जेएनयू में राष्ट्र विरोधी नारेबाज़ी के मामले में ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ के सदस्यों के ख़िलाफ़ दायर की गई दिल्ली पुलिस की चार्जशीट पर होने वाली सुनवाई एक बार फिर 28 फ़रवरी तक के लिए टल गई है। इस दौरान पटियाला हाउस कोर्ट ने दिल्ली सरकार की लेट-लतीफ़ी पर फटकार लगाते हुए अपनी नाराजगी जाहिर की है।
दिल्ली सरकार पिछले कुछ समय से दिल्ली पुलिस द्वारा दायर आरोप पत्र पर ज़रूरी सरकारी अनुमति नहीं दे रही थी। जिस पर कोर्ट ने फटकार लगाते हुए केजरीवाल सरकार को कहा कि वह फ़ाइल पर बैठ नहीं सकती है। अदालत ने कहा कि सरकार के कहने पर दिल्ली के अधिकारी अनिश्चितकाल तक फ़ाइल अटका कर नहीं रख सकते। कोर्ट ने दिल्ली पुलिस से कहा कि मुक़दमा चलाने के लिए संबंधित अधिकारियों से जल्द से जल्द मंजूरी देने को कहें।
अदालत ने कन्हैया कुमार एवं अन्य पर मुक़दमा चलाने के लिए दिल्ली पुलिस को मंजूरी हासिल करने के लिए 28 फ़रवरी तक का समय दिया है। इसके साथ ही अदालत ने दिल्ली सरकार से कहा है कि वो इस मुद्दे पर अपना रुख स्पष्ट करें।
कोर्ट में सुनवाई टलने के बाद जेएनयू नारेबाजी विवाद में कन्हैया कुमार और उनके साथियों के ख़िलाफ़ देशद्रोह का मामला चलेगा या नहीं इसे लेकर सस्पेंस लगातार बरकरार है। इसे लेकर अड़चने साफ नहीं हो सकी क्योंकि मामले की सुनवाई आज भी टल गई।
बता दें, दिल्ली पुलिस ने कुछ दिनों पहले कन्हैया कुमार और अन्य के खिलाफ अदालत में आरोप पत्र दायर किया था। दिल्ली पुलिस का कहना है कि कन्हैया कुमार ने जुलूस की अगुवाई की और जेएनयू परिसर में फ़रवरी 2016 में देश विरोधी नारे लगाए जाने का समर्थन किया था।
पुलिस ने विश्वविद्यालय के पूर्व छात्रों उमर खालिद तथा अनिर्बान भट्टाचार्य पर जेएनयू परिसर में संसद हमले के मुख्य साजिशकर्ता अफ़जल गुरु को फाँसी दिए जाने की बरसी 9 फरवरी 2016 को आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान भारत विरोधी नारे लगाने का आरोप भी लगाया है।
बता दें, देश विरोधी नारेबाज़ी मामले में अन्य आरोपितों में कन्हैया कुमार, उमर ख़ालिद के साथ आकिब हुसैन, मुजीब हुसैन, मुनीब हुसैन, उमर गुल, रईया रसूल, बशीर भट, बशरत को भी आरोपी बनाया गया है।
वर्ष 2009 में अचानक से कश्मीर का एक नौजवान देश की मेनस्ट्रीम मीडिया की सुर्खियाँ बन गया था। कश्मीर के बारे में प्रचलित नैरेटिव से अलहदा एक नौजवान सामने आया था। अखण्ड भारत के दूसरे हिस्से के लोगों को ये लगने लगा था कि कुछ भटके हुए कश्मीरियों की बुद्धि में जो भारत के प्रति मानसिकता का कुहासा है, वो शायद अब छँट गया है।
ये नौजवान शाह फ़ैसल था और इसने वर्ष 2009 की परीक्षा में यूपीएससी टॉप किया था और प्रतिष्ठित सेवा आईएएस के लिए चयनित हुआ था। उस समय आईएएस शाह फ़ैसल अपने तमाम साक्षात्कारों में ये बात कहते थे कि कश्मीर का युवा देश के विकास में भागीदारी चाहता है, उसे अपने देश के प्रति सम्पूर्ण निष्ठा है। शाह व्यक्तिगत तौर पर भी आतंक पीड़ित थे, उनके पिता की आतंकियों ने हत्या कर दी थी। इसलिए वो खुलकर आतंकियों की मुख़ालफ़त करते थे और तमाम सेमिनारों में कश्मीर के चहुमुखी विकास का खाका भी देते थे।
हम लोग भी यही समझते थे कि शाह फ़ैसल जैसा युवा ही कश्मीरी स्पिरिट का प्रतिबिंब है। इसके बाद इसी लीक पर अतहर आमिर का भी यूपीएससी 2015 में द्वितीय स्थान के लिए चयन हुआ। उधर परवेज़ रसूल का चयन भारतीय क्रिकेट टीम में हो गया। ये लोग आम कश्मीरियों के लिए रोल मॉडल सरीखे थे।
अचानक से इन्हीं रोल मॉडल की जमात के बीजपुरुष शाह फ़ैसल का उस सरकारी मशीनरी से मोहभंग हो जाता है, जिसकी निष्ठा के लिए उन्होंने नौ बरस पहले शपथ ली थी। वो कहते हैं कि उन्हें दुःख है कि कश्मीरियों की हत्या हो रही है और केंद्र सरकार कुछ नहीं कर रही है। देश के विरुद्ध खुली यलगार करने वाले पत्थरबाजों से उन्हें सहानुभूति हो जाती है। अलगाववादी नेताओं में उन्हें लीजेंड नज़र आने लगता है।
अखण्ड भारत के कश्मीर से इतर हिस्से को वो मेनलैंड कहने लगते हैं। गोया कश्मीर उस मेनलैंड से अलग एक टेरीटरी भर है। जिस लोकतांत्रिक ढांचे के बूते वो एमबीबीएस सहित यूपीएससी की सेवा में आते हैं, उसे वो कश्मीरियों के संग सौतेला व्यवहार करने वाला बताने लगते हैं।
