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लिंचिंग से लेकर देसी बम से हमलों तक, ममता की TMC के गुंडों ने खेला खूनी खेल: जाधव बोर से मधु मंडल-चंद्रनाथ राठ की हत्याएँ महज बानगी, जानें राजनीतिक हिंसा से कैसे फैलाई दहशत

तृणमूल कॉन्ग्रेस और उसकी प्रमुख ममता बनर्जी 2026 विधानसभा चुनाव हारने के बाद पूरी तरह बौखला गई हैं। चुनाव में हार के बाद अब पार्टी के गुंडों ने राज्य में हिंसा और अराजकता फैलानी शुरू कर दिया है।

एक तरफ ममता बनर्जी ने इस्तीफा देने से इनकार कर दिया है, वहीं दूसरी तरफ TMC समर्थकों पर बीजेपी कार्यकर्ताओं की हत्या, लोगों की संपत्ति को नुकसान पहुँचाने और आम नागरिकों को डराने-धमकाने के आरोप लग रहे हैं।

सोमवार (4 मई 2026) से अब तक TMC कार्यकर्ताओं द्वारा की गई ऐसी कई घटनाओं को ऑपइंडिया ने मिलाकर ये रिपोर्ट बनाई है।

जाधव बोर की हावड़ा में लिंचिंग

सोमवार (4 मई 2026) को हावड़ा के उदयनारायणपुर इलाके में 45 साल के बीजेपी कार्यकर्ता जाधव बोर की TMC समर्थित गुंडों द्वारा पीट-पीटकर हत्या कर दी गई। यह घटना बीजेपी की चुनावी जीत के बाद इलाके में चल रहे जश्न के बीच हुई।

परिवार के अनुसार, जाधव बोर अन्य बीजेपी कार्यकर्ताओं के साथ रंग खेलकर जीत का जश्न मना रहे थे। शाम को वह घर लौट आए थे, लेकिन कुछ देर बाद नहाने के लिए घर से थोड़ी दूरी पर स्थित एक जगह पर गए।

इसी दौरान कुछ लोग वहाँ पहुँचे और उन पर हमला कर दिया। बताया जा रहा है कि हमलावरों ने लोहे की रॉड से उनके सिर पर वार किया, जिससे वह गंभीर रूप से घायल हो गए।

उनकी चीख सुनकर आसपास के लोग मौके पर पहुँचे, लेकिन तब तक आरोपित वहाँ से फरार हो चुके थे। इसके बाद जाधव बोर को तुरंत उदयनारायणपुर स्टेट जनरल अस्पताल ले जाया गया, जहाँ डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।

न्यू टाउन में मधु मंडल की पीट-पीटकर हत्या

मंगलवार (5 मई 2026) को पश्चिम बंगाल के न्यू टाउन के बालीगुड़ी इलाके में विजय जुलूस के दौरान बीजेपी नेता मधु मंडल की TMC समर्थित गुंडों ने पीट-पीटकर हत्या कर दी।

बाद में उनका शव कीचड़ से भरी एक जगह पर पड़ा मिला। इस निर्मम हत्या के मामले में स्थानीय पुलिस ने अब तक टीएमसी नेता कमल मंडल और उसके 4 सहयोगियों को गिरफ्तार किया है।

राजारहाट न्यू टाउन विधानसभा सीट से जीत हासिल करने वाले बीजेपी नेता पीयूष कनोडियाने मधु मंडल के हत्यारों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई का भरोसा दिया।

उन्होंने कहा, “मैंने अभी विधायक पद की जिम्मेदारी संभाली है और चार घंटे भी नहीं बीते हैं कि मुझे अपने भाई के शव पर माला चढ़ानी पड़ रही है। मैंने पुलिस से साफ कहा है कि इस घटना के जिम्मेदार लोगों को किसी भी हालत में बख्शा नहीं जाना चाहिए।”

शुभेंदु अधिकारी के पर्सनल असिस्टेंट की हत्या, ड्राइवर की हालत गंभीर

बुधवार (6 मई 2026) को पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना जिले के मध्यमग्राम इलाके में बीजेपी नेता सुवेंदु अधिकारी के निजी सहायक चंद्रनाथ रथ की गोली मारकर हत्या कर दी गई। यह घटना उनके घर के पास ही हुई। उस समय वह एक काले रंग की स्कॉर्पियो एसयूवी में यात्रा कर रहे थे।

रिपोर्ट्स के अनुसार, दो बाइक सवार हमलावरों ने इस वारदात को अंजाम दिया। गोली लगने से चंद्रनाथ रथ के सिर, छाती और पेट में गंभीर चोटें आईं। उन्हें तुरंत अस्पताल ले जाया गया, लेकिन डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।

इस हमले में कार चालक बुद्धदेव बेहरा भी घायल हो गए, जिनकी हालत फिलहाल गंभीर बनी हुई है। मामले की गंभीरता को देखते हुए जाँच के लिए एक विशेष जांच दल (SIT) का गठन किया गया है।

रोहित रॉय को बारासात में गोली मारी गई

बुधवार (6 मई 2026) को पश्चिम बंगाल के बसिरहाट में बीजेपी कार्यकर्ता रोहित रॉय को पेट में गोली मार दी गई। यह घटना उस समय हुई जब वह अपनी पार्टी की चुनावी जीत के जश्न में अपने इलाके में बीजेपी के झंडे लगा रहे थे।

रिपोर्ट के अनुसार, पीड़ित का सामना 8 से 10 लोगों के एक समूह से हुआ, जिसके बाद उनमें से 3 से 5 लोगों ने उन पर गोली चला दी। हमले के बाद रोहित रॉय को तुरंत बसिरहाट स्टेट अस्पताल ले जाया गया। फिलहाल उनकी हालत गंभीर लेकिन स्थिर बताई जा रही है।

उत्तर 24 परगना में भाजपा समर्थक के घर में तोड़फोड़

सोमवार (4 मई 2026) को पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना जिले के आमडंगा विधानसभा क्षेत्र में बीजेपी समर्थक मदन मोरोल के घर पर हमला और तोड़फोड़ की गई। आरोप है कि इस घटना को TMC समर्थित लोगों ने अंजाम दिया।

पीड़ित ने मीडिया से बात करते हुए बताया, “हमने बीजेपी को वोट दिया था, इसलिए कल देर रात 40-50 तृणमूल के असामाजिक तत्व आए और हमारे घर में तोड़फोड़ की तथा हमें पीटा। पुलिस को सूचना मिलने के बाद पुलिस और केंद्रीय बल मौके पर पहुंचे। मैं बहुत डरा हुआ हूँ।”

बारानगर में भाजपा कार्यकर्ता पर चाकू से हमला

बुधवार (6 मई 2026) को पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना जिले के बरानगर इलाके में बीजेपी नेता सोमनाथ धर पर बेरहमी से चाकू से हमला किया गया। वह बूथ अध्यक्ष के पद पर कार्यरत थे और इस हमले में वह तथा उनके परिवार के सदस्य गंभीर रूप से घायल हो गए।

रिपोर्ट के अनुसार, सोमनाथ धर अपने घर के बाहर खड़े थे तभी उन पर अचानक हमला किया गया। हमलावरों ने उन्हें जमीन पर गिराकर धारदार हथियारों से वार किया। जब उनके परिवार के सदस्य उन्हें बचाने पहुँचे, तो उन पर भी हमला किया गया। बाद में घायल अवस्था में उन्हें स्थानीय अस्पताल में भर्ती कराया गया।

परिवार का आरोप है कि यह हमला TMC से जुड़े रंजीत धर और शुभंकर धर ने किया है। उनका कहना है कि दोनों लंबे समय से उनके पैतृक घर पर कब्जा करने की कोशिश कर रहे थे और संपत्ति नहीं छोड़ने पर नाराज होकर उन्होंने यह हमला किया।

अमित ठाकोर के ट्वीट का स्क्रीनशॉट

पानीहाटी में बम धमाके में 5 BJP कार्यकर्ता घायल

बुधवार 6 मई को पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना जिले के पानीहाटी इलाके में बीजेपी कार्यकर्ताओं पर कच्चे बम फेंके जाने की घटना सामने आई। यह घटना पानीहाटी नगरपालिका के वार्ड नंबर 2 के दत्ता रोड स्थित सेंट जेवियर्स संस्थान के पास हुई।

रिपोर्ट के अनुसार, कुछ बीजेपी कार्यकर्ता स्थानीय लोगों से बातचीत कर रहे थे, तभी बाइक सवार कुछ लोग वहाँ पहुँचे। प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक बाइक पर चार लोग सवार थे और उन्होंने एक के बाद एक तीन बम बीजेपी कार्यकर्ताओं की ओर फेंके और मौके से फरार हो गए।

इस हमले में करीब 5 बीजेपी कार्यकर्ता गंभीर रूप से घायल हो गए। घायलों को तुरंत आर जी कर मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहाँ उनका इलाज चल रहा है।

गौरतलब है कि इसी क्षेत्र से बीजेपी उम्मीदवार रतना देवनाथ ने चुनाव में जीत दर्ज की है, जो आरजी कर अस्पताल की रेप और हत्या पीड़िता की माँ हैं।

संदेशखली में 3 पुलिस अधिकारियों और 2 CRPF जवानों पर हमला

बुधवार (6 मई 2026) को पश्चिम बंगाल के संदेशखाली के बामनघेरिया इलाके में गश्त पर निकली पुलिस और केंद्रीय बलों की टीम पर अचानक हमला किया गया। अज्ञात हमलावरों ने फायरिंग की, जिसमें कई पुलिसकर्मी घायल हो गए।

घायलों में नजत थाना प्रभारी भारत पुरकैत, राजबाड़ी आउटपोस्ट के अधिकारी भास्वत गोस्वामी और एक महिला पुलिस अधिकारी शामिल हैं। साथ ही इस गोलीबारी में दो सीआरपीएफ जवान भी घायल हुए।

सभी घायल सुरक्षाकर्मियों को तुरंत मिनाखा ग्रामीण अस्पताल ले जाया गया, जहां प्राथमिक उपचार के बाद उनकी गंभीर हालत को देखते हुए उन्हें कोलकाता के अलग-अलग सरकारी अस्पतालों में बेहतर इलाज के लिए रेफर किया गया।

टीएमसी पार्षद के पति ने बीजेपी माइनॉरिटी विंग के नेता पर हमला किया

शुक्रवार (7 मई 2026) को पश्चिम बंगाल के हावड़ा के शिबपुर इलाके में TMC पार्षद के पति शमीम अहमद पर बीजेपी कार्यकर्ताओं और समर्थकों पर हिंसक हमले का आरोप लगा है।

बताया जा रहा है कि सामने आए वीडियो में अहमद एक भीड़ का नेतृत्व करते दिखे, जिसके दौरान 7-15 कच्चे बम फेंके गए और 7-8 राउंड गोलियाँ भी चलाई गईं। इस हमले का मुख्य निशाना बीजेपी अल्पसंख्यक मोर्चा अध्यक्ष मनोज खान का घर बताया गया।

इस हमले में बीजेपी नेता मुन्‍ना खान और सिकंदर खान घायल हो गए, जबकि कई अन्य कार्यकर्ता भी जख्मी हुए। सभी घायलों को इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती कराया गया है। गौरतलब है कि शमीम अहमद का नाम पहले भी रामनवमी जुलूस के दौरान हुई हिंसा के मामले में सामने आ चुका है और उन्हें NIA द्वारा गिरफ्तार भी किया गया था।

टीएमसी के गुंडों ने टॉलीगंज में पेट्रोल पंप मालिक को धमकाया

सोमवार (4 मई 2026) को कोलकाता के टॉलीगंज इलाके में स्थित HPCL पेट्रोल पंप की मालिक शालिनी सेन ने आरोप लगाया कि उनके पेट्रोल पंप पर कुछ लोगों ने हंगामा किया।

शालिनी सेन के अनुसार, “कल शाम जब मैं घर पर थी, तभी लगभग 30-40 लोग नशे की हालत में पेट्रोल पंप पर पहुँचे। उन्होंने मैनेजर को एक बड़े फ्यूल टैंकर की पार्किंग को लेकर धमकाया और कहा कि उसे हटाने के लिए केवल 10 मिनट दिए जाएँगे, नहीं तो वे हंगामा करेंगे। इसके बाद मेरे मैनेजर ने मुझे फोन कर पूछा कि क्या करना है।”

