भगोड़े शराब व्यापारी विजय माल्या ने सीबीआई द्वारा धोखाधड़ी और मनी लॉन्डरिंग के केस में अपनी सम्पत्ति को अटैच किए जाने पर आज शुक्रवार (फ़रवरी 1, 2019) को एक के बाद एक ट्वीट के माध्यम से आलोचना की।
लगातार एक के बाद एक ट्वीट करते हुए माल्या ने सवाल किया, “इस तरह सम्पत्ति को अटैच करना न्याय है, या अन्याय?”
विजय माल्या ने लिखा, “डेब्ट रिकवरी ट्रिब्यूनल (DRT) ने भारत में 13,000 करोड़ रुपए की माल्या ग्रुप की सम्पत्ति को बैंक के कंसोर्टियम के रूप में अटैच किया है। जबकि कहा गया है कि मैं पब्लिक सेक्टर बैंक का 9000 करोड़ रुपए लेकर भाग गया हूँ। न्याय कहाँ है? क्या ये सही है?” माल्या ने अपने पहले ट्वीट में पूछा।
माल्या ने अपने सेकंड ट्वीट में सवाल किया, “मेरी हर सुबह DRT के एक नए अटैचमेंट से होती है। सम्पत्ति की कुल वैल्यू पहले ही 13,000 करोड़ की सीमा को क्रॉस कर गई है। बैंक 9000 करोड़ रुपए क़र्ज़ के ब्याज के रूप में 13000 करोड़ रुपए की कुल राशि क्लेम करता है। जो कि अभी पुनर्विचार के दायरे में है। ये जब्ती का कार्यक्रम कब तक और कहाँ तक चलेगा?”
“भारत में मेरी प्रॉपर्टी की तमाम अटैचमेंट्स के बाद भी बैंकों ने अपने वकीलों को इंग्लैंड में मेरे ख़िलाफ़ झूठे केस करने के लिए रखा है। इस पर जो लीगल फ़ीस आएगी क्या वो पब्लिक के पैसे की बर्बादी नहीं है? उसका ज़िम्मा कौन लेगा?” माल्या ने ट्विटर पर अपने तीसरे ट्वीट में लिखा।
इसके बाद माल्या ने अपने अंतिम ट्वीट में लिखा, “और अंत में, इंग्लैंड में उपस्थित बैंक वकीलों ने लिखित रूप में मेरे द्वारा HMRC के उचित टैक्स ड्यूज़ के भुगतान के अनुरोध पर सवाल उठाए। विडम्बना यह है कि भारत के बैंक, मुझसे इंग्लैंड में उस भारतीय उधार को चुकता करने की बात कर रहे हैं जो पहले से ही सिक्योर किया जा चुका है, और UK को किए जाने वाले भुगतान को रोक रहे हैं। शर्मनाक!”
With respect where have I defrauded Banks ? I did not borrow a single rupee. The borrower was Kingfisher Airlines. Money was lost due to a genuine and sad business failure. Being held as guarantor is not fraud. https://t.co/CygZODV5Xv
इससे पहले माल्या ने अपने बचाव में लिखा था की उसने कुछ भी गलत नहीं किया, गलती कंपनी की थी जिसका बिज़नेस डूब गया, “मैं यह जानना चाहता हूँ कि मैंने कब बैंकों के साथ धोखा किया? मैंने एक रुपया उधार नहीं लिया था। उधार लेने वाली थी किंगफ़िशर एयरलाइन्स। पैसों का नुकसान एक दुखद व्यवसायिक असफलता थी। गारंटर के रूप में पकड़ा जाना फ्रॉड नहीं है। “
खबरों के मुताबिक अंडरवर्लड डॉन रवि पुजारी को अफ्रीकी देश सेनेगल से गिरफ़्तार कर लिया गया है। पुजारी 90 के दशक में मुंबई में एक सक्रिय अपराधी था। जिस पर हत्या और फ़िरौती माँगने के आरोप हैं।
कुछ समय तक माना जा रहा था रवि देश से भागकर ऑस्ट्रेलिया में छिपा हुआ है। लेकिन खुफ़िया सूत्रों के अनुसार पुजारी के सेनेगल में होने की बात का पता चली। इसके बाद उसकी गिरफ़्तारी 22 जनवरी को हुई। वहाँ के दूतावास से भारतीय दूतावास को इसकी जानकारी 26 जनवरी को दी गई। खबरों की मानें तो कहा जा रहा है कि रवि को पूछताछ के लिए भारत लाया जा सकता है।
