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नेताओं को मिल रहा नोटिस, बैठकों से MLA हो रहे गायब, पार्षद ग्रुप बनाकर दे रहे इस्तीफा: क्या बंगाल में हार के बाद टूटने लगी TMC?

पश्चिम बंगाल के हालिया विधानसभा चुनाव में बीजेपी की बंपर जीत के बाद पार्टी का जोश एकदम हाई है तो वहीं ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) के भीतर कलह लगातार बढ़ती जा रही है। बीजेपी के हाथों मिली करारी हार के बाद ऐसा साफ तौर पर लग रहा है कि TMC के भीतर सबकुछ सामान्य नहीं है।

राजनीति में हार सीटों की संख्या तो घटाती ही है, साथ ही साथ वो नेतृत्व और कार्यकर्ताओं के मनोबल की भी परीक्षा लेती है। बंगाल में यही होता दिखाई दे रहा है। TMC के भीतर का असंतोष अब धीरे-धीरे पार्टी से बाहर निकल सतह पर आने लगा है। चुनाव के बाद की घटनाओं के अगर डॉट्स कनेक्ट करने की कोशिश करें तो लग रहा है कि कहीं ममता बनर्जी की पार्टी उसी दौर में तो नहीं पहुँच रही जहाँ यह चुनावी झटका TMC के संगठन के लिए संकट में बदलने लगा है।

विधानसभा चुनाव के बाद जब TMC ने नई सरकार के खिलाफ चुनाव बाद हिंसा, बुलडोजर कार्रवाई और फुटपाथ दुकानदारों के मुद्दे पर विधानसभा परिसर में विरोध प्रदर्शन किया तो पार्टी के भीतर असहज तस्वीर सामने आई। 80 विधायकों वाली पार्टी के धरने में केवल 36 विधायक पहुँचे। यानी आधे से भी कम।

यह केवल कुछ विधायकों की गैर-मौजूदगी का मामला नहीं है बल्कि एक राजनीतिक संदेश भी है। जब कोई पार्टी विपक्ष में जाती है तो उसका पहला बड़ा प्रदर्शन उसके मनोबल और एकजुटता की परीक्षा माना जाता है। अगर उसी मंच पर बड़ी संख्या में विधायक गायब दिखें तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या पार्टी के भीतर असंतोष अब खुलकर सामने आने लगा है।

यह कोई एक दिन की घटना नहीं थी। इससे पहले 19 मई को कालीघाट में ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी की मौजूदगी में हुई अहम बैठक में भी करीब 15 विधायक नहीं पहुँचे थे। और जो पहुंचे, उनमें भी कई नेताओं ने बंद कमरे की राजनीति पर सवाल उठा दिए। रिपोर्ट्स बताती हैं कि बैठक के दौरान कुछ विधायकों ने साफ कहा कि सिर्फ बैठकों और रणनीति चर्चा से जनता का भरोसा वापस नहीं आएगा, जमीनी स्तर पर काम और आत्ममंथन की जरूरत है।

सबसे दिलचस्प बात यह रही कि कोलकाता और हावड़ा के कुछ विधायकों ने जहाँगीर खान के चुनाव से हटने को लेकर सीधे शीर्ष नेतृत्व से सवाल पूछे। मतदान से महज दो दिन पहले उम्मीदवार का मैदान छोड़ देना अपने आप में बड़ा मामला था लेकिन पार्टी नेतृत्व ने कोई कार्रवाई ना करके इसे और मुश्किल बना दिया। क्योंकि फालता विधानसभा सीट अभिषेक बनर्जी के डायमंड हार्बर लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आती है, इसलिए इन सवालों को अभिषेक के नेतृत्व पर सवाल के तौर पर भी देखा गया।

लंबे समय से पार्टी में यह धारणा बनाई गई थी कि अभिषेक बनर्जी संगठन के भविष्य हैं। लेकिन चुनावी हार के बाद पहली बार उनके फैसलों और नेतृत्व क्षमता पर पार्टी के भीतर ही चर्चा शुरू हुई है। यह चर्चा कोई 1-2 दिन की नहीं है, यह हार के तुरंत बाद ही शुरू हो गई थी। कथित पार्टी विरोध बयानों के लिए TMC ने अपने ही 5 प्रवक्ताओं को कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया।

यह कदम अपने आप में बताता है कि पार्टी नेतृत्व भीतर उठ रही आवाजों को लेकर असहज है। किसी भी राजनीतिक दल में जब हार के बाद सवाल उठते हैं और उनका जवाब संवाद से ज्यादा कार्रवाई से दिया जाने लगे तो यह अक्सर अंदरूनी बेचैनी का संकेत माना जाता है।

अगर मामला केवल विधायकों की नाराजगी तक सीमित होता, तब भी इसे सामान्य चुनावी प्रतिक्रिया कहा जा सकता था। लेकिन इस मामले में TMC की टेंशन बढ़ाई है सबसे निचले और महत्वपूर्ण ईकाई स्थानीय निकाय ने। उत्तर 24 परगना की कांचरापाड़ा नगरपालिका में 24 में से 15 पार्षदों का सामूहिक इस्तीफा और हलीशहर नगरपालिका में 23 में से 16 पार्षदों ने सामूहिक तौर पर पद छोड़ दिया है।

राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी तेज है कि बीजेपी की बंगाल में मजबूत होती स्थिति इस असंतोष को और हवा दे सकती है। बंगाल की राजनीति का इतिहास बताता है कि यहाँ सत्ता बदलने के बाद दल-बदल की राजनीति भी तेज हो जाती है। जिस तरह कभी वाम दलों के नेताओं ने TMC का रुख किया था, उसी तरह अब TMC के भीतर भी राजनीतिक भविष्य को लेकर नई महत्वकाँक्षाएँ शुरू होना असंभव नहीं है।

हालाँकि, हम यह आज ही नहीं कर सकते कि TMC कल ही टूटने जा रही है। लेकिन यह भी सच है कि राजनीति में संकट अचानक नहीं आता, उसके संकेत पहले दिखने लगते हैं। कभी कम होती बैठकों की उपस्थिति, कभी नेतृत्व पर उठते सवाल, कभी सामूहिक इस्तीफे और कभी पार्टी प्रवक्ताओं पर अनुशासनात्मक कार्रवाई ये सब संकेत अक्सर बड़े राजनीतिक बदलावों से पहले दिखाई देते हैं।

बंगाल की राजनीति फिलहाल एक नए मोड़ पर खड़ी दिखाई देती है। बीजेपी अपनी ऐतिहासिक जीत के बाद आत्मविश्वास में है जबकि TMC आत्ममंथन और असंतोष के बीच झूलती दिख रही है। आने वाले महीनों में यह साफ होगा कि यह केवल हार के बाद का अस्थायी झटका है या फिर बंगाल की राजनीति में एक बड़े शक्ति परिवर्तन की शुरुआत।

1877 में इससे मरे थे 5 करोड़ लोग, लेकिन 2026 वाला ‘Super El Nino’ उससे भी खतरनाक: पढ़ें- कैसे आग उगलता सूरज इस साल को बना सकता है महाविनाशक

दुनिया एक बार फिर ऐसे जलवायु संकट की ओर बढ़ती दिखाई दे रही है, जिसकी तुलना इतिहास की सबसे भयावह प्राकृतिक आपदाओं में से एक से की जा रही है। वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि आने वाला ‘सुपर एल नीनो’ 1877-78 के उस ऐतिहासिक एल नीनो से भी अधिक शक्तिशाली हो सकता है, जो दुनिया भर में भयानक सूखा, अकाल, बीमारियाँ और करोड़ों लोगों की मौत का कारण बना था।

इतिहासकारों के अनुसार, 1877-78 के सुपर एल नीनो के कारण फैले वैश्विक अकाल और बीमारियों में करीब 5 करोड़ लोगों की मौत हुई थी। भारत, चीन, ब्राजील और अफ्रीका के कई हिस्सों में लोग भूख, सूखे और महामारी से मरने लगे थे। उस समय यह आँकड़ा दुनिया की कुल आबादी का लगभग 3 से 4 प्रतिशत था।

अगर आज वैसी तबाही दोहराई जाए तो इसका असर 25 करोड़ से अधिक लोगों पर पड़ सकता है। हालाँकि वैज्ञानिक यह भी कहते हैं कि आज दुनिया 19वीं सदी की तुलना में कहीं अधिक तैयार है, लेकिन बढ़ती ग्लोबल वार्मिंग ने खतरे को और गंभीर बना दिया है।

ऐसे में सवाल उठ रहा है कि आखिर एल नीनो क्या है, 1877 में क्या हुआ था और 2026 का संभावित सुपर एल नीनो दुनिया के लिए कितना बड़ा खतरा बन सकता है।

क्या होता है एल नीनो और क्यों माना जाता है खतरनाक?

एल नीनो एक प्राकृतिक जलवायु चक्र है, जो प्रशांत महासागर के भूमध्यरेखीय हिस्से में समुद्री सतह के तापमान में असामान्य बढ़ोतरी से जुड़ा होता है। यह El Nino Southern Oscillation यानी ENSO नामक जलवायु प्रणाली का हिस्सा है।

सामान्य परिस्थितियों में प्रशांत महासागर की हवाएँ पूर्व से पश्चिम की ओर बहती हैं, लेकिन एल नीनो के दौरान ये हवाएँ कमजोर पड़ जाती हैं। इससे समुद्र की गर्म सतह वाला पानी पूर्वी और मध्य प्रशांत क्षेत्र में फैलने लगता है।

इस गर्मी का असर केवल समुद्र तक सीमित नहीं रहता बल्कि पूरी दुनिया के मौसम पैटर्न को बदल देता है। कहीं भारी बारिश और बाढ़ आती है, तो कहीं सूखा और जंगलों में आग लगने की घटनाएँ बढ़ जाती हैं। वैश्विक तापमान भी सामान्य से अधिक हो जाता है।

वैज्ञानिकों के अनुसार, जब समुद्री सतह का तापमान सामान्य से 2 डिग्री सेल्सियस से अधिक बढ़ जाता है, तो इसे आम बोलचाल में ‘सुपर एल नीनो’ कहा जाता है। हालाँकि वैज्ञानिक आधिकारिक रूप से इस शब्द का कम इस्तेमाल करते हैं।

1877 का सुपर एल नीनो क्यों बना मानव इतिहास की बड़ी त्रासदी?

1877-78 का एल नीनो इतिहास के सबसे विनाशकारी जलवायु संकटों में गिना जाता है। जलवायु पुनर्निर्माण अध्ययनों के अनुसार, उस समय प्रशांत महासागर के एक अहम हिस्से में समुद्री तापमान लगभग 2.7 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ गया था। इसके बाद दुनिया भर में बारिश का संतुलन बिगड़ गया।

भारत उन देशों में शामिल था, जहाँ इसका सबसे विनाशकारी असर पड़ा। मानसून लगभग गायब हो गया, फसलें बर्बाद हो गईं और भयंकर अकाल फैल गया। उत्तरी चीन में भी लंबे सूखे ने खेती को तबाह कर दिया। ब्राजील में नदियाँ सूख गईं, जबकि अफ्रीका, दक्षिण-पूर्व एशिया और ऑस्ट्रेलिया में भीषण सूखा और जंगलों में आग की घटनाएँ बढ़ीं।

सूखे और फसल बर्बादी के कारण भोजन की भारी कमी हो गई। इसके बाद कमजोर आबादी में हैजा, चेचक, पेचिश, प्लेग और मलेरिया जैसी बीमारियाँ फैल गईं। इतिहासकारों का मानना है कि इस आपदा ने कई समाजों को कमजोर किया, बड़े पैमाने पर पलायन बढ़ाया और कई क्षेत्रों में औपनिवेशिक नियंत्रण को और मजबूत बना दिया।

वॉशिंगटन स्टेट यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर दीप्ति सिंह के अनुसार, अकाल केवल सूखे की वजह से नहीं आया था। उस समय उपनिवेशवादी नीतियों ने स्थानीय खाद्य और सामाजिक व्यवस्थाओं को कमजोर कर दिया था, जिससे लोग जलवायु संकट का सामना नहीं कर सके।

2026 का सुपर एल नीनो कितना शक्तिशाली हो सकता है?

वैज्ञानिकों के ताजा अनुमान चिंता बढ़ाने वाले हैं। अमेरिकी एजेंसी NOAA, यूरोपीय मौसम केंद्र ECMWF और विश्व मौसम संगठन (WMO) सहित कई संस्थानों का कहना है कि प्रशांत महासागर का तापमान इस बार सामान्य से 3 डिग्री सेल्सियस तक ऊपर जा सकता है। यदि ऐसा होता है तो यह 1877 के सुपर एल नीनो से भी अधिक शक्तिशाली साबित हो सकता है।

NOAA के अनुसार, इस बात की लगभग 25 प्रतिशत संभावना है कि यह ‘बहुत मजबूत’ एल नीनो बने। वहीं कुछ मॉडल्स यह भी संकेत दे रहे हैं कि इसका प्रभाव 2026 के अंत से 2027 की शुरुआत तक जारी रह सकता है।

जलवायु वैज्ञानिक कैथरीन हेहो ने चेतावनी दी है कि इसका मानव समाज और मानव कल्याण पर गहरा असर पड़ सकता है। वैज्ञानिक पॉल राउंडी ने इसे 1877 के बाद सबसे बड़ा एल नीनो बताया है।

ग्लोबल वार्मिंग क्यों बढ़ा रही खतरा?

वैज्ञानिकों की सबसे बड़ी चिंता यह है कि 1877 के मुकाबले आज पृथ्वी पहले से लगभग 1.4 डिग्री सेल्सियस अधिक गर्म हो चुकी है। यानी एल नीनो का प्रभाव अब और अधिक खतरनाक हो सकता है।

दीप्ति सिंह कहती हैं कि 1870 के दशक जैसे कई वर्षों तक चलने वाले सूखे दोबारा हो सकते हैं, लेकिन फर्क यह है कि अब महासागर और वातावरण पहले से ज्यादा गर्म हैं। इसका मतलब है कि गर्मी की लहरें, सूखा, जंगलों की आग और जल संकट कहीं अधिक गंभीर हो सकते हैं।

2023-24 का एल नीनो पहले ही दुनिया को रिकॉर्ड गर्मी दिखा चुका है। विश्व मौसम संगठन के अनुसार, 2024 पृथ्वी का सबसे गर्म वर्ष रिकॉर्ड किया गया। ऐसे में नया सुपर एल नीनो तापमान को और ऊपर धकेल सकता है।

दुनिया के किन हिस्सों पर पड़ सकता है असर?

एल नीनो का असर पूरी दुनिया में अलग-अलग रूप में दिखाई देता है। भारत, इंडोनेशिया और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में मानसून कमजोर पड़ सकता है और सूखे का खतरा बढ़ सकता है। दक्षिण अमेरिका और प्रशांत क्षेत्र के कुछ हिस्सों में भारी बारिश और बाढ़ आ सकती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि लंबे समय तक सूखा पड़ा तो खाद्य उत्पादन प्रभावित होगा। गेहूँ, चावल, मक्का और सोयाबीन जैसी फसलों की पैदावार घट सकती है। इससे वैश्विक खाद्य कीमतें बढ़ सकती हैं और गरीब देशों में खाद्य संकट गहरा सकता है।

जल संकट, बिजली उत्पादन और स्वास्थ्य सेवाओं पर भी असर पड़ने की आशंका है। कमजोर अर्थव्यवस्थाओं वाले देशों में यह संकट सामाजिक और राजनीतिक अस्थिरता भी पैदा कर सकता है।

क्या आज दुनिया पहले से ज्यादा तैयार है?

1877 के मुकाबले आज दुनिया के पास बेहतर तकनीक और वैज्ञानिक जानकारी मौजूद है। उस समय यह समझ ही नहीं थी कि एल नीनो क्या होता है और इसके आने का अनुमान कैसे लगाया जाए। लेकिन 1982-83 और 1997-98 के सुपर एल नीनो के बाद जलवायु विज्ञान में काफी प्रगति हुई।

आज प्रशांत महासागर में हजारों सेंसर, उपग्रह और समुद्री उपकरण लगातार तापमान, हवाओं और नमी पर नजर रखते हैं। NOAA, WMO और ECMWF जैसी एजेंसियाँ पहले से चेतावनी जारी कर सकती हैं। इससे सरकारों को खाद्य भंडारण, जल प्रबंधन और आपदा तैयारियों का समय मिल जाता है।

वैज्ञानिक केविन ट्रेंबरथ के अनुसार, अब दुनिया रियल टाइम में एल नीनो की गतिविधियों पर नजर रख सकती है, जो 19वीं सदी में संभव नहीं था।

फिर भी क्यों बनी हुई है चिंता?