हाल ही में तो उन्होंने गलीचपन की सारी सीमाएँ लाँघ लीं। उन्होंने कहा कि मैंने अपने सेवा के दौरान के नौ वर्ष ऐसे बिताए हैं मानो मैं किसी कैद में हूँ। उनके लिए भारतीय प्रशासनिक सेवा में नौकरी करना जेल में रहने जैसा है। सत्ता लोलुपता में लोगों को नीचे गिरते हुए देखा है। मग़र ऐसे नीच उदाहरण विरले ही देखने को मिलते हैं।
ऐसे बौद्धिक मतिछिन्न का इतनी प्रतिष्ठित सेवा के लिए चयन होना देश के लिए किसी दुर्दैव सपने से कम नहीं है। जो अपनी सेवा की तुलना जेल में बिताए गए दिनों से करता हो, उसने इन नौ सालों में एक रत्ती भी उत्पादनकारी कार्य न किया होगा, इसकी गारंटी है। जिसके दिलोदिमाग़ में शासन-प्रशासन को लेकर इस हद तक मार्बिडिज्म (घृणा) हो, वो भला कैसे निष्ठावान होकर देश के लिए योगदान कर सकता है।
शाह फ़ैसल जैसे युवा का चयन-इस्तीफ़ा घटनाक्रम उन नवयुवाओं में निराशा का संचार करता है जो इस प्रतिष्ठित सेवा की तैयारी में अपना दिन-रात होम कर देते हैं। जिस प्रकार भारतीय क्रिकेट टीम में चयन के लिए यो-यो टेस्ट की अनिवार्यता होती है, उसी प्रकार कार्मिक एवं प्रशासन मंत्रालय को लोक सेवकों की एचआर एजेंसी यूपीएससी को ये निर्देश जारी कर देना चाहिए कि वो लोकसेवकों की बराबर जाँच करते रहें ताकि शाह फ़ैसल जैसे मतिछिन्न युवा को सेवा से बाहर का रास्ता दिखाया जा सके।
सबरीमाला विवाद की 65 याचिकाओं पर बुधवार (फरवरी 6, 2019) को सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने सुनवाई की। इसमें सितंबर 2018 के फैसले के ख़िलाफ़ 56 समीक्षा याचिकाएं, 4 ताजा रिट याचिकाएं और 5 अन्य याचिकाएं शामिल हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर सुबह 10:30 से सुनवाई शुरू की। 5 जजों की बेंच में मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई के साथ जस्टिस रोहिंटन नरीमन, जस्टिस एएम खानविल्कर, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस इंदु मल्होत्रा ने की सुनवाई।
सुनवाई की शुरुआत करते हुए CJI रंजन गोगोई ने उपस्थित वकीलों से अपने तर्क को समीक्षा के आधार पर सीमित करने को कहा। इसके बाद सीनियर काउंसलर पराशरन ने सबसे पहले अपने तर्क रखे। सभी वकीलों के तर्क नीचे सिलसिलेवार ढंग से दिए गए हैं।
सीनियर काउंसलर पराशरन की मजबूत दलील
पराशरन ने कहा कि जब तक प्रैक्टिस बहुत ही वीभत्स नहीं होता, तब तक अदालत धार्मिक संस्थाओं से जुड़ी गतिविधि में आम तौर पर हस्तक्षेप नहीं करती है। उन्होंने यहोवा केस का हवाला दिया।
उन्होंने कहा कि मंदिर प्रथा पर प्रहार करना अनुच्छेद 15 के तहत एक त्रुटि है। उन्होंने कहा- “फ़ैसले ने इस महत्वपूर्ण पहलू पर विचार नहीं किया कि अनुच्छेद 15 (2) धार्मिक स्थानों को कवर नहीं करता है।”
सीनियर काउंसलर ने आगे कहा- ‘यह द्विपक्षीय विवाद नहीं है; इसके परिणाम अन्य धर्मों पर भी पड़ेंगे।
जस्टिस नरीमन जे ने टिप्पणी करते हुए कहा कि ये धारणा मत रखें कि महिलाओं पर लगे बैन को सिर्फ़ अस्पृश्यता (Untouchability) के आधार हटाया गया था।
परासरन ने कहा कि सबरीमाला में बहिष्कार प्रथा देवता के चरित्र पर आधारित है, जो कि ब्रह्मचारी हैं।
वी गिरी के विचारणीय तर्क
सबरीमाला मंदिर के मुख्य पुजारी की तरफ से सीनियर काउंसल वी गिरी ने कहा कि कोई भी व्यक्ति जो अनुच्छेद 25 (2) (बी) के तहत पूजा करने का अधिकार रखता है, उसे देवता की प्रकृति के अनुरूप करना होगा।
उन्होंने कहा- “महिलाओं को प्रवेश की अनुमति देने के मामले में स्थायी ब्रह्मचर्य चरित्र नष्ट हो जाता हैहर भक्त जो मंदिर जाता है, मंदिर की आवश्यक प्रथाओं पर सवाल नहीं उठा सकता है। हर भक्त जो मंदिर जाता है, मंदिर की आवश्यक प्रथाओं पर सवाल नहीं उठा सकता है।”
गिरी ने कहा कि तंत्री को देवता का पिता माना जाता है, और देवता के आवश्यक चरित्र को संरक्षित करने के लिए उनके पास विशेष अधिकार हैं। अनटचेबिलिटी से कुछ लेना-देना नहीं है।
गिरी ने कहा- “याचिकाकर्ताओं में से किसी ने भी सबरीमाला में भगवान अयप्पा के भक्त होने का दावा नहीं किया। प्रथा का जाति से कोई लेना-देना नहीं है। इसलिए, सबरीमाला प्रथा को अस्पृश्यता के समान नहीं माना जा सकता है।”
