनिधित्व बहुत कम है।’ कारवाँ क्या यह परिभाषित करेगा कि हिंदुत्व क्या है? राष्ट्रवाद क्या है? और अव्वल तो यह कि ये हिंदुत्व राष्ट्रवाद क्या है? और हाँ, कारवाँ के पास इस बात के क्या सबूत हैं कि जिस कथित हिंदुत्व राष्ट्रवाद की बात वह कर रहा है, उसके कर्ता-धर्ता शहरी उच्च जाति के लोग हैं? ना आँकड़ा और ना कोई सबूत, सीधा घटिया सा एक निष्कर्ष। कभी किसी गाँव के महावीरी झंडे वाले मेले में जाओ, तुम्हे भगवा ध्वज थामे दलित और पिछड़ी जाति के लोग ही दिखाई पड़ेंगे। क्या इसी को तुम हिंदुत्व कह कर इसे डरावने रूप में पेश करने की कोशिश करते हो?
Urban upper-castes driving Hindutva nationalism have little representation among Pulwama’s slain jawans.
लेख की शुरुआत होते-होते यह नैरेटिव और ज़हरीला हो जाता है। जैसे-जैसे लेख आगे बढ़ता है, कथित हिंदुत्व राष्ट्रवाद का सारा दोष शहरी उच्च-जाति की बजाय शहरी मध्यम वर्ग के चरित्र-हनन पर उतर आते हैं और फिर बिना आँकड़ों व सबूत के दावा ठोकते हैं कि उच्च-जाति में अधिकतर शहरी मध्यम वर्ग के लोग हैं। ऐसा किस जनगणना में लिखा है? जब मध्यम वर्ग द्वारा झेली जा रही परेशानियों की बात होनी चाहिए, उनकी समस्याओं पर बात होने चाहिए, उनके लिए सरकार द्वारा लाई गई योजनाओं पर बात होनी चाहिए तब कारवाँ के अशरफ़ उनके चरित्र-हनन में मशग़ूल हैं।
मौलाना अशरफ़ साहब, जब कोई युवा सेना में भर्ती होने के लिए जाता है तो उसकी जाति नहीं देखी जाती। देखा जाता है तो उनका शारीरिक गठन, उनका हौसला और देखी जाती है उनकी योग्यता। वो सब के सब भारतीय होते हैं। अगर कोई पिछड़ी जाति से आता है तो उसे नियमानुसार कई सुरक्षा बलों में कुछ राहत ही मिलती है, दिक्कतें नहीं आतीं। इससे उसे फ़ायदा ही होता है, नुक़सान नहीं। जाति नेताओं और पत्रकारों की खोजिए, सेना के जवानों की नहीं। आप अपना हथकंडा राजनीति और मीडिया तक सीमित रखिए, इसे देश की सुरक्षा व्यवस्था में मत घुसाइए। सेना के जवान अपने जज़्बे, साहस और देशप्रेम के लिए लड़ते हैं, जाति-धर्म के लिए नहीं। वे मातृभूमि की सुरक्षा के लिए वीरगति को प्राप्त होते हैं। वे किसी आम नागरिक की रक्षा करते समय उससे उसकी जाति नहीं पूछते।
जरा उन जवानों की जगह स्वयं को रख कर देखिए
अशरफ़ और कारवाँ ने इन जवानों की जाति का पता लगाने के लिए जिस नीचता का परिचय दिया, उसे जान कर आप कारवाँ मैगज़ीन के पन्नों का टॉयलेट पेपर की तरह प्रयोग करने से भी हिचकेंगे। जैसा कि उसने बेशर्मीपूर्वक अपने लेख में ही बताया है, उसने वीरगति को प्राप्त जवानों की जाति जानने के लिए उनके परिजनों को कॉल किया। यह मानवीय नैतिकता को तार-तार करने वाला आचरण है। इसे अशरफ़ को समझना पड़ेगा। कल यदि ख़ुदा-न-ख़ास्ता अगर अशरफ की ही मृत्यु हो जाए और खुदा न करे उनकी विधवा, बच्चों व माता-पिता से मृत अशरफ़ की जाति पूछने के लिए फोन पर फोन आने लगे, तो परिजनों पर कैसा असर पड़ेगा?