बता दें रवि पुजारी को अंडरवर्ल्ड का रास्ता दिखाने वाला शख़्स कोई और नहीं हैं बल्कि गैंगस्टर की दुनिया का नामी नाम ‘छोटा राजन’ है, छोटा राजन इस समय नवी मुंबई की जेल में उम्रक़ैद की सज़ा काट रहा है।
मुंबई पुलिस की एंटी एक्सटॉर्शन सेल, जब छोटा राजन के ज्यादातर शूटर्स को पकड़ रही थी उस समय जहाँ तक है रवि बेंगलूरु शिफ्ट हो गया था। मंगलोर में उदूपी के पास पदबिरी का रवि पुजारी, न केवल अंग्रेज़ी भाषा पर अच्छी पकड़ रखता है बल्कि कन्नड़ भी बहुत अच्छे से बोलताा है। साल 2001 में पुजारी ने खुद को छोटा राजन गिरोह से अलग कर लिया था
एक तरफ जहाँ 2009-2013 के बीच में रवि पर कई बॉलीवुड हस्तियों से जबरन वसूली की माँग करने का आरोप है। वहीं पिछले साल ख़बरे थीं कि रवि ने जेएनयू के पूर्व छात्र उमर ख़ालिद, छात्र कार्यकर्ता शेहला राशिद, दलित नेता गुजरात विधायक जिग्नेश मेवानी को जान से मारने की धमकी भी दी है।
राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल के अधीन काम करने वाले राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद सचिवालय (NSCS) ने जम्मू कश्मीर प्रशासन से कश्मीर घाटी से विस्थापित हुए पंडितों, सिखों और अन्य लोगों की अचल संपत्ति का ब्यौरा माँगा है।
जम्मू कश्मीर राज्य के राजस्व विभाग को लिखे पत्र में NSCS ने कश्मीर घाटी से आतंक के कारण विस्थापित होकर जम्मू कश्मीर के अन्य भागों में बसे लोगों की अचल संपत्ति का क्षेत्रवार डेटा माँगा है। हालाँकि NSCS ने 14 जनवरी को लिखे पत्र में यह स्पष्ट नहीं किया यह डाटा किसलिए माँगा गया है।
NSCS ने तनाव में आकर बेची गई संपत्ति का ब्यौरा भी माँगा है। बता दें कि सन 1997 में जम्मू कश्मीर सरकार ने J&K Migrant Immovable Property (Preservation, Protection and Restraint on Distress Sales) Act पास किया था। यह कानून तनाव अथवा भय के कारण बेची जाने वाली संपत्ति को रोकने के लिए लाया गया था। इस कानून के मुताबिक नवंबर 1989 के बाद जो भी कश्मीर घाटी से विस्थापित हुआ और उसने रिलीफ़ कमिश्नर के पास अपना नाम दर्ज कराया है वह ‘माइग्रेंट’ कहलाएगा।
जम्मू कश्मीर के रेवेन्यू कमिश्नर ने डिविज़नल कमिश्नर और अपने कनिष्ठ अधिकारियों से डेटा माँगा है। उनके अनुसार तीन दिनों के भीतर विस्थापितों की संपत्तियों का डेटा उपलब्ध होगा।
बता दें कि मोदी सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद को पहले से अधिक शक्ति प्रदान की है इसलिए NSCS द्वारा विस्थापित कश्मीरी पंडितों का डेटा माँगा जाना घाटी में उनके पुनर्वास के लिए महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है।
मोदी सरकार कुछ करे और हल्ला-हंगामा न हो तो मज़ा कैसे आएगा? मज़ा को तो छोड़िए, कॉन्ग्रेस के कुछ नेताओं को तो शायद खाना तक न हज़म हो।
मनीष तिवारी के ट्वीट का स्क्रीनशॉट-1
अंतरिम बजट पेश होने से पहले राहुल गाँधी यूनिवर्सल बेसिक इनकम को लेकर ऐलान कर ही चुके हैं। लेकिन मनीष तिवारी अगर इसमें छौंक नहीं लगाएँगे तो ‘महाराज’ खुश कैसे होंगे भला!
मनीष तिवारी के ट्वीट का स्क्रीनशॉट-2
बस तिवारी जी आ गए छौंक लगाने। मोदी सरकार से पहले बजट पेश कर दिया। संसद में नहीं, सोशल मीडिया पर। ऊपर से लिख दिया कि इसे सरकार ने ही लीक किया है। हद कर दी तिवारी जी आपने!
