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क्या है अंतरिम और पूर्ण बजट? अंतरिम बजट के तहत क्या हैं सरकार की सीमाएँ

मोदी सरकार का 5 साल का कार्यकाल पूरा हो रहा है। सरकार ने 2019 के चुनाव से पहले 1 फरवरी को बजट पेश करने की तैयारी कर ली है। वित्त मंत्री 1 फरवरी को अंतरिम बजट पेश करगें। बता दें कि, आम तौर पर सरकार जब अपने 5 साल के कार्यकाल को पूरा करने वाली होती है तो वह केवल अंतरिम बजट पेश करती है। उसके बाद सत्ता में आई नई सरकार पूर्ण बजट को पेश करती है।

अंतरिम बजट और पूर्ण बजट में अंतर

अंतरिम बजट (Interim Budget) का अर्थ है चुनावी साल में कुछ वक्त जो बचा हुआ है, तब तक देश को चलाने के लिए खर्चों का इंतजाम करने की औपचारिकता। इस बजट में नई सरकार के आने के बीच के बचे हुए समय में देश को चलाने के लिए ख़र्चे का इंतजाम किया जाता है। दरअसल, सरकार बजट में नई सरकार बनने तक के समय के लिए अंतरिम बजट पेश करती है।

बता दें कि, इस बजट में कोई ऐसा फै़सला भी नहीं लिया जा सकता है, जिसके लिए संसद की मंजूरी की ज़रूरत हो या जिसके लिए संविधान संशोधन की जरूरत पड़े। इस बजट में डायरेक्ट टैक्स, जिसमें इनकम टैक्स शामिल है, उसमें कोई बदलाव नहीं किया जाता। हालाँकि, सरकार यदि कोई वस्तु सस्ती करनी चाहे तो वह इंपोर्ट, एक्साइज या सर्विस टैक्स में थोड़ी राहत दे सकती है।

पूर्ण बजट

पूर्ण बजट में सरकार आने वाले वित्तीय वर्ष के ख़र्चे का लेखा-जोखा पेश करती है। इसमें सभी विभागों को आवंटित होने वाली राशि, विभिन्न योजनाओं में ख़र्च होने वाली राशि क्या होगी आदि का जिक्र होता है। यही नहीं सरकार चल रही तमाम योजनाओं में धन की राशि बढ़ा या घटा भी सकती है। पूर्ण बजट में सरकार के पास डायरेक्ट टैक्स में बदलाव करने का अधिकार भी होता है।

मुज़फ़्फ़रनगर दंगे से जुड़ी 18 मुक़दमे वापस लेगी योगी सरकार

उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने मुज़फ़्फ़रनगर दंगों से जुड़े 18 केस वापस लेने का निर्णय लिया है। सरकार ने ज़िला प्रशासन को इस बारे में कोर्ट की अनुमति लेने को कहा है। 2013 में हुए इस दंगे को लेकर दायर किए गए 125 मामलों को वापस लेने की माँग लम्बे समय से की जा रही है। इस बाबत डीएम-एसएसपी से रिपोर्ट माँगी गई थी, लेकिन अधिकारियों ने मामले को वापस लेने से मना कर दिया था।

अब सरकार ने डीएम राजीव शर्मा को एक पत्र भेजा है जिसमें उन्हें 18 मुक़दमों को वापस लेने की संस्तुति करते हुए कोर्ट में अपील दायर करने का निर्देश दिया गया है। बता दें कि जिन मुक़दमों को वापस लिए जाने का निर्णय लिया गया है, उनमे कोई भाजपा नेता नामज़द नहीं है।

जिन मुक़दमों को वापस लिया जाना है, वह भौराकलां और फुगाना क्षेत्र के हैं। एडीएम प्रशासन ने इसकी पुष्टि करते हुए बताया कि सरकार ने मुक़दमे वापस लेने के लिए कुल 13 बिंदुओं पर जानकारी माँगी थी। उन्होंने बताया कि अभी पूरी सूची तो नहीं आई है लेकिन इस बाबत एकल आदेश जारी कर दिया गया है। शासकीय अधिवक्ता राजीव सिंह शर्मा ने कहा:

“मुकदमे वापसी के लिए शासन का पत्र प्राप्त हो गया है। अब मुकदमे वापस लेने के लिए कोर्ट में अपील की जाएगी। इस संबंध में कोर्ट का फ़ैसला ही अंतिम होगा।”

बता दें कि मुज़फ़्फ़रनगर दंगों को लेकर चल रहे मुक़दमों में केंद्रीय मंत्री संजीव बालियान, बिजनौर के सांसद भारतेंद्र सिंह, सरधना विधायक संगीत सोम और बुढ़ाना के विधायक उमेश मलिक सहित कई भाजपा नेताओं को आरोपित बनाया गया था। संगीत सोम पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लोकप्रिय नेता माने जाते हैं। इतना ही नहीं, दंगों से जुड़े मामलों में विहिप के दुर्गा वाहिनी की संस्थापक अध्यक्ष साध्वी प्राची भी नामज़द हैं। इसके अलावा योगी सरकार में राज्यमंत्री का पदभार संभाल रहे सुरेश राणा को भी आरोपित बनाया गया था।

बता दें कि, 2013 में अखिलेश सरकार के दौरान मुज़फ़्फ़रनगर में भड़की हिंसा में 60 से भी अधिक लोग मारे गए थे। गृह मंत्रालय द्वारा जारी किए गए आँकड़ों के मुताबिक़, इन दंगों में क़रीब 20 हिन्दू मारे गए थे। सुप्रीम कोर्ट ने अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली सपा सरकार को फटकार लगाते हुए लापरवाही बरतने का दोषी बताया था।

बजट 2019: किसानों की आय बढ़ाने को प्रतिबद्ध मोदी सरकार, दे सकती है ये सौगात

2019 का बजट इस मायने में ख़ास है कि यह बजट 2019 लोकसभा चुनाव से पहले और सरकार के पाँच साल के कार्यकाल के अंत में पेश किया जाएगा। कार्यकाल के अंत में या लोकसभा भंग होने से पहले पेश बजट को अंतरिम बजट कहा जाता है। सरकार 1 फरवरी को अंतरिम बजट 2019-20 पेश करेगी। बजट में ये उम्मीद की जा रही है कि सरकार स्वच्छता, निवेश, रेलवे, टैक्स, सड़कों के साथ किसानों की आय बढ़ाने के लिए कई सौगातें दे सकती है।