शालिनी सेन ने आगे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का आभार भी जताया। उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल में लोगों को अब आखिरकार खुलकर सांस लेने, सुरक्षित तरीके से जीने और बिना डर के काम करने का अवसर मिल रहा है।

मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

योगी सरकार में जीरो टॉलरेंस पॉलिसी से UP में क्राइम पर लगी लगाम, सपा शासन में हर दिन होते थे 19 दंगे-33 अपहरण: समझें कैसे आया ये बदलाव

उत्तर प्रदेश में कानून व्यवस्था की तस्वीर पिछले नौ वर्षों में पूरी तरह बदल गई है। योगी आदित्यनाथ सरकार की जीरो टॉलरेंस नीति ने राज्य को दंगा मुक्त बनाते हुए फिरौती के लिए अपहरण जैसी घटनाओं पर पूरी तरह लगाम लगा दी है। जिस प्रदेश को 2017 से पहले ‘दंगा प्रदेश’ कहा जाता था, वहाँ अब शांति और सुरक्षा की मिसाल कायम हो गई है।

सपा सरकार में हर दिन औसतन 19 दंगे-33 अपहरण

सपा सरकार के दौरान वर्ष 2012 से 2017 के बीच प्रदेश में कानून व्यवस्था को लेकर लगातार सवाल उठते रहे। एनसीआरबी की रिपोर्ट के अनुसार उस समय औसतन हर दिन करीब 19 दंगे होते थे और अपहरण की 33 घटनाएँ दर्ज की जाती थीं। इस अवधि में कुल 25 हजार से अधिक दंगे हुए, जो प्रदेश की छवि को बुरी तरह प्रभावित करते थे। व्यापारी और आम नागरिक दोनों ही फिरौती के खतरे में रहते थे।

योगी सरकार ने अपनाई जीरो टॉलरेंस पॉलिसी

योगी सरकार ने सत्ता संभालते ही अपराध और अपराधियों के खिलाफ सख्त रुख अपनाया। जीरो टॉलरेंस नीति के तहत सक्रिय पुलिसिंग, गैंगस्टर एक्ट का इस्तेमाल और माफिया की संपत्तियों की जब्ती जैसे कदम उठाए गए। परिणामस्वरूप पिछले नौ वर्षों में उत्तर प्रदेश में एक भी दंगा नहीं हुआ। कुछ अराजक तत्वों द्वारा दंगा भड़काने की कोशिशें जरूर की गईं, लेकिन सरकार ने समय रहते सख्त कार्रवाई कर उन मंसूबों पर पानी फेर दिया।

मामूली हिंसक घटनाओं को उग्र रूप लेने से पहले ही दंगा विरोधी धाराओं में रिपोर्ट दर्ज कर अराजक तत्वों को सलाखों के पीछे भेज दिया गया। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सार्वजनिक मंचों पर स्पष्ट कहा है, ‘नो कर्फ्यू-नो दंगा, यूपी में सब चंगा।’ उनकी इस नीति ने पूरे प्रदेश में शांति का माहौल स्थापित किया है।

एनसीआरबी की रिपोर्ट करती है दावों की पुष्टि

एनसीआरबी की 2024 रिपोर्ट इस बदलाव की पुष्टि करती है। रिपोर्ट के अनुसार फिरौती के लिए अपहरण की अपराध दर उत्तर प्रदेश में शून्य दर्ज की गई है। वर्ष 2023 में भी यह दर शून्य ही रही। देश के अन्य राज्यों की तुलना में यूपी इस मामले में सबसे बेहतर स्थिति में है। नगालैंड में यह दर 0.7, मणिपुर में 0.6, अरुणाचल प्रदेश में 0.3 और मेघालय में 0.2 रही, जबकि उत्तर प्रदेश में शून्य रहा।

प्रदेश में दो वर्षों (2023-2024) में फिरौती के लिए अपहरण की एक भी घटना नहीं हुई। पहले जहां व्यापारियों को आए दिन अगवा कर फिरौती माँगी जाती थी, वहां अब ऐसी घटनाएँ पूरी तरह समाप्त हो गई हैं। एनसीआरबी रिपोर्ट स्पष्ट बताती है कि सपा शासन में हर दिन 33 अपहरण दर्ज होते थे, लेकिन योगी सरकार में यह आँकड़ा शून्य पर पहुँच गया है।

बलवा यानी दंगे की अपराध दर पर भी योगी सरकार का रिकॉर्ड उल्लेखनीय है। 2024 में यूपी में यह दर 1.1 दर्ज की गई, जबकि राष्ट्रीय स्तर पर यह 2.2 रही। रिपोर्ट में उल्लेख है कि यूपी में दर्ज 1.1 दर वाले मामले वे हैं जिनमें दंगा भड़काने की कोशिशों को तुरंत विफल कर दिया गया और अराजक तत्वों के खिलाफ सख्त धाराओं में कार्रवाई की गई। मणिपुर में यह दर 8.4, महाराष्ट्र में 6.4, कर्नाटक में 5.4, हरियाणा में 5.3 और हिमाचल प्रदेश में 4.7 रही।

योगी सरकार ने बदली यूपी की तस्वीर

यह सकारात्मक बदलाव योगी सरकार की अपराध एवं अपराधियों के खिलाफ जीरो टॉलरेंस नीति, सक्रिय पुलिसिंग और संगठित अपराधों पर लगातार कार्रवाई का नतीजा है। पुलिस ने गैंगस्टर एक्ट लागू कर माफिया की आर्थिक कमर तोड़ी और उनकी संपत्तियां जब्त कीं। इन कदमों का असर धरातल पर साफ दिखाई दे रहा है।

उत्तर प्रदेश अब न केवल दंगा मुक्त है बल्कि अपराध की अन्य श्रेणियों में भी राष्ट्रीय औसत से बेहतर प्रदर्शन कर रहा है। सपा सरकार के समय की तुलना में आज यूपी की छवि पूरी तरह बदल चुकी है। पहले जहाँ दंगे और अपहरण आम बात थे, वहां आज शांति और विकास की कहानी लिखी जा रही है।

सरकार का मानना है कि सख्त कानून व्यवस्था ही विकास का आधार है। योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में उठाए गए इन कदमों ने न केवल अपराधियों के हौसले पस्त किए हैं बल्कि आम नागरिकों में सुरक्षा की भावना भी बढ़ाई है। एनसीआरबी की ताजा रिपोर्ट इसी सच्चाई की गवाही देती है।

इस तरह योगी सरकार ने साबित कर दिया कि जीरो टॉलरेंस नीति के साथ सख्ती और संवेदनशीलता का सही संतुलन अपराध मुक्त समाज का रास्ता तैयार कर सकता है। उत्तर प्रदेश अब पूरे देश के लिए मिसाल बन गया है।

रेप-ब्लैकमेल-फिरौती… बरेली जिम जिहादी अकरम-आलम ने डॉक्टर ही नहीं- पड़ोसन पर भी ढाया जुल्म, पहले से दर्ज हैं कई FIR: GYM में हिंदू युवती को धमकाने का भी केस, जानें इनकी करतूतें

उत्तर प्रदेश के बरेली में महिला डॉक्टर से रेप किए जाने और अश्लील Video बनाकर ब्लैकमेल किए जाने के मामले मे पुलिस ने दो जिहादी भाइयों अकरम बेग और आलम बेग को गिरफ्तार किया है। ये दोनों जिहादी ‘अल्टीमेट’ नाम से जिम चलाते थे और खुलासा हुआ है कि इसमें करीब 80 हिंदू महिलाएँ वर्कआउट के लिए आती थीं लेकिन वहाँ कोई महिला ट्रेनर तक नहीं थी।

ताजा मामला में आलम बेग ने महिला डॉक्टर को वजन घटाने का झाँसा देकर नशीला ‘प्री-वर्कआउट’ ड्रिंक पिला था और उसके बेहोश हो जाने पर दोनों उसे एक प्राइवेट कमरे में ले गए। वहाँ उसका रेप किया गया और वहीं लगे कैमरे और मोबाइल से डॉक्टर का अश्लील वीडियो भी शूट किया गया। इसके बाद जिहादियों ने अश्लील वीडियो से ब्लैकमेल कर डॉक्टर को लूटना शुरू कर दिया।

करीब 2 साल तक महिला का उत्पीड़न होकर रहा और अंतत: वो हिम्मत जुटाकर पुलिस के पास पहुँची जिसके बाद दोनों जिहादी भाई गिरफ्तार कर लिए गए हैं। ये एक दो नहीं बल्कि 7 भाई है और इन पर पहले भी गुंडई और दबंगई के आरोप लगते रहे हैं। आरोपितों का परिवार उन्हें निर्दोष बताने की कोशिश में जुटा है लेकिन दोनों भाइयों को यह पाप कोई नया नहीं है। दोनों और अन्य भाइयों के कुकर्मों की एक लंबी फेहरिस्त है जिनमें से कुछ पर हम नजर डालेंगे।

अक्टूबर 2024: दोनों भाइयों ने हिंदू महिला के साथ की अभद्रता, पीछे भेजे लड़के

अक्टूबर 2024 में भी एक महिला ने दोनों जिहादी भाइयों के खिलाफ पुलिस में FIR दर्ज कराई थी। ऑपइंडिया के पास मौजूद FIR कॉपी के मुताबिक, हिंदू पीड़िता ने आरोप लगाया था कि ‘अल्टीमेट जिम’ के संचालक अकरम और उसके भाई आलम ने उसके साथ अभद्र व्यवहार किया, गालियाँ दीं और जान से मारने की धमकी दी।

शिकायत में कहा गया था कि हिंदू पीड़िता जिम जाती थी, जहाँ उसके साथ पहले भी कई बार गलत हरकतें और गंदे कमेंट किए गए। युवती के मुताबिक, जब उसने जिम मालिक अकरम से इसकी शिकायत की तो उसका भाई आलम उससे बदतमीजी करने लगा। आरोप है कि आलम मारपीट के लिए आगे बढ़ा और जिम से बाहर तक उसका पीछा किया।

FIR में यह भी दावा किया गया कि दोनों भाई पहले भी उसके पीछे जिम के लड़कों को भेजते थे और लगातार परेशान करते थे। पीड़िता ने पुलिस से कहा था कि उसे दोनों भाइयों से खतरा है और वे उसे मारने की धमकी दे चुके हैं।

FIR की कॉपी की एक प्रति

मार्च 2024: आलम बेग ने महिला के घर में घुसकर की रेप की कोशिश

मई 2024 में भी आलम बेग समेत अन्य लोगों के खिलाफ एक FIR दर्ज की गई थी। इसमें बरेली में एक महिला ने आलम पर घर में घुसकर रेप की कोशिश करने और जान से मारने की धमकी देने का गंभीर आरोप लगाया था।

ऑपइंडिया के पास मौजूद FIR कॉपी के मुताबिक, महिला ने आरोप लगाया कि उसका पड़ोसी आलम बेग उर्फ छोटे मियाँ काफी समय से उस पर बुरी नजर रखता था। महिला का कहना है कि आलम बेग शराब पीने का आदी है और पहले भी कई बार उसके साथ अश्लील हरकतें कर चुका था। पीड़िता ने बताया कि उसने इस बारे में पहले ही अपने पति को जानकारी दी थी।

महिला के मुताबिक, 30 मार्च 2024 की रात करीब 11 बजे वह अपने कमरे में अकेली थी। इसी दौरान आलम बेग शराब के नशे में चाकू लेकर उसके कमरे में घुस आया। आरोप है कि वह महिला के बिस्तर पर लेट गया और उसके साथ जबरदस्ती अश्लील हरकतें करने लगा। शिकायत में कहा गया कि आरोपित ने महिला को निर्वस्त्र कर बलात्कार करने की कोशिश की।

FIR की कॉपी की एक प्रति

पीड़िता का आरोप है कि जब उसने विरोध किया और शोर मचाया, तो आलम बेग ने चाकू दिखाकर उसे चुप रहने और जान से मारने की धमकी दी। इसी दौरान महिला के छोटे बच्चे रोने और चीखने लगे, जिसके बाद आरोपित मौके से भाग गया।