मनीष तिवारी जी! आप बहुत क्यूट हैं। आपकी सरकार से सूचना निकलवाने वाले लूटियंस पत्रकार तक को मोदी सरकार में ‘धक्के’ खाने पड़ रहे हैं और आप बात कर रहे हैं बजट लीक होने की! वो भी मीडिया के सूत्रों को! खैर! आपकी भी दुकान चलती रहे, शिवभक्त राहुल बाबा का आशीर्वाद बना रहे आप पर। 3-4 पहले वैसे भी आप लोकसभा में घुसने के लिए सांसदी का दावा ठोक ही चुके हैं। ‘महाराज’ पर दबाव बनाना भी जरूरी है।
मनीष तिवारी के ट्वीट का स्क्रीनशॉट-3मनीष तिवारी के ट्वीट का स्क्रीनशॉट-4
आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय के सचिव श्री दुर्गा शंकर मिश्र की अध्यक्षता में हुई इस बैठक में कुल 940 परियोजनाओं को मंजूरी दी गई, ₹7,180 करोड़ की केन्द्रीय सहायता के साथ इनकी परियोजना की कुल लागत ₹22,492 करोड़ है।
आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय ने शहरी गरीबों के लाभ के लिए प्रधानमंत्री आवास योजना (शहरी) के अंतर्गत 4,78,670 अन्य किफायती मकानों के निर्माण को मंजूरी प्रदान की है।
केन्द्रीय स्वीकृति एवं निगरानी समिति (सीएसएमसी) की कल हुई 42वीं बैठक के दौरान यह मंजूरी प्रदान की गई। प्रधानमंत्री आवास योजना (शहरी) के अंतर्गत अब कुल स्वीकृत मकानों की संख्या 72,65,763 हो गई है।
आंध्र प्रदेश के लिए 1,05,956 मकानों को जबकि पश्चिम बंगाल के लिए 1,02,895 मकानों को मंजूरी दी गई है। उत्तर प्रदेश के लिए 91,689 मकानों को स्वीकृति दी गई है, जबकि तमिलनाडु के लिए 68,110 मकानों को स्वीकृति दी गई है।
मध्य प्रदेश के लिए 35,377 मकानों और केरल के लिए 25,059 मकानों को मंजूरी दी गई है। महाराष्ट्र के लिए 17,817 और ओडिशा के लिए 12,290 मकानों को मंजूरी दी गई है। बिहार के लिए 10,269 जबकि उत्तराखंड के लिए 9,208 मकानों को मंजूरी दी गई है।
शहीद राइफलमैन औरंगज़ेब के पिता मोहम्मद हनीफ़, जो जम्मू-कश्मीर लाइट इन्फेंट्री के पूर्व सिपाही रह चुके हैं, जल्द ही भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने जा रहे हैं। प्रधानमंत्री मोदी की 3 फ़रवरी की जम्मू-कश्मीर यात्रा के दौरान हनीफ़ के भाजपा में शामिल होने की सम्भावना है।
औरंगज़ेब शोपियाँ के शादीमर्ग में 44 राष्ट्रीय राइफल्स कैंप पर पोस्टेड थे जब पुलवामा में आतंकियों ने उनकी क्रूरता से हत्या कर दी। ईद मनाने के लिए औरंगज़ेब अपने घर जा रहे थे जब आतंकियों ने उनका अपहरण कर लिया। उसके बाद उनकी लाश गुस्सू गाँव से 10 किलोमीटर दूर पाई गई।
भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरांत शौर्य चक्र देकर सम्मानित किया। उनकी हत्या वाली वीडियो, जिसमें उन्हें आतंकियों के द्वारा गोली मारी गयी, सोशल मीडिया पर बहुत वायरल हुई थी। वीडियो में औरंगज़ेब की आवाज़ सुनी जा सकती थी जब वो निर्भीक होकर आतंकी से बात कर रहे थे।
जब औरंगज़ेब के शहादत की ख़बर फैली तो, कहा जाता है कि लगभग 50 किशोरों ने गल्फ़ देशों में अपनी नौकरियाँ छोड़ दीं ताकि वो पुलिस या सेना की नौकरी कर सकें। उनके पिता ने घाटी से आतंकवाद के ख़ात्मे की मोदी से अपील की थी। रिपोर्ट के अनुसार उनके पिता का नाम भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को दिया जा चुका है।
कर्नाटक में आजकल सियासी तूफ़ान चल रहा है। कॉन्ग्रेस और जनता दल (सेक्युलर) के बीच गठबंधन की सरकार में कुछ भी ठीक नहीं चल रहा है। राज्य के मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी के अपनी पीड़ा उजागर करने के बाद अब उनके पिता और देश के पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा ने भी अपना मुँह खोला है।
पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा ने कर्नाटक में चल रही सियासत पर दुख जताया है। उन्होंने कहा, “मैं बहुत दुखी हूँ। एचडी कुमारस्वामी को मुख्यमंत्री बने हुए आज 6 महीने हो गए हैं, लेकिन मैंने अभी तक अपना मुँह नहीं खोला है, लेकिन मैं अब चुप नहीं रह सकता हूँ।” उन्होंने कहा कि इन 6 महीनों में सभी प्रकार की चीजें हुई हैं। अपना दुःख व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा, “क्या यह गठबंधन सरकार चलाने का कोई तरीका है? जहाँ हर दिन आपको अपने गठबंधन के साथी से अनुरोध करना होगा कि वह कोई बेकार की टिप्पणी न करें।”
Former PM HD Deve Gowda: I am in pain, today six months have completed since Kumaraswamy became Chief Minister. All kinds of things have happened in these 6 months, till now I have not opened my mouth but I can’t keep quiet now. (30.1.19) pic.twitter.com/YECpMIX29e
इस से पहले भी कर्नाटक में कॉन्ग्रेस व जनता दल सेक्यूलर (जेडीएस) के नेताओं के बीच आए दिन बिगड़ते रिश्ते की ख़बर पर ख़ुद राज्य के मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी कॉन्ग्रेस पर भड़क गए थे। दोनों ही दलों के बीच रिश्ता इतना ख़राब हो चुका है कि ख़ुद मुख्यमंत्री को बयान देना पड़ा।
कुमारस्वामी ने मीडिया द्वारा पूछे गए एक सवाल के जवाब में कहा, “कॉन्ग्रेस के नेता अपनी सीमा को लाँघ रहे हैं। कॉन्ग्रेस को अपने नेताओं को कंट्रोल करना चाहिए। यदि कॉन्ग्रेस के नेता इस तरह के बयान देते रहे तो मैं मुख्यमंत्री पद से पीछे हटने के लिए तैयार हूँ।” मुख्यमंत्री ने अपने बयान में यह भी कहा कि कॉन्ग्रेस को इन मुद्दों पर नजर रखनी चाहिए, मैं इनके लिए जिम्मेवार व्यक्ति नहीं हूँ।
#WATCH: Karnataka CM HD Kumaraswamy says “…If they want to continue with the same thing, I am ready to step down. They are crossing the line”, when asked ‘Congress MLAs are saying that Siddaramaiah is their CM’.’ pic.twitter.com/qwErh4aEq4
दरअसल कॉन्ग्रेस की तरफ़ से राज्य के उपमुख्यमंत्री बने जी परमेश्वरा ने बयान दिया था कि सिद्धरमैया सबसे अच्छे व्यक्ति रहे हैं। “वह हमारे नेता हैं। कॉन्ग्रेस विधायकों के लिए सिद्धरमैया ही मुख्यमंत्री हैं। हम उनके साथ खुश हैं।” राज्य के उपमुख्यमंत्री के इस बयान के बाद पत्रकारों ने जब मुख्यमंत्री से इस मामले में सवाल किया तो मुख्यमंत्री ने पद छोड़ने तक की बात कह दी।
सीबीआई प्रमुख के पद से हटाए जा चुके आलोक वर्मा पर विभागीय कार्रवाई की जा सकती है। इसका मुख्य कारण यह है कि उन्हें जब सरकार ने फ़ायर सर्विस, सिविल डिफेन्स और होम गार्ड्स के प्रमुख की ज़िम्मेदारी दी थी, तो उन्होंने ज्वाइन नहीं किया।
आज के ही दिन उन्हें ज्वाइन करना था। अगर विभागीय कार्रवाई में उन्हें दोषी पाया गया तो उनकी पेंशन और उससे सम्बंधित सुविधाएँ ख़त्म की जा सकती है।
10 जनवरी, 2019 को सीबीआई निदेशक पद से हटाए जाने के बाद आलोक वर्मा ने शनिवार को नौकरी से इस्तीफ़ा दे दिया था। उससे पहले प्रधानमंत्री के नेतृत्व वाले हाई पावर्ड समिति ने आलोक वर्मा को सीबीआई निदेशक पद से हटा कर उनका तबादला फ़ायर सर्विसेज में कर दिया था। इसके बाद वर्मा ने फ़ायर विभाग में चार्ज लेने से इनकार कर दिया और सर्विस से इस्तीफ़ा दे दिया। फरवरी 1, 2017 को सीबीआई डायरेक्टर बनाए गए वर्मा आज (जनवरी 31, 2019) रिटायर होने वाले थे। अपने इस्तीफ़े में उन्होंने कहा:
“मैं अपनी सर्विस 31 जुलाई 2017 को ही पूरी कर चुका था और सिर्फ सीबीआई डायरेक्टर के पद पर कार्यरत था। सिविल डिफेंस, फायर सर्विसेज़ और होमगार्ड का महानिदेशक बनने के लिए तय आयु सीमा को मैं पार कर चुका हूँ।”
आलोक वर्मा का इस्तीफ़ा पत्र