अभिषेक मनु सिंघवी की दलीलें
सीनियर अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी की दलील- ‘विश्वास के कई पहलू तर्कहीन होंगे। लेकिन यह साइंस म्यूजियम नहीं बल्कि धर्म है। इसलिए संवैधानिक नैतिकता को इस सब में लागू नहीं किया जाना चाहिए। कोर्ट को धर्म के मामलों में संवैधानिक नैतिकता लागू करते समय सावधानी बरतनी चाहिए।’
उन्होंने आगे कहा- ‘न्यायालय ने यह मान लिया कि जब तक सार्वभौमिकता नहीं होगी तब तक यह आवश्यक धार्मिक अभ्यास नहीं होगा। हिंदू धर्म जैसे विविध धर्म में, कोई सार्वभौमिकता की तलाश नहीं कर सकता है। यह जजमेंट (पैराग्राफ को संदर्भित करते हुए) सही नहीं है।’
वरिष्ठ अधिवक्ता शेखर नफाड़े के तर्क
वरिष्ठ अधिवक्ता शेखर नफाड़े ने अदालत से कहा- ‘यह आस्था का विषय है। जब तक कि एक आपराधिक कानून नहीं है जो एक विशेष धार्मिक प्रथा को प्रतिबंधित करता है (जैसे सती), अदालतें हस्तक्षेप नहीं कर सकती हैं।
उन्होंने आगे कहा- ‘अकेले समुदाय ही यह तय कर सकता है कि सदियों पुरानी मान्यता को बदला जाए या नहीं। कुछ एक्टिविस्ट्स को यह तय करने के लिए नहीं दिया जा सकता है।एक आवश्यक धार्मिक अभ्यास क्या है?, यह तय करने का अधिकार उस विशेष समुदाय के सदस्यों को होना चाहिए।’
आर वेंकटरमानी और वेंकटरमन के सबमिशन
आर वेंकटरमानी ने अदालत के समक्ष कहा- “या तो आप एक अनुष्ठान में विश्वास करते हैं या इसका हिस्सा नहीं बनने का विकल्प चुनते हैं। आप अपने आधार पर सवाल उठाकर अनुष्ठान का हिस्सा नहीं बन सकते।”
वेंकटरमन ने कहा- ‘एक का विश्वास दूसरे का अंधविश्वास हो सकता है। इन पहलुओं का तर्कसंगतता के साथ परीक्षण नहीं किया जा सकता है। आस्था आस्था होती है; इसे परमिशन वाली विश्वास और बिना परमिशन वाली आस्था में विभाजित नहीं किया जा सकता है।’
उन्होंने आगे कहा- “1991 के केरल HC के फैसले ने रिवाज को एक आवश्यक धार्मिक प्रथा के रूप में मानने के सबूतों पर विचार किया है। उस निर्णय में तथ्यात्मक खोज को चुनौती नहीं दी गई है, और इसलिए फाइनल हो गया है।”
उत्तर प्रदेश पुलिस ने महात्मा गाँधी के पुतले पर गोली चलाने वाली पूजा शकुन पांडेय को गिरफ़्तार कर लिया है। पूजा के साथ उसके पति अशोक पांडेय की भी गिरफ़्तारी हुई है। इस मामले में अलीगढ़ पुलिस ने कुल 13 लोगों (11 की पहचान, 2 अज्ञात) के ख़िलाफ़ FIR दर्ज किया था। पूजा और अशोक को मिलाकर इनमें से 7 लोगों की गिरफ़्तारी अब तक हो चुकी है।
आपको बता दें कि हिंदू महासभा की राष्ट्रीय सचिव पूजा ने 30 जनवरी को महात्मा गाँधी की पुण्यतिथि के मौके पर उनकी हत्या का सीन दोहराया था। इसके लिए पूजा ने महात्मा गाँधी के पुतले पर खिलौने वाली पिस्टल (एयर पिस्टल) से तीन गोलियाँ चलाई थीं। इस दौरान वहाँ खड़े लोगों ने ‘गोडसे जिंदाबाद’ के नारे भी लगाए और गाँधीजी के लिए अपशब्दों का इस्तेमाल भी किया था।
अलीगढ़ के नौरंगाबाद में घटी इस घटना का सोशल मीडिया पर तस्वीरें और वीडियो सामने आने के बाद पुलिस ने FIR दर्ज की थी। जिन धाराओं में इन लोगों के ख़िलाफ़ मामला दर्ज किया गया है, वे हैं –
153A (शत्रुता को बढ़ावा देना) – धर्म, नस्ल, जन्म-स्थान, निवास-स्थान, भाषा आदि के आधार पर विभिन्न समूहों के बीच शत्रुता को बढ़ावा देना और आपसी सद्भाव को चोट पहुँचाने के लिए पूर्वग्रहपूर्ण कार्य करना।
295A (जानबूझकर और निंदनीय कृत्य) – जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण किया गया ऐशा कृत्य, जिसका उद्देश्य धार्मिक भावनाओं का अपमान करना या किसी भी वर्ग को उसके धर्म या उसके धार्मिक विश्वासों का अपमान कर उकसाना है।
147 (दंगा करने की सजा) – जो कोई भी दंगा करने का दोषी है, उसे दो साल तक जेल की सजा या जुर्माना या दोनों हो सकता है।
148 (घातक हथियार से लैस दंगाई) – जो कोई भी घातक हथियार से लैस होकर दंगा करने का दोषी है या किसी ऐसे हथियार के साथ हो जिसकी वजह से मौत हो सकती और जिसका अपराध करने में इस्तेमाल किया जाता है, उसे तीन साल तक जेल की सजा या जुर्माना या दोनों हो सकता है।
