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कॉन्ग्रेस-TMC से दूर जाता मुस्लिम वोटबैंक, बढ़ रहे ‘अपनी’ पार्टियों की ओर कदम: समझें- क्यों पश्चिम बंगाल में ओवैसी-हुमायूँ कबीर का गठबंधन दिखा सकता है दम

पश्चिम बंगाल की सियासत में 2026 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले एक ऐसा गठबंधन सामने आया है जो मुस्लिम मतदाताओं की बदलती सोच को पूरी तरह उजागर कर रहा है। असदुद्दीन ओवैसी की ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) ने तृणमूल कॉन्ग्रेस से निष्कासित पूर्व विधायक हुमायूँ कबीर की आम जनता उन्नयन पार्टी (AJUP) के साथ गठबंधन का ऐलान कर दिया है।

असदुद्दीन ओवैसी ने टीएमसी सरकार पर मुसलमानों के साथ ‘अन्याय’ का आरोप लगाते हुए कहा कि यह गठबंधन मुस्लिम बहुल इलाकों में अल्पसंख्यकों की आवाज को मजबूत करेगा। कबीर की पार्टी पहले ही 182 सीटों पर चुनाव लड़ने का फैसला कर चुकी है।

अब AIMIM रणनीतिक रूप से करीब 8 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारेगी, जिनमें बीरभूम, मुर्शिदाबाद और मालदा जैसे मुस्लिम बहुल इलाके शामिल हैं। वहीं कबीर खुद मुर्शिदाबाद जिले की रेजीनगर और नौदा सीट से चुनाव लड़ेंगे। उनकी पार्टी ने काफी सारी सीटों पर उम्मीदवारों की घोषणा पहले से कर चुकी है।

यह गठबंधन महज सीट बँटवारे का नहीं, बल्कि मुस्लिम वोटबैंक को पारंपरिक सेकुलर दलों से अलग करके ‘अपनी’ पहचान वाली पार्टियों के साथ खड़ा करने का बड़ा प्रयोग है।

पश्चिम बंगाल में मुस्लिम वोट का गणित: 294 सीटों पर कितना असर?

पश्चिम बंगाल विधानसभा में कुल 294 सीटें हैं। 2011 जनगणना के अनुसार राज्य में मुसलमानों की आबादी 27.01 प्रतिशत थी, जो वर्तमान अनुमानों के मुताबिक 29-30 प्रतिशत के करीब पहुँच गई है। राजनीतिक रूप से यह वोट बैंक 85 मुस्लिम-बहुल सीटों पर निर्णायक भूमिका निभाता है, जहाँ मुस्लिम आबादी 35 से 66 प्रतिशत तक है। इनमें मुर्शिदाबाद (66 प्रतिशत), मालदा (51 प्रतिशत), उत्तर दिनाजपुर (50 प्रतिशत), बीरभूम (37 प्रतिशत) और दक्षिण 24 परगना (35 प्रतिशत) जैसे जिले मुख्य हैं। अगर 25-30 प्रतिशत मुस्लिम वोट वाले इलाकों को भी जोड़ें तो प्रभावित सीटों की संख्या 110-120 तक पहुँच सकती है।

साल 2021 के चुनाव में टीएमसी ने इन 85 मुस्लिम-बहुल सीटों में से 75 पर जीत हासिल की थी (कुल 213 सीटें जीतीं)। भाजपा मात्र 5 सीटें ही ले पाई थी। लेकिन अब AJUP-AIMIM गठबंधन के आने से टीएमसी का वोट बैंक बंटने का खतरा साफ दिख रहा है। अगर गठबंधन 40-50 सीटों पर भी मजबूत प्रदर्शन करता है या मुस्लिम वोट शेयर 15-20 प्रतिशत तक पहुँच जाता है, तो टीएमसी को 50-70 सीटों का नुकसान हो सकता है।

कबीर का खुला दावा है कि अगर विधानसभा लटक गई तो उनकी पार्टी किंगमेकर बनेगी और मुस्लिम डिप्टी सीएम या यहाँ तक कि सीएम पद की माँग रखेगी। बता दें कि पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव दो चरणों में 23 और 29 अप्रैल 2026 को होंगे और मतगणना 4 मई को होगी।

महाराष्ट्र में दिखा ट्रेलर- जहाँ AIMIM ने 114-125 वार्ड जीतकर दिखाया दम

जनवरी 2026 के महाराष्ट्र नगर निकाय चुनावों में AIMIM ने 29 नगर निगमों में 114 से 125 वार्ड जीत लिए थे। इसकमें छत्रपति संभाजीनगर में 33 सीटें, मालेगांव में 21 और अन्य शहरों में अच्छी संख्या में वार्ड जीतकर पार्टी ने समाजवादी पार्टी, एमएनएस और एनसीपी को पीछे छोड़ दिया। AIMIM के राष्ट्रीय प्रवक्ता वारिस पठान ने कहा कि जनता अब पारंपरिक दलों पर भरोसा नहीं कर रही है।

सेकुलर दलों का नुकसान और बंगाल में गठबंधन की रणनीति

इन नतीजों से सबसे ज्यादा नुकसान टीएमसी, कॉन्ग्रेस और वापमंथी पार्टियों होता दिख रहा है, क्योंकि मुस्लिम वोटबैंक अब बंट रहा है। ओवैसी उन मुद्दों को उठाते हैं जिन पर पारंपरिक सेकुलर दल चुप रहते हैं, खासकर अल्पसंख्यक अधिकार, असुरक्षा और स्थानीय समस्याएँ। ऐसे में युवा मुस्लिम मतदाताओं में उनकी बोलने की शैली को बेहद पसंद किया जाता है।

पश्चिम बंगाल में गठबंधन की रणनीति बिल्कुल स्पष्ट है। AIMIM तीन सीटें बीरभूम, तीन मुर्शिदाबाद और दो मालदा में लड़ेगी, जबकि AJUP बाकी सीटों पर। दोनों मिलकर मुस्लिम बहुल इलाकों में टीएमसी का वोट 10-15 प्रतिशत तक घटा सकते हैं। कबीर ने दिसंबर 2025 में मुर्शिदाबाद में ‘बाबरी मस्जिद’ शैली की मस्जिद की नींव रखी थी, जिसके बाद टीएमसी ने उन्हें निष्कासित कर दिया। इस इमोशनल कार्ड से मुस्लिम वोट ध्रुवीकृत होने की संभावना बढ़ गई है।

दोनों ताकतें कैसे एकजुट करेंगी मुस्लिम वोटबैंक?

ओवैसी राष्ट्रीय स्तर पर मुस्लिम असुरक्षा और टीएमसी-कॉन्ग्रेस की ‘नाकामी’ का मुद्दा उठाते हैं। कबीर स्थानीय लीडर हैं, मुर्शिदाबाद जैसे इलाकों में उनकी पकड़ गहरी है। दोनों मिलकर वोट को दो हिस्सों में बाँटने की बजाय एकजुट करने का काम कर रहे हैं, जिसमें AIMIM राष्ट्रीय छवि देगी तो AJUP जमीनी ताकत। अगर यह सफल हुआ तो 2021 की टीएमसी की 213 सीटों वाली जीत दोहराना मुश्किल हो जाएगा।

दीदी बनाम बीजेपी से आगे बढ़ी राजनीतिक लड़ाई

पश्चिम बंगाल की राजनीति में 2026 का चुनाव अब ‘दीदी बनाम भाजपा’ से आगे बढ़कर ‘अस्तित्व की लड़ाई’ की ओर मुड़ गया है। ओवैसी (AIMIM) और हुमायूँ कबीर (AJUP) का गठबंधन उन इलाकों में सीधे तौर पर टीएमसी (TMC) की जड़ें खोदने की तैयारी में है, जहाँ मुस्लिम मतदाता 50% से अधिक हैं।

मुर्शिदाबाद यानी ‘किंगमेकर’ का अपना घर

मुर्शिदाबाद जिला इस गठबंधन का नर्व सेंटर (मुख्य केंद्र) है। यहाँ की लगभग 66% आबादी मुस्लिम है और जिले की 22 सीटों में से अधिकांश पर मुस्लिम मतदाता ही हार-जीत तय करते हैं। हुमायूँ कबीर यहीं के कद्दावर नेता हैं।

मुर्शिदाबाद की हरेक विधानसभा सीट और मुस्लिम आबादी (%) पर नजर डालें तो इस गठबंधन के प्रभाव का कारण भी साफ हो जाएगा। इसमें रेजीनगर सीट पर करीब 75% वोटर मुस्लिम हैं, जहाँ से खुद हुमायूँ कबीर खुद चुनाव लड़ रहे हैं। वहीं, नाओडा में 70% तक मुस्लिम वोटर हैं, जिसकी वजह से ये कबीर की दूसरी पसंदीदा सीट बन गई है। इस सीट पर उनका मजबूत जनाधार है। वहीं डोमकल में 85% तक मुस्लिम वोटर हैं, ये सीट कट्टरपंथी राजनीति का गढ़ भी मानी जाती है।

बात रानीनगर की करें तो यहाँ 80% तक मुस्लिम वोटर हैं। ये सीमावर्ती क्षेत्र है, ऐसे में यहाँ घुसपैठ और नागरिकता के मुद्दे हावी हैं। इसके अलावा भगवानगोला में करीब 82% आबादी मुस्लिम है, जहाँ AIMIM का संगठन पिछले दो सालों में बहुत मजबूत हुआ है। आखिरी सीट हरिहरपाड़ा की बात करें तो यहाँ भी करीब 75% मुस्लिम वोटर हैं। यहाँ के स्थानीय मुद्दों पर टीएमसी से नाराजगी का फायदा गठबंधन को मिल सकता है।

मालदा यानी उत्तर बंगाल का प्रवेश द्वार

मालदा में मुस्लिम आबादी करीब 51% है। यहाँ पारंपरिक रूप से कॉन्ग्रेस मजबूत रही थी, लेकिन 2021 में टीएमसी ने यहाँ बड़ी सेंध लगाई थी। अब ओवैसी यहाँ कॉन्ग्रेस और टीएमसी दोनों के वोटों में बँटवारा करेंगे। मालदा की हरेक विधानसभा सीट और मुस्लिम आबादी (%) पर नजर डालें तो इस गठबंधन के प्रभाव का कारण भी साफ हो जाएगा।

इसमें सुजापुर की करें तो करीब 90% मुस्लिम आबादी के साथ ये पश्चिम बंगाल की सबसे ज्यादा मुस्लिम आबादी वाली सीटों में से एक है। जाहिर सी बात है कि इन दलों की इस पर खास नजर है। वहीं, मोथाबाड़ी में 75% मुस्लिम वोटर हैं। यहाँ के युवा मतदाता ओवैसी की रैलियों में भारी भीड़ जुटाते हैं। कालियाचक की बात करें तो करीब 80% मुस्लिम आबादी वाला ये क्षेत्र सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील और राजनीतिक रूप से सक्रिय माना जाता है। वहीं, 65% मुस्लिम वोटरों के साथ चांचल विधानसभा सीट टीएमसी के लिए ‘स्पॉइलर’ बन सकती है।

उत्तर दिनाजपुर पर बिहार के ‘सीमांचल’ का प्रभाव

बिहार के सीमांचल से सटे होने के कारण इस जिले पर ओवैसी का प्रभाव सबसे ज्यादा दिखने की उम्मीद है। साल 2020 और 2025 में बिहार में मिली जीत की लहर यहाँ स्पष्ट रूप से महसूस की जा सकती है। यहाँ की विधानसभा सीटों पर मुस्लिम आबादी की बात करें तो चोपड़ा पर 65% वोटर मुस्लिम हैं। ये बिहार की किशनगंज सीट से सटा हुआ इलाका है।

इस्लामपुर में 72% की मुस्लिम आबादी भी अब खुलकर इन पार्टियों के पक्ष में आ सकती है। गोवालपोखर में 78% मुस्लिम वोटर हैं, और ओवैसी ने यहाँ अपनी रैलियों में ‘अपनी पहचान’ का मुद्दा जोर-शोर से उठाया है। जबकि चकूलिया में 70% मुस्लिम आबादी भी इन दोनों पार्टियों के लिए किंगमेकर की भूमिका में आ सकती है।

दक्षिण 24 परगना और बीरभूम, इस बार TMC के किले में पड़ने वाली है दरार

ये जिले ममता बनर्जी के सबसे मजबूत गढ़ रहे हैं, लेकिन फुरफुरा शरीफ के प्रभाव और अब हुमायूँ कबीर की नई पार्टी के कारण यहाँ के समीकरण बदल रहे हैं। विधानसभा सीट और मुस्लिम आबादी को ध्यान में रखें तो मेटियाब्रुज विधानसभा सीट पर करीब 80% मुस्लिम आबादी है। ये इलाका दक्षिण 24 परगना (कोलकाता का मिनी पाकिस्तान कहा जाने वाला क्षेत्र) है।

इसके साथ ही इसी दक्षिण 24 परगना जिले की कैनिंग पूर्व सीट पर 70% के मुस्लिम वोटर अल्पसंख्यक राजनीति के केंद्र में रहते हैं। वहीं, मगरहाट पश्चिम सीट पर मुस्लिम वोटरों की आबादी करीब 65% है।

बीरभूम की बात करें तो झारखंड से सटे इस जिले की मुरारई विधानसभा सीट पर 80% मुस्लिम आबादी है। तो नलहाटी में भी करीब 70% मुस्लिम वोटर हैं।

यह गठबंधन टीएमसी के लिए ‘खतरनाक’ क्यों है?