महिला ने बताया कि घटना के करीब आधे घंटे बाद जब उसके पति घर लौटे, तब उसने पूरी घटना उन्हें बताई। इसके बाद पति ने आरोपित के घर जाकर शिकायत की और पुलिस बुलाने की बात कही। आरोप है कि इसके बाद आलम बेग के साथ उसका भाई मुकर्रम उर्फ मिक्की, भतीजा रजा खान और सोहेल अहमद भी वहाँ पहुँच गए।

शिकायत में कहा गया कि इन सभी लोगों ने उल्टा महिला और उसके पति के साथ मारपीट और गाली-गलौज शुरू कर दी। इतना ही नहीं, उन्होंने पूरे परिवार को जान से मारने और मोहल्ले से निकाल देने की धमकी भी दी। पीड़िता ने अपनी शिकायत में कहा कि आरोपित पक्ष इलाके में दबंग और प्रभावशाली माना जाता है जबकि वह और उसका पति अकेले रहते हैं।

अप्रैल 2025: आलम बेग और उसके भाइयों पर जुड्डा का अड्डा चलाने का केस

बरेली के बारादरी थाना क्षेत्र में रहने वाले एक व्यक्ति ने आलम बेग और उसके भाइयों पर पर जुआ अड्डा चलाने, घर में घुसकर मारपीट करने और तमंचे के बल पर जान से मारने की धमकी देने का गंभीर आरोप लगाया है। यह मामला अप्रैल 2025 में दर्ज शिकायत से जुड़ा है।

ऑपइंडिया के पास मौजूद FIR कॉपी के मुताबिक, शिकायतकर्ता नसीम बेग ने वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) को दिए प्रार्थना पत्र में आरोप लगाया कि उसके पड़ोसी अकमल बेग उर्फ अऊआ, उसका भाई आलम बेग, मुकर्रम बेग उर्फ मिक्की और उनके परिवार के लोग में जुए का अड्डा चलाते हैं। शिकायत में कहा गया कि घेर जाफर खाँ, झंडे वाली गली, पुराना शहर इलाके में असामाजिक तत्वों और जुआरियों का लगातार जमावड़ा लगा रहता था।

FIR की कॉपी की एक प्रति

शिकायत के अनुसार, पहली शिकायत के बाद 15 अप्रैल 2025 की रात करीब 9 बजे फिर से इलाके में जुआरियों और असामाजिक तत्वों की भीड़ जमा होने लगी। इस पर नसीम बेग ने 112 नंबर पर फोन कर पुलिस बुला ली। पुलिस के पहुँचने के बाद जुआ और जमावड़ा बंद करा दिया गया लेकिन पुलिस के जाते ही मामला और भड़क गया।

आरोप है कि आलम बेग, मुकर्रम बेग उर्फ मिक्की और करीब 10-12 जुआरी नसीम बेग के घर पहुँच गए और गेट पर लात मारते हुए धमकाने लगे। शिकायत में कहा गया कि आरोपितों ने कहा ‘आज तो तूने पुलिस बुलाकर काम बंद करा दिया, अब यह काम रोज होगा। अगर दोबारा रुकावट डाली तो पूरे परिवार को जान से मरवा देंगे’।

FIR में आगे कहा गया है कि 23 अप्रैल 2025 की रात करीब 10:50 बजे आलम बेग शराब के नशे में अपने भाई मुकर्रम बेग उर्फ मिक्की और दो अन्य बदमाश साथियों के साथ नसीम बेग के घर में घुस आया। उस समय नसीम बेग और उसकी पत्नी घर पर मौजूद थे।

शिकायतकर्ता के मुताबिक, आरोपितों ने घर में घुसते ही गाली-गलौज और मारपीट शुरू कर दी। आरोप है कि आलम बेग के हाथ में तमंचा था, जिसे उसने नसीम बेग की कनपटी पर लगा दिया।

शिकायत में कहा गया कि आलम बेग ने धमकी देते हुए कहा कि वह उसके भाई अकमल बेग उर्फ अऊआ का ‘कैरम’ यानी जुआ का काम बंद कराने के लिए लगातार पुलिस में शिकायत करता है। अगर दोबारा कोई शिकायत की गई तो उसे और उसकी पत्नी को जान से मार दिया जाएगा। नसीम बेग ने यह भी आरोप लगाया कि मुकर्रम बेग ने उसका गला दबाकर जान से मारने की कोशिश की।

अगस्त 2025: केस दर्ज होन के बाद आलम ने पड़ोसी से की मारपीट

आलम और अन्य लोगों के खिलाफ 8 सितंबर 2025 को भी एक FIR दर्ज की गई थी। यह केस अप्रैल 2025 में दर्ज जुआ और धमकी वाले मुकदमे से ही जुड़ा हुआ था।

ऑपइंडिया के पास मौजूद FIR कॉपी के मुताबिक, शिकायतकर्ता नसीम बेग ने बताया कि 14 अगस्त 2025 को मुकदमे (अप्रैल 2025 का जुए से जुड़ा) की विवेचना के लिए पुलिस अधिकारी उनके मोहल्ले में पहुँचे थे। इसी बात से नाराज होकर अगले ही दिन यानी 15 अगस्त 2025 को दोपहर करीब 12 बजे आलम बेग, उवैस और इस्माइल उनके घर में घुस आए।

FIR की कॉपी की एक प्रति

FIR में कहा गया है कि आरोपितों ने घर में घुसते ही नसीम बेग और उनकी पत्नी के साथ गाली-गलौज और मारपीट शुरू कर दी। आरोप है कि उवैस ने धारदार हथियार से नसीम बेग के सिर पर हमला कर दिया, जिससे उनके सिर से खून बहने लगा।

FIR के मुताबिक, इसके बाद आरोपित नसीम बेग को घसीटते हुए घर के बाहर तक ले आए। शिकायतकर्ता ने कहा कि पूरी घटना मोहल्ले के लोगों ने भी देखी। जब नसीम बेग ने मारपीट का वीडियो बनाने की कोशिश की, तब आलम बेग ने उनका मोबाइल फोन छीन लिया। FIR में कहा गया कि मोबाइल में दो सिम भी थीं, जो आरोपित के पास ही हैं।

नसीम बेग ने आरोप लगाया कि जाते-जाते आरोपितों ने उन्हें धमकी दी कि अगर उन्होंने पहले दर्ज कराया गया मुकदमा वापस नहीं लिया तो पूरे परिवार को जान से मार दिया जाएगा।

इन FIRs को अगर एक साथ जोड़कर देखा जाए तो यह केवल एक रेप और ब्लैकमेल का मामला नहीं है, बल्कि महिलाओं को निशाना बनाने, दबंगई, धमकी, मारपीट और इलाके में भय का माहौल बनाने के लगातार सामने आती एक लंबी श्रृंखला है। अलग-अलग समय पर अलग-अलग लोगों द्वारा दर्ज कराई गई शिकायतों में बार-बार वहीं नाम सामने आना बताता है कि इन जिहादियों ने लंबे वक्त से किस तरह दबंगई की है।

अब महिला डॉक्टर के साथ रेप, अश्लील वीडियो बनाकर ब्लैकमेल और उगाही का आरोप है, तो दूसरी तरफ महिलाओं से अभद्रता, घर में घुसकर रेप की कोशिश, जुआ अड्डा चलाने, तमंचे के बल पर धमकाने और मुकदमा वापस लेने के लिए मारपीट जैसे आरोप भी FIR में दर्ज हैं। ‘अल्टीमेट जिम’ में करीब 80 हिंदू महिलाओं के आने की बात सामने आना और वहाँ किसी महिला ट्रेनर का न होना भी कई सवाल पैदा करता है।

अब पुलिस के सामने चुनौती सिर्फ एक केस की जाँच भर नहीं है बल्कि यह पता लगाने की भी है कि क्या यह पूरा नेटवर्क सुनियोजित तरीके से महिलाओं को निशाना बना रहा था। फिलहाल पुलिस ने अकरम बेग और आलम बेग को गिरफ्तार कर लिया है। उम्मीद है कि पुलिस इसे कोई इकलौता केस मानकर नहीं छोड़ देगी बल्कि इसकी तह तक जाएगी और इस सुनियोजित नेटवर्क का पर्दाफाश कर इसमें शामिल लोगों को जेल तक पहुँचाएगी।

पश्चिम बंगाल के नए CM शुभेंदु अधिकारी, छात्र राजनीति से शुरू कर सफर पहुँचे सत्ता के शीर्ष पर: 2 बार ममता को दी चुनावी शिकस्त, जानें उनके बारे में सब कुछ

पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की ऐतिहासिक जीत के बाद पार्टी ने वरिष्ठ नेता शुभेंदु अधिकारी को विधायक दल का नेता चुन लिया है।

इसके साथ ही अब उनका पश्चिम बंगाल का अगला मुख्यमंत्री बनना तय माना जा रहा है। बीजेपी ने इस चुनाव में राज्य में बड़ी जीत हासिल की है और लंबे समय से बंगाल में पार्टी का सबसे बड़ा चेहरा रहे शुभेंदु अधिकारी को इसकी सबसे बड़ी वजह माना जा रहा है।

बीजेपी की जीत के बाद सबसे बड़ा सवाल यही था कि आखिर बंगाल की कमान किसके हाथ में जाएगी। कई नाम चर्चा में थे, लेकिन अंत में पार्टी नेतृत्व ने शुभेंदु अधिकारी पर भरोसा जताया। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने विधायक दल की बैठक में उनके नाम का ऐलान किया।

कौन हैं शुभेंदु अधिकारी?

शुभेंदु अधिकारी का जन्म 15 दिसंबर 1970 को पश्चिम बंगाल के पूर्वी मेदिनीपुर जिले के कांथी इलाके में हुआ था। वे एक बड़े राजनीतिक परिवार से आते हैं। उनके पिता शिशिर अधिकारी बंगाल की राजनीति का बड़ा नाम रहे हैं और कई बार सांसद भी चुने जा चुके हैं।

शुभेंदु अधिकारी ने अपनी शुरुआती पढ़ाई कांथी हाई स्कूल से की। इसके बाद उन्होंने प्रभात कुमार कॉलेज से ग्रेजुएशन किया। बाद में उन्होंने रवींद्र भारती विश्वविद्यालय से मास्टर ऑफ आर्ट्स की डिग्री हासिल की।

राजनीति में आने से पहले ही उनके परिवार का बंगाल की राजनीति में बड़ा प्रभाव था। खासकर पूर्वी मेदिनीपुर इलाके में अधिकारी परिवार का दबदबा लंबे समय से माना जाता रहा है।

छात्र राजनीति से शुरू हुआ सफर

शुभेंदु अधिकारी ने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत 1989 में कॉन्ग्रेस की छात्र राजनीति से की थी। उस समय बंगाल में वामपंथी दलों का दबदबा था और विपक्षी छात्र नेता के तौर पर अपनी पहचान बनाना आसान नहीं था।

1995 में वे कांथी नगर पालिका में पार्षद चुने गए और यहीं से उनकी सक्रिय राजनीति की शुरुआत हुई। बाद में वे अपने पिता के साथ TMC में शामिल हो गए।

ममता बनर्जी के करीबी से सबसे बड़े विरोधी तक

एक समय ऐसा था जब शुभेंदु अधिकारी को ममता बनर्जी का बेहद करीबी माना जाता था। उन्होंने TMC को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाई। 2006-07 में सिंगूर और नंदीग्राम आंदोलन के दौरान शुभेंदु अधिकारी सबसे आगे रहे।

इन्हीं आंदोलनों ने बंगाल में 34 साल पुरानी वामपंथी सरकार के खिलाफ माहौल बनाया। इसके बाद 2011 में TMC सत्ता में आई और ममता बनर्जी पहली बार मुख्यमंत्री बनीं।

लेकिन समय के साथ शुभेंदु और TMC नेतृत्व के बीच दूरी बढ़ने लगी। आखिरकार 2020 में उन्होंने TMC छोड़ दी और बीजेपी में शामिल हो गए। उनके बीजेपी में आने को पार्टी के लिए बड़ा राजनीतिक फायदा माना गया।

लगातार दो बार ममता बनर्जी को हराया

शुभेंदु अधिकारी का नाम पूरे देश में तब चर्चा में आया जब उन्होंने 2021 के विधानसभा चुनाव में नंदीग्राम सीट से ममता बनर्जी को हराया। यह मुकाबला बेहद हाई-प्रोफाइल था।

इसके बाद 2026 के चुनाव में उन्होंने फिर ममता बनर्जी के खिलाफ चुनाव लड़ा। इस बार भवानीपुर सीट पर भी उन्होंने ममता बनर्जी को शिकस्त दी। यही वजह रही कि बीजेपी की जीत के बाद मुख्यमंत्री पद की दौड़ में उनका नाम सबसे आगे माना जा रहा था।

कितनी है शुभेंदु अधिकारी की संपत्ति?

