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25 प्रोफेसर नियुक्त किए जिनमें 16 ईसाई? जानिए- क्या है DU के सेंट स्टीफंस कॉलेज का भर्ती विवाद, क्यों DUTA अध्यक्ष ने कहा- गैर-ईसाइयों की होती है अनदेखी

दिल्ली यूनिवर्सिटी (DU) से संबद्ध सेंट स्टीफंस कॉलेज एक बार फिर विवादों में है। कॉलेज में हाल ही में 25 शिक्षकों की नई नियुक्तियाँ की गई और अब दावा किया जा रहा है कि इनमें से 16 ईसाई/अल्पसंख्यक हैं। ये मामला इसलिए भी तूल पकड़ गया, क्योंकि ये नियुक्तियाँ करीब दर्जनभर हिंदू शिक्षकों को कॉलेज से निकालने के ठीक बाद में की गईं। इनमें से कुछ शिक्षकों ने हाईकोर्ट का रुख किया, जिसके बाद कोर्ट ने शिक्षकों को निकालने के आदेश पर रोक लगा दी।

यह मामला सिर्फ शिक्षक नियुक्तियों तक सीमित नहीं है बल्कि कॉलेज प्रशासन पर यूनिवर्सिटी के नियमों को दरकिनार कर मनमाने तरीके से फैसले लेने, लंबे समय से कार्यरत गैर-ईसाई ऐड हॉक शिक्षकों को बाहर करने और नए प्रिंसिपल की नियुक्ति में भी नियमों की अनदेखी करने के आरोप लग रहे हैं। इस पूरे विवाद पर दिल्ली यूनिवर्सिटी टीचर्स एसोसिएशन (DUTA) ने भी खुलकर कॉलेज प्रशासन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। DUTA के अध्यक्ष वीके नेगी ने कहा कि कॉलेज में गैर-ईसाइयों को प्राथमिकता नहीं दी जाती है।

सेंट स्टीफंस में 25 में से 16 सिर्फ ईसाई शिक्षकों की भर्ती

यह विवाद सेंट स्टीफंस कॉलेज में हुई नई शिक्षक नियुक्तियों का है, जिसमें आरोप लगे कि कॉलेज प्रशासन ने दिल्ली यूनिवर्सिटी और UGC की गाइडलाइन्स को नजरअंदाज करते हुए नियुक्ति प्रक्रिया पूरी की। DUTA ने आपत्ति जताते हुए कहा कि अनारक्षित सीटों में से प्रत्येक पर 70 उम्मीदवारों को शॉर्टलिस्ट किया गया था, जो दिल्ली यूनिवर्सिटी की नियुक्ति प्रक्रिया से कहीं अधिक है। यूनिवर्सिटी की प्रक्रिया के अनुसार, प्रत्येक सीट पर अधिकतम 40 उम्मीदवारों को ही शॉर्टलिस्ट किया जा सकता है।

इसके बाद 9 मई 2026 को सेंट स्टीफंस कॉलेज की ओर से चुने गए सहायक प्रोफेसरों की लिस्ट जारी की गई जिससे विवाद और बढ़ गया। अधिसूचना के मुताबिक, 25 अनारक्षित सहायक प्रोफेसरो पदों में से 16 ईसाई हैं। इससे कॉलेज पर अल्पसंख्यक के अधिकार के नाम पर मनमानी करने के आरोप बढ़ गए। DUTA अध्यक्ष वीके नेगी ने इसे गैर-ईसाई के प्रति कॉलेज का विरोध बताया।

सेंट स्टीफंस का नियुक्ति संबंधी नोटिस

इन नियुक्तियों के बाद उन 12-15 ऐड-हॉक (अस्थायी) शिक्षकों में आक्रोश फैल गया, जिन्हें निकालकर कॉलेज में नई नियुक्तियाँ की गई थीं। इनमें से अधिकतर हिंदू हैं। ये शिक्षक साल 2019 से कॉलेज में कार्यरत थे। इनमें से 6 शिक्षकों ने दिल्ली हाई कोर्ट का रुख किया। साथ ही दिल्ली यूनिवर्सिटी ने भी कॉलेज को भर्ती प्रक्रिया को आगे न बढ़ाने का निर्देश दिया।

दिल्ली हाई कोर्ट में शिक्षकों ने रखी माँग

2018 से 2021 के बीच दिल्ली यूनिवर्सिटी की प्रक्रिया के तहत भर्ती किए गए इन 6 शिक्षकों ने नई नियुक्तियों पर आपत्ति जताई और दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका दायर की। याचिका में शिक्षकों ने माँग की कि उनकी नौकरी को शुरुआत से ही पक्की माना जाए, उनकी सेवा लगातार मानी जाए, वेतन तय किया जाए, सीनियरिटी दी जाए और जो सुविधाएँ रेगुलर कर्मचारियों को मिलती हैं, वो उन्हें भी दी जाएँ।

कोर्ट में इन शिक्षकों ने कहा कि चयन सिर्फ इंटरव्यू के आधार पर किया गया है। उन्होंने आरोप लगाया कि कॉलेज ने हर पद के लिए करीब 70 उम्मीदवारों को शॉर्टलिस्ट किया, जबकि यूनिवर्सिटी के तय नियम इससे अलग थे।

याचिका में कहा गया, “इस प्रक्रिया से कट-ऑफ स्तर नीचे कर दिया गया, ताकि कम अकादमिक अंक और कम पढ़ाने का अनुभव रखने वाले उम्मीदवारों को मौका मिल सके। इससे ज्यादा पढ़े-लिखे, लंबे समय से पढ़ा रहे और कई सालों से कॉलेज में लगातार काम कर रहे शिक्षकों को चयन प्रक्रिया में सही और बराबरी का मौका नहीं मिल पाया।”

DU ने माना- सेंट स्टीफंस की भर्ती प्रक्रिया नियमों के खिलाफ

इन शिक्षकों का नेतृत्व दिल्ली यूनिवर्सिटी की कार्यकारी परिषद की सदस्य डॉ. मोनिका अरोरा ने किया। उन्होंने कोर्ट में कहा कि सेंट स्टीफंस कॉलेज की भर्ती प्रक्रिया नियमों के खिलाफ थी। हालाँकि उन्होंने याचिका में शिक्षकों की ओर से माँगी गई राहत यानी अस्थायी शिक्षकों को परमानेंट करने का विरोध किया।

कोर्ट को बताया गया कि यूनिवर्सिटी पहले ही इस संबंध में सेंट स्टीफंस कॉलेज को पत्र लिख चुकी है। पत्र में गलत शॉर्टलिस्टिंग नियमों को देखते हुए भर्ती प्रक्रिया आगे न बढ़ाने की सलाह दे चुकी है।

इससे पहले यूनिवर्सिटी की एग्जीक्यूटिव काउंसिल ने कॉलेज की भर्ती प्रक्रिया की जाँच के लिए कमेटी बनाई थी। इसके बावजूद कॉलेज ने भर्ती प्रक्रिया जारी रखी। वहीं, कॉलेज के कुछ अधिकारियों का यह भी कहना है कि भर्ती के दौरान कुछ खास उम्मीदवारों को फायदा पहुँचाने के लिए कई गलत तरीके अपनाए गए।

दिल्ली हाई कोर्ट का फैसला

दिल्ली हाई कोर्ट ने सेंट स्टीफंस कॉलेज के इन शिक्षकों को बड़ी राहत देते हुए कहा कि अगली सुनवाई तक उनकी सेवाएँ खत्म नहीं की जाएँगी। 13 मई 2026 को फैसले सुनाते हुए कोर्ट ने कहा कि ये शिक्षक कई वर्षों से कॉलेज में लगातार काम कर रहे हैं और पहली नजर में उनका पक्ष मजबूत दिखाई देता है।

कोर्ट ने यह भी माना कि शिक्षकों को नौकरी से हटाए जाने का डर कॉलेज की नई भर्ती प्रक्रिया की वजह से है। खास बात यह रही कि कोर्ट ने दिल्ली यूनिवर्सिटी की दलील कि कॉलेज द्वारा अपनाई गई शॉर्टलिस्टिंग प्रक्रिया तय नियमों के खिलाफ थी, को भी मान लिया। कोर्ट ने कहा कि इन परिस्थितियों में कई अहम सवाल उठते हैं, जिन पर विस्तार से सुनवाई जरूरी है।

इसके साथ ही अदालत ने आदेश दिया कि भर्ती विज्ञापन के तहत चयन समिति की रिपोर्ट या सिफारिशों को कोर्ट की अनुमति के बिना लागू नहीं किया जाएगा। कोर्ट ने दिल्ली यूनिवर्सिटी और अन्य पक्षों को नोटिस जारी करते हुए 6 हफ्ते के भीतर जवाब दाखिल करने को कहा है। कोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई 5 अक्टूबर 2026 को तय की है।

बिशप की मनमानी, कोर्ट के आदेशों का उल्लंघन

इस पूरे मामले में ऑपइंडिया ने DUTA के अध्यक्ष वीके नेगी से बात की। उन्होंने बताया कि दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश को नजरअंदाज करते हुए सेंट स्टीफंस कॉलेज ने नए शिक्षकों की नियुक्ति के विज्ञापन को आगे बढ़ा दिया है। इनमें से कई शिक्षक अब कॉलेज के आधिकारिक सहायक प्रोफेसर के पद पर काम कर रहे हैं।

वीके नेगी का कहना है कि कॉलेज प्रशासन ने पहले दिल्ली यूनिवर्सिटी की गाईडलाइन को अनदेखा कर मनमाने तरीके से प्रक्रिया संपन्न कर दी और कार्यरत गैर ईसाई एड-हॉक हिंदू शिक्षकों को टारगेट कर हटा दिया। उन्होंने बताया कि कॉलेज का इतिहास गैर-ईसाई विरोधी रहा है।

DUTA ने सेंट स्टीफंस कॉलेज की मनमानी को लेकर दिल्ली यूनिवर्सिटी को पत्र लिखकर शिकायत की और कॉलेज प्रशासन के खिलाफ कार्रवाई की माँग की, लेकिन सेंट स्टीफंस कॉलेज ने किसी भी यूनिवर्सिटी द्वारा भेजे गए किसी भी लिखित पत्र का जवाब नहीं दिया।

वीके नेगी ने इस मामले में बिशप के द्वारा की गई मनमानी और यूनिवर्सिटी के ढुलमुल रवैये से कॉलेज के छात्रों और शिक्षकों के भविष्य को खतरा बताया है। उन्होंने कहा कि इससे कॉलेज की मान्यता और संबद्धता खत्म हो सकती है, जिससे हजारों छात्र-छात्राओं की डिग्री अमान्य होने का भी कारण बनने लगा है। वीके नेगी ने कहा कि छात्रों के भविष्य को देखते हुए कॉलेज को दिल्ली यूनिवर्सिटी के नियमों और कानून के दायरे में रहना चाहिए।

सेंट स्टीफंस का अल्पसंख्यक दर्जे का फायदा उठाने का रहा इतिहास

यह पहली बार नहीं है जब सेंट स्टीफंस कॉलेज विवादों में आया हो। कॉलेज पहले भी मजहब, शिक्षकों की नियुक्ति, छात्र संस्कृति और दिल्ली यूनिवर्सिटी के साथ अपने संबंधों को लेकर चर्चा में रहा है। सबसे बड़ा और लंबे समय से चला आ रहा विवाद कॉलेज की अल्पसंख्यक (ईसाई) संस्थान वाली पहचान को लेकर है। अक्सर आरोप लगते रहे हैं कि यहाँ धर्म के आधार पर नियुक्तियों और कॉलेज की संस्कृति में पक्षपात होता है।

1.दिल्ली यूनिवर्सिटी की रोक के बावजूद नए प्रिंसिपल की नियुक्त: हाल ही में सेंट स्टीफंस कॉलेज में पहली महिला प्रिंसिपल की नियुक्ति को लेकर विवाद सामने आया था। कॉलेज ने सुसान एलियास को नया प्रिंसिपल घोषित कर दिया, लेकिन दिल्ली यूनिवर्सिटी ने इस नियुक्ति को नियमों के खिलाफ बताते हुए प्रक्रिया रोक दी थी और UGC से भी मामले में दखल देने की माँग की थी। इसके बावजूद कॉलेज ने कोई जवाब नहीं दिया। अब 1 जून 2026 को नई प्रिंसिपल पदभार ग्रहण करने जा रही हैं।

2.अल्पसंख्यक (ईसाई) संस्थान और धार्मिक पक्षपात का आरोप: 2015 के आसपास यह विवाद खुलकर सामने आया, जब पूर्व छात्र संगठन एसोसिएशन ऑफ ओल्ड स्टेफेनियन्स (AOS) ने आरोप लगाया कि 8 नई नियुक्तियों में से 7 ईसाई थे, जिसे उन्होंने धार्मिक पक्षपात और सेकुलर शिक्षा के दिल्ली यूनिवर्सिटी की नीतियों के उल्लंघन का उदाहरण बताया। इन आरोपों पर बाद में मीडिया और राजनीतिक दलों ने भी चर्चा शुरू की, जिससे कॉलेज‑प्रशासन के खिलाफ एक व्यापक सार्वजनिक आरोप‑याचिका‑डिबेट शुरू हुई थी।

3.नियुक्ति, स्वायत्तता और DU-कोर्ट विवाद: धर्म के आरोप के साथ‑साथ यह भी बार‑बार विवाद का विषय रहा कि क्या सेंट स्टीफंस को DU के नियम‑नियंत्रण में रहना चाहिए या नहीं। DU निरंतर यह ज़ोर देता है कि भर्ती, फीस और एडमिशन नीति उसके दिशा‑निर्देशों के अनुरूप हों, जबकि कॉलेज प्रबंधन अपने लैंड टाइटल, ईसाई ट्रस्ट और ऐतिहासिक अधिकारों के नाम पर ‘स्वायत्त’ संस्था की दलील देता है। साल 2022–23 में जब दिल्ली हाई कोर्ट ने भर्ती और CUET‑आधारित एडमिशन नीति के मामले में कॉलेज के रवैये पर सख्त टिप्पणी की और कहा कि ऐसा व्यवहार यूनिवर्सिटी एक्ट और शिक्षा आयोग के नियमों के खिलाफ है, जिससे स्पष्ट हुआ कि इस विवाद सिर्फ आंतरिक बल्कि विधिक और संवैधानिक भी है।

4. धार्मिक असेंबली और ‘हिंदू विरोधी’ आरोप: साल 2024 में एक विवाद कॉलेज की धार्मिक असेंबली और भीतरी संस्कृति को लेकर उठा। कॉलेज ने 120 छात्रों को मॉर्निंग असेंबली में हिस्सा नहीं लेने के लिए निलंबित करने का मेल किया। विवाद बढ़ा तो कॉलेज प्रशासन ने इसे टाइपिंग त्रुटि बताते हुए माफी माँग ली। कॉलेज की असेंबली में छात्रों को बाइबल और अन्य धार्मिक ग्रंथों के अंश पढ़ाए जाते हैं, छात्र संगठनों और शिक्षक संगठनों ने इसे वास्तव में ईसाइयत का हिस्सा बताया। इसके बाद से कॉलेज पर हिंदू-विरोधी होने के आरोप बढ़ते गए।

सेंट स्टीफंस लिबरल-वामपंथी इकोसिस्टम का बना अड्डा

साफ तौर पर देखा जाए तो सेंट स्टीफंस कॉलेज सिर्फ एक शिक्षण संस्थान नहीं बल्कि देश की राजनीति, मीडिया और लिबरल-वामपंथी इकोसिस्टम तैयार करने वाला बड़ा केंद्र बन गया है। इस कॉलेज से निकले कई बड़े नाम आज राजनीति और मीडिया के अहम पदों पर बैठे हैं। राहुल गाँधी, शशि थरूर, कपिल सिब्बल, मणि शंकर अय्यर, जय राम रमेश, सलमान खुर्शीद, सागरिका घोष जैसे नेता हों या बरखा दत्त और करण थापर जैसे पत्रकार।

कॉलेज के भीतर लंबे समय से ऐसा माहौल बना रहा है, जहाँ वामपंथी और तथाकथित सेक्युलर विचारधारा को बढ़ावा मिलता है। यही वजह है कि जब भी इस कॉलेज में भर्ती, प्रशासन या किसी नीति को लेकर विवाद होता है, तब इसे सिर्फ एक कॉलेज का मामला नहीं समझा जा सकता बल्कि बड़े लिबरल-वामपंथी गैंग का हिस्सा माना जाता है।

(इस विवाद पर ऑपइंडिया ने सेंट स्टीफंस कॉलेज से संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन कॉलेज का आधिकारिक नंबर उपयोग में नहीं है और न ही कॉलेज का कोई स्टाफ विवाद में बोलने को तैयार हुआ।)

हेयर ट्रांसप्लांट से लेकर प्लास्टिक सर्जरी तक, दहशतगर्दी के लिए दाँत भी बदलवा रहे आतंकी: पढ़ें- बचने के लिए अपनाते हैं कैसे-कैसे हथकंडे