अरे लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ पर टांग उठा के पेशाब करने वालों, बजाय इसके कि तुम वीरगति को प्राप्त जवानों की आवाज सरकार तक पहुँचाओ, तुम उन्हें परेशान करने में लगे हो? बजाय इसके कि तुम उन जवानों के परिजनों को सरकारी सहायताएँ दिलाने में मदद करो, तुम उनकी पीड़ा को बढ़ाने का कार्य कर रहे हो? हद है असंवेदनशीलता की। अगर ऐसे पत्रकारों की चले तो ये लोग किसी भी मृतक के श्राद्धकर्म में सम्मिलित होकर शोक-संतप्त परिजनों का दुःख बाँटने की बजाय फोन कर के जाति पूछने लगें। मान लीजिए कि खुदा न करे अशरफ़ की मृत्यु के बाद अगर उनकी जैसी ही गन्दी मानसिकता वाले पत्रकार और मीडिया संस्थान उनकी विधवा से फोन पर ये पूछने लग जाएँ कि वह शिया हैं या सुन्नी, पठान हैं या सैयद या क़ुरैशी- तो उन पर क्या असर पड़ेगा?
The CRPF jawans who were killed in the #PulwamaAttack were predominantly lower-caste. Only five out of 40 jawans, or 12.5 percent, came from Hindu upper-caste families.
अभी पत्रकारों को बलिदान हुए जवानों के बारे में जनता को बताना चाहिए ताकि पूरा देश उनकी वीरता और बलिदान के बारे में जान सके। अभी पत्रकारों का धर्म होना चाहिए उन जवानों के परिजनों को ढांढस बँधाना ताकि उन्हें ऐसा महसूस हो कि दुःख की इस घड़ी में पूरा देश उनके साथ खड़ा है। लेकिन अशरफ़ जैसे पत्रकार और कारवाँ जैसे मीडिया संस्थान कर क्या रहे हैं? वो मृतकों के परिजनों से हुतात्मा की जाति पूछ रहे हैं। संवेदनाएँ मर गई हैं क्योंकि इनके मन में जवानों के बलिदान के प्रति कोई सम्मान नहीं है।
जिनके ख़ुद के घर काँच के हों…
भारत में क़रीब 15% मुस्लिम हैं। क्या अशरफ बताएँगे कि उनके संस्थान कारवाँ में लोगों को जाति एवं धर्म के आधार पर कितनी हिस्सेदारी मिलती है? भारत में सैकड़ों जातियों और कई धर्मों के लोग रहते हैं। क्या कारवाँ में उन सबका उचित प्रतिनिधित्व है? संस्थान ने कितने पारसियों को नौकरी पर रखा है? वहाँ जैन और बौद्ध पत्रकारों के प्रतिनिधित्व का आँकड़ा क्या है? अगर ऐसा नहीं है, तो सबसे पहले अपना घर दुरुस्त कीजिए और फिर दूसरों को सलाह दीजिए। और अगर जाति-धर्म ही हर संस्थान का मापदंड होगा तो ऐसा संस्थान आपको ही मुबारक हो। सुरक्षा बल भारतीय होते हैं, भारतियों की रक्षा के लिए लड़ते हैं और भारतीय अस्मिता की लाज रखते हैं।
तुम्हें तो यह पता करना चाहिए था कि वीरगति को प्राप्त जवानों के बच्चों को पढ़ाने के लिए परिजनों के पास धन है या नहीं। तुम्हे पता लगाना चाहिए था कि जिन माँ-बाप ने अपनी इकलौती संतान को खो दिया, उनकी ज़िंदगी का कोई अन्य सहारा है या नहीं। तुमने लिखा है कि जवानों के परिजनों को डर है कि उनके बलिदान को लोग भुला देंगे। उनका यह डर वाज़िब है लेकिन उनकी इस संवेदना के साथ तुमने जो प्रीफिक्स लगाया है वह निंदनीय है। “While the fervour of nationalism grips the country” जैसा गन्दा प्रीफिक्स लगा कर तुमने परिजनों के बयानों को मैनिपुलेट किया है, उसके साथ छेड़-छाड़ कर उसमे अपना हथकंडा घुसाया है।