चुनावी हलफनामे के मुताबिक शुभेंदु अधिकारी करोड़पति नेताओं में शामिल नहीं हैं। उनकी कुल संपत्ति करीब 85.87 लाख रुपए बताई गई है। खास बात यह है कि उनके ऊपर किसी तरह का कोई कर्ज नहीं है।

उनके पास करीब 12 हजार रुपए नकद हैं। वहीं PNB, SBI और IDIB बैंक समेत कई खातों में लगभग 7 लाख रुपए जमा हैं। इसके अलावा उन्होंने पोस्टल सेविंग, किसान विकास पत्र और NSC में भी निवेश किया हुआ है। उनके पास शेयर और बॉन्ड्स में भी थोड़ा निवेश है।

आमतौर पर बड़े नेताओं के पास लग्जरी गाड़ियाँ और भारी संपत्ति होती है, लेकिन शुभेंदु अधिकारी का हलफनामा इससे अलग तस्वीर दिखाता है। उनके नाम पर कोई कार या बाइक नहीं है। यहाँ तक कि उनके पास सोना-चाँदी के गहने भी नहीं बताए गए हैं।

हालाँकि उनके पास कृषि भूमि और कुछ प्लॉट जरूर हैं। इसके अलावा उनके नाम पर तीन घर और फ्लैट दर्ज हैं, जिनकी कीमत करीब 24 लाख रुपए बताई गई थी।

शुभेंदु अधिकारी का पूरा परिवार राजनीति से जुड़ा रहा है। उनके भाई सौमेंदु अधिकारी भी बीजेपी में सक्रिय हैं। वहीं उनके दूसरे भाई दिव्येंदु अधिकारी पहले TMC सांसद रह चुके हैं। दिलचस्प बात यह है कि शुभेंदु अधिकारी ने अब तक शादी नहीं की है।

बीजेपी ने क्यों जताया भरोसा?

बीजेपी नेतृत्व का मानना है कि बंगाल में पार्टी को मजबूत करने में शुभेंदु अधिकारी की सबसे बड़ी भूमिका रही है। वे राज्य की जमीनी राजनीति को अच्छी तरह समझते हैं और संगठन पर उनकी मजबूत पकड़ मानी जाती है।

केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने विधायक दल की बैठक में कहा कि सभी विधायकों ने एकमत से शुभेंदु अधिकारी के नाम का समर्थन किया। किसी दूसरे नाम का प्रस्ताव तक नहीं आया। यही वजह रही कि उन्हें विधायक दल का नेता चुना गया।

अब शुभेंदु अधिकारी के सामने सबसे बड़ी चुनौती बंगाल में बीजेपी सरकार को मजबूत तरीके से चलाने और राज्य की राजनीति में अपनी पकड़ बनाए रखने की होगी। बंगाल की राजनीति में उनकी एंट्री छात्र नेता के तौर पर हुई थी, लेकिन आज वे राज्य के सबसे ताकतवर नेताओं में गिने जा रहे हैं।

‘SIR की वजह से जीती BJP’: The Wire, आँकड़े और तर्क कहते हैं कुछ और, समझें कैसे ये दावा असलियत से है कोसों दूर

फैलेसी यानी तर्क में गलती या सोचने के तरीके की कमी। दुनिया में 230 से ज्यादा तरह की फैलसी होती हैं। इनमें से एक बहुत मशहूर भूल है ‘दो चीजों के एक साथ होने को किसी काम की ‘वजह’ मान लेना’। इसका मतलब होता है कि अगर दो चीजें एक साथ हो रही हैं, तो लोग मान लेते हैं कि एक चीज दूसरे की वजह से हो रही है। लेकिन यहाँ इस गलत निष्कर्ष की बात क्यों हो रही है? क्योंकि द वायर ने एक लेख छापा जिसका शीर्षक था ‘डेटा दिखाता है कि SIR ने बंगाल में बीजेपी की मदद की’।

इस लेख में यह दिखाने की कोशिश की गई कि SIR ने पश्चिम बंगाल चुनाव में बीजेपी की जीत में मदद की। लेकिन पूरा लेख सिर्फ अंदाजों, अधूरी बातों और गलत तर्क पर आधारित है। इस लेख में हम समझेंगे कि ये दावे सिर्फ कमजोर ही नहीं बल्कि लोगों को गुमराह करने वाले भी हैं।

साथ होने का मतलब वजह होना नहीं होता

पूरे लेख में द वायर  का तर्क सिर्फ एक आंकड़े पर टिका है कि कई सीटों पर हटाए गए वोटरों की संख्या जीत के अंतर से ज्यादा थी। इसी के आधार पर दावा किया गया कि SIR ने बीजेपी को फायदा पहुँचाया। लेकिन यही सबसे बड़ी कमजोरी भी है।

सिर्फ इसलिए कि दो चीजें एक साथ हुईं, इसका मतलब यह नहीं कि एक दूसरी की वजह है। वोटर हटाए गए, इससे यह साबित नहीं हो जाता कि बीजेपी उसी वजह से जीती।

लेख यह भी साबित नहीं कर पाता कि अगर ये वोटर हटाए नहीं जाते तो नतीजे बदल ही जाते। ज्यादा से ज्यादा इसे एक संभावना कहा जा सकता है, पक्का सच नहीं।

लेख बार-बार वोटर हटाने और कम जीत के अंतर की तुलना करके यह माहौल बनाने की कोशिश करता है कि चुनाव का नतीजा बदल दिया गया। लेकिन कहीं भी यह नहीं बताया गया कि आखिर SIR ने बीजेपी की मदद कैसे की। यह साबित नहीं किया गया कि हटाए गए वोटर सच में वोट डालते, वे असली वोटर थे भी या नहीं या फिर मतदान का तरीका वैसा ही रहता।

सबसे बड़ी बात यह है कि द वायर ने अपने लेख में खुद ये बात मानी है कि हर सीट का नतीजा SIR की वजह से बदला। यानी लेखक खुद ही कह रहा है कि उसका तर्क पूरी तरह पक्का नहीं है।

यहीं पर पूरा लेख कमजोर पड़ जाता है। एक तरफ शीर्षक में बड़े भरोसे के साथ कहा जाता है कि ‘डेटा दिखाता है कि SIR ने बीजेपी को जिताया’, लेकिन अंदर का पूरा लेख सिर्फ मान्यताओं, कल्पनाओं और संभावनाओं पर टिका है। कोई सीधा सबूत नहीं दिया गया।

यह लेख 14 साल की सत्ता विरोधी लहर, बीजेपी की संगठनात्मक ताकत, उम्मीदवारों का चयन, सरकार के खिलाफ नाराजगी, मतदान का तरीका और बदलते वोटरों के रुझान जैसे बड़े कारणों को पूरी तरह नजरअंदाज कर देता है।

लेख पूरी तरह कल्पनाओं पर टिका है

आँकड़ों की तुलना करने के बाद ‘लेख अगर ऐसा होता तो?’ वाली कल्पनाओं की दुनिया में चला जाता है। यहाँ लेखक अलग-अलग कहानियाँ बनाकर निष्कर्ष निकालने की कोशिश करता है। लेकिन ये सिर्फ कल्पना है, सबूत नहीं।

पहले मॉडल में लेखक सबसे खराब स्थिति मान लेता है। इसमें कहा जाता है कि हर हटाया गया वोटर TMC को वोट देता और हर नया वोटर बीजेपी को। फिर कहा जाता है कि अगर SIR नहीं हुआ होता तो 87 सीटें TMC के पास रहतीं और शायद चुनाव का नतीजा बदल जाता।

लेकिन यहाँ कई सवाल खड़े होते हैं। हमें कैसे पता कि हटाए गए वोटर असली थे और अभी भी जिंदा थे? और अगर वे असली वोटर थे भी, तो यह क्यों मान लिया जाए कि सभी TMC को ही वोट देते? वे बीजेपी, कॉन्ग्रेस या वामपंथी दलों को भी वोट दे सकते थे और क्या यह तय है कि हर हटाया गया वोटर मतदान करता?

यानी पूरा निष्कर्ष सिर्फ एक मान्यता पर खड़ा है। अगर मान्यता बदल जाए तो नतीजा भी बदल जाएगा। अब दूसरे मॉडल की बात करते हैं। यहाँ द वायर  थोड़ा नरम तरीका अपनाता है और 2021 के मतदान के आधार पर नया हिसाब लगाता है।

इसमें कहा जाता है कि अगर SIR नहीं हुआ होता और हटाए गए वोटरों ने पिछली बार की तरह वोट किया होता, तो सिर्फ 11 सीटों का नतीजा बदलता। लेकिन सवाल वही है कि आखिर किस आधार पर यह मान लिया गया कि लोग इस बार भी पिछली बार जैसा ही वोट करते? और सबसे बड़ी बात, अगर इस मॉडल को भी सही मान लें, तब भी बीजेपी बहुमत के साथ चुनाव जीत रही थी।

अगर हटाए गए वोटरों को जोड़ने के बाद भी बीजेपी जीत रही है, तो फिर SIR अकेले चुनाव का कारण कैसे हो सकता है? सिर्फ बड़े-बड़े शब्द इस्तेमाल कर देने से कोई तर्क सही नहीं हो जाता।

ऐसे शब्द सिर्फ लोगों को यह महसूस कराने के लिए इस्तेमाल किए गए कि चुनाव में गड़बड़ी साबित हो चुकी है, जबकि पूरा लेख सिर्फ कल्पनाओं पर टिका है। कल्पना सवाल उठा सकती है, लेकिन उसे पक्का सबूत नहीं कहा जा सकता।

आंकड़ों को चुनकर दिखाने से कहानी कमजोर पड़ती है

अगर एक शब्द में द वायर के इस लेख को समझाना हो, तो वह होगा आंकड़ों से खेल। लेख बार-बार उन सीटों की बात करता है जहाँ ज्यादा वोटर हटाए गए और बीजेपी जीती। लेकिन वह यह नहीं बताता कि कई सीटों पर भारी संख्या में वोटर हटाए जाने के बावजूद TMC भी जीती।

जिन 20 विधानसभा सीटों पर सबसे ज्यादा वोटर हटाए गए, उनमें से 13 सीटें TMC ने जीतीं, 6 बीजेपी ने और 1 कॉन्ग्रेस ने। अगर SIR सच में TMC को नुकसान पहुँचाने और बीजेपी को फायदा देने के लिए किया गया था, तो सबसे ज्यादा वोटर हटने वाली सीटों पर TMC की जीत इस पूरी कहानी पर बड़ा सवाल खड़ा करती है।

यहीं पर द वायर  की दोहरी सोच साफ दिखती है। जहाँ बीजेपी को फायदा हुआ वहाँ जोर देकर बात की गई, लेकिन जहाँ भारी वोटर हटाने के बावजूद TMC जीत गई, वहाँ चुप्पी साध ली गई। इससे साफ दिखता है कि आँकड़ों को निष्पक्ष तरीके से नहीं बल्कि एक राजनीतिक कहानी फिट करने के लिए इस्तेमाल किया गया।

सिर्फ वोटर हटाए जाने से चुनाव का नतीजा तय नहीं होता। चुनाव उम्मीदवार की ताकत, जातीय और धार्मिक समीकरण, सत्ता विरोधी माहौल, संगठन की ताकत और लोगों के मूड जैसे कई कारणों से तय होते हैं। इसलिए किसी एक चीज को चुनाव का पूरा कारण बताना गलत है।