अक्सर छोटे दलों को ‘वोट कटवा’ कहा जाता है, लेकिन ओवैसी और कबीर का गठबंधन 149 सीटों पर लड़कर यह संदेश दे रहा है कि वे जीतने के लिए मैदान में हैं। यदि वे औसतन हर सीट पर 20,000 से 30,000 वोट भी हासिल करते हैं, तो टीएमसी का ‘मार्जिन’ खत्म हो जाएगा।

हुमायूँ कबीर द्वारा बाबरी मस्जिद की नींव रखना और ओवैसी का ‘अब्बा’ और ‘हिजाब’ जैसे मुद्दों पर बोलना, उन युवा मुस्लिम मतदाताओं को आकर्षित करता है जो महसूस करते हैं कि टीएमसी केवल ‘दिखावे की सेकुलर’ है और हिंदुओं को खुश करने के लिए उनके अधिकारों से समझौता करती है।

ओवैसी पर अक्सर ‘बाहरी’ होने का आरोप लगता है, लेकिन हुमायूँ कबीर के साथ आने से इस गठबंधन को ‘लोकल फेस’ मिल गया है। कबीर जानते हैं कि बंगाल की गलियों में संगठन कैसे खड़ा किया जाता है।

पश्चिम बंगाल की 120 से अधिक सीटों पर मुस्लिम मतदाता निर्णायक हैं। ओवैसी और हुमायूँ कबीर की यह जुगलबंदी अगर 50 ऐसी सीटों पर अपना प्रभाव दिखा देती है जहाँ मुस्लिम आबादी 50% से अधिक है, तो 2026 में ममता बनर्जी के लिए सत्ता की राह बेहद कठिन हो जाएगी। यह चुनाव केवल मुख्यमंत्री चुनने का नहीं, बल्कि बंगाल की ‘मुस्लिम राजनीति’ का नया वारिस चुनने का भी होगा।

नई मुस्लिम राजनीति का उदय

ये सारे घटनाक्रम भारतीय राजनीति में एक बड़े बदलाव का संकेत हैं। मुस्लिम मतदाता अब कॉन्ग्रेस, एसपी या टीएमसी जैसे दलों की छाया में नहीं रहना चाहते। ऐसे में वो अपनी पार्टियों जैसे AIMIM, AJUP या इस्लाम पार्टी के साथ खुलकर खड़े हो रहे हैं।

यह बदलाव सेकुलर दलों के लिए खतरे की घंटी है। मुस्लिम वोट बँटने से विपक्ष कमजोर होगा और सत्तारूढ़ दलों को फायदा मिल सकता है। लेकिन लंबे समय में यह मुस्लिम राजनीति को मजबूत बनाएगा। महाराष्ट्र ने ट्रेलर दिखाया, पश्चिम बंगाल में पूरा शो शुरू हो चुका है। उत्तर प्रदेश, केरल, कर्नाटक और बिहार में भी ऐसे संकेत मिल रहे हैं। 2026 का बंगाल चुनाव सिर्फ सत्ता का नहीं, बल्कि मुस्लिम वोटबैंक की नई दिशा का भी होगा। यह नया अध्याय भारतीय लोकतंत्र को और दिलचस्प बना देगा।

कॉन्ग्रेस-RJD ने होर्मुज पर भारत को लेकर फैलाया झूठ, कहा- चीनी ‘युआन’ देकर आ रहे हमारे जहाज: विदेश मंत्रालय ने खोली पोल

भारत में आ रहे तेल और गैस भी अब देश विरोधी प्रोपेगेंडा फैलाने वालों को नहीं पच रहे हैं। हॉर्मुज स्ट्रेट में जब से जहाजों को निकलने में दिक्कतें आई हैं, तब से भारत में 5 गैस और तेल के जहाज भारत आ चुके हैं। इनमें से एक तेल और दो एलपीजी भरा जहाज हॉर्मूज स्ट्रेट से होकर सुरक्षित गुजरा।

विदेश मंत्रालय ने साफ कहा कि ये भारत की कूटनीति है, इसकी वजह से भारत आने वाले जहाज सुरक्षित हॉर्मुज से निकल कर आए। सरकार पूरी जी जान से गैस और तेल की कमी को दूर करने में लगी है। लेकिन प्रोपेगेंडा फैलाने वाले कह रहे हैं कि सरकार ने चाइनीज युआन में हॉर्मुज से गुजरने की कीमत चुकाई है। ये सरासर गलत है। भारतीय विदेश मंत्रालय ने इसका खंडन भी किया है।

प्रोपेगेंडा फैलाने वालों ने क्या- क्या लिखा

आरजेडी प्रवक्ता प्रियंका भारती ने एक्स पर दावा किया है कि भारतीय जहाज को सुरक्षित हॉर्मुज स्ट्रेट से निकलने दिया गया है तो इसकी वजह चीनी ‘युआन’ में मुद्रा का भुगतान है। वहीं एक कॉन्ग्रेस प्रवक्ता और पूर्व सेना अधिकारी अनुमा आचार्या ने कहा है कि भारतीय तेल टेंकर को चीनी युआन में भुगतान करने के बाद होर्मूज स्ट्रेट से गुजरने की परमिशन मिली। उनका ये भी दावा है कि ये ईरान के जमीर की सराहना करने वाली भारत की जनता की वजह से हुआ। मोदी सरकार की वजह से कुछ भी नहीं हुआ।

सोशल मीडिया में ये भी कहा गया है कि ईरान ने अल्टीमेटम दिया था कि वह उन्हीं तेल टैंकरों को होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने की अनुमति देगा, जो चाइनीज युआन में पेमेंट करेंगे। सोशल मीडिया पर दावा किया गया है कि इसके लिए 20 लाख डॉलर ईरान वसूल रहा है।

विदेश मंत्रालय ने कर दिया साफ

भारतीय विदेश मंत्रालय ने साफ किया है कि सोशल मीडिया पर गैर जिम्मेदाराना तरीके से ये प्रचारित करने की कोशिश की जा रही है कि भारत के जहाज को युआन में पेमेंट करने पर होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने की अनुमति दी गई, जो सरासर गलत है। इसमें आरजेडी नेता प्रियंका
भारती का पोस्ट भी दिखा कर फेक बताया है।

दरअसल ये मिडिल ईस्ट में जारी संघर्ष में भारत की कूटनीतिक सफलता का ही कमाल है कि होर्मूज स्ट्रेट से भारत के जहाज सुरक्षित आ जा पा रहे हैं। भारत का तिरंगा लगा जहाज जब स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पहुँचा, तो उसे सुरक्षित पार कराने की जिम्मेदारी खुद ईरानी नौसेना ने उठाई। ईरान इससे मित्र देशों जैसे भारत रूस चीन आदि के जहाजों को यहाँ से जाने की इजाजत दे रहा है। यही वजह है कि विदेश मंत्रालय ने गैस और तेल के जहाज को होर्मुज से निकालने का श्रेय भारत की कूटनीति को दिया था।

यही वजह है कि लोग सोशल मीडिया पर देश विरोधी प्रोपेगेंडा करने वालों से पूछ रहे हैं कि आखिर इतने देशों के जहाज वहाँ खड़े हैं। क्या वे युआन नहीं दे सकते हैं। आखिर ईरानी सेना उन्हें क्यों जाने नहीं दे रही है। लोग तो यहाँ तक कह रहे हैं कि आखिर इतना ही ज्यादा जनता की फिक्र है तो खुद आने बढ़ कर गैस-तेल का इंतजाम कर सकती है कॉन्ग्रेस। आखिर देश में सालों तक राज किया है। इतने कनेक्शन हैं कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी के। जनता की भलाई के लिए इतनी मेहनत तो कर ही सकते हैं।

दरअसल ईरान हर देश से अपने रिश्ते खराब नहीं करना चाहता। भारत इस युद्ध में मध्यस्थता की भूमिका भी निभा सकता है। पीएम मोदी ने हाल ही में मध्यपूर्व देशों के राष्ट्राध्यक्षों से बात की है और शांति का रास्ता अपनाने पर बल दिया है। भारत के संबंध अमेरिका के साथ भी अच्छे हैं। यही वजह है कि ईरान ने भारत को विशेष छूट दी है।

ईरान जैसे संकट से निपटने के लिए पहले से तैयार था भारत, 6 माह पहले शुरू कर दिया दक्षिण एशिया का सबसे बड़ा LPG स्ट्रेटजिक रिजर्व: जानें इसके बारे में सबकुछ

मिडिल ईस्ट युद्ध यानी ईरान युद्ध जैसे संकट के बीच मोदी सरकार की दूरदर्शिता सामने आ रही है। आज जब पूरी दुनिया ईंधन की बढ़ती कीमतों से जूझ रही है, तो भारत ने इन जैसे संकटों को देखते हुए पहले ही तैयारी शुरू कर दी थी। इसका एक नमूना है मंगलौर में दक्षिण एशिया की सबसे बड़ी 80,000 मीट्रिक टन क्षमता वाली अंडरग्राउंड एलपीजी कैवर्न, जो सिर्फ 6 माह पहले ही सितंबर 2025 पूरी तरह ऑपरेशनल हुई है।

जी हाँ, मोदी सरकार ने साल 2014 में सत्ता में आने के बाद से न सिर्फ ऑयल रिजर्व बनाए हैं, बल्कि एलपीजी जैसी महत्वपूर्ण एनर्जी स्रोत के लिए भी स्ट्रेटजिक रिजर्व बनाने पर जोर दिया था। ऐसा ही स्ट्रेटजिक रिजर्व है मंगलौर में स्थित अंडरग्राउंड एलपीजी कैवर्न, जिसमें 80,000 मीट्रिक टन एलपीजी को आपात समय के लिए स्टोर करके रखा जाता है। इसे सिर्फ 6 माह पहले ही चुपचाप ऑपरेशनल किया गया था, जिसके बारे में केंद्रीय मंत्री हरदीप पुरी ने सोशल मीडिया पर जानकारी दी थी।

इस रिजर्व के बारे में सार्वजनिक तौर पर बहुत कम बात की गई। इसका मतलब साफ है कि मोदी सरकार सभी परिस्थितियों को देखते हुए चुपचाप देश का भविष्य सुरक्षित रखने की दिशा में काम कर रही थी। हालाँकि अब पीएम मोदी ने जब सोमवार (23 मार्च 2026) को लोकसभा में मिडिल ईस्ट युद्ध को लेकर अपना बयान दिया, तब उन्होंने जरूरत इसका जिक्र दिखा।

लोकसभा में पीएम मोदी ने कहा, “भारत अपनी जरूरत की 60% LPG आयात करता है। इसकी वजह से डोमेस्टिक सप्लाई को प्राथमिकता दी जा रही है। पेट्रोल-डीजल की सप्लाई निर्बाध रूप से जारी रहे, इसके लिए भी काम किया जा रहा है। भारत सरकार ने बीते 11 सालों में एनर्जी इंपोर्ट का डायवर्सिफिकेशन किया है। पहले क्रूड, एलएनजी इत्यादि चीजें 27 देशों से मंगाया जाता था, आज 41 देशों से एनर्जी उत्पाद मंगाए जाते हैं। हमारी सरकार ने संकट के इसी समय के लिए स्ट्रेटजिक स्टोरेज बनाए थे। जिसकी क्षमता लगातार बढ़ाई जा रही है।”

मंगलौर एलपीजी कैवर्न के बारे में जानिए अहम बातें

मंगलौर एलपीजी कैवर्न भारत की ऊर्जा सुरक्षा का एक शानदार उदाहरण है। कर्नाटक के मंगलौर में स्थित यह सुविधा दक्षिण एशिया की सबसे बड़ी भूमिगत एलपीजी स्टोरेज कैवर्न है। मोदी सरकार की दूरदर्शी नीति के तहत बनाई गई यह परियोजना पश्चिम एशिया जैसे संकट के समय देश को स्थिर एलपीजी सप्लाई सुनिश्चित करती है। यह न सिर्फ घरेलू उपभोक्ताओं बल्कि उद्योगों को भी निरंतर ईंधन उपलब्ध कराती है।