विशेषज्ञ मानते हैं कि 1877 जैसी करोड़ों मौतों वाली त्रासदी दोहराने की संभावना कम है, लेकिन खतरा पूरी तरह टला नहीं है। आज दुनिया की आबादी कहीं ज्यादा है और वैश्विक अर्थव्यवस्था आपस में गहराई से जुड़ी हुई है। किसी एक क्षेत्र में फसल खराब होने का असर पूरी दुनिया की खाद्य और आर्थिक व्यवस्था पर पड़ सकता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि सुपर एल नीनो के कारण कई देशों में एक साथ सूखा और गर्मी बढ़ती है, तो इसका असर खाद्य सुरक्षा, जल संसाधनों और वैश्विक बाजारों पर दिखाई देगा। सबसे अधिक खतरा गरीब और जलवायु संकट से पहले से जूझ रहे देशों को होगा।

ऐसे में वैज्ञानिकों का मानना है कि आने वाले महीनों में अंतरराष्ट्रीय सहयोग, मजबूत चेतावनी प्रणाली और समय रहते तैयारी ही दुनिया को संभावित जलवायु संकट से बचाने का सबसे बड़ा हथियार साबित हो सकती है।

जिनके राज में नेताओं की भैंस ढूँढती थी पुलिस, वो अखिलेश दे रहे कानून-व्यवस्था पर ज्ञान: पढ़िए- कैसे सपा शासन में बाहुबलियों से लेकर अपराधियों तक को मिलता रहा संरक्षण

उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने हाल ही में सोशल मीडिया पर यूपी की कानून व्यवस्था को लेकर सवाल उठाए। सपा प्रमुख ने यूपी पुलिस पर गंभीर आरोप लगाते हुए उसे ‘भ्रष्टपुतली’ तक कह दिया। अखिलेश का आरोप है कि प्रदेश की पुलिस बीजेपी सरकार के इशारे पर काम कर रही है।

हालाँकि अखिलेश यादव के इन आरोपों के बीच समाजवादी पार्टी की सरकार के वो पुराने किस्से भी फिर चर्चा में आ गए हैं, जब यूपी पुलिस पर माफियाओं, बाहुबलियों और रसूखदार नेताओं के दबाव में काम करने के आरोप लगते थे। सोशल मीडिया पर आज भी ऐसे कई मामले वायरल होते रहते हैं।

जब आजम खान की भैंस खोजने में जुट गई थी पूरी पुलिस

ये मामला साल 2014 का है। प्रदेश में अखिलेश यादव की ही सरकार थी और आजम खान कैबिनेट मंत्री थे। रामपुर स्थित उनके फॉर्महाउस से 7 भैंसें चोरी हो गईं थी। इसके बाद पुलिस प्रशासन पूरी ताकत के साथ भैंसों की तलाश में जुट गया।

हालात ये थे कि बड़े-बड़े अधिकारी मौके पर पहुँच गए। क्राइम ब्रांच को लगाया गया। डॉग स्क्वॉड तक मैदान में उतार दिया गया। कई थानों की पुलिस भैंसें ढूंढने में लगी रही। इस घटना ने पूरे देश में सुर्खियां बटोरीं।

विपक्ष ने सवाल उठाया कि आम आदमी की एफआईआर पर सुस्ती दिखाने वाली पुलिस आखिर एक मंत्री की भैंसों के लिए इतनी सक्रिय क्यों हो गई?

2005: जब दो विधायकों की हत्या से दहल गया था यूपी

सपा सरकार पर कानून व्यवस्था को लेकर सबसे बड़े सवाल साल 2005 में उठे थे। उस समय प्रदेश में मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री थे। उसी साल दो बड़े राजनीतिक हत्याकांड हुए। BSP विधायक राजू पाल और BJP विधायक कृष्णानंद राय की हत्या।

दोनों मामलों में प्रदेश के बड़े बाहुबली अतीक अहमद और मुख्तार अंसारी के नाम सामने आए। विपक्ष ने आरोप लगाया कि इन माफियाओं को राजनीतिक संरक्षण मिला हुआ था।

बीच सड़क पर गोलियों से भून दिए गए थे राजू पाल

5 जनवरी 2005 को प्रयागराज में बसपा विधायक राजू पाल की दिनदहाड़े हत्या कर दी गई थी। हमलावरों ने उनकी गाड़ी को चौराहे पर घेर लिया और ताबड़तोड़ फायरिंग शुरू कर दी।

हमला इतना खौफनाक था और अपराधियों के हौसले इतने बुलंद थे कि जब घायल राजू पाल को ऑटो से अस्पताल ले जाया जा रहा था, तब भी बदमाश पीछा करते रहे और गोलीबारी करते रहे।

इस हमले में राजू पाल के साथ देवी दयाल और संदीप यादव की भी मौत हुई। इस हत्याकांड का आरोप अतीक अहमद और उसके गुर्गों पर लगा। यही वो अतीक अहमद था जिसकी तस्वीरें मुलायम सिंह यादव के साथ वायरल हुईं. जिसमें मुलायम सिंह मंच पर अतीक के कुत्तों के साथ हाथ मिलाते नजर आ रहे थे।

कृष्णानंद राय हत्याकांड ने पूरे पूर्वांचल को हिला दिया

29 नवंबर 2005 को गाजीपुर में BJP विधायक कृष्णानंद राय की हत्या कर दी गई। वह एक कार्यक्रम से लौट रहे थे, तभी रास्ते में घात लगाकर उन पर ऑटोमैटिक हथियारों से हमला किया गया। रिपोर्ट्स के मुताबिक 500 से ज्यादा गोलियाँ चलाई गईं। इस हमले में कृष्णानंद राय समेत 7 लोगों की मौत हुई थी।

इस हत्याकांड में मुख्तार अंसारी और मुन्ना बजरंगी गैंग का नाम सामने आया। हैरानी की बात ये है कि उस समय मुख्तार अंसारी जेल में बंद था। लेकिन जेल के भीतर ही रहते हुए उसने इस बड़े हत्याकांड को अंजाम दिया था।

बताया जाता है कि जब कृष्णानंद राय की हत्या की खबर मुख्तार को जेल में मिली तो वह ठहाके मार रहा था और कह रहा था कि चोटी काट दी गई। दरअसल, अपराधियों ने हत्या के बाद कृष्णानंद राय की चोटी भी काट ली थी।

सपा सरकार में जेल सजा या आलीशान अड्डा?

सपा सरकार में मुख्तार अंसारी के जेल में अय्याशी के किस्से आज भी सुर्खियों में रहते हैं जो बताते हैं कि सपा सरकार में अपराधियों को कैसे संरक्षण मिलता था। मुख्तार अंसारी ने अपनी पसंद की मछली खाने के लिए जेल के भीतर ही तालाब खुदवा लिया था।

यही नहीं बड़े-बड़े अधिकारी उसके साथ जेल में बैडमिंटन खेलने आते थे। मुख्तार को इस कदर संरक्षण था कि वो जब मन करे जेल से बाहर आकर घूमता था और फिर जेल में चला जाता था।

जब पुलिस अफसर पर ही चलवा दी गई गोलियाँ

मुख्तार का एक किस्सा मशहूर है जब 1996 में मुख्तार अंसारी ने एक पुलिस अधिकारी उदय शंकर जायसवाल और उनकी टीम पर दिनदहाड़े गोलियाँ बरसाईं थीं। उसने हमला सिर्फ इसलिए किया था क्योंकि पुलिस वाहनों की चेकिंग कर रही थी। तब उसने पुलिस को ललकारते हुए कहा था कि किसकी औकात है जो मुख्तार अंसारी की गाड़ी चेक करे।

वहीं, अतीक ने तो तत्कालीन आईजी जोन आरके चतुर्वेदी तक को धमका दिया था। इस बात का जिक्र खुद आरके चतुर्वेदी ने किया था। उन्होंने एक मीडिया इंटरव्यू में बताया था कि कैसे साल 2016 में जब सपा की सरकार थी तो अतीक एक दिन मेरे दफ्तर आ गया था और मुझे धमकाया था। बाद में उसने अगले ही दिन मेरा ट्रांसफर करा दिया था।

सपा सरकार में यूपी पुलिस के हर थाने को ये आदेश था कि किसी भी मामले में एक जाति विशेष और धर्म विशेष लोगों के खिलाफ मुकदमा नहीं लिखा जाएगा। कई राजनैतिक पार्टियाँ इस बात को लेकर सपा को घेरती भी रही हैं।

“ये सब तनखैया हैं…” वाला बयान भी रहा विवादों में

ये बात इसलिए भी मौजूं हैं क्योंकि हाल ही में कोर्ट ने सपा सरकार में मंत्री रहे आजम खान को एक मामले में सजा सुनाई है। आजम खान ने एक चुनावी सभा में कलेक्टर को धमकी देते हुए मंच से कहा था कि पुलिस और कलेक्टर-फलेक्टर से डरने की जरूरत नहीं। ये सब तनखैया हैं.. इनसे जूता साफ कराऊँगा।

सोचिए अगर सपा का इतना कद्दावर नेता इस तरह का बयान मंच से देता है तो फिर आप अंदाजा लगा सकते हैं कि पुलिस का क्या हाल सपा सरकार में रहा होगा।

अब योगी सरकार पर हमला, तो पुराने सवाल भी लौटे

अब जब अखिलेश यादव यूपी पुलिस और कानून व्यवस्था को लेकर योगी सरकार पर सवाल उठा रहे हैं। तो राजनीति में उनके विरोधी सपा शासनकाल की उन्हीं पुरानी घटनाओं को याद दिला रहे हैं, जब यूपी में बाहुबलियों और माफियाओं के प्रभाव को लेकर लगातार सवाल उठते थे।

यही वजह है कि जैसे ही अखिलेश यादव पुलिस पर हमला बोलते हैं, सोशल मीडिया पर ‘भैंस कांड’ से लेकर राजू पाल, कृ्ष्णानंद राय तक के पुराने मामले फिर वायरल होने लगते हैं।

बांद्रा के गरीब नगर में चला बुलडोजर, फिर चर्चा में आए सुनील दत्त: पढ़ें- जब अभिनेता और कॉन्ग्रेस नेता पर लगे थे अवैध बस्तियों को संरक्षण देने के आरोप

महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई के बांद्रा ईस्ट स्थित गरीब नगर में बुधवार (20 मई 2026) को अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई के दौरान हिंसक झड़पें देखने को मिलीं। यह घनी आबादी वाला और मुस्लिम बहुल इलाका है। यह कार्रवाई बॉम्बे हाई कोर्ट के 29 अप्रैल के आदेश के बाद की जा रही है। निर्मल नगर पुलिस स्टेशन क्षेत्र में पश्चिम रेलवे की एंटी-एन्क्रोचमेंट टीम पर ने पथराव भी किया गया।

स्थानीय लोगों ने पुलिस, रेलवे कर्मचारियों और अन्य अधिकारियों के खिलाफ नारेबाजी की। उन पर बर्तन, पानी से भरी बाल्टियां, बोतलें और अन्य सामान भी फेंके गए। हालात बिगड़ने पर पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़ा और भीड़ को तितर-बितर करने के लिए कई लोगों को हिरासत में लिया गया जिनमें महिलाएँ भी शामिल थीं। इस हमले में 7 पुलिसकर्मी घायल हुए हैं जबकि 10 आरोपितों को गिरफ्तार किया गया है। मामले में FIR दर्ज कर ली गई है और आरोपितों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की चेतावनी दी गई है।

अब तक अतिक्रमण हटाने का करीब 60% काम पूरा हो चुका है। लगभग 300 घरों और अन्य अवैध निर्माणों को हटाया गया है जिनमें बांद्रा ईस्ट स्टेशन के पास स्थित एक अवैध मस्जिद भी शामिल है। तय समय में कार्रवाई पूरी करने के लिए मशीनों की संख्या भी बढ़ा दी गई है। इस अभियान के लिए करीब 1,200 सुरक्षाकर्मियों और कर्मचारियों को तैनात किया गया है।

एक प्रत्यक्षदर्शी के अनुसार, मस्जिद का एक हिस्सा हटाए जाने के बाद स्थिति बिगड़ी। करीब 50-60 लोग विरोध जताने के लिए जमा हुए लेकिन बार-बार समझाने के बावजूद वे शांत नहीं हुए और पथराव शुरू कर दिया जिसके बाद पुलिस को हस्तक्षेप करना पड़ा। इलाके में किसी भी अप्रिय घटना को रोकने के लिए भारी पुलिस बल तैनात किया गया है।

500 अवैध ढांचों को हटाने और करीब 5,300 वर्ग मीटर कब्जाई गई रेलवे जमीन को खाली कराने के लिए 19 मई से 5 दिन का अभियान शुरू किया गया था। रिपोर्ट्स के मुताबिक, बांद्रा ईस्ट की ओर जाने वाले ओवरब्रिज के पास रेलवे लाइन के किनारे 700 से ज्यादा अवैध झुग्गियाँ बनी हुई हैं। इनमें कुछ 5 से 6 मंजिला ऊँची इमारतें भी शामिल हैं।

प्रशासन की ओर से लोगों को पहले ही घर खाली करने की सूचना दे दी गई थी, ताकि कार्रवाई के दौरान किसी तरह की परेशानी न हो। पश्चिम रेलवे के मुख्य जनसंपर्क अधिकारी (CPRO) विनीत अभिषेक ने कहा कि प्रभावित लोगों को जरूरी सुविधाएँ देने की कोशिश की जा रही है। जरूरत पड़ने पर पीने का पानी और खाने के पैकेट भी बाँटे जा रहे हैं।

इस मामले पर भाजपा नेता किरीट सोमैया ने कहा, “मुस्लिम भूमि माफियाओं ने अवैध झुग्गियों पर कब्जा किया था। अब कोर्ट और मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के निर्देश के बाद कार्रवाई शुरू हुई है। मुंबई में ‘लैंड जिहाद’ बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।”

यह कार्रवाई क्यों है रेलवे के लिए जरूरी

इस कार्रवाई के पीछे सिर्फ अवैध निर्माण हटाना ही उद्देश्य नहीं है बल्कि पश्चिम रेलवे के बड़े विस्तार प्रोजेक्ट को भी आगे बढ़ाना है। इस इलाके में रेलवे की क्षमता बढ़ाने, नए स्टेबलिंग लाइन (ट्रेनों को खड़ा करने की जगह), एकीकृत रेलवे कॉम्प्लेक्स और दूसरे इन्फ्रा प्रोजेक्ट शुरू किए जाने हैं। रेलवे की योजना के तहत सांताक्रूज-मुंबई सेंट्रल कॉरिडोर पर 5वीं और 6वीं रेलवे लाइन का विस्तार इसी खाली कराई गई जमीन के जरिए किया जाएगा। करीब 500 मीटर लंबी यह जमीन रेलवे ट्रैक के किनारे स्थित है और रेल भूमि विकास प्राधिकरण (RLDA) की व्यावसायिक योजनाओं के लिए भी बेहद अहम मानी जा रही है।

इस परियोजना के पूरा होने से मुंबई से चलने वाली करीब 50 नई ट्रेनों का संचालन आसान होगा। साथ ही उपनगरीय ट्रेनों में भारी भीड़ कम करने, बांद्रा सबअर्बन स्टेशन और बांद्रा टर्मिनस के बीच बेहतर कनेक्टिविटी बनाने और लोकल व लंबी दूरी की ट्रेनों को अलग-अलग ट्रैक पर चलाने में मदद मिलेगी। रेलवे अधिकारियों का कहना है कि इससे आसपास की रेलवे जमीन का व्यावसायिक विकास भी तेजी से हो सकेगा।

पश्चिम रेलवे के मुख्य जनसंपर्क अधिकारी (CPRO) विनीत अभिषेक ने कहा, “जिस जमीन को खाली कराया गया है, वह बांद्रा इंटीग्रेटेड रेलवे कॉम्प्लेक्स का हिस्सा बनेगी। इस नई खाली हुई जमीन से बांद्रा रेलवे स्टेशन का विस्तार किया जाएगा, जिससे नए ट्रैक पर 12 अतिरिक्त ट्रेनें चलाई जा सकेंगी। इतने बड़े पैमाने पर अतिक्रमण शहर को बंधक बनाकर नहीं रख सकता।”

अधिकारियों के मुताबिक यह कार्रवाई रेलवे ट्रैक की सुरक्षा के लिहाज से भी जरूरी है। रेलवे लाइन के आसपास अतिक्रमण और कूड़ा फेंकने की वजह से ट्रेन सेवाओं पर खतरा बना रहता है। बॉम्बे हाई कोर्ट ने भी अपने आदेश में इन चिंताओं को ध्यान में रखा था।

गरीब नगर और कॉन्ग्रेस नेता सुनील दत्त का पुराना कनेक्शन

दिलचस्प बात यह है कि गरीब नगर के कई अवैध निवासियों ने इस कार्रवाई के दौरान दिवंगत अभिनेता और कॉन्ग्रेस सांसद रहे सुनील दत्त को याद किया। उनका कहना था कि पहले भी ऐसी कार्रवाई हुई थी लेकिन सुनील दत्त ने उसे रुकवा दिया था। एक स्थानीय व्यक्ति ने कहा, “अगर आज सुनील दत्त होते तो कोई हमें यहाँ से हटा नहीं पाता।”

कुछ लोगों ने यह भी कहा कि इलाके के लोग लंबे समय तक कुछ राजनीतिक दलों के भरोसे और संरक्षण में रहे। एक शख्स ने कहा, “हम सुरक्षित थे क्योंकि हम सुनील दत्त को वोट देते थे।” वहीं, एक अन्य व्यक्ति ने आरोप लगाया, “चुनाव के समय हम जैसे ‘अनधिकृत’ लोग नेताओं के लिए ‘अधिकृत’ बन जाते हैं। सांसद, विधायक सब वोट माँगने आते थे लेकिन अब जब घर टूट रहे हैं तो कोई मदद के लिए नहीं है।”

एक स्थानीय निवासी ने दावा किया कि चुनाव के दौरान बांद्रा विधायक वरुण सरदेसाई ने भरोसा दिया था कि गरीब नगर के लोगों को कोई दिक्कत हो तो वे उनसे संपर्क करें। स्थानीयों का कहना है कि उनके पास आधार कार्ड, पैन कार्ड और वोटर आईडी हैं लेकिन बिना किसी सर्वे के तोड़फोड़ कर दी गई।

सुनील दत्त पर लगे थे क्या आरोप

1984 में कॉन्ग्रेस में शामिल हुए सुनील दत्त को अवैध झुग्गियों को संरक्षण देने के आरोपों को लेकर पहले भी आलोचना झेलनी पड़ी थी। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, 2004 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने मुंबई नॉर्थ-वेस्ट सीट 5वीं बार जीती थी लेकिन बांद्रा-खार-जुहू क्षेत्र में उनके कई समर्थक उनसे नाराज हो गए थे। आरोप था कि उन्होंने सार्वजनिक जगहों पर बढ़ती अवैध झुग्गियों को रोकने के लिए प्रयास नहीं किए। इसका असर चुनाव नतीजों में भी दिखा और उनकी जीत का अंतर 1999 के करीब 85,500 वोटों से घटकर 2004 में लगभग 47,000 रह गया।