भारत एक कृषि प्रधान देश है, यहाँ करीब 70% लोगों की आजीविका आज भी कृषि पर निर्भर है। आँकड़ों के मुताबिक़ देश में लगभग 70% किसान हैं। किसान सही मायने में देश के रीढ़ की हड्डी है। कृषि का देश की मौजूदा जीडीपी में लगभग 17% का योगदान है।

रिपोर्ट के अनुसार, सरकार का मुख्य लक्ष्य किसानों की आय दोगुनी करने का है। साथ ही उन्हें कई चीजों मेंं रियायत देने के बारे में भी सरकार विचार कर रही है। रिपोर्ट की मानें तो किसानों को उनकी उपज की सही कीमत नहीं मिल रही है। ज्ञात हो कि पिछले बजट में सरकार ने किसानों को फसल की लागत का डेढ़ गुना न्यूनतम समर्थन मूल्य देने की घोषणा की थी। लेकिन, इसे प्रभावी ढंग से लागू नहीं किया जा सका। बजट में ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी विशेष ध्यान देने की उम्मीद है। साथ ही ग्रामीण अर्थव्यवस्था में 20-25% वृद्धि की संभावना के भी अनुमान लगाए जा रहे हैं।

डायरेक्ट कैश ट्रांसफर से किसानों की आय बढ़ाने की तैयारी

बता दें कि, बिचौलियों के चलते किसानों को काफ़ी नुकसान उठाना पडता है। तमाम कोशिशों के बावजूद भी उन्हें उनकी मेहनत की पूरी लागत नहीं मिल पाती है। सरकार इसे लेकर गंभीर है। रिपोर्ट की मानें तो बजट में किसानों के खातों में डायरेक्ट कैश ट्रांसफर करने की योजना के बारे में विचार किया जा रहा है। साथ ही अलग-अलग योजनाओं के जरिए सब्सिडी देने की बजाय सीधे उनके खाते में पैसा भेजने का फ़ैसला लिया जा सकता है। संभावना इस बात की भी है कि सरकार किसानों पर ख़र्च ₹70,000 करोड़ से बढ़ाकर ₹75,000 करोड़ कर सकती है।

एक नज़र किसानों को लेकर चल रही विभिन्न राज्यों की योजनाओं पर

कॉन्ग्रेस सरकार की ऋण माफ़ी के चुनावी हथियार से निपटने के लिए भाजपा सरकार विभिन्न राज्यों के किसानों को लेकर चल रही योजनाओं पर निरंतर मंथन कर रही है। देखना यह है कि किस राज्य का मॉडल सरकार द्वारा चुना जाता है।

मध्य प्रदेश भावान्तर योजना

पिछले साल मध्य प्रदेश की शिवराज सरकार ने जिस ‘भावांतर योजना’ के ज़रिए 15 लाख किसानों की मदद की थी। केंद्र की मोदी सरकार भी उसी तर्ज़ पर किसानों को फ़सल के न्यूनतम समर्थन मूल्य और बिक्री मूल्य के अंतर को सीधे खाते में भेजने पर विचार कर रही है।

ओडिशा का ‘कालिया’ (KALIA) फ़ॉर्मूला

कर्ज़ के बोझ तले दबे किसानों की मदद के लिए ओडिशा सरकार ने ₹10,000 करोड़ की ‘जीविकोपार्जन एवं आय वृद्धि के लिए कृषक सहायता (KALIA)’ योजना लागू की है। इस स्कीम के तहत किसानों की आय बढ़ाकर उन्हें आर्थिक रूप से समृद्ध किया जाएगा। इस स्कीम के द्वारा किसानों को कर्ज़माफ़ी के बजाय ख़ासतौर से सीमांत किसानों को फ़सल उत्पादन के लिए आर्थिक मदद दिया जाएगा। ‘KALIA’ योजना के तहत छोटे किसानों को रबी और खरीफ़ की बुआई के लिए प्रति सीजन ₹5000-5000 की वित्तीय मदद मिलेगी, अर्थात सालाना ₹10,000 दिए जाएँगे।

झारखंड मॉडल

झारखंड की रघुवर दास सरकार भी मध्यम और सीमांत किसानों के लिए ₹2,250 करोड़ की योजना की घोषणा कर चुकी है। झारखंड में 5 एकड़ की जोत पर सालाना प्रति एकड़ ₹5,000 मिलेंगे, एक एकड़ से कम खेत पर भी ₹5,000 की सहायता मिलेगी। इस योजना की शुरुआत झारखंड सरकार 2019-20 वित्त वर्ष से करेगी जिसमें लाभार्थियों को चेक या डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफ़र के ज़रिए मदद दी जाएगी।

तेलंगाना का ऋतु बंधु मॉडल

ओडिशा और झारखंड के साथ ही केंद्र सरकार तेलंगाना सरकार द्वारा शुरू की गई किसान योजनाओं की भी पड़ताल कर रही है। तेलंगाना सरकार ने किसानों के लिए ऋतु बंधु योजना शुरू की है। यहाँ के किसानों को प्रति वर्ष प्रति फ़सल ₹4000 प्रति एकड़ की रकम दी जाती है। दो फ़सल के हिसाब से किसानों को हर साल ₹8000 प्रति एकड़ मिल जाते हैं।

लगातार घट रही कृषि योग्य भूमि है चुनौती

कृषि ऋण और कर्ज़ माफ़ी जैसी योजनाएँ कहीं ना कहीं सरकारी राजस्व पर दबाव डालती हैं। फिर भी, सरकार के लिए किसान प्राथमिकता रहे हैं और उसे कोई न कोई मार्ग तो निकालना ही है। समय के साथ-साथ कृषि योग्य भूमि भी देश में निरंतर घट रही है। ऐसी अनेक चुनौतियाँ हैं, जिन्हे मद्देनज़र रखते हुए सरकार अपना अंतरिम बजट पेश करेगी। मोदी सरकार का यह आख़िरी बजट है, इस कारण सभी की निगाह इस बजट पर रहनी सामान्य बात है।

आम धारणा है कि देश का चुनावी मिज़ाज काफी हद तक देश का किसान तय करता है। देश में ज्यादातर लोग कृषि पर आश्रित हैं, तो यह ज़ाहिर सी बात है कि सरकार उसकी बनती है जिसके साथ देश का किसान रहता है। वर्तमान सरकार किसानों की दशा सुधारने के लिए निरंतर महत्वपूर्ण प्रयास करती आ रही है। लेकिन सच्चाई यह भी है कि पिछले 60 वर्षों तक किसानों के जो हालात रहें हैं उसकी क्षतिपूर्ति करिश्माई तरीके से करना अपने आप में एक बड़ी चुनौती है।