इस कैवर्न की कुल क्षमता 80,000 मीट्रिक टन एलपीजी है। यह लगभग 6 लाख बैरल या 6 करोड़ लीटर ईंधन स्टोर करने में सक्षम है। इतनी बड़ी क्षमता इसे देश की सबसे बड़ी एकल एलपीजी कैवर्न बनाती है। कम माँग के समय स्टोरेज भरकर रखने से अंतरराष्ट्रीय कीमत उतार-चढ़ाव का असर कम होता है।

कैवर्न का निर्माण समुद्र तल से 156 मीटर नीचे किया गया है। इसमें दो विशाल अंडरग्राउंड टनल्स हैं, एक 1220 मीटर लंबी और दूसरी 225 मीटर लंबी। एक्सेस टनल एक किलोमीटर से ज्यादा लंबा है और गहराई 128 मीटर तक जाती है। यह गहराई प्राकृतिक सुरक्षा प्रदान करती है।

भारत में यह पहली बार अंडरग्राउंड रॉक कैवर्न टेक्नोलॉजी का उपयोग एलपीजी स्टोरेज के लिए हुआ है। पारंपरिक टैंकों से अलग यह तकनीक लीक का खतरा लगभग शून्य करती है। इससे ऊर्जा भंडारण का नया मानक स्थापित हुआ है।

कैवर्न को मौजूदा एलपीजी प्लांट के ठीक नीचे बनाया गया। इससे जमीन का दोहरी उपयोग संभव हुआ और अतिरिक्त जगह की जरूरत नहीं पड़ी। यह नवाचारी डिजाइन भविष्य की परियोजनाओं के लिए बेंचमार्क है।

इंजीनियर्स इंडिया लिमिटेड (EIL) ने एपीसीएम कंसल्टेंट के रूप में इस प्रोजेक्ट को पूरा किया। हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (HPCL) के लिए बनाई गई यह सुविधा EIL की इंजीनियरिंग उत्कृष्टता का प्रमाण है। निर्माण में 500 से ज्यादा कुशल इंजीनियर और मजदूर लगे।

यह कैवर्न सितंबर 2025 से पूरी तरह ऑपरेशनल है। सफल ‘गैस-इन’ के बाद पिछले 6 महीनों से निर्बाध काम कर रही है। न्यू मंगलौर पोर्ट पर आने वाले एलपीजी टैंकरों का स्टोरेज अब आसान हो गया है।

ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से यह परियोजना महत्वपूर्ण है। भारत 60 प्रतिशत एलपीजी आयात करता है। कैवर्न संकट के समय बफर का काम करती है और घरेलू सप्लाई को प्राथमिकता देती है। पेट्रोल-डीजल की निरंतरता भी सुनिश्चित करती है।

  1. सुरक्षा के लिहाज से इसमें वॉटर कर्टेन टेक्नोलॉजी लगाई गई है। इससे गैस रिसाव का खतरा न के बराबर है। पर्यावरण अनुकूल होने के कारण यह मौसम या हमलों से पूरी तरह सुरक्षित रहती है।

मोदी सरकार के ‘आत्मनिर्भर भारत’ विजन को यह कैवर्न साकार करती है। भविष्य में ऐसी और सुविधाएँ बनने से 2030 तक 90 दिनों का रिजर्व लक्ष्य हासिल होगा। यह 140 करोड़ भारतीयों की ऊर्जा सुरक्षा की गारंटी है और इंजीनियरिंग चमत्कार का प्रतीक है।

भारत के अन्य रणनीतिक ईंधन भंडारण हैं उर्जा के क्षेत्र में मजबूत सुरक्षा कवच

मोदी सरकार की ऊर्जा सुरक्षा नीति के तहत मंगलौर एलपीजी कैवर्न (80,000 मीट्रिक टन) के अलावा भारत के पास कई अन्य रणनीतिक ईंधन भंडारण सुविधाएँ हैं। ये भूमिगत रॉक कैवर्न देश को अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति व्यवधान, कीमत उतार-चढ़ाव और भू-राजनीतिक संकट (जैसे पश्चिम एशिया तनाव) से बचाती हैं। भारतीय रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार लिमिटेड (ISPRL) इनका प्रबंधन करती है।

क्रूड ऑयल रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व (SPR) – फेज-1

ये तीन प्रमुख भूमिगत कैवर्न हैं, जिनकी कुल क्षमता 5.33 मिलियन मीट्रिक टन (MMT) है। यह भारत की करीब 9.5-10 दिनों की क्रूड ऑयल जरूरत पूरी कर सकती है-

  • विशाखापट्टनम (आंध्र प्रदेश): इसकी क्षमता 1.33 MMT है।
  • मंगलौर (कर्नाटक): इसकी क्षमता 1.50 MMT है, ये एलपीजी कैवर्न से अलग है और सिर्फ क्रूड ऑयल के लिए है।
  • पाडुर (कर्नाटक): इसकी क्षमता 2.50 MMT है।

ये सुविधाएँ समुद्र तल से 100-150 मीटर नीचे चट्टानों में बनी हैं, जो प्राकृतिक आपदाओं, हमलों और लीक से पूरी तरह सुरक्षित हैं।

अन्य एलपीजी कैवर्न (मंगलौर के अलावा)

विशाखापट्टनम (आंध्र प्रदेश): 60,000 मीट्रिक टन क्षमता वाली भूमिगत एलपीजी कैवर्न (HPCL और फ्रांस की Total Energies का 50:50 जॉइंट वेंचर) है। यह देश की दूसरी सबसे बड़ी एलपीजी स्टोरेज है और आयात की अस्थिरता से बचाव करती है। इसके निर्माण की शुरुआत 1999 में हुई थी।

फेज-2 (निर्माणाधीन/स्वीकृत)

  • चंडीखोल (ओडिशा): ये प्रोजेक्ट काफी बड़ा है, जिसकी क्षमता 4.0 MMT की होगी। इसका विकास PPP मॉडल पर किया जा रहा है।
  • पाडुर अतिरिक्त (कर्नाटक): इसकी क्षमता 2.5 MMT की होगी। अभी इस पर काम चल रहा है।

इनके पूरा होने पर कुल SPR क्षमता 11.83 MMT हो जाएगी, जो 22 दिनों की उर्जा जरूरतों को पूरी करेगी। भविष्य में बीकानेर (राजस्थान) में सॉल्ट कैवर्न और राजकोट, बीना जैसी नई साइट्स पर काम चल रहा है।

फिलहाल देश का पूरा ईंधन स्टॉक (SPR + कमर्शियल) मिलाकर 74 दिन तक का बफर उपलब्ध है। ये सुविधाएँ प्रधानमंत्री मोदी के ‘संकट के समय की तैयारी’ वाले विजन को साकार करती हैं। मंगलौर एलपीजी कैवर्न के साथ ये अन्य भंडारण भारत को दक्षिण एशिया की सबसे मजबूत ऊर्जा सुरक्षा व्यवस्था देते हैं।

मंगलौर के अलावा ये अन्य रणनीतिक भंडारण देश को आत्मनिर्भर बनाते हैं। सरकार लगातार विस्तार कर रही है ताकि 2030 तक 90 दिनों का रिजर्व लक्ष्य हासिल हो सके। यह न सिर्फ इंजीनियरिंग चमत्कार है, बल्कि 140 करोड़ भारतीयों की ऊर्जा सुरक्षा की गारंटी भी है।

हॉर्मूज संकट के बीच दिखी भारत की ताकत, अमेरिकी-रूसी जहाज एक साथ पहुँचे मंगलौर पोर्ट

बहरहाल, हॉर्मूज संकट के बीच ही रविवार (22 मार्च 2026) को न्यू मंगलौर पोर्ट पर दो महत्वपूर्ण टैंकर पहुँचे हैं। इसमें पहला है अमेरिका से 16,714 टन एलपीजी ले कर आया पायक्सिस पॉयनियर और दूसरा है रूस से 96,099 टन क्रूड ऑयल ले कर आया एक्वॉ टाइटन। इन दोनों ही टैंकरों की अनलोडिंग एक ही जगह पर इसलिए हो रही है, क्योंकि मंगलोर में क्रूड रिजर्व के साथ ही अब एलपीजी रिजर्व पूरी तरह ऑपरेशनल हो चुका है। पूरी दुनिया में जहाँ ये दोनों शक्तियाँ प्रतिस्पर्धा करती हैं, वहीं भारत में चुपचाप भारत की उर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए क्रूड और एलपीजी पहुँचा रही हैं।

वैश्विक संकट में पता चला मंगलौर प्रोजेक्ट का असली मूल्य

मंगलौर परियोजना से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि यह मॉडल पूरे देश में दोहराया जा सकता है। MEIL और EIL जैसी कंपनियों की तकनीकी क्षमता ने भारत को वैश्विक स्तर पर नई पहचान दी है। दक्षिण एशिया में ऐसी कोई दूसरी सुविधा नहीं है। यह भारत की बढ़ती ताकत और मोदी सरकार की विजनरी लीडरशिप को दर्शाती है।

साफतौर पर देखें तो मंगलौर एलपीजी कैवर्न सिर्फ एक इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट नहीं, बल्कि 140 करोड़ भारतीयों की ऊर्जा सुरक्षा की गारंटी है। जब दुनिया संकट से गुजर रही है, तब भारत अपनी तैयारी से मजबूती दिखा रहा है। पीएम मोदी के नेतृत्व में ऊर्जा क्षेत्र में हो रहे इन क्रांतिकारी बदलावों ने देश को आत्मनिर्भर बनाने के साथ-साथ वैश्विक पटल पर एक विश्वसनीय ऊर्जा पार्टनर भी बनाया है। यह परियोजना आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बनेगी।

जिस गुंडे के कुत्ते से हाथ मिला गदगद होते थे अखिलेश यादव के ‘अब्बा’, धुरंधर-2 में उससे मिलते-जुलते किरदार को देख सपा प्रमुख भड़के

‘धुरंधर द रिवेंज’ ने सिनेमाघरों में कामयाबी के झंडे गाड़ दिए हैं। इसमें 7-9 मिनट का किरदार अतीफ अहमद नाम के शख्स का है, जो यूपी का माफिया है और इलाहाबाद से ताल्लुक रखता है।

पाकिस्तान के आईएसआई चीफ से उसका सीधा कनेक्शन है। पंजाब में ड्रोन से गिराए गए अवैध हथियारों को लोकल गैंग के सहारे उस तक पहुँचता है। उसके लश्कर ए तैयबा से संबंध हैं। देश में जाली नोट पाकिस्तान से नेपाल के रास्ते भारत आता है। इसमें वह शामिल है। यूपी की राजनीति में उसका दखल है। कुल मिलाकर राजनीति से लेकर माफिया तंत्र तक वह हावी है।

अखिलेश यादव ने जताया विरोध

इस किरदार को एसपी के सांसद रहे माफिया अतीक अहमद से जोड़ा जा रहा है। इसको लेकर समाजवादी पार्टी आग बबूला है। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने कहा है कि सरकार ऐसी फिल्में बनाने में पैसे खर्च कर रही है और विपक्ष को बदनाम करने की कोशिश की जा रही है, तभी तो फिल्म के रिलीज पर भी पैसे बहाए जा रहे हैं।

वहीं समाजवादी पार्टी के सांसद अवधेश प्रसाद ने कहा कि किसी मृत व्यक्ति पर टिप्पणी करना ठीक नहीं है। सरकार असल मुद्दों से आम जनता का ध्यान भटकाने के लिए प्रोपेगेंडा फैला रही है। वहीं एसपी विधायक अबू आजमी ने कहा है कि उनकी पार्टी के किसी सांसद का आईएसआई से कभी संबंध नहीं हो सकता।

मुस्लिमों के खिलाफ नफरत फैलाना मकसद- अबू आजमी

फिल्म पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए अबू आजमी ने कहा कि फिल्म का मकसद मुस्लिमों के खिलाफ नफरत फैलाना है।

समाजवादी पार्टी के नेता पूर्व सांसद एसटी हसन का कहना है कि अतीक के मामले में किसी भारतीय जाँच एजेंसी ने आईएसआई कनेक्शन का खुलासा नहीं किया था। लेकिन फिल्म में अतीफ अहमद के नाम के किरदार का कनेक्शन दिखाया गया है। जबकि हकीकत ये है कि अतीक अहमद का कनेक्शन आईएसआई के साथ-साथ जम्मू कश्मीर के आतंकी संगठन लश्कर ए तैयबा से था। अतीक अहमद के ISI से सीधे जुड़ाव को दिखाए जाने पर अगर समाजवादी पार्टी के नेता अतीक अहमद की पैरवी कर रहे हैं, तो ये काफी शर्म की बात है।