सिटीस्पेस समिति की सदस्य विद्या वैद्य ने आरोप लगाया था कि सुनील दत्त ने टैक्स देने वाले नागरिकों की चिंताओं को नजरअंदाज किया। वहीं सामाजिक कार्यकर्ता एडविन ब्रिटो ने शिकायत की थी कि बांद्रा और खार में बढ़ते अवैध निर्माणों को रोकने में राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी रही। उन्होंने कहा था कि लिंकिंग रोड जैसे इलाकों में पैदल चलने तक की जगह नहीं बची।

वकील आर. हरिदास के अनुसार, इस इलाके की कुछ जमीनें जो पहले पार्क और खेल मैदानों के लिए तय थीं, बाद में स्लम रिहैबिलिटेशन के लिए चिन्हित कर दी गईं।

स्लम राजनीति और वोट बैंक का खेल

2021 में कॉन्ग्रेस नेताओं ने स्लम निवासियों के समर्थन में बांद्रा कलेक्टर कार्यालय पर प्रदर्शन भी किया था। माँग की गई थी कि केंद्र सरकार की जमीन, खासकर एयरपोर्ट अथॉरिटी की जमीन पर बसे झुग्गीवासियों को भी 1995 से पहले की स्लम सुरक्षा नीति का लाभ मिले। एयरपोर्ट अथॉरिटी ने सुरक्षा कारणों से इन झुग्गियों को हटाने की बात कही थी लेकिन राजनीतिक दबाव के चलते कार्रवाई टालने की माँग उठी।

इससे पहले 1980 के दशक में महाराष्ट्र सरकार ने मुंबई की झुग्गियों को हटाने की कोशिश की थी, जिसका विरोध कई सामाजिक संगठनों और एक्टिविस्ट्स ने किया। अभिनेत्री शबाना आजमी से जुड़े संगठन भी उस समय कट-ऑफ डेट बढ़ाने की माँग कर रहे थे। बाद में सुनील दत्त को कॉन्ग्रेस के लिए ऐसे नेता के रूप में देखा गया जो नाराज वोटरों को वापस ला सकते थे। बताया जाता है कि सुनील दत्त ने सोनिया गाँधी से हस्तक्षेप करवाकर तत्कालीन मुख्यमंत्री विलासरवा देशमुख से मुंबई की झुग्गियों पर बुलडोजर कार्रवाई रुकवाने की भी कोशिश की थी।

बांद्रा के पास स्थित नर्गिस दत्त नगर स्लम को लेकर भी समय-समय पर विवाद उठे। कुछ स्थानीय संगठनों ने आरोप लगाया कि यह इलाका राजनीतिक वोट बैंक बनाने का माध्यम बन गया। स्थानीय निवासी संगठनों का दावा था कि नेताओं की चुप्पी के कारण अवैध बस्तियां लगातार बढ़ती गईं। 2015 में राज ठाकरे ने भी मुंबई की झुग्गी समस्या के लिए सुनील दत्त, शबाना आजमी और दिवंगत एनसीपी नेता बाबा जियाउद्दीन सिद्दीकी को जिम्मेदार ठहराया था।

धारावी में भी दिखी ऐसी ही कहानी

गरीब नगर की मौजूदा घटना कई मायनों में मुंबई की धारावी बस्ती से मिलती-जुलती नजर आती है, जहाँ पिछले कई वर्षों से रीडेवलपमेंट को लेकर लगातार विवाद और विरोध देखने को मिलता रहा है। एशिया की सबसे बड़ी झुग्गी बस्ती मानी जाने वाली धारावी के पुनर्विकास का काम अडानी ग्रुप और महाराष्ट्र सरकार की संयुक्त कंपनी नवभारत मेगा डेवलपर्स प्राइवेट लिमिटेड (पहले धारावी रीडेवलपमेंट प्रोजेक्ट प्राइवेट लिमिटेड) के जरिए किया जा रहा है।

करीब 2.4 वर्ग किलोमीटर में फैले इस इलाके को आधुनिक टाउनशिप में बदलने की योजना है। इस परियोजना को लेकर लगातार विरोध भी हुआ। 2024 में शिव सेना (UBT) और कॉन्ग्रेस ने धारावी में ‘धारावी न्याय यात्रा’ निकाली और परियोजना का विरोध किया।

महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव से पहले लोकसभा में विपक्ष के नेता और कॉन्ग्रेस सांसद भी धारावी पहुँचे थे। उन्होंने आरोप लगाया था कि यह पुनर्विकास परियोजना एक दिखावा है और इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सिर्फ एक कारोबारी को फायदा पहुँचाने के लिए सौंपा है। वहीं, कॉन्ग्रेस सांसद वर्षा गायकवाड ने भी जमीन कब्जाने के आरोप लगाए थे।

निष्कर्ष

परियोजनाओं की जगह भले अलग-अलग हो लेकिन कॉन्ग्रेस की राजनीति को लेकर उठने वाले सवाल अक्सर एक जैसे दिखाई देते हैं। आलोचकों का कहना है कि पार्टी कई मुद्दों को राष्ट्रीय हित के बजाय राजनीतिक फायदे और वोट बैंक के नजरिए से देखती है। इसी वजह से झुग्गी पुनर्विकास और अतिक्रमण हटाने जैसी परियोजनाओं का विरोध सामने आता रहा है। मुंबई जैसे बड़े शहरों में बढ़ती अवैध बस्तियाँ न सिर्फ बुनियादी ढाँचे और विकास के सामने चुनौती बन गई हैं बल्कि कई जगह सार्वजनिक जमीन पर कब्जे और सुरक्षा संबंधी चिंताओं का कारण भी बनी हैं।

ऐसे में सरकार और प्रशासन का कहना है कि पहले की सरकारों और राजनीतिक संरक्षण के दौरान विकसित हुई अवैध बस्तियों पर कार्रवाई जरूरी है ताकि शहरों का विकास, सार्वजनिक सुविधाओं का विस्तार और सुरक्षा व्यवस्था बेहतर हो सके। कोर्ट के आदेश के अनुसार चल रही ऐसी कार्रवाई बिना किसी हिंसा, राजनीतिक हस्तक्षेप या भ्रामक दावों के पूरी होनी चाहिए ताकि विकास परियोजनाएँ समय पर पूरी हो सकें और प्रभावित लोगों के लिए वैकल्पिक व्यवस्था भी सुनिश्चित की जा सके।

(यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं।)

डरने का नहीं, स्किल बदलने का वक्त आया… AI नौकरियाँ खा जाएगा या नए मौके बनाएगा? WEF, ILO और McKinsey की रिपोर्टों ने बताया सच

न सिर्फ भारत में, बल्कि पूरी दुनिया में छंटनी और भर्ती में गिरावट की रिपोर्टें आ रही हैं। इससे कर्मचारियों में, खासकर उन युवा कर्मचारियों में चिंता बढ़ रही है जो अभी-अभी अपने जॉब में कदम रख रहे हैं। कई कर्मचारी, खासकर सॉफ्टवेयर और IT सेवाओं से जुड़े लोग इस बात से परेशान हैं कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) उस सुरक्षा कवच को कम कर रहा है, जो कभी ‘व्हाइट-कॉलर’ नौकरियों में मिलता था।

उनका यह डर बेबुनियाद नहीं है। वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की ‘फ्यूचर ऑफ जॉब्स रिपोर्ट 2025’ बताती है कि 41% नियोक्ताओं को उम्मीद है कि वे अपने कर्मचारियों की संख्या कम करेंगे, खासकर उन जगहों पर जहाँ AI से काम लिया जा सकता है। इसके अलावा मीडिया रिपोर्टों में उन उद्योगों में छंटनी और भर्तियों में कमी आने की बात कही गई है, जहाँ AI का इस्तेमाल किया जा सकता है।

‘AI सारी नौकरियाँ छीन लेगा’ ये कहना सही नहीं है। WEF रिपोर्ट के मुताबिक, 2030 तक दुनिया भर में 17 करोड़ नई नौकरियाँ पैदा होंगी और 9.2 करोड़ नौकरियाँ खत्म हो जाएँगी। इसका मतलब है कि कुल मिलाकर 7.8 करोड़ नई नौकरियाँ बढ़ेंगी। खास बात यह है कि रिपोर्ट बताती है कि 2030 तक 39% कर्मचारियों के कौशल विकास की जरूरत है।

इंटरनेशनल लेबर ऑर्गनाइज़ेशन (ILO) तो इस बारे में और भी स्पष्ट है। ऐसी बहुत कम नौकरियाँ हैं, जिन्हें AI का इस्तेमाल करके पूरी तरह से ऑटोमेट किया जा सकता है। ‘जेनरेटिव AI’ का सबसे ज्यादा असर नौकरियों को पूरी तरह से खत्म करने के बजाय उनमें बदलाव लाने के रूप में दिखेगा।

यह वह अहम सुधार है जो मीडिया रिपोर्टों और सोशल मीडिया की कहानियों में गायब है। असली कहानी यह नहीं है कि AI काम को खत्म कर देता है, बल्कि यह है कि AI कुछ कामों को छोटा कर देता है, दूसरे कामों का महत्व बढ़ा देता है, और उन कर्मचारियों और संस्थानों को नुकसान पहुँचाता है, जो बदलाव को अपनाने से इनकार करते हैं।

यहाँ तक कि McKinsey भी बड़े पैमाने पर होने वाले व्यावसायिक बदलावों को लेकर बताता है कि उसके शोध इस बात का समर्थन नहीं करता कि जनरेटिव AI नौकरियाँ को खत्म कर देगा। इतिहास गवाह है कि तकनीकी बदलाव पहले व्यवधान लाता है और बाद में रोजगार में व्यापक परिवर्तन लाता है।

AI को इंसान ही बनाते हैं, सुधारते हैं और नियंत्रित करते हैं

सार्वजनिक बहस में सबसे बड़ी गलतफहमी यह है कि AI खुद को प्रशिक्षित करता है, खुद को सुधारता है और खुद को सभ्य बनाता है। ऐसा नहीं है, बल्कि वह ऐसा कर ही नहीं सकता। InstructGPT पेपर प्रशिक्षण के बाद की बुनियादी प्रक्रिया को सरल शब्दों में बताता है। शोधकर्ताओं ने इंसानों के लिखे गए सामग्री जमा किए, फिर इंसानों से मॉडल के आउटपुट को रैंक करने के लिए कहा और उन रैंकिंग का उपयोग करके इंसानी प्रतिक्रिया के साथ मॉडल को और बेहतर बनाया।

इसी तरह OpenAI के GPT-4 रिलीज में भी कहा गया है कि कंपनी ने इंसानों की ज्यादातर प्रतिक्रियाओं को शामिल किया और महत्वपूर्ण क्षेत्रों में शुरुआती प्रतिक्रिया के लिए 50 से ज्यादा विशेषज्ञों के साथ काम किया। Anthropic भी उतनी ही स्पष्टता से कहता है कि Claude को लिखित सिद्धांतों या नियमों के आधार पर निर्देशित करता है।

तो जब लोग पूछते हैं, ‘आखिर इन सिस्टम्स को ट्रेन कौन कर रहा है?’, तो इसका सीधा-सा जवाब है—इंसान और वह भी कई चरणों में। सबसे पहले लोग डेटा इकट्ठा करते हैं या उसका लाइसेंस लेते हैं। फिर लोग अच्छे व्यवहार के उदाहरण लिखते हैं। फिर लोग आउटपुट की तुलना करते हैं और निशान लगाते हैं कि कौन-सा जवाब बेहतर, सुरक्षित, सही या उपयोगी है। उसके बाद सुरक्षा टीमें और बाहरी टेस्टर मॉडल में कमियों की जाँच करते हैं। फिर पॉलिसी टीमें सिस्टम-लेवल के नियम बनाती हैं। फिर इंजीनियर सिस्टम को दोबारा ट्रेन करते हैं, उसे ठीक करते हैं, फिल्टर करते हैं या उसे पिछली स्थिति में वापस ले जाते हैं।
OpenAI का ‘मॉडल’ इसे एक औपचारिक ढाँचे के रूप में बताता है। इस मॉडल को कैसा व्यवहार करना चाहिए, उन्हें आपस में टकराने वाले निर्देशों को कैसे सुलझाना चाहिए और डिप्लॉयमेंट और फीडबैक के जरिए समय के साथ उनके तय व्यवहार में कैसे बदलाव किया जाता है।

सबसे आसान शब्दों में कहें तो इसका मतलब यह है कि मशीन लर्निंग के हर कदम पर इंसान शामिल होते हैं। इस दुनिया की कोई भी मशीन अपने आप नहीं सीख सकती। इंसान ही उन्हें सिखाते हैं— चाहे कोड के जरिए या फिर यह लिखकर कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की दुनिया में ‘अच्छा व्यवहार’ असल में किसे कहते हैं।

GPT-4o में आई ‘चापलूसी’ की समस्या पर OpenAI की सार्वजनिक रिपोर्ट (postmortem) इस बात का एक अच्छा उदाहरण है कि असल दुनिया में यह प्रक्रिया कैसे काम करती है। अप्रैल 2025 में, कंपनी ने एक अपडेट को वापस ले लिया था, क्योंकि उस अपडेट के बाद मॉडल जरूरत से ज़्यादा चापलूसी करने वाला और हर बात पर सहमत होने वाला बन गया था। OpenAI ने बताया कि उसने ‘शॉर्ट-टर्म फीडबैक सिग्नल्स’ पर बहुत ज्यादा ध्यान दे दिया था। इसलिए अब वह फीडबैक इकट्ठा करने के तरीके और उस फीडबैक को मॉडल के व्यवहार में शामिल करने के तरीके दोनों में ही सुधार किए है। दूसरे शब्दों में कहें तो यह सुधार इसलिए नहीं हुआ कि मॉडल में अचानक कोई ‘अंतरात्मा’ जाग गई हो। बल्कि यह सुधार इसलिए हुआ, क्योंकि इंसानों ने उस कमी को पहचाना, नियमों में बदलाव किया और पूरे सिस्टम को ही बदल दिया।

इसका सबसे ताज़ा उदाहरण है—‘Grok’ इमेज विवाद। जनवरी 2026 में Grok को बनाने वाली कंपनी xAI को Grok की इमेज एडिटिंग क्षमताओं पर रोक लगानी पड़ी थी। ऐसा इसलिए करना पड़ा, क्योंकि Grok द्वारा बनाई गई कुछ इमेज को लेकर ज़बरदस्त विरोध हुआ था। इन इमेज में असली लोगों को आपत्तिजनक या बगैर कपड़ों के (undressing) दिखाया गया था।

AI की बुनियादी विज़ुअल क्षमता भी इंसानी मेहनत पर निर्भर करती है। ImageNet, जो कंप्यूटर-विजन के बुनियादी डेटासेट में से एक है, अपनी तस्वीरों को ‘क्वालिटी-कंट्रोल्ड’ और ‘इंसानों द्वारा एनोटेट की गई’ बताता है।

OpenAI के GPT-4o सिस्टम कार्ड में बताया गया है कि इस मॉडल की क्षमताओं को पब्लिक डेटासेट, वेब डेटा और दूसरे स्रोतों से ट्रेनिंग दी गई है और फिर सुरक्षा जाँच से गुजारा गया। इसलिए अगर कोई मॉडल भरोसेमंद तरीके से भूरे अंडों और सफेद अंडों में फर्क कर पाता है, तो ऐसा इसलिए नहीं है कि मशीन ने ‘हकीकत को खुद ही समझ लिया।’ इंसानों ने ही श्रेणियाँ बनाईं, उदाहरणों को चुना मशीन को बताया कि भूरे और सफेद अंडों में फर्क कैसे करना है (इसके लिए उन्होंने तस्वीर में टोकरी में रखे हर एक अंडे पर निशान लगाया), बेंचमार्क बनाए, और यह तय किया कि क्या यह सिस्टम इस्तेमाल के लायक है।

खास बात यह है कि यह सब एक बार में नहीं हो जाता। आज भी ऐसी कई कंपनियाँ हैं जो ‘डेटा टैगिंग’ की सेवाएं देती हैं, जहाँ इंसान टेक्स्ट, तस्वीरों और वीडियो को टैग करते हैं, ताकि मशीनें उनसे सीख सकें। इस तरह की नौकरियाँ इतनी जल्दी खत्म होने वाली नहीं हैं।

चलिए एक उदाहरण और देते हैं। एक चीज होती है जिसे ‘वाइब कोडिंग’ कहते हैं, जिसका मतलब है AI की मदद से कोड लिखना। अगर कोई यह कहता है कि मशीन ने खुद ही कोड लिखना सीख लिया है, तो यह झूठ होगा। दुनिया भर में लाखों कोडिंग विशेषज्ञ दिन-रात AI को कोड लिखना सिखा रहे हैं, ताकि कोई भी नया सीखने वाला (नोब) भी एक विशेषज्ञ की तरह कोड लिख सके।

वे डिजिटल नौकरियां बदलेंगी, जो हमेशा एक जैसी रहती हैं

तो फिर, सबसे पहले बदलाव (disruption) कहाँ देखने को मिलेगा? इसका जवाब ‘हर तरह के काम’ नहीं है, बल्कि, यह उन कामों में आएगा जो बार-बार दोहराए जाते हैं, स्क्रीन पर किए जाते हैं, एक तय ढाँचे में होते हैं और जिनमें ज्यादातर काम जानकारी को एक जगह से दूसरी जगह पहुँचाने से जुड़े होते हैं।