बता दें कि सीबीआई डायरेक्टर आलोक वर्मा और उनके डिप्टी राकेश अस्थाना के बीच हुए विवाद के बाद दोनों को ही पद से हटा दिया गया था। 23 अक्टूबर की आधी रात को केंद्र सरकार ने सीबीआई के भीतर बढ़ते विवाद को लेकर आलोक वर्मा को उनके पद से मुक्त कर लम्बी छुट्टी पर भेज दिया था। इसके करीब ढ़ाई महीने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार के इस फ़ैसले को पलटते हुए वर्मा को फिर से बहाल कर दिया था। अदालत ने अपने इस निर्णय में कहा था कि इस मामले में आगे का फैसला चयन समिति करेगी। चयन समिति में प्रधानमंत्री के अलावे नेता प्रतिपक्ष और मुख़्य न्यायाधीश का शामिल होना था। शुक्रवार को हुई समिति की बैठक में मुख़्य न्यायाधीश के प्रतिनिधि के रूप में न्यायमूर्ति एके सीकरी ने भाग लिया था।
1979 बैच के IPS अधिकारी आलोक वर्मा सीबीआई के 27वें निदेशक थे। सीबीआई निदेशक के रूप में उनका कार्यकाल काफी विवादित रहा और राकेश अस्थाना से उनके झगड़े के कारण सीबीआई भी कई दिनों तक सुर्ख़ियों में रही। वर्मा के खिलाफ केंद्रीय सतर्कता आयोग में भ्रष्टाचार संबंधी जाँच भी चल रहा है। वर्मा ने कहा कि उन्होंने सीबीआई की अखंडता बनाए रखने की पूरी कोशिश की लेकिन कुछ लोगों द्वारा इस संस्था को बर्बाद करने की कोशिश की जा रही है।
भारत को जल्द ही भगौड़े कारोबारी विजय माल्या के स्विस बैंक खातों की जानकारी और अन्य विवरण प्राप्त हो सकते हैं। स्विटजरलैंड की शीर्ष अदालत द्वारा सूचना प्रदान करने को मंजूरी मिलने के बाद दोनों देशों के अधिकारियों द्वारा पहल शुरू की जा चुकी है।
रिपोर्ट्स के अनुसार जेनेवा और नई दिल्ली के अधिकारियों ने मामले की जानकारी देते हुए कहा कि फ़ेडरल कोर्ट ने माल्या की अपील को रद्द कर दिया है।
विजय माल्या ने अगस्त 14, 2018 को स्विस बैंकों में उनके द्वारा रखे गए तीन बैंक खातों से संबंधित दस्तावेजों को भारतीय अधिकारियों को प्रेषित करने के लिए जेनेवा के सरकारी वकील के निर्णय को चुनौती दी थी।
जेनेवा के कार्यालय ने ईमेल द्वारा दिए जवाब में पुष्टि की है कि भारतीय अधिकारियों के अनुरोध को स्वीकार कर लिया गया है। स्विस फ़ेडरल कोर्ट के अनुसार, कार्यालय ने भारतीय जाँच एजेंसियों द्वारा माल्या के 3 स्विस बैंक खातों की जाँच शुरू कर दी है।
केंद्रीय जाँच ब्यूरो (CBI) ने विजय माल्या से सम्बंधित बैंक खातों में धनराशि को अवरुद्ध करने के लिए स्विस अधिकारियों से अनुरोध किया था, साथ ही खातों का विवरण प्रदान करने की भी माँग की थी।
कुछ समय पहले सीबीआई ने स्विस अधिकारियों से इस बात का अनुरोध किया था कि वो भगौड़े व्यापारी विजय माल्या के चार बैंक अकाउंट में आने वाले फंड को रोक दें।
जिसके बाद जेनेवा के सरकारी वकील ने न केवल सीबीआई द्वारा किए इस अनुरोध का 14 अगस्त 2018 को पालन किया है, बल्कि माल्या के अन्य तीन बैंक अकाउंट की जानकारियों को भी साझा किया है। साथ ही उन पाँच कंपनियों की भी जानकारी दी है जिनका संबंध माल्या से है।
इन पाँच कंपनियों में लेडीवॉक इंवेस्टमेंट, रोज़ कैपिटल वेंचर्स, कॉन्टीनेंटल एडमिनिस्ट्रेशन सर्विसज़, फर्स्ट यूरो कमर्शियल इन्वेस्टमेंट्स और मॉडल सेक्योरिटी का नाम शामिल है। जिनकी जानकारी स्विस सरकार ने सीबीआई के साथ साझा की है।
इन कंपनियों ने स्विस कोर्ट की तरफ रुख़ करते हुए कहा है कि उनकी कंपनियों के अकाउंट वो अकाउंट नहीं थे जिसकी जानकारी सीबीआई द्वारा मांगी गई है तो फिर उनकी जानकारियाँ क्यों भेजी गई हैं।
इसके अलावा माल्या ने अपनी स्विस की कानूनी टीम की मदद से वहाँ के न्यायलय में सीबीआई को जानकारी देने के मामले पर सवाल उठाए हैं। माल्या का कोर्ट में कहना रहा कि भारत में पहले ही घोटालों से जुड़े मामलों पर गंभीर तनाव वाली स्थिति बनी हुई। क्योंकि सीबीआई के जिस अफसर को माल्या और राकेश अस्थाना के ख़िलाफ़ जाँच करनी थी वो खुद ही इस समय में भ्रष्टाचार के मामले में आरोपित है।