दरअसल इस फिल्म में जिस तरह से अतीफ अहमद का किरदार दिखाया गया है, वह माफिया डॉन अतीक अहमद से मिलता है। अतीक अहमद का पाकिस्तानी कनेक्शन था। ये पुलिस के चार्जशीट से भी साबित होता है।

उसकी हत्या से कुछ दिनों पहले प्रयागराज पुलिस ने अप्रैल 2023 में उमेश पाल हत्याकांड का चार्जशीट दाखिल किया था। इसमें अतीक अहमद और उसके भाई अशरफ अहमद को हथियार तस्करी का भी आरोपी बनाया गया था।

चार्जशीट के मुताबिक, उसके आईएसआई और लश्कर ए तैयबा से सीधे संबंध थे। आईएसआई के एजेंट से फोन पर बात होती थी। पंजाब में पाकिस्तान से हथियार ड्रोन के माध्यम से गिराए जाते थे। कोई लोकल एजेंट इसे उठाता था और अतीक अहमद गैंग तक पहुँचाता था। लश्कर ए तैयबा और दूसरे आतंकियों को भी ये हथियार सप्लाई किए जाते थे।

अतीक के कुत्ते से मुलायम सिंह यादव ने हाथ मिलाए थे

राजनीतिक गलियारों में एक फोटो काफी चर्चित हुआ था, जिसमें एसपी नेता मुलायम सिंह यादव जब अतीक अहमद के घर गए थे, तो उन्होंने अती अहमद के कुत्ते ब्रूनों से हाथ मिलाई थी। अतीक के घर पर 5 कुत्ते थे, जो उसके घर की रखवाली करते थे।

समाजवादी पार्टी का नेता होने की वजह से अतीक अहमद के आईएसआई कनेक्शन को लेकर एसपी विरोध जता रही है। उसे ‘धुरंधर 2’ फिल्म में एक किरदार पर इतनी दिक्कत है, लेकिन वही समाजवादी पार्टी और उसके नेता दूसरी फिल्मों में जब किसी जाति या धर्म को बदनाम किया जाता है, तो चुप्पी साध लेते हैं।

याद कीजिए फिल्म ‘आर्टिकल 15’ को, जिसमें कथित तौर पर बदायूँ दुष्कर्म और हत्या को दिखाया गया था। इस फिल्म में आरोपियों को ‘ब्राह्मण’ दिखाने की कोशिश की गई। फिल्म में उनलोगों को ‘पंडित, पंडित’ कहा जा रहा था। इस पर अखिलेश यादव या समाजवादी पार्टी के किसी नेता की मुँह नहीं खुली।

ऐसी न जाने कितनी फिल्में हैं जिसके माध्यम से हिन्दू धर्म को बदनाम करने की कोशिश की गई। फिल्मों में ‘पुजारी’ से सारे कुकर्म कराए जाते हैं। इसको लेकर समाजवादी पार्टी ने कभी एतराज नहीं जताया। याद कीजिए समलैंगिक संबंधों पर आधारित फिल्म फायर में किरदार का नाम सीता और गीता था। क्या ये हिन्दू धर्म को बदनाम करने की कोशिश नहीं थी।

दिल्ली HC के आदेश पर पुलिस ने UNI न्यूज एजेंसी का ऑफिस किया सील, वामपंथी-कॉन्ग्रेसी बता रहे प्रेस की आजादी पर हमला: जानें क्या है पूरा विवाद

राष्ट्रीय राजधानी में उस समय बड़ा विवाद खड़ा हो गया जब देश की सबसे पुरानी समाचार एजेंसियों में से एक यूनाइटेड न्यूज ऑफ इंडिया (UNI) के दफ्तर पर पुलिस कार्रवाई की गई। शुक्रवार (20 मार्च 2026) की शाम दिल्ली पुलिस के अधिकारी अर्धसैनिक बलों के साथ रफी मार्ग स्थित UNI के कार्यालय पहुँचे और अदालत के आदेश के बाद वहाँ खाली कराने की प्रक्रिया शुरू की।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, दफ्तर में मौजूद करीब 50 पत्रकारों और कर्मचारियों को तुरंत परिसर खाली करने के लिए कहा गया। यह भी सामने आया कि कार्रवाई के दौरान कुछ कर्मचारियों को जबरन बाहर निकाला गया।

इस मामले पर डिप्टी कमिश्नर ऑफ पुलिस सचिन शर्मा ने कहा कि पुलिस केवल सरकारी अधिकारियों की मदद के लिए वहाँ मौजूद थी। उन्होंने बताया, “हाईकोर्ट के आदेश के अनुसार हम L&DO अधिकारियों को सुरक्षा देने पहुँचे थे और UNI के स्टाफ से परिसर खाली करने को कहा गया।”

यह पूरी कार्रवाई दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा UNI की उस याचिका को खारिज किए जाने के कुछ घंटों बाद हुई, जिसमें जमीन आवंटन रद्द करने के फैसले को चुनौती दी गई थी। इसके तुरंत बाद अधिकारियों ने संपत्ति को सील कर दिया, जिसके बाद प्रेस की आजादी और सरकारी कार्रवाई को लेकर बहस तेज हो गई।

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UNI के खिलाफ कार्रवाई को ‘प्रेस की आजादी’ पर हमला बताकर जनता को किया जा रहा गुमराह

इस घटना के बाद कई वामपंथी विचारधारा से जुड़े लोग, एक्टिविस्ट और खुद को पत्रकार बताने वाले लोग सोशल मीडिया पर सरकार की आलोचना करने लगे। कई लोगों ने कहा कि यह कदम भारत में अभिव्यक्ति की आजादी के लिए कम होती जगह को दिखाता है।

कॉन्ग्रेस से जुड़े कार्यकर्ता श्रीनिवास ने इस स्थिति की तुलना एक तानाशाही व्यवस्था से की और कहा कि भारत में मीडिया की स्वतंत्रता पर गंभीर खतरा है। उन्होंने लिखा, “बधाई हो, भारत में उत्तर कोरिया पैदा हो गया…”

पत्रकार ममता त्रिपाठी ने भी इस मामले पर चिंता जताई और आरोप लगाया कि मीडिया इंडस्ट्री पर नियंत्रण किया जा रहा है। उन्होंने एक वीडियो शेयर करते हुए लिखा, “क्या लाला जी अब UNI पर भी कब्जा कर लेंगे? आज दिल्ली पुलिस ने UNI के दफ्तर पर छापा मारा!! पूरे न्यूज इंडस्ट्री को अपनी मुट्ठी में कर रखा है।”

इसी तरह पत्रकार हर्षवर्धन त्रिपाठी ने भी इस कार्रवाई की आलोचना की और सामने आए दृश्य को परेशान करने वाला बताया। उन्होंने लिखा, “दिल्ली पुलिस ने UNI पर छापा मारा है। ‘द स्टेट्समैन’ अखबार भी इसी समूह का हिस्सा है। यह शर्मनाक दृश्य है।”

वहीं एक अन्य पत्रकार नमिता शर्मा ने इस पूरे मामले पर कड़ी प्रतिक्रिया दी और कहा कि सिस्टम खुद मीडिया को निशाना बना रहा है। उन्होंने लिखा, “कोई गोली से मरता है, कोई भूख से… तो कोई सिस्टम से मरेगा, सब मरेंगे, दिल्ली पुलिस द्वारा UNI न्यूज पर रेड… मीडिया के लिए साफ संदेश है, जो चाटेगा, वो काटा जाएगा। आज UNI की बारी है, कल आपकी होगी, चापलूसी करने वाली पत्रकारिता ने भ्रष्ट सरकारों को महान बना दिया है…”

राजनीतिक नेताओं ने भी इस मामले में अपनी प्रतिक्रिया दी। पी संतोष कुमार ने इस कार्रवाई की निंदा करते हुए इसे प्रेस की आजादी पर हमला बताया।

इसी बीच गुजरात के एक अन्य कॉन्ग्रेस कार्यकर्ता सरल पटेल ने इस कार्रवाई को अघोषित आपातकाल जैसा बताया और अधिकारियों पर सख्ती से काम करने का आरोप लगाया। उन्होंने लिखा, “मोदी बीजेपी सरकार के पिछले 12 सालों के अघोषित आपातकाल की एक झलक है यह। भारत की सबसे पुरानी न्यूज एजेंसी UNI के दफ्तर पर दिल्ली पुलिस ने ऐसे छापा मारा और सील कर दिया, जैसे किसी आतंकी संगठन के खिलाफ कार्रवाई हो रही हो। कर्मचारियों को अपना सामान तक लेने का समय नहीं दिया गया। यह प्रेस की आजादी पर खुला हमला है!”

इन प्रतिक्रियाओं ने इस नैरेटिव को और हवा दी है कि प्रेस की आजादी खतरे में है। हालाँकि, कुछ अन्य लोगों का मानना है कि इस तरह के बयान बिना पूरे कानूनी और न्यायिक संदर्भ को समझे अनावश्यक घबराहट और डर का माहौल पैदा कर रहे हैं।

कार्रवाई की वजह क्या थी? कानूनी बैकग्राउंड

इस पूरे विवाद के केंद्र में UNI और सरकार के लैंड एंड डेवलपमेंट ऑफिस (L&DO) के बीच लंबे समय से चला आ रहा जमीन का विवाद है, जो आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय के तहत आता है।

यह संपत्ति केंद्रीय दिल्ली के 9 रफी मार्ग पर स्थित है और इसे बेहद कीमती सार्वजनिक जमीन माना जाता है। UNI को यह जमीन कई दशक पहले इस साफ शर्त के साथ दी गई थी कि वह तय समय के भीतर यहाँ प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया (PCI) के साथ मिलकर एक संयुक्त कार्यालय भवन बनाएगा।

लेकिन सरकार और अदालत के रिकॉर्ड के अनुसार, यह शर्त कभी पूरी नहीं की गई। अपने हालिया आदेश में दिल्ली हाईकोर्ट ने UNI के खिलाफ कड़ी टिप्पणियाँ कीं। न्यायमूर्ति सचिन दत्त ने कहा कि संगठन ने वर्षों तक अपनी जिम्मेदारियाँ पूरी किए बिना ही कीमती सार्वजनिक जमीन पर कब्जा बनाए रखा।

अदालत ने कहा, “इस मामले के तथ्य दिखाते हैं कि एक ऐसी स्थिति बनी हुई थी, जहाँ एक लाइसेंसी ने दशकों तक अपनी जिम्मेदारियाँ पूरी नहीं कीं और कीमती सार्वजनिक जमीन को जैसे बंधक बनाकर रखा।”

अदालत ने आगे कहा कि इस तरह का व्यवहार “सार्वजनिक जमीन के आवंटन की व्यवस्था की बुनियाद पर चोट करता है” और यह निष्कर्ष निकाला कि “आवंटन रद्द किया जाना पूरी तरह सही और कानूनी रूप से अनिवार्य था।”

दशकों से नियमों का पालन न करना और डेडलाइन चूकना

यह मामला नया नहीं है, बल्कि 45 साल से भी ज्यादा पुराना है। UNI को रफी मार्ग स्थित जमीन पहली बार 1979 में इस योजना के साथ दी गई थी कि यहाँ कई मीडिया संस्थानों के लिए एक साझा ऑफिस कॉम्प्लेक्स बनाया जाएगा, लेकिन यह परियोजना कभी शुरू ही नहीं हो सकी।

इसके बाद 1986, 1999 और 2000 में कई बार संशोधित आवंटन पत्र जारी किए गए, जिनमें हर बार भवन निर्माण की शर्त दोहराई गई। इसके बावजूद कोई खास प्रगति नहीं हुई। यहाँ तक कि 2012 में निर्माण की मंजूरी मिलने के बाद भी परियोजना ठप ही रही।

साल 2023 में, कारण बताओ नोटिस जारी करने और संतोषजनक जवाब न मिलने के बाद, L&DO ने लीज की शर्तों के उल्लंघन का हवाला देते हुए आवंटन रद्द कर दिया। UNI ने इस फैसले को अदालत में चुनौती दी, लेकिन उसकी याचिका खारिज कर दी गई।

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि “45 साल से अधिक समय तक लगातार काम न करने” को इस आधार पर माफ नहीं किया जा सकता कि अब संगठन कार्रवाई करने को तैयार है।