इस लेख में तुम्हारे कथित दलित विशेषज्ञ ने कहा है कि CRPF में आरक्षण है, इसीलिए वीरगति को प्राप्त जवानों में अधिकतर दलित हैं। अगर किसी संस्थान में आरक्षण नहीं हो तो तुम्हारा वही कथित दलित विशेषज्ञ यह बोल रहा होगा कि वहाँ दलितों को नहीं लिया जाता क्योंकि सरकार को उनकी योग्यता पर संदेह है। ऐसे ही देश की सुरक्षा व्यवस्था चलेगी क्या? चित भी कारवाँ की और पट भी कारवाँ की। तुम्हारा ये असंवेदनशील, नीच और घटिया खेल तुम्हे मुबारक।
The low representation of urban upper-caste Hindus among the jawans killed in the #PulwamaAttack bears out a truism—the Hindutva nationalism of the urban middle-class conveniently exploits the sacrifices of the downtrodden.https://t.co/usdnEBmRHE
और हाँ, पुलवामा हमले को लेकर केवल शहरी मध्यम वर्ग ही आक्रोशित नहीं है, पूरा देश आक्रोशित है। कभी गाँवों में जाकर कम से कम वहाँ की किसी चौपाल पर 10 मिनट बैठ कर देखो, ज़मींदार, किसान और मजदूर- सभी एक सुर में आतंकियों की निंदा करते हुए दिखेंगे। कभी किसी कस्बे में जा कर देखों। तुम्हें एक सब्जी वाला उँगलियों पर गिनाता मिल जाएगा कि वीरगति को प्राप्त जवानों में किस राज्य से कितने थे। कभी किसी खेत-खलिहान में जा कर देखो, तुम्हे खर-पतवार इकठ्ठा करती महिलाएँ पाकिस्तान की निंदा करती मिलेंगी। लेकिन नहीं, तुमने अपने AC कमरे में बैठ कर जवानों के परिजनों से बेढंगे सवाल पूछने हैं क्योंकि तुम्हे अपना प्रोपेगंडा चलाना है।
और अंत में, तुम्हे आइना दिखाने के लिए रामधारी सिंह दिनकर की यह कालजयी पंक्तियाँ:
“तेजस्वी सम्मान खोजते नहीं गोत्र बतलाके, पाते हैं जग से प्रशस्ति अपना करतब दिखलाके। हीन मूल की ओर देख जग गलत कहे या ठीक, वीर खींचकर ही रहते हैं इतिहासों में लीक।”
और दिनकर की ये पंक्तियाँ जो भारतीय सुरक्षाबलों पर आज भी फिट बैठती है, ख़ासकर तब, जब कारवाँ जैसे संस्थान अपना घटिया रंग दिखा कर वीरगति को प्राप्त जवानों से उनकी जाति पूछते हैं:
“मूल जानना बड़ा कठिन है नदियों का, वीरों का, धनुष छोड़कर और गोत्र क्या होता है रणधीरों का? पाते हैं सम्मान तपोबल से भूतल पर शूर, ‘जाति-जाति’ का शोर मचाते केवल कायर, क्रूर।”
एक समय कॉन्ग्रेस के ख़िलाफ़ जनता को रोजाना अपने साथ धरने पर बिठाकर अपने राजनीतिक करियर की बुनियाद रखने वाले दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल आजकल कॉन्ग्रेस पार्टी के साथ गठबंधन करने के लिए दिन-रात प्रयास कर रहे हैं। मीडिया में रोजाना आ रहे उनके बयानों से स्पष्ट है कि भाजपा को लोकसभा चुनावों में हराने के लिए अरविन्द केजरीवाल किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार हैं।
Delhi CM in Chandni Chowk y’day: There should be only 1 candidate against every BJP candidate,votes must not be divided.Tired of trying to convince Congress for alliance,but they refuse to understand. If today our alliance with Congress is done, BJP will lose all 7 seats in Delhi pic.twitter.com/6LG5rNGnZB
लोकसभा चुनाव में दिल्ली में बीजेपी को टक्कर देने के लिए आम आदमी पार्टी और कॉन्ग्रेस के गठबंधन की चर्चा पर अब खुद दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल ने विराम लगा दिया है। बुधवार (फरवरी 20, 2019) को केजरीवाल ने कहा कि दिल्ली की सातों सीटों पर बीजेपी को हराने के लिए आम आदमी पार्टी के नेताओं ने कॉन्ग्रेस को गठबंधन के लिए मनाने की खूब कोशिशें कीं लेकिन कॉन्ग्रेस नहीं मानी। अरविन्द केजरीवाल ने कहा कि बीजेपी के हर कैंडिडेट के ख़िलाफ़ एक प्रत्याशी होना चाहिए और वोटों का बँटवारा नहीं होना चाहिए।