देश की सुरक्षा एजेंसियाँ इन दिनों आतंकवाद के एक ऐसे खौफनाक और हैरान करने वाले चेहरों का सामना कर रही हैं, जो बंदूक और बारूद से कहीं ज्यादा खतरनाक है। यह चेहरा है ‘बहरूपियेपन’ का। सीमा पार से भारत में घुसपैठ करने वाले आतंकी अब सिर्फ जंगलों या गुफाओं में नहीं छिपते, बल्कि वे हमारे और आपके बीच आम इंसानों की तरह जिंदगी जी रहे हैं। कोई प्लंबर बन जाता है, कोई ढाबा चलाने लगता है, कोई शेयर मार्केट में ट्रेडिंग करने लगता है, तो कोई ‘पीर’ बनकर लोगों का भरोसा जीत लेता है।

इतना ही नहीं, आधुनिक तकनीक और सुरक्षा कैमरों को चकमा देने के लिए ये आतंकी अब हेयर ट्रांसप्लांट, डेंटल प्रोसीजर और प्लास्टिक सर्जरी जैसे महँगे कॉस्मेटिक इलाजों का भी सहारा ले रहे हैं। दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल, नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (NIA) और श्रीनगर पुलिस की जाँच में आतंकवादियों के इस पूरे गिरगिटिया जाल का भंडाफोड़ हुआ है, जिसने सुरक्षा ग्रिड को भी चौकन्ना कर दिया है।

जब मिशन छोड़ हेयर ट्रांसप्लांट कराने पहुँचा आतंकी

आतंक की दुनिया की यह कहानी बहुत हैरान करने वाली है। यह किस्सा लश्कर-ए-तैयबा के पाकिस्तानी आतंकी मोहम्मद उस्मान जट उर्फ ‘चाइनीज’ का है। उस्मान लाहौर का रहने वाला है। वह कश्मीर में आतंकियों का एक गुप्त ग्रुप (स्लीपर सेल) बनाने के लिए भारत आया था। लेकिन भारत आते ही उसके खतरनाक इरादों पर ‘सजने-संवरने का शौक’ भारी पड़ गया। दरअसल, उस्मान के बाल बहुत झड़ रहे थे और वह अपने गंजेपन से काफी परेशान था। इस वजह से उसका हौसला टूट चुका था।

जब उस्मान ने कश्मीर में लोगों को शांति से अपनी जिंदगी जीते देखा, तो उसका दिमाग बदलने लगा। उसे समझ आ गया कि पाकिस्तान के ट्रेनिंग कैंपों में उसे जो नफरत सिखाई गई थी, वह सब झूठ था। इसी बीच श्रीनगर के एक दुकानदार ने (जो आतंकियों की मदद करता था) उस्मान को बताया कि कश्मीर में ही बाल उगाने (हेयर ट्रांसप्लांट) का अच्छा इलाज होता है। फिर क्या था, उस्मान अपना आतंकी मिशन भूल गया। वह श्रीनगर के एक बड़े क्लिनिक में गया और अपने बालों का इलाज करवाने लगा। इस इलाज के लिए उसे कई बार क्लिनिक में रात को रुकना भी पड़ा।

सिर्फ शौक नहीं, AI और कैमरों को धोखा देने की चाल

पहले-पहल तो पुलिस और जाँच एजेंसियों को लगा कि लश्कर के इन आतंकियों (उस्मान जुट और शब्बीर अहमद लोन) को बस सजने-संवरने और अच्छे दिखने का शौक है। लेकिन जब गहराई से पूछताछ हुई, तो एक बहुत बड़ी और खतरनाक साजिश का पता चला।

दरअसल, आजकल दुनिया के सभी बड़े एयरपोर्ट्स और रेलवे स्टेशनों पर चेहरा पहचानने वाले खास कैमरे (फेस-रिकग्निशन सॉफ्टवेयर) लगे होते हैं। यह कंप्यूटर सिस्टम सिर्फ किसी का फोटो नहीं देखता, बल्कि वह चेहरे की खास बनावट को नापता है। जैसे- दोनों आँखों के बीच कितनी दूरी है, नाक कितनी लंबी है, जबड़ा कितना चौड़ा है और माथा कैसा है। इस माप के जरिए कंप्यूटर किसी भी अपराधी या भगोड़े को तुरंत पहचान लेता है।

आतंकी इसी कंप्यूटर सिस्टम और कैमरों को धोखा देने के लिए अपने चेहरे की सर्जरी करवा रहे हैं। इन आतंकियों ने यह रास्ता 26/11 मुंबई हमले के मास्टरमाइंड साजिद मीर से सीखा है। साजिद मीर ने बहुत पहले अपनी पहचान छिपाने के लिए प्लास्टिक सर्जरी कराई थी। चेहरा बदल जाने के बाद ये आतंकी नकली पासपोर्ट बनवा लेते हैं। इसके बाद वे बिना किसी रोक-टोक और बिना पकड़े गए एक देश से दूसरे देश आसानी से आ-जा सकते हैं। पुराना कुख्यात अंतरराष्ट्रीय हत्यारा ‘कार्लोस द जैकल’ भी पुलिस से बचने के लिए यही हथकंडा अपनाता था।

16 साल तक छिपा रहा, यूट्यूब से सीखी शेयर ट्रेडिंग

लश्कर के बड़े आतंकी अब्दुल्ला उर्फ ‘अबू हुरैरा’ की कहानी किसी फिल्म जैसी है। वह साल 2010 में पाकिस्तान से छिपकर भारत आया था और पूरे 16 साल तक यहाँ अलग-अलग राज्यों में छिपा रहा। अब्दुल्ला पाकिस्तान के पंजाब प्रांत का था, इसलिए उसे हिंदी और पंजाबी बहुत अच्छे से बोलनी आती थी। भारत आकर उसने अपना हुलिया और पहचान पूरी तरह बदल ली। वह पाकिस्तान से ही नल ठीक करने (प्लंबिंग) का थोड़ा-बहुत काम सीखकर आया था।

भारत में टिके रहने के लिए उसने सबसे पहले ‘खरगोश’ नाम के एक दूसरे आतंकी की मदद ली। उसने नकली दस्तावेज (ID) बनवाए। जब उसके हाथ में ये कागजात आ गए, तो उसने राजस्थान और हरियाणा में जाकर पेंटर, बिजली वाले (इलेक्ट्रीशियन) और प्लंबर का काम करना शुरू कर दिया। कुछ समय बाद वह पंजाब के मलेरकोटला में रहने लगा।

वहाँ उसने एक ढाबा भी खोला, लेकिन जब ढाबा नहीं चला तो उसने यूट्यूब देखकर शेयर बाजार (शेयर ट्रेडिंग) का काम सीख लिया। वह इस काम में इतना पक्का हो गया कि पकड़े जाने तक उसने शेयर बाजार से 50 हजार रुपए से ज्यादा कमा लिए थे। वह आस-पड़ोस के लोगों को भी कमाई के तरीके सिखाता था। लोग उसे एक सीधा-साधा व्यापारी समझते थे। किसी को कानों-कान खबर नहीं थी कि उनके बीच रहने वाला यह शख्स असल में 40 विदेशी आतंकियों का खतरनाक कमांडर है।

‘पीर’ का चोला और AK-47 का जखीरा

पहचान बदलने का ऐसा ही एक और किस्सा दिल्ली के लक्ष्मी नगर से सामने आया था। वहाँ पुलिस ने मोहम्मद अशरफ नाम के एक पाकिस्तानी आतंकी को पकड़ा था। अशरफ ने खुद को भारतीय दिखाने के लिए ‘अली अहमद नूरी’ के नाम से नकली कागजात (ID) बनवा लिए थे। वह लोगों के बीच एक सीधे-साधे ‘पीर’ या मौलवी बनकर रहने लगा था। अशरफ साल 2004 में पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI से ट्रेनिंग लेकर, बांग्लादेश के रास्ते भारत में घुसा था।

भारत आकर उसने सबसे पहले अजमेर के एक मौलवी से दोस्ती की और फिर उनके साथ दिल्ली आ गया। दिल्ली में वह फैक्ट्रियों में नमाज पढ़ाने का काम करने लगा। धीरे-धीरे उसने लोगों का भरोसा जीत लिया। समाज में किसी को उस पर शक न हो, इसके लिए उसने गाजियाबाद की एक महिला से शादी भी कर ली। लेकिन जब पुलिस ने उसे दबोचा, तो इस ‘पीर’ के पास से एक AK-47 राइफल, कारतूस, बम (हैंड ग्रेनेड) और दो पिस्तौलें मिलीं। वह त्योहारों के समय दिल्ली में बड़ा धमाका करने की साजिश रच रहा था।

फर्जी दस्तावेजों का सिंडिकेट और जमीनी नेटवर्क

आतंकियों के इस छद्म रूप को लंबे समय तक टिकाए रखने का काम करता है ओजीडब्ल्यू (Over Ground Workers) यानी जमीनी मददगारों का नेटवर्क। श्रीनगर के नकीब भट, आदिल राशिद भट और गुलाम मोहम्मद मीर उर्फ ‘मामा’ जैसे लोग इन पाकिस्तानी आतंकियों को पनाह देते हैं। ये मददगार स्थानीय स्तर पर जाली कागजात बनाने वाले गिरोहों से मिलकर आतंकियों के नाम पर असली जैसे दिखने वाले आधार कार्ड, पैन कार्ड और वोटर ID कार्ड तैयार करवाते हैं।

एक बार जब इन आतंकियों को ये सरकारी पहचान पत्र मिल जाते हैं, तो इनके लिए बैंक खाता खोलना, सिम कार्ड खरीदना और देश के किसी भी कोने में कमरा किराए पर लेना बेहद आसान हो जाता है। इसी कानूनी पहचान की आड़ में ये आतंकी अपना बैंक नेटवर्क और डिजिटल ट्रांजैक्शन चलाते हैं ताकि पाकिस्तान से आने वाले फंड को आसानी से ठिकाने लगाया जा सके।

पढ़े-लिखे डॉक्टर और ‘अल फलाह मॉड्यूल’ का सच

सुरक्षा एजेंसियों के लिए सबसे बड़ी चिंता यह है कि अब आतंकी नेटवर्क में सिर्फ अनपढ़ या कम पढ़े-लिखे लोग ही शामिल नहीं हैं। श्रीनगर पुलिस ने कुछ समय पहले लश्कर के ‘अल फलाह मॉड्यूल’ का भंडाफोड़ किया था। इस मॉड्यूल को देखकर अधिकारियों के होश उड़ गए, क्योंकि इसमें शामिल ज्यादातर लोग बेहद पढ़े-लिखे और समाज के प्रतिष्ठित पेशेवर थे, जिनमें मुख्य रूप से डॉक्टर शामिल थे।

इस मॉड्यूल का सीधा संबंध लाल किले के बाहर हुए कार बम धमाके से था, जिसमें एक दर्जन से ज्यादा मासूम लोगों की मौत हो गई थी। उस आत्मघाती कार को चलाने वाला कोई आम इंसान नहीं, बल्कि अल फलाह यूनिवर्सिटी से जुड़ा डॉ उमर-उन-नबी था। ये डॉक्टर दिन में मरीजों का इलाज करते थे और रात में आतंकियों के लिए लॉजिस्टिक, हथियार और फंडिंग का इंतजाम करते थे। यह इस बात का सबूत है कि आतंकवाद का कैंसर अब समाज के बौद्धिक स्तर तक पहुँच चुका है।

आखिरकार कैसे पकड़े जाते हैं ये शातिर आतंकी?

आतंकी चाहे कितना भी चालाक क्यों न हो और अपना रूप कितना भी बदल ले, वह कानून की नजरों से हमेशा के लिए नहीं बच सकता। उनके पकड़े जाने की शुरुआत अक्सर उनकी किसी एक छोटी सी गलती से होती है। कभी-कभी उनके गैंग का कोई एक मददगार पुलिस के हत्थे चढ़ जाता है, और वहीं से पूरा खेल बिगड़ जाता है।

जैसे, आतंकी उस्मान जुट के मामले में भी ऐसा ही हुआ। श्रीनगर पुलिस ने 31 मार्च को नकीब भट नाम के एक स्थानीय मददगार को पिस्तौल के साथ पकड़ा। जब पुलिस ने नकीब से कड़ाई से पूछताछ की, तो उसने अपने साथी आदिल का नाम उगल दिया। फिर आदिल के जरिए पुलिस को उन जंगलों और क्लिनिकों का पता चल गया, जहाँ आतंकी छिपे हुए थे।

पुलिस के बड़े अफसरों की देखरेख में जब इन पकड़े गए लोगों से सख्ती से पूछताछ होती है, तो इनका सारा झूठ सामने आ जाता है। इसके बाद पुलिस इनके ठिकानों पर छापा मारकर छिपाई गई AK-47, राइफलें और बम बरामद कर लेती है। पुलिस इनके मोबाइल फोन और बैंक खातों की भी जाँच करती है, जिससे दूसरे राज्यों में फैले इनके पूरे गैंग का पर्दाफाश हो जाता है। इस तरह, आम जनता के बीच सीधा-साधा इंसान बनकर छिपे इन खतरनाक अपराधियों का अंत होता है।

बंगाल में सरेआम ‘गाय-बैल-बछड़ा’ काटने पर लगी रोक तो छटपटाए वामपंथी: कलकत्ता HC में CPI-M ने अर्जी देकर कहा- ये मुस्लिमों की आजादी पर खतरा

कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) लिबरेशन (CPI-ML) की पश्चिम बंगाल इकाई ने कलकत्ता हाई कोर्ट में शुभेंदु सरकार के एक आदेश के खिलाफ अर्जी दायर की है। दरअसल BJP सरकार ने ‘पश्चिम बंगाल पशु वध नियंत्रण अधिनियम, 1950’ को लागू कर दिया है। इस कानून को चुनौती देते हुए तत्काल मामले में दखल देने की माँग की है। जनहित याचिका पर कोलकाता हाईकोर्ट के चीफ़ जस्टिस सुजॉय पॉल और जस्टिस पार्थ सारथी सेन की खंडपीठ सुनवाई करेगी।

अपनी याचिका में CPI-ML ने दावा किया है कि इस कानून को लागू करना मुस्लिम समुदाय की धार्मिक आजादी, पशु व्यापार से जुड़े किसानों के अधिकारों और नागरिकों के भोजन केअधिकार पर हमला है। CPI-ML के मुताबिक, “यह एक साथ मुस्लिम समुदाय की धार्मिक आजादी पर, पशु व्यापार से जुड़े किसानों (जो ज़्यादातर हिंदू समुदाय से हैं) की रोजी-रोटी पर, नागरिकों की अपनी पसंद का खाना खाने की आजादी पर और पश्चिम बंगाल की खान-पान की विविधता पर किया गया हमला है।”

इस कानून को ‘पुराना’ बताते हुए, CPI-ML ने आरोप लगाया कि इस कानून को लागू करना, पशुओं की कुर्बानी पर रोक लगाने के लिए किया गया है।

पश्चिम बंगाल सरकार ने 13 मई 2026 को एक नोटिस जारी किया, जिसमें ‘पश्चिम बंगाल पशु वध नियंत्रण अधिनियम, 1950’ को सख्ती से लागू करने की बात दोहराई गई। आइए इस अधिनियम के उद्देश्य और प्रावधानों पर एक नजर डालते हैं।

यह अधिनियम क्यों पारित किया गया?