इस बीच UNI की आर्थिक समस्याओं ने स्थिति को और जटिल बना दिया। एजेंसी दिवालियापन प्रक्रिया से गुजरी और 2025 में द स्टेट्समैन लिमिटेड ने इसे अपने नियंत्रण में ले लिया। सरकार का तर्क था कि इस स्वामित्व परिवर्तन से आवंटी की प्रकृति बदल गई, क्योंकि यह जमीन मूल रूप से एक गैर-लाभकारी संस्था को दी गई थी, न कि किसी निजी व्यावसायिक संगठन को।

न्यायालय ने जनहित पर जोर दिया

अदालत ने एक और अहम बिंदु यह उठाया कि सार्वजनिक संपत्तियों की सुरक्षा बेहद जरूरी है। जिस जमीन की बात हो रही है, उसकी कीमत करीब 409 करोड़ रुपए आंकी गई है, जिससे यह एक बहुत ही कीमती सार्वजनिक संसाधन बन जाती है।

अदालत ने जोर देकर कहा कि सार्वजनिक जमीन को निजी संपत्ति की तरह नहीं माना जा सकता। उसने कहा, “सार्वजनिक जमीन को ऐसे किसी डिफॉल्टर लाइसेंसी के पास बंधक बनाकर नहीं रखा जा सकता, जिसने उस उद्देश्य को ही पूरा नहीं किया, जिसके लिए लाइसेंस दिया गया था।”

अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि भविष्य में ऐसे मामलों से बचने के लिए जमीन आवंटन की शर्तों को सख्ती से लागू किया जाए, ताकि इस तरह की लंबी देरी और दुरुपयोग न हो।

सरकार की भूमिका: हाई कोर्ट के आदेश को लागू करना

इस पूरे विवाद में एक बड़ा सवाल यह भी है कि सरकार ने यह कार्रवाई अपने स्तर पर की या फिर सिर्फ अदालत के निर्देशों का पालन किया। घटनाक्रम को ध्यान से देखने पर लगता है कि यह कार्रवाई दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश के बाद की गई, जिसमें साफ तौर पर अधिकारियों को “तुरंत जमीन का कब्जा लेने” के लिए कहा गया था।

पुलिस अधिकारियों ने भी कहा है कि उनकी भूमिका केवल खाली कराने की प्रक्रिया के दौरान सुरक्षा देने तक सीमित थी। यह पूरी कार्रवाई L&DO के समर्थन में की गई, जो सरकारी जमीन के प्रबंधन के लिए जिम्मेदार है। इस लिहाज से देखा जाए तो सरकार की कार्रवाई मनमानी नहीं, बल्कि अदालत के निर्देशों के अनुरूप दिखाई देती है।

मामला कानूनी कार्रवाई का है, प्रेस की आजादी का नहीं

UNI विवाद ने एक बार फिर प्रेस की आजादी को लेकर बहस को सुर्खियों में ला दिया है। जहाँ कुछ एक्टिविस्ट और पत्रकार इस घटना को मीडिया की स्वतंत्रता पर हमला बता रहे हैं, वहीं कानूनी रिकॉर्ड एक ज्यादा जटिल तस्वीर पेश करता है।

यह कार्रवाई अचानक नहीं हुई, बल्कि जमीन के इस्तेमाल को लेकर दशकों पुराने विवाद का नतीजा है। दिल्ली हाईकोर्ट की विस्तृत टिप्पणियाँ बताती हैं कि UNI लगातार अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करने में विफल रहा।

साथ ही, सरकार एक इम्प्लीमेंटेशन एजेंसी के रूप में अदालत के आदेशों का पालन करने के लिए बाध्य होती है। ऐसे निर्देशों को नजरअंदाज करना शासन और कानून के राज पर गंभीर सवाल खड़े कर सकता है।

जहाँ एक ओर प्रेस की आजादी को लेकर चिंताएँ किसी भी लोकतंत्र में अहम होती हैं, वहीं कानूनी कार्रवाई और राजनीतिक नैरेटिव के बीच फर्क करना भी उतना ही जरूरी है। इस मामले में उपलब्ध तथ्यों से यही संकेत मिलता है कि UNI के खिलाफ की गई कार्रवाई एक न्यायिक फैसले पर आधारित थी, न कि मीडिया पर किसी स्वतंत्र कार्रवाई का हिस्सा।

हालाँकि, इस घटना ने साफ तौर पर एक बड़ी बहस को जन्म दिया है और मीडिया की आजादी, सरकारी कार्रवाई और जवाबदेही को लेकर चर्चा आने वाले दिनों में जारी रहने की संभावना है।


(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

Exclusive मुंबई के धारावी में अशिक खान ने चाकुओं से गोदकर हिंदू युवक को उतारा मौत के घाट, अपने बचाव में दर्ज कराई क्रॉस FIR: जानें- क्या लिखा है

मुंबई के धारावी इलाके में 16 मार्च 2026 को एक मामूली बहस ने हिंसक रूप ले लिया और एक मुस्लिम युवक ने एक हिंदू युवक की बेरहमी से हत्या कर दी। मृतक की पहचान अश्विन नादर के रूप में हुई है, जिसे अशिक असीम अख्तर खान ने शाम करीब 5:30 बजे गोपीनाथ कॉलोनी के एक सार्वजनिक शौचालय के पास चाकू मारकर मौत के घाट उतार दिया।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, मौके पर मौजूद लोगों ने बीच-बचाव की कोशिश की, लेकिन आरोपित लगातार अश्विन पर चाकू से वार करता रहा, जिससे उसके शरीर पर गहरे घाव हो गए। गंभीर रूप से घायल अश्विन को तुरंत नजदीकी अस्पताल ले जाया गया, जहाँ इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई।

घटना वाले दिन ही मृतक की माँ ने स्थानीय पुलिस स्टेशन में आरोपित अशिक असीम अख्तर खान के खिलाफ FIR दर्ज कराई। इस FIR में महाराष्ट्र पुलिस अधिनियम 1951 की धारा 135 और 37(1)(a) तथा BNS की धारा 109(1) और 351(3) के तहत मामला दर्ज किया गया।

(फोटो साभार: Mumbai police)

FIR के मुताबिक, 16 मार्च 2026 की शाम को अश्विन के चाचा मुथप्पा नाडर दौड़ते हुए उसकी माँ शेवंती शिवकुमार नाडर के पास पहुँचे और बताया कि उनके बेटे पर गोपीनाथ कॉलोनी के सार्वजनिक शौचालय के पास बेरहमी से हमला हुआ है। इसके बाद दोनों घटनास्थल पर पहुँचे, जहाँ उन्होंने अश्विन को खून से लथपथ जमीन पर बेहोश हालत में पड़ा पाया।

शेवंती ने FIR में बताया कि उन्होंने आरोपित को वहीं खड़े देखा, जिसके हाथ में खून से सना हुआ चाकू था। आरोपित वहाँ मौजूद लोगों को धमकी दे रहा था कि जो भी बीच में आएगा, उसे जान से मार देगा। उन्होंने यह भी बताया कि उनके बेटे का गला काटा गया था और उसके सीने, कमर, पेट और जांघों पर गहरे घाव थे।

(फोटो साभार: Mumbai Police)

पुलिस के मौके पर पहुँचने के बाद आरोपित को पकड़ लिया गया। मृतक की माँ ने बताया कि उन्हें वहाँ मौजूद लोगों से पता चला कि उनका बेटा और आरोपित एक-दूसरे को पहले से जानते थे और पहले भी उनके बीच झगड़ा हो चुका था। पुलिस अश्विन को अस्पताल लेकर गई, जहाँ डॉक्टरों ने उसकी हालत गंभीर बताई।

आरोपित अशिक खान द्वारा दर्ज की गई काउंटर FIR

घटना के अगले दिन 17 मार्च 2026 को आरोपित अशिक असीम अख्तर खान ने मृतक के खिलाफ BNS की धारा 118(1), 351(2) और 352 के तहत काउंटर FIR दर्ज कराई। अपनी शिकायत में खान ने दावा किया कि वह मूल रूप से बिहार के पूर्वी चंपारण जिले के ढाका का रहने वाला है।

(फोटो साभार: Mumbai police)

वह मुंबई अपने चाचा के पास रहने आया था, लेकिन फिलहाल अकेला रह रहा है। उसने खुद को दिहाड़ी मजदूर बताया और यह भी कहा कि वह नशे का आदी है। खान ने दावा किया कि उसकी मुलाकात करीब दो महीने पहले अश्विन नाडर से हुई थी, जो कथित तौर पर नशा करता था।

दोनों धारावी इलाके में साथ में गांजा पीते थे। खान के अनुसार, 15 मार्च 2026 को जूता गली में सिगरेट को लेकर उसका अश्विन और उसके दोस्तों के साथ झगड़ा हुआ था, जिसके बाद वह वहाँ से चला गया। खान ने आगे बताया कि 16 मार्च को वह गोपीनाथ कॉलोनी के सार्वजनिक शौचालय के पीछे बैठकर गांजा पी रहा था, तभी अश्विन वहाँ आया।

(फोटो साभार: Mumbai Police)

उसने आरोप लगाया कि पिछले दिन के झगड़े की वजह से अश्विन उसे गुस्से से देख रहा था और फिर दोनों के बीच बहस शुरू हो गई। खान के मुताबिक, अश्विन ने उसे गालियाँ दीं और जान से मारने की धमकी भी दी। खान ने यह भी कहा कि बहस के दौरान उसने चाकू निकाला और हमला किया, जिसके जवाब में अश्विन ने उस पर हाथ से हमला किया।

उसके अनुसार, जब अश्विन ने उससे चाकू छीन लिया, तो उसने अपनी जेब से ब्लेड निकालकर अश्विन पर वार किया। खान ने दावा किया कि इस झगड़े में उसका दाहिना हाथ घायल हुआ, जबकि अश्विन की गर्दन पर चोट आई। दोनों को इलाज के लिए अस्पताल ले जाया गया।

गौरतलब है कि जब यह FIR दर्ज की गई, तब अश्विन नाडर का इलाज चल रहा था। बाद में उसकी मौत हो गई। हालाँकि रिपोर्ट लिखे जाने तक उसकी मौत का सटीक समय और तारीख स्पष्ट नहीं हो पाई थी।

(मूल रुप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

हिमाचल प्रदेश के इतिहास में पहली बार सिकुड़ गया राज्य का बजट, CM से लेकर DM तक की सैलरी में कटौती: समझें- कैसे कॉन्ग्रेस की नीतियों से राज्य हुआ बर्बाद

मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने शनिवार (21 मार्च 2026) को वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए 54,928 करोड़ रुपए का बजट पेश किया, जो पिछले वर्ष के 58,514 करोड़ रुपए से 3,586 करोड़ रुपए कम है। इसके साथ ही हिमाचल प्रदेश के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ है कि बजट का आकार घटा दिया गया। पिछले वर्ष जहाँ बजट 58,514 करोड़ रुपए था, वहीं इस बार इसे घटाकर 54,928 करोड़ रुपए कर दिया गया। यह लगभग 3,500–4,000 करोड़ रुपए की कटौती है।

यह कटौती महज संख्यात्मक नहीं, बल्कि राज्य की अर्थव्यवस्था की गंभीर बीमारी का प्रतीक है। बजट का कम होना केवल एक आँकड़ा नहीं है, बल्कि यह राज्य की आर्थिक स्थिति की गंभीरता का संकेत है। आमतौर पर राज्यों का बजट हर साल बढ़ता है, क्योंकि विकास कार्य, महंगाई और जनसंख्या की जरूरतें बढ़ती हैं। लेकिन यहाँ उल्टा हुआ यानी सरकार के पास खर्च करने के लिए संसाधन कम पड़ गए।

इसके साथ ही मुख्यमंत्री ने अपने वेतन में 50 प्रतिशत, उपमुख्यमंत्री और मंत्रियों के वेतन में 30 प्रतिशत, विधायकों के वेतन में 20 प्रतिशत की कटौती की घोषणा की है। ग्रुप-ए और ग्रुप-बी अधिकारियों के वेतन का 3 प्रतिशत, मुख्य सचिव, एसीएस, पीएस और डीजीपी स्तर के अधिकारियों का 30 प्रतिशत तथा अन्य उच्चाधिकारियों का 20 प्रतिशत वेतन अगले छह महीनों के लिए स्थगित किया गया है। बोर्ड-निगम के चेयरमैन, वाइस चेयरमैन और सलाहकारों के वेतन में भी 20 प्रतिशत कटौती होगी। ग्रुप-सी और डी कर्मचारी तथा पेंशनभोगी इससे अछूते रहेंगे, लेकिन न्यायपालिका से भी सहयोग की अपील की गई है।