5 सवाल अखिलेश यादव जी से पूछती उत्तर प्रदेश की एक लड़की

लोकसभा के चुनाव पास में आ रहे हैं। बिना आधार के किसी भी बात को विवाद बनाने की रीत शुरू हो चुकी है। उत्तर प्रदेश तो खैर केंद्र की राजनीति का हमेशा से केंद्र-बिंदु रहा है, ऐसे में यहाँ के नेताओं का आरोप-प्रत्यारोप ख़बरों के केंद्र में बना रहता है। ताजा मामला है, योगी आदित्यनाथ के गणतंत्र दिवस पर कही गई बातें और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का उसकी आड़ में किसानों के दर्द का आँसू बहाना।

26 जनवरी के मौक़े पर जनता को सम्बोधित करते हुए सीएम योगी ने कहा कि कोर्ट को राम मंदिर मामले पर जल्द ही फै़सला सुनाना चाहिए। आदित्यनाथ ने कहा कि अगर वो ऐसा नहीं कर पा रहे हैं तो यह मामला उन्हें सौंप देना चाहिए, योगी सरकार इसका हल 24 घंटों के अंदर निकाल लेगी।

अखिलेश यादव ने सीएम आदित्यनाथ की बात पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा, “हमारा देश 70वाँ गणतंत्र दिवस मना रहा है। अगर कोई मुख्यमंत्री इस मौके पर ऐसी बातें करता है तो आप सोचिए कि वो किस तरह के मुख्यमंत्री होंगे?” अखिलेश ने सीएम को हिदायत देते हुए कहा कि जनता ने उन्हें 90 दिन दिए हैं, उन्हें फसलों को बैलों से बचाने की दिशा में कुछ कदम उठाने चाहिए, सबसे पहले किसानों को बचाने की आवश्यकता है।

सवाल यह है कि गणतंत्र दिवस पर जनता द्वारा चुने मुख्यमंत्री क्या बोलें, क्या न बोलें – यह लिखित है क्या, कहीं दर्ज़ है क्या? मेरी जानकारी में तो नहीं। एक मुख्यमंत्री का जनता की उम्मीदों पर, उनके सवालों पर बात करना शायद पूर्व मुख्यमंत्री की नज़र में गलत हो सकता है क्योंकि बतौर सीएम उनका अनुभव बिल्कुल ही अलग है।

अखिलेश यादव द्वारा कही गई इस बात को पढ़कर-सुनकर ऐसा लगता है जैसे वो भूल गए हैं कि योगी आदित्यनाथ का बतौर मुख्यमंत्री अभी कार्यकाल ज़ारी है। यह और बात है कि ख़ुद उनका बीत चुका है। सिर्फ सवाल उठाने को ही अगर सवाल उठाए जाएँ तो अखिलेश यादव को अंदाज़ा भी नहीं कि उन पर किस-किस तरह के सवाल उठेंगे।

सवाल नंबर #1

2013 का समय याद किया जाए तो मालूम पड़ेगा कि अखिलेश जनता से बात करने से ज्यादा उपयुक्त कटरीना कैफ़ के सवालों का जवाब देना पसंद करते थे। ऐसे में पॉलिटिकल करियर में कई बॉलीवुड कलाकारों से रूबरू हुए अखिलेश अगर बीजेपी पर इस तरह के सवाल नहीं उठाएँगे तो शायद उन पर किसी का ध्यान भी नहीं जाएगा।

साल 2013 में पूर्व मुख्यमंत्री साहब ने हॉकी इंडिया लीग के उद्घाटन समारोह में कटरीना से बड़े धैर्य और संयमता को बनाए रखते हुए बातचीत की थी। कटरीना और अखिलेश की इस बातचीत में कटरीना ने उनसे कई पॉलिटिकल सवाल पूछे थे, जिस पर उन्होंने शांति से मुस्कुराते हुए सिर हिलाकर जवाब दिए थे।

शायद हो सकता है उनका चुप, मुस्कुराते हुए जवाब देना इसलिए हो क्योंकि वो उस समय भी किसानों की समस्याओं में उलझे हुए हों 🙂 कटरीना से हुई बातचीत में वो इस बात का लब्बो-लुआब ढूंढ रहे हों कि किस तरह से उनके इन क़ीमती पलों को किसानों के लिए समर्पित किया जा सकता है 🙂

सवाल नंबर #2

वैसे, अखिलेश यादव का कहना भी बिलकुल जायज है क्योंकि जनता के लिए किए गए उनके कार्य, योगी आदित्यनाथ के कार्यों से बिलकुल ही अलग हैं। एक तरफ जहाँ सीएम योगी के राज में राज्य में सेवाभाव की ख़बरें आती हैं, वहीं साल 2016 में यह ख़बर आती थी कि सूखे से पीड़ित लोगों की व्यथा जानने पहुँचे अखिलेश के स्वागत में हज़ारों लीटर पानी को हैलीपैड पर बहा दिया गया।

पानी की सौगात लेकर पहुँचे अखिलेश अपने लोगों की परेशानियों के प्रति इतने सचेत थे कि उन्हें इस बात से भी कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा। वो अखिलेश योगी आदित्यनाथ को जब ये बताते हैं कि किसानों के लिए, जनता के लिए क्या करना है, तो थोड़ा हास्यास्पद वाली स्थिति बन जाती है।

सवाल नंबर #3

अखिलेश अपने कार्यकाल में इतनी व्यस्तता से जीवन गुज़ारते थे कि सरकारी सम्पत्ति (सरकार द्वारा मिले आवास) की भी हालत ख़स्ता करने से नहीं चूके। यह और बात है कि सरकारी बंगले में तोड़-फोड़ करने से परहेज नहीं करने वाले अखिलेश यादव खुद के आवास निर्माण और उसके साज-सज्जा पर करोड़ों खर्च कर देते हैं।

सवाल नंबर #4

किसानों के कंधों पर बंदूक रख कर बीजेपी पर निशाना साधने वाले अखिलेश यादव न जाने क्यों अपने कार्यकाल के बारे में बात करने में हमेशा पीछे रह जाते हैं। अखिलेश यादव शायद इस बात को भूल रहे हैं कि जो हिदायत वो सीएम योगी को दे रहे हैं वो अगर उन्होंने खुद पर लागू की होती तो 2017 में उन्हें इतनी तीख़ी हार का सामना नहीं करना पड़ता। अन्य राज्यों के मुक़ाबले अखिलेश यादव के राज में लगातार किसानों का फंदे पर लटकना उनकी कार्यशैलियों पर न केवल सवाल खड़ा करता है बल्कि चुनावों के नज़दीक होने के कारण उनके अवसरवादी होने का भी प्रमाण देता है।

सवाल नंबर #5

जो अखिलेश यादव 2016 में किसी पार्टी से गठबंधन न करने की हामी भरते रहे, वही अखिलेश 2017 में कॉन्ग्रेस से हाथ मिलाकर फूले नहीं समाते। और न जाने फिर क्या हुआ कि वही अखिलेश 2019 के आते-आते वर्षों पुरानी दुश्मनी भुलाकर बसपा से बुआ-भतीजे का खेल खेलते भी नज़र आते हैं।

अखिलेश यादव जी! आप किसी पर भी सवाल उठाने से पहले अपने कार्यकाल का समय आखिर क्यों भूल जाते हैं?