पश्चिम बंगाल पशु वध नियंत्रण अधिनियम 1950, दरअसल पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा दूध की आपूर्ति बढ़ाने और कृषि सुधार के लिए आवश्यक पशु शक्ति की बर्बादी को रोकने के उद्देश्य से पारित किया गया था। यही कारण है कि यह अधिनियम सभी पशुओं के वध पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाता, बल्कि केवल कुछ विशिष्ट पशुओं और एक निश्चित आयु तक के पशुओं के वध पर ही प्रतिबंध लगाता है। इस अधिनियम का उद्देश्य राज्य में पशुओं के वध को पूरी तरह रोकना नहीं है, बल्कि दुधारू पशुओं को संरक्षण देना है।

यह अधिनियम विशेष रूप से सांडों, बैलों, गायों, बछड़ों, नर और मादा भैंसों, भैंस के बछड़ों और बधिया की गई भैंसों के वध पर रोक लगाता है। अधिनियम में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि इसमें निर्दिष्ट किसी भी जानवर का वध तब तक नहीं किया जा सकता, जब तक कि उसे वध के लिए ‘उपयुक्त’ घोषित करने वाला प्रमाण पत्र न प्राप्त हो जाए।

जानवरों के वध के लिए प्रमाण पत्र

अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार, किसी जानवर को वध के लिए उपयुक्त घोषित करने वाला प्रमाण पत्र नगरपालिका के अध्यक्ष और पशु चिकित्सा सहायक सर्जन द्वारा संयुक्त रूप से केवल तभी जारी किया जा सकता है, जब जानवर की आयु 14 वर्ष से अधिक हो, या यदि वह आयु, चोट, शारीरिक विकलांगता या किसी असाध्य रोग के कारण कार्य करने या प्रजनन करने में स्थायी रूप से असमर्थ हो गया हो।

यदि नगरपालिका के अध्यक्ष और पशु चिकित्सा सहायक सर्जन किसी निर्णय पर पहुँचने में विफल रहते हैं, तो यह मामला पशु चिकित्सा अधिकारी के पास चला जाएगा। तत्पश्चात, पशु चिकित्सा अधिकारी यह निर्णय लेते हैं कि प्रमाण पत्र जारी किया जाएगा अथवा अस्वीकृत कर दिया जाएगा। पशु चिकित्सा अधिकारी के लिए यह अनिवार्य है कि वे जानवर के वध की अनुमति देने अथवा उसे अस्वीकृत करने संबंधी एक हस्ताक्षरित आदेश पारित करें।

पश्चिम बंगाल सरकार ने 1950 के कानून का हवाला देते हुए गाय, बैल और भैंस जैसे गोवंश के वध के लिए स्थानीय निकाय प्रमुख और सरकारी पशु चिकित्सक का संयुक्त फिटनेस सर्टिफिकेट अनिवार्य कर दिया है। यह प्रमाणपत्र केवल तभी जारी होगा, जब पशु की उम्र 14 वर्ष से अधिक हो या वह बीमारी या चोट के कारण स्थायी रूप से अक्षम हो।

इसके अलावा खुले में वध करने पर रोक लगाया गया है। खुले स्थानों या सार्वजनिक जगहों पर पशु वध पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया गया है और इसके उल्लंघन पर 6 महीने तक की जेल और जुर्माने का प्रावधान है।

अस्वीकृति के विरुद्ध अपील का अधिकार

कोई भी व्यक्ति जो वध के लिए प्रमाण पत्र नहीं मिलने से असंतुष्ट है तो वह सर्टिफिकेट नहीं मिलने की सूचना 15 दिनों के भीतर राज्य सरकार से कर सकता है। इस अधिनियम के तहत राज्य सरकार के पास पुनरीक्षण (revisional) शक्तियाँ हैं, जिनका प्रयोग करते हुए वह मामले की जाँच कर सकती है और ऐसा आदेश पारित कर सकती है जिसे वह उचित समझे। राज्य सरकार का निर्णय अंतिम होगा और उसे किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती।

अधिनियम राज्य सरकार को यह अधिकार देता है कि वह धार्मिक, औषधीय या अनुसंधान उद्देश्यों के लिए किसी भी पशु के वध को इस अधिनियम के प्रावधानों से छूट दे सकती है।

पशुओं का वध केवल निर्धारित स्थानों पर ही किया जाएगा

अधिनियम के अनुसार, पशुओं का वध तय स्थान पर ही किया जा सकता है। राज्य सरकार अधिसूचना के माध्यम से इसे निर्धारित कर सकता है। पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार, प्रमाणित पशुओं का वध केवल नगरपालिका के बूचड़खानों या स्थानीय प्रशासन जहाँ तय करे, वहाँ किया जा सकता है। सार्वजनिक स्थानों पर वध करने पर सख्त मनाही है।

यह अधिनियम किसी नगरपालिका के अध्यक्ष, पशु चिकित्सा सहायक सर्जन, या पशु चिकित्सा सहायक सर्जन द्वारा तय किए गए व्यक्ति को निरीक्षण करने की शक्ति प्रदान करता है। निरीक्षक को किसी भी तरह का संदेह हो, तो वह बूचड़खानों की तलाशी ले सकता है।

अधिनियम के तहत सजा

कोई भी व्यक्ति जो इस अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन करता है, उसे 6 महीने तक की कैद या ₹1000 तक का जुर्माना, या दोनों की सजा दी जा सकती है। अधिनियम के तहत बताए गए सभी अपराध संज्ञेय हैं। इसका मतलब है कि पुलिस अपराध के मामले में मजिस्ट्रेट की पहले से अनुमति लिए बिना FIR दर्ज कर सकती है या गिरफ्तारी कर सकती है। यहाँ तक कि जाँच भी शुरू कर सकती है।

(यह लेख अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे मूल रुप से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

मुस्लिम तुष्टिकरण पर सिली रही जुबान, आज जागृत हिंदू दिख रहा सांप्रदायिक… ‘मॉर्डन जिन्ना’ राजदीप सरदेसाई के नाम खुला खत

सागरिका के शौहर राजदीप सरदेसाई जी,

‘इंडिया टुडे’ में आपका ‘सांप्रदायिक राजनीति का खतरनाक सामान्यीकरण’ (I won’t work for them: The dangerous normalisation of communal politics) लेख पढ़ा। आपकी इस कुंठा को देखकर मन में मिश्रित भाव हैं, समझ नहीं आता आपके इस लेख को पढ़कर हँसा जाए या नाराज हुआ जाए। इन मनःस्थिति के पीछे आपकी चालाकी है, जो आप और आपके गिरोह के लोग अब देश पर किसी ना किसी तरह बस सवाल उठाने के बहाने ढूँढते हैं। यही आपने इस लेख में करने की कोशिश की है।

राजदीप जी को अब तथाकथित सांप्रदायिक राजनीति की चिंता सता रही है और यह चिंता आज की नहीं है, यह चिंता 2014 के बाद से ही नजर आने लगी है। 2014 के बाद भारत की राजनीति में कई चीजें बदल गई हैं, उनमें एक ये भी है कि अब राजनीतिक दल बहुसंख्यकों की बात भी करने लगे हैं। राजदीप आपको और उनके जैसों को इससे ही दिक्कत है लेकिन ये दिक्कत बनी भी रहे तो भी कोई दिक्कत की बात नहीं, खैर आगे बढ़ते हैं।

कमोबेश आजादी के बाद से ही जब राजनीति में मुस्लिम समाज, मस्जिद, चर्च, अल्पसंख्यक के कथित अधिकार या उनके ही मुद्दों की बात होती तो उसे आप लोग अपनी टीबी डिबेट में उसे ‘धर्मनिरपेक्ष राजनीति’ का लबादा ओढ़ाकर चलाते रहे। लेकिन अब जब बीजेपी या अन्य दल हिंदू समाज, बहुसंख्यक पहचान या सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की बात करते हैं तो उसे तुरंत ‘कम्युनल’ यानी सांप्रदायिक करार दे दिया जाता है।

राजदीप जी, आपको आज बड़ी तकलीफ हो रही है कि कॉन्ग्रेस को ‘मुस्लिम लीग’ क्यों कहा जा रहा है। लेकिन जरा याद कीजिए, जब कॉन्ग्रेस की पार्टी के प्रधानमंत्री मंच से कहते थे कि ‘देश के संसाधनों पर पहला हक मुसलमानों का है’। कॉन्ग्रेस के सबसे बड़े नेता ने अपनी पार्टी को मुस्लिमों की पार्टी बताया था, तब आपकी सेक्युलर आत्मा छुट्टी पर चली गई थी क्या? जब वोट बैंक की राजनीति के लिए हिंदुओं की आस्था को ‘ढोंग’ और मुस्लिम तुष्टिकरण को ‘सेक्युलरिज्म’ बताया जा रहा था, तब आपने कितनी प्राइम टाइम डिबेट चलाई थीं? तब आपको लोकतंत्र खतरे में नहीं दिखा?

आपको समस्या ‘मुस्लिम लीग’ शब्द से नहीं है, समस्या इस बात से है कि अब जनता नैरेटिव समझने लगी है। अब हर बार हिंदुओं को अपराधबोध में डालकर राजनीति नहीं चलेगी। अब बहुसंख्यक समाज अपनी पहचान, संस्कृति और अधिकारों की बात खुलकर कर रहा है और यही बात तथाकथित सेक्युलर गैंग को सबसे ज्यादा चुभ रही है।

राजदीप जी, राजनीति के इस लंबे दौर में हर तरह की बातें हुईं। ‘तिलक, तराजू और तलवार, इनको मारो जूते चार’ जैसे नारे लगाए गए, ‘भूरा बाल साफ करो’ जैसी बातों के सहारे जातीय घृणा साफ नजर आई। कभी जाति के नाम पर वोट माँगे गए, कभी भाषा के नाम पर, कभी उत्तर-दक्षिण, कभी दलित-पिछड़ा-अगड़ा की दीवारें खड़ी की गईं। तब आप जैसे तथाकथित सेक्युलर बुद्धिजीवियों को लोकतंत्र खतरे में नहीं दिखा।

दशकों तक समाज को टुकड़ों में बाँटकर राजनीति होती रही और उसे टीवी स्टूडियो में बैठ आप जैसे ‘पत्रकार’ ‘सोशल इंजीनियरिंग’ नाम देते रहे। लेकिन आज अगर वही बँटा हुआ समाज अपनी सांस्कृतिक पहचान के आधार पर एक अम्ब्रैला के नीचे आने लगे हैं, अपना हित देख वोट करने लगे हैं तो आपको अचानक सांप्रदायिकता नजर आने लगी है।

दशकों से मुस्लिमों ने सिर्फ एक ध्येय बनाकर वोटिंग की है कि किसी भी तरह से BJP को हराया जाए, तब आपको नहीं लगा कि ‘सांप्रयादिकता’ हो रही है। लेकिन अब जब जिन्होंने नोट दिया है, जिन्होंने चुना है, उनके लिए काम करने की बात होने लगी है तो आपके पेट में मरोड उठ रही हैं।

राजदीप जी, आप कह रहे हैं कि मुस्लिम राजनीति से अदृश्य हो रहे हैं, ऐसा नहीं है। वो उन्हें चुन रहे हैं, जिन्हें वो चुनना चाहते हैं। जो उनके लिए तुष्टिकरण करने को तैयार बैठे हैं। इसकी जिम्मेदारी BJP की नहीं है। आपकी पत्नी जिस TMC से राज्यसभा सांसद हैं उस पार्टी ने मुस्लिम वोटों के लिए क्या-क्या नहीं किया है, ये किसी को बताने की जरूरत नहीं है।

जब हिंदुओं ने देखा कि उनके त्योहारों पर रोक लगती है, दुर्गा विसर्जन के समय प्रशासनिक आदेश आते हैं, रामनवमी यात्राओं पर सख्ती होती है लेकिन दूसरी तरफ कट्टरपंथी तत्वों पर कार्रवाई से ममता की सरकार बचती है तो उनके भीतर असंतोष पैदा होना स्वाभाविक था।

मुस्लिमों के वोट बैंक के लिए बंगाल को तुष्टिकरण की आग में झोंक दिया गया और इसका ताप जब हिंदुओं से सहन करना मुश्किल हुआ तो उन्होंने एक दल को अपना समर्थन दे दिया और इसी बात से आप चिढ़े हैं। आप सवाल उठा रहे हैं कि बीजेपी के मुस्लिम मुख्यमंत्री, सांसद नहीं है।

आपने कभी यह सवाल भी उठाया कि क्या मुस्लिमों ने बीजेपी के साथ कभी वैसा व्यवहार किया? क्या बीजेपी को सिर्फ राजनीतिक दल की तरह देखा? जवाब है नहीं। क्योंकि आप जैसे बुद्धिजीवियों और कट्टरपंथी जमात ने उनके मन में यह भर दिया कि वो आपके वैचारिक दुश्मन हैं और यही ‘दुश्मनी’ वोट ना देकर निभाई जाती रही।

राजदीप जी, आखिरी बात ‘हिंदू पाकिस्तान’ को लेकर है। आपने अपने लेख में इस शब्द का जिक्र किया है, ‘हिंदू पाकिस्तान’ यह शब्द सिर्फ एक ‘राजनीतिक टिप्पणी’ नहीं है बल्कि भारत, हिंदू समाज और संविधान तीनों का अपमान है। हिंदू समाज को पाकिस्तान के साथ जोड़ना ही खतरनाक विचार है। क्या आप ऐसा इसलिए कर रहे हैं राजदीप जी क्योंकि पहली बार हिंदू समाज अपनी पहचान, अपने अधिकारों और अपनी सभ्यता के बारे में खुलकर बोल रहा है?

अगर भारत सच में ‘हिंदू पाकिस्तान’ बन रहा होता, तो क्या यहाँ हर शुक्रवार सड़कों पर नमाज होती? क्या मदरसों को सरकारी सहायता मिलती? क्या मुस्लिम पर्सनल लॉ आज भी कायम रहता? क्या वक्फ बोर्ड देश का सबसे बड़ा भूमि मालिक बन पाता? क्या मुस्लिम समाज को संविधान द्वारा दिए गए सभी धार्मिक अधिकार खुले तौर पर मिले होते?

दशकों तक भारत में खुली मुस्लिम तुष्टिकरण राजनीति हुई। शाह बानो केस में सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलट दिया गया। वोट बैंक बचाने के लिए कट्टरपंथियों के सामने सरकारें झुकती रहीं लेकिन तब आपने भारत को ‘इस्लामिक भारत’ नहीं कहा। तब सेक्युलरिज्म खतरे में नहीं आया।

राजदीप जी, असल में आपने ‘हिंदू पाकिस्तान’ शब्द का इस्तेमाल डर पैदा करने के लिए जानबूझकर किया है। इसका मकसद हिंदुओं को यह संदेश देना है कि अगर वे अपनी सभ्यता, अपने मंदिरों, अपने त्योहारों या अपने अधिकारों की बात करेंगे तो उन्हें ‘कट्टर’, ‘फासीवादी’ या ‘पाकिस्तान जैसा’ कह दिया जाएगा।

राजदीप जी, जिन्ना की जिस सोच को आप हिंदू के साथ जोड़ना चाहते हैं वो ना हो भारत का DNA है और ना हिंदू विचार का। पाकिस्तान की नींव धार्मिक अलगाववाद पर रखी गई थी। भारत की आत्मा सांस्कृतिक विविधता पर आधारित है। हिंदू सभ्यता ने हजारों वर्षों से विविधताओं को आत्मसात किया है। यही कारण है कि यहूदियों से लेकर पारसियों तक हर समुदाय को इस देश में शरण और सम्मान मिला।

हिंदू बहुसंख्यक होने के बावजूद भारत ने कभी खुद को हिंदू राष्ट्र घोषित नहीं किया। 1947 में अगर हिंदू समाज चाहता, तो भारत भी एक धार्मिक राष्ट्र बन सकता था। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। क्योंकि हिंदू सभ्यता मूलतः थिओक्रेटिक नहीं है। आपका ‘हिंदू पाकिस्तान’ कहना सिर्फ एक राजनीतिक जुमला नहीं बल्कि हिंदू समाज को नैतिक रूप से अपराधी साबित करने की कोशिश है।

भारत को पाकिस्तान बनने से सबसे ज्यादा बचाकर अगर किसी ने रखा है, तो वह हिंदू सभ्यता की सहिष्णुता और उदारता ही है। लेकिन सहिष्णुता का मतलब यह नहीं कि हिंदू हमेशा चुप रहें, अपनी आस्था पर हमले सहते रहें और अपनी ही पहचान के लिए शर्मिंदा महसूस करें। भारत ‘हिंदू पाकिस्तान’ नहीं बन रहा। भारत बस उस दौर से बाहर निकल रहा है जहाँ हिंदू बहुसंख्यक से सिर्फ चुप रहने, सहते रहने और अपराधबोध में जीने की अपेक्षा की जाती थी।

भारत में 4 करोड़ पीड़ित, दुनियाभर में 17 करोड़… 14 साल की चर्चा के बाद PCOS का नाम बदलकर किया PMOS: जानिए इससे महिलाओं के इलाज में कैसे होगा फायदा

महिलाओं में होने वाली आम हार्मोनल दिक्कतें, जिसे मेडिकल की भाषा में PCOS यानी पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम कहा जाता है, उसका नाम बदल दिया गया है। अब इसे PMOS यानी पोलीइंडोक्राइन मेटाबॉलिक ओवेरियन सिंड्रोम कहा जाएगा। विशेषज्ञों ने ये बदलाव बीमारी को सही तरीके से समझने में मदद करने के लिए किया है।

प्राग में आयोजित यूरोपीय एंडोक्रिनोलॉजी कॉन्ग्रेस में नए नाम की घोषणा के बाद ‘द लैंसेट’ ने 12 मई 2026 को इसे प्रकाशित किया। गौरतलब है कि दुनिया भर में हर 8 में से 1 महिला यानी करीब 170 मिलियन से ज्यादा महिलाएँ PMOS से पीड़ित हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अनुमान लगाया है कि प्रजनन आयु वाली 10% से 13% महिलाएँ इस समस्या से गर हैं।

कई क्षेत्रों में यह समस्या ज्यादा है। उदाहरण के लिए, उत्तरी यूरोप में यह समस्या दक्षिण एशिया की तुलना में कम है। हालाँकि डब्ल्यूएचओ यह भी बताता है कि इस विकार से पीड़ित 70% से अधिक महिलाएँ इसके बारे में जानती भी नहीं।