149 (एक समान अपराध और उद्देश्य के लिए गैरकानूनी रूप से एकत्रित प्रत्येक सदस्य अपराध का दोषी) – यदि गैरकानूनी ढंग से एकत्रित (कम से कम 5 लोग) होकर कोई अपराध किया जाता है, जिसमें सभी का उद्देश्य एक होता है, या एकत्रित भीड़ में सभी को उस उद्देश्य की जानकारी होती है, तो प्रत्येक व्यक्ति जो उस अपराध के समय उस एकत्रित भीड़ का हिस्सा है, उसे उस अपराध का दोषी माना जाएगा।
यूनाइटेड प्रोविन्सेज़ स्पेशल पॉवर एक्ट की धारा 6 – 1932 में बनी यूनाइटेड प्रोविन्सेज़ स्पेशल पॉवर एक्ट की धारा 6 के तहत किसी जीवित व्यक्ति के नकली अंतिम संस्कार का आयोजन करना एक अपराध है, जिसमें जुर्माने के साथ-साथ तीन महीने तक की जेल की सजा का प्रावधान है।
सन 1947 में अंग्रेज़ों ने स्वतंत्रता के उपहार स्वरूप दो डोमिनियन दिए थे- भारत और पाकिस्तान। उस समय कश्मीर के महाराजा हरि सिंह यह तय नहीं कर पा रहे थे कि भारत और पाकिस्तान में से किसके साथ जाएँ। उधर पाकिस्तान ने अपनी चालें सोच रखी थीं। सोची समझी रणनीति के तहत पाकिस्तान ने क़बाइलियों की फ़ौज जम्मू कश्मीर राज्य की तरफ भेज दीं।
क़बाइलियों के साथ मिलकर पाकिस्तानी फ़ौज ने बारामुला में शैतानी क़हर ढाया। हिन्दू, मुस्लिम, सिख जो भी उन्हें रास्ते में मिला उसे मारा-काटा। मारकाट करने के साथ ही क़रीब 280 ट्रक लूटकर पाकिस्तान ले गए। बारामुला को बर्बाद करने के बाद पाकिस्तानी फ़ौज श्रीनगर की तरफ बढ़ी। रास्ते में उन्हें एक 19 वर्षीय लड़का मक़बूल शेरवानी मिला जिससे पाकिस्तानी फ़ौज ने श्रीनगर जाने का रास्ता पूछा।
यूँ तो बारामुला से श्रीनगर एकदम सीधा सपाट मात्र 60-65 किमी का रास्ता है लेकिन मक़बूल शेरवानी ने पाकिस्तान की फ़ौज को गलत रास्ता बता दिया और पहाड़ों से होकर जाने की सलाह दी। इसके कारण पाकिस्तानियों को श्रीनगर जाने में देर हुई और भारतीय सेना को कश्मीर में तैनात होने के लिए पर्याप्त समय मिला।
मक़बूल शेरवानी ने पाकिस्तान की फौजों को बरगला दिया यह कहकर कि भारतीय सेनाएँ बारामुला तक पहुँच गई हैं। पाकिस्तानी फ़ौज इस बहकावे में आ गई और उसे श्रीनगर पहुँचने में देर हुई जिसके कारण भारतीय सेना की 1 सिख रेजिमेंट 27 अक्टूबर को श्रीनगर पहुँची और कबाइलियों को खदेड़ने में सफल हुई। उस दिन को भारतीय सेना ‘इन्फैंट्री डे’ के रूप में मनाती है।
मक़बूल शेरवानी के इस कृत्य को आज भी याद किया जाता है और बारामुला में भारतीय सेना ने उसका स्मारक भी बनवाया है। प्रसिद्ध उपन्यासकार मुल्कराज आनंद मक़बूल शेरवानी से इतने प्रभावित हुए थे कि उन्होंने उसके ऊपर एक उपन्यास लिखा जिसका शीर्षक था: Death of a Hero. इस उपन्यास में एक स्थान पर मक़बूल शेरवानी से फैक्ट्री का मालिक सय्यद मुरातिब अली कहता है कि हालात ख़राब हैं और कश्मीर छोड़कर भाग जाना चाहिए। इसपर मक़बूल उत्तर देता है कि वो नहीं भागेगा। मक़बूल कहता है कि यदि हमें ‘मुस्लिम कट्टरपंथियों’ से उसी तरह आज़ादी चाहिए जैसे अंग्रेज़ों की गुलामी से ली थी तो हमें संघर्ष करना होगा।
मक़बूल का यह संघर्ष उसकी साँसें चलने तक चला था। जब पाकिस्तानियों को पता चला कि एक उन्हें एक किशोर ने बेवकूफ़ बना दिया था तब वे लौटे और मुल्कराज आनंद के इस हीरो को वास्तव में इतना मारा कि हैवानियत की भी रूह काँप गई। मारने से पहले उन्होंने मक़बूल को पाकिस्तानी फ़ौज में शामिल होने का न्योता भी दिया था लेकिन मक़बूल ने साफ़ इनकार कर दिया था। तब उन्होंने मक़बूल को मार कर सलीब पर टाँग दिया था ताकि देखने वाले हमेशा ख़ौफ़ में रहें। इतने पर भी खूनी खेल खेलने से मन नहीं भरा तो उसके मृत शरीर में दस पंद्रह गोलियाँ और दाग दीं।
कश्मीर में पाकिस्तान परस्त मानसिकता से लोहा लेने वाला अकेला मक़बूल शेरवानी ही नहीं हुआ। नब्बे के दशक में अलगाववादी आतंकी गुटों के खिलाफ आत्मसमर्पण कर चुके आतंकियों की ‘इख़्वान’ फ़ौज खड़ी की गई थी जिसका नायक था कूका परे। कूका परे ने आतंकवादियों के सफाए में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी जिसकी सज़ा आतंकवादियों ने 2003 में उसकी जान लेकर दी थी जब वह क्रिकेट मैच का उद्घाटन करने जा रहा था।