मुख्यमंत्री पद छोड़ दूँगा, सीमा लाँघ रही है कॉन्ग्रेस: कुमारस्वामी

कर्नाटक में कॉन्ग्रेस व जनता दल सेक्यूलर (जेडीएस) के नेताओं के बीच आए दिन बिगड़ते रिश्ते की ख़बर मीडिया में आती रहती है। लेकिन इस बार ख़ुद राज्य के मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी कॉन्ग्रेस पर भड़क गए हैं। दोनों ही दलों के बीच रिश्ता इतना ख़राब हो चुका है कि ख़ुद मुख्यमंत्री को बयान देना पड़ा है।

राज्य के मुख्यमंत्री कुमारस्वामी ने मीडिया द्वारा पूछे गए एक सवाल के जवाब में कहा, “कॉन्ग्रेस के नेता अपनी सीमा को लाँघ रहे हैं। कॉन्ग्रेस को अपने नेताओं को कंट्रोल करना चाहिए। यदि कॉन्ग्रेस के नेता इस तरह के बयान देते रहे तो मैं मुख्यमंत्री पद से पीछे हटने के लिए तैयार हूँ।” मुख्यमंत्री ने अपने बयान में यह भी कहा कि कॉन्ग्रेस को इन मुद्दों पर नजर रखनी चाहिए, मैं इनके लिए जिम्मेवार व्यक्ति नहीं हूँ।

दरअसल कॉन्ग्रेस की तरफ़ से राज्य के उपमुख्यमंत्री बने जी परमेश्वरा ने बयान दिया था कि सिद्धरमैया सबसे अच्छे व्यक्ति रहे हैं। “वह हमारे नेता हैं। कॉन्ग्रेस विधायकों के लिए सिद्धरमैया ही मुख्यमंत्री हैं। हम उनके साथ खुश हैं।” राज्य के उपमुख्यमंत्री के इस बयान के बाद पत्रकारों ने जब मुख्यमंत्री से इस मामले में सवाल किया तो मुख्यमंत्री ने पद छोड़ने तक की बात कह दी।  

कॉन्ग्रेस पार्टी में भी अंदरूनी कलह

कर्नाटक कॉन्ग्रेस के अंदरुनी खेमें से खटपट की ख़बरें आए दिन उजागर होती रहती हैं। इससे पार्टी की बिगड़ती छवि तो दिखती ही है, साथ में पार्टी के अंदर फैला गहरा असंतोष भी जगज़ाहिर होता है। पिछले दिनों कर्नाटक में कॉन्ग्रेस के दो विधायक किसी बात को लेकर आपस में न सिर्फ़ भिड़ गए थे बल्कि बात हाथापाई की नौबत तक आ गई थी।

बेंगलुरू के जिस होटल में कॉन्ग्रेसी विधायक आनंद सिंह और जेएन गणेश ठहरे हुए थे, वहीं यह झड़प हुई थी। किसी बात को लेकर दोनों में आपसी विवाद इतना बढ़ गया कि जेएन गणेश ने आनंद सिंह के सिर पर बोतल से वार कर दिया था।

‘वेश्या’ कहे जाने पर पति की हत्या ‘मर्डर’ नहीं: SC का फ़ैसला

तमिलनाडु के एक मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए निर्णय ने सबका ध्यान अपनी तरफ आकर्षित किया है। दरअसल, यह निर्णय तमिलनाडु की एक घटना से जुड़ा है। एक महिला द्वारा अपने प्रेमी के साथ मिल कर पति की हत्या करने को सुप्रीम कोर्ट ने ‘मर्डर’ मानने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने दोनों को मिली उम्रकैद की सज़ा भी रद्द कर दी और इसे ‘ग़ैर इरादतन हत्या’ की श्रेणी में रखा। ट्रायल कोर्ट और मद्रास हाई कोर्ट- दोनों ने ही महिला और उसके प्रेमी को हत्या का दोषी मानते हुए उम्रक़ैद की सज़ा सुनाई थी, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने कम कर दिया।

आरोपित महिला का उसके पड़ोसी के साथ विवाहेतर सम्बन्ध थे। घटना के दिन उसके पति ने महिला और अपनी बेटी के लिए ‘वेश्या’ शब्द का प्रयोग किया। बढ़ते वाद-विवाद के बाद महिला के प्रेमी ने महिला का पक्ष लेते हुए दख़ल दिया, जिसके कारण पति का गुस्सा सातवें आसमान पर चढ़ गया। प्रेमी ने महिला के पति को थप्पड़ जड़ा और आरोपित महिला के साथ मिल कर पति का गला भी दबाया।

दोनों ने मिलकर पति की हत्या कर दी और उसके शव को अपने एक मित्र की गाड़ी में छिपा दिया। लाश को 40 दिन बाद बरामद किया जा सका। महिला ने गाँव के ही एक शिक्षक को घटना की जानकारी देते हुए अपना दोष स्वीकार किया। ट्रायल कोर्ट और मद्रास हाई ने महिला और उसके प्रेमी को उम्रक़ैद की सज़ा सुनाई।

हाई कोर्ट के निर्णय के ख़िलाफ़ दाख़िल की गई याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस मोहन एम शांतानागोदर और दिनेश माहेश्वरी ने कहा:

“अश्लील भाषा की वजह से महिला को एकदम से गुस्सा आ गया और महिला ने अपना नियंत्रण खो दिया और मात्र कुछ ही मिनटों में पति की हत्या कर दी गई। मृत पति ने पत्नी को वेश्या कहकर उकसाया था।”

अदालत ने यह भी कहा कि हमारे समाज में कोई भी महिला अपने लिए या ख़ास तौर पर अपनी बेटी के लिए ऐसे शब्दों को बर्दाश्त नहीं करेगी। कोर्ट ने इसे एक भड़काने वाला मामला बताया। कोर्ट ने दोनों को मिली उम्रकैद की सज़ा को 10 वर्ष की सज़ा में तब्दील कर दिया। कोर्ट ने कहा कि यह ‘एकाएक उकसाए जाने (Sudden Provocation)’ का मामला है।