एडिनबर्ग विश्वविद्यालय के एमआरसी (मेडिकल रिसर्च काउंसिल) सेंटर फॉर रिप्रोडक्टिव हेल्थ के प्रोफेसर कॉलिन डंकन के हवाले से ‘द गार्जियन’ ने कहा है कि यह पुराना शब्द संभवतः तब प्रचलित हुआ, जब शोधकर्ताओं ने शुरू में महिला मरीजों के ओवरी की जाँच की और उनमें तरल पदार्थ से भरी कई छोटी-छोटी ग्रंथियाँ पाई गई। ये थैलियाँ फॉलिकल्स हैं, जो अंडाणु धारण करने वाली संरचनाएँ हैं। उन्होंने आगे कहा कि ये सिस्ट नहीं हैं।

स्वस्थ महिलाओं में हर महीने ओवरी के अंदर कई फॉलिकल्स विकसित होते हैं। अंततः, इनमें से एक मेच्योर होकर अंडाणु उत्पन्न करता है जबकि अन्य नष्ट हो जाते हैं। अगर महिला बीमार हो, तो कुछ फॉलिकल्स का विकास रुक जाता है और वे अंडाणु में नहीं बदल पाता। इसके लक्षण आमतौर पर टीनएज के शुरुआत में दिखने लगते हैं, लेकिन यह एक ऐसी समस्या है जो महिलाओं को अलग-अलग तरीकों से प्रभावित कर सकती है।

क्यों बदला गया नाम

PCOS के नाम से ऐसा लगता था कि ये सिर्फ ओवरी के सिस्ट से जुड़ी बीमारी है, लेकिन कई बार ऐसा नहीं होता। ये बीमारी सिर्फ पीरियड्स या ओवरी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे शरीर पर असर डाल सकता है।

विशेषज्ञों के मुताबिक, इस बीमारी को बेहतर तरीके से समझाने के लिए नया नाम PMOS दिया गया है। यह महिलाओं में होने वाले हॉर्मोनल और मेटाबॉलिक दिक्कतों को बताता है। इसमें वे सारी समस्याएँ मसलन पीरियड्स अनियमित होना, फर्टिलिटी, वजन असंतुलित होना, त्वचा संबंधी बीमारी और मेंटल हेल्थ भी आ सकते हैं।

शुरुआत में इसे केवल प्रजनन संबंधी बीमारी माना जाता था और उस समय इसे स्टीन लेवेंथल सिंड्रोम के नाम से जाना जाता था। 1980 के दशक में वैज्ञानिकों ने पाया कि यह इंसुलिन प्रतिरोध या रक्त में सामान्य इंसुलिन स्तर पर शरीर की प्रतिक्रिया करने में असमर्थता से भी जुड़ा हुआ है।

पीएमओएस के लक्षण

पीएमओएस की समस्या आने पर महिलाओं में पीरियड की साइकिल बिगड़ सकते हैं। चेहरे पर ज्यादा बाल या मुँहासे आ सकते हैं। वजन बढ़ना, प्रेग्नेंसी में दिक्कत, एंजायटी और डिप्रेशन जैसे लक्षण पाए जाते हैं। कई बार मरीज दिल की बीमारी, हाई कॉलेस्ट्रॉल, फैटी लीवर, स्लीपिंग दिक्कतें और डायबटीज, ब्लड प्रेशर का शिकार हो जाता है।

यह व्यक्ति के मनोविज्ञान को भी गंभीर रूप से नुकसान पहुँचाता है, जिससे डिप्रेशन, चिंता, जीवन की गुणवत्ता में कमी और खाने संबंधी दिक्कतें आती हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि सभी महिलाओं में ये ‘पुरुष वाले हार्मोन’ मौजूद होते हैं, लेकिन पीएमओएस से पीड़ित महिलाओं में इनकी मात्रा अत्यधिक होती है। फॉलिकल-स्टिम्युलेटिंग हार्मोन और ल्यूटिनाइजिंग हार्मोन के बीच असंतुलन से स्थिति बिगड़ती है। इसके अलावा दूसरी वजहों से भी हॉर्मोनल दिक्कतें आती हैं।

(साभार- pmc.ncbi.nlm.nih.gov)

मोटापा इस बीमारी की एक वजह है। इसके कारण अतिरिक्त एंड्रोजन को अवशोषित करने वाले प्रोटीन का स्तर कम हो जाता है साथ ही यह इंसुलिन प्रतिरोध से भी जुड़ा हुआ है। पीएमओएस एक जेनेटिक बीमारी है, जो परिवारों में पीढ़ी दर पीढ़ी चलता रहता है। एक्सपर्ट डंकन के मुताबिक, “इसका अर्थ है कि पॉलीसिस्टिक अंडाशय के बिना भी पॉलीसिस्टिक अंडाशय सिंड्रोम हो सकता है, या अनियमित मासिक धर्म के बिना भी पॉलीसिस्टिक अंडाशय सिंड्रोम हो सकता है।” वर्तमान में रोटरडैम सिस्टम का उपयोग इसके इलाज के लिए किया जाता है।

नाम में बदलाव और महिलाओं के स्वास्थ्य के लिए इसका महत्व

पिछले 14 वर्षों से 56 रिसर्चर और संस्थानों ने पीसीओएस का नाम बदलने की वकालत की। एक सर्वेक्षण के दौरान 14360 जवाब मिले।

कुल मिलाकर 22000 लोगों को शामिल करते हुए एक व्यापक अभियान के बाद ऐतिहासिक निर्णय लिया गया और नाम बदलकर पीएमओएस किया गया। इसका शॉर्ट नाम है – पॉलीएंडोक्राइन यानी कई हार्मोन सिस्टम वाला। मेटाबोलिक: मेटाबॉलिज्म से जुड़ा इंसुलिन, ब्लड शुगर कंट्रोल, ब्लड प्रेशर जैसी समस्या है। ओवेरियन यानी ओवरी और सिंड्रोम यानी लक्षणों का एक साथ होना।

इसको देखते हुए विशेषज्ञों ने पीसीओएस का नाम बदला, क्योंकि इसमें सिर्फ पीरियड्स से जुड़ी समस्याएँ आती हैं। नया नाम यह बताता है कि यह सिर्फ ओवरी की ही नहीं, बल्कि पूरे शरीर में इससे दिक्कत आ सकती है। जानकारों के मुताबिक, नाम बदलने से बीमारी के प्रति जागरुकता बढ़ेगी और महिलाओं को सही इलाज मिल पाएगा।

भारत के लिए यह क्यों महत्वपूर्ण है?

भारत में पीएमओएस के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं, खासकर शहरी युवा महिलाओं और टीनएजर में। भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (PCMR) की पीसीओएस जाँच में पाया गया है कि इससे पीड़ित महिलाओं की संख्या 3.7% से लेकर 22% तक हो सकती हैं। जानकारों के मुताबिक, दिनचर्या में गड़बड़ी, शहरी जीवनशैली, डिब्बाबंद खाद्य पदार्थों का अधिक सेवन, बढ़ता मोटापा, नींद नहीं आना और तनाव महिलाओं में तेजी से बढ़ा है।

ऐसी महिलाओं में कम उम्र में ही मेटाबॉलिज्म संबंधी समस्याओं का खतरा होता है। इंडियन जर्नल ऑफ मेडिकल रिसर्च में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, पीएमओएस से पीड़ित लगभग एक तिहाई भारतीय महिलाओं में मेटाबोलिक सिंड्रोम पाया जाता है।

नाम बदलने से महिलाओं को होगा फायदा

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार, इस स्थिति से जुड़े लक्षणों को कई जगहों पर सामाजिक रूप से हीन भावना से देखा जाता है। इससे परिवारिक और सामाजिक संबंध, नौकरी के अवसर में कमी, अपनेपन की भावना, मानसिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुँचता है। डिप्रेशन, चिंता, नकारात्मक भावनाएँ इनलोगों में अधिक होती है।

महिलाओं में अपने शरीर के प्रति जागरूकता की कमी देखी गई है। महिलाएँ अपनी स्थिति को बाहरी दुनिया के सामने व्यक्त करने में असमर्थ होती हैं, तो वे खुद को अलग-थलग और एकांत में रहना पसंद करती हैं। इसे मासिक धर्म और प्रेग्नेंसी से जुड़े होने के कारण इस विषय पर खुल कर बात नहीं करतीं।

पीसीओएस का नाम बदलकर पीएमओएस करना सिर्फ शब्दावली में बदलाव नहीं है। यह बताता है कि लोगों में मेडिकल साइंस को लेकर समझ बढ़ रही है। हालाँकि अभी और भी जागरुकता की जरूरत है। अगर महिलाएँ अपनी समस्या नहीं बताएँगी, तो उसका इलाज कैसे होगा।

(मूलरूप से यह लेख अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

इटली और भारत: इंडो-मेडिटेरेनियन के लिए एक स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप

भारत और इटली के बीच संबंध अब एक निर्णायक दौर में पहुँच चुके हैं। हाल के वर्षों में दोनों देशों के रिश्तों में अभूतपूर्व तेजी आई है और यह सौहार्दपूर्ण मित्रता से आगे बढ़कर स्वतंत्रता, लोकतंत्र और भविष्य को लेकर साझा विजन पर आधारित एक सच्ची स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप में बदल गए हैं।

ऐसे समय में जब अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था गहरे बदलाव के दौर से गुजर रही है, इटली और भारत की साझेदारी उच्च राजनीतिक और संस्थागत स्तर पर नियमित संवाद से आगे बढ़ रही है और अब एक नए तथा व्यापक आयाम हासिल कर रही है, जो हमारी आर्थिक गतिशीलता, सामाजिक रचनात्मकता और हजारों साल पुरानी सभ्यतागत समझ को साथ जोड़ती है। हमारा सहयोग इस साझा समझ को दर्शाता है कि 21वीं सदी में समृद्धि और सुरक्षा इस बात से तय होगी कि देश इनोवेशन, एनर्जी ट्रांजिशन के प्रबंधन और स्ट्रैटेजिक संप्रभुता को मजबूत करने में कितने सक्षम हैं। इसी उद्देश्य से हमने अपने द्विपक्षीय संबंधों को और गहरा तथा डाइवर्स बनाने का संकल्प लिया है, ताकि नए लक्ष्यों को हासिल किया जा सके और एक-दूसरे की पूरक क्षमताओं का बेहतर उपयोग हो सके। हमारा लक्ष्य इटली की डिजाइन क्षमता, मैन्युफैक्चरिंग एक्सीलेंस और वर्ल्ड-क्लास सुपरकंप्यूटर्स, जो उसे एक इंडस्ट्रियल पावरहाउस बनाते हैं, को भारत की तेज आर्थिक ग्रोथ, इंजीनियरिंग टैलेंट, बड़े पैमाने की क्षमता, इनोवेशन और 100 से ज्यादा यूनिकॉर्न तथा 2 लाख स्टार्ट-अप वाले एंटरप्रेन्योरशिप इकोसिस्टम के साथ जोड़कर मजबूत तालमेल बनाना है। यह केवल साधारण इंटीग्रेशन नहीं, बल्कि ऐसा साझा वैल्यू क्रिएशन है जिसमें दोनों देशों की औद्योगिक ताकतें एक-दूसरे को और मजबूत बनाती हैं।

यूरोपियन यूनियन और भारत के बीच फ्री ट्रेड एग्रीमेंट दोनों दिशाओं में ट्रेड और इनवेस्टमेंट बढ़ाने का रास्ता खोलता है। हमारा लक्ष्य 2029 तक इटली और भारत के बीच 20 बिलियन यूरो के ट्रेड टारगेट को हासिल करना और उससे आगे निकलना है। इसके लिए डिफेंस और एयरोस्पेस, क्लीन टेक्नोलॉजी, मशीनरी, ऑटोमोटिव कंपोनेंट्स, केमिकल्स, फार्मास्युटिकल्स, टेक्सटाइल, एग्री-फूड, टूरिज्म समेत कई सेक्टर्स पर फोकस किया जाएगा।

‘मेड इन इटली’ हमेशा से पूरी वर्ल्ड में एक्सीलेंस का प्रतीक रहा है और आज इसकी स्वाभाविक साझेदारी ‘मेक इन इंडिया’ पहल के हाई-क्वालिटी लक्ष्यों के साथ बन रही है। इस संदर्भ में भारत के लिए प्रोडक्शन को लेकर इटली की कंपनियों की बढ़ती रुचि और इटली में भारतीय इंडस्ट्री की बढ़ती मौजूदगी, जिनकी संख्या अब दोनों तरफ से 1000 से ज्यादा हो चुकी है, एक सकारात्मक संकेत है जो हमारी सप्लाई चेन के इंटीग्रेशन को और मजबूत करेगा।

टेक्नोलॉजिकल इनोवेशन हमारी साझेदारी के केंद्र में है। आने वाले दशकों को ऐसी टेक्नोलॉजिकल क्रांति आकार देगी जिसका दायरा बेहद व्यापक होगा। इसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्वांटम कंप्यूटिंग, एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग, क्रिटिकल मिनरल्स और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे सेक्टर्स में तेज प्रगति शामिल है। भारत का डायनामिक इनोवेशन इकोसिस्टम, हाई स्किल्ड प्रोफेशनल टैलेंट पूल और इटली की एडवांस्ड इंडस्ट्रियल क्षमताएं इन सेक्टर्स में हमारे सहयोग को स्वाभाविक और रणनीतिक बनाती हैं। हमारी यूनिवर्सिटीज और रिसर्च सेंटर्स के बीच बढ़ती साझेदारी भी इसे मजबूत आधार देगी।

भारत का डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर पहले ही बड़ी संख्या में देशों, खासकर ग्लोबल साउथ में, अपनी मजबूत पहचान बना चुका है। खासतौर पर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस अब हमारे समाज और ग्लोबल अर्थव्यवस्था पर गहरा असर डाल रही है। इटली और भारत लंबे समय से यह सुनिश्चित करने के लिए साथ काम कर रहे हैं कि AI डेवलपमेंट जिम्मेदारीपूर्ण और मानव-केंद्रित हो। इसी नजरिये से भारत और इटली AI को समावेशी विकास के एक मजबूत माध्यम के रूप में भी देखते हैं, खासकर ग्लोबल साउथ के लिए, जहां डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर और सुलभ बहुभाषी टेक्नोलॉजी विभाजन बढ़ाने के बजाय उसे कम कर सकती हैं। टेक्नोलॉजी के केंद्र में इंसान को रखने वाले भारत के MANAV विजन और मानवीय परंपरा पर आधारित मानव-केंद्रित “एल्गोर-एथिक्स” को बढ़ावा देने में इटली की अग्रणी भूमिका के आधार पर हमारी साझेदारी यह सुनिश्चित करना चाहती है कि AI सामाजिक सशक्तिकरण का माध्यम बने। हमारा दृष्टिकोण भारत की डिजिटल क्षमता को इटली की एथिकल और इंडस्ट्रियल विशेषज्ञता के साथ जोड़ता है, ताकि टेक्नोलॉजी मानव गरिमा की सेवा करे। सुरक्षित डिजिटल सहयोग, कैपेसिटी बिल्डिंग और मजबूत साइबर इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़ी बेस्ट प्रैक्टिसेज को साझा करते हुए हमारा लक्ष्य ऐसा स्वतंत्र, भरोसेमंद और समान अवसर वाला डिजिटल स्पेस तैयार करना है, जिसमें हर देश AI को आकार देने और उससे लाभ उठाने में सक्षम हो। यही दृष्टिकोण इटली की G7 प्रेसीडेंसी और नई दिल्ली में आयोजित AI इम्पैक्ट समिट 2026 के निष्कर्षों के केंद्र में है। AI को इंसानों द्वारा इंसानों के लिए बनाए गए एक माध्यम के रूप में देखने का मतलब यह स्पष्ट करना है कि टेक्नोलॉजी न तो लोगों की जगह ले सकती है, न उनके मौलिक अधिकारों को कमजोर कर सकती है और न ही इसका इस्तेमाल जनमत को प्रभावित करने या लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को बदलने के लिए होना चाहिए। तेजी से जुड़ती दुनिया में स्वतंत्रता और मानव गरिमा की रक्षा को लेकर हमारा दृष्टिकोण इसी चुनौती पर आधारित है।

हमारा सहयोग स्पेस सेक्टर तक भी फैला हुआ है। स्पेस एक्सप्लोरेशन और सैटेलाइट टेक्नोलॉजी में भारत की प्रभावशाली प्रगति, साथ ही एयरोस्पेस इंजीनियरिंग में इटली की उत्कृष्ट क्षमता, संयुक्त पहलों और अगली पीढ़ी की टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट के लिए बड़े अवसर प्रदान करती है।

सिक्योरिटी और स्टेबिलिटी देशों की समृद्धि सुनिश्चित करने के लिए बेहद जरूरी बनी हुई हैं। इटली और भारत डिफेंस, सिक्योरिटी और स्ट्रैटेजिक टेक्नोलॉजी जैसे सेक्टर्स में अपने सहयोग को और मजबूत करना चाहते हैं। हमारा सहयोग महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के साथ आतंकवाद, अंतरराष्ट्रीय आपराधिक नेटवर्क, ड्रग तस्करी, साइबर क्राइम और मानव तस्करी जैसे खतरों के खिलाफ मजबूती बढ़ाने में मदद करेगा।