बंगाल का राजनीतिक बदलाव SIR से पहले शुरू हो चुका था

द वायर अपने पूरे विश्लेषण में यह दिखाने की कोशिश करता है कि पश्चिम बंगाल चुनाव का नतीजा मुख्य रूप से वोटर लिस्ट संशोधन यानी SIR की वजह से आया। लेकिन यह दावा बंगाल में पिछले एक दशक से चल रहे बड़े राजनीतिक बदलाव को पूरी तरह नजरअंदाज करता है।

दशकों तक पश्चिम बंगाल की राजनीति पर पहले वामपंथी दलों और फिर TMC का दबदबा रहा, जबकि बीजेपी की मौजूदगी बहुत सीमित थी। लेकिन इसी दौरान राज्य की आर्थिक स्थिति लगातार कमजोर होती गई।

कभी पश्चिम बंगाल की प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत का 127.5 प्रतिशत थी, जो घटकर 83.7 प्रतिशत रह गई। एक समय देश के कुल औद्योगिक उत्पादन में बंगाल की हिस्सेदारी 27 प्रतिशत थी, जो अब घटकर केवल 4 प्रतिशत रह गई है। आर्थिक गिरावट के साथ-साथ राज्य ने राजनीतिक हिंसा और कई विवादित घटनाएँ भी देखीं।

हालाँकि, 2014 के बाद बंगाल की राजनीति में बड़ा बदलाव दिखना शुरू हुआ। बीजेपी ने धीरे-धीरे अपना वोट शेयर बढ़ाया और राज्य में एक मजबूत राजनीतिक ताकत के रूप में उभरने लगी।

2019 के लोकसभा चुनाव में यह बदलाव और साफ दिखाई दिया, जब बीजेपी ने बंगाल में 18 लोकसभा सीटें जीतकर खुद को TMC की सबसे बड़ी चुनौती के रूप में स्थापित कर लिया। यह राजनीतिक बदलाव 2026 के SIR से कई साल पहले शुरू हो चुका था।

पश्चिम बंगाल में बीजेपी का बढ़ना अचानक नहीं हुआ, बल्कि लंबे समय से जमीनी स्तर पर संगठन मजबूत करने का नतीजा था। पार्टी ने बूथ स्तर पर नेटवर्क तैयार किया, कार्यकर्ताओं को मजबूत किया और उन इलाकों तक पहुँच बनाई जहाँ पहले उसका प्रभाव बहुत कम था।

समय के साथ बीजेपी ने सीमावर्ती जिलों, ग्रामीण हिंदू बहुल इलाकों और सांप्रदायिक तनाव वाले क्षेत्रों में अपना जनाधार बढ़ाया। दूसरी तरफ TMC सरकार के खिलाफ सत्ता विरोधी माहौल भी लगातार बढ़ रहा था।

भ्रष्टाचार, भर्ती घोटाले, राजनीतिक हिंसा और संदेशखाली जैसे विवादों ने लोगों में नाराजगी पैदा की। ऐसे राजनीतिक माहौल में चुनावी बदलाव को सिर्फ वोटर लिस्ट संशोधन से जोड़ देना सही नहीं माना जा सकता।

द वायर ने बंगाल के चुनावी नतीजों को मुख्य रूप से SIR के नजरिए से दिखाकर TMC और उसके कार्यकर्ताओं पर लगे आरोपों और विवादों को नजरअंदाज करने की कोशिश की। चुनाव सिर्फ वोटर लिस्ट से तय नहीं होते, बल्कि बदलती जनता की पसंद, संगठन की ताकत, विचारधारा और लोगों की सोच भी इसमें बड़ी भूमिका निभाती है।

बीजेपी की हर बड़ी जीत को सिर्फ वोटर हटाने का नतीजा बताना एक ऐसा राजनीतिक नैरेटिव तैयार करना है जिसमें लोग सिर्फ सनसनीखेज हेडलाइन पर ध्यान दें और पूरी सच्चाई को नजरअंदाज कर दें।

‘डेटा से पता चलता है कि SIR ने BJP को बंगाल जीतने में मदद की’ जैसी हेडलाइन बिना ठोस सबूत और सिर्फ मान्यताओं के आधार पर यह दिखाती है कि वामपंथी सोच से जुड़े लोग बीजेपी की हर चुनावी जीत को किसी न किसी तरह फर्जी या धांधली साबित करने की कोशिश कर रहे हैं। यही बेचैनी पूरे लेख में साफ दिखाई देती है।

निष्कर्ष

द वायर  का लेख SIR को लेकर कुछ सवाल जरूर उठाता है, लेकिन यह कहीं भी साबित नहीं कर पाता कि वोटर हटाने की वजह से बीजेपी चुनाव जीती। पूरा तर्क सिर्फ आँकड़ों की तुलना और कल्पनाओं पर टिका है, किसी ठोस सबूत पर नहीं।

लेकिन इस लेख में यह मानकर चला जा रहा है कि जहाँ जीत का अंतर कम था और वोटर ज्यादा हटाए गए, वहाँ चुनाव का नतीजा बदल गया होगा। लेकिन यह बंगाल की राजनीति के बड़े कारणों को नजरअंदाज करता है, जैसे सत्ता विरोधी माहौल, बीजेपी का लगातार बढ़ता संगठन, धार्मिक ध्रुवीकरण और बदलते वोटरों का रुझान।

यहाँ तक कि इस लेख में खुद ये बात माना गया है कि यह तय नहीं किया जा सकता कि हटाए गए वोटर किसे वोट देते हैं और उसके अपने हिसाब से भी बीजेपी आगे रहती है।

लोकतंत्र में वोटर लिस्ट की जाँच जरूरी है, लेकिन सिर्फ शक को सबूत नहीं माना जा सकता। संभावना सवाल खड़े कर सकती है, लेकिन उसे चुनाव में गड़बड़ी का पक्का प्रमाण नहीं कहा जा सकता। आखिरकार बंगाल का चुनावी नतीजा कल्पनाओं से नहीं बल्कि वहाँ की असली राजनीतिक परिस्थितियों से तय हुआ था।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

भारत में क्यों बढ़ रहे हैं AC ब्लास्ट के मामले? जानिए इससे बचाव के तरीके, जो बचा सकते हैं आपकी जान

पिछले कुछ हफ्तों में देशभर में AC ब्लास्ट के कई मामले सामने आए हैं। अभी बुधवार (6 मई 2026) की रात ग्रेटर नोएडा के बीटा सेक्टर में एक घर में एयर कंडीशनर फटने से भीषण आग लग गई।

आग ने पूरे घर को अपनी चपेट में ले लिया, जिससे लाखों रुपए का सामान जलकर राख हो गया। हालाँकि इस हादसे में कोई घायल नहीं हुआ। बाद में दमकल कर्मियों ने मौके पर पहुँचकर आग पर काबू पाया।

फोटो सोर्स -दैनिक भास्कर

इससे पहले, दिल्ली के विवेक विहार में रविवार (3 मई 2026) को एक चार मंजिला रिहायशी इमारत में एयर कंडीशनर (AC) फटने से भीषण आग लग गई थी। उस दर्दनाक हादसे में 9 लोगों की मौत हो गई और 4 लोग घायल हो गए। राहत और बचाव कार्य के दौरान करीब 10 से 15 लोगों को आग से घिरी इमारत के अंदर से सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया।

पिछले कुछ हफ्तों में ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जिससे एक बड़ा सवाल उठता है कि आखिर AC ब्लास्ट क्यों होते हैं?

जिसे आमतौर पर AC का ब्लास्ट कहा जाता है, वह असल में एयर कंडीशनर के कंप्रेसर, यानी आउटडोर यूनिट के मुख्य हिस्से या रेफ्रिजरेंट सर्किट में होने वाला जोरदार टूट या आग की घटना होती है।

AC ब्लास्ट होने का सबसे आम कारण कंप्रेसर पर दबाव का बढ़ जाना होता है। कंप्रेसर रेफ्रिजरेंट गैस को बहुत अधिक दबाव यानी सैकड़ों PSI (गैस को दबाना) तक दबाता है। अगर एयर फ्लो रुक जाए, फिल्टर गंदे हो जाएँ, यूनिट ओवरहीट हो जाए या गैस का लेवल सही न हो, तो अंदर दबाव अचानक बढ़ जाता है।

इससे सेफ्टी वाल्व फेल हो सकते हैं और कंप्रेसर का खोल फट सकता है। यह फटना कई बार इतना जोरदार होता है कि विस्फोट जैसी आवाज आती है और गर्म तेल या गैस बाहर निकल सकती है।

दूसरा कारण ज्वलनशील रेफ्रिजरेंट भी हो सकता है। AC की कार्यक्षमता को बढ़ाने के लिए कई आधुनिक AC में हल्के ज्वलनशील रेफ्रिजरेंट जैसे R32 और R290 (प्रोपेन) का इस्तेमाल होता है। अगर इनमें लीकेज हो जाए तो यह हवा के संपर्क में आकर किसी इलेक्ट्रिक स्पार्क, जैसे कैपेसिटर, कंप्रेसर या खराब वायरिंग से मिलकर आग पकड़ सकता है।

पुराने R22 यूनिट ज्वलनशील नहीं थे, लेकिन नए इको-फ्रेंडली गैस वाले AC में इस तरह की समस्या रहती है। इसके अलावा इलेक्ट्रिकल फॉल्ट और बाहरी कारण भी AC ब्लास्ट का कारण बन सकते हैं।

इसमें वोल्टेज फ्लक्चुएशन, शॉर्ट सर्किट, खराब या पुरानी वायरिंग शामिल हैं। इसके साथ ही गर्मियों में लगातार बिना ब्रेक के AC चलाना मशीन पर दबाव डालता है। गलत इंस्टॉलेशन या गलत गैस चार्जिंग की वजह से भी विस्फोट जैसी स्थिति बन सकती है।

गलत सर्विसिंग के कारण भी कई टेक्नीशियन की मौत के मामले सामने आए हैं। अगर लीकेज टेस्ट के लिए इस्तेमाल किया गया नाइट्रोजन पूरी तरह बाहर न निकाला जाए तो अंदर अतिरिक्त दबाव रह सकता है। वहीं सही तरीके से वैक्यूम न करने पर नमी रह जाती है, जिससे एसिड बनता है और धीरे-धीरे पुर्जे खराब होने लगते हैं।

AC की सर्विसिंग के दौरान यूनिट को पूरी तरह बंद करना जरूरी होता है। अगर सर्विसिंग के समय AC चालू रह जाए तो कंप्रेसर के अंदर जोरदार धमाका जैसा हादसा हो सकता है।दरअसल कई अध्ययनों में यह सामने आया है कि सामान्य सर्विसिंग के दौरान भी AC मैकेनिकों की मौत कंप्रेसर ब्लास्ट की वजह से हुई है।

AC ब्लास्ट को रोकने के लिए सावधानियाँ

AC ब्लास्ट से बचने के लिए कुछ सरल लेकिन जरूरी सावधानियाँ हैं जिन्हें विशेषज्ञ और निर्माता कंपनियाँ सुझाती हैं। घरों में AC की सर्विस हर 6 महीने में एक ट्रेड टेक्नीशियन से करानी चाहिए, सिर्फ गैस भरवाना ही काफी नहीं है।

एयर फिल्टर को नियमित रूप से साफ करें और आउटडोर यूनिट की कॉइल्स को धूल-मुक्त रखें। साथ ही यह सुनिश्चित करें कि यूनिट के चारों तरफ कम से कम 1 से 1.5 फीट की जगह हवा के लिए हो।

सबसे जरूरी बात यह है कि वोल्टेज स्टेबलाइजर का उपयोग करें, क्योंकि भारत में वोल्टेज फ्लक्चुएशन एक बड़ी समस्या है। यह भी ध्यान रखें कि वेंट्स कभी बंद न हों और AC को लगातार बिना ब्रेक के लंबे समय तक न चलाएँ।

AC की इंस्टॉलेशन की जगह भी बहुत महत्वपूर्ण होती है। इसे हमेशा अच्छी वेंटिलेशन वाली जगह पर लगाना चाहिए और बंद या हवा रहित जगहों से बचना चाहिए। समय-समय पर वायरिंग और कनेक्शन की जाँच करें और पुराने कैपेसिटर बदलते रहें।