2007 में भी केरल की एक घटना पर निर्णय देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने यही कारण देते हुए एक दुकानदार की सज़ा कम कर दी थी। यह घटना 1998 की थी। एक कूड़ा उठाने वाले ने आरोपित व्यक्ति की दुकान में कूड़ा फेंक दिया था, जिसके कारण दुकानदार ने उसकी हत्या कर दी थी। अदालत ने उस मामले में कहा था कि आरोपित दुकानदार ने ‘स्वयं पर नियंत्रण खोने’ के कारण ऐसा किया।

बाल लिंगानुपात: सिक्किम, छत्तीसगढ़ अव्वल तो दक्षिण भारतीय राज्य फिसड्डी

बाल लिंगानुपात के आँकड़ों को देखने पर पता चलता है कि उत्तर-पूर्व के कुछ राज्य बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं, वहीं दक्षिण भारतीय राज्य फिसड्डी साबित हुए हैं। रजिस्ट्रार जनरल ऑफ़ इंडिया द्वारा जारी किए गए आँकड़ों के मुताबिक़ बाल लिंगानुपात में सिक्किम भारतीय राज्यों में सबसे ऊपर रहा है। वहीं अगर केरल को छोड़ दें, तो बाकी दक्षिण भारतीय राज्यों की स्थिति ख़राब है। आंध्र प्रदेश की स्थिति तो पूरे देश में सबसे ज़्यादा बदतर है। वो भी तब, जब मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू राज्यवासियों को ज़्यादा से ज़्यादा बच्चे पैदा करने की सलाह देते हैं। मुख्यमंत्री नायडू अगर इसके बजाय बाल लिंगानुपात बेहतर करने की बात करते, तो शायद परिणाम कुछ बेहतर होते।

उत्तर पूर्व के राज्य सिक्किम ने इस मामले में सबसे अच्छा प्रदर्शन किया है। सिक्किम में बाल लिंगानुपात 999 (प्रति 1000) है। यह अपने-आप में एक बड़ी उपलब्धि है क्योंकि राज्य में बाल लिंगानुपात 2007 में 981 से घट कर 2013 में 956 पर आ गया था। 2014 से सिक्किम ने इस मामले में पीछे मुड़ कर नहीं देखा और साल दर साल प्रदर्शन में सुधार होता गया। सिक्किम ने 2015 के मुक़ाबले 2016 में 26 (प्रति 1000) की छलाँग लगाई है। सिक्किम का प्रदर्शन सराहनीय है और शेष भारत को इससे सीख लेने की जरूरत है। इस से यह भी पता चलता है कि उत्तर-पूर्वी राज्यों पर केंद्र सरकार द्वारा विशेष ध्यान देने के सुखद परिणाम सामने आ रहे हैं।

उत्तर भारतीय राज्यों के मुक़ाबले तुलनात्मक रूप से ज्यादा विकसित दक्षिण भारतीय राज्यों का प्रदर्शन इस मामले में काफ़ी ख़राब रहा है। जैसा की हमने ऊपर बताया, आंध्र प्रदेश 29 राज्यों और 7 केंद्र शासित प्रदेशों में सबसे फिसड्डी रहा है। राज्य में जन्म लिंगानुपात सिर्फ़ 806 रह गया है। यह राज्य सरकार के लिए ख़तरे की घंटी है। 2008 में यहाँ बाल लिंगानुपात 986 हुआ करता था। अर्थात, 8 वर्षों के भीतर आंध्र में बाल लिंगानुपात तेज़ी से नीचे गिरा है।

बाल लिंगानुपात में सिक्किम चोटी पर तो आंध्र फिसड्डी (डाटा साभार: Census India)

हालाँकि, सरकार द्वारा जारी किए गए ताज़ा आँकड़ें 2016 के हैं। बाल लिंगानुपात के क्षेत्र में एक और उत्तर-पूर्वी राज्य नागालैंड ने भी बेहतरीन प्रदर्शन किया है। नागालैंड की स्थिति 2007 में काफ़ी बदतर थी और राज्य इस मामले में पंजाब के बाद सबसे फिसड्डी राज्य था। 2016 में यह तस्वीर बदल गई है और नागालैंड अब बाल लिंगानुपात के मामले में तीसरा सबसे बेहतर राज्य है। बाल लिंगानुपात की लिस्ट में (घटते क्रम में) सिक्किम और छत्तीसगढ़ के बाद नागालैंड का ही स्थान आता है। 2016 में नागालैंड में बाल लिंगानुपात 967 दर्ज़ किया गया। यह अपने आप में सबसे बड़ी बात है क्योंकि 10 सालों में नागालैंड ने पहली बार 900 के आँकड़े को पार किया है। 2015 में 897 से 2016 में सीधा 967 पर आना यह दिखाता है कि राज्य के लोग ‘बेटी बचाओ’ के नारे को सचमुच गंभीरता से ले रहे हैं।

यहाँ छत्तीसगढ़ की बात करना अनिवार्य हो जाता है क्योंकि वहाँ पूर्व मुख्यमंत्री डॉक्टर रमन सिंह द्वारा भ्रूण-हत्या की रोकथाम के लिए, किए गए कार्यों के सीधे परिणाम नज़र आ रहे हैं। केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गाँधी ने भी जुलाई 2015 में मुख्यमंत्री सिंह की प्रशंसा करते हुए कहा था कि महिला-पुरुष अनुपात के मामले में छत्तीसगढ़ देश के अग्रणी राज्यों में से एक है। सुचिता योजना के तहत रमण सरकार ने विद्यालयों में बालिकाओं के लिए सैनिटरी नैपकिन्स भी वितरित करवाए थे। महिलाओं को ध्यान में रख कर चलाई गई ऐसी गई योजनाओं के परिणाम के रूप में छत्तीसगढ़ ने भारतीय राज्यों में दूसरा स्थान प्राप्त किया है।

हमने देखा कि कैसे सिक्किम, छत्तीसगढ़ और नागालैंड जैसे छोटे राज्यों ने बाल लिंगानुपात की सूची में बेहतर स्थान प्राप्त किया तो आंध्र प्रदेश जैसे राज्य बदतर स्थिति में हैं। एक और बड़े राज्य तमिलनाडु की स्थिति भी काफ़ी बदतर है। 2007-18 के दशक में पहले छह सालों में जहाँ तमिलनाडु में बाल लिंगानुपात 900 से नीचे नहीं गिरा, वहीं 2014-16 तक तो यह 800 से भी कम रहा। 2016 में 840 के साथ यह बाल लिंगानुपात के क्षेत्र में देश के सबसे बदतर राज्यों में से एक साबित हुआ। पूर्व मुख्यमंत्री जयललिता की मृत्यु के बाद राजनीतिक रूप से अस्थिरता झेल रहा राज्य 2015 में राजस्थान के बाद सबसे कम लिंगानुपात वाला राज्य था।