एनर्जी हमारी साझेदारी का एक और प्रमुख स्तंभ है। डाइवर्सिफाइड एनर्जी सोर्सेज की ओर बढ़ रहे ग्लोबल ट्रांजिशन के लिए इनोवेशन, इनवेस्टमेंट और सहयोग की जरूरत है। भारत और इटली रिन्यूएबल एनर्जी से लेकर हाइड्रोजन टेक्नोलॉजी तक, और स्मार्ट ग्रिड से लेकर मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर तक कई क्षेत्रों में साथ काम कर रहे हैं। ग्रीन हाइड्रोजन एक्सपोर्ट हब बनने की भारत की पहल जहां अपार संभावनाएं प्रदान करती है, वहीं यह रिन्यूएबल इंफ्रास्ट्रक्चर में इटली की एडवांस्ड टेक्नोलॉजी और यूरोप के लिए एनर्जी गेटवे के रूप में उसकी रणनीतिक भूमिका के साथ पूरी तरह मेल खाती है। इस संदर्भ में भारत की अगुवाई वाली प्रमुख पहलों, इंटरनेशनल सोलर अलायंस (ISA), कोएलिशन फॉर डिजास्टर रेजिलिएंट इंफ्रास्ट्रक्चर (CDRI) और ग्लोबल बायोफ्यूल्स अलायंस (GBA) में अन्य देशों के साथ हमारा सहयोग भी महत्वपूर्ण है।

फिजिकल, डिजिटल और मानवीय कनेक्टिविटी वह कड़ी है जो हमें एक साथ जोड़ती है। भारत और इटली दोनों ग्लोबल अर्थव्यवस्था के दो अहम केंद्रों, इंडो-पैसिफिक और मेडिटेरेनियन, के मध्य स्थित हैं। इन क्षेत्रों को अलग-अलग दायरों के रूप में नहीं, बल्कि तेजी से एक-दूसरे से जुड़ते हुए क्षेत्रों के रूप में देखा जाना चाहिए।

दरअसल, हम उस उभरते हुए ‘इंडो-मेडिटेरेनियन’ को देख रहे हैं, जो ट्रेड, टेक्नोलॉजी, एनर्जी, डेटा और विचारों का एक महत्वपूर्ण कॉरिडोर बनता जा रहा है, जो हिंद महासागर को यूरोप से जोड़ता है। इसी आपस में जुड़े हुए क्षेत्र में हमारे संबंध स्वाभाविक रूप से एक विशेष स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप में विकसित हो रहे हैं, जो दो महाद्वीपों को जोड़ते हुए नई ग्लोबल डायनामिक्स को आकार दे रही है।

इसी संदर्भ में इंडिया-मिडिल ईस्ट-यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर हमारे क्षेत्रों को मॉडर्न ट्रांसपोर्ट और इंफ्रास्ट्रक्चर, डिजिटल नेटवर्क, एनर्जी सिस्टम और मजबूत सप्लाई चेन के जरिए जोड़ने की एक दूरदर्शी पहल है। भारत और इटली इस विजन को हकीकत में बदलने के लिए अन्य साझेदार देशों के साथ मिलकर काम करने के लिए भी प्रतिबद्ध हैं।

हम अपनी साझा चुनौतियों का समाधान दोनों देशों के बीच गहरी साझेदारी और दीर्घकालिक सांस्कृतिक संबंधों के आधार पर कर सकते हैं। भारतीय संस्कृति में ‘धर्म’ की अवधारणा उस जिम्मेदारी की भावना को दर्शाती है, जो हमारे कार्यों का आधार बननी चाहिए, जबकि ‘वसुधैव कुटुम्बकम’, यानी ‘पूरी दुनिया एक परिवार है’ का सिद्धांत आज के आपस में जुड़े डिजिटल युग में गहराई से प्रतिध्वनित होता है। ऐसे मूल्य इटली की पुनर्जागरण काल से जुड़ी मानवतावादी परंपरा में भी स्वाभाविक रूप से दिखाई देते हैं, जो हर व्यक्ति की गरिमा और समाजों तथा लोगों को जोड़ने में संस्कृति की शक्ति को महत्व देती है।

इसलिए हमारा साझा विजन लोगों को केंद्र में रखकर मजबूत और भविष्योन्मुखी भारत-इटली साझेदारी की नींव रखना है।

(यह लेख प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी के साथ मिलकर लिखा है)

खपत का 66% खाद्य तेल आयात करता है भारत, तिजोरी पर ₹1.61 लाख करोड़ का बोझ: समझें कैसे ये सेहत के साथ देश की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता है भारी

जब भी भारत के तेल आयात की बात होती है, तो सबसे पहले कच्चे तेल यानी क्रूड ऑयल पर चर्चा होती है। लेकिन एक और ऐसी चीज है जो हर दिन चुपचाप लगभग हर भारतीय घर तक पहुँचती है वह है खाद्य तेल यानी एडिबल ऑयल

सड़क किनारे मिलने वाले खाने से लेकर बड़े रेस्तराँ तक, पैकेज्ड फूड से लेकर घर की रसोई तक, खाद्य तेल आज भारतीय जीवन का एक जरूरी हिस्सा बन चुका है। लेकिन आज इस विषय पर चर्चा क्यों हो रही है? इसका जवाब पिछले तीन वर्षों की उन घटनाओं में छिपा है जिन्होंने भारत के खाद्य तेल क्षेत्र की असली कमजोरी को उजागर कर दिया।

फरवरी 2022 में रूस ने यूक्रेन पर बड़ा हमला शुरू किया। कुछ ही हफ्तों में दोनों देशों से आने वाला सनफ्लावर ऑयल लगभग पूरी तरह रुक गया और इसकी कीमतें तेजी से बढ़ गईं। इसके ठीक दो महीने बाद अप्रैल 2022 में इंडोनेशिया, जो दुनिया के सबसे बड़े पाम ऑयल (ताड़ का तेल) निर्यातकों में से एक है, ने अपने घरेलू भंडार को सुरक्षित रखने के लिए पाम ऑयल के निर्यात पर रोक लगा दी।

भारत इंडोनेशिया से बड़ी मात्रा में पाम ऑयल आयात करता है, इसलिए इस फैसले का असर सीधे भारतीय बाजार पर पड़ा और कीमतें बढ़ गईं। अब हाल के समय में मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर पैदा हुई चिंताओं ने भी नई परेशानी खड़ी कर दी है।

दुनिया के समुद्री रास्ते से होने वाले लगभग एक-तिहाई कच्चे तेल का व्यापार इसी रास्ते से गुजरता है। ऐसे में शिपिंग और माल ढुलाई लागत बढ़ने का खतरा बना हुआ है। इन सभी घटनाओं ने यह साफ कर दिया कि भारत की रसोई वैश्विक युद्धों, निर्यात प्रतिबंधों, सप्लाई चेन संकट और भू-राजनीतिक तनावों के प्रति बेहद संवेदनशील हो चुकी है।

आज भारत अपनी खाद्य तेल की जरूरत का लगभग 60% हिस्सा आयात करता है। अमेरिका, चीन और ब्राजील जैसे देशों के बाद भारत दुनिया की सबसे बड़ी खाद्य तेल अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। अनुमान है कि 2024-25 में खाद्य तेल आयात पर भारत को लगभग 18.3 अरब डॉलर यानी करीब 1.61 लाख करोड़ रुपए खर्च करने पड़े।

पाम ऑयल, जिसका इस्तेमाल प्रोसेस्ड फूड, स्नैक्स और बेकरी उत्पादों में बड़े पैमाने पर होता है, मुख्य रूप से इंडोनेशिया और मलेशिया से आता है। सोयाबीन ऑयल अर्जेंटीना और ब्राजील से आयात होता है, जबकि सनफ्लावर ऑयल रूस और यूक्रेन से आता है। इसी दौरान भारत में खाद्य तेल की खपत पिछले दो दशकों में तेजी से बढ़ी है।

अब बढ़ती तेल खपत केवल आयात तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसका संबंध मोटापा, डायबिटीज, हृदय रोग और फैटी लिवर जैसी बीमारियों से भी जुड़ चुका है। इस लेख में हम समझेंगे कि कैसे रसोई में इस्तेमाल होने वाला एक सामान्य खाद्य पदार्थ अब स्वास्थ्य, विदेशी निर्भरता और आर्थिक सुरक्षा से जुड़ा बड़ा मुद्दा बन चुका है।

भारत की कुल खपत बनाम उत्पादन

आज भारत दुनिया के सबसे बड़े खाद्य तेल उपभोक्ताओं और आयातकों में शामिल है। भारतीय हर साल लगभग 25-26 मिलियन टन खाद्य तेल का उपभोग करते हैं, जबकि देश में उत्पादन केवल 11-12 मिलियन टन के आसपास होता है। यानी भारत की लगभग 60% जरूरतें विदेशी देशों से पूरी होती हैं।

इसी वजह से भारत ने 2024-25 में करीब 16 मिलियन टन खाद्य तेल आयात करने के लिए लगभग 1.61 लाख करोड़ रुपए खर्च किए। यह कोई नई स्थिति नहीं है। 2023-24 में भी भारत ने लगभग 15.96 मिलियन टन खाद्य तेल आयात करने पर करीब 1.32 लाख करोड़ रुपए खर्च किए थे। वैश्विक कीमतें बढ़ने के कारण आयात लागत में करीब 22% की बढ़ोतरी दर्ज की गई।

बढ़ती माँग बनाम धीमा घरेलू उत्पादन, आत्मनिर्भरता में सुधार 

बढ़ती आबादी, तेजी से हो रहा शहरीकरण, फास्ट फूड का बढ़ता चलन और रेस्तराँ संस्कृति के विस्तार के कारण खाद्य तेल की खपत लगातार बढ़ी है। लेकिन घरेलू उत्पादन इस बढ़ती माँग के साथ कदम नहीं मिला पाया। हालाँकि पिछले एक दशक में भारत की खाद्य तेल के मामले में आत्मनिर्भरता में कुछ सुधार जरूर हुआ है।

सरकारी आँकड़ों के अनुसार, 2015 में जहाँ आत्मनिर्भरता करीब 36.8% थी, वहीं 2024 तक यह लगभग 44% तक पहुँच गई। इसके पीछे घरेलू तिलहन उत्पादन में बढ़ोतरी और सरकारी नीतियों का योगदान रहा। फिर भी तेजी से बढ़ती माँग के मुकाबले घरेलू उत्पादन अभी भी काफी पीछे है।

भारत आयातित खाद्य तेल पर निर्भर क्यों है?

भारत कृषि प्रधान देश होने के बावजूद खाद्य तेल के मामले में आत्मनिर्भर नहीं बन पाया है। इसकी सबसे बड़ी वजह पारंपरिक फसलों पर ज्यादा निर्भरता है। भारत में किसान गेहूँ और धान जैसी फसलें उगाना ज्यादा सुरक्षित मानते हैं क्योंकि उन्हें MSP, सरकारी खरीद, सिंचाई और सब्सिडी जैसी सुविधाएँ मिलती हैं।

इसके विपरीत, तिलहन फसलें जैसे सोयाबीन, सूरजमुखी, सरसों और मूंगफली अधिक जोखिम भरी मानी जाती हैं। इनकी कीमतें अस्थिर रहती हैं, कीटों का खतरा ज्यादा होता है और बारिश पर निर्भरता भी अधिक रहती है। तिलहन किसानों को गेहूँ और धान किसानों जैसी मजबूत सरकारी सुरक्षा नहीं मिलती।

एक और बड़ी समस्या कम उत्पादकता है। भारत में कई जगहों पर तिलहन फसलें कमजोर मिट्टी और सीमित सिंचाई वाले क्षेत्रों में उगाई जाती हैं, जिससे उत्पादन कम रहता है। दूसरी तरफ इंडोनेशिया और मलेशिया जैसे देशों ने समय के साथ बेहद प्रभावी पाम ऑयल उद्योग विकसित कर लिया।

बढ़ती खपत और बदलती जीवनशैली

भारत में तली हुई चीजों, पैकेज्ड स्नैक्स, बेकरी उत्पादों, रेस्तराँ और फास्ट फूड की खपत तेजी से बढ़ी है। जैसे-जैसे शहर बढ़े और फूड डिलीवरी ऐप्स आम हुए, वैसे-वैसे खाद्य तेल की खपत भी बढ़ती गई। अगर आँकड़ों की बात करें, तो 2001 में एक भारतीय औसतन सालभर में 8.2 किलो खाद्य तेल का सेवन करता था।

2023-24 तक यह बढ़कर 23.5 किलो प्रति व्यक्ति हो गया। यानी कुछ ही वर्षों में प्रति व्यक्ति खपत लगभग 15 किलो बढ़ गई। भारत की खाद्य तेल खपत और घरेलू उत्पादन के बीच बढ़ता अंतर अब इसे केवल रसोई का सामान नहीं बल्कि एक बड़ा आर्थिक और रणनीतिक मुद्दा बना चुका है।

कौन-कौन से तेल आयात करता है भारत?

भारत अलग-अलग प्रकार के खाद्य तेल अलग-अलग देशों से आयात करता है। पाम ऑयल भारत में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला खाद्य तेल है, जो मुख्य रूप से इंडोनेशिया और मलेशिया से आता है। इसकी कम कीमत और लंबी शेल्फ लाइफ के कारण इसका इस्तेमाल प्रोसेस्ड फूड, चिप्स, बिस्किट और बेकरी उत्पादों में बड़े पैमाने पर होता है।

भारत बड़ी मात्रा में सोयाबीन ऑयल अर्जेंटीना और ब्राजील से आयात करता है, जबकि सनफ्लावर ऑयल रूस और यूक्रेन से आता है। रूस-यूक्रेन युद्ध ने दिखाया कि वैश्विक संकट भारत की खाद्य तेल सप्लाई को कितना प्रभावित कर सकते हैं। हालाँकि भारत सरसों और मूंगफली जैसे तेलों का उत्पादन खुद करता है, लेकिन घरेलू उत्पादन तेजी से बढ़ती माँग को पूरा नहीं कर पा रहा। परिणामस्वरूप, भारत आयातित खाद्य तेलों पर अत्यधिक निर्भर है। 

1998 का सरसों तेल कांड

भारत के खाद्य तेल इतिहास में 1998 का सरसों तेल कांड एक बड़ा मोड़ साबित हुआ। उस समय उत्तर भारत में सरसों का तेल व्यापक रूप से इस्तेमाल होता था। बाद में पता चला कि इसमें जहरीला आर्गेमोन ऑयल मिलाया जा रहा था, जिससे ‘एपिडेमिक ड्रॉप्सी’ नाम की गंभीर बीमारी फैल गई।

इस बीमारी से लोगों के शरीर में सूजन, साँस लेने में दिक्कत और दिल संबंधी समस्याएँ होने लगीं। इस घटना में 60 से अधिक लोगों की मौत हो गई और करीब 3000 लोग बीमार पड़े।

इस घटना के बाद लोगों का खुला सरसों तेल पर भरोसा टूट गया। सरकार ने सख्त खाद्य सुरक्षा नियम लागू किए और धीरे-धीरे ब्रांडेड रिफाइंड ऑयल और सस्ते आयातित पाम ऑयल का इस्तेमाल बढ़ने लगा। कई विशेषज्ञ मानते हैं कि इस घटना ने भारत में आयातित और रिफाइंड तेलों की ओर झुकाव को तेज कर दिया।

वनस्पति की कहानी

रिफाइंड ऑयल के आम होने से पहले वनस्पति भारत में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाली कुकिंग फैट्स में से एक था। इसे देसी घी के सस्ते विकल्प के रूप में लाया गया था। मिठाइयों, बेकरी, रेस्तराँ और स्ट्रीट फूड में इसका बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होता था। ‘डालडा’ इसका सबसे प्रसिद्ध ब्रांड बन गया था।

लेकिन बाद में पता चला कि वनस्पति में ट्रांस फैट की मात्रा काफी ज्यादा होती है, जो हृदय रोग और मोटापे से जुड़ी है। समय के साथ सस्ता आयातित पाम ऑयल वनस्पति की जगह लेने लगा क्योंकि यह बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए ज्यादा सस्ता और सुविधाजनक था। इससे भारत की आयातित तेलों पर निर्भरता और बढ़ गई।

सस्ते पाम ऑयल की अर्थव्यवस्था

आज भारत के खाद्य तेल बाजार में पाम ऑयल का सबसे बड़ा हिस्सा है और यह कुल खाद्य तेल खपत का 37% से ज्यादा हिस्सा बनाता है। कई दशकों तक पाम ऑयल दुनिया के सबसे सस्ते खाद्य तेलों में शामिल रहा। इसकी सबसे बड़ी वजह ऑयल पाम पेड़ों की बहुत ज्यादा उत्पादन क्षमता है।