जून 2017 में श्रीनगर में नौहट्टा मस्जिद के पास पाकिस्तान और अल-क़ायदा समर्थन में नारे लगाने वालों की भीड़ ने डीएसपी अयूब पंडित की हत्या कर दी थी। इसी प्रकार गत वर्ष राइफलमैन औरंगज़ेब को मार दिया गया था। औरंगज़ेब उस टीम का हिस्सा थे जिसने हिज़्ब-उल-मुजाहिदीन कमांडर समीर टाइगर को ढेर किया था। औरंगज़ेब को मारने से पहले आतंकियों ने डेढ़ मिनट का वीडियो बनाया था। वीडियो बनाने के पीछे वही मानसिकता थी जिसने सत्तर साल पहले मक़बूल शेरवानी की हत्या कर सलीब पर लटका दिया था।
इसी तरह छुट्टियों में घर आए लेफ्टिनेंट उमर फ़ैयाज़ को शोपियाँ में तब मार दिया गया था जब वे निहत्थे थे। उनके हत्यारों और अन्य आतंकियों को पकड़ने के लिए 25 नवंबर 2018 को एक ऑपरेशन चलाया गया जिसमें राष्ट्रीय राइफल्स के लांस नायक नज़ीर अहमद वानी ने सर्वोच्च बलिदान दिया। नज़ीर वानी को उनकी वीरता के लिए मरणोपरांत अशोक चक्र से सम्मानित किया गया। आतंकियों की नज़र में नज़ीर भी खटकते थे क्योंकि वह भी पहले इख़्वान के सदस्य रह चुके थे।
81 वर्षीय सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री राधा मोहन सिंह के साथ चली गहन बैठक के बाद अपना अनशन ख़त्म करने का निर्णय लिया है। 6 घंटे तक चली बैठक में दोनों बड़े नेताओं ने अन्ना की माँग को सुना और उन्हें लिखित आश्वासन भी दिया।
इस बैठक में महाराष्ट्र के जल संसाधन मंत्री गिरीश महाजन और केंद्रीय रक्षा राज्य मंत्री सुभास भामरे भी उपस्थित रहे। मुख्यमंत्री फडणवीस ने अन्ना को जूस पीला कर उनका अनशन ख़त्म कराया। ग़ौरतलब हो कि अन्ना 7 दिनों से अपनी माँगों को लेकर अनशन पर बैठे थे।
“कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (CACP) को स्वायत्त दर्जा देने, लोकायुक्त विधेयक महाराष्ट्र विधानसभा के अगले सत्र में सदन के पटल पर रखने और लोकपाल के लिए उच्चतम न्यायालय की समय सीमा का पालन करने, इन तीन माँगों के लिए मैंने अपना आंदोलन शुरू किया था। सरकार द्वारा मुझे दिए गए आश्वासन से मैं संतुष्ट हूँ और मैं अपना अनशन खत्म कर रहा हूँ।“
On the Agriculture price commission and other agriculture related demands:
A committee will be formed under Union Minister @RadhamohanBJP and recommendations will be submitted by October 19. Noted Agriculturist Sompal Shastri to represent Anna Hajare in this committee.
मुख्यमंत्री फडणवीस ने बताया कि 13 फरवरी को लोकपाल सर्च कमिटी की बैठक होगी, जिसमें सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के अनुरूप आगे का निर्णय लिया जाएगा। बता दें कि मंगलवार (फरवरी 5, 2019) को अन्ना का अनशन 7वें दिन में प्रवेश कर गया था, जिसके बाद उनका रक्तचाप और शुगर बढ़ गया। उनके वज़न में भी 5 किलोग्राम की कमी दर्ज की गई। अन्ना निम्नलिखित माँगों को लेकर अनशन पर बैठे थे:
केंद्र में लोकपाल एवं राज्यों में लोकायुक्तों की नियुक्ति
चुनाव सुधार
कृषि संकट के समाधान
स्वामीनाथन आयोग की अनुशंसाओं को लागू करना
जूस पी कर अनशन तोड़ते अन्ना (फोटो साभार: CMO Maharashtra)
अन्ना हजारे से मिलने मुख्यमंत्री व अन्य केंद्रीय मंत्रीगण उनके पैतृक गाँव रालेगण सिद्धि पहुँचे। राधा मोहन सिंह की अध्यक्षता में बनने वाली लोकपाल सर्च कमिटी में अन्ना के सहयोगी सोनपाल शास्त्री भी होंगे। कमिटी एक निश्चित समय में खाका तैयार करेगी, जिस पर केंद्र सरकार निर्णय लेगी। अन्ना ने सरकार के साथ अपनी चर्चा को सकारात्मक बताया।
मैं अपनी यात्रा के तीसरे दिन बनारस से प्रयागराज जा रहा था। प्रयागराज जाने के समय मुझे क़मर जमील की वो पंक्ति याद आ गई, जिसमें उन्होंने कहा है, “या इलाहाबाद में रहिए जहाँ संगम भी हो, या बनारस में जहाँ हर घाट पर सैलाब है।” बनारस के घाटों पर सैलाब देखने के बाद अब मैं प्रयागराज को देखना चाह रहा था। क़मर जमील की शायरी में जिस इलाहाबाद की चर्चा है, उसी शहर का नाम अब प्रयागराज है।
पिछले कुछ सालों में सरकारी लूटपाट और भ्रष्टाचार की चपेट में फँसकर प्रयागराज शहर की ख़ूबसूरती धूमिल हो गई थी। कभी इसी प्रयागराज में संगम के किनारे बैठकर कोई नास्तिक हो या आस्तिक, हिंदू हो या मुस्लिम सभी तरह के लोग प्रकृति के अद्भुत सौंदर्य में लीन हो जाते थे। जहाँ कुछ देर बैठने भर से लोगों को शांति और सुख की प्राप्ति होती थी।