सभी 29 राज्यों में बाल लिंगानुपात के 10 वर्ष के आँकड़े (डाटा साभार: Census India)

अगर केंद्र-शासित प्रदेशों की बात करें तो सातों केंद्र-शासित प्रदेशों में लिंगानुपात का आँकड़ा 900 के पार रहा। अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह अव्वल रहा तो चंडीगढ़ 901 लिंगानुपात के साथ अंतिम स्थान पर रहा। दिल्ली की बात करें तो वर्ष 2008 में यहाँ बाल लिंगानुपात 1000 को पार कर गया था, जिसके बाद लगा था कि दिल्ली इस मामले में पूरे देश को राह दिखाएगी लेकिन 2008 के मुक़ाबले 2016 में यह आँकड़ा सिर्फ़ 902 रह गया।

केंद्र-शासित प्रदेशों में अंडमान-निकोबार टॉप पर ( डाटा साभार: Census India )

आंध्र प्रदेश के साथ जिस राज्य ने ताल से ताल मिलाई, वह है राजस्थान। राजस्थान और आंध्र प्रदेश का बाल लिंगानुपात समान रहा और दोनों ही राज्य पूरे देश में फिसड्डी रहे। राजस्थान में 2014-15 में तो यह आँकड़ा 800 से भी कम रहा। राज्य में भ्रूण-हत्या रोकने और बालिकाओं की शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। पहाड़ी राज्य उत्तराखंड उपर्युक्त दोनों राज्यों के बाद देश का दूसरा सबसे फिसड्डी राज्य रहा और 825 बाल लिंगानुपात के साथ राजस्थान, उत्तराखंड और बिहार (837) के साथ क़दमताल करता दिखा। उत्तराखंड में तो 10 सालों में बाल लिंगानुपात कभी 900 की संख्या को पार ही नहीं कर पाया।

एक और बड़े दक्षिण भारतीय राज्य कर्नाटक की स्थिति भी ख़राब है। 2007-09 के दौरान लगातार तीन वर्षों तक कर्नाटक बाल लिंगानुपात के क्षेत्र में पूरे भारत में सबसे अग्रणी राज्य रहा। 2007-10 तक यहाँ बाल लिंगानुपात 1000 के पार रहा। 2011 से इसमें गिरावट शुरु हो गई जो 2015 तक नहीं रुकी। 2016 में भी 896 लिंगानुपात के साथ राज्य बेहतर स्थिति में नहीं है।

यहाँ ओडिशा राज्य की बात करनी ज़रूरी है क्योंकि ओडिशा पूरे भारत में एकमात्र ऐसा राज्य है जहाँ 2009-18 के बीच 9 वर्षों में बाल लिंगानुपात किसी भी वर्ष बढ़ा ही नहीं। 2009 के बाद साल दर साल ओडिशा में बाल लिंगानुपात घटता ही गया और 935 से 858 पर आ गया। इन 9 सालों में एक भी ऐसा साल नहीं आया जब ओडिशा में बाल लिंगानुपात में घटोतरी न दर्ज़ की गई हो। राज्य के लिए यह आँकड़ा भयावह है और चौंकाने वाला भी। एक स्थिर व लम्बे कार्यकाल वाली सरकार और एक मज़बूत मुख्यमंत्री के रहते बाल लिंगानुपात का लगातार कम होना चिंता का विषय होना चाहिए। राज्य को इस क्षेत्र में आत्ममंथन की ज़रूरत है क्योंकि ऐसी स्थिति देश के किसी भी अन्य राज्य में नहीं बनी है।

26 जनवरी पर ‘संप्रदाय विशेष’ का देश विरोधी मामला (लेटेस्ट): ‘खां’ उपनाम के 8 लोगों पर FIR दर्ज़

मध्य प्रदेश स्थित राजगढ़ जिले के खुजनेर में 26 जनवरी को एक ‘संप्रदाय विशेष’ द्वारा देश-विरोधी नारे और बच्चों पर हथियारों से हमला करने में नया अपडेट आया है। अपडेट सुखद भी है और दुखद भी। सुखद इसलिए क्योंकि पुलिस ने 16 लोगों के ख़िलाफ़ केस दर्ज़ किया है। दुखद इसलिए क्योंकि गणतंत्र दिवस समारोह के कार्यक्रम स्थल पर भगदड़ मचने से चार स्कूली बच्चे समेत 12 लोग घायल हुए हैं।

नई दुनिया में 28 जनवरी को छपी ख़बर के अनुसार जिन 16 लोगों के ख़िलाफ़ केस दर्ज किया गया है, उनमें से छह को रविवार की शाम तक गिरफ़्तार भी किया जा चुका है। ‘संप्रदाय विशेष’ के समद खां, बल्ला खां, सेठा उर्फ जाकिर खां, अबरार खां, शाकिर खां, अय्यूब खां, इम्तियाज खां एवं समीर खां के खिलाफ बलवा, मारपीट सहित अन्य धाराओं के तहत केस दर्ज़ हुआ है।

जाँच के बाद देशद्रोह का आरोप

राजगढ़ के पुलिस अधीक्षक प्रशांत खरे ने बताया कि जाँच शुरू कर दी गई है। घटना स्थल पर मौजूद लोगों के बयान एवं सीसीटीवी की रिकॉर्डिंग व अन्य सबूतों के बाद ही देशद्रोह का केस दर्ज किया जाएगा।

दबाव में बना दिया आरोपी

जिन लोगों ने गणतंत्र दिवस के कार्यक्रम स्थल पर भगदड़ को रोकने में मदद की और बच्चों को बचाया, उनका कहना है कि पुलिस ने दबाव में आकर उन्हें भी इस मामले में आरोपी बना दिया है। पुलिस के इस रवैये के ख़िलाफ़ इन लोगों ने बाजार बंद का ऐलान किया है। ये लोग अंकित यादव, कपिल यादव, सोपान यादव, कमल यादव, हरिओम यादव, कमल भानेज एवं बंटी यादव के खिलाफ दर्ज मामले का विरोध कर रहे हैं।