एक हेक्टेयर जमीन से करीब 3.3 टन पाम ऑयल निकलता है, जबकि सोयाबीन से केवल 0.4 टन और सूरजमुखी से लगभग 0.7 टन तेल मिलता है। हालाँकि 2024 तक स्थिति कुछ बदली और पाम ऑयल की कीमतें लगभग 10% बढ़ गईं, जबकि सोयाबीन ऑयल की कीमतों में करीब 9% की गिरावट आई।

इसके बावजूद पाम ऑयल आज भी कम लागत, लंबी शेल्फ लाइफ और ज्यादा तापमान सहने की क्षमता के कारण खाद्य उद्योग की पहली पसंद बना हुआ है। बिस्किट, चिप्स, इंस्टेंट फूड, फ्रोजन फूड और बेकरी उत्पादों में इसका बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होता है क्योंकि इससे उत्पादन लागत कम रहती है।

यही वजह है कि सस्ता होने के कारण पाम ऑयल धीरे-धीरे भारत के प्रोसेस्ड फूड और कमर्शियल कुकिंग सेक्टर का अहम हिस्सा बन गया।

पाम ऑयल से जुड़ी स्वास्थ्य चिंताएँ

भारत अपना ज्यादातर पाम ऑयल इंडोनेशिया और मलेशिया से आयात करता है। दुनिया की लगभग 85% पाम ऑयल सप्लाई इन्हीं दो देशों से आती है, इसलिए पाम ऑयल भारत के सबसे बड़े आयातित खाद्य उत्पादों में शामिल हो गया है।

समय के साथ सस्ता आयातित पाम ऑयल बड़े पैमाने पर पारंपरिक तेलों की जगह लेने लगा क्योंकि इसे खरीदना आसान था और यह खाद्य उद्योग के लिए ज्यादा सस्ता पड़ता था। भारत में बिकने वाले कई रिफाइंड और ब्लेंडेड ऑयल में भी पाम ऑयल मिला होता है, लेकिन अक्सर लोगों को इसकी जानकारी नहीं होती।

हालाँकि ज्यादा मात्रा में पाम ऑयल का सेवन स्वास्थ्य के लिए चिंता का कारण बन गया है। इसमें लगभग 50% सैचुरेटेड फैट होता है। WHO और कई शोधों के अनुसार, इससे खराब कोलेस्ट्रॉल (LDL) बढ़ सकता है और हृदय रोग का खतरा भी बढ़ता है।

इसके बावजूद बिस्किट बनाने वाली कंपनियाँ, रेस्तराँ, होटल और फूड इंडस्ट्री आज भी बड़े पैमाने पर पाम ऑयल का इस्तेमाल कर रहे हैं क्योंकि यह आसानी से उपलब्ध और अपेाकृत सस्ता होता है। इससे भारत की आयातित खाद्य तेलों पर निर्भरता लगातार बढ़ती जा रही है।

बढ़ती तेल खपत के पीछे का स्वास्थ्य संकट

बढ़ती खाद्य तेल खपत अब केवल आर्थिक समस्या नहीं रही, बल्कि धीरे-धीरे यह एक बड़ा स्वास्थ्य संकट भी बनती जा रही है। पिछले दो दशकों में भारत में खाद्य तेल का सेवन तेजी से बढ़ा है। बदलती खानपान की आदतों और आधुनिक जीवनशैली ने लोगों के भोजन में तेल की मात्रा काफी बढ़ा दी है।

आज तली हुई स्ट्रीट फूड, फास्ट फूड, प्रोसेस्ड स्नैक्स और बेकरी उत्पादों का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है, जिनमें बड़ी मात्रा में तेल का उपयोग होता है। हाल के वर्षों में फूड डिलीवरी ऐप्स और रेस्तरां संस्कृति ने भी ज्यादा तेल वाले खाने की खपत को और बढ़ा दिया है। हमने तेल की भारी खपत के आर्थिक प्रभावों पर चर्चा की है, लेकिन भारतीयों के स्वास्थ्य का क्या?

ज्यादा मात्रा में तेल का सेवन कई गंभीर बीमारियों का कारण बन सकता है। अगर प्रति व्यक्ति खाद्य तेल खपत की बात करें, तो 1960 के दशक में भारत में एक व्यक्ति सालभर में केवल 3-4 किलो खाद्य तेल का सेवन करता था।

लेकिन 2024-25 तक यह बढ़कर लगभग 25.3 किलो हो गया है और अनुमान है कि 2030-31 तक यह 40 किलो तक पहुँच सकता है। यानी करीब 60 सालों में भारत में तेल की खपत लगभग 7 गुना बढ़ गई है। अगर हाल के आँकड़ों को देखें, तो 2001 में एक व्यक्ति औसतन सालभर में लगभग 8.2 किलो खाद्य तेल इस्तेमाल करता था।

यानी पिछले दो दशकों में यह खपत लगभग तीन गुना हो चुकी है। यह स्थिति इसलिए और चिंता बढ़ाती है क्योंकि ICMR यानी इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च के अनुसार, एक व्यक्ति को प्रतिदिन केवल 20-30 ग्राम तेल का सेवन करना चाहिए, जो सालभर में लगभग 12 किलो के बराबर होता है।

लेकिन आज भारतीय लोग इससे लगभग दोगुना तेल खा रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, जरूरत से ज्यादा तेल खाने से मोटापा, डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर और दूसरी लाइफस्टाइल बीमारियों का खतरा तेजी से बढ़ता है।

दोबारा इस्तेमाल होने वाला तेल और छिपे खतरे

NFHS-5 के आँकड़ों के अनुसार, भारत में लगभग 24% महिलाएँ और 23% पुरुष मोटापे या अधिक वजन की समस्या से जूझ रहे हैं। भारत उन देशों में शामिल हो चुका है जहाँ मोटापा तेजी से बढ़ रहा है। वर्ल्ड ओबेसिटी एटलस के अनुसार, दुनिया में मोटापे से ग्रस्त बच्चों की दूसरी सबसे बड़ी आबादी भारत में है।

अनुमान है कि 2040 तक भारत में लगभग 5.6 करोड़ बच्चे मोटापे का शिकार हो सकते हैं। यह समस्या केवल मोटापे तक सीमित नहीं है, बल्कि डायबिटीज जैसी बीमारियाँ भी तेजी से बढ़ रही हैं। वर्तमान में भारत में लगभग 8.98 करोड़ वयस्क डायबिटीज से पीड़ित हैं और अनुमान है कि 2050 तक यह संख्या बढ़कर 15.67 करोड़ तक पहुँच सकती है।

अगर आँकड़ों को देखें, तो पिछले तीन दशकों में भारत में डायबिटीज के मामलों में भारी बढ़ोतरी हुई है। 1990 में जहाँ लगभग 3% आबादी डायबिटीज से प्रभावित थी, वहीं 2021 तक यह बढ़कर करीब 6% हो गई। डॉक्टरों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, खराब खानपान, ज्यादा तेल वाला भोजन, प्रोसेस्ड फूड और बढ़ता मोटापा इसके मुख्य कारण हैं।

भारत में हृदय रोग और कार्डियोवैस्कुलर बीमारियाँ भी तेजी से बढ़ रही हैं। ये बीमारियाँ दिल और रक्त वाहिकाओं को प्रभावित करती हैं और इनका सीधा संबंध अस्वस्थ खानपान और अत्यधिक तेल सेवन से माना जाता है। ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज स्टडी के अनुसार, 2016 तक भारत में होने वाली कुल मौतों में लगभग 28% मौतें हृदय रोगों की वजह से हो रही थीं।

वहीं WHO इंडिया के आँकड़ों के अनुसार, 40 से 69 साल की उम्र के लोगों में होने वाली लगभग 45% मौतों के पीछे कार्डियोवैस्कुलर बीमारियाँ जिम्मेदार हैं। पिछले कुछ दशकों में भारत में हृदय रोगों से होने वाली मौतों की संख्या लगभग दोगुनी हो चुकी है। 1990 में हर साल करीब 22.6 लाख लोगों की मौत हृदय रोगों से होती थी, जो 2020 तक बढ़कर लगभग 47.7 लाख हो गई।

इसके साथ ही हाई ब्लड प्रेशर यानी हाइपरटेंशन की समस्या भी तेजी से बढ़ रही है। आज भारत में हर चार में से एक व्यक्ति हाई ब्लड प्रेशर से प्रभावित है। लेकिन बड़ी संख्या में लोगों को इसकी जानकारी तक नहीं होती या उनका इलाज सही तरीके से नहीं हो पाता।

रिपोर्ट्स के अनुसार, भारत के लगभग 80% घरों में तलने वाला तेल कई बार दोबारा इस्तेमाल किया जाता है। बार-बार गर्म किया गया तेल ट्रांस फैट, फ्री रेडिकल्स और जहरीले तत्व पैदा करता है, जो शरीर में सूजन बढ़ाने के साथ-साथ हृदय रोग, फैटी लिवर और कुछ प्रकार के कैंसर का खतरा भी बढ़ा सकता है।

कैसे भारतीय रसोई को प्रभावित करती हैं वैश्विक घटनाएँ?

भारत की बड़ी आबादी और भारी आयात निर्भरता के कारण देश वैश्विक घटनाओं से आसानी से प्रभावित हो जाता है। भारत खाद्य तेल के लिए बड़े पैमाने पर दूसरे देशों पर निर्भर है, इसलिए दुनिया में होने वाले युद्ध, निर्यात प्रतिबंध और सप्लाई चेन संकट का सीधा असर भारतीय रसोई तक पहुँचता है।

रूस-यूक्रेन युद्ध इसका सबसे बड़ा उदाहरण था। भारत रूस और यूक्रेन से बड़ी मात्रा में सनफ्लावर ऑयल आयात करता है। युद्ध शुरू होने के बाद सप्लाई चेन प्रभावित हुई और भारत में खाद्य तेल की कीमतें तेजी से बढ़ गईं। इसी तरह भारत पाम ऑयल के लिए इंडोनेशिया और मलेशिया पर काफी निर्भर है।

जब इन देशों ने निर्यात पर प्रतिबंध लगाए, तो भारत में पाम ऑयल की कीमतें तुरंत बढ़ गईं। पाम ऑयल, सोयाबीन ऑयल और सनफ्लावर ऑयल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में होने वाले बदलाव का असर सीधे पैकेज्ड फूड, रेस्तराँ और घरों में इस्तेमाल होने वाले खाद्य तेल की कीमतों पर पड़ता है।

मुद्रा विनिमय दर यानी रुपए की कमजोरी भी इस समस्या को और बढ़ाती है। क्योंकि भारत खाद्य तेल डॉलर में खरीदता है, इसलिए जब रुपया कमजोर होता है तो आयात लागत बढ़ जाती है, भले अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें स्थिर क्यों न हों। यानी भारत की बढ़ती आयात निर्भरता ने भारतीय रसोई को वैश्विक युद्धों, शिपिंग संकटों और निर्यात प्रतिबंधों से जोड़ दिया है।

अब दुनिया में हजारों किलोमीटर दूर होने वाले संघर्ष भी भारत में कुकिंग ऑयल की कीमतें बढ़ा सकते हैं। इसी वजह से खाद्य तेल अब केवल रसोई का सामान्य सामान नहीं रह गया, बल्कि यह भारत के लिए एक बड़ा आर्थिक और रणनीतिक मुद्दा बन चुका है।

सरकार की प्रतिक्रिया और पीएम मोदी की अपील

आयातित खाद्य तेल पर बढ़ती निर्भरता और लाइफस्टाइल बीमारियों के तेजी से बढ़ने के कारण सरकार ने भी इस मुद्दे पर ध्यान देना शुरू किया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कई बार लोगों से तेल की खपत कम करने की अपील कर चुके हैं। उन्होंने लोगों से 10% तेल कम इस्तेमाल करने की अपील करते हुए कहा, “इससे देश सेवा भी होगी और देह सेवा भी होगी।”

स्वतंत्रता दिवस पर देश को संबोधित करते हुए उन्होंने चेतावनी दी थी कि आने वाले वर्षों में मोटापा और लाइफस्टाइल बीमारियाँ भारत के लिए बड़ी चुनौती बन सकती हैं।

बाद में विश्व स्वास्थ्य दिवस पर भी उन्होंने कहा कि जरूरत से ज्यादा तेल का सेवन कम करना केवल व्यक्तिगत स्वास्थ्य का मामला नहीं बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी भी है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, अत्यधिक खाद्य तेल सेवन का सीधा संबंध मोटापा, डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, फैटी लिवर और हृदय रोग जैसी बीमारियों से है।

इसलिए तेल की खपत कम करने से एक तरफ लोगों का स्वास्थ्य बेहतर हो सकता है और दूसरी तरफ देश का आयात बिल भी घट सकता है। सरकार ने जागरूकता अभियान चलाने के साथ-साथ नेशनल मिशन ऑन एडिबल ऑयल्स–ऑयलसीड्स (NMEO-OS) और नेशनल मिशन ऑन एडिबल ऑयल्स–ऑयल पाम (NMEO-OP) जैसी योजनाएँ भी शुरू की हैं।

इन योजनाओं का उद्देश्य देश में तिलहन उत्पादन बढ़ाना, किसानों को बेहतर प्रोत्साहन देना, खाद्य तेल में आत्मनिर्भरता मजबूत करना और आयात पर निर्भरता कम करना है। अब सरकार खाद्य तेल को केवल खाने-पीने की चीज नहीं मान रही, बल्कि इसे आर्थिक सुरक्षा, सार्वजनिक स्वास्थ्य और आत्मनिर्भरता से जुड़ा बड़ा राष्ट्रीय मुद्दा मानकर काम कर रही है।

आप क्या कर सकते हैं: तेल की खपत कम करने के आसान उपाय

स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, तेल की खपत कम करने के लिए लोगों को अपनी आदतों और जीवनशैली में बदलाव लाने की जरूरत है। सबसे आसान तरीका यह है कि खाना बनाते समय तेल को बिना नापे इस्तेमाल करने के बजाय उसकी मात्रा तय करके इस्तेमाल किया जाए।

डॉक्टर यह भी सलाह देते हैं कि इस्तेमाल किए गए तेल को दोबारा गर्म या बार-बार इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। बार-बार गर्म करने से तेल में ट्रांस फैट, फ्री रेडिकल्स और जहरीले तत्व बनने लगते हैं, जो हार्ट अटैक, डायबिटीज, फैटी लिवर और कुछ प्रकार के कैंसर का खतरा बढ़ा सकते हैं।

विशेषज्ञ कम प्रोसेस्ड और कोल्ड-प्रेस्ड तेलों का इस्तेमाल करने की सलाह देते हैं। साथ ही एक ही प्रकार के तेल पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय अलग-अलग तेलों का संतुलित इस्तेमाल बेहतर माना जाता है। पैकेज्ड फूड खरीदते समय उसके लेबल पढ़ना भी जरूरी है, क्योंकि कई प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों में छिपे हुए फैट और रिफाइंड ऑयल मौजूद होते हैं।

डीप फ्राइड स्नैक्स, फास्ट फूड, बेकरी उत्पाद और ज्यादा प्रोसेस्ड फूड का सेवन कम करने से लंबे समय में स्वास्थ्य जोखिम काफी घट सकते हैं। इसके साथ ही भाप में पकाना, ग्रिल करना, रोस्टिंग और एयर फ्राइंग जैसी हेल्दी कुकिंग तकनीकें तेल की जरूरत कम कर सकती हैं।

विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि बच्चों को छोटी उम्र से ही हेल्दी खानपान की आदतें सिखाना बहुत जरूरी है, क्योंकि कम उम्र में ही मोटापा और लाइफस्टाइल बीमारियाँ तेजी से बढ़ रही हैं।
डॉक्टरों के अनुसार, संतुलित भोजन, सीमित मात्रा में तेल का सेवन और घर का बना खाना लंबे समय तक स्वस्थ रहने के सबसे प्रभावी तरीकों में शामिल हैं।

निष्कर्ष

कुकिंग ऑयल भले ही रसोई में इस्तेमाल होने वाली एक सामान्य चीज लगे, लेकिन इसके पीछे विदेशी निर्भरता, बदलती खानपान की आदतें, बढ़ते स्वास्थ्य खतरे और आर्थिक असुरक्षा की बड़ी कहानी छिपी हुई है। आज भारत अपनी खाद्य तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा दूसरे देशों से आयात करता है।

कृषि प्रधान देश होने के बावजूद भारत खाद्य तेल के मामले में पूरी तरह आत्मनिर्भर नहीं बन पाया है। इसकी वजह से भारतीय घर वैश्विक युद्धों, निर्यात प्रतिबंधों, सप्लाई चेन संकट और अंतरराष्ट्रीय कीमतों में उतार-चढ़ाव से आसानी से प्रभावित हो जाते हैं।

दूसरी तरफ जरूरत से ज्यादा खाद्य तेल का सेवन देश में मोटापा, डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, हृदय रोग और दूसरी लाइफस्टाइल बीमारियों को तेजी से बढ़ा रहा है। इसलिए खाद्य तेल का मुद्दा अब केवल खेती या खाने तक सीमित नहीं रहा। यह सार्वजनिक स्वास्थ्य, आर्थिक सुरक्षा, खाद्य महँगाई और आत्मनिर्भरता से जुड़ा बड़ा राष्ट्रीय मुद्दा बन चुका है।