पिछले कुछ सालों में उसी संगम में मिलने वाली दो प्रमुख नदियों गंगा और यमुना का पानी इतना गंदा हो गया था कि लोगों का संगम पर बैठना भी मुश्किल हो गया था। गंगा और यमुना दोनों ही नदियों में शहरों से निकलने वाले गटर और औद्योगिक कचरे को गिराया जाता रहा। सत्ता में बैठे लोगों ने अपने निजी स्वार्थ के लिए गंगा व यमुना जैसी नदियों पर जरा भी ध्यान नहीं दिया। ऐसे में जिस संगम में डुबकी लगाने के लिए देश-विदेश के करोड़ों लोग जमा हो रहे हैं, उस संगम को नज़दीक से देखना और महसूस करना बतौर रिपोर्टर मेरे लिए जरूरी था।
दो दिनों से लगातार गाड़ी की सवारी करके थक चुका था। ऐसे में वाराणसी से प्रयागराज जाने के दौरान रास्ते में भदोही नाम की जगह हमलोग चाय पीने के लिए रुके। हमारे साथ अलग-अलग संस्थानों के कुछ और भी पत्रकार थे, लेकिन यहाँ आपस में बात करने की बजाय मैंने समय का सदुपयोग करते हुए स्थानीय लोगों से बात करना उचित समझा।
चारों तरफ़ देखने पर ढाबे पर ही कुछ लोगों के साथ गहरे लाल रंग का लहँगा पहने एक लड़की पर मेरी नज़र गई। शायद वह लड़की भी यात्रा के दौरान चाय पीने के लिए ढाबे पर रुकी थी। पहली नज़र में देखने पर मुझे लगा कि लड़की किसी शादी समारोह से लौट रही है। मैं हर हाल में देश के वर्तमान हालात पर इस लड़की के विचार को जानना चाह रहा था। ऐसे में जैसे ही उस लड़की के करीब आकर मैंने हाइवे के बहाने बात छेड़ी, लड़की वहाँ से हट गई लेकिन उसके साथ खड़े गौरव श्रीवास्तव नाम के शख़्स ने बोलना शुरू कर दिया।
गौरव ने मुझे बताया, “भैया देखिए हाइवे कितना बेहतरीन बना है। अब दो से ढाई घंटे में वाराणसी से प्रयागराज आराम से जाया जा सकता है। रात में वाराणसी से शादी समारोह में हिस्सा लेकर इलाहाबाद लौट रहा हूँ, लेकिन रास्ते में जरा भी थकान महसूस नहीं हो रही है।”
इसके बाद गौरव से जब मोदी सरकार के कामकाज के बारे में हमने पूछा तो गौरव बताते हैं कि साहब सिर्फ़ शहर का नाम ही इलाहाबाद से प्रयागराज नहीं हुआ है, बल्कि नाम बदलने के साथ ही शहर में माफ़ियाओं के आतंक का भी अंत हो गया है। शहर की सड़कें चमचमाने लगी हैं। प्रयागराज की जो रौनक गुम हो गई थी, केंद्र व राज्य की भाजपा सरकार ने उसे वापस लाने का काम किया है। गौरव श्रीवास्तव ने बातचीत के दौरान ही बताया कि वो इलाहाबाद हाई कोर्ट में वकील हैं।
इस तरह मैं भले ही उस लड़की की राय नहीं जान पाया, जिसका मुझे मलाल इसलिए है क्योंकि विकास के मुद्दों पर मेरे हिसाब से महिलाओं की राय पुरुषों से ज्यादा मायने रखती है। लेकिन उसके रिश्तेदार गौरव श्रीवास्तव से मुझे अपने रिपोर्ट का कच्चा माल मिल गया था। इसके बाद एक बार फिर हमारी गाड़ी हाइवे पर प्रयागराज की तरफ़ चल पड़ी।
प्रयागराज शहर में प्रवेश करने के बाद गाड़ी से उतरते ही मैंने एक बेहद ठंडी हवा के स्पर्श को महसूस किया। मैं इस समय गंगा पर बने उस ब्रिज पर खड़ा था, जहाँ से कई किलोमीटर दूर तक सिर्फ साधू-संतों की लंबी कतारें और उनके रहने के लिए लगाए गए तंबू व टेंट दिख रहा था। ब्रिज के नीचे से गंगा अपने रफ़्तार में बह रही थी, जबकि कुछ दूरी पर यमुना को गंगा में मिलते देखा जा सकता था।
मैं अपने साथियों के साथ संगम पर पहुँचा। ब्रिज से संगम की दूरी करीब 6-7 किलोमीटर है। मेरे साथ कई लोग थे और समय कम था इसलिए मुझे यह दूरी गाड़ी से ही तय करनी पड़ी। लेकिन मैंने महसूस किया कि कुंभ आने का असली मजा संगम पर बने इन अस्थाई तंबूओं के चारों ओर की गलियों में पैदल घूमने का ही है।
कुंभ में श्रद्धालुओं के लिए पूजा सामग्री बेचते स्थानीय लोग
इस बार का कुंभ कई मायने में अलग व अद्भुत है। उत्तर प्रदेश जल निगम के अधिकारी पीके अग्रवाल ने मुझे बताया कि वो बचपन से कई बार कुंभ आता रहे हैं, लेकिन इस बार कुंभ जितना अधिक साफ और पवित्र है, इतना पहले कभी नहीं था।
पीके अग्रवाल के बयान के बाद मैंने कुंभ को एक पत्रकार के नजरिए से देखना शुरू कर दिया। मैं देखना चाहता था कि क्या वाकई में कुंभ में पहुँचने वाले करोड़ों श्रद्धालुओं के लिए अच्छी तैयारी की गई है या सबकुछ कागजी और हवा-हवाई है?