यह फैसला ‘वित्तीय अनुशासन’ के नाम पर लिया गया है, लेकिन वास्तविकता यह है कि कॉन्ग्रेस सरकार की अकर्मण्यता, चुनावी फ्रीबीज के जाल और कुप्रबंधन ने राज्य के खजाने को खोखला कर दिया है। कमाई के स्रोत सूख गए हैं, जबकि खर्च दिन-प्रतिदिन बढ़ते जा रहे हैं। यह एक राज्य का हाल नहीं है, बल्कि कॉन्ग्रेस शासित कर्नाटक और डीएमके शासित तमिलनाडु (जो कॉन्ग्रेस की विचारधारा से प्रेरित है) भी इसी रास्ते पर चल रहे हैं।

इस रिपोर्ट में हम विस्तार से विश्लेषण करेंगे कि कैसे सुखविंदर सिंह सुक्खू की सरकार ने हिमाचल को फ्रीबीज का शिकार बनाया, कैसे वादे पूरे नहीं हुए, बजट कटौती से किन क्षेत्रों को नुकसान होगा, जनता पर क्या असर पड़ेगा और यह कॉन्ग्रेस की राष्ट्रीय नीति का हिस्सा कैसे है।

कॉन्ग्रेस की फ्रीबीज संस्कृति: हिमाचल की आर्थिक तबाही का मूल कारण

कॉन्ग्रेस ने 2022 के विधानसभा चुनाव में हिमाचल प्रदेश में सत्ता हासिल करने के लिए भारी-भरकम वादे किए थे, जिसमें पुरानी पेंशन योजना (ओपीएस) की बहाली, महिलाओं को 1,500 रुपए मासिक भत्ता, 300 यूनिट मुफ्त बिजली, युवाओं को रोजगार, किसानों को एमएसपी और बागवानी को बढ़ावा देना शामिल था।

सुखविंदर सिंह सुक्खू ने इन वादों को ‘जनहित’ का नाम देकर लागू किया, लेकिन इनकी लागत राज्य की क्षमता से कहीं ज्यादा थी। ओपीएस की बहाली अकेले 1,000 करोड़ रुपए सालाना अतिरिक्त बोझ डाल रही है, जो 1.36 लाख कर्मचारियों को लाभ देती है। महिलाओं के भत्ते, मुफ्त बिजली और अन्य सब्सिडी ने राजस्व व्यय को आसमान छू लिया।

पिछले तीन वर्षों में कॉन्ग्रेस सरकार ने लगभग 45,000 करोड़ रुपए का नया कर्ज लिया, कुल कर्ज 1 लाख करोड़ रुपए के पार पहुँच गया। ब्याज अदायगी अकेले 13 रुपए प्रति 100 रुपए व्यय में जा रही है। भाजपा प्रदेश प्रवक्ता संदीपनी भारद्वाज का कहना है यह कर्जा लेकर घी पीने वाली नीति है।

इस बजट में राज्य का राजस्व घाटा 6,577 करोड़ रुपए अनुमानित है, जबकि राजकोषीय घाटा 9,698 करोड़ रुपए (जीएसडीपी का 3.49 प्रतिशत) हो गया है। केंद्र द्वारा राजस्व घाटा अनुदान (आरडीजी) बंद होने को कॉन्ग्रेस बहाना बना रही है, जिसमें वार्षिक 8,105 करोड़ रुपए का नुकसान होना है, लेकिन सच्चाई यह है कि फ्रीबीज और कुप्रबंधन ने पहले ही खजाना खाली कर दिया था।

कॉन्ग्रेस सरकार ने दोगुना किया कर्ज

पिछली भाजपा सरकार के समय भी कर्ज बढ़ा था, लेकिन कॉन्ग्रेस ने उसे दोगुना कर दिया। कॉन्ग्रेस की ‘आइडियोलॉजी’ फ्रीबीज पर टिकी है, न कि विकास पर।

अब देखिए कि सुक्खू सरकार ने बोर्ड-निगमों में चेयरमैनों का मानदेय 30,000 से 80,000 रुपए बढ़ाया, फिर कटौती का दिखावा किया है। उन्होंने पंचायतों के 15वें वित्त आयोग के फंड वापस लेने की प्रक्रिया शुरू की, जो लोकतंत्र पर हमला है। यही नहीं, सुक्खू सरकार में दूध खरीद पर सीमा लगा दी गई, जबकि किसानों की 120 करोड़ रुपए की देनदारी लंबित है। इसके अलावा हिमाचल प्रदेश की रीढ़ यानी बागवानी की भी सुक्खू सरकार ने अनदेखी की, जिसकी वजह से केंद्र प्रायोजित 3,300 करोड़ रुपए के प्रोजेक्ट्स लागू नहीं हो सके और धन वापसी की नौबत तक आ गई।

यह अकर्मण्यता है। सुक्खू ने कहा कि बजट में ग्रामीण अर्थव्यवस्था, शिक्षा और स्वास्थ्य पर कोई कटौती नहीं है, लेकिन वास्तविकता एक दम उलट है। कुल व्यय में वेतन-पेंशन-ब्याज पर 61 रुपए प्रति 100 रुपए खर्च हो रहे हैं, जबकि पूंजीगत कार्यों पर सिर्फ 20 रुपए। ऐसे में विकास कार्य रुकेंगे, क्योंकि बजट घटने से लोक निर्माण, जल शक्ति जैसे विभाग प्रभावित होंगे, भले ही सीएम दावा करें कि इन पर कटौती नहीं की गई है।

CAG रिपोर्ट साफ कहती है कि हिमाचल प्रदेश ने भाजपा शासनकाल में 2018-19 से 2021-22 तक राजस्व अधिशेष दिखाया, लेकिन कॉन्ग्रेस के हाथ में कमान आने के बाद से लगातार घाटा हो रहा है। 15वें वित्त आयोग का अनुदान राजस्व घाटा खत्म करने के लिए था, लेकिन कॉन्ग्रेस ने फ्रीबीज पर उड़ा दिया। बकाया गारंटी 3,188 करोड़ रुपए, जो जीएसडीपी का 1.2 प्रतिशत है।

वेतन कटौती से क्या होंगे नुकसान

हिमाचल प्रदेश में वेतन कटौती वित्तीय आपातकाल का संकेत है। सरकार का दावा है कि इससे खजाने पर दबाव कम होगा, लेकिन हकीकत ये है कि इससे विकास कार्यों पर सीधा असर पड़ेगा। ग्रामीण क्षेत्रों में सड़कें, सिंचाई, बिजली परियोजनाएं अधर में लटकेंगी। शिक्षा और स्वास्थ्य में शिक्षक-डॉक्टर भर्ती रुकेंगी।

इस सरकार में आम आदमी को रोजगार नहीं मिल रहा है। युवा बेरोजगार, महिलाओं को 1,500 रुपए मिल भी रहे तो महंगाई में घुल गए। किसानों को दूध-फल बेचने में परेशानी हो रही है। पेंशनभोगी और ग्रुप-सी/डी कर्मचारी बच गए, लेकिन कुल मिलाकर माहौल निराशा का है। सुक्खू सरकार के इस कदम से प्रति व्यक्ति व्यय घटेगा, जिससे विकास दर धीमी पड़ेगी।

कॉन्ग्रेस शासित राज्यों का बुरा हाल

कॉन्ग्रेस ने जो चुनावी वादे किए थे, उन्हें भी पूरे नहीं कर पाई। ये एक राज्य का हाल नहीं है, बल्कि कॉन्ग्रेस शासित कर्नाटक भी इसी रास्ते की तरफ बढ़ रहा है। तमिलनाडु का भी यही हाल है। राज्य लगातार कर्ज ले रहे हैं, जबकि कर्नाटक और तमिलनाडु जैसे राज्य परपंरागत तरीके से समृद्ध माने जाते हैं और इनकी कमाई भी बहुत अधिक है। लेकिन कॉन्ग्रेस इन राज्यों में फ्रीबीज का वादा करके सत्ता में आई और पूरे राज्य को बर्बाद कर गई।

हिमाचल की अर्थव्यवस्था पर संकट

हिमाचल प्रदेश की राजनीति और अर्थव्यवस्था इस समय एक ऐसे मोड़ पर खड़ी दिखाई देती है, जहाँ से आगे का रास्ता बेहद चुनौतीपूर्ण है। हालिया बजट में जो तस्वीर सामने आई है, उसने न सिर्फ वित्तीय संकट को उजागर किया है, बल्कि यह भी दिखाया है कि राज्य की आर्थिक संरचना कितनी कमजोर हो चुकी है।

हिमाचल प्रदेश की मौजूदा स्थिति एक चेतावनी है केवल एक राज्य के लिए नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए। सुखविंदर सिंह सुक्खू सरकार का यह फैसला कि वह अपने और अधिकारियों के वेतन में कटौती करेगी, एक साहसिक कदम जरूर है, लेकिन यह उस गहरे संकट का लक्षण भी है, जिसमें राज्य फंस चुका है। हिमाचल की यह कहानी केवल एक राज्य की आर्थिक रिपोर्ट नहीं, बल्कि उस राजनीति का आईना है, जहाँ अल्पकालिक लाभ के लिए दीर्घकालिक स्थिरता को नजरअंदाज किया गया।

सुखविंदर सिंह सुक्खू की अगुवाई वाली कॉन्ग्रेस सरकार ने अपने चौथे बजट में कई ऐसे फैसले लिए हैं, जिन्हें ‘सख्त लेकिन जरूरी’ बताया जा रहा है। लेकिन सवाल यह है कि आखिर राज्य को इस स्थिति तक पहुँचाया किसने? अब देखना यह है कि क्या यह संकट सुधार का अवसर बनता है या फिर यह आर्थिक गिरावट की लंबी कहानी की शुरुआत है।

AI से क्या चाहते हैं लोग और किस बात को लेकर हैं चिंतित: एनथ्रोपिक के ‘सबसे बड़े सर्वे’ में हुआ बड़ा खुलासा, पढ़ें- कैसे बदल जाएगी दुनिया

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI आज सिर्फ एक तकनीकी शब्द नहीं रह गया है, बल्कि यह हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुका है। चाहे दफ्तर का काम हो, पढ़ाई हो, बिजनेस हो या व्यक्तिगत जीवन, AI हर जगह अपनी जगह बना रहा है।

इसी बदलती दुनिया को समझने के लिए AI कंपनी एनथ्रोपिक (Anthropic) ने एक स्टडी की है। इस अध्ययन में 159 देशों के 80 हजार से अधिक लोगों से बातचीत की गई और खास बात यह रही कि यह इंटरव्यू खुद AI मॉडल क्लाउड ने लिया।

यह स्टडी इसलिए खास है, क्योंकि इसमें सिर्फ आँकड़े नहीं हैं, बल्कि लोगों की सोच, उनके अनुभव, उनकी उम्मीदें और उनके डर सब कुछ बहुत गहराई से सामने आया है। इससे ये समझने में मदद मिलती है कि लोग AI को कैसे देख रहे हैं और भविष्य में उससे क्या चाहते हैं।

AI का बढ़ता प्रभाव

आज AI को लेकर दुनिया भर में चर्चा हो रही हैं, कहीं इसे भविष्य का सबसे बड़ा अवसर बताया जा रहा है, तो कहीं इसे खतरे के रूप में देखा जा रहा है। लेकिन इन चर्चाओं में अक्सर एक चीज की कमी रहती है, आम लोगों की आवाज।

Anthropic की इस स्टडी ने उसी कमी को पूरा करने की कोशिश की है। इसमें लोगों से सवाल पूछे गए, उनकी बातों को ध्यान से सुना गया और फिर AI की मदद से उन जवाबों का विश्लेषण किया गया। इस तरह यह स्टडी सिर्फ डेटा नहीं, बल्कि लोगों के अनुभव के रूप में सामने आई है।

AI सबसे बड़ा सहयोगी

स्टडी के अनुसार, लगभग 18.8 प्रतिशत लोगों ने AI से अपनी सबसे बड़ी उम्मीद प्रोफेशनल एक्सीलेंस यानी काम में उत्कृष्टता हासिल करने की जताई। इसका सीधा मतलब है कि लोग चाहते हैं कि AI उनके छोटे-छोटे, दोहराए जाने वाले काम संभाल ले, ताकि वे बड़े और महत्वपूर्ण फैसलों पर ध्यान दे सकें।

कई प्रोफेशनल्स ने बताया कि AI की मदद से वे अपने काम को तेजी से और बेहतर तरीके से पूरा कर पा रहे हैं। इससे उनकी प्रोडक्टिविटी बढ़ी है और वे ज्यादा प्रभावी ढंग से काम कर पा रहे हैं। लेकिन यह सिर्फ काम तक सीमित नहीं है, इसके पीछे एक गहरी सोच भी छिपी है।