ILO का कहना है कि जिन नौकरियों पर ‘जेनरेटिव AI’का सबसे ज्यादा असर पड़ने की संभावना है, वे ऐसी नौकरियाँ हैं, जिनमें अलग-अलग कामों में ऑटोमेशन की बहुत ज्यादा और लगातार गुंजाइश होती है। साथ ही, ILO इस बात पर भी जोर देता है कि लगभग सभी नौकरियों में अभी भी कुछ ऐसे काम होते हैं, जिनके लिए इंसानी दखल की जरूरत पड़ती है।

WEF का अनुमान है कि जिन नौकरियों में सबसे तेजी से कमी आएगी, उनमें क्लर्क और प्रशासनिक काम शामिल हैं—जैसे कैशियर, टिकट क्लर्क, प्रशासनिक सहायक और दूसरे क्लर्क। वहीं जिन तकनीकी नौकरियों में सबसे तेज़ी से बढ़ोतरी होगी, उनमें AI और मशीन लर्निंग विशेषज्ञ, बिग डेटा विशेषज्ञ, फिनटेक इंजीनियर और सॉफ्टवेयर डेवलपर शामिल हैं।

यह पैटर्न असल इस्तेमाल के डेटा में भी दिखता है। Anthropic की 2026 की रिसर्च, जो Claude के असल इस्तेमाल पर आधारित है, बताती है कि कंप्यूटर प्रोग्रामर, कस्टमर सर्विस रिप्रेजेंटेटिव और डेटा एंट्री करने वालों पर इसका सबसे ज़्यादा असर पड़ा है। कंपनी का कहना है कि AI अभी भी अपनी सैद्धांतिक पहुँच से बहुत दूर है और उसके डेटा में 30% कर्मचारियों के काम पर इसका कोई असर नहीं पड़ा है।

इसका मतलब यह नहीं है कि कुछ काम को पूरी तरह AI रिप्लेस कर देगा। इसका मतलब यह होता है कि काम का एक बड़ा हिस्सा AI की मदद से किया जाएगा, उसकी रफ्तार बढ़ जाएगी या उसे नए सिरे से व्यवस्थित किया जाएगा।

Microsoft की रिसर्च में पाया गया कि जिन डेवलपर के पास GitHub Copilot की सुविधा थी, उन्होंने एक प्रयोग में कोडिंग का काम 55.8% तेजी से पूरा किया। बाद में Microsoft Research के एक पेपर में, जिसमें लगभग 4900 डेवलपर पर किए गए तीन प्रयोगों के नतीजों को एक साथ मिलाया गया था, पाया गया कि AI कोडिंग असिस्टेंट का इस्तेमाल करने वाले डेवलपर द्वारा पूरे किए गए कामों में 26.08% की बढ़ोतरी हुई और कम अनुभवी डेवलपर को इससे ज्यादा फायदा हुआ।

ये उत्पादकता के लिहाज से बहुत अहम नतीजे हैं, लेकिन ये इस बात को साबित नहीं करते कि कोडर का काम पूरी तरह से खत्म हो जाएगा। ये नतीजे बताते हैं कि रूटीन कोडिंग, बॉयलरप्लेट, शुरुआती ड्राफ़्ट और बार-बार दोहराए जाने वाले छोटे-मोटे कामों पर सबसे ज्यादा असर पड़ेगा, जबकि रिव्यू, आर्किटेक्चर, एज केस, डीबगिंग, इंटीग्रेशन, सुरक्षा और जवाबदेही जैसे काम अभी भी बहुत जरूरी बने रहेंगे।

कोडिंग के अलावा दूसरे क्षेत्रों में भी यही बात लागू होती है। कस्टमर-सपोर्ट पर की गई एक बड़ी रिसर्च में पाया गया कि एक जनरेटिव AI असिस्टेंट की मदद से उत्पादकता में औसतन लगभग 14% से 15% की बढ़ोतरी हुई, और इसका सबसे ज्यादा फायदा नए और कम हुनर ​​वाले कर्मचारियों को मिला।

Erik Brynjolfsson अपने पेपर ‘Generative AI at Work’ में कहते हैं कि इस टूल ने नए कर्मचारियों को अनुभवी कर्मचारियों के काम करने के तरीके से सीखकर, अनुभव हासिल करने की प्रक्रिया में तेजी से आगे बढ़ने में काफी मदद की। यह कोई छोटी-मोटी बात नहीं है। इसका मतलब है कि AI इंसानी हुनर ​​के कुछ हिस्सों को सीखकर उन्हें नए सिरे से इस्तेमाल कर सकता है। लेकिन इसका यह भी मतलब है कि किसी के पास पहले से ही वह हुनर ​​होना चाहिए, उसे AI के लिए एक मॉडल के तौर पर तैयार किया जाना चाहिए, और उस पर अभी भी इंसानी निगरानी की जरूरत बनी रहेगी।

यही कारण है कि मशीन आउटपुट में भारी वृद्धि के साथ ‘मानवीय नजर’ का महत्व कम नहीं, बल्कि और बढ़ जाता है। स्टैक ओवरफ्लो के 2025 डेवलपर सर्वेक्षण में पाया गया कि एआई उपकरणों की सटीकता पर भरोसा करने वालों की तुलना में अविश्वास करने वाले डेवलपर्स की संख्या अधिक है। 46% अविश्वास बनाम 33% भरोसा। पत्रकारिता के क्षेत्र में, एपी का कहना है कि पत्रकार की केंद्रीय भूमिका नहीं बदलेगी, एआई पत्रकारों का विकल्प नहीं है, और किसी भी जनरेटिव-एआई आउटपुट को “अपुष्ट स्रोत सामग्री” के रूप में माना जाना चाहिए।

रॉयटर्स ने अक्टूबर 2025 में रिपोर्ट किया कि बीबीसी-ईबीयू परीक्षण में 45% एआई समाचार उत्तरों में महत्वपूर्ण कमियाँ और 81% में किसी न किसी प्रकार की समस्या पाई गई। लोग एआई स्लोप की बात करते समय इसी का जिक्र करते हैं, जिसका अर्थ है बड़े पैमाने पर सस्ता आउटपुट, जिसमें सच लिखने की जिम्मेदारी मानव की होती है।

वास्तविक दुनिया को अभी भी मानवीय हाथों की जरूरत

जनरेटिव एआई भाषा, पैटर्न पूर्णता, सारांश और स्क्रीन पर कोड जैसे कार्यों में सर्वश्रेष्ठ है। मैकिन्से का कहना है कि कुछ कम वेतन वाली नौकरियों में अनिश्चित शारीरिक काम या कस्टमर से डील जैसे काम शामिल है, जो खुद से संचालित नहीं हो सकते।

इसी रिसर्च में कहा गया है कि शारीरिक काम खत्म नहीं होगा और अनुमानित रूप से कुल समय का लगभग 31% हिस्सा शारीरिक काम में ही बीतेगा, जिसमें परिवहन, निर्माण और स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र योगदान दे रहे हैं। अंतर्राष्ट्रीय लेबर संगठन (आईएलओ) भी इस बात पर जोर देता है कि कुछ ही नौकरियाँ पूरी तरह से स्वचालित हो सकती हैं और अधिकांश बिजनेस मानव और मशीन दोनों के मिलने से चलता है।

एंथ्रोपिक के श्रम-बाजार अनुसंधान के अनुसार, कई काम एआई की पहुँच से बाहर हैं, विशेष रूप से पेड़ों की छँटाई और कृषि मशीनरी चलाने जैसे शारीरिक कृषि कार्य। करीब 30% श्रमिकों के कार्यों को एआई नहीं ले सकता। इनमें रसोइया, मोटरसाइकिल मैकेनिक, लाइफगार्ड, बारटेंडर, डिशवॉशर और ड्रेसिंग रूम अटेंडेंट शामिल हैं।

एआई एक प्लंबर के लिए निर्देश लिख सकता है, एक इलेक्ट्रीशियन का काम कर सकता है या एक मैकेनिक की मदद कर सकता है, लेकिन फिर भी यह किसी लीक हो रहे पाइप में पानी के दबाव को महसूस नहीं कर सकता, किसी दीवार में लगे तार अगर जलने लगे तो उसके गंध नहीं सूँघ सकता। शोरगुल वाले कार्यस्थल पर टेढ़ी-मेढ़ी बीम का आकलन नहीं कर सकता या अव्यवस्थित, अस्थिर कार्य वातावरण में सुरक्षित रूप से काम नहीं कर सकता। ये सभी शारीरिक, परिस्थितिजन्य और स्थानीय निर्णय लेने के तरीके हैं।

यही वजह है कि WEF का अपना जॉब्स आउटलुक ऐसा भविष्य नहीं दिखाता जिसमें सिर्फ कोडर और प्रॉम्प्ट-राइटर ही हों। इसके मुताबिक, अगले पाँच सालों में सबसे तेजी से बढ़ने वाली नौकरियों में बिल्डिंग बनाने वाले मजदूर शामिल हैं। इनके साथ खेती-बाड़ी करने वाले मजदूर, डिलीवरी ड्राइवर और फूड-प्रोसेसिंग का काम करने वाले लोग भी हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो, AI ऑफ़िसों को बदल सकता है, लेकिन कंस्ट्रक्शन साइटों, रिपेयर की दुकानों, रसोईघरों, खेतों और मेंटेनेंस के कामों वाली जगहों पर लोगों की जरूरत हमेशा रहेगी। भविष्य की अर्थव्यवस्था “डिजिटल मजदूर बनाम शारीरिक काम करने वाले मज़दूर” वाली नहीं होगी। यह एक मिली-जुली अर्थव्यवस्था होगी, जिसमें शारीरिक काम करने वाले लोग AI को एक टूल के तौर पर इस्तेमाल करेंगे, लेकिन साथ ही वे खुद ही ऐसे शारीरिक काम भी करते रहेंगे जिनकी जगह कोई और नहीं ले सकता।

भारत कौशल विकास कर रहा, घबरा नहीं रहा

भारत के लिए व्यावहारिक सवाल यह नहीं है कि AI से डरना है या नहीं, बल्कि यह है कि इसके इर्द-गिर्द पर्याप्त कौशल, भाषाई बुनियादी ढाँचा और डोमेन विशेषज्ञता विकसित की जाए या नहीं। IndiaAI मिशन को भी इसी नज़रिए से तैयार किया गया है। फरवरी 2026 की PIB रिलीज में कहा गया है कि भारत की AI रणनीति का उद्देश्य आर्थिक और रोजगार के अवसर पैदा करना है। इसमें मिशन के लिए ₹10372 करोड़ के बजट का जिक्र है, और बताया गया है कि 38000 से ज्यादा GPUs को सिस्टम में जोड़ा गया है, स्वदेशी फाउंडेशन मॉडल्स के लिए बारह टीमों को शॉर्टलिस्ट किया गया है, भारत-विशिष्ट 30 AI एप्लीकेशन्स को मंजूरी दी गई है और हजारों अंडरग्रेजुएट, पोस्टग्रेजुएट और PhD छात्रों को प्रतिभा विकास के लिए सहायता दी गई है। इसी रिलीज में इस बात पर भी जोर दिया गया है कि भारत के फाउंडेशन मॉडल्स को भारतीय डेटासेट्स और भाषाओं के आधार पर तैयार किया जा रहा है।

यह स्थानीय आधार बहुत मायने रखता है। BHASHINI के CEO ने जनवरी 2026 में कहा था कि AI नागरिकों की प्रभावी ढंग से सेवा तभी कर सकता है, जब वह भारतीय भाषाओं को समझे और उसे ऐसे स्वदेशी डेटा पर प्रशिक्षित किया गया हो, जो स्थानीय संदर्भों और उपयोग के तरीकों को दर्शाता हो। इस प्लेटफॉर्म का कहना है कि यह 36 से ज्यादा लिखित भाषाओं, 22 से ज्यादा बोली जाने वाली भाषाओं, 350 से ज्यादा AI भाषा मॉडल्स और सैकड़ों इंटीग्रेशन को सपोर्ट करता है। यह कोई मामूली मुद्दा नहीं है। ऐसे देश में, जहाँ भाषा, बोली, कोड-मिक्सिंग और संदर्भ ही रोजमर्रा के संवाद को आकार देते हैं, वहाँ स्थानीय मानवीय इनपुट कोई वैकल्पिक चीज नहीं है, बल्कि यही तो इस पूरे सिस्टम का आधार है।

भारतीय भाषाओं पर हुए स्वतंत्र शोध भी इसी दिशा की ओर इशारा करते हैं। AI4Bharat का कहना है कि ज्यादातर भारतीय भाषाओं में उस बड़े पैमाने के प्रशिक्षण डेटा की कमी है, जिसकी जरूरत आधुनिक AI प्रणालियों को होती है। इसके ‘Indic LLM-Arena’ का तर्क है कि वैश्विक मानक बहुत ज्यादा अंग्रेजी-केंद्रित हैं। वे ‘हिंग्लिश’ और ‘टैंग्लिश’ जैसी कोड-मिश्रित बोलियों को नजरअंदाज़ कर देते हैं और भारतीय सांस्कृतिक, प्रासंगिक और सुरक्षा संबंधी जरूरतों को समझने में नाकाम रहते हैं। यह स्पष्ट रूप से ‘भाषा, संदर्भ और सुरक्षा’ के मूल्यांकन के लिए एक ऐसे मॉडल की वकालत करता है, जिसमें मानवीय हस्तक्षेप शामिल हो।

इसका मतलब यह है कि भारत के AI-युक्त भविष्य के लिए न केवल मॉडल बनाने वालों की जरूरत होगी, बल्कि ऐसे मूल्यांकनकर्ताओं, भाषा विशेषज्ञों, डोमेन विशेषज्ञों, सुरक्षा समीक्षकों और ऐसे लोगों की भी जरूरत होगी, जो लगातार इस बात की पुष्टि करते रहें कि ये प्रणालियाँ वास्तव में भारतीय उपयोगकर्ताओं के लिए कारगर साबित हो रही हैं या नहीं।

नीति आयोग का 2025 का रोडमैप एक अहम रणनीतिक विकल्प को साफ तौर पर सामने रखता है। 2031 तक, भारत का टेक्नोलॉजी सेक्टर 1.5 मिलियन नौकरियाँ खो सकता है या 4 मिलियन तक नए अवसर पैदा कर सकता है, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि अभी क्या फैसले लिए जाते हैं। ठीक इसी वजह से, यह आम धारणा कि “AI नौकरियाँ खा रहा है,”। लेकिन, देश की नीति बनाने वाली संस्थाएँ AI के इस बदलाव को सिर्फ एक जोखिम के तौर पर ही नहीं, बल्कि कौशल विकास, क्षमता निर्माण और स्थानीय इकोसिस्टम के एक मुकाबले के तौर पर देख रही हैं।

सबसे ईमानदार निष्कर्ष न तो बेफिक्री है और न ही घबराहट। AI पहले से ही कुछ दोहराए जाने वाले डिजिटल कामों को कम कर रहा है। यह साफ तौर पर शुरुआती स्तर के क्लर्क वाले काम, रोजमर्रा की कोडिंग, बुनियादी तौर पर चीजों को दोबारा लिखने और स्क्रीन पर किए जाने वाले दूसरे बहुत एक जैसे कामों पर दबाव डाल रहा है। साथ ही, इस बात का कोई सबूत नहीं है कि इंसानी मेहनत पूरी तरह से खत्म होने वाली है। असल में जो हो रहा है, वह है काम का फिर से मूल्यांकन: दोहराए जाने वाले कामों के लिए कम इनाम, और सही फैसला लेने, जाँच-पड़ताल करने, चीजों को जोड़ने, जवाबदेही, स्थानीय जानकारी और शारीरिक मौजूदगी के लिए ज्यादा इनाम।

इसलिए इस बात को कहने का बेहतर तरीका यह नहीं है कि ‘AI नौकरियाँ खा जाएगा।’ बल्कि यह है कि “AI उन लोगों को इनाम देगा जो खुद को बदलते हैं और उन लोगों को पीछे छोड़ देगा जो सीखना नहीं चाहते।” जो कोडर सिर्फ घिसे-पिटे कोड बनाते हैं, उन्हें उन कोडर के मुक़ाबले ज़्यादा जोखिम है जो AI की मदद से बने सिस्टम की समीक्षा कर सकते हैं, उनका ढाँचा तैयार कर सकते हैं और उन्हें बेहतर बना सकते हैं। जो लेखक सिर्फ दूसरों की बातों को अपने शब्दों में दोहराते हैं, उन्हें उन संपादकों और फैक्ट-चेकर के मुकाबले ज्यादा जोखिम है, जो मशीन से मिले आउटपुट की जाँच कर सकते हैं और उसे और बेहतर बना सकते हैं। प्लंबर, इलेक्ट्रीशियन, वेल्डर, मैकेनिक, किसान, बढ़ई और निर्माण क्षेत्र के मज़दूर AI के इस दौर में कोई पुरानी और बेकार चीजें नहीं हैं, वे उस इंसानी बुनियाद का हिस्सा हैं जिस पर AI वाली अर्थव्यवस्था आज भी निर्भर करती है।

भविष्य उन कामगारों का है जो अपने काम में माहिर हैं, और जो नए औज़ारों का इस्तेमाल करना जानते हैं, लेकिन अपने फैसले लेने की क्षमता को उन ‘हथियारों’ के हवाले नहीं करते।

(ये खबर मूलरूप से अंग्रेजी में लिखी गई है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

आने वाले हैं सबसे भीषण गर्मी के 9 दिन, 25 मई से शुरू होगा नौतपा: जानें- जब आसमान से बरसेगी आग तब क्या करें और किससे रहें सतर्क

भीषण गर्मी ने देशभर में दस्तक दे दी है और लोग सूरज की तपिश से बेहाल हैं। उत्तर भारत से लेकर दक्षिण तक तापमान रिकॉर्ड तोड़ रहा है। इसी बीच अब साल के सबसे गर्म दिनों यानी ‘नौतपा’ की शुरुआत होने वाली है।