मैंने जैसे ही लघुशंका जाने की इच्छा ज़ाहिर की, पास खड़े एक सिपाही ने एक गलियारे की तरफ़ इशारा कर दिया। मैं जैसे ही उस गलियारे की तरफ़ बढ़ा तो देखा कि वहाँ सैकड़ों अस्थाई शौचालय बने हुए हैं। जब मैंने इसके बारे में पता किया तो पीके अग्रवाल ने मुझे बताया कि सरकार ने इस साल होने वाले कुंभ को हर हाल में स्वच्छ कुंभ बनाने का सोचा है।
यही वजह है कि कुंभ के दौरान 27,500 अस्थाई शौचालय बनाने के लिए सरकार ने 113 करोड़ रुपए खर्च किए हैं। यही नहीं, कुंभ में 6 मुख्य घाटों और 3 शवदाह गृहों के लिए भी सरकार ने 88.03 करोड़ रुपए खर्च किए हैं। इसके अलावा 21 अन्य घाटों के लिए भी सरकार ने 3.3 करोड़ रुपए खर्च किए हैं।
कुंभ में 27,500 से अधिक अस्थाई शौचालय बनाए गए हैं
संगम में नहाने से पहले मेरे दिमाग में दिल्ली की यमुना की तस्वीर उभर आई। लेकिन जब घाट पर खड़े होकर हमने संगम की तरफ़ देखा तो दिल्ली में बीमार नज़र आने वाली यमुना प्रयागराज में बलखाती नजर आ रही थी। संगम पर खड़े होने के बाद शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा, जो ख़ुद को संगम में डुबकी लगाने से रोक पाए।
मैंने भी कुछ पत्रकार साथी और नमामि गंगे के अधिकारी रजत गुप्ता के साथ संगम में डुबकी लगाई। इस दौरान जब मैंने रजत गुप्ता से पूछा कि तमाम बड़े शहरों की गंदगी को साथ लेकर प्रयाग आने वाली नदियों का पानी यहाँ साफ कैसे नजर आ रहा है, तो इसके जवाब में रजत गुप्ता ने बताया कि प्रयागराज शहर से निकलने वाले गंदे पानी को कुंभ के दौरान गंगा में मिलने से रोक दिया गया है। यही नहीं शहर के हर छोटे-बड़े नाले के पानी को गंगा में मिलने से पहले साफ किया जा रहा है। उन्होंने यह भी बताया कि इन नदियों में खुद ही पानी साफ़ करने की क्षमता काफ़ी अधिक है, लेकिन संगम साफ रहे इसके लिए स्थानीय शहरों के गंदे पानी को रोकना जरूरी है।
प्रयागराज के नैनी STP में पानी को साफ किया जा रहा है
इसके लिए नमामि गंगे के तहत शहर में 10 नए प्रोजेक्ट को 2915.78 करोड़ रुपए की मदद से शुरू किया गया है। इसमें 6 प्रोजेक्ट कुंभ से पहले पूरा किया जा चुका है। उन्होंने यह भी बताया कि वर्तमान समय में प्रयागराज से लगभग 215 मिलियन लीटर गंदा पानी प्रति दिन गंगा में मिलता है। सरकारी अनुमान के मुताबिक 2035 तक 300 मिलियन लीटर गंदा पानी प्रतिदिन गंगा में मिलने की संभावना है। यही वजह है कि सरकार ने अगले 15 से 16 वर्षों को ध्यान में रखकर गंगा को साफ करने का रोडमैप बनाया है।
शहर के गंदे पानी को गंगा व यमुना दोनों नदियों में मिलने से रोकने के लिए सरकार ने शहर को सात हिस्से में बाँट दिया है। हर हिस्से के पानी को साफ करने के लिए सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट स्थापित किया गया है। यही नहीं, छोटे नालों के पानी को भी साफ करने के लिए सरकार ने बायोरेमिडेशन व जियो सिंथेटिक ट्यूब जैसी नई तकनीक का भी इस्तेमाल किया है। हम इन सारी तकनीकों पर विस्तृत चर्चा लेख की अगली कड़ी में करेंगे।
कुंभ में श्रद्धालुओं के लिए जगह-जगह पर मुफ़्त में स्वच्छ पानी के लिए स्टॉल लगाया गया है
यही वजह है कि संगम पर पानी पहले की तुलना में ज्यादा साफ नजर आता है। इसके अलावा कुंभ में जगह-जगह स्वच्छ पानी व एम्बुलेंस की भी चाकचौबंद व्यवस्था की गई है।
देश की सांस्कृतिक नगरी वाराणसी और प्रयागराज की पहचान मुख्य रूप से दो पवित्र नदियाँ गंगा व यमुना की वजह से ही है। हमारे सांस्कृतिक व समाजिक विकास में इन नदियों का बेहद अहम योगदान है। ऐसे में इन नदियों को जिंदा रखना अपनी पहचान को जिंदा रखने जितना जरूरी है।
केंद्रीय गृह मंत्रालय ने कोलकाता पुलिस कमिश्नर के ख़िलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई का नोटिस जारी किया है। गृह मंत्रालय ने अपने नोटिस में राज्य के मुख्य सचिव को पुलिस कमिश्नर पर कार्रवाई करने के लिए कहा है। गृह मंत्रालय ने ममता बनर्जी के साथ धरने पर बैठने के आरोप में पुलिस अधिकारी पर अनुशासनात्मक कार्रवाई के लिए यह नोटिस भेजा है।
ममता की किरकिरी, बच गया ‘लोकतंत्र’
आपको बता दें कि पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी सरकार सीबीआई और केंद्र सरकार के खिलाफ पिछले तीन दिनों से धरने पर बैठी हुई थी। सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश से उनको झटका लगा है। हालाँकि यह झटका TMC के लिए तो प्रत्यक्ष तौर पर है, लेकिन परोक्ष तौर पर उन विपक्षी पार्टियों के लिए भी है, जो ममता के साथ धरना-पॉलिटिक्स को बढ़ावा दे रहे थे। यह झटका उनके लिए भी है जो, लोकतंत्र की ‘हत्या’ को लेकर ‘चिंतित’ थे।
CBI vs ममता: क्या-क्या हुआ ‘खेल’