माल्या ने खुद के बचाव में यूरोपीय अदालत के अनुच्छेद 6 का हवाला देते हुए मानवाधिकारों के बारे में भी स्विस कोर्ट में बात की। माल्या ने अपने अधिकारों के बारे में बात करते हुए कहा कि जब तक वो दोषी नहीं साबित होते तबतक उनके अधिकारों के प्रति निष्पक्ष सुनवाई हो।
लेकिन, आपको बता दें कि संघीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 26 और 29 नवंबर, 2018 लिए फ़ैसलों ने माल्या की बात को ख़ारिज कर दिया और कंपनियों द्वारा अपील को अस्वीकार कर दिया और प्रत्येक असफल अपीलकर्ता को 2,000 स्विस फ़्रैंक (1.4 लाख रुपए) का भुगतान करने का आदेश दिया।
यूनिवर्सल बेसिक इनकम पूरी दुनिया में चर्चा का विषय है। अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड सहित कई यूरोपीय देशों के साथ-साथ ईरान और इराक़ जैसे मध्य एशिया के देशों में भी लागू है।
हो सकता है कि मोदी सरकार भी इस बजट सत्र में यूनिवर्सल बेसिक इनकम से जुड़ा कोई बड़ा ऐलान कर दे। माहौल भाँपते हुए राहुल गाँधी भी एक रैली में बेसिक इनकम से जुड़ी योजना की घोषणा को हवा दे चुके हैं। अब देखना ये है कि क्या ऐसी कोई योजना निकट भविष्य में लागू होती है, ज़रूरी होने के बावज़ूद संसाधनों के अभाव में टल जाती है या महज़ एक चुनावी घोषणा ही बनकर रह जाती है।
यूनिवर्सल बेसिक स्कीम की चर्चा लंबे समय से की जा रही थी। लेकिन मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, कहा जा रहा है कि हाल ही में विभिन्न मंत्रालयों से इस संबंध में राय माँगी गई है। PMO, बेसिक इनकम पर अलग-अलग मंत्रालयों के साथ बैठकें कर उनकी राय के अनुसार इसकी रूप रेखा पर अंदरखाने काम भी कर रहा है। हालाँकि, अभी इस बात की ख़बर नहीं है कि कौन-कौन इसमें शामिल होगा और इसके लिए संसाधन कहाँ से जुटाए जाएँगे।
फिर भी, मीडिया के सूत्रों का ऐसा कहना है कि सरकार यूनिवर्सल बेसिक इनकम के तहत जीरो इनकम वाले सभी नागरिकों के बैंक खातों में एक तयशुदा रकम सीधा ट्रांसफर करेगी। जीरो इनकम वाले नागरिकों का मतलब साफ़ है कि वो नागरिक जिनके पास कमाई का कोई साधन नहीं है। इसमें किसान, छोटे व्यापारी और बेरोज़गार युवा शामिल होंगे। इस योजना के तहत देश के हर साधनहीन नागरिक को 2,000 से 2,500 रुपए तक हर माह दिए जा सकते हैं।
बता दें कि इस स्कीम के तहत क़रीब 10 करोड़ लोग लाभान्वित हो सकते हैं, ऐसा अभी तक अनुमान है। साल 2016-17 के आर्थिक सर्वेक्षण में सरकार को इस योजना को लागू करने की सलाह दी गई थी। उम्मीद की जा रही है कि नए साल के बजट में मोदी सरकार इस बड़ी योजना का ऐलान कर सकती है।
UBI पर वैश्विक सोच क्या है
एक तरफ़ जहाँ अर्थशास्त्री आर्थिक असमानता, आय में धीमी वृद्धि के कारण UBI की वकालत कर रहे हैं। उनके हिसाब से आने वाले कई दशक विश्व भर में व्यापक बदलावों से भरे हैं। तकनिकी उन्नयन, ऑटोमेशन, बड़े मशीन, रोबोट, आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस के प्रयोग से नौकरियाँ के न सिर्फ़ भारत में बल्कि यूरोप, मध्य एशिया, रूस तथा अमेरिका में भी तेज़ी से कम होने की सम्भावना व्यक्त की जा रही है। यही कारण है कि हाल के वर्षों में वैश्विक स्तर पर यूनिवर्सल बेसिक इनकम लागू करने की माँग तेज़ हुई है।
भारत में UBI लागू होने की सम्भावना
अगर भारत की बात करें तो यहाँ आबादी का एक बड़ा हिस्सा अभी भी ग़रीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने को मज़बूर है। तमाम रक्षात्मक उपायों के बाद भी ग़रीबों को सब्सिडी एवं सहायता प्रदान करने वाली कई सरकारी योजनाएँ विभिन्न समस्याओं से ग्रस्त हैं। इन योजनाओं में GDP का एक बड़ा हिस्सा ख़र्च होने के बावजूद भी इनके क्रियान्वयन में समस्या आती है।