जामा मस्जिद के पास आयोजित रैली को संबोधित करते हुए केजरीवाल ने कहा, “हम गठबंधन के लिए कॉन्ग्रेस को मना-मनाकर थक गए हैं, लेकिन वह नहीं समझ रही। अगर गठबंधन होता है तो बीजेपी सातों लोकसभा सीटों पर हार सकती है।” अपने भाषण में दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल ने यह भी कहा कि जिनके अंदर भी देश के लिए अच्छी भावना है, उन्हें चाहिए कि वह 2019 चुनाव में भाजपा को हराए।
केजरीवाल की यह रैली चाँदनी चौक इलाके के अल्पसंख्यक बहुल इलाके में आयोजित की गई थी। उन्होंने कहा, “मैं नहीं जानता कि कॉन्ग्रेस के दिमाग में क्या चल रहा है। कॉन्ग्रेस उत्तर प्रदेश में सपा और बसपा को कमजोर करने गई है और दिल्ली में बीजेपी के ख़िलाफ़ लड़ रही AAP को कमजोर करने का काम कर रही है।” ज्ञात हो कि फरवरी की शुरुआत में केजरीवाल ने मीडिया को बताया था कि कॉन्ग्रेस ने लोकसभा चुनाव के लिए AAP के साथ गठबंधन की संभावना को लगभग खत्म कर दिया है।
पुलवामा हमले के बाद देश भर में कश्मीरी छात्रों पर कथित तौर पर हो रहे हमलों के ख़िलाफ़ एक वकील द्वारा दायर की गई जनहित याचिका पर सुनवाई के लिए देश की शीर्ष अदालत सहमत हो गई है।
CJI रंजन गोगोई, न्यायमूर्ति एल एन राव और न्यायमूर्ति संजीव खन्ना की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंसाल्विस की याचिका पर संज्ञान लिया और कश्मीरी छात्रों की सुरक्षा से संबंधित मामले में तत्काल सुनवाई की माँग की। अदालत इस याचिका पर कल (22 फ़रवरी 2019) को सुनवाई करेगी।
याचिका में आरोप लगाया गया है कि पुलवामा आतंकी हमले के बाद देश भर के विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों में कश्मीर घाटी के छात्रों के साथ मारपीट की जा रही है। याचिका में इस तरह के हमले रोकने के लिए संबंधित अधिकारियों द्वारा कार्रवाई की माँग की गई है।
पुलवामा में 14 फ़रवरी को CRPF के क़ाफ़िले पर हुए भीषण हमले के बाद देश भर के लोगों के मन में इसको लेकर गहरा दुख और क्षोभ है। लेकिन कुछ लोग ऐसे भी थे जो आतंकी हमले का जश्न मनाने में व्यस्त थे। कई सोशल मीडिया यूज़र के साथ जश्न मना रहे लोगों के सहयोगियों ने भी शिकायतें कीं, कई छात्रों और कर्मचारियों को उनके देश विरोधी पोस्ट के लिए निलंबित और गिरफ़्तार भी किया गया।
पुलवामा हमले के बाद कश्मीरी छात्रों पर हमले जैसी घटनाओं पर पुलिस द्वारा स्ष्टीकरण दिया जा चुका है कि ऐसी कोई घटना नहीं हो रही है, बावजूद इसके पूरे भारत में कश्मीरी छात्रों पर हमले जैसी अफ़वाहें प्रचारित और प्रसारित हो रही हैं। बेवजह ही ऐसी अफ़वाहों को हवा दी जा रही है जिसका वास्तविकता से कोई संबंध नहीं है।
इसके अलावा यह भी ग़ौर करने वाली बात है कि पिछले साल सुप्रीम कोर्ट ने 1989-90 के दौरान हुए कश्मीरी पंडितों के नरसंहार में जाँच और बाद में मुक़दमा चलाने की माँग को ख़ारिज कर दिया था।