सर्विसिंग के दौरान AC को मेन स्विच से पूरी तरह बंद करें और काम शुरू करने से पहले प्रेशर पूरी तरह डिस्चार्ज किया जाए। टेक्नीशियन द्वारा नाइट्रोजन पूरी तरह निकाला गया है और सही वैक्यूम किया गया हैं, यह सुनिश्चित करें।

कभी भी सर्विसिंग के बीच में AC चालू न करें। हमेशा ब्रांडेड गैस और उसका बिल माँगें। लोगों को DIY गैस रिफिल या खुद मरम्मत करने से पूरी तरह बचना चाहिए, क्योंकि छोटी सी गलती भी बड़ा हादसा कर सकती है।

अगर AC से जलने की बदबू आए या अजीब आवाज सुनाई दे, तो तुरंत उसे बंद करें, प्लग निकाल दें और तकनीशियन को बुलाएँ। चूँकि आधुनिक AC में R32 या R290 जैसी हल्की ज्वलनशील गैसें होती हैं, इसलिए पर्याप्त वेंटिलेशन बहुत जरूरी है।

AC ब्लास्ट कोई अचानक होने वाली घटना नहीं है, बल्कि यह खराब मेंटेनेंस, कमजोर इलेक्ट्रिकल सिस्टम या गलत सर्विसिंग का परिणाम होता है। सही जानकारी और सावधानी अपनाकर इन हादसों को काफी हद तक रोका जा सकता है।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

कपड़े फाड़े, बिजली काटी, महिलाओं को घसीटा… बंगाल में TMC गुंडों ने 2 साल पहले किया था मुफ्त शिक्षा देने वाले ‘अरण्यज स्कूल’ पर कब्जा: BJP सरकार आते ही लोगों ने कराया ‘मुक्त’, पढ़ें Ground Report

पश्चिम बंगाल की राजनीति में सत्ता परिवर्तन की बयार सिर्फ सचिवालय तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसकी गूँज उन सुदूर गाँवों में भी सुनाई दे रही है जहाँ पिछले कई वर्षों से सत्ताधारी दल के स्थानीय नेताओं का ‘जंगलराज’ चल रहा था। बुधवार (06 मई 2026) की सुबह दक्षिण 24 परगना जिले के झरखली में एक ऐसा दृश्य देखने को मिला जिसने लोकतंत्र में न्याय की उम्मीद को फिर से जीवित कर दिया है। करीब दो साल से अखिल भारतीय तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) के स्थानीय नेताओं के अवैध कब्जे में रहा अरण्यज स्कूल आखिरकार मुक्त करा लिया गया है।

हालाँकि डराने वाली बात ये है कि चुनाव के समय में लगातार बीते 1 माह से अरण्यज स्कूल के कर्ताधर्ताओं को टीएमसी के स्थानीय काडर की तरफ से लगातार जान से मारने की धमकियाँ मिलती रही, लेकिन वो पीछे नहीं हटे और राज्य में टीएमसी की सरकार ढहते ही स्कूल को मुक्त करा लिया गया। ये अलग बात है कि सुंदरवन के जिस इलाके में ये स्कूल है, वहाँ मौजूदा चुनाव में एससी-सुरक्षित सीट से टीएमसी की उम्मीदवार नीलिमा की जीत हुई है।

सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे एक वीडियो में स्थानीय लोग और बच्चे उस स्कूल का ताला खुलवाते दिखाई दे रहे हैं, जिस पर जुलाई 2024 से कथित तौर पर टीएमसी के स्थानीय नेताओं का कब्जा था। जैसे ही स्कूल के गेट पर लगा अवैध ताला टूटा, पूरे परबतीपुर इलाके में खुशी की लहर दौड़ गई। जो बच्चे दो साल से अपनी शिक्षा और अपने सुनहरे भविष्य से दूर कर दिए गए थे, उनकी आँखों में खुशी के आँसू और चेहरे पर वह मासूम मुस्कान थी, जिसे जुलाई 2024 की उस काली सुबह ने छीन लिया था।

ऑपइंडिया से बातचीत में अरण्यज ग्रुप से जुड़े अभिजीत मुखर्जी ने बताया, “साल 2023 में अमृता बोस गुप्ता द्वारा शुरू किया गया यह फ्री इंग्लिश मीडियम स्कूल गरीब बच्चों की शिक्षा और महिलाओं के सशक्तिकरण का केंद्र था। जुलाई 2024 में टीएमसी के स्थानीय नेताओं ने इसे छीन लिया था। अब दो साल बाद स्कूल वापस मिलने पर पूरे परबतिपुर में उत्सव का माहौल है।”

यह सिर्फ एक इमारत की मुक्ति नहीं है, बल्कि उस शिक्षा और सामाजिक सशक्तिकरण के विचार की जीत है जिसे टीएमसी के गुंडों ने अपने पैरों तले रौंदने की कोशिश की थी।

वह ‘खौफनाक सुबह’ जब इंसानियत हुई शर्मसार

अरण्यज स्कूल की सचिव अमृता बोस गुप्ता द्वारा दर्ज कराई गई प्राथमिकी (FIR) और उनके बयानों से उस दिन की जो तस्वीर उभरती है, वह किसी भी सभ्य समाज को दहलाने के लिए काफी है। झरखली कोस्टल थाना क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले परबतीपुर में यह स्कूल गरीब बच्चों को निःशुल्क अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा देने के पवित्र उद्देश्य से 2023 में शुरू किया गया था।

अमृता बोस के अनुसार, 8 जुलाई 2024 की सुबह करीब 7:30 बजे, जब स्कूल परिसर में मौजूद लोग अभी सोकर भी नहीं उठे थे, तब झरखली के उप-प्रधान दिलीप मंडल के नेतृत्व में दर्जनों उपद्रवियों ने हमला बोल दिया। हमलावरों ने सबसे पहले स्कूल की बिजली काट दी और सीसीटीवी कैमरों के तार काट दिए ताकि उनके कुकर्मों का कोई सबूत न रहे।

अमृता ने अपनी शिकायत में बताया कि उन्हें और उनकी टीम को नींद से घसीटकर बाहर निकाला गया। उनके साथ अभद्र भाषा का प्रयोग किया गया और उनके कपड़े फाड़ दिए गए। सबसे शर्मनाक बात यह थी कि हमलावरों के साथ कुछ महिलाएँ भी शामिल थीं, जो अमृता और उनकी साथी उपासना को पीट रही थीं और उनके कपड़े खींच रही थीं। जब अमृता ने सरकार द्वारा भूमि आवंटन से संबंधित पत्र दिखाने की कोशिश की, तो परिमल मंडल नाम के आरोपित ने उस आधिकारिक दस्तावेज को फाड़कर फेंक दिया।

मासूम और बुजुर्गों पर भी नहीं आया तरस

बर्बरता की हद तो तब हो गई जब अमृता के 8 साल के बेटे को जमीन पर पटक कर पीटा गया। जब उनकी 65 वर्षीय माँ ने अपने पोते को बचाने की कोशिश की, तो उन दरिंदों ने उनकी नाइटी तक खींच ली। उस अर्धनग्न अवस्था में भी वह बुजुर्ग महिला अपने पोते को बचाने के लिए जूझती रही, लेकिन टीएमसी के उन कथित कार्यकर्ताओं ने उनकी पीठ पर तब तक लातें मारीं जब तक कि वह बेहोश नहीं हो गईं। अमृता को भी सीढ़ियों से नीचे फेंक दिया गया, जिससे वह कुछ समय के लिए अचेत हो गई थीं।

लूट का व्यवस्थित तंत्र, शिक्षा के मंदिर को बनाया ‘मालखाना’

स्कूल को केवल खाली ही नहीं कराया गया, बल्कि ‘अरण्यज सोसाइटी फॉर एजुकेशनल एंड एनवायरमेंटल डेवलपमेंट’ की वर्षों की मेहनत से जुटाए गए सामान को बेरहमी से लूटा गया। जो सूची सामने आई है, वह यह दर्शाती है कि यह केवल एक राजनीतिक कब्जा नहीं, बल्कि एक सुनियोजित डकैती थी।

स्कूल और हॉस्टल की संपत्ति जो लूट ली गई

  • शिक्षा और तकनीक: स्कूल की लाइब्रेरी में रखी लगभग 1500 पुस्तकें, एक एलसीडी प्रोजेक्टर सेट, पब्लिक एड्रेसिंग सिस्टम, दो सीपीयू सेट, एक आसुस लैपटॉप और महत्वपूर्ण दस्तावेज फाइलों सहित गायब कर दिए गए।
  • ऊर्जा और बुनियादी ढाँचा: एक सोलर इन्वर्टर, दो सोलर पैनल (160W), 8 सीलिंग फैन, 4 टेबल फैन, 20 एलईडी लाइटें और 4 हैवी ड्यूटी हैलोजन लाइटें।
  • फर्नीचर: 12 लकड़ी के बेंच, 40 प्लास्टिक की कुर्सियाँ, 2 लकड़ी की मेज, और अलमारियाँ।
  • हॉस्टल का सामान: शिक्षकों और स्वयंसेवकों के लिए रखे गए 3 लकड़ी के बिस्तर, 20 कंबल, 20 तकिए और 5 बेडिंग सेट।

महिलाओं और बच्चों के हक पर डाका

यह एनजीओ केवल स्कूल ही नहीं चलाता था, बल्कि महिलाओं के स्वावलंबन के लिए एक सेनेटरी नेपकिन प्रोडक्शन यूनिट भी चला रहा था। हमलावरों ने इस यूनिट की कीमती मशीनों को भी नहीं छोड़ा, जिसमें-

  • 2 एचपी की पल्वेराइजर मशीन और वुड पल्प ग्राइंडर।
  • 3 यूवी रेडिएशन स्टरलाइजर (2000 नेपकिन क्षमता वाले)।
  • Ball press मशीन (100 किलो वजन वाली) और 10 सीलिंग मशीनें।
  • 600 पैकेट तैयार सेनेटरी नेपकिन्स और 200 किलो वुड पल्प जैसे कच्चे माल।

इसके अलावा बच्चों के लिए रखे गए 450 स्कूल यूनिफॉर्म, 150 वाटरप्रूफ बैग और महिलाओं को देने के लिए रखी गईं 150 नई साड़ियाँ भी लूट ली गईं। रसोई से 100 किलो चावल, 20 किलो दालें और रेफ्रिजरेटर तक उठा ले गए। संस्था के कैश बॉक्स से 20,000 रुपए और अमृता की निजी बैग से 15,000 रुपए नकद भी चोरी कर लिए गए।

चार्जशीट में नामजद ‘सत्ता के रसूखदार’

इस पूरे मामले में पुलिस की भूमिका पर भी गंभीर सवाल उठे थे। 9 जुलाई 2024 को प्राथमिकी दर्ज होने के बावजूद, टीएमसी सरकार के दौरान आरोपितों की गिरफ्तारी को लेकर कोई खास तत्परता नहीं दिखाई गई। हालाँकि जाँच अधिकारी प्रियंका रूज (LSI) द्वारा जो चार्जशीट दाखिल की गई, वह इन अपराधियों के चेहरे बेनकाब करने के लिए काफी है।

मुख्य आरोपित जिनके खिलाफ चार्जशीट दाखिल हुई-

  • दिलीप मंडल (Dilip Mondal) पिता- अजीत मंडल (झरखली उप-प्रधान और हमले का मास्टरमाइंड)
  • परिमल मंडल (Parimal Mondal) पिता- सरोजित मंडल
  • धनंजय मंडल (Dhananjoy Mondal) पिता- मन्मथ मंडल
  • सरोज चंद्र विश्वास
  • अपूर्वा रॉय
  • विश्वजीत बारी
  • किशोर गायेन
  • समीर मंडल

इन सभी के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की विभिन्न गंभीर धाराओं जैसे 329(4) (गंभीर चोट पहुँचाना), 115(2), 76, 324(4), 351(3) और 3(5) के तहत मामला दर्ज किया गया। चार्जशीट अलीपुर के अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में पेश की गई थी, लेकिन सत्ता के संरक्षण के कारण ये आरोपित दो साल तक खुलेआम घूमते रहे।

सत्ता बदली तो बदला मंजर

मई 2026 में ममता बनर्जी की सरकार गिरने के साथ ही प्रशासन का इकबाल वापस लौटा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि जैसे ही सत्ता का संरक्षण हटा, इन ‘बाहुबलियों’ के हौसले पस्त हो गए। जो स्कूल दो साल से सन्नाटे और खौफ का केंद्र बना हुआ था, वहाँ अब फिर से बच्चों की किलकारियाँ गूँजने की तैयारी है।

सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो में देखा जा सकता है कि कैसे स्थानीय ग्रामीण और एनजीओ के कार्यकर्ता मिलकर स्कूल की सफाई कर रहे हैं और कब्जा हटाने के बाद तिरंगा फहरा रहे हैं। यह वीडियो केवल एक स्कूल की मुक्ति का दस्तावेज नहीं है, बल्कि बंगाल की जनता के उस दबे हुए गुस्से का प्रकटीकरण भी है जो उन्होंने पिछले कई वर्षों से सहा है।

ऑपइंडिया से बातचीत में अमृता बोस गुप्ता ने बताया बीते 1 माह का हाल

ऑपइंडिया से एक्सक्लूसिव बातचीत में अरण्यज स्कूल की संचालिका अमृता बोस गुप्ता ने बताया कि जैसे जैसे चुनावी माहौल गरम हो रहा था, वैसे-वैसे टीएमसी के गुंडों की हरकतें बढ़ती जा रही थी। उन्होंने इस स्कूल पर कब्जे और पूरे गुंडा गैंग का सरगना राजा गाजी नाम के ब्लॉक स्तर के टीएमसी नेता को बताया। अमृता बोस ने कहा कि शुरू में हमें पता नहीं चल पाया कि दिलीप मंडल और गैंग के पीछे कौन है, लेकिन बाद में टीएमसी नेता राजा गाजी का नाम सामने आया। फिलहाल पुलिस उसे ढूँढ रही है और अब वो कभी भी गिरफ्तार किया जा सकता है। उन्होंने बताया कि बीते 1 माह से अरण्यज स्कूल से जुड़े हर इंसान की जिंदगी खतरे में रही।

अमृता ने बताया कि बीते 1 माह में अनगिनत बार उन्हें और उनके सहयोगियों को जान से मारने की धमकियाँ मिली। इसके बावजूद उन्होंने सत्ता परिवर्तन के लिए पूरी ताकत लगा दी और बीजेपी के पक्ष में जमकर प्रचार किया। अमृता ने साफ कहा कि इस स्कूल की मुक्ति बीजेपी की जीत से जुड़ी थी, भले ही इस सीट पर TMC कैंडिडेट की जीत हुई हो, लेकिन राज्य में सत्ता परिवर्तन होने के बाद हमें ताकत मिली और हमने इस स्कूल को मुक्त करा लिया है।

अमृता बोस गुप्ता ने कहा कि अभी स्कूल के पुनर्उद्धार पर पूरा जोर है। चूँकि शैक्षणिक सत्र शुरू हो गए हैं, इसलिए बच्चों को लाने की चुनौती रहेगी, लेकिन अभी स्कूल की पूरी व्यवस्था खड़ी करने में समय लगेगा। उन्होंने कहा कि ये स्कूल लोगों के सहयोग से चलेगा, इसमें किसी पार्टी की तरफ से सहयोग की जरूरत नहीं है। हमें जिस कानून व्यवस्था और न्याय की जरूरत थी, वो इस नई सरकार से मिल जाएगी, हमारे लिए इतना ही काफी रहेगा।

बीजेपी ने स्वीकारा अमृता का संघर्ष, वीडियो किया ट्वीट

यहाँ ये बताना अहम है कि एक तरफ अब तक सत्ता में रही टीएमसी और उसके लोग नन्हे-मुन्ने बच्चों का भविष्य बर्बाद करने पर तुले थे, तो दूसरी तरफ बीजेपी ने अमृत बोस गुप्ता के संघर्ष को न सिर्फ स्वीकार किया, बल्कि स्कूल की मुक्ति का वीडियो अपने आधिकारिक एक्स हैंडल से भी पोस्ट किया है। दरअसल, अमृता इसी नैतिक समर्थन की बात कर रही थी, जो फिलहाल उन्हें बीजेपी की तरफ से मिलता दिख रहा है।

न्याय की उम्मीद अभी बाकी है

स्कूल तो मुक्त हो गया लेकिन अरण्यज के सामने अब चुनौतियों का पहाड़ है। लुटा हुआ सामान, टूटी हुई मशीनें और दो साल का शैक्षिक नुकसान… इसकी भरपाई कौन करेगा? अमृता बोस गुप्ता ने प्रशासन से गुहार लगाई है कि न केवल आरोपितों को सलाखों के पीछे भेजा जाए, बल्कि लूटी गई एक-एक पाई और सामान की बरामदगी भी सुनिश्चित की जाए।

इन तमाम बहसों के बीच सबसे महत्वपूर्ण तस्वीर उन बच्चों की है जो करीब दो साल बाद अपने स्कूल परिसर में लौटे। जिन कमरों में कभी पढ़ाई होती थी, वहाँ ताले लगे रहे। जिन दीवारों पर बच्चों के सपने लिखे जाने थे, वहाँ राजनीतिक संघर्ष की छाया पड़ गई। अब सवाल यह है कि क्या यह स्कूल सिर्फ खुल जाएगा या वास्तव में फिर से वैसा बन पाएगा जैसा उसे शुरू किया गया था जिसमें गरीब बच्चों के लिए मुफ्त शिक्षा, महिलाओं के लिए रोजगार प्रशिक्षण और ग्रामीण समाज के लिए उम्मीद का केंद्र।

बच्चों के साथ अमृता बोस गुप्ता (फोटो साभार: विशेष प्रबंध)

यह मामला बंगाल के अन्य उन क्षेत्रों के लिए भी एक नजीर है जहाँ राजनीतिक रसूख के दम पर जन-कल्याणकारी संस्थाओं और निजी संपत्तियों पर कब्जे किए गए हैं। अरण्यज स्कूल की मुक्ति एक संदेश है कि सत्ता का अहंकार शाश्वत नहीं होता और अंततः जीत न्याय और शिक्षा की ही होती है।

आज परबतीपुर का हर बच्चा कह रहा है- “हमारा स्कूल वापस मिल गया, अब हम फिर से पढ़ेंगे।” यह छोटी सी जीत बंगाल के पुनरुद्धार की दिशा में एक बड़ा कदम साबित हो सकती है।

‘साम्राज्य बदला, इतिहास बदला… हृदय में बसा रहा सोमनाथ’: PM मोदी ने मंदिर के लोकार्पण की 75वीं वर्षगाँठ से पूर्व लिखा भावुक लेख, बोले- जरूर करें पावन धाम के दर्शन

जय सोमनाथ !

वर्ष 2026 की शुरुआत में मुझे सोमनाथ स्वाभिमान पर्व में सम्मिलित होने का सौभाग्य मिला। यह सोमनाथ मंदिर पर हुए पहले आक्रमण के एक हजार वर्ष बाद भी मंदिर के शाश्वत और अविनाशी होने का पर्व था। अब 11 मई को मुझे एक बार फिर सोमनाथ जाने का सुअवसर प्राप्त हो रहा है।

इस बार यह यात्रा पुनर्निर्मित सोमनाथ मंदिर के लोकार्पण की 75वीं वर्षगाँठ के उपलक्ष्य में है। मैं उस क्षण को फिर जीने जा रहा हूँ जब भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद जी ने मंदिर का लोकार्पण किया था। उस दिन सोमनाथ में विध्वंस से सृजन तक की यात्रा फिर से जीवंत होगी। छह महीनों के भीतर सोमनाथ के इतिहास से जुड़े इन दो अत्यंत महत्वपूर्ण पड़ावों का साक्षी बनना मेरे लिए बहुत सौभाग्य की बात है।

सोमनाथ केवल एक मंदिर नहीं, हमारी सभ्यता का अटूट संकल्प है। इसके सामने लहराता विशाल समुद्र अनंत काल की अनूभूति कराता है। इसकी लहरें हमें सिखाती हैं कि तूफान चाहे कितने भी विकराल क्यों न हों, मनुष्य का साहस और आत्मबल हर बार फिर से उठ खड़ा होने में सक्षम है। तट से टकराती लहरें सदियों से यह उद्घोष कर रही हैं कि मानवीय चेतना को लंबे समय तक दबाया नहीं जा सकता है।

हमारे प्राचीन शास्त्रों में लिखा है: प्रभासं च परिक्रम्य पृथिवीक्रमसंभवम्। अर्थात दिव्य प्रभास (सोमनाथ) की परिक्रमा पूरी पृथ्वी की परिक्रमा के समान है! जब लोग यहाँ दर्शन-पूजन के लिए आते हैं, तब उन्हें उस सभ्यता की अद्भुत निरंतरता का भी अनुभव होता है, जिसकी ज्योति कभी बुझाई नहीं जा सकी।

कई साम्राज्य आए और गए, समय बदला और इतिहास ने ढेरों उतार-चढ़ाव देखे, फिर भी सोमनाथ हमारे हृदय में हमेशा बना रहा। यह समय उन असंख्य महान विभूतियों के स्मरण का भी है, जो क्रूर आक्रांताओं के सम्मुख अडिग रहे। लकुलीश और सोम शर्मा जैसे मनीषियों ने प्रभास को शैव दर्शन का महान केंद्र बनाया। चक्रवर्ती महाराज धारसेन चतुर्थ ने सदियों पहले वहां दूसरा मंदिर बनवाया था।

समय की कठिन परीक्षा के बीच भीम प्रथम, जयपाल और आनंदपाल जैसे शासकों ने आक्रमणों के विरुद्ध अपनी सभ्यता की ढाल बनकर मंदिर की रक्षा की थी। ऐसा माना जाता है कि महान राजा भोज ने भी इस पावन स्थल के पुनर्निर्माण में अपना अमूल्य योगदान दिया था। कर्णदेव सोलंकी और जयसिंह सिद्धराज ने गुजरात की राजनीतिक और सांस्कृतिक शक्ति को पुनर्स्थापित करने में अहम भूमिका निभाई।

भाव बृहस्पति, कुमारपाल सोलंकी और पाशुपताचार्यों ने इस तीर्थ को आराधना और ज्ञान के केंद्र के रूप में स्थापित करने में अमूल्य योगदान दिया। विशालदेव वाघेला और त्रिपुरांतक ने इसकी बौद्धिक और आध्यात्मिक परंपराओं की रक्षा की। महिपाल चूड़ासमा और राव खंगार चूड़ासमा ने विध्वंस के बाद पूजा-पाठ की परंपरा को पुनर्जीवित किया।

पुण्यश्लोक अहिल्याबाई होल्कर, जिनकी 300वीं जयंती मनाई जा रही है, उन्होंने सबसे चुनौतीपूर्ण समय में भी भक्ति की परंपरा को जीवंत रखा। बड़ौदा के गायकवाड़ों ने तीर्थयात्रियों के अधिकारों की रक्षा की। इसके साथ ही हमारी यह धरती वीर हमीरजी गोहिल, वीर वेगड़ाजी भील जैसे पराक्रमियों से धन्य हुई है। उनके साहस और बलिदान को आज भी याद किया जाता है।

1940 के दशक में स्वतंत्रता की भावना पूरे भारत में फैल रही थी। सरदार पटेल जैसे महान नेताओं के नेतृत्व में स्वतंत्र भारत की नींव रखी जा रही थी। ऐसे में एक बात जो उन्हें बहुत व्यथित करती थी, वह थी- सोमनाथ की दुर्दशा। 13 नवंबर 1947 को, दिवाली के समय, उन्होंने सोमनाथ के जर्जर अवशेषों के सामने खड़े होकर, समुद्र का जल हाथ में लेकर संकल्प लिया, “इस (गुजराती) नववर्ष पर हमारा निश्चय है कि सोमनाथ का पुनर्निर्माण होगा। सौराष्ट्र के लोगों को इसके लिए हर तरह से अपना योगदान देना होगा। यह एक पावन कार्य है, जिसमें हर किसी को भागीदारी निभानी होगी।” उनके इस आह्वान ने सिर्फ गुजरात ही नहीं, बल्कि संपूर्ण भारतवर्ष को नए उत्साह से भर दिया।