ज्योतिष और विज्ञान दोनों ही नजरिए से यह समय बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दौरान सूरज की किरणें सीधे धरती पर प्रहार करती हैं। लू और उमस लोगों का जीना मुहाल कर देती है। नौतपा क्या होता है और इससे बचने के लिए क्या करें। नीचे पढ़ें।

क्या होता है नौतपा और कब से है इसकी शुरुआत

नौतपा का शाब्दिक अर्थ है नौ दिनों की भारी तपिश या गर्मी। हिंदू पंचांग के अनुसार, जब सूर्य देव रोहिणी नक्षत्र में प्रवेश करते हैं, तो उस समय के शुरुआती नौ दिनों को नौतपा कहा जाता है। साल 2026 में नौतपा 25 मई से शुरू हो रहा है और 2 जून तक चलेगा।

इन नौ दिनों में सूर्य अपनी सबसे तीव्र ऊर्जा के साथ पृथ्वी पर प्रभाव डालते हैं। इस दौरान तापमान सामान्य से काफी ज्यादा रहता है। दिल्ली-NCR समेत देश के कई हिस्सों में भीषण लू चलने की संभावना जताई जा रही है। मौसम विभाग ने भी हीटवेव को लेकर अलर्ट जारी कर दिया है।

क्यों कहा जाता है इसे नौतपा और क्या है इसका कारण

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, ज्येष्ठ मास में सूर्य का रोहिणी नक्षत्र में जाना एक बड़ी खगोलीय घटना है। रोहिणी नक्षत्र के स्वामी चंद्रमा हैं, जो शीतलता के कारक माने जाते हैं। जब सूर्य इस नक्षत्र में आते हैं, तो वे चंद्रमा की शीतलता को सोख लेते हैं।

इस वजह से पृथ्वी पर अग्नि तत्व बहुत सक्रिय हो जाता है। सूर्य और पृथ्वी के बीच की दूरी कम होने से किरणें सीधे और तेजी से जमीन पर पड़ती हैं। धार्मिक मान्यताओं के साथ इसका वैज्ञानिक आधार भी है। इन दिनों सूर्य की स्थिति ऐसी होती है कि वायुमंडल में नमी कम हो जाती है और शुष्क गर्मी बढ़ जाती है।

मानसून और खेती के लिए क्यों है यह शुभ संकेत

भले ही नौतपा की गर्मी हमें परेशान करती हो, लेकिन यह प्रकृति के लिए वरदान है। ऐसी प्राचीन मान्यता है कि नौतपा के दौरान जितनी ज्यादा गर्मी पड़ेगी, मानसून उतना ही अच्छा आएगा। भीषण गर्मी के कारण समुद्र के पानी का वाष्पीकरण तेजी से होता है।

इससे आसमान में बादलों के बनने की प्रक्रिया तेज हो जाती है। यदि नौतपा के दौरान अच्छी तपिश होती है, तो खरीफ की फसलों के लिए बारिश भरपूर मिलती है। किसान भी अच्छी फसल की उम्मीद में इस तपिश का स्वागत करते हैं। इसे एक अच्छे और लंबे मानसून का संकेत माना जाता है।

नौतपा के दौरान क्या करें और क्या न करें

धर्म शास्त्रों में इस दौरान विशेष सावधानी बरतने की सलाह दी गई है। नौतपा के नौ दिनों में सूर्य देव की उपासना करना बहुत फलदायी होता है। प्रतिदिन तांबे के लोटे से सूर्य को जल अर्पित करना चाहिए। जल में लाल फूल और अक्षत डालने से सूर्य की कृपा प्राप्त होती है।

इन दिनों में दान-पुण्य का विशेष महत्व बताया गया है। राहगीरों को ठंडा पानी पिलाना और प्याऊ लगवाना पुण्य का काम है। हालाँकि, इस दौरान विवाह, मुंडन और गृह प्रवेश जैसे मांगलिक कार्य वर्जित माने जाते हैं। दोपहर के समय लंबी यात्रा करने से बचना चाहिए क्योंकि यह सेहत बिगाड़ सकता है।

भीषण गर्मी से बचने के लिए खास खान-पान

नौतपा की लू से बचने के लिए डाइट पर ध्यान देना सबसे जरूरी है। डायटीशियन के अनुसार, इस दौरान हल्का और पानी से भरपूर भोजन करना चाहिए। तरबूज, खरबूजा, खीरा और ककड़ी जैसे मौसमी फल शरीर को हाइड्रेटेड रखते हैं। सब्जियों में लौकी, तोरई और कद्दू का सेवन करना चाहिए क्योंकि ये आसानी से पच जाते हैं।

दोपहर के समय एक गिलास छाछ या दही का सेवन पेट की गर्मी को शांत करता है। सत्तू का शरबत और आम पन्ना लू से बचने के अचूक उपाय हैं। ये शरीर को तुरंत ऊर्जा देते हैं और इलेक्ट्रोलाइट्स की कमी को पूरा करते हैं।

भूलकर भी न करें इन चीजों का सेवन

नौतपा के दौरान कुछ चीजों से परहेज करना सेहत के लिए बेहतर होता है। बहुत ज्यादा मसालेदार और तला-भुना खाना शरीर का तापमान बढ़ा देता है। इससे एसिडिटी और पाचन की समस्या हो सकती है। चाय और कॉफी का सेवन कम से कम करें क्योंकि इनमें कैफीन होता है।

कैफीन शरीर से पानी बाहर निकालता है जिससे डिहाइड्रेशन का खतरा बढ़ जाता है। ज्यादा चीनी वाले कोल्ड ड्रिंक्स और शराब से भी दूर रहना चाहिए। गर्मियों में बैक्टीरिया जल्दी पनपते हैं, इसलिए बासी खाने से बचें। हमेशा ताजा बना हुआ सात्विक भोजन ही ग्रहण करें।

जरूरी सावधानी और बचाव के तरीके

दोपहर 12 बजे से शाम 4 बजे तक सूरज की किरणें सबसे ज्यादा घातक होती हैं। कोशिश करें कि इस समय घर से बाहर न निकलें। अगर निकलना जरूरी हो, तो छाता लेकर जाएँ और सिर को कपड़े से ढंक लें। हल्के रंग के सूती कपड़े पहनें जो पसीना सोख सकें। प्यास लगने का इंतजार न करें और हर आधे घंटे में पानी पीते रहें।

बच्चों, बुजुर्गों और बीमार लोगों का विशेष ध्यान रखना चाहिए। उनके कमरे में वेंटिलेशन और ठंडक का पूरा इंतजाम रखें। पशु-पक्षियों के लिए भी अपनी छत या बालकनी पर दाना-पानी जरूर रखें। सही जानकारी और सावधानी से आप नौतपा की इस जंग को जीत सकते हैं।

जिस मंच से कभी होता था ‘नग्नता’ का प्रसार, वहाँ भारतीय परिधानों का चला जादू: जानिए CANNES फेस्टिवल में नियम सख्त होने से दिखे क्या बदलाव, क्यों था ये जरूरी?

‘कान्स’ (Cannes) इस बार भारतीयों के लिए सिर्फ एक फिल्म फेस्टिवल नहीं, बल्कि संस्कृति, फैशन और पहचान के वैश्विक प्रदर्शन का मंच बन गया। फ्रांस स्थित फ्रेंच रिवेरा के रेड कार्पेट पर हुए 79वें कान्स फिल्म फेस्टिव में भारत ने अपने रंग कुछ अलग अंदाज में बिखेरे। वर्षों से गाउन, बोल्ड फैशन और पश्चिमी स्टाइल के बीच सीमित दिखाई देने वाला कान्स इस बार साड़ियों, लहँगा, पारंपरिक परिधान, बिंदी और भारतीय हस्तशिल्प की खूबसूरती से सजा नजर आया। रेड कार्पेट पर भारतीय संस्कृति और सनातन परंपरा की झलक ने दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा।

इस बार की सबसे दिलचस्प बात यह रही कि कान्स में सिर्फ वही पुराने और चर्चित चेहरे केंद्र में नहीं रहे। नए भारतीय कलाकारों, फैशन क्रिएटर्स और उभरते चेहरों ने इस मंच को नई पहचान देने की कोशिश की। इन नए चेहरों ने पश्चिमी फैशन की नकल करने के बजाय भारतीयता को आधुनिक अंदाज में पेश किया, जिससे कान्स का पूरा माहौल पहले से अलग दिखाई दिया। यही वजह रही कि इस बार भारत की मौजूदगी केवल ग्लैमर तक सीमित नहीं रही, बल्कि उसमें अपनी जड़ों पर गर्व और सांस्कृतिक आत्मविश्वास भी साफ नजर आया।

1. रूपी गिल

(फोटो साभार: Instagram-@roopigill_)





पंजाबी एक्ट्रेस रूपी गिल ने कान्स 2026 के रेड कार्पेट पर अपने पारंपरिक पंजाबी अंदाज से अलग पहचान बनाई। उन्होंने भारतीय संस्कृति और पंजाबी विरासत को बेहद सादगी और खूबसूरती के साथ पेश किया। उन्होंने हल्के क्रीम यानी आइवरी शेड का शरारा सेट पहना था, जिस पर सुनहरे धागों से बारीक कढ़ाई की गई थी। आउटफिट में पारंपरिक पंजाबी शिल्प की झलक साफ दिखाई दे रही थी, जिसने उनके पूरे लुक को रॉयल लेकिन बेहद सहज बनाया।

उनके इस लुक की सबसे खास बात रहा फुलकारी दुपट्टा, जिसे उन्होंने सिर पर ओढ़ रखा था। रंग-बिरंगी फुलकारी कढ़ाई ने उनके पूरे लुक में पंजाबी मिट्टी की खुशबू जोड़ दी। वहीं, भारी ग्लैमरस मेकअप से दूर रूपी गिल ने बेहद हल्का और नैचुरल मेकअप चुना, जिसने उनके पारंपरिक लुक की सादगी को और निखारा।

2.प्राजक्ता माली

(फोटो साभार: Instagram-@prajakta_official)

मराठी फिल्म एक्ट्रेस प्राजक्ता माली ने कान्स 2026 के रेड कार्पेट पर महाराष्ट्र की पारंपरिक संस्कृति और मराठी सौंदर्य को बेहद खूबसूरती से पेश किया। रेड कार्पेट पर उनका अंदाज बिल्कुल एक पारंपरिक ‘मराठी मुलगी’ जैसा नजर आया, जिसने लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा। प्राजक्ता ने नीले रंग की नौवारी साड़ी पहनी। साड़ी की पारंपरिक ड्रेपिंग ने महाराष्ट्र की सांस्कृतिक विरासत को बखूबी सामने रखा। साथ ही हल्के झुमके, नाक में नथ, कमर पर कमरबंद और माथे पर सजा अर्धचंद्र ने इस लुक की खूबसूरती को और निखार दिया।

3.ऐमी बरुआ

(फोटो साभार: Instagram-@aimeebaruahofficial)

कंटेंट क्रिएटर ऐमी बारुआ ने अपने पाँचवे कान्स अपीयरेंस में अपनी जड़ों को महत्व दिया। रेड कार्पेट पर उन्होंने असम की कार्बी संस्कृति को गरिमा के साथ पेश किया, जिससे उनका लुक सबसे अलग बन गया। एमी बरुआ पारंपरिक हाथ से बुनी ‘पिनी-पेकोक’ पोशाक में नजर आईं, जो कार्बी समुदाय की सांस्कृतिक पहचान मानी जाती है।

उनके कपड़ों की बुनाई, रंगों का संतुलन और पारंपरिक स्टाइलिंग में असम की मिट्टी और लोक संस्कृति की झलक साफ दिखाई दे रही थी। अपने इस लुक की तस्वीर साझा करते हुए उन्होंने लिखा, “अपनी विरासत को सेलिब्रेट करते हुए।”

4.जयंती वागधरे

(फोटो साभार: Instagram-@jayantiwaghdhare)

कान्स 2026 के रेड कार्पेट पर कंटेंट क्रिएटर जयंती वागधरे ने अपने लुक के जरिए महाराष्ट्र की पारंपरिक कला और बुनाई को खास पहचान दिलाई। जयंती ने सफेद रंग का फ्लेयर्ड पैठानी घाघरा पहना था, जिस पर पारंपरिक मोर और फूलों की खूबसूरत पेंटिंग बनी हुई थी। उन्होंने अपने इस पारंपरिक पहनावे को मराठी गहनों के साथ पूरा किया। माथे पर चंद्रकोर बिंदी, नाक में पारंपरिक नथ और गले में कसौटी/थुशी नेकलेस ने उनके लुक में शाही मराठी अंदाज जोड़ दिया। लुक के साथ उन्होंने छत्रपति शिवाजी महाराज की फोटो के साथ ‘जय महाराष्ट्र’ लिखा पर्स कैरी किया, जिसने महाराष्ट्र के इतिहास को दर्शाया।

5.आरती खेत्रपाल

(फोटो साभार: Instagram-@aartikhetarpal_)

कान्स के इतिहास में पहली बार सनातन धर्म और आध्यात्मिकता की झलक देखने को मिली। भक्ति गायिका आरती खेत्रपाल ने अपने पूरे लुक को वैष्णव परंपरा और भगवान श्रीकृष्ण को समर्पित करते हुए अलग पहचान बनाई। उन्होंने फ्लेयर्ड मस्टर्ड येलो स्कर्ट पहनी थी, जिस पर हाथों से बनाई गई वृंदावन की कलाकृतियाँ उकेरी गई थीं। इसके साथ उन्होंने एंब्रॉयडर्ड ब्लाउज और दुपट्टा कैरी किया।

एक कृष्ण भक्त के रूप में उन्होंने अपने साथ पॉकेट साइज भगवद गीता, तुलसी कंठी माला और ‘कृष्णा पाउच’ भी रखा, जिसने उनके लुक को आस्था का प्रतीक बनाया। उन्होंने अपने लुक की तस्वीरें साझा करते हुए इसे अपनी गुरुओं, संतों और भगवद गीता के रचयिता को समर्पित बताया। आरती ने कहा कि उनका यह लुक हर उस व्यक्ति के लिए है, जो भगवान में विश्वास रखता है।

6.रुचि गुज्जर

(फोटो साभार: Instagram-@ruchigujjarofficial)

हरियाणा की मॉडल और एक्ट्रेस रुचि गुज्जर ने कान्स 2026 के रेड कार्पेट पर अपने राजस्थानी अंदाज से अलग ही छाप छोड़ी। उन्होंने गुलाबी रंग का पारंपरिक राजपूताना लहँगा-चोली पहना, जिस पर बारीक कढ़ाई और पारंपरिक डिजाइन की खूबसूरत झलक दिखाई दे रही थी। उनके लुक को माँ3.ग टीका, भारी हार, चूड़ियों और अन्य पांरपरिक आभूषणों ने निखारा। लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा उनके घूँघट की हुई, जिसे उन्होंने आत्मविश्वास के साथ ग्लोबल मंच पर कैरी किया, जो आज की मॉडर्न दुनिया में कम ही देखने को मिलता है।

7.रिदा थारना

(फोटो साभार: [email protected])

कंटेंट क्रिएटर रिदा थारना ने कान्स 2026 के रेड कार्पेट पर अपने लुक के जरिए भारतीय प्रकृति और आध्यात्मिक प्रतीकों को आधुनिक फैशन से जोड़ने की कोशिश की। उनका सफेद रंग का गाउन गंगा नदी से प्रेरित था, जिसकी डिजाइन में बहते पानी की सहजता और शांति को खूबसूरती से उकेरा गया। शिफॉन की परतों से तैयार यह आउटफिट झरने की तरह नीचे की ओर बहता नजर आ रहा था, मानों कपड़ों में पानी की गति को कैद कर लिया गया हो।

ड्रेस पर लगे ताजे पानी के मोती पूरे लुक में नर्म चमक जोड़ रहे थे, जबकि कमर पर लगा तांबे के रंग का प्लीटेड कमरबंद सफेद गाउन के साथ बेहद आकर्षक कंट्रास्ट बना रहा था। रिदा ने अपने लुक को कस्टम-मेड लैब-ग्रोन डायमंड ज्वैलरी के साथ पूरा किया, जिसने उनके पूरे स्टाइल में मॉडर्न और टिकाऊ लग्जरी का स्पर्श जोड़ा।

कान्स में नियम सख्त होने से दिखे बदलाव

दरअसल, कान्स फिल्म फेस्टिवल ने साल 2025 से अपने रेड कार्पेट नियमों में बड़ा बदलाव किया था, जिसका असर 2026 के फैशन ट्रेंड्स में भी साफ दिखाई दिया। नए नियमों के तहक रेड कार्पेट पर ‘न्यूड फैशन’ यानी जरूरत से ज्यादा रिवीलिंग कपड़ों और बेहद लंबे ट्रेल या ओवरसाइज्ड गाउन्स पर रोक लगा दी गई। फेस्टिवल प्रशासन का कहना था कि ऐसे आउटफिट्स रेड कार्पेट की आवाजाही और थिएटर सीटिंग में दिक्कत पैदा करते हैं। इसके साथ ही ‘डिसेंसी’ यानी गरिमा को बनाए रखने पर भी खास जोर दिया गया।

इन नियमों के बाद कान्स के रेड कार्पेट पर फैशन का अंदाज पहले से काफी बदलाव हुआ नजर आया। जहाँ पहले बोल्ड, शीयर और जरूरत से ज्यादा ड्रामेटिक आउटफिट्स सुर्खियाँ बँटोरते थे, वहीं अब कई सितारों ने नियंत्रित और सांस्कृतिक फैशन की ओर रुख किया। यही वजह रही कि कान्स 2026 में भारतीय सितारों और कंटेंट क्रिएटर्स के पारंपरिक लुक्स ज्यादा चर्चा में रहे। साड़ी, फुलकारी, राजपूताना घूँघट, नौवारी और भारतीय हस्तशिल्प जैसे पहनावे सिर्फ फैशन स्टेटमेंट नहीं रहे, बल्कि उन्होंने रेड कार्पेट पर एक अलग सांस्कृतिक पहचान भी बनाई।