जम्मू-कश्मीर में 14 फ़रवरी को हुए आत्मघाती हमले में जहाँ एक तरफ देश में ग़ुस्सा और पाकिस्तान से बदले की भावना है वहीं दूसरी तरफ आतंकियों की उन गतिविधियों का ख़ुलासा भी हो रहा है जिसके फलस्वरूप इस हमले को अंजाम तक पहुँचाया गया। ऐसी ही एक ख़बर सामने आई है जिसके मुताबिक़ पुलवामा में आतंकी हमला करने के लिए विस्फोटक ढोने के लिए आतंकवादियों ने कश्मीरी बच्चों और महिलाओं को काम पर रखा।
टाइम्स नाउ की ख़बर के अनुसार, RDX ग्रेड-5 विस्फोटक को पुलवामा ज़िले के त्राल से विस्फोटक स्थल तक पहुँचाने में आतंकवादियों ने बच्चों और महिलाओं का इस्तेमाल किया।इसके लिए महीनों तक काम किया गया। आतंकियों ने बच्चों और महिलाओं को इसलिए अपना माध्यम बनाया ताकि सुरक्षा बलों की नज़र से बचा जा सके।
ख़बर के अनुसार विस्फोटक के ट्रिगर को स्थानीय स्तर पर ही बनाया गया था। अमोनियम नाइट्रेट और RDX को विस्फोटक के रूप में इस्तेमाल किया गया था। सैन्य ग्रेड A5 RDX पाकिस्तानी सेना द्वारा सप्लाई किया गया था और डिवाइस को विस्फोट स्थल से लगभग 10 किमी की दूरी पर तैयार किया गया।
ज़ी न्यूज़ की एक ख़बर के अनुसार, पुलवामा हमले में इस्तेमाल किए गए RDX को अधिक प्रभावशाली बनाने के लिए अमोनियम नाइट्रेट को छर्रे के साथ मिलाया गया था। इसे SUV वाहन में तीन ड्रमों में रखा गया था। RDX की इस ख़तरनाक क्वॉलिटी और ऑपरेशन को बड़े ही चुस्त-दुरुस्त रूप से अंजाम देने के कारण, इसमें पाकिस्तानी सेना की भागीदारी पर संदेह किया जा रहा है।
कीर्तिवर्धन भागवत झा आज़ाद। इतना लंबा नाम किसे याद रहेगा भला! लोग कीर्ति आज़ाद बोलकर ‘मुक्ति’ पा लेते हैं। बिहार में एक मुख्यमंत्री हुआ करते थे – भागवत झा आज़ाद। उन्हीं के बेटे हैं। लालू के बेटे की तरह इन्होंने भी क्रिकेट खेला। तेजस्वी IPL में पानी ढोने के लिए फेमस हुए। जबकि कीर्ति ने 1983 विश्व कप क्रिकेट के सेमीफाइनल में इंग्लैंड के इयान बॉथम का विकेट लेकर कीर्ति पाई थी। इसके अलावा इंटरनेशनल क्रिकेट में कुछ और ख़ास किया, ऐसा गूगल भी नहीं बता पा रहा।
ख़ैर! कीर्तिवर्धन भागवत झा आज़ाद अपनी कीर्ति का वर्धन करने के ख्याल से राजनीति में आ घुसे। लेकिन अफसोस! क्रिकेट वाली गुगली ने उनका साथ राजनीति में भी नहीं छोड़ा। पहले दिल्ली में विधायक बने। अब तक तीन बार सांसदी भी जीत चुके हैं। लेकिन नेता वाला रुतबा या भौकाल बना पाए हों, ऐसा कभी ख़बरों में भी न देखा, न पढ़ा। सांसदी के बावजूद इनका वजूद छुटभैये नेता से कभी ऊपर न उठ सका। वज़ह ये खुद रहे।
लक्ष्य – पता नहीं।
पार्टी – पता नहीं।
क्या बोलना है – पता नहीं।
ऊपर के तीन लक्षण इन्होंने क्रिकेट के फ़िल्ड से लेकर राजनीति के क्षेत्र तक हमेशा दिखाया – एकसमान दिखाया। राजनीति में जिस BJP के सहारे विधायकी से सांसदी तक का सफ़र तय किया, उसी के ख़िलाफ़ हमेशा झंडा (एजेंडा ज्यादा सटीक शब्द होगा वैसे) बुलंद करते रहे। अब नए-नए कॉन्ग्रेसी बने हैं। वैसे रगों में कॉन्ग्रेसी खून ही है। क्योंकि इनके पिताजी कॉन्ग्रेसी ही थे।
‘मैं आपके लायक हूँ’ – यह एक ब्रह्म वाक्य है। लेकिन सिर्फ उनके लिए जिन्हें स्वामी-भक्ति दिखानी होती है।
‘मैं आप ही के लायक हूँ’ – यह महा-ब्रह्म वाक्य है। लेकिन सिर्फ उनके लिए जिन्हें हद से ज्यादा स्वामी-भक्ति दिखनी होती है। इतनी ताकि ऐसा लगे कि पुराना वाला स्वामी लायक नहीं था।