बता दें कि, वर्तमान में मोदी सरकार की देश की जनता के उत्थान के लिए कुल 950 फ़्लैगशिप योजनाएँ चल रही हैं। इन योजनाओं को चलाने के लिये GDP का करीब 5% ख़र्च होता है। ये योजनाएँ ग़रीबों, वंचितों, अनुसूचित जातियों, जनजातियों को लाभ पहुँचा रही हैं या नहीं या कितना पहुँच रहा है। इसके भी कुछ योजनाओं को छोड़कर, कोई वास्तविक आँकड़े मौजूद नहीं है।
आर्थिक सर्वेक्षण- 2016-17 में भी इस बात को स्वीकार किया गया है कि इन सभी योजनाओं को यदि बंद कर इनमें ख़र्च होने वाले पैसे को UBI की ओर ले जाया जाए तो ग़रीबों तक डायरेक्ट पैसा पहुँचेगा और उनकी स्थिति में वास्तविक सुधार नज़र आएगा। लाख कोशिशों के बाद भी सिस्टम में अनेक खामियों के चलते जिन लोगों को वास्तव में सरकारी सहायता की ज़रूरत होती है, उन तक कई योजनाओं के लाभ नहीं पहुँच पाते। इसलिये यह तर्क दिया जाता है कि यूनिवर्सल बेसिक इनकम देश के सभी ज़रूरतमंद नागरिकों को बेसिक आय प्रदान कर इन समस्याओं को दूर कर सकती है।
UBI लागू करने की राह में कौन-सी प्रमुख अड़चने हैं
दुनिया भर में उच्च असमानता की स्थिति और ऑटोमेशन के कारण रोज़गार के नुकसान की संभावना ने कई उन्नतशील अर्थव्यवस्थाओं को भी यूनिवर्सल बेसिक इनकम (UBI) पर विचार करने को प्रेरित किया है। ताकि, उनके नागरिकों को न्यूनतम स्तर की ज़रूरी नियमित आय की गारंटी दी जा सके। हालाँकि, कई विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि सबके लिए बेसिक इनकम का बोझ कोई बहुत विकसित अर्थव्यवस्था ही उठा सकती है। जहाँ सरकार का ख़र्च सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के 40% से ज़्यादा हो और सरकार का टैक्स से होने वाली आय का आँकड़ा भी इसके आसपास ही हो।
यदि हम भारत के सन्दर्भ में बात करें तो टैक्स और GDP का यह अनुपात 17% से भी कम बैठता है। समुचित टैक्स संग्रहण न होने के कारण, हम तो बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं और आधारभूत ढाँचे के अलावा बाह्य और आंतरिक सुरक्षा, मुद्रा और बाहरी वैश्विक संबंधों से जुड़ी संप्रभु प्रक्रियाओं का बोझ भी उठाने में कठिनाई महसूस करते हैं।
भारत सहित दुनिया के वो देश जहाँ UBI पायलट प्रोजेक्ट के रूप में लागू है या लागू हो चूका है
बेसिक इनकम की जब भी बात होती है तो उसकी राह में सबसे बड़ी चुनौती यह है कि ‘बेसिक आय’ का स्तर क्या हो? अर्थात वह कौन-सी राशि होगी जो व्यक्ति की न्यूनतम ज़रूरतों को पूरा कर सके? चलिए मान लेते हैं यदि हम ग़रीबी रेखा का पैमाना भी लेते हैं, जो कि औसतन 40 रुपए रोज़ाना है (गाँव में 32 रुपए और शहर में 47 रुपए), तो इस हिसाब से प्रत्येक व्यक्ति को लगभग 14000 रुपए वार्षिक या 1200 रुपए प्रति माह की न्यूनतम आय की गारंटी देनी होगी।
पहली नज़र में यह न्यूनतम राशि व्यावहारिक प्रतीत हो रही है लेकिन यदि हम ग़रीबी रेखा की इन आँकड़ो की नज़र से ही देखें तो अपनी कुल जनसंख्या की 25% शहरी वंचितों को सालाना 14000 रुपए और अन्य 25% ग्रामीण आबादी को वार्षिक 7000 रुपए देने की ज़रूरत पड़े और बाकी आबादी को कुछ भी न दें तो भी योजना की लागत आएगी प्रति वर्ष 6,93,000 करोड़ रुपए। हालाँकि, इस तरह के भेदभाव से शहरों की तरफ़ पलायन बढ़ेगा, जो एक नई समस्या को निमंत्रण देना होगा, कहने का तात्पर्य यह है कि इस प्रकार के भेदभाव को व्यवहारिक नहीं कहा जा सकता।
ग़ौरतलब है कि यह राशि वित्तीय वर्ष 2016-17 में सरकार के भुगतान बज़ट के 35% के बराबर है। इस गणित के हिसाब से वर्तमान परिस्थितियों में यह आवंटन सरकार के लिये संभव नज़र नहीं आ रहा। हो सकता है सरकार इस बोझ को कम करने के लिए पायलट रूप में योजना को कई चरणों में लागू करे या और भी कोई नया प्रावधान कर सकती है। वो क्या होगा? सरकार कौन से क़दम उठाएगी, इस पर अभी कुछ और कहना जल्दबाज़ी होगी। फिर भी मोदी सरकार की कार्यप्रणाली पर पिछले लगभग पाँच सालों तक बारीक़ नज़र रखने के आधार पर अभी ऐसी भविष्यवाणी की जा सकती है।