कहीं न कहीं इन नए नियमों ने कान्स के फैशन नैरेटिव को भी बदल दिया। अब सिर्फ सबसे बोल्ड या सबसे बड़ा गाउन चर्चा का केंद्र नहीं रहा, बल्कि ऐसे लुक्स को सराहा गया जिनमें कहानी, संस्कृति और व्यक्तिगत पहचान दिखाई दी। भारतीय प्रतिनिधित्व ने इसी बदलाव का सबसे मजबूत उदाहरण पेश किया, जहाँ ग्लैमर के साथ परंपरा और विरासत भी बराबरी से रेड कार्पेट पर चमकती नजर आई।

जोसेफ डिसूजा फाइल्स: ₹296 करोड़ के फंड डायवर्जन, वैश्विक नेटवर्क और भारत विरोधी नैरेटिव की पड़ताल

भारत में विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (FCRA) और धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA) जैसे कड़े कानूनों के बाद विदेशी फंडिंग से जुड़े कई नेटवर्क्स जाँच के दायरे में आए हैं। जैसे-जैसे कानूनी कार्रवाई बढ़ी, वैसे-वैसे कुछ समूहों ने खुद को पीड़ित बताकर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत के खिलाफ नैरेटिव खड़ा करना शुरू किया।

इसी कड़ी में आर्चबिशप जोसेफ डिसूजा (Archbishop Joseph D’Souza) का नाम भी सामने आया। डिसूजा ने भारत में वित्तीय जाँच की तुलना नाजी जर्मनी में यहूदियों के उत्पीड़न से कर दी। खुद को दलितों और वंचितों की आवाज बताने वाले डिसूजा पर विदेशी फंडिंग, वित्तीय गड़बड़ियों और जाँच एजेंसियों की कार्रवाई को लेकर सवाल उठते रहे हैं। इस रिपोर्ट में हम जोसेफ डिसूजा के अतीत, उनके पारिवारिक फ्रॉड, वित्तीय घोटालों, ईडी और सीआईडी की जाँच, राजनीतिक साठगांठ और उनके भारत विरोधी टूलकिट की हर परत को बेनकाब करेंगे।

जोसेफ डिसूजा का अतीत: पारिवारिक पृष्ठभूमि और धर्मांतरण का सच

जोसेफ डिसूजा और उनके पश्चिमी सहयोगियों द्वारा अंतरराष्ट्रीय मंचों पर लगातार यह नैरेटिव  बेचा जाता है कि वे भारत के किसी शोषित, पिछड़े या अछूत वर्ग से धर्मांतरित होकर ईसाई बने हैं। ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि वे खुद को भारत के दलितों का ‘स्वाभाविक और प्रामाणिक प्रतिनिधि’ साबित कर सकें और विदेशी दाताओं से सहानुभूति बटोर सकें। लेकिन ऐतिहासिक, वंशावली और दस्तावेजी तथ्य इस पूरे विमर्श को एक सुनियोजित झूठ साबित करते हैं।

कुलीन ईसाई परिवार में जन्म और ‘ईसाई गेटोज’ का सच

जोसेफ डिसूजा का जन्म किसी गरीब, वंचित या सामाजिक रूप से पिछड़े परिवार में नहीं हुआ था। वे एक अत्यधिक समृद्ध, आर्थिक रूप से मजबूत और ऊँची जाति के पारंपरिक ईसाई परिवार में पैदा हुए थे। कई अवसरों पर वे खुद स्वीकार करते हैं कि उनका बचपन ‘ईसाई गेटोज’ (Christian Ghettos) यानी विशिष्ट, संपन्न ईसाई बस्तियों में बीता था, जो चारों ओर से निचली जातियों और गरीब दलित आबादी से घिरी हुई थीं। यानी वे बचपन से ही उस शोषित वर्ग से अलग एक विशेषाधिकार प्राप्त जीवन जी रहे थे, जिसका मुखौटा वे आज ओढ़े हुए हैं।

वंशावली का सच: गोवा के ‘गौड़ सारस्वत ब्राह्मण’

पारिवारिक इतिहास और वंशावली संबंधी रिकॉर्ड के अनुसार, जोसेफ डिसूजा का व्यक्तिगत रूप से हिंदू धर्म से ईसाई धर्म में परिवर्तन का कोई इतिहास नहीं है। उनका परिवार पीढ़ियों से ईसाई है। वे मूल रूप से कर्नाटक के मूडुबेले के प्रसिद्ध ‘मुदर्था’ (Mudartha) परिवार के वंशज हैं।

इस वंश का इतिहास खंगालने पर पता चलता है कि ये मूल रूप से गोवा के उच्च-जाति ‘गौड़ सारस्वत ब्राह्मणों’ से जुड़े थे। पुर्तगाली शासन के क्रूर दौर के दौरान इस ब्राह्मण परिवार को जबरन ईसाई धर्म में परिवर्तित किया गया था।

बाद में, 1591 के भीषण अकाल के दौरान यह परिवार गोवा से दक्षिण की ओर (तटीय कर्नाटक) पलायन कर गया। 19वीं और 20वीं शताब्दी के दौरान सामाजिक और औपनिवेशिक लाभ के लिए इस परिवार ने अपना मूल उपनाम बदलकर ‘डिसूजा’ (D’Souza) रख लिया। इस प्रकार, जोसेफ डिसूजा जन्मजात ईसाई हैं और उच्च-जाति पृष्ठभूमि से आते हैं। उनका खुद को ‘दलित पृष्ठभूमि’ का दिखाना केवल विदेशी चंदा उगाहने का एक व्यावसायिक पैंतरा है।

शैक्षणिक जीवन और पारिवारिक ढाँचा

जोसेफ ने कर्नाटक विश्वविद्यालय से रसायन विज्ञान में स्नातक किया। इसके बाद वे पूरी तरह से मिशनरी गतिविधियों में शामिल हो गए। उन्होंने फिलीपींस के ‘एशियन थियोलॉजिकल सेमिनरी’ से संचार में एम.ए. किया। बाद में उन्हें ‘गॉस्पेल फॉर एशिया बिब्लिकल सेमिनरी’ से ‘मानद डॉक्टर ऑफ डिविनिटी’ की डिग्री दी गई, जो इस नेटवर्क के भीतर रसूख बढ़ाने का एक सामान्य जरिया है।

जोसेफ ने मरियम नाम की एक आदिवासी महिला से विवाह किया (जिसका शुरुआती दौर में उनके परिवार और दोस्तों ने उनकी उच्च पृष्ठभूमि के कारण विरोध भी किया था)। आज इनका यह पारिवारिक ढांचा पूरी तरह से एक पारिवारिक कॉर्पोरेट में बदल चुका है; उनकी बेटी, बेरिल डिसूजा, उनके द्वारा ही संचालित और विदेशी फंड से पोषित ‘डिग्निटी फ्रीडम नेटवर्क’ (DFN) में चिकित्सा और मानव तस्करी विरोधी विभाग की वैश्विक निदेशक के रूप में कार्य करती है और ऊंचे वेतन व भत्ते उठाती है।

ओएम इंटरनेशनल, ओएम इंडिया, गुड शेफर्ड और DFN का वैश्विक त्रिकोणीय ढाँचा

जोसेफ डिसूजा के साम्राज्य को समझने के लिए उनके संगठनों के वैश्विक और घरेलू ताने-बाने को समझना आवश्यक है। यह कोई साधारण धार्मिक संस्था या सामान्य चर्च नहीं है, बल्कि यह एक बहु-स्तरीय, अत्यधिक परिष्कृत कॉर्पोरेट मिशनरी नेटवर्क है:

A: ओएम इंटरनेशनल (OM International) से ओएम इंडिया (OM India)

जोसेफ डिसूजा ने अपने करियर की शुरुआत जॉर्ज वेरवर के वैश्विक और अत्यधिक प्रभावशाली संगठन ‘ऑपरेशन मोबिलाइजेशन’ (OM International) के भारतीय प्रभाग ‘ओएम इंडिया’ से की थी। ओएम इंटरनेशनल यूके की चैरिटी कमिशन (UK Charity Commission – OM International) के तहत पंजीकृत एक विशाल वैश्विक नेटवर्क है।

डिसूजा इस वैश्विक संस्था के अंतरराष्ट्रीय उपाध्यक्ष के पद तक पहुँचे और 2012 में इसके भारतीय प्रभाग (OM India) के CEO बने।

साल 2014 में एक रणनीतिक कदम के तहत, ‘ओएम इंडिया’ ने अंतरराष्ट्रीय मूल संस्था से तकनीकी और कानूनी रूप से अलग होने का नाटक किया ताकि भारतीय सुरक्षा एजेंसियों की जांच से बचा जा सके। इस स्वतंत्र प्रभाग को नया नाम दिया गया, ‘गुड शेफर्ड चर्च ऑफ इंडिया’ (Good Shepherd Church of India)। इसके माध्यम से पूरे भारत में चर्चों और स्कूलों का एक समानांतर नेटवर्क खड़ा किया गया, जो विदेशों से सीधे आर्थिक मदद प्राप्त करता था।

B: डिग्निटी फ्रीडम नेटवर्क (Dignity Freedom Network – DFN)

विदेशी धरती से भारत के खिलाफ नैरेटिव सेट करने और बिना किसी रुकावट के चंदा वसूलने के लिए जोसेफ डिसूजा ने साल 2002 में अमेरिका में ‘दलित फ्रीडम नेटवर्क’ की सह-स्थापना की। बाद में जब भारत में इस नाम को लेकर सुरक्षा एजेंसियां सतर्क हुईं, तो इसका नाम बदलकर ‘डिग्निटी फ्रीडम नेटवर्क’ (DFN) कर दिया गया।

वर्तमान में यह नेटवर्क अमेरिका (DFN USA), ऑस्ट्रेलिया (DFN Australia), कनाडा और यूके में बड़ी ब्रांच के रूप में सक्रिय है। इन देशों की वेबसाइटों और ब्रोशरों पर भारत की एक भयावह तस्वीर बेची जाती है। वहाँ यह दावा किया जाता है कि ‘भारत में दलितों और ईसाइयों को कीड़े-मकौड़ों की तरह मारा जा रहा है और उनके उद्धार का एकमात्र जरिया डीएफएन को दान देना है।’

C: ‘ब्रेकिंग इंडिया’ इकोसिस्टम में DFN की भूमिका

मशहूर शोधकर्ता एवं लेखक राजीव मल्होत्रा और अरविंदन नीलकंदन की प्रसिद्ध पुस्तक ‘Breaking India: Western Interventions in Dalit and Dravidian Faultlines’ में जोसेफ डिसूजा के इस ‘दलित फ्रीडम नेटवर्क’ (DFN) का बेहद बारीकी से खोजी विश्लेषण किया गया है।

पुस्तक में अकादमिक साक्ष्यों के साथ यह प्रमाणित किया गया है कि  DFN कोई मानवाधिकार संगठन नहीं है बल्कि यह भारत को अस्थिर करने और उसकी संप्रभुता को खंडित करने वाले एक बड़े पश्चिमी भू-राजनीतिक हस्तक्षेप (Geopolitical Intervention) का हिस्सा है। यह नेटवर्क ‘मानवाधिकारों’ और ‘दलित उद्धार’ की आड़ में विदेशी धन को उन कार्यक्रमों और सेमिनारों में लगाता है, जिनका मूल उद्देश्य भारतीय युवाओं, विशेषकर पिछड़ों को उनकी राष्ट्रीय और सांस्कृतिक पहचान से पूरी तरह विमुख करना, उनके भीतर अपनी ही सभ्यता के प्रति नफरत भरना और देश में गृहयुद्ध जैसी सामाजिक दरारें पैदा करना है।

गंभीर वित्तीय अपराध और धोखाधड़ी

जोसेफ डिसूजा का असली चेहरा तब पूरी तरह बेनकाब हो गया जब तेलंगाना CID और प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने उनके और उनके सहयोगियों के खिलाफ धन शोधन (Money Laundering) और वित्तीय गबन के संगीन मामलों में चार्जशीट दाखिल की।

सुरक्षा एजेंसियों की जांच के अनुसार, जोसेफ डिसूजा और उनके बेटे जोश लॉरेंस डिसूजा ने गरीब दलित बच्चों की मुफ्त शिक्षा और सामाजिक कल्याण के नाम पर विदेशों से प्राप्त हुए ₹296.6 करोड़ के विशाल फंड को फर्जी इनवॉइस और शेल कंपनियों के जरिए निजी बैंक खातों, फिक्स्ड डिपॉजिट और विलासितापूर्ण रियल एस्टेट संपत्तियों में डाइवर्ट कर दिया।

जाँच एजेंसियों द्वारा उजागर किए गए प्रमुख घोटालों और उनकी कार्यप्रणाली (Modus Operandi) का विस्तृत विवरण समझते हैं ताकि इस पूरे खेल को आसानी से समझा जा सके:

सुनामी राहत कोष की चोरी (Tsunami Relief Fraud)

क्या था घोटाला: साल 2004 में आई विनाशकारी सुनामी के बाद, तटीय क्षेत्रों के प्रभावित और बेघर हुए मछुआरों के पुनर्वास के नाम पर विदेशों से ₹4 से ₹5 करोड़ का विशेष फंड जुटाया गया था।

हेराफेरी कैसे की गई (Modus Operandi): इस फंड का इस्तेमाल जमीन पर मछुआरों के लिए नए घर और नावें बनाने के लिए होना था। लेकिन जाँच में सामने आया कि जमीन पर कोई राहत कार्य किया ही नहीं गया। डिसूजा के नेटवर्क ने ऐसी कंपनियों और वेंडर्स के नाम पर फर्जी बिल (Fake Invoices) तैयार किए जो असल में थीं ही नहीं। इन फर्जी बिलों के जरिए पूरी रकम को खातों से निकालकर हड़प लिया गया।

बाइबिल बिक्री घोटाला

क्या था घोटाला: इस नेटवर्क को विदेशों से ₹5.9 करोड़ का फंड इस विशेष और वैधानिक उद्देश्य के लिए मिला था कि वे भारत के ग्रामीण और जनजातीय इलाकों में मुफ्त वितरण (Free Distribution) के लिए बाइबिल और अन्य धार्मिक सामग्री छापें।

हेराफेरी कैसे की गई (Modus Operandi): चैरिटी के पैसे का इस्तेमाल व्यापार के लिए किया गया। डिसूजा ने ‘ओएम बुक्स फाउंडेशन’ (OMBF) नामक अपनी एक व्यावसायिक संस्था बनाई। विदेशों से मुफ्त बांटने के लिए मिले पैसे से जो बाइबिल छापी गईं, उन्हें मुफ्त देने के बजाय इस फाउंडेशन के जरिए बाजार में ऊँची कीमतों पर बेचा गया। इस तरह मुफ्त की सामग्री से ₹9.7 करोड़ का अनधिकृत और गुप्त व्यावसायिक मुनाफा कमाया गया, जो FCRA नियमों और टैक्स कानूनों का खुला उल्लंघन था।

‘जोगिनी’ प्रथा के नाम पर अंतरराष्ट्रीय धोखाधड़ी (The Jogini Exploitation Scam)

क्या था घोटाला: यह इस पूरे नेटवर्क का सबसे घिनौना और संवेदनहीन वित्तीय अपराध था, जिसमें अधिक से अधिक विदेशी स्पॉन्सरशिप और डॉलर बटोरने के लिए मासूम बच्चों का इस्तेमाल किया गया।

हेराफेरी कैसे की गई  (Modus Operandi): ‘जोगिनी’ या देवदासी प्रथा समाज की एक प्रथा रही है, जिसमें समय के साथ यहाँ नैरेटिव बना दिया गया कि यह हिंदू मंदिरों में महिलाओं का शोषण का जरिया था। डिसूजा के नेटवर्क ने विदेशों में बैठे अमीर ईसाई दाताओं (Foreign Donors) को भावुक करने के लिए अपने गुड शेफर्ड स्कूलों में पढ़ने वाले सामान्य गरीब छात्र-छात्राओं की तस्वीरें खींचीं।

दान करने वालों के सामने इन सामान्य बच्चों को ‘जोगिनी’ (कथित रूप से धार्मिक और यौन रूप से शोषित देवदासी की संतानें) के रूप में पेश किया गया। विदेशी डोनर्स को झूठ बोला गया कि इन बच्चों को नरक से बचाने के लिए फंड चाहिए। इस तरह प्रति बच्चा $27 से $33 (डॉलर) प्रति माह का अतिरिक्त भारी-भरकम दान ऐंठा गया, जो सीधे डिसूजा और उनके परिवार के निजी ट्रस्टों में डाइवर्ट हो गया।

जोगिनी प्रथा का विदेशों में यह दुष्प्रचार इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण है कि ब्रिटिश उपनिवेश के दौरान सनातन की आस्थाओं को कैसे दुष्प्रचार कर उन्हें शोषण का करण साबित किया गया, और आज डिसूजा जैसे लोग इन दुष्प्रचार पर धन उगाही और विदेशी चंदे के फर्जीवाड़े कर रहे हैं।

गरीब बच्चों की फीस और सरकारी फंड का गबन (Fee Siphoning)

क्या था घोटाला: यह घोटाला ‘दोगुनी कमाई’ का सटीक उदाहरण है, जहाँ विदेशों से भी पैसा लिया गया और उन्हीं बच्चों के गरीब माता-पिता को भी लूटा गया।

कैसे की गई हेराफेरी (Modus Operandi): अंतरराष्ट्रीय मंचों पर डीएफएन (DFN) ने दावा किया कि वे भारत में दलित बच्चों को ‘100% पूर्णतः मुफ्त शिक्षा, हॉस्टल और भोजन’ दे रहे हैं और इसके बदले विदेशों से हर साल करोड़ों रुपये लिए।