समय की आजादी: असली लक्ष्य बेहतर जीवन

जब लोगों से यह पूछा गया कि वे AI के जरिए काम में सुधार क्यों चाहते हैं, तो जवाब सिर्फ अधिक पैसा या बेहतर करियर तक सीमित नहीं था। बहुत से लोगों ने कहा कि वे AI की मदद से अपने लिए समय निकालना चाहते हैं।

किसी ने कहा कि अब वह परिवार के साथ ज्यादा समय बिता पा रहा है, तो किसी ने बताया कि उसे अपने शौक पूरे करने का मौका मिल रहा है। यानी AI लोगों को सिर्फ काम में मदद नहीं कर रहा, बल्कि उन्हें जीवन जीने का समय भी दे रहा है।

व्यक्तिगत विकास और मानसिक सशक्तिकरण

करीब 13.7 प्रतिशत लोगों ने AI को अपने पर्सनल ट्रांसफॉर्मेशन का जरिया बताया। इसका मतलब है कि वे AI की मदद से खुद को बेहतर बनाना चाहते हैं, नई चीजें सीखना, अपनी सोच को विकसित करना और मानसिक रूप से मजबूत बनना।

कई लोगों ने AI को एक ऐसे साथी के रूप में देखा जो उन्हें बिना किसी जजमेंट के समझता है। वे उससे अपने सवाल पूछ सकते हैं, अपनी समस्याएँ बता सकते हैं और सीख सकते हैं। खासकर छात्रों के लिए AI एक ऐसा शिक्षक बन गया है जो हमेशा उपलब्ध रहता है और धैर्य के साथ हर सवाल का जवाब देता है।

जीवन प्रबंधन में AI की भूमिका

AI का इस्तेमाल लाइफ मैनेजमेंट में भी देखने को मिला। लगभग 14 प्रतिशत लोगों ने कहा कि वे AI का इस्तेमाल अपने रोजमर्रा के कामों को व्यवस्थित करने के लिए करते हैं।

आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में समय और ध्यान दोनों की कमी होती है। ऐसे में AI एक पर्सनल असिस्टेंट की तरह काम करता है, जो शेड्यूल बनाता है, रिमाइंडर देता है और कामों को प्राथमिकता के अनुसार व्यवस्थित करता है। खासकर उन लोगों के लिए, जिन्हें फोकस करने या प्लानिंग में दिक्कत होती है, AI एक बड़ी मदद बनकर उभरा है।

आर्थिक अवसर और विकास की नई दिशा

AI ने लोगों के लिए कमाई के नए रास्ते भी खोले हैं। स्टडी में कई लोगों ने बताया कि वे AI की मदद से अपना बिजनेस शुरू कर रहे हैं या अपनी आय बढ़ा रहे हैं।

खासकर विकासशील देशों में AI को एक गेम चेंजर के रूप में देखा जा रहा है। यहाँ लोग इसे एक ऐसे टूल के रूप में देख रहे हैं जो उन्हें बिना ज्यादा संसाधनों के भी आगे बढ़ने का मौका देता है। AI की मदद से लोग नए आइडिया विकसित कर रहे हैं, मार्केट तक पहुँच बना रहे हैं और अपनी पहचान बना रहे हैं।

स्टडी में एक दिलचस्प बात यह सामने आई कि केवल 5.6 प्रतिशत लोगों ने AI का उपयोग क्रिएटिव एक्सप्रेशन के लिए करते हैं। कला, लेखन या संगीत जैसे क्षेत्रों में AI का उपयोग काफी काम रहा। इससे यह संकेत मिलता है कि फिलहाल लोग AI को एक प्रोडक्टिविटी टूल के रूप में ज्यादा देखते हैं, न कि रचनात्मकता को बढ़ाने वाला माध्यम।

सबसे बड़ी चिंता: AI पर भरोसे की कमी

जहाँ उम्मीदें हैं, वहीं चिंताएँ भी हैं। स्टडी में सबसे बड़ी चिंता AI की विश्वसनीयता को लेकर सामने आई। लगभग 26.7 प्रतिशत लोगों को डर है कि AI हमेशा सही जानकारी नहीं देता।

फोटो साभार – एनथ्रोपिक

यह चिंता खासकर उन लोगों में ज्यादा देखी गई जो AI का इस्तेमाल जरूरी निर्णय लेने में करते हैं, जैसे वकील, डॉक्टर या वित्तीय सलाहकार। उनके लिए AI की एक छोटी सी गलती भी बड़े नुकसान का कारण बन सकती है।

नौकरी और आर्थिक असुरक्षा का डर

करीब 22.3 प्रतिशत लोगों ने नौकरी और अर्थव्यवस्था को लेकर चिंता जताई। उन्हें डर है कि AI के बढ़ते इस्तेमाल से नौकरियाँ खत्म हो सकती हैं या काम करने का तरीका पूरी तरह बदल सकता है। हालाँकि कुछ लोग इसे अवसर के रूप में भी देख रहे हैं, लेकिन यह डर अभी भी काफी मजबूत है। खासकर उन लोगों में जिनकी स्थाई नौकरी है और वह पूरी तरह उस पर निर्भर हैं।

लगभग 21.9 प्रतिशत लोगों को यह चिंता है कि AI के बढ़ने से इंसानों का नियंत्रण कम हो सकता है। उन्हें डर है कि कहीं ऐसा न हो कि AI खुद फैसले लेने लगे और इंसानों की भूमिका कम हो जाए। यह चिंता सिर्फ तकनीकी नहीं, बल्कि नैतिक और सामाजिक भी है। लोग यह जानना चाहते हैं कि AI का इस्तेमाल कैसे और किसके नियंत्रण में होगा।

मानसिक प्रभाव और रिश्तों पर असर

AI के इस्तेमाल का एक और पहलू है, उसका मानसिक और सामाजिक प्रभाव। कुछ लोगों को डर है कि AI पर ज्यादा निर्भरता से उनकी सोचने की क्षमता कम हो सकती है।

वहीं दूसरी तरफ कई लोग AI को भावनात्मक सहारा भी मानते हैं। खासकर ऐसे लोग जो अकेले हैं या मुश्किल परिस्थितियों में हैं, वे AI से बातचीत करके राहत महसूस करते हैं। लेकिन इससे यह खतरा भी है कि कहीं लोग असली रिश्तों से दूर न हो जाएँ।

इस स्टडी में यह भी सामने आया कि अलग-अलग देशों में AI को लेकर सोच अलग-अलग है। भारत जैसे देशों में लोग AI को लेकर ज्यादा सकारात्मक हैं, क्योंकि वे इसे अवसर के रूप में देखते हैं।

वहीं यूरोप और अमेरिका में लोग ज्यादा सतर्क हैं और इसके संभावित नुकसान को लेकर चिंतित हैं। यह अंतर आर्थिक स्थिति, तकनीकी पहुँच और सामाजिक ढाँचे के कारण भी हो सकता है।

इस स्टडी का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष लाइट और शेड की अवधारणा है। इसका मतलब है कि AI के फायदे और नुकसान एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। AI आपको तेजी से काम करने में मदद करता है, लेकिन इससे काम का दबाव भी बढ़ सकता है।

यह आपको सीखने में मदद करता है, लेकिन इससे आपकी खुद की सोचने की क्षमता कम हो सकती है। यह आपको भावनात्मक सहारा देता है, लेकिन इससे आप उस पर निर्भर भी हो सकते हैं। यानी AI एक ऐसा टूल है जो जितना फायदेमंद है, उतना ही जटिल भी है।

धुरंधर-2 में ‘अतीक अहमद’ का पाकिस्तानी कनेक्शन दिखाए जाने पर छाती पीट रहे प्रोपेगेंडाबाज, माफिया के लिए उमड़ा प्रेम: जानें- क्या है पूरा सच

फिल्म ‘धुरंधर: द रिवेंज’ में करीब 7-9 मिनट का यूपी के माफिया डॉन का किरदार है। उसका नाम है अतीफ अहमद। फिल्म में उसके आईएसआई कनेक्शन, हथियारों की तस्करी और जाली नोट का धंधा करने वाला दिखाया गया है। इसको लेकर एसपी- कॉन्ग्रेस और तमाम वामपंथियों की भौहें चढ़ गई हैं।

इनका कहना है कि ये पूर्व एसपी सांसद और माफिया अतीक अहमद को दिखाया गया है। लेकिन उसकी हत्या के बाद उसे इस तरह से पाकिस्तान से कनेक्शन दिखाना गलत है। जबकि सच यह है कि अतीक अहमद का पाकिस्तान से न सिर्फ संबंध था बल्कि उसके सारे काले कारनामे पाकिस्तान की मदद से चलते थे। अपना खौफ पैदा करने के लिए वह जिन हथियारों का इस्तेमाल करता था, वह पाकिस्तान से आते थे।

ISI और आतंकियों से कनेक्शन

फिल्म में इलाहाबाद और यूपी का जिक्र करते हुए अतीफ का आईएसआई से कनेक्शन दिखाया गया है। आईएसआई से हथियारों की तस्करी, नकली नोट नेपाल के रास्ते भारत में लाकर खपाना और यूपी में किसकी सरकार बनेगी, इसमें हस्तक्षेप करना। फिल्म में उसका मर्डर भी लगभग उसी तरह दिखाया गया है, जैसा रियल में हुआ था।

हालाँकि, फिल्म में ये दिखाया गया है कि उसकी हत्या की योजना भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजय सान्याल ने की थी। जबकि असल मे अतीक और उसके भाई अशरफ की हत्या 15 अप्रैल 2023 को प्रयागराज में पुलिस कस्टडी में गोली मारने से हुई थी। सीएम योगी के कानून व्यवस्था सख्त किए जाने के बाद यूपी में माफिया राज का खात्मा हुआ।

इसको लेकर फिल्म में दिखाया गया है कि जेल में अतीफ की आईएसआई के हेड से बात होती है, वह 60000 करोड़ जाली नोट लाने के लिए तैयार हो जाता है। यूपी चुनाव को प्रभावित करने के लिए इन जाली नोटों का इस्तेमाल करने का प्लान था। इस बीच उसकी हत्या हो जाती है। इस वजह से कॉन्ग्रेस और समाजवादी पार्टी फिल्म को प्रोपेगेंडा बता रही है।

समाजवादी पार्टी के नेता पूर्व सांसद एसटी हसन का कहना है कि अतीक के मामले में किसी भारतीय जाँच एजेंसी ने आईएसआई कनेक्शन का खुलासा नहीं किया था। लेकिन फिल्म में अतीफ अहमद के नाम के किरदार का कनेक्शन दिखाया गया है। जबकि हकीकत ये है कि अतीक अहमद का कनेक्शन आईएसआई के साथ साथ जम्मू कश्मीर के आतंकी संगठन लश्कर ए तैयबा से था। अतीक अहमद के ISI से सीधे जुड़ाव को दिखाए जाने पर अगर समाजवादी पार्टी के नेता अतीक अहमद की पैरवी कर रहे हैं, तो ये काफी शर्म की बात है।

उसकी हत्या से कुछ दिनों पहले प्रयागराज पुलिस ने अप्रैल 2023 में उमेश पाल हत्याकांड का चार्जशीट दाखिल किया था। इसमें अतीक अहमद और उसके भाई अशरफ अहमद को हथियार तस्करी का भी आरोपी बनाया गया था। चार्जशीट के मुताबिक, उसके आईएसआई और लश्कर ए तैयबा से सीधे संबंध थे। आईएसआई के एजेंट से फोन पर बात होती थी। पंजाब में पाकिस्तान से हथियार ड्रोन के माध्यम से गिराए जाते थे। कोई लोकल एजेंट इसे उठाता था और अतीक अहमद गैंग तक पहुँचाता था। लश्कर ए तैयबा और दूसरे आतंकियों को भी ये हथियार सप्लाई किए जाते थे।

चार्जशीट में कहा गया है कि अगर पुलिस अतीक को उन जगहों पर ले जाए, तो वह हथियार और गोला बारूद तक बरामद करवा सकता है। पुलिस ने इसी बयान पर एफआईआर दर्ज की थी। पुलिस ने जब उसके घर की तलाशी ली थी तो पाकिस्तानी कारतूस और हथियार भी बरामद हुई थी।