इसी घटना की पहली रिपोर्ट आप यहाँ पढ़ सकते हैं।

हेमा मालिनी पर बेहूदा कॉमेंट से पहले इंदिरा के पोस्टर को भी देख लो ‘दुर्जन’ सिंह

आज के दौर में महिलाएँ किसी भी क्षेत्र में पीछे नहीं हैं। फिर चाहे वो आसमान हो या धरती। अपनी कड़ी मेहनत और अदम्य साहस का परिचय वो सदियों से देती चली आईं हैं। अगर कोई गाँव और क़स्बों की ज़िंदगियों में झाँक कर देखे तो वहाँ भी महिलाएँ इतिहास रचती दिख जाएँगी, फिर चाहे वो घर की दहलीज़ हो या आसमान की लंबी उड़ान। अपनी विलक्षण प्रतिभा का लोहा मनवाने के बावजूद आए दिन महिलाएँ तरह-तरह के कटाक्षों और जुमलों का सामना करती दिखती हैं। अपनी पीड़ित मानसिकता से ग्रसित विकृत समाज के लोग न जाने क्यों महिलाओं को ही कमतर आँकते हैं?

राजनीतिक गलियारे से आए दिन महिलाओं के लिए अभद्र टीका-टिप्पणियाँ भर-भर के प्रचारित-प्रसारित होती रहती हैं। एक तरफ जहाँ देश का ‘जोश’ 26 जनवरी की परेड में महिलाओं के प्रतिनिधित्व से ‘हाई’ था, वहीं दूसरी ओर मध्य प्रदेश सरकार के मंत्री सज्जन सिंह वर्मा ने बीजेपी की महिला नेताओं पर भद्दा तंज कसा। उन्होंने कहा, “दुर्भाग्य की बात है बीजेपी के पास खुरदुरे चेहरे हैं, जिन्हें लोग पसंद नहीं करते। केवल एक हेमा मालिनी हैं, जिन्हें जगह-जगह शास्त्रीय नृत्य कराते हैं और वोट की माँग करते हैं।” मंत्री ‘साहब’ का ऐसा बयान साबित करता है कि वो महिलाओं के प्रति कैसा दृष्टिकोण रखते हैं। फ़िल्म अभिनेत्री हेमा मालिनी मथुरा से सांसद हैं, मंत्री ‘साहब’ की ही तरह जनप्रतिनिधि हैं। ऐसे में उनके प्रति इस तरह की अभद्र भाषा का इस्तेमाल कॉन्ग्रेस नेता की घटिया सोच को उजागर करती है। किसी भी महिला के लिए इस तरह की टीका-टिप्पणी अक्षम्य अपराध है।

आपको बता दें कि टीका-टिप्पणी करने में सज्जन सिंह इतने पर ही नहीं रुके बल्कि हद तो तब हो गई, जब उन्होंने एक तरफ तो प्रियंका गाँधी की सुंदरता और व्यक्तित्व का ख़ूब गुणगान किया और दूसरी तरफ बीजेपी खेमें की महिला नेताओं के स्वाभिमान को चकनाचूर करने का काम किया। ऐसी विकृत सोच वाले पुरुष से यदि पूछा जाए कि क्या महिलाएँ जिन प्रतिष्ठित पदों पर आसीन होती हैं, उसका आधार केवल उनकी सुंदरता मात्र ही होता है या फिर उनकी ईमानदारी, कड़ी मेहनत और लगन भी होती है? क्या ऐसे पुरुषों की आँखें उस समय काम करना बंद कर देती हैं, जब महिलाएँ दुनिया भर में अपना परचम लहराती हैं!

बात चाहे आज के दौर की हो या बीते कल की। हर दौर में महिलाओं ने ख्याति प्राप्त करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी, जिसका प्रमाण जगज़ाहिर भी है। चाहें तो इतिहास में दर्ज उन पन्नों को पलट कर देख लें जहाँ भिकाजी कामा, विजयलक्ष्मी पंडित, राजकुमारी अमृत कौर, रानी लक्ष्मीबाई, और सुभाष चंद्र बोस की इंडियन नेशनल आर्मी की झांसी की रानी रेजीमेंट कैप्टन लक्ष्मी सहगल का उल्लेख हो। इन्होंने अपनी अद्भुत क्षमता का परिचय देते हुए देश की आज़ादी में अपना योगदान देने में कोई कसर बाक़ी नहीं रखी।

आज़ादी के बाद देश की पहली महिला प्रधानमंत्री बनी इंदिरा गाँधी की कार्यशैली से तो पूरा देश वाक़िफ़ है। देश को एक साथ चलने की सूझबूझ उनकी सुंदरता का परिचय देती है या उनकी कुशाग्र बुद्धि का, इसे समझ पाना सज्जन सिंह जैसे मंदबुद्धी नेताओं की समझ से परे है। जो महिलाओं के केवल रूप रंग को उसकी बुद्धि से जोड़कर देखते हों, उनकी सोच की गहराई ऊपर से ही दिख जाती है।

चिकने चेहरों की बात करने वाले सज्ज्न सिंह ये बताने का कष्ट करेंगे कि क्या वो इस नेता नगरी में कोई ब्यूटी कॉन्टेस्ट जीत कर आए थे, या उन्हें मंत्री पद दान में मिल गया था? और बात अगर ब्यूटी कॉन्टेस्ट की ही है, तो नेताजी आप तो यहाँ भी विफल हो जाएँगे क्योंकि वहाँ भी पैमाना सिर्फ़ सुंदरता का नहीं होता, बल्कि बौद्धिक क्षमताओं को भी आँका जाता है – अफ़सोस आपके पास तो वो भी नहीं!

सही मायनों में तो दुर्भाग्य समाज के उस तबके का है, जिन्होंने सज्जन सिंह जैसे नेताओं को अपना प्रतिनिधि चुनकर उनके लिए राजनीति के रास्ते खोल दिए। खुरदरे चेहरे की संज्ञा देकर महिलाओं के सम्मान को हानि पहुँचाने का जो काम कॉन्ग्रेसी नेता ने किया है, वो किसी भी दशा में स्वीकार्य नहीं है।

आपको बता दें कि ऐसा पहली बार नहीं हुआ है जब किसी नेता या स्टार ने महिलाओं की गरिमा पर इस क़दर प्रहार किया हो। हाल ही में घटित ऐसी कई ओछी हरक़तें हैं, जिसमें राजनीति के मद में चूर नेताओं ने महिलाओं के आत्मसम्मान और प्रतिभा को ही मोहरा बनाया।

हद तो तब पार हो जाती है जब राजनीतिक दलों की महिला नेताओं को कभी ‘टंचमाल’ तो कभी ‘टनाटन’ कह दिया जाता है। कभी ‘थकी हुई और मोटी’ कह दिया जाता है, तो कभी ‘महिलाओं के सजावटी’ होने की बात होती है। यहाँ तक कि ‘हट्टी-कट्टी गाय’ तक कह दिया जाता है। माने ये कि पुरुष नेताओं की गज़ भर लंबी ज़ुबान, जो चाहे वो कह दे। महिलाओं के प्रति बेलगाम होती ये ज़ुबान आख़िर पुरुष नेताओं के किन संस्कारों का परिचय कराती है, ये एक गंभीर प्रश्न है?