लेकिन भारत में जमीनी हकीकत इसके उलट थी। यहाँ गुड शेफर्ड स्कूलों के गरीब छात्रों से ट्यूशन फीस, स्कूल यूनिफॉर्म और बस की पूरी फीस वसूली जा रही थी। इसके अलावा, भारत सरकार से मिलने वाले शिक्षा के अधिकार (RTE) के तहत मिलने वाले रिफंड (सूट-बूट और फीस की सरकारी सब्सिडी) के पैसे को भी स्कूल के ऑडिट बुक्स से गायब कर निजी खातों में ट्रांसफर कर दिया गया।

नकली इनवॉइस के जरिए FCRA उल्लंघन (Post-Ban Siphoning)

क्या था घोटाला: केंद्रीय गृह मंत्रालय (MHA) द्वारा नियमों के उल्लंघन के कारण जब इनके मुख्य संगठनों का एफसीआरए (FCRA) लाइसेंस निलंबित और रद्द कर दिया गया, तब भी पिछले दरवाजे से विदेशी पैसा भारत मंगाया गया।

कैसे की गई हेराफेरी (Modus Operandi): लाइसेंस रद्द होने का मतलब था कि अब ये सीधे विदेशी चंदा नहीं ले सकते थे। इस पर डिसूजा ने अपनी व्यावसायिक कंपनी ‘ओएम बुक्स फाउंडेशन’ का इस्तेमाल किया। उन्होंने विदेशों में मौजूद अपने ही डमी संगठनों को प्रिंटिंग और पब्लिशिंग के झूठे और अत्यधिक बढ़ा-चढ़ाकर पेश किए गए बिल (Fake Commercial Invoices) भेजे। ऐसा दिखाया गया कि विदेशी संस्थाओं ने किताबें छपवाई हैं, और इस व्यावसायिक व्यापार की आड़ में प्रतिबंधित विदेशी फंड को भारत में अवैध रूप से लाना जारी रखा।

प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा संपत्तियों की जब्ती

क्या था घोटाला: इन सभी घोटालों से कमाए गए ₹296.6 करोड़ के काले धन को सफेद करने (Money Laundering) के लिए उसे रियल एस्टेट में निवेश किया गया।

कैसे की गई कार्रवाई: पीएमएलए (PMLA) के तहत जांच करते हुए प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने पाया कि इस चैरिटी के पैसे से जोसेफ डिसूजा, उनके बेटे जोश लॉरेंस और उनके करीबियों ने महंगी जमीनें, कमर्शियल कॉम्प्लेक्स और आलीशान विला खरीदे थे। ईडी ने इस ‘अपराध की कमाई’ (Proceeds of Crime) पर कड़ा प्रहार करते हुए उनकी कुल 12 मुख्य अचल संपत्तियां कुर्क (Freeze) और जब्त कर लीं, जिनका वर्तमान बाजार मूल्य ₹15 करोड़ से कहीं अधिक है।

जोसेफ डिसूजा के इस वित्तीय साम्राज्य का काम करने का तरीका बेहद सरल लेकिन शातिर था। भारत की गरीबी और कुप्रथाओं की डरावनी तस्वीर विदेशों में बेचकर डॉलर कमाओ, उन डॉलर्स को गरीब बच्चों तक पहुँचाने के बजाय कागजी हेराफेरी और फर्जी बिलों के जरिए भारत में अपनी निजी अचल संपत्तियों और लग्जरी लाइफस्टाइल में बदल लो।

राजनीतिक कनेक्शन और भारतीय वामपंथी-लिबरल इकोसिस्टम

जोसेफ डिसूजा केवल धार्मिक गतिविधियों तक सीमित नहीं हैं। वो भारत के भीतर मौजूद वामपंथी-उदारवादी राजनीतिक और मीडिया इकोसिस्टम के एक बेहद मजबूत स्तंभ हैं। जब भी उन पर वित्तीय अपराधों के कारण कानूनी फंदा कसता है, यह पूरा राजनीतिक तंत्र उन्हें बचाने और देश की संप्रभु सरकारों को घेरने के लिए सक्रिय हो जाता है।

सोनिया और राहुल गाँधी के साथ वैचारिक जुगलबंदी

जोसेफ डिसूजा के संबंध कॉन्ग्रेस के शीर्ष नेतृत्व से बेहद पुराने और गहरे हैं। साल 2004 के लोकसभा चुनाव में जब अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली राष्ट्रवादी सरकार की हार हुई और सोनिया गांधी के रिमोट-कंट्रोल वाली यूपीए सरकार सत्ता में आई, तो जोसेफ डिसूजा ने अमेरिकी चर्च नेटवर्क्स को लिखे अपने पत्र और बयानों में इसे ‘ईश्वरीय न्याय’ (Divine Justice) और ‘एक महान चमत्कार’ बताते हुए जश्न मनाया था।

जोसेफ डिसूजा उस समय ‘ऑल इंडिया क्रिश्चियन काउंसिल’ (AICC) के वैश्विक अध्यक्ष के रूप में काम कर रहे थे। इस विशिष्ट घटनाक्रम और उनके इस बयान का पूरा ब्योरा राजीव मल्होत्रा और अरविंदन नीलकंदन की चर्चित खोजी पुस्तक ‘Breaking India’ के अध्याय 8 (The Dalit Freedom Network) में दस्तावेजी साक्ष्यों के साथ दर्ज है।

हालिया घटनाक्रमों में भी यह राजनीतिक जुगलबंदी खुलकर सामने आई है। जब भारत सरकार ने वक्फ बोर्ड के एकाधिकार को विनियमित करने के लिए कदम उठाए, तो राहुल गाँधी ने सोशल मीडिया पर बिशपों के सुर में सुर मिलाते हुए दावा किया कि सरकार वक्फ बिल के बाद अब ईसाई चर्चों की संपत्तियों को निशाना बनाने की योजना बना रही है। यह सीधा राजनीतिक बयानबाजी जोसेफ जैसे दागी बिशपों को कानूनी कार्रवाइयों (ED और CID जांच) से सुरक्षा प्रदान करने और इसे ‘धार्मिक उत्पीड़न’ का रंग देने का एक सुनियोजित प्रयास है।

‘द वायर’ (The Wire) और सिद्धार्थ वरदराजन द्वारा मंच प्रदान करना

जब भारत सरकार ने FCRA संशोधनों के जरिए विदेशी फंडिंग के जरिए होने वाले अवैध धर्मांतरण और मनी लॉन्ड्रिंग पर पूरी तरह शिकंजा कसा, तो भारत विरोधी एजेंडा चलाने के लिए कुख्यात डिजिटल पोर्टल ‘द वायर’ (The Wire) के सह-संस्थापक सिद्धार्थ वरदराजन ने बिशप जोसेफ डिसूजा को अपने चैनल पर एक विशेष मंच प्रदान किया।

‘द वायर’ को दिए अपने लंबे वीडियो इंटरव्यू में जोसेफ डिसूजा ने भारत के संप्रभु संसद द्वारा पारित वित्तीय नियमों को ‘चर्च की संपत्तियों की सीधी सरकारी लूट’ करार दिया। इस इंटरव्यू में उन्होंने बेहद शातिर तरीके से अंतरराष्ट्रीय समुदाय (विशेष रूप से अमेरिका और यूरोपीय देशों) से यह अपील की कि वे भारत के इन कड़े कानूनों पर दखल दें और भारत सरकार पर आर्थिक व कूटनीतिक प्रतिबंध लगाएँ। The Wire पर ये साक्षात्कार उनके साथ वरिष्ठ पत्रकार करण थापर कर रहे थे।

नेशनल फेडरेशन ऑफ चर्चेज इन इंडिया (NFCI) का गठन: एक दबाव समूह

जोसेफ डिसूजा की उच्च-स्तरीय लॉबिंग का ही परिणाम है कि भारत में पहली बार कैथोलिक, प्रोटेस्टेंट, इवेंजेलिकल और पेंटाकोस्टल जैसे आपस में वैचारिक मतभेद रखने वाले चर्चों को एक साथ लाकर ‘नेशनल फेडरेशन ऑफ चर्चेज इन इंडिया’ (NFCI) का गठन किया गया है। इसके अध्यक्ष के रूप में कार्डिनल एंथनी पूला को स्थापित किया गया। इस फेडरेशन का असली उद्देश्य कोई धार्मिक सुधार नहीं बल्कि भारत के विभिन्न राज्यों में लागू कड़े धर्मांतरण-विरोधी कानूनों (Anti-Conversion Laws) और केंद्र सरकार के एफसीआरए नियमों के खिलाफ एक संयुक्त, शक्तिशाली राजनीतिक और सामाजिक दबाव समूह (Pressure Group) के रूप में कार्य करना है, ताकि उनकी वित्तीय सल्तनत सुरक्षित रह सके।

जोसेफ डिसूजा के भारत विरोधी बयान, वीडियो और ब्लॉग  

जोसेफ डिसूजा लगातार अंतरराष्ट्रीय मीडिया, अमेरिकी थिंक-टैंक्स और डिजिटल मंचों पर भारत की छवि को एक ‘असहिष्णु’, ‘ईसाई-विरोधी’ और ‘फासीवादी’ राष्ट्र के रूप में पेश करने का एक सतत अभियान चला रहे हैं। उनके बयानों, वीडियो साक्षात्कारों और ब्लॉग पोस्ट का विश्लेषण उनके भारत विरोधी टूलकिट के खतरनाक मंसूबों को उजागर करता है:

1. वैश्विक मीडिया पर जहर उगलना और नाजी जर्मनी से तुलना

  • CBN न्यूज पर उगला जहर: अमेरिकी क्रिश्चियन ब्रॉडकास्टिंग नेटवर्क (CBN News) को दिए गए अपने एक बेहद आपत्तिजनक साक्षात्कार में जोसेफ डिसूजा ने भारत के वित्तीय नियमों (FCRA Amendments) की तुलना सीधे नाजी जर्मनी के तानाशाह एडॉल्फ हिटलर द्वारा यहूदियों के साथ किए गए सुव्यवस्थित और क्रूर उत्पीड़न (Nazi Persecution) से की। उनका यह बयान भारत की लोकतांत्रिक संस्थाओं और उसकी न्यायप्रणाली का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर घोर अपमान है।
  • भारत को बताया गुलामों का देश: कनाडाई मिशनरी टीवी शो ‘100 Huntley Street’ और अपनी वीडियो सीरीज ‘Dalit Freedom Part 2’ में दिए गए बयानों में जोसेफ डिसूजा ने भारत की गौरवशाली 3000 साल से पुरानी सनातन सभ्यता और संस्कृति को ‘केवल गुलामी, उत्पीड़न और अंधकार का इतिहास’ बताया। वे पश्चिमी दर्शकों को यह समझाते हैं कि ईसाइयत के आने से पहले भारत में कोई मानवीय मूल्य नहीं थे, ताकि उनके कन्वर्जन एजेंडे को नैतिक वैधता मिल सके।

2. भारतीय न्यायपालिका पर सीधा हमला

जब भारत के सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) और विभिन्न राज्यों के उच्च न्यायालयों ने प्रलोभन, धोखे और जबरन किए जाने वाले अवैध धर्मांतरण पर रोक लगाने वाले राज्य कानूनों को संवैधानिक रूप से वैध और देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए आवश्यक ठहराया, तो जोसेफ डिसूजा ने भारतीय जजों और न्यायपालिका के खिलाफ बेहद आक्रामक रुख अपनाया। अपने वीडियो बयानों (SC Judges Criticism Videos) में उन्होंने भारतीय न्यायपालिका को ‘एकतरफा और बहुसंख्यकवादी एजेंडे से प्रभावित’ बताया।

आखिर क्यों एक ईसाई धर्म प्रचारक (इवेंजेलिकल पादरी) अचानक भारत की सबसे बड़ी अदालत (सुप्रीम कोर्ट) को ‘बाइबिल के मूल्यों’ और ‘निर्दोषता’ पर लेक्चर देने लगा? सुप्रीम कोर्ट के जजों को ‘शांत दिमाग’ रखने की सलाह देने के इस पढ़े-लिखे और सभ्य मुखौटे के पीछे, दरअसल एक बहुत ही सोची-समझी चाल छिपी है।

जोसेफ डिसूजा भारतीय अदालतों की कानूनी कार्रवाइयों के बीच चालाकी से बाइबिल की बातों को घुसा रहे हैं। ऐसा करके वे चुपके से भारत के धर्मनिरपेक्ष कानूनों और अदालती जाँच को कमजोर करने की कोशिश कर रहे हैं। वे एक ऐसा मनोवैज्ञानिक माहौल तैयार कर रहे हैं जिससे उनके खिलाफ चल रही पैसे की हेराफेरी की आम कानूनी जाँच को उनके चर्च के खिलाफ एक ‘धार्मिक युद्ध’ के रूप में पेश किया जा सके।

3. कंचा इलैया शेफर्ड के साथ हिंदू विरोधी मंच साझा करना

जोसेफ डिसूजा अक्सर कट्टर हिंदू-विरोधी और भारत-विद्वेषी विचारक कंचा इलैया शेफर्ड के साथ अंतरराष्ट्रीय मंचों और पॉडकास्ट (जैसे- Premier Unbelievable Podcast) पर दिखाई देते हैं। कंचा इलैया वही व्यक्ति हैं जो चीनी फंडिंग के गहरे घेरे में आए और दिल्ली पुलिस की जाँच के दायरे में मौजूद ‘न्यूजक्लिक’ (Newsclick) पोर्टल के नियमित लेखक रहे हैं। ये दोनों मिलकर पश्चिमी मंचों पर हिंदू धर्म, उसकी सामाजिक व्यवस्था और भारतीय संस्कृति को पूरी तरह से नीचा दिखाने के लिए डॉ. बी.आर. अंबेडकर, जवाहरलाल नेहरू और कार्ल मार्क्स के विचारों की अपनी सुविधानुसार तोड़-मरोड़ कर व्याख्या करते हैं और भारत के खिलाफ एक वैचारिक मोर्चा खोलते हैं।

ब्लॉग और पोर्टल्स पर भारत विरोधी एजेंडा

जोसेफ डिसूजा अपने व्यक्तिगत ब्लॉग और अंतरराष्ट्रीय इवेंजेलिकल पोर्टल्स पर लगातार भारत की राजभाषा हिंदी, भारतीय राष्ट्रवाद (Indian Nationalism) और राज्यों के धर्मांतरण-विरोधी कानूनों के खिलाफ लेख लिखते रहते हैं। उनका स्पष्ट मानना है कि भारत में धर्म परिवर्तन का अधिकार अबाधित होना चाहिए, चाहे उसके लिए विदेशी धन का कितना भी अंधाधुंध इस्तेमाल क्यों न किया जा रहा हो।

एक किले का ढहना, एक विश्वास का लौटना: बंगाल में भाजपा की जीत ने बदला राजनीतिक मनोविज्ञान, UP की राह आसान

बीते दिनों 5 राज्यों के विधानसभा चुनाव के नतीजे आए, जिसमें भाजपा को शानदार सफलता हासिल हुई। BJP/NDA ने 5 में से 3 राज्य पश्चिम बंगाल, असम, पांडिचेरी में अपनी सरकार बनाई। इसमें बंगाल में पार्टी का प्रदर्शन उल्लेखनीय है। बंगाल विधानसभा चुनाव में जीत भाजपा के लिए एक बड़ी चुनौती थी। ममता बनर्जी के वर्चस्व वाले राज्य में जीत हासिल करना, एक बड़ा मुकाम है। 2021 के चुनाव में भाजपा को पुरजोर आजमाइश के बाद भी हार मिली थी और बंगाल पिछले 15 वर्षों से ममता बनर्जी का अभेद्य किला बना हुआ था, इस परिस्थिति में जीत हासिल करना बिल्कुल भी आसान नहीं था।

भाजपा की इस प्रचंड जीत का अपना ही राजनीतिक महत्व है। बंगाल जीतना भाजपा के लिए सिर्फ एक राज्य का चुनाव जीतने मूल्य जैसा नहीं था बल्कि यह एक राजनीतिक जीत के साथ-साथ एक प्रतीकात्मक जीत भी है। पिछले विधानसभा चुनाव की बात करें तो सीटों के लिहाज से भाजपा ने पूरी स्थिति को ही पलट दिया है, जितनी सीटें तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) को 2021 के विधानसभा चुनाव में प्राप्त हुई थी, कमोवेश उतनी ही सीटें भाजपा को 2026 के विधानसभा चुनाव में प्राप्त हुई है। बंगाल की यह जीत सिर्फ एक चुनावी राज्य की जीत मात्र नहीं है बल्कि यह उनके कार्यकर्ताओं के लिए एक बूस्टर डोज है।

गौरतलब है कि 2014 से लगातार 2 लोकसभा चुनाव में अकेले अपने दम पर केंद्र में अपनी सरकार स्थापित करने बनाने वाली भाजपा 2024 के लोकसभा चुनाव में 32 सीटों से अकेले दम पर बहुमत प्राप्त करने से चूक गई। हालाँकि, NDA के समर्थन से मोदी तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने में सफल हुए। इस प्रतीकात्मक हार से भाजपा कार्यकर्ताओं में भी आत्मविश्वास का अभाव उत्पन्न हुआ और विपक्षी दलों में भी यह भावना ओत-प्रोत हो रही थी कि अब मोदी को हराया जा सकता है केंद्र से उनकी सरकार को बेदखल किया जा सकता है। उसे अब यह उम्मीद है जागृत हो रही थी कि देर सबेर इंडी गठबंधन की सरकार केंद्र में बन सकती है।

परंतु, ममता दीदी द्वारा शासित बंगाल जैसे राज्य की कठिन परीक्षा को उत्तीर्ण करके भाजपा ने अपने कार्यकर्ताओं में एक नई ऊर्जा का संचार किया है और उनके दिमाग में आई नकारात्मकता को समाप्त किया है। भाजपा कोई भी असंभव राजनीतिक उद्देश्य पूरा कर सकती है इसका विश्वास बंगाल जीत कर उसने अपने कार्यकर्ताओं में पुनः भरा है और उसे प्रमाणित किया है। यह आत्मविश्वास उसके भविष्य की दिशा के लिए अत्यंत आवश्यक था।