बस, यहीं पर कीर्तिवर्धन भागवत झा आज़ाद ने झंडे गाड़ दिए। गाड़ा भी कहाँ – बिहार में अपने संसदीय क्षेत्र दरभंगा में। जहाँ की जनता ने पिछली बार उन्हें BJP सांसद के रूप में लोकसभा भेजा था, वहीं की जनता के सामने उन्होंने कॉन्ग्रेसी गुलामी कुबूल करते हुए स्वीकारा कि उनके पिताजी और खुद उनके लिए भी कॉन्ग्रेस के लोगों ने बूथ कब्जा किया था।
2019 में हम जी रहे हैं। लेकिन सांसद महोदय 90 के दशक से आगे बढ़ ही नहीं पा रहे। अभी की जनता, ख़ासकर युवाओं के सामने बूथ कब्जे की बात करके कीर्ति साहब न जाने कौन सी कीर्ति फैलाना चाहते हैं! शायद कॉन्ग्रेस को पता हो। या हो सके जिस बात से वो बाद में मुकर गए, सच में ऐसा किया-करवाया हो। जाँच होनी चाहिए। और अगर यह सच है तो जैसी सज़ा क्रिकेट में मिलती है, वैसी ही सज़ा दोनों बाप-बेटों को मिलनी चाहिए – गद्दार क्रिकेटरों के नाम से उनका सारा रिकॉर्ड डिलीट कर दिया जाता है, इन दोनों बाप बेटों के नाम विधायकी-सांसदी के रिकॉर्ड से हटाया जाए। देश को चोर-उचक्के-वोट_डकैत नेताओं की जरूरत नहीं।
अपना टाइम आएगा – जनता के बीच यह गाना पॉपुलर हो रहा है। क्या पता यह गाना राजनैतिक जागरूकता की मिसाल बन जाए। और अगर ऐसा हुआ तो बाप के नाम पर बेटे अभिषेक बच्चन को नहीं झेलने वाला पैरामीटर, वोटर लोग भी सेट करने लगें। तब कीर्ति के साथ-साथ बहुत से नेता-‘वीर’ पुत्रों को अपकीर्ति हाथ लगेगी। राजनीतिक संभावनाओं और समीकरण के साथ मिलते हैं अगले लेख में। तब तक के लिए राम-राम?
पुलवामा आत्मघाती हमले का गुस्सा राजस्थान की जयपुर सेंट्रल जेल में भी देखने को मिला। यहाँ एक पाकिस्तानी क़ैदी शकर उल्लाह की हत्या कर दी गई। इस हत्या की सूचना दिल्ली स्थित पाकिस्तानी दूतावास को दे दी गई है।
जयपुर जेल के आईजी रुपिंदर सिंह के अनुसार शकर उल्लाह को साल 2011 में जेल में बंद किया गया था।
Rajasthan: Pakistani prisoner Shakar Ullah found dead today in Jaipur Central Jail; Jaipur Jail IG Rupinder Singh says, “he was lodged here since 2011 and died following a brawl with other inmates.” pic.twitter.com/G20cICefpi
वहीं हत्या की घटना पर अधिक जानकारी देते हुए जेल के एडिश्नल कमिश्नर लक्ष्मण गौर ने बताया कि टीवी के वॉल्यूम को लेकर शकर उल्लाह और कैदियों में आपस में विवाद हो गया था जिसके बाद बुधवार (फ़रवरी 20, 2019) को वह मृत पाया गया।
आतंकी शकर उल्लाह के बारे में आपको बता दें कि क़रीब आठ साल पहले उसे राजस्थान पुलिस ने गिरफ़्तार किया था। राजस्थान पुलिस को इस बात के पुख़्ता सबूत मिले थे कि उल्लाह के संबंध आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा से थे। जाँंच के दौरान उसकी फोन रिकॉर्डिंग से आतंकियों के स्लीपर सेल का ख़ुलासा भी हुआ था। इसके बाद सात साल तक चली सुनवाई के बाद इसे और इसके साथियों को 30 नवंबर 2017 को उम्र क़ैद की सज़ा सुनाई गई थी। शकर उल्लाह के साथियों में दो अन्य पाकिस्तानी असगर अली और मोहम्मद इकबाली भी शामिल थे।
ख़बरों के अनुसार, शकर उल्लाह समेत आरोपितों के तार सीधे पाकिस्तान से जुड़े थे। इस बात का ख़ुलासा हुआ कि जेल में बैठकर भी ये आतंकी अपने पाकिस्तानी आकाओं से बातचीत करता था।