कोलकाता में चल रही राजनीतिक खींचातानी के बीच केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने 4 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। याचिका में सीबीआई में कोलकाता पुलिस आयुक्त राजीव कुमार से शारदा चिट फंड मामले में सहयोग करने का निर्देश देने की मांग की थी। सीबीआई ने अपनी याचिका में यह भी कहा कि था कई बार तलब किए जाने के बावजूद, राजीव कुमार सहयोग करने में असफल रहे। साथ ही जाँच में बाधा भी पैदा की।
सीबीआई द्वारा सुनवाई के लिए याचिका को सूचीबद्ध करने के बावजूद, मुख्य न्यायाधीश (CJI) रंजन गोगोई ने मंगलवार (5 फरवरी, 2019) को सुनवाई की तारीख़ दी थी। हालाँकि मुख्य न्यायाधीश ने चेतावनी वाले अंदाज़ में यह ज़रूर कहा था कि अगर कोलकाता पुलिस कमिश्नर मामले से जुड़े सबूतों को नष्ट करने की भी सोचेगा, तो कोर्ट उस पर बहुत भारी पड़ेगा, उसे पछतावा होगा।
इससे पहले रविवार (फरवरी 3, 2019) को शारदा चिटफंड घोटाला मामले में CBI की टीम जब कोलकाता में पुलिस कमिश्नर राजीव कुमार के निवास स्थान पर पहुँची, तो CBI टीम को पुलिसकर्मियों ने अन्दर जाने ही नहीं दिया। इतना ही नहीं, उन सीबीआई ऑफिसरों को कोलकाता पुलिस ने गिरफ़्तार भी कर लिया। हालाँकि कुछ घंटों बाद उन्हें रिहा भी कर दिया गया।
ममता बनर्जी ने सीबीआई के इस एक्शन को केंद्र सरकार से प्रेरित बताया। इसमें राजनीति को घुसाते हुए वो राजीव कुमार के समर्थन में धरने पर बैठ गईं। एक मुख्यमंत्री का किसी व्यक्ति विशेष के लिए उठाया गया ये धरनारूपी क़दम भारतीय राजनीति के लिए अनोखा है। ख़ुद को ‘धरना क्वीन’ बनाने वाली ममता को CBI की कार्रवाई पर भला ऐसी भी क्या आपत्ति हो सकती है कि वो आधी रात को ही धरने पर बैठ गई।
ट्विटर इंडिया को पार्लियामेंट्री बोर्ड की तरफ़ से सोशल मीडिया पर लोगों के अभिव्यक्ति की आजादी को दबाने के लिए नोटिस भेजा है। पार्लियामेंट द्वारा भेजे गए इस नोटिस में ट्विटर इंडिया को 11 फरवरी 2019 को दोपहर 3 बजे बोर्ड के सामने पेश होने के लिए कहा गया है। इंफार्मेशन व टेक्नॉलाजी मामले पर अनुराग ठाकुर के नेतृत्व में गठित पार्लियामेंट्री कमिटि ने ट्विटर इंडिया को यह नोटिस भेजा है।
The Parliamentary Commitee on Information Technology will examine the issue:
SAFEGUARDING CITIZENS RIGHTS ON SOCIAL/ONLINE NEWS MEDIA PLATFORMS
ट्विटर इंडिया पर अक्सर दक्षिणपंथी लेखकों के विरुद्ध एक पक्षपातपूर्ण रवैया रखने के आरोप लगते रहे हैं। विगत दिनों ट्विटर ने कुछ हैंडल्स को सिर्फ इस कारण से प्रतिबंधित कर दिया था क्योंकि वो दक्षिणपंथी विचारधारा रखते हैं। इसके विरोध में कुछ लोगों ने ट्विटर इंडिया कार्यालय के बाहर धरना प्रदर्शन भी किया था।
We stayed united and it made an impact.
We won't stop until @TwitterIndia stops its biased behaviour agnst RWs and stop wrong suspension, shadow ban and play dirty tricks from back end.https://t.co/rN2wsN9RkS
अक्सर ट्विटर ऐसे ट्विटर एकाउंट्स की या तो पोस्ट रीच को कम कर देता है या फिर उनके एकाउंट्स को सस्पेंड कर देता है, जो सरकार के समर्थन में लिखने के लिए जाने जाते हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मार्च के महीने पटना मेट्रो रेल परियोजना की आधारशिला रख सकते हैं। इसके साथ ही बिहारवासियों के मेट्रो में सफर का सपना जल्द ही पूरा हो सकता है।
रिपोर्ट्स के अनुसार, भाजपा नेता सुरेश शर्मा ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 3 मार्च को NDA की रैली में शामिल होंगे। इस दौरान प्रधानमंत्री द्वारा पटना मेट्रो रेल परियोजना की आधारशिला रखे जाने को लेकर सैद्धांतिक सहमति हो चुकी है, जिसके लिए ₹17,887.56 करोड़ की राशि मंजूर कर ली गई है।
सुरेश शर्मा ने कहा, “मेरे मन में यह विचार था, जो मैंने सोमवार को मुख्यमंत्री के साथ साझा किया, वह भी सहमत थे। मैंने विभागीय प्रधान सचिव चैतन्य प्रसाद से आवश्यक औपचारिकताओं को पूरा करने के लिए कहा है, ताकि इस संबंध में एक प्रस्ताव को मंत्रिपरिषद मंजूरी दे सके।”
सुरेश शर्मा ने कहा, “हमें उम्मीद है कि प्रधानमंत्री जब रैली को संबोधित करने के लिए अगले महीने यहाँ आएंगे, तब पटना मेट्रो रेल की आधारशिला रखेंगे।” पटना मेट्रो के लिए विस्तृत परियोजना रिपोर्ट को राज्य मंत्रिपरिषद ने पिछले साल अक्टूबर के महीने मंजूरी दे दी थी।
बिहार में NDA के घटक दल जदयू, भाजपा और लोजपा की प्रदेश इकाई ने हाल ही में कहा था कि लोकसभा चुनाव की घोषणा के पूर्व आयोजित इस रैली में गठबंधन के शीर्ष नेता हिस्सा लेंगे।
पटना मेट्रो के अंतर्गत 2 कॉरिडोर बनाए जाएँगे, पहला कॉरिडोर दानापुर से मीठापुर 16.94 किलोमीटर का होगा। दूसरा कॉरिडोर पटना जंक्शन से लेकर न्यू आईएसबीटी तक 14.45 किलोमीटर का होगा। पटना जंक्शन एक इंटरचेंज स्टेशन होगा, जहाँ लोग एक कॉरिडोर से उतरकर दूसरे कॉरिडोर के लिए मेट्रो पकड़ सकेंगे। इस जंक्शन पर एक स्टेशन अंडरग्राउंड, जबकि दूसरा एलीवेटेड होगा।