सरकार घरेलू तिलहन उत्पादन बढ़ाने और आयात निर्भरता कम करने के लिए कई योजनाएँ और सुधार लागू कर रही है। लेकिन लंबे समय में असली बदलाव तभी संभव होगा जब लोग स्वस्थ खानपान अपनाएँ, संतुलित मात्रा में तेल का सेवन करें, किसानों को बेहतर समर्थन मिले और लोगों में जागरूकता बढ़े। भारत के खाद्य तेल संकट का समाधान केवल उत्पादन बढ़ाने से नहीं बल्कि खाने की आदतें बदलने से भी जुड़ा हुआ है।

(मूल रुप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

कोलकाता का पार्क सर्कस एरिया आजादी के बाद से ही इस्लामी कट्टरपंथियों की उपद्रव-हिंसा का रहा केंद्र, पहली बार कसी लगाम: जानें मुस्लिमों ने कैसे अब तक की सरकारों पर बनाए रखा था दबाव

मध्य कोलकाता का पार्क सर्कस इलाका एक बार फिर सुर्खियों में आ गया है। इस बार सड़क पर नमाज पढ़ने और लाउडस्पीकर के इस्तेमाल पर लगी रोक के विरोध में प्रदर्शन हो रहा था। इस दौरान अचानक हिंसा भड़क गई और प्रदर्शनकारियों की पुलिस से झड़प हो गई। भीड़ ने गाड़ियों में तोड़फोड़ की, जिससे कुछ पुलिसवाले भी घायल हो गए हैं।

इस ताजा घटना के बाद पार्क सर्कस को लेकर राजनीति भी गरमा गई है। दरअसल, यह इलाका पिछले कई सालों से बड़े प्रदर्शनों और भीड़ जुटाने का मुख्य केंद्र रहा है, खासकर तब जब मुस्लिम समुदाय से जुड़े मुद्दे सामने आते हैं। अब इस पूरे मामले पर पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने कड़ी चेतावनी दी है। उन्होंने साफ-साफ कहा है कि जो लोग भी कानून-व्यवस्था को बिगाड़ने की कोशिश करेंगे, उन्हें बख्शा नहीं जाएगा। सरकार अब किसी भी तरह की हिंसा या अशांति फैलाने की कोशिश को बिल्कुल बर्दाश्त नहीं करेगी।

CM शुभेंदु अधिकारी की चेतावनी

मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने पथराव की घटना पर कड़ा रुख अपनाया। उन्होंने साफ कहा है कि हिंसा करने वालों के खिलाफ राज्य सरकार बहुत सख्ती से निपटेगी। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि बंगाल में अब गुंडागर्दी बिल्कुल नहीं चलने दी जाएगी।

मुख्यमंत्री ने कहा कि पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों को कानून के तहत कार्रवाई करने की पूरी छूट दे दी गई है। अब वह समय बीत चुका है जब पुलिसवालों को बिना किसी सरकारी समर्थन के अकेले छोड़ दिया जाता था। अब सरकार पुलिस के साथ मजबूती से खड़ी है।

CM शुभेंदु अधिकारी ने आगे कहा कि कुछ लोगों को पहले की ढीली व्यवस्था की आदत हो गई थी। उन्हें लगता था कि वे कुछ भी करेंगे और उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होगी। लेकिन अब सरकार साफ संदेश देना चाहती है कि पथराव करना, शांति भंग करना या मजहबी नारों की आड़ में तनाव फैलाना बिल्कुल बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। उन्होंने यह भी बताया कि पुलिस सोशल मीडिया पर नजर रख रही है, क्योंकि ऐसी खबरें आई हैं कि घटना होने से पहले ही इसके बारे में जानकारी इंटरनेट पर डाल दी गई थी।

मुख्यमंत्री ने कोलकाता पुलिस को और मजबूत बनाने की बात भी कही। उन्होंने कहा कि पुलिस बल को बेहतर सुविधाएँ और गाड़ियाँ दी जाएँगी। इसके साथ ही, उन्होंने केंद्रीय गृह मंत्री से अपील की है कि राज्य में पहले से मौजूद पैरामिलिट्री (अर्धसैनिक बलों) की कंपनियों को कुछ समय के लिए यहीं रहने दिया जाए, क्योंकि उनके अचानक जाने से पुलिस पर काम का दबाव बढ़ सकता है। आखिर में उन्होंने आम जनता से भी अपील की कि वे शांति बनाए रखने में पुलिस और प्रशासन का सहयोग करें।

पुलिस की कार्रवाई

यह हिंसा पार्क सर्कस सेवन पॉइंट चौराहे के पास हुई, जहाँ सड़क पर नमाज पढ़ने और लाउडस्पीकर की आवाज सीमित करने के सरकारी नियमों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन बुलाया गया था। इस दौरान इस्लामी कट्टरपंथी वहाँ इकट्ठा हो गए और सड़क जाम कर दी, जिससे ट्रैफिक रुक गया। खुफिया जानकारी मिलने के बाद पुलिस ने पहले से ही वहाँ सुरक्षा बल तैनात कर रखा था।

अधिकारियों के मुताबिक, जैसे ही पुलिस ने सड़क से जाम हटाने की कोशिश की, माहौल बिगड़ गया। इस्लामी भीड़ ने सुरक्षाकर्मियों और वहाँ खड़ी गाड़ियों पर पत्थर और ईंटें फेंकनी शुरू कर दीं, जिससे पुलिस की गाड़ियाँ और कई दूसरी गाड़ियाँ टूट गईं। हालात को काबू में करने के लिए पुलिस ने लाठीचार्ज किया और भीड़ को खदेड़ दिया, जिसके बाद वहाँ भारी पुलिस बल तैनात किया गया और ट्रैफिक को दोबारा शुरू कराया गया।

पुलिस ने इस मामले में कई लोगों को गिरफ्तार किया है और इलाके में फ्लैग मार्च भी किया है। प्रशासन ने इस घटना को कुछ दिन पहले राजाबाजार में शुक्रवार की नमाज के दौरान हुए विवाद से भी जोड़कर देखा है, जहाँ पुलिस ने सड़क पर नमाज न पढ़ने की सरकारी नीति को लागू करने की कोशिश की थी और तब भी झड़प हुई थी।

दरअसल, नई सरकार ने सड़क पर होने वाली मजहबी गतिविधियों को लेकर बहुत कड़ा रुख अपनाया है। बीजेपी नेताओं का साफ कहना है कि नमाज सिर्फ मस्जिदों के अंदर होनी चाहिए और इससे सड़कों पर आम लोगों को कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए। इसी नीति के तहत प्रशासन अब लाउडस्पीकर की आवाज और सड़कों पर भीड़ जुटाने के खिलाफ सख्ती से कार्रवाई कर रहा है।

पार्क सर्कस: क्यों बनता है यह बड़े प्रदर्शनों का केंद्र?

पार्क सर्कस में हुई इस घटना ने एक बार फिर इस इलाके के पुराने इतिहास की याद दिला दी है। यह इलाका लंबे समय से बड़े-बड़े प्रदर्शनों और भारी भीड़ जुटाने का मुख्य केंद्र रहा है। जब भी समुदाय से जुड़ा कोई बड़ा आंदोलन होता है, तो पार्क सर्कस उसका मुख्य अड्डा बन जाता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि इस इलाके की बनावट और यहाँ की सड़कें ऐसी हैं, जहाँ बहुत ही कम समय में बहुत बड़ी भीड़ आसानी से इकट्ठा हो जाती है।

भौगोलिक नजरिए से देखें तो पार्क सर्कस कोलकाता के सबसे जुड़े हुए इलाकों में से एक है। इसके आसपास कई मुख्य सड़कें हैं और पास में ही घनी आबादी वाली बस्तियाँ भी हैं। इसके अलावा, हर शुक्रवार को जुमे की नमाज के समय यहाँ वैसे भी भारी संख्या में लोग इकट्ठा होते हैं। ऐसे में जब भी कोई सामाजिक या राजनीतिक तनाव होता है, तो यहाँ लोगों को एकजुट करना बहुत आसान हो जाता है। यही वजह है कि पिछले कई सालों में मुस्लिम समुदाय से जुड़े जितने भी बड़े प्रदर्शन हुए हैं, वे या तो इसी इलाके से शुरू हुए हैं या फिर यहीं आकर उन्हें असली रफ्तार मिली है।

CAA-NRC के खिलफ पार्क सर्कस मैदान बना आंदोलन का बड़ा केंद्र

इसका सबसे बड़ा उदाहरण साल 2020 की सर्दियों में देखने को मिला था, जब नागरिकता कानून (CAA) और NRC के खिलाफ हुए आंदोलन ने पार्क सर्कस मैदान को एक बड़ा केंद्र बना दिया था। दिल्ली के शाहीन बाग आंदोलन से प्रेरणा लेकर यहाँ मुस्लिम महिलाओं ने दिन-रात का धरना शुरू कर दिया था। प्रदर्शन कर रही महिलाओं का कहना था कि जब तक नागरिकता कानून और NRC से जुड़ी उनकी चिंताएँ दूर नहीं होतीं, वे वहाँ से नहीं हटेंगी।

इस आंदोलन में पार्क सर्कस और उसके आसपास के इलाकों की मुस्लिम महिलाएँ लगातार शामिल हुईं। कई महिलाएँ अपने बच्चों और परिवार के सदस्यों को भी साथ लाई थीं, जबकि छात्रों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भी उनका साथ दिया। जैसे-जैसे यह प्रदर्शन बढ़ा, वहाँ नारेबाज़ी होने लगी और सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किए गए। आंदोलन के बड़ा होने पर प्रदर्शनकारियों ने टेंट, शौचालय और लाउडस्पीकर जैसी सुविधाओं की माँग भी की। इस आंदोलन को वहाँ मौजूद कुछ लोगों ने ‘स्वतंत्रता आंदोलन 2’ यानी दूसरी आज़ादी की लड़ाई का नाम भी दे दिया था।

धरने पर बैठी कई मुस्लिम महिलाओं का कहना था कि उन्होंने इससे पहले कभी किसी राजनीतिक आंदोलन में हिस्सा नहीं लिया था, लेकिन नागरिकता छिन जाने के डर से वे इस बार सड़क पर उतरने को मजबूर हुईं। आंदोलन के दौरान प्रदर्शन स्थल पर दिल का दौरा पड़ने से समीदा खातून नाम की एक महिला की मौत हो गई, जिसने हर किसी को भावुक कर दिया।

इस दौरान कई बड़े कलाकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और राजनीतिक नेताओं ने भी पार्क सर्कस मैदान का दौरा किया। यह प्रदर्शन कोलकाता में सीएए (CAA) के खिलाफ सबसे बड़ा चेहरा बन गया और इसके बाद पूरे देश में पार्क सर्कस की चर्चा होने लगी।

रोहिंग्या मुसलमानों के समर्थन में बड़ी रैली

पार्क सर्कस एक बार फिर उस समय एक बड़े आंदोलन का केंद्र बना, जब म्यांमार वापस भेजे जा रहे रोहिंग्या मुसलमानों के समर्थन में एक हजार से ज्यादा मुस्लिम लोग इकट्ठा हुए। म्यांमार सरकार द्वारा रोहिंग्याओं को वापस बुलाने के फैसले के खिलाफ कई मुस्लिम संगठनों ने मिलकर एक बड़ी रैली निकाली। यह मार्च पार्क सर्कस मैदान से शुरू हुआ था और वहाँ से होते हुए म्यांमार के दूतावास (कंसुलेट ऑफिस) की तरफ बढ़ा था।

इस प्रदर्शन के बाद बंगाल में भारी राजनीतिक बयानबाजी शुरू हो गई। बीजेपी नेताओं ने तब की राज्य सरकार (ममता बनर्जी सरकार) पर तीखा हमला बोला और आरोप लगाया कि सरकार इस मुद्दे के जरिए वोट बैंक की राजनीति कर रही है। इस बड़ी रैली के बाद पार्क सर्कस की यह पहचान और मजबूत हो गई कि जब भी मुस्लिम संगठनों से जुड़ा कोई मुद्दा होता है, तो भारी भीड़ जुटाने के लिए इसी इलाके को चुना जाता है।

नई सरकार के आते ही बदल गई पुलिस की सख्ती

पुलिस ने पार्क सर्कस मामले में जो कार्रवाई की, उसे नई बीजेपी सरकार के समर्थक एक बड़े बदलाव के रूप में देख रहे हैं। उनका मानना है कि टीएमसी (TMC) का राज खत्म होने के बाद अब प्रशासन के काम करने का तरीका पूरी तरह बदल गया है। नई सरकार का साफ कहना है कि अब कानून-व्यवस्था को लेकर कोई ढिलाई नहीं बरती जाएगी। जो लोग भी सड़कें जाम करेंगे, पुलिस पर पत्थर फेंकेंगे या हिंसा फैलाएँगे, उनके खिलाफ तुरंत और कड़ी कार्रवाई की जाएगी।

सरकार के समर्थकों का कहना है कि पहले ऐसे मामलों में शामिल लोगों पर कोई सख्त कार्रवाई नहीं होती थी और वे आसानी से बच जाते थे। लेकिन अब ऐसा नहीं है। अब गड़बड़ी करने वालों को तुरंत गिरफ्तार किया जा रहा है, संवेदनशील इलाकों में भारी पुलिस बल तैनात किया जा रहा है और पुलिस का सख्त रूप साफ दिखाई दे रहा है। संवेदनशील जगहों पर पुलिस का फ्लैग मार्च करना, सड़कों पर भीड़ जमा करने से रोकना और तुरंत एक्शन लेना इस नए बदलाव के सबसे बड़े उदाहरण हैं।

एक बार फिर पार्क सर्कस राजनीति और चर्चा के केंद्र में आ गया है। इस पूरी घटना ने यहाँ के पुराने इतिहास, पुराने आंदोलनों और अब सरकार की नई कड़क नीति को एक साथ लाकर खड़ा कर दिया है। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की तरफ से प्रशासन ने बिल्कुल साफ संदेश दे दिया है कि कानून के दायरे में रहकर शांतिपूर्वक काम करने की पूरी आजादी है, लेकिन अगर किसी ने भी प्रदर्शन की आड़ में हिंसा करने या शहर की शांति भंग करने की कोशिश की, तो पुलिस उसे किसी भी कीमत पर बख्शेगी नहीं।

(यह रिपोर्ट अंग्रेजी में लिखी गई है। अंग्रेजी की रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

ममता राज में रेप केस का खुलासा करने वाली महिला IPS को किया गया था शंट, अब CM शुभेंदु ने सौंपी अहम जिम्मेदारी: जानें कौन हैं ‘सुपरकॉप’ दमयंती सेन, जिनसे काँपते हैं अपराधी

पश्चिम बंगाल में ‘माँ-माटी-मानुष’ का नारा देकर सत्ता में आई ममता बनर्जी सरकार का असली चेहरा उस समय बेनकाब हो गया था, जब उन्होंने अपनी ही सरकार की नाक के नीचे हुए एक खौफनाक गैंगरेप को ‘मनगढ़ंत कहानी’ बता दिया था।

उस दौर में राजनीति के बड़े-बड़े धुरंधर मुख्यमंत्री ममता के सुर में सुर मिला रहे थे, लेकिन एक निडर महिला IPS अधिकारी ऐसी थीं, जिन्होंने सत्ता के दबाव के आगे झुकने से साफ इनकार कर दिया। नाम है- दमयंती सेन

ममता सरकार ने सच को उजागर करने के बदले इस जांबाज अधिकारी को इनाम देने के बजाय सालों-साल हाशिए (साइडलाइन) पर धकेल कर रखा। लेकिन कहते हैं न कि सच कभी हारता नहीं है। बंगाल में BJP की सरकार बनते ही मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने बड़ा और सराहनीय कदम उठाया है।

उन्होंने तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) के 15 साल के काले शासनकाल के दौरान महिलाओं और बच्चों पर हुए अत्याचारों की जाँच के लिए एक हाई-लेवल विशेष आयोग बनाया है। CM शुभेंदु अधिकारी ने इस बेहद महत्वपूर्ण जाँच आयोग का ‘सदस्य सचिव’ (Member Secretary) दमयंती सेन को नियुक्त कर उन्हें वो सम्मान लौटाया है, जिसकी वो हकदार थीं।

कौन हैं ‘सुपरकॉप’ दमयंती सेन?