अगले साल 5 राज्यों में विधानसभा चुनाव है, जिसमें से उत्तर प्रदेश जीतना भाजपा के लिए सर्वोच्च प्राथमिकता में है। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था कि दिल्ली का रास्ता लखनऊ से होकर जाता है। अतः ये स्पष्ट है कि भाजपा 2029 का रास्ता यूपी विधानसभा जीत कर सुनिश्चित करना चाहेगी।

योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश में माफियाराज का खात्मा उनकी श्रेष्ठ उपलब्धियों में से रहा है जिसके कारण से प्रदेश में कानूनी स्थिरता मजबूत हुई है, शासन प्रशासन में काफी हद तक सुधार हुआ है। बीते सालों में योगी आदित्यनाथ की छवि भी एक सख्त प्रशासक के तौर पर उभरी है, जो आम जनमानस के बीच में काफी लोकप्रिय है। इसके अतिरिक्त उन्हे एक निर्णायक नेतृत्वकर्ता, हिंदुत्व के प्रतीक और जनप्रिय नेता के तौर पर देखा जाता है। प्रदेश में योगी ब्रांड ना सिर्फ एक लोकप्रिय छवि है अपितु इससे उन्हें ना सिर्फ प्रदेश में बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त है। बंगाल की विजय उत्तर प्रदेश में भी बूस्टर का काम करेगी।

उत्तर प्रदेश के साथ साथ भाजपा के लिए पंजाब जैसे राज्य में अपनी पैठ बड़ी करना और उत्तरखंड में सरकार का दोहराव पार्टी के लिए बड़ा असाइनमेंट होगा। हालाँकि, पंजाब से राघव चड्डा समेत 7 राज्यसभा सासंद के आम आदमी पार्टी (AAP) छोड़ने के बाद भाजपा अपने लिए राज्य विधानसभा चुनाव में अवसर तलाश रही है। उसे अभी भी राज्य में एक सुदृढ़ चेहरे की आवश्यकता है जो उसे नेतृत्व दे पाए और संगठनिक स्थिरता दे पाए। इन सभी राज्यों के चुनाव एक प्रकार से जनता का रुझान उसके बाद आने वाले लोकसभा चुनाव के लिए तय करेंगे। वर्तमान में भाजपा के लिए बंगाल जैसा कठिन राज्य जीतना उसके भविष्य की दिशा और संगठन में ऊर्जा संचार हेतु अति आवश्यक था।

₹3.8 लाख करोड़ का निवेश, 50+ समझौते और 6 दिन में 5 देशों का दौरा: जानें- PM मोदी की यात्रा में किस देश से हुई क्या डील और कैसे मिलेगा ‘मेक इन इंडिया’ को बढ़ावा

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 15 मई से 21 मई तक यानी 6 दिनों में 5 देशों- यूएई, नीदरलैंड, स्वीडन, नॉर्वे और इटली का दौरा किया। इसका मकसद भारत में विदेशी निवेश यानी एफडीआई, नई तकनीक और मैन्युफैक्चरिंग लाना था। इन देशों में हुए समझौतों से यह साफ है कि आने वाले वर्षों में भारत में करीब ₹3.8 लाख करोड़ निवेश हो सकते हैं।

पीएम मोदी के दौरे का मुख्य फोकस ऊर्जा सुरक्षा, रक्षा, नई तकनीक, सेमीकंडक्टर, ग्रीन एनर्जी और यूरोप के साथ व्यापार बढ़ाना रहा। इस दौरे में भारत ने कई महत्वपूर्ण समझौते किए, जिनसे आने वाले वर्षों में अर्थव्यवस्था, रोजगार, तकनीक और रणनीतिक ताकत बढ़ने की उम्मीद है।

इस दौरे के दौरान PM मोदी ने अलग-अलग सेक्टरों की 50 से अधिक ग्लोबल कंपनियों के CEO और सीनियर अधिकारियों से मुलाकात की। इनमें से कई कंपनियों की भारत में पहले से ही मौजूदगी है। पीएम मोदी के साथ बैठक के बाद भारत में उनका कुल निवेश करीब 180 अरब डॉलर होने का अनुमान है।

यूएई दौरे से ‘ऊर्जा सुरक्षा’ को फायदा

पीएम मोदी सबसे पहले यूएई गए। यहाँ करीब 3 घंटे रुके और 7 एमओयू पर हस्ताक्षर किए। इसमें सबसे अहम था – स्ट्रैटजिक पेट्रोलियम रिजर्व एग्रीमेंट। इसके तहत अबुधाबी नेशनल ऑयल कंपनी अब भारत के लिए 3 करोड़ बैरल कच्चा तेल का भंडारण करेगी। तेल संकट के दौरान इस ऑयल पर पहला दावा भारत का होगा। यूएई इस रिजर्व का किराया भी देगा। इसके अलावा भारत के लिए फुजेराह में भी पेट्रोलियम रिजर्व की क्षमता बढ़ाई जा रही है।

संयुक्त अरब अमीरात ने भारत के विभिन्न क्षेत्रों में 5 अरब डॉलर यानी करीब ₹48000 करोड़ से अधिक के निवेश की घोषणा की है। यह निवेश दोनों देशों के बीच व्यापार, ऊर्जा सुरक्षा और रक्षा संबंधों को मजबूत करने के लिए किया गया है। इनमें सबसे अहम है गुजरात के वडीनगर में जहाज रिपेयरिंट सेंटर का बनाया जाना, जहाँ नाविकों को ट्रेनिंग दी जाएगी।

दरअसल भारत का मुख्य फोकस ऊर्जा और रक्षा क्षेत्र था। UAE पहले से भारत का बड़ा निवेशक है और भारत का तीसरा सबसे बड़ा ट्रेड पार्टनर भी है। MEA के अनुसार, यूएई भारत में पिछले 25 वर्षों में सबसे बड़े निवेशकों में रहा है। पीएम मोदी के इस दौरे से खाड़ी देशों में काम कर रहे 45 लाख से अधिक भारतीयों के हित मजबूत होंगे।

यूएई के साथ भारत ने रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व, एलपीजी सप्लाई और रक्षा सहयोग से जुड़े समझौते किए। इसके तहत भारत ने तेल भंडारण यानी स्ट्रेटजिक पेट्रोलियम रिजर्व बढ़ाने पर समझौता किया। एलपीजी और LNG सप्लाई बढ़ाने पर सहमति बनी, रक्षा उद्योग, साइबर सुरक्षा और समुद्री सुरक्षा में सहयोग को लेकर समझौते हुए। यूएई की भारतीय बैंकिंग और ऊर्जा सेक्टर में निवेश में दिलचस्पी है।

भारत के साथ ऑयल की डील को काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इससे मिडिल ईस्ट संकट के बीच भारत की ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी। खास बात यह है कि इन तेल टैंकरों को होर्मुज स्ट्रेट से होकर नहीं गुजरना पड़ेगा। यूएई से मिलने वाले कच्चे तेल में से 1.37 करोड़ बैरल भारत में स्टोर होगा, बाकी यूएई के फुजैराह में होगा। इससे भारत का स्ट्रैटजिक रिजर्व ऑयल 14-15 दिनों का हो जाएगा, जो अभी मात्र 9 दिन का है। इससे तेल की कीमतों में अचानक उछाल का असर कम होगा। देश को सस्ता और स्थिर ईंधन सप्लाई चेन मिल जाएगा।

नीदरलैंड दौरे में 17 समझौतों पर हुए हस्ताक्षर

यूरोपीय देश भारत में ग्रीन हाइड्रोजन, सौर ऊर्जा और पवन ऊर्जा, इलेक्ट्रिक गाड़ियाँ, ईवी सप्लाई चेन में निवेश करने जा रहा है। इससे भारत में ऊर्जा आयात में कमी आएगी, इलेक्ट्रिक व्हीकल उद्योग तेज होगा, नई फैक्ट्रियाँ लगेंगी और रोजगार के अवसर बढ़ेंगे।

नीदरलैंड दौरे के दौरान सेमीकंडक्टर और ग्रीन टेक्नोलॉजी काफी अहम रहे हैं। इसको लेकर भारत ने नीदरलैंड के साथ 17 समझौते किए। सबसे बड़ा फोकस सेमीकंडक्टर सेक्टर पर रहा। नीदरलैंड की कंपनी ASML दुनिया की सबसे बड़ी चिप मशीन निर्माता कंपनी है। भारत चाहता है कि गुजरात और अन्य राज्यों में बनने वाले चिप प्लांट्स को डच तकनीक और सपोर्ट मिले।

इसको देखते हुए सेमीकंडक्टर सहयोग, ग्रीन हाइड्रोजन, जल प्रबंधन, रक्षा और तकनीक का सहयोग, माइग्रेशन एंड मोबिलिटी समझौते हुए। चिप बनाने की लिथोग्राफी तकनीक में एएसएमएल कंपनी का एकाधिकार है। ये कंपनी टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स के 91 हजार करोड़ रुपए से बनाई जा रही देश के पहले सेमीकंडटर प्लांट तैयार करने में मदद करेगी।

आने वाले वर्षो में भारत में सेमीकंडक्टर फैब्रिकेशन, चिप मशीनरी, इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग, AI हार्डवेयर जैसे क्षेत्रों में निवेश होगा। इन समझौतों से भारत की सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री को बड़ा समर्थन मिलेगा। चिप निर्माण में चीन जैसे देशों पर निर्भरता घटेगी। ग्रीन एनर्जी सेक्टर में नई तकनीक आएगी। जल संकट और कृषि प्रबंधन में डच विशेषज्ञता का लाभ मिलेगा। भारतीय छात्रों और पेशेवरों को यूरोप में ज्यादा अवसर मिलेंगे। चीन और ताइवान पर निर्भरता कम होगी। हाई-टेक नौकरियाँ बढ़ेंगी और मेक इन इंडिया को मजबूती मिलेगी।

चोल वंश की तांबे की प्लेटें भारत को लौटाई– नीदरलैंड ने चोल राजवंश के समय की तांबे की प्लेटें भारत को वापस की। इसमें तमिल भाषा में चोल वंश के बारे में बताया गया है। 18वीं सदी में डच इसे उठाकर ले गए थे। ये ऐतिहासिक प्रमाण देश की संस्कृति के लिए काफी अहम है।

स्वीडन दौर में 6 द्विपक्षीय समझौते

पीएम मोदी का स्वीडन दौरा भी खास रहा। स्वीडन ने अपने सर्वोच्च राष्ट्रीय सम्मान से नवाजा और स्ट्रेटजिक साझेदारी के तहत 6 समझौते हुए। स्वीडन यात्रा में पीएम मोदी ने यूरोप की बड़ी कंपनियों और इंडस्ट्री के सीईओ से मुलाकात की। इस दौरान एआई, 6जी और इंडस्ट्री पर जोर रहा। यूरोपीय कंपनियों का भारत में निवेश होने से भारत का ऊर्जा आयात कम होगा। इलेक्ट्रिक व्हीकल उद्योग तेज होगा, नई फैक्ट्रियाँ लगेगी और रोजगार के अवसर बढ़ेंगी।

भारत और स्वीडन ने आने वाले 5 सालों में यानी 2026-2030) के बीच द्विपक्षीय व्यापार और निवेश को दोगुना करने पर सहमति जताई है। 2025 में भारत और स्वीडन के बीच द्विपक्षीय व्यापार 7.75 अरब डॉलर यानी 64625 करोड़ रुपए पहुँच चुका है। यह अगले 5 सालों में बढ़कर करीब 15 अरब डॉलर पहुँचाने का लक्ष्य रखा गया है।

AI यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस सहयोग, 6G रिसर्च, ग्रीन इंडस्ट्रियल टेक्नोलॉजी में सहयोग से भारत को काफी फायदा होगा। यहाँ स्किल डेवलपमेंट के साथ साथ रोजगार के नए अवसर मिलेंगे। भारत में नई कंपनियाँ लगने से मेक इन इंडिया और मैन्युफैक्चरिंग को सपोर्ट मिलेगा और सबसे अहम है कि भारत यूरोप के सप्लाई चेन नेटवर्क का हिस्सा बन जाएगा।

स्वीडन दौरे के दौरान एक अहम बात ये हुई कि मदर ऑफ ऑल डील यानी यूरोपीय यूनियन के साथ हुए मुक्त व्यापार समझौते को लागू करने पर सहमति बनी। यूरोपीय यूनियन की प्रेसिडेंट उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने वादा किया है कि साल 2026 के अंत तक इसपर साइन वो कर देंगी।

पीएम मोदी का नॉर्वे दौरा

यूरोप का अहम देश नॉर्वे पीएम मोदी का चौथा अहम पड़ाव रहा। 43 साल बाद भारत का प्रधानमंत्री नॉर्वे पहुँचा था। इस दौरान 12 समझौते हुए।इनमें सबसे अहम ‘Triangular Development Cooperation’ समझौता है। इसके तहत नॉर्वे भारत में ग्रीन एनज्री के क्षेत्र में निवेश करेगा।

इसके अलावा सौर उर्जा, पवन ऊर्जा, पनबिजली जैसे क्लीन ऊर्जा में निवेश करेगा। भारत का लक्ष्य 2030 तक 500 गीगावाट क्लीन एनर्जी उत्पादन का लक्ष्य है। वर्तमान में सिर्फ 283.46 गीगावाट का क्लीन एनर्जी का उत्पादन देश में होता है।

भारत के साथ हुए समझौतों के अंतर्गत ग्लोबल साउथ देशों में संयुक्त विकास परियोजनाएँ, ब्लू इकोनॉमी और समुद्री सहयोग, आर्कटिक रिसर्च, ग्रीन टेक्नोलॉजी से जुड़ा समझौता शामिल है।

पीएम मोदी की इस यात्रा के दौरान EFTA व्यापार समझौते के तहत अगले 15 वर्षों में भारत में 100 अरब डॉलर यानी लगभग 8.4 लाख करोड़ रुपए निवेश का लक्ष्य रखा गया है। इससे करीब 10 लाख नई नौकरियाँ पैदा होंगी।

भारत को इससे काफी फायदा होने जा रहा है। इससे भारत की वैश्विक नेतृत्व भूमिका मजबूत होगी। समुद्री व्यापार और रिसर्च में नई संभावनाओं का द्वार खुलेगा। भारत को यूरोप के ग्रीन फंड और तकनीक तक पहुँच हो पाएगी।

यूरोप का सबसे बड़ा तेल उत्पादक देश होने के नाते नॉर्वे से भारत तेल और गैस भी खरीदता रहा है। भारत ने एलपीजी की खरीद भी इनदिनों नॉर्वे से बढ़ाई है।

इटली दौरे के दौरान अहम समझौता

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी यात्रा के अंतिम पड़ाव इटली पहुँचे, जहाँ प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी के बीच हुई द्विपक्षीय वार्ता के दौरान 10 महत्वपूर्ण समझौतों पर हस्ताक्षर किए। पीएम मोदी और पीएम जॉर्जिया मेलोनी की केमेस्ट्री ने भी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा।

पीएम की इटली यात्रा के दौरान दोनों देशों ने 20 अरब यूरो यानी करीब 1 लाख 80 हजार करोड़ रुपए से अधिक के व्यापार लक्ष्य को 2029 तक हासिल करने का संकल्प लिया है। फिलहाल ये 14 अरब यूरो है। द्विपक्षीय संबंधों को ‘विशेष रणनीतिक साझेदारी’ यानी स्पेशल स्ट्रेटजिक पार्टनरशिप तक अपग्रेड किया गया है, जो काफी अहम है।

इटली के साथ जो समझौते हुए हैं उनमें रक्षा उत्पादन और को-डेवलपमेंट क्रिटिकल मिनरल्स सहयोग और IMEC कॉरिडोर यानी इंडिया मिडिल ईस्ट यूरोप कॉरिडोर शामिल है। शिक्षा, कृषि और विज्ञान में सहयोग के साथ-साथ आर्थिक अपराध रोकने में सहयोग पर सहमति बनी है।

भारत को इसका फायदा यह होगा कि रक्षा निर्माण में यूरोपीय तकनीक मिलेगी। चीन के मुकाबले यूरोप में वैकल्पिक सप्लाई चेन बनेगी। इससे भारतीय निर्यात बढ़ेगा। IMEC कॉरिडोर से भारत-यूरोप व्यापार में जबरदस्त इजाफा होने की उम्मीद है। इलेक्ट्रिक गाड़ियों और बैटरी उद्योग के लिए जरूरी मेटल्स सप्लाई सुरक्षित होगी

इस पूरे दौरे से भारत को 5 बड़े रणनीतिक फायदे मिलते दिख रहे हैं। सबसे अहम ऊर्जा सुरक्षा को मजबूती मिल रही है। ऑयल संकट से निपटने के लिए आगे आने वाले दिनों में तेल और गैस सप्लाई अधिक सुरक्षित हो जाएँगे। सेमीकंडक्टर और AI टेक्नोलॉजी समेत दूसरे सेक्टर में टेक्नॉलोजी तेजी से आने वाले हैं। मेक इन इंडिया को बल मिलेगा और रक्षा निर्माण के क्षेत्र में आत्मनिर्भर भारत के लिहाज से आधुनिक हथियार और तकनीक उत्पादन बढ़ेगा।

चीन के बजाय यूरोप के साथ व्यापार भारत के हित में होगा। मुक्त व्यापार समझौते के लागू होने के बाद भारत-EU आर्थिक संबंध दुनिया में नई आर्थिक परिभाषा लिखेगी। इससे सप्लाई चेन और तकनीकी विकल्प के क्षेत्र में भारत मीलों आगे बढ़ जाएगा।