पूर्व DGP विक्रम सिंह के मुताबिक, “इस बारे में कोई शक नहीं होना चाहिए। जब ​​अतीक अहमद जिंदा था, तो उसके गैंग को IS-277 (इंटरस्टेट-277) के तौर पर लिस्ट किया गया था। अपने कबूलनामे में उसने माना था कि 0.45 कैलिबर की पिस्तौल, AK-47 और RDX आदि पाकिस्तान से ड्रोन के जरिए पंजाब पहुँचते थे और वहाँ से उस तक पहुँचते थे। उसके संबंध लश्कर-ए-तैयबा और ISI से भी थे। जब अतीक के घर की तलाशी ली गई थी तो पाकिस्तानी कारतूस और हथियार बरामद हुए थे। “

जेल से चलाता था अपना साम्राज्य

फिल्म में दिखाया गया है कि जेल में बंद अतीफ अहमद अपना काम जेल से आराम से चलाता था। उसे फोन मिल जाते थे और वह आईएसआई से बात करता था। सारी प्लानिंग हो जाती थी। हकीकत में भी अतीक अहमद जेल में रहे या बाहर। उसके काले कारनामें चलते रहते थे।

इसमें तो किसी को शक नहीं होना चाहिए कि जब समाजवादी पार्टी की सरकार यूपी में थी, तो अतीक अहमद की तूती बोलती थी। इलाहाबाद और आसपास के इलाकों में वह खौफ का पर्याय हुआ करता था। यहाँ तक कि जब सरकार ने अवैध कब्जा की गई जमीन की नीलामी करने की कोशिश की, तो उसे लेने कोई सामने नहीं आया।

लोगों की जमीनों पर कब्जा करना, गुंडागर्दी, किसी को भी उठवा कर मार देना जैसी हरकतें आज भी लोगों की जुबान पर हैं। फिल्म में जिस तरह से अतीफ अहमद का आईएसआई कनेक्शन दिखाया गया है।

असल में वह भी उसकी मौत से पहले बाहर आ चुका था। खुद उसने इसे स्वीकार किया था। अब फिल्म में अतीफ के किरदार पर सवाल उठाने वालों का कहना है कि अगर उसका पाकिस्तान से कनेक्शन था तो फिर उसकी हत्या पर संसद में क्यों दुख जताया गया। अतीक अहमद पूर्व सांसद था और उसकी मौत पर संसद में श्रद्धांजलि एक सांसद को दिया गया था, न की पाकिस्तानी कनेक्शन वाले माफिया को।

यूपी सरकार में दखल रखता था अतीक अहमद

फिल्म में दिखाया गया है कि यूपी सरकार में अतीफ का अच्छा खासा दखलंदाजी है। नोटबंदी के बाद आईएसआई के चीफ और आतिफ के बीच बातचीत होती है। अतीफ कहता है कि यूपी गया अपने हाथ से…हार जाएँगे चुनाव, आगे अल्लाह की मर्जी..। इसको देखकर बताया जा सकता है कि ये किस वक्त की बात है।

दरअसल माफिया अतीक अहमद ने 1989 में पहली बार इलाहाबाद पश्चिम सीट से विधानसभा चुनाव जीतकर राजनीतिक में सक्रिय हुआ था। उसके बाद वह लगातार चुनाव जीतता रहा। 2004 में वह एसपी की टिकट पर फूलपुर से लोकसभा चुनाव जीता। उसकी समाजवादी पार्टी के सत्ता पर काबिज रहने के दौरान तूती बोलती थी।

1971 में पाकिस्तानी फौज ने चुन-चुनकर मारे हिंदू, अमेरिकी संसद में ‘बांग्लादेश’ के नरसंहार पर आया प्रस्ताव: जानें- क्या हैं माँग

अमेरिकी संसद ‘सीनेट’ में 1971 में बांग्लादेश मुक्ति संग्राम में पाकिस्तानी फौज द्वारा की गई हत्याओं को नरसंहार के रूप में मान्यता देने को लेकर प्रस्ताव पेश किया गया है। शुक्रवार (20 मार्च 2026) को अमेरिकी कॉन्ग्रेस के सांसद ग्रेग लैंड्समैन ने निचले सदन में यह प्रस्ताव पेश किया, जिसमें कहा गया कि पाकिस्तान का यह ऑपरेशन संयुक्त राष्ट्र (UN) की नरसंहार की परिभाषा को पूरा करता है।

लैंड्समैन ने पाकिस्तान का साथ देने के लिए इस्लामी कट्टरपंथी राजनीतिक संगठन ‘जमात-ए-इस्लामी’ को कठघरे में लाने की बात कही। सांसद ने यह भी कहा कि अमेरिका को बहुत पहले ही इसे नरसंहार घोषित कर देना चाहिए था।

उन्होंने बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिंदुओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने की भी माँग की। प्रस्ताव में कहा गया है कि 25 मार्च 1971 को घोषित ऑपरेशन सर्चलाइट के दौरान पागकिस्तानी फौज और उनके इस्लामी सहयोगियों ने अत्याचार किए। उस समय सभी धर्मों के बंगाली मूल के लोगों को हमलों में निशाना बनाया गया था। हिंदुओं का सफाया किया गया और उनका नरसंहार किया गया।

प्रस्ताव में क्या कहा गया?

अमेरिकी संसद में पेश किए गए प्रस्ताव में 1971 में बांग्लादेश मुक्ति संग्राम को इतिहास की दर्दनाक घटनाओं में से एक बताया है, जिसे न्याय और वैश्विक मान्यता नहीं मिल सकी है। इस प्रस्ताव में उस दौर की घटनाओं को याद करते हुए न सिर्फ नरसंहार के रूप में पहचान देने की बात कही गई है, बल्कि बांग्लादेश के अल्पसंख्यक हिंदुओं की सुरक्षा पर भी जोर दिया गया है।

प्रस्ताव में कहा गया कि इस दौरान पश्चिम पाकिस्तान की सरकार में पंजाबी नेताओं की संख्या अधिक थी, जिन्होंने पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) को नजरअंदाज किया। पूर्वी पाकिस्तान के बंगालियों को कमतर समझा गया।

ऑपरेशन सर्चलाइट और नरसंहार की शुरुआत

1970 के चुनाव में शेख मुजिबुर रहमान के नेतृत्व वाली अवामी लीग को बहुमत हासिल होने के बाद भी हालात नहीं सुधरे। रहमान ने पूर्वी पाकिस्तान को अधिक स्वायत्तता देने का वादा किया था, लेकिन पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति आगा मोहम्मद याह्या खान, जुलफिकर अली भुट्टो के साथ उनकी बातचीत विफल हो गई और 25 मार्च 1971 की रात पाकिस्तानी सरकार ने उन्हें गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया।

इसके बाद ही जमात-ए-इस्लामी की विचारधारा से प्रेरित इस्लामी समूहों के साथ मिलकर पाकिस्तानी फौज ने ‘ऑपरेशन सर्चलाइट’ नाम से पूर्वी पाकिस्तान में बड़े पैमाने पर सैन्य कार्रवाई शुरू की। इस दौरान आम नागरिकों का नरसंहार किया गया।

प्रस्ताव में माना गया कि इस नरसंहार का एक बेहद दर्दनाक पहलू महिलाओं के साथ हुई हिंसा है। अनुमान है कि 2 लाख से अधिक महिलाओं के साथ बलात्कार हुआ। सामाजिक कलंक के कारण असली संख्या शायद कभी सामने नहीं आ पाएगी और कई पीड़ितों की पहचान इतिहास में दर्ज नहीं हो सकी।

हिंदुओं को बनाया गया निशाना

प्रस्ताव में कहा गया कि नरसंहार में विशेष तौर पर हिंदुओं को निशाना बनाया गया। 28 मार्च 1971 को ढाका में अमेरिकी कौंसुल जनरल आर्चर ब्लड ने वॉशिंगटन को भेजे संदेश में इसे ‘चयनात्मक नरसंहार’ बताया और कहा कि पाकिस्तानी फौज के समर्थन से गैर-बंगाली मुस्लिम समूह गरीब इलाकों में बंगालियों और हिंदुओं पर हमले कर रहे हैं। 6 अप्रैल 1971 को भेजे गए ‘ब्लड टेलीग्राम’ में अमेरिकी अधिकारियों ने अपनी सरकार की चुप्पी पर आपत्ति जताई और इस स्थिति को नरसंहार बताया। 8 अप्रैल के एक अन्य संदेश में ब्लड ने साफ कहा कि हिंदुओं को विशेष रूप से निशाना बनाया जा रहा है।

अमेरिकी सीनेटर एडवर्ड एम. केनेडी की अध्यक्षता वाली समिति ने 1 नवंबर 1971 को अपनी रिपोर्ट में कहा कि 25 मार्च 1971 से पाकिस्तानी फौज ने सुनियोजित आतंकी अभियान चलाया, जिसमें सबसे ज्यादा नुकसान हिंदू समुदाय को हुआ। उनकी जमीनें छीनी गईं, उन्हें चिन्हित कर मार डाला गया और यह सब इस्लामाबाद से लागू मार्शल लॉ के तहत किया गया। 1972 में इंटरनेशनल कमीशन ऑफ जूरिस्ट्स की एक रिपोर्ट में भी कहा गया कि हिंदुओं को सिर्फ उनके धर्म के कारण मारा गया और उनके गाँव तबाह कर दिए गए।

प्रस्ताव में संयुक्त राष्ट्र (UN) का रुख भी साफ किया कि UN ने नरसंहार रोकथाम और सजा संबंधी कन्वेंशन के अनुसार, किसी राष्ट्रीय, जातीय, नस्लीय या धार्मिक समूह को पूरी तरह या आंशिक रूप से खत्म करने की मंशा से किए गए कृत्य नरसंहार माने जाते हैं।

प्रस्ताव में क्या है माँगें?

प्रस्ताव में कहा गया है कि संसद का निचला सदन 25 मार्च 1971 को पाकिस्तानी सुरक्षाबलों द्वारा बांग्लादेश के लोगों पर किए गए अत्याचारों की कड़ी निंदा करता है। इसमें माना गया है कि पाकिस्तानी फौज और उसके इस्लामी सहयोगियों ने बिना भेदभाव के बंगाली लोगों की बड़े पैमाने पर हत्या की, चाहे उनका धर्म या लिंग कुछ भी हो।

उन्होंने राजनीतिक नेताओं, बुद्धिजीवियों, पेशेवरों और छात्रों को मार डाला और हजारों महिलाओं को जबरन यौन दासी बनाया। खासतौर पर हिंदू अल्पसंख्यकों को निशाना बनाते हुए उनके खिलाफ नरसंहार, सामूहिक बलात्कार, जबरन धर्म परिवर्तन और उन्हें उनके घरों से निकालने जैसे अत्याचार किए गए।

प्रस्ताव में यह भी स्वीकार किया गया कि किसी भी पूरे समुदाय या धार्मिक समूह को कुछ लोगों के अपराधों के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। प्रस्ताव में अपील की गई कि वे 1971 में पाकिस्तानी फौज और उसके सहयोगी जमात-ए-इस्लामी द्वारा बंगाली हिंदुओं के खिलाफ किए गए इन अत्याचारों को मानवता के खिलाफ अपराध, युद्ध अपराध और नरसंहार के रूप में मान्यता दें।

प्रस्ताव पास होने का माफी माँगेगा पाकिस्तान?

अगर यह प्रस्ताव पास हो जाता है तो सबसे पहले पाकिस्तान पर कूटनीतिक दबाव बढ़ेगा। अमेरिकी संसद का यह कदम भले की प्रतीकात्मक हो, लेकिन इससे दुनिया भर में 1971 की घटनाओं को नरसंहार के रूप में देखने की सोच मजबूत होगी। इसके बाद पाकिस्तान को अमेरिकी अधिकारियों से मानवाधिकार से जुड़े सवालों का सामना करना पड़ेगा।

इससे दोनों देशों के बीच बातचीत में यह मुद्दा बार-बार उठेगा और रिश्तों में तनाव आएगा। साथ ही बांग्लादेश और हिंदू समुदाय की आवाज भी मजबूत होगी, जिससे वैश्विक मीडिया में पाकिस्तान की छवि खराब हो सकती है।

इसके अलावा अमेरिका की विदेश नीति में पाकिस्तान को लेकर ज्यादा सावधानी बरती जाएगी। इससे आर्थिक मदद और सैन्य सहयोग जैसे मुद्दों पर बहस तेज हो सकती है। आगे चलकर यह प्रस्ताव दूसरे देशों को भी प्रेरित कर सकता है, जैसे यूरोपीय संघ और कनाडा, जहाँ ऐसे ही प्रस्ताव लाए जा सकते हैं। इससे पाकिस्तान पर माफी माँगने या जवाब देने का दबाव बढ़ेगा। कुल मिलाकर पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय छवि को नुकसान होगा और भविष्य में होने वाले समझौतों में यह पुराना मुद्दा परेशानी खड़ी कर सकता है।