दमयंती सेन 1996 बैच की भारतीय पुलिस सेवा (IPS) की एक बेहद तेजतर्रार अधिकारी हैं। 1970 में जन्मी दमयंती पढ़ाई-लिखाई में बचपन से ही बेहद होनहार और हमेशा फर्स्ट क्लास रही हैं। उन्होंने कोलकाता के प्रतिष्ठित जादवपुर विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र (Economics) में ग्रेजुएशन और पोस्ट ग्रेजुएशन की डिग्री हासिल की।

उनकी काबिलियत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वह कोलकाता पुलिस के इतिहास में जॉइंट कमिश्नर (क्राइम) के पद पर तैनात होने वाली पहली महिला अधिकारी थीं। इसके बाद वे कोलकाता पुलिस की स्पेशल कमिश्नर भी बनीं। प्रशासनिक हलकों में उनकी ईमानदारी, कड़क स्वभाव और बिना किसी राजनीतिक दबाव के काम करने के अंदाज की मिसाल दी जाती है।

ममता बनर्जी का वो ‘झूठ’ जिसने हिला दिया था बंगाल

कहानी की शुरुआत होती है 6 फरवरी 2012 से। कोलकाता के आलीशान पार्क स्ट्रीट इलाके में एक नाइट क्लब से लौट रही महिला के साथ चलती कार में सामूहिक बलात्कार (पार्क स्ट्रीट गैंगरेप) होता है। तब ममता बनर्जी की तृणमूल कॉन्ग्रेस सरकार को सत्ता में आए कुछ ही समय हुआ था।

अपनी सरकार की छवि को बचाने के लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने बिना किसी जाँच के इस भयानक कांड को ‘सजानो घोटोना’ (एक मनगढ़ंत कहानी) करार दे दिया। उन्होंने सार्वजनिक तौर पर कहा कि यह उनकी सरकार को बदनाम करने की एक राजनीतिक साजिश है। मुख्यमंत्री का यह बयान पीड़ित महिला के घावों पर नमक छिड़कने जैसा था।

जब मुख्यमंत्री के झूठ के सामने अड़ गईं दमयंती सेन

ममता बनर्जी ने तो इसे झूठ मान लिया था, लेकिन उस समय क्राइम ब्रांच की प्रभारी जॉइंट कमिश्नर दमयंती सेन चुप नहीं बैठीं। उन्होंने मुख्यमंत्री के राजनीतिक बयानों की परवाह न करते हुए पूरी लगन से जाँच की।

दमयंती सेन और उनकी टीम ने वैज्ञानिक और पुख्ता सबूत जुटाए और यह साबित कर दिया कि बलात्कार की घटना कोई अफवाह नहीं बल्कि 100 फीसदी कड़वा सच थी। उन्होंने चंद दिनों के भीतर ही रसूखदार आरोपितों को दबोचकर सलाखों के पीछे भेज दिया।

सच बोलने की ‘सजा’ और ममता राज में ‘वनवास’

ममता बनर्जी के दावों को झूठा साबित करना और पीड़ित महिला को न्याय दिलाना दमयंती सेन के करियर पर भारी पड़ गया। बौखलाई ममता सरकार ने केस सुलझने के तुरंत बाद ही उनका ट्रांसफर कोलकाता पुलिस मुख्यालय (लालबाजार) से हटाकर बैरकपुर पुलिस ट्रेनिंग कॉलेज में एक बेहद मामूली और कम महत्वपूर्ण पद पर कर दिया।

सरकार ने इसे ‘रूटीन ट्रांसफर’ कहा, लेकिन पूरा बंगाल समझ गया था कि सच का साथ देने की वजह से एक ईमानदार अफसर को प्रताड़ित किया जा रहा है। इसके बाद TMC के पूरे कार्यकाल में उन्हें मुख्यधारा से दूर रखा गया।

हालाँकि, कलकत्ता हाई कोर्ट को उनकी ईमानदारी पर इतना भरोसा था कि अदालत ने 2014 के ‘मध्यमग्राम बलात्कार कांड’, साल 2022 के चार बड़े रेप केस और चर्चित रसिका जैन मौत मामले की जाँच सीधे दमयंती सेन को सौंप दी थी।

पर्सनल लाइफ: एक साहसी सिंगल मदर

दमयंती सेन अपनी निजी जिंदगी को हमेशा मीडिया और लाइमलाइट से दूर रखती हैं। उनके माता-पिता या भाई-बहन के बारे में कोई जानकारी सार्वजनिक नहीं है। उन्होंने जीवन में कभी शादी नहीं की, लेकिन वह एक बेहद गौरवान्वित ‘सिंगल मदर’ हैं। उन्होंने एक बच्चे को गोद लिया है और अकेले ही उसका बेहतरीन पालन-पोषण कर रही हैं।

CM शुभेंदु का मास्टरस्ट्रोक: बेटियों को सुरक्षा, अपराधियों को सजा

पश्चिम बंगाल की सत्ता संभालते ही मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ताबड़तोड़ और कड़े फैसले ले रहे हैं। पिछली सरकार के दौरान हुए संस्थागत भ्रष्टाचार, ‘कट मनी’, रिश्वतखोरी और महिलाओं-बच्चों के खिलाफ हुई हिंसा के खिलाफ उन्होंने कड़ा रुख अपनाया है। शुभेंदु सरकार ने इसके लिए दो अलग-अलग जाँच आयोगों का गठन किया है।

पहला है संस्थागत भ्रष्टाचार की जाँच, जिसमें कलकत्ता हाई कोर्ट के रिटायर्ड जज जस्टिस विश्वजीत बसु की अध्यक्षता में यह कमेटी काम करेगी, जिसमें ADG रैंक के अधिकारी जयरमन सदस्य-सचिव होंगे।

दूसरा है महिला एवं बाल उत्पीड़न की जाँच, जिसमें रिटायर्ड जस्टिस समाप्ति चटर्जी की अध्यक्षता में बनी इस कमेटी में IPS दमयंती सेन को ‘सदस्य सचिव’ बनाया गया है। यह आयोग विशेष रूप से अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अल्पसंख्यक समुदायों की पीड़ित महिलाओं को न्याय दिलाएगा।

1 जून से लगेगा न्याय का ‘जनता दरबार’

ममता सरकार जहाँ अपराधियों को बचाने और सच छुपाने के आरोपों से घिरी रही, वहीं शुभेंदु सरकार ने सीधे जनता के द्वार जाने का फैसला किया है। यह विशेष आयोग आगामी 1 जून से राज्य के अलग-अलग थानों में जाकर ‘जनसुनवाई’ करेगा, जहाँ पीड़ित महिलाएँ बिना किसी डर के सीधे अपनी शिकायतें दर्ज करवा सकेंगी।

1 जून से पहले दमयंती सेन की देखरेख में अधिकारियों की टीम पुराने सभी लंबित मामलों का डेटा जुटा रही है। सालों तक हाशिए पर रहने के बाद दमयंती सेन की यह वापसी बंगाल की कानून-व्यवस्था के लिए एक नया सवेरा है और मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की न्यायप्रिय सोच का सबसे बड़ा प्रमाण है।

खरीफ की फसल के लिए UP की तैयारी पूरी, अभी से खाद-बीज-सिंचाई के लिए निगरानी तंत्र तैयार: जानें किसान हित में क्या-क्या कदम उठा रही योगी सरकार

उत्तर प्रदेश भारत का सबसे बड़ा कृषि प्रधान राज्य है, जहाँ करोड़ों किसान प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से कृषि पर निर्भर हैं। राज्य की अर्थव्यवस्था में कृषि का महत्वपूर्ण योगदान है। हाल के वर्षों में उत्तर प्रदेश सरकार ने किसानों की आय बढ़ाने, कृषि उत्पादन को स्थिर रखने तथा खेती को अधिक लाभकारी बनाने के लिए अनेक ठोस कदम उठाए हैं।

खासतौर पर उर्वरकों की उपलब्धता, उनकी आपूर्ति व्यवस्था, कालाबाजारी पर नियंत्रण और किसानों तक समय पर खाद पहुँचाने के क्षेत्र में योगी आदित्यनाथ सरकार की कार्यशैली उल्लेखनीय रही है।

उत्तर प्रदेश सरकार ने किसानों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए खाद और उर्वरकों की आपूर्ति को सर्वोच्च प्राथमिकता दी है। प्रदेश में यूरिया, डीएपी, एनपीके और एमओपी जैसे प्रमुख उर्वरकों का पर्याप्त भंडारण किया गया है।

राज्य सरकार ने केंद्र सरकार के रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय के साथ मिलकर किसानों तक समय पर खाद पहुँचाने की प्रभावी व्यवस्था विकसित की है। यूपी सरकार का कहना है कि प्रदेश में लाखों मीट्रिक टन उर्वरक उपलब्ध हैं और लगातार अतिरिक्त आवंटन भी कराया जा रहा है।

किसानों को समय पर खाद उपलब्ध कराने की व्यवस्था

उत्तर प्रदेश सरकार ने खरीफ और रबी सीजन में खाद की कमी न होने देने के लिए बड़े स्तर पर भंडारण किए। एक रिपोर्ट के अनुसार, प्रदेश सरकार ने लगभग 4.8 मिलियन टन उर्वरकों का भंडार तैयार किया, जो कुल मांग का लगभग 84 प्रतिशत था। राज्य सरकार ने केवल घोषणाएँ नहीं कीं, बल्कि जमीनी स्तर पर खाद उपलब्ध कराने की दिशा में प्रभावी प्रशासनिक प्रबंधन भी किया।

खेती में समय पर खाद की उपलब्धता अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। यदि बुआई या सिंचाई के समय किसान को खाद नहीं मिले तो इसका सीधा असर फसल पर पड़ता है। इसे ध्यान में रखते हुए उत्तर प्रदेश सरकार ने बहुस्तरीय निगरानी तंत्र विकसित किया है।

दैनिक जागरण की एक रिपोर्ट के अनुसार कृषि विभाग ने ये भी स्पष्ट किया है कि प्रदेश के सभी जिलों में पर्याप्त उर्वरक उपलब्ध हैं तथा किसानों को अफवाहों पर ध्यान नहीं देना चाहिए। इस प्रशासनिक पारदर्शिता ने सरकार और किसानों के बीच विश्वास बढ़ाने का काम किया है।

कालाबाजारी और जमाखोरी पर सख्त कार्रवाई

देश के कई राज्यों में खाद की कालाबाजारी और कुछ अन्य परेशानियों से जूझ रहे किसानों के लिए बड़ी समस्या रही है। लेकिन उत्तर प्रदेश सरकार ने इस चुनौती से निपटने के लिए कठोर कदम उठाए हैं।

सरकार ने उर्वरकों की टैगिंग एवं पॉइंट ऑफ सेल (PoS) मशीनों के माध्यम से बिक्री को अनिवार्य बनाया है। किसानों के पहचान पत्र के माध्यम से खाद वितरण की व्यवस्था लागू की गई है। इससे यह सुनिश्चित हुआ कि अनुदानित उर्वरक वास्तविक किसानों तक ही पहुँचे।

सरकार ने उर्वरकों की अनधिकृत बिक्री, जमाखोरी तथा कालाबाजारी पर उर्वरक नियंत्रण आदेश एवं आवश्यक वस्तु अधिनियम-1955 के अंतर्गत कार्रवाई सुनिश्चित की है।

एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार योगी सरकार ने स्पष्ट निर्देश दिए कि किसानों को किसी प्रकार की परेशानी नहीं होनी चाहिए और उर्वरकों की कालाबाजारी करने वालों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की जाएगी। इसके जरिए किसानों के हितों की रक्षा के लिए ये कदम अत्यंत महत्वपूर्ण साबित हुआ।

वैज्ञानिक खेती और संतुलित उर्वरक उपयोग को बढ़ावा

सरकार ने किसानों से सही मात्रा में खाद के उपयोग की अपील की है। कृषि वैज्ञानिकों द्वारा सुझाई गई मात्रा के अनुसार ही उर्वरक खरीदने और प्रयोग करने का निर्देश दिया गया है।

यह पहल कई तरह से महत्वपूर्ण है। पहली इससे मिट्टी की उर्वरता बनी रहती है। इसके अलावा किसानों के फसल लगाने की लागत में कमी आती है। सही मात्रा में खाद के उपयोग से उत्पादन की गुणवत्ता बढ़ती है और सबसे अहम पहलू येहा कि इससे पर्यावरण संरक्षण भी होता है।

उत्तर प्रदेश सरकार लगातार ‘संतुलित उर्वरक उपयोग’ की अवधारणा को बढ़ावा दे रही है। कृषि विभाग किसानों को जागरूक करने के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम, किसान गोष्ठियाँ और कृषि मेलों का आयोजन भी कर रहा है।

कृषि क्षेत्र में उत्तर प्रदेश की बढ़ती प्रगति

उत्तर प्रदेश ने हाल के वर्षों में कृषि क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति दर्ज की है। आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार राज्य की अर्थव्यवस्था में कृषि और उससे जुड़े क्षेत्रों का योगदान बढ़कर लगभग 24.9 प्रतिशत तक पहुँच गया है।

यह उपलब्धि कई कारणों से संभव हुई है। समय पर खाद और बीज की उपलब्धता मिली है। इसके अलावा सिंचाई व्यवस्था को बेहतर किया गया है। सरकार ने फसल विविधीकरण के लिए किसानों को प्रोत्साहित किया है। कृषि तकनीक का विस्तार लगातार किया जा रहा है। और सरकारी योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित किया जा रहा है।

एक रिपोर्ट कहती है कि उत्तर प्रदेश की कृषि वृद्धि दर 17.7 प्रतिशत तक पहुँच गई, जो पूर्व वर्षों की तुलना में काफी अधिक है। इससे ये तो साफ है कि योगी सरकार की कृषि नीतियाँ किसानों के हित में सकारात्मक परिणाम दे रही हैं।

कृषि आधुनिकीकरण की दिशा में आगे बढ़ रहा UP

सरकार द्वारा PoS मशीनों से उर्वरक वितरण की व्यवस्था लागू करना एक बड़ा प्रशासनिक सुधार है। इससे कई लाभ हुए। वास्तविक किसानों की पहचान आसान हुई। इससे फर्जी खरीद पर भी रोक लगी। साथ ही खाद की उपलब्धता का असल डेटा मिला और वितरण प्रणाली अधिक पारदर्शी बनी।

उत्तर प्रदेश सरकार केवल खाद वितरण तक सीमित नहीं है, बल्कि कृषि आधुनिकीकरण पर भी विशेष बल दे रही है। आर्थिक सर्वेक्षण में उल्लेख है कि राज्य में सोलर पंपों का विस्तार हुआ है। इसके साथ ही माइक्रो इरिगेशन, सीड पार्क की स्थापना, हाईटेक नर्सरी, कृषि प्रसंस्करण इकाइयों के विकास के साथ कोल्ड स्टोरेज की क्षमता भी बढ़ाई जा रही है। इन पहलों से कृषि को अधिक लाभकारी और टिकाऊ बनाने में सहायता मिल रही है।

योगी सरकार की सक्रियता के कारण किसानों में यह विश्वास मजबूत हुआ है कि सरकार उनकी समस्याओं के समाधान के लिए तत्पर है। खाद संकट की आशंकाओं के बीच भी राज्य सरकार ने नियमित प्रेस विज्ञप्तियों और प्रशासनिक निर्देशों के माध्यम से किसानों को भरोसा दिलाया कि प्रदेश में पर्याप्त खाद और उर्वरक उपलब्ध हैं।

चुनौतियाँ अभी और भी हैं

हालाँकि उत्तर प्रदेश सरकार ने उर्वरक प्रबंधन में उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की है, फिर भी कुछ चुनौतियाँ बनी हुई हैं। बढ़ती जनसंख्या के कारण खाद की माँग लगातार बढ़ रही है। इसके अलावा किसानी के कुछ क्षेत्रों में अचानक खाद की माँग बढ़ने लगी है।

इनके अलावा कुछ निजी विक्रेताओं द्वारा भी अनियमितताएँ भी बरती जा रही हैं जिस पर सरकार काम कर रही है। इन सभी के साथ-साथ किसानों में वैज्ञानिक खेती के प्रति जागरूकता कम है। इसे बढ़ाए जाने की जरूरत है।

इन चुनौतियों से निपटने के लिए डिजिटल निगरानी प्रणाली को और मजबूत करने की जरूरत होगी। ब्लॉक स्तर पर उर्वरक नियंत्रण कक्ष बनाने, किसानों को मृदा स्वास्थ्य कार्ड से जोड़ने, जैविक एवं प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने और कृषि विस्तार सेवाओं को आगे बढ़ाने जैसे कदम किसानों के लिए प्रभावी हो सकते हैं।

योगी आदित्यनाथ सरकार ने यह सिद्ध किया है कि यदि प्रशासनिक इच्छाशक्ति मजबूत हो तो किसानों को समय पर संसाधन उपलब्ध कराए जा सकते हैं। कृषि क्षेत्र में उत्तर प्रदेश की बढ़ती विकास दर, उत्पादन में वृद्धि और किसानों के बढ़ते विश्वास से यह स्पष्ट है कि राज्य सरकार की नीतियाँ सकारात्मक परिणाम दे रही हैं।

आने वाले समय में यदि सरकार इसी प्रकार कृषि अवसंरचना, तकनीकी नवाचार और किसान हितैषी योजनाओं पर कार्य करती रही, तो उत्तर प्रदेश न केवल देश का सबसे बड़ा कृषि राज्य रहेगा, बल्कि आधुनिक एवं टिकाऊ कृषि मॉडल के रूप में भी स्थापित होगा।