सम्भावित राह: मोदी सरकार से उम्मीदें
अहम सवाल ये है कि सबको पैसा देने के लिये धन कहाँ से आएगा? मोदी सरकार एक झटके में नोटबंदी की तरह यदि फ़्लैगशिप योजनायें बंद करती है तो विपक्ष को चुनावी साल में फिर से बवाल काटने का हथियार मिल जाएगा। विपक्ष के पिछले प्रदर्शन को देखते हुए शायद ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ऐसा कोई क़दम उठाएँ। अब अगर वर्तमान में लागू जन-कल्याणकारी योजनाओं के साथ-साथ UBI को लागू करना हो, तो इसके लिए अनुमानित राशि कहाँ से आएगी, ये सवाल और भी स्वाभाविक और गंभीर रूप में हमारे सामने आता है।
इसीलिये, यह माना जाता है कि भारत जैसे देश में UBI तभी संभव है, जब कर संरचना (Tax Structure) में व्यापक बदलाव कर, उसे प्रगतिशील या रैडिकल बनाया जाए। टैक्स स्ट्रक्चर में परिवर्तन के संकेत मोदी सरकार पहले भी नोटबंदी जैसा बड़ा क़दम उठा के दे चुकी है। आँकड़ों के हिसाब से नोटबंदी के बाद से टैक्स से प्राप्त आय में कई गुना बढ़ोतरी हुई है। साथ ही GST के लागू होने से भी भारत सरकार का कर संग्रह बढ़ा है।
बता दें कि विकसित देशों में न्यूनतम मानव श्रम के उपयोग के साथ उत्पादन करने वाली मशीनों पर टैक्स लगाने का विचार चर्चित रहा है। और लोग वहाँ स्वतः भी ईमानदारी से टैक्स भरते हैं। हमारे यहाँ सारे जतन कर चोरी के लिए किये जाते हैं। इन बातों से सीख लेते हुए भारत में भी ऑटोमेशन का इस्तेमाल करने वाली कंपनियों पर ज़्यादा टैक्स लगाया जा सकता है तथा कर संरचना में सुधार कर, उस पैसे को UBI में इस्तेमाल किया जा सकता है।
हालाँकि, पूरे भारत में एक साथ UBI लागू करना अभी भी एक बड़ी चुनौती है। फिर भी, कुछ आवश्यक रक्षात्मक क़दम उठाकर इस चुनौती का समाधान किया जा सकता है।
वर्तमान में मोदी के वैश्विक प्रयासों से दक्षिण एशिया में स्थिरता का माहौल है एवं चीन, पाकिस्तान तथा अन्य पड़ोसी देशों के साथ भारत के बेहतर संबंध को देखते हुए, यदि तेल के आयात व रक्षा ख़र्च में कमी कर दी जाए तो शायद इतना पैसा बचाया जा सकता है कि भारत आने वाले समय में UBI पर गंभीरता से विचार कर सकता है। एक गणना के मुताबिक, UBI को यदि वास्तव में यूनिवर्सल रखना है तो उसके लिये जीडीपी का लगभग 10% ख़र्च करना होगा। यदि इसे सीमित दायरे में सिर्फ़ कुछ तबकों के लिये ही लागू किया जाता है, तो फिर इस योजना को ‘यूनिवर्सल’ न कहकर ‘बेसिक इनकम’ कहना ज़्यादा समीचीन होगा।
इसमें दो राय नहीं है कि बेसिक इनकम का विचार भारत की जनता के स्वास्थ्य, शिक्षा और अन्य नागरिक सुविधाओं में सुधार के साथ-साथ देश के वंचित, साधनहीन जनसँख्या के जीवन-स्तर को भी ऊपर उठाने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण प्रयास होगा लेकिन सबके लिये एक बेसिक इनकम तब तक संभव नहीं है जब तक कि वर्तमान में सभी योजनाओं के माध्यम से दी जा रही सब्सिडी को ख़त्म न कर दिया जाए। अतः सभी भारतवासियों के लिये एक बेसिक इनकम की व्यवस्था करने की बजाए यदि मोदी सरकार सामाजिक-आर्थिक जनगणना की मदद से समाज के सर्वाधिक वंचित तबके के लिये एक निश्चित न्यूनतम आय की व्यवस्था करती है तो यह कहीं ज़्यादा प्रभावी और व्यावहारिक होगा।
बेसिक इनकम के माध्यम से लोगों के जीवन में प्रत्यक्ष सुधार की उम्मीद की जा सकती है, साथ ही इससे सामाजिक सुधार को भी बल मिलेगा। पिछले पाँच सालों में जिस तेज़ी से मोदी सरकार भारत के बुनियादी विकास की रूप रेखा बना रही है वह आशा कि किरण है। हाल ही में प्रधानमंत्री ने अपने विकसित भारत के सपने को साकार करने के लिए, ‘सबका साथ, सबका विकास’ मूल मंत्र पर चलते हुए सूरत की एक रैली में देश के लोगों से पुनः बहुमत की सरकार चुनने की अपील की। जिस तरह से देश उनके विज़न के प्रति उत्साह दिखा रहा है, वह आने वाले भारत के लिए सुखद उम्मीदों से परिपूर्ण है।