देश में वर्षों तक सत्ता पर क़ाबिज़ होने वाली कॉन्ग्रेस पार्टी अपने सहयोगी नेताओं की इस तरह की टिप्पणियों को कभी आड़े हाथों नहीं लेती, और विरोध दर्ज करें भी तो क्यों जब ख़ुद राहुल गाँधी रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण को लेकर दिए गए अपने एक बयान से विवादों के घेरे में रह चुके हों। राहुल गाँधी को तो महिला आयोग ने नोटिस भी भेजा था जबकि प्रधानमंत्री मोदी ने ट्विटर हैंडल के ज़रिए निर्मला सीतारमण के रक्षा मंत्री होने पर गर्व होने की बात कही थी।

महिलाओं के प्रति इस तरह की आपत्तिजनक और अभद्र टिप्पणियों को गंभीरता से लेना चाहिए और राजनीति में इस तरह की विकृत सोच वाले नेताओं का आगमन पर उनका स्वागत करने के बजाए उन पर विराम लगाने के लिए, ऐसे नेताओं पर तुरंत कार्रवाई करनी चाहिए। उन्हें राजनीति से बेदख़ल कर उनके राजनीतिक करियर पर हमेशा के लिए फुलस्टॉप लगा देना चाहिए, जिससे ऐसी कुंठित सोच को आगे बढ़ने से रोका जा सके।

1500+ गाय, 52 नेत्रहीन, 350 अपाहिज: गौसेवा की अनुपम मिसाल के लिए जर्मन महिला को पद्मश्री

जर्मन महिला फ्रेड्रिन इरिन ब्रूनिंग उर्फ़ सुदेवी दासी गोवर्धन को केंद्र सरकार ने पद्मश्री से सम्मानित किया है। सुदेवी राधाकुंड धाम में विगत 42 वर्षों से गौसेवा कर रहीं हैं। बीमार और असहाय गायों की सेवा करने के कारण उन्हें ‘गायों की मदर टेरेसा’ भी कहा जाता है। उन्हें पद्म पुरष्कार मिलने का समाचार पा कर स्थानीय निवासी भी ख़ुश हुए और गौशाला पहुँच कर उन्होंने सुदेवी को माला पहनाकर सम्मानित किया।

पाँच बीघा के क्षेत्र में फैले सुरभि गौशाला का संचालन कर रही सुदेवी ने 1,500 से भी अधिक गायों को पाल रखा है, जिनकी वह लगातार देखभाल करती हैं। इन गायों में से अधिकतर बीमार, नेत्रहीन या अपाहिज हैं। इनमें से 52 गायें नेत्रहीन है जबकि 350 पैरों से अपाहिज है। उनके पैरों की नियमित मरहम-पट्टी की जाती है। सुदेवी के अनुसार, जब मंत्रालय द्वारा उन्हें पुरस्कार मिलने की जानकारी दी गई, तब उन्हें समझ नहीं आया कि क्या हो रहा है। फिर स्थानीय निवासियों ने उन्हें इस से अवगत कराया।

अपने माता-पिता की इकलौती संतान फ्रेड्रिन 42 वर्ष पहले भारत भ्रमण पर आई थी। इस दौरान उन्होंने ब्रज आकर श्रीकृष्ण के भी दर्शन किए। कृष्ण-भक्ति ने उन्हें अपने तरफ ऐसा खींचा कि उन्होंने यहीं रहने की ठान ली। ब्रजवास में उन्होंने एक गाय भी पाल रखी थी, जिसके बीमार होने के बाद उन्होंने उसकी काफ़ी देखभाल की। इसके बाद वह जहाँ भी बीमार गाय देखती, उसकी देखभाल और सेवा में लग जाती। इसके बाद तो जैसे उन्होंने गौसेवा को ही अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया।

सुदेवी के पिता तीस वर्ष पहले तक दिल्ली स्थित जर्मन दूतावास में कार्यरत थे। इकलौती संतान होने के कारण उन्होंने पिता से मिलने वाली सारी धनराशि को गौसेवा में ही ख़र्च किया। उनके गौशाला में गायों के लिए एक स्पेशल एम्बुलेंस भी है। अगर किसी गाय की मृत्यु निकट आ जाए और उसके बचने की कोई संभावना न रहे, तब सुदेवी उसे गंगाजल का सेवन कराती है। मरणोपरांत गायों के शरीर का अंतिम संस्कार भी पूरे विधि-विधान के साथ संपन्न किया जाता है।

सुदेवी बताती हैं कि गायों की सेवा में हर महीने ₹30 लाख तक ख़र्च होते हैं। गायों का इलाज डॉक्टरों द्वारा करवाया जाता है। सुदेवी दानदाताओं और जर्मनी से आने वाले रुपयों की मदद से इस गौशाला का संचालन कर रहीं हैं। सुरभि गौशाला में 70 से 80 कर्मचारी कार्यरत हैं। किराए की भूमि पर गौशाला चला रहीं सुदेवी को उम्मीद है कि उन्हें इस पुरस्कार के मिलने के बाद गौशाला के लिए भूमि उपलब्ध कराई जाएगी। साथ ही, उन्होंने इस बात की भी उम्मीद जताई कि अब गोसेवा के रास्ते में आने वाली अड़चनें दूर होंगी।

सुदेवी ने बताया कि अगर गौशाला के लिए उन्हें भूमि मिल जाती है तो मासिक किराए में ख़र्च हो रहे रुपयों की बचत होगी और उसका उपयोग गौसेवा में किया जाएगा। हाल ही में जब उनके वीजा की अवधि समाप्त हो गई थी तब उन्होंने मथुरा की सांसद हेमा मालिनी से लेकर विदेश मंत्री सुषमा स्वराज तक के दरवाज़े खटखटाए थे। इसके बाद उन्हें वीजा मिल गया था। सुदेवी अविवाहित हैं और अभी भी एक झोपड़ी में ही रहती हैं। स्थानीय निवासियों ने उन्हें भारतीय नागरिकता देने की भी माँग की है।