दुर्भाग्यवश, सरदार पटेल अपने उस सपने को साकार होते नहीं देख सके, जिसके लिए उन्होंने स्वयं को समर्पित कर दिया था। इससे पहले कि जीर्णोद्धार के बाद सोमनाथ मंदिर भक्तों के लिए खुलता, उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। इसके बावजूद, प्रभास पाटन की पावन धरती पर उनका प्रभाव निरंतर महसूस किया जाता रहा है।

उनके विजन को केएम मुंशी ने आगे बढ़ाया, जिन्हें नवानगर के जामसाहेब का समर्थन मिला। 1951 में मंदिर का पुनर्निर्माण पूरा होने पर राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद को उद्घाटन के लिए आमंत्रित किया गया। तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित नेहरू के विरोध के बावजूद, डॉ प्रसाद ने समारोह में हिस्सा लेकर इसे ऐतिहासिक बना दिया।

मुझे अक्टूबर 2001 का वह समय आज भी अच्छे से याद है, जब मैंने मुख्यमंत्री के रूप में दायित्व संभाला था। 31 अक्टूबर 2001 को, सरदार पटेल की जयंती के अवसर पर गुजरात सरकार ने सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण की 50वीं वर्षगांठ का भव्य आयोजन किया। इसी समय सरदार पटेल की 125वीं जयंती भी मनाई जा रही थी।

इस कार्यक्रम में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी और तत्कालीन गृहमंत्री श्री लालकृष्ण आडवाणी जी की मौजूदगी ने इसे और भी गरिमापूर्ण बना दिया। 11 मई 1951 को अपने भाषण में डॉ राजेंद्र प्रसाद ने कहा था कि सोमनाथ मंदिर दुनिया को यह संदेश देता है कि अद्वितीय श्रद्धा और विश्वास को कभी नष्ट नहीं किया जा सकता।

उन्होंने आशा व्यक्त की, कि यह मंदिर सदैव लोगों के हृदय में बसा रहेगा। उन्होंने यह भी कहा कि मंदिर के पुनर्निर्माण से सरदार पटेल का सपना साकार हुआ है। उन्होंने इस बात पर भी बल दिया कि सरदार पटेल की भावनाओं के अनुरूप लोगों के जीवन में समृद्धि भी लानी होगी। इसको लेकर उनके संदेश अत्यंत प्रेरणादायी रहे हैं।

पिछले एक दशक से हम इसी मार्ग पर चल रहे हैं। ‘विकास भी, विरासत भी’ के मंत्र से प्रेरित होकर सोमनाथ से काशी, कामाख्या से केदारनाथ, अयोध्या से उज्जैन और त्रयंबकेश्वर से श्रीशैलम तक, हमने अपने आध्यात्मिक केंद्रों को आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित किया है।

इसके साथ ही उनकी पारंपरिक पहचान को भी बनाए रखा है। आज बेहतर कनेक्टिविटी से ज्यादा से ज्यादा लोग यहां आ पा रहे हैं। इससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को बल मिल रहा है, आजीविका सुरक्षित हो रही है, साथ ही ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ की भावना और सशक्त हो रही है।

सोमनाथ की रक्षा और इसके पुनर्निर्माण के लिए जिन्होंने अपना सर्वस्व बलिदान किया, उनका संघर्ष हम कभी नहीं भुला सकते। भारत के विभिन्न हिस्सों से आए लोगों ने इसकी भव्यता और दिव्यता को लौटाने में अपना अद्भुत योगदान दिया। उनकी ऐसी ही आस्था पूरे भारतवर्ष को लेकर भी थी। वे एकता की ऐसी अद्भुत डोर से बंधे थे, जिसे जमीनी सीमाओं में नहीं बाँटा जा सकता।

आज की विभाजित दुनिया में, सोमनाथ से मिलने वाली एकता की यह सीख पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक है। सोमनाथ अपनी गौरवशाली परंपरा के साथ हमेशा खड़ा रहेगा, क्योंकि यह हमारी साझा सभ्यता का प्रतीक है। इसी गौरव को नमन करते हुए बलिदान देने वाले वीरों की स्मृति में और दानवीरों की उदारता को याद करते हुए अगले एक हजार दिनों तक यहाँ विशेष पूजा आयोजित की जाएगी। यह देखकर बहुत प्रसन्नता हो रही है कि बड़ी संख्या में लोग इस पुनीत कार्य में अपना योगदान दे रहे हैं।

सोमनाथ हमें याद दिलाता है कि जब कोई समाज अपनी आस्था, अपनी संस्कृति और अपनी एकता से जुड़ा रहता है, तब उसे लंबे समय तक दबाया नहीं जा सकता। आज भी हमारी सबसे बड़ी शक्ति यही साझा चेतना है, यही एकात्म भाव है। यही भावना हमें विभाजन से ऊपर उठकर राष्ट्रहित में साथ चलने की प्रेरणा देती है।

मैं सभी देशवासियों से आग्रह करता हूँ कि इस पावन अवसर पर पवित्र सोमनाथ धाम की यात्रा करें और इसकी भव्यता के साक्षात दर्शन करें। जब आप सोमनाथ के तट पर खड़े होंगे, तब उसकी प्राचीन प्रतिध्वनियों को अपने भीतर महसूस करेंगे। वहाँ आपको केवल भक्ति का अनुभव नहीं होगा, बल्कि उस सभ्यतागत चेतना की सशक्त धड़कन भी सुनाई देगी, जो कभी रुकी नहीं, जिसकी तीव्रता कभी कम नहीं हुई।

वहाँ आप भारत की उस अपराजित आत्मा का अनुभव करेंगे, जिसने हर आघात के बावजूद अपनी पहचान और अपनी संस्कृति को अक्षुण्ण बनाए रखा। आप समझ पाएँगे कि इतने प्रयासों के बाद भी क्यों हमारी सभ्यता मिट नहीं सकी। वहां आपको चिर विजय के उस दर्शन का अनुभव होगा, जो सदियों से भारत की शक्ति बना हुआ है। मुझे पूरा विश्वास है कि आपके लिए यह एक अविस्मरणीय अनुभव होगा।

जय सोमनाथ।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यह लेख अपने ब्लॉग पर लिखा है, आप इस लिंक पर क्लिक कर इसे पढ़ सकते हैं)

15000+ हिंसा की घटनाएँ, 40000+ हिंदू शिकार और 7000+ महिलाओं पर अत्याचार: याद है 2021 में बंगाल में क्या हुआ था जब लौटी थी TMC सरकार

बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में भारतीय जनता पार्टी की जीत के बाद से ही तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) के कार्यकर्ता बौखलाए हुए हैं। राज्य के कई हिस्सों से भाजपा समर्थकों और कार्यकर्ताओं पर हमलों और हत्याओं की खबरें आ रही हैं। कहीं बम फेंके जा रहे हैं- कहीं गोलियाँ चल रही हैं।

इन सब खबरों के बीच एक तरफ सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि राज्य में दंगाई ये सब तब कर रहे हैं जब उन्हें पता है कि भाजपा सरकार बनने के बाद वो बख्शे नहीं जाएँगे। दूसरी तरफ ये कल्पना की जा रही है कि यदि 2026 के परिणाम 2021 जैसे होते, तो राज्य के आम नागरिकों और हिंदुओं का क्या हश्र होता।

आज जब बंगाल एक नए दौर की ओर बढ़ने को तैयार हो रहा है, तो 2021 की उन भयावह यादों को ताजा करना जरूरी है, ताकि वर्तमान परिवर्तन की अहमियत को समझा जा सके। 2021 के नतीजों के बाद बंगाल ने हिंसा का जो दौर देखा था वह पश्चिम बंगाल पर लगा कलंक है।

क्या हुआ था 2021 के चुनावी नतीजों के बाद

वो दिन 2 मई 2021 का था। टीवी पर इधर चुनावी नतीजों में इधर टीएमसी को बहुमत मिलता दिखा, उधर पूरे राज्य में चुन-चुनकर भाजपा समर्थकों को निशाना बनाए जाने की खबरें, तस्वीरें और वीडियोज आने लगीं।

उस वक्त चुन-चुनकर भाजपा समर्थकों के घरों में तोड़फोड़ की गई, कार्यकर्ताओं के परिजनों के साथ मारपीट हुई और उनपर क्रूड बमों से हमले किए गए। राजनीतिक प्रतिशोध की इंतेहा ये थी कि कई कार्यकर्ताओं की बेरहमी से हत्या कर दी गई- किसी कीलाश पेड़ से लटकी मिली, तो किसी को चाकुओं से गोद दिया गया। माता-पिता के सामने बच्ची की बलात्कार की बातें सामने आईं। बच्चे के सामने माँ का कत्ल हुआ। उस समय 40 से ज्यादा घटनाएँ थी, जिन्हें ऑपइंडिया ने भी रिपोर्ट किया था।

2021 में हुई सभी हिंसा की घटनाओं की खबरें सुन पूरा देश सन्न था और दूसरी तरफ तत्कालीन बंगाल सरकार के कान में जूँ नहीं रेंग नहीं थी। मीडिया से बात करते हुए केवल कानून-व्यवस्था बनाए रखने के हवा-हवाई दावे हो रहे थे, वहीं दूसरी ओर पुलिस बल मूकदर्शक बने बैठे थे। पीड़ितों से मिलने जा रहे अन्य राज्यों के लोगों को रोका जा रहा था कि कहीं असलियत बाहर न आ जाए। स्थिति इतनी विकट हो गई थी कि हजारों हिंदुओं को अपनी जान बचाने के लिए पलायन करना पड़ा था।

हिंदुओं को करना पड़ा पलायन

भाजपा के तत्कालीन अध्यक्ष जेपी नड्डा ने तब बताया था कि उस दौरान हुई राजनीतिक हिंसा के कारण लगभग 80000 से 100000 हिंदू परिवार विस्थापित हुए। बंगाल में सुरक्षा न मिलने के कारण बड़ी संख्या में लोगों ने पड़ोसी राज्य असम के धुबरी जिले में शरण ली।

वहीं, 14 मई 2021 को विश्व हिंदू परिषद (VHP) ने दावा किया कि इस हिंसा से 3500 से अधिक गाँव और लगभग 40,000 हिंदू प्रभावित हुए। परिषद के अनुसार, इस मारकाट में सबसे अधिक अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों को निशाना बनाया गया। वीएचपी ने इस संबंध में तत्कालीन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को पत्र लिखकर तत्काल हस्तक्षेप की माँग की थी।

फैक्ट फाइंडिंग टीम की जाँच

इसके बाद 29 जून 2021 को सिक्किम हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश प्रमोद कोहली की अगुवाई वाली फैक्ट फाइंडिंग टीम ने अपनी रिपोर्ट में चौंकाने वाले तथ्य रखे। उन्होंने अपनी रिपोर्ट में बताया कि बंगाल में परिणाम घोषित होने के बाद राज्य में हिंसा की करीब 15000 घटनाएँ घटी थीं। इन वारदातों में 25 लोगों की जान गई और लगभग 7000 महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार हुआ था।

मानवाधिकार आयोग ने HC को दी रिपोर्ट

इसके बाद 14 जुलाई को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने हाईकोर्ट में अपनी विस्तृत रिपोर्ट सौंपी थी। उनकी 7 सदस्यीय टीम ने 20 दिनों के भीतर 311 स्थानों का मुआयना किया था। आयोग ने अपनी कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा था कि राज्य में ‘कानून का शासन’ नहीं, बल्कि ‘शासक का कानून’ चल रहा है।

मानवाधिकार आयोग ने बताया था कि उन्हें 23 जिलों से कुल 1979 शिकायतें मिलीं, जिनमें से अधिकांश कूच बिहार, बीरभूम, बर्धमान, उत्तर 24 परगना और कोलकाता से थीं। इन शिकायतों में हत्या, दुष्कर्म, छेड़खानी और आगजनी जैसे जघन्य अपराध शामिल थे। आयोग ने महिलाओं पर हुए अत्याचार की उन 57 शिकायतों का भी जिक्र किया जो उन्हें राष्ट्रीय महिला आयोग से प्राप्त हुई थीं। रिपोर्ट की गंभीरता को देखते हुए आयोग ने स्पष्ट सिफारिश की थी कि इस पूरे मामले की जाँच सीबीआई (CBI) को सौंपी जाए।

अदालत का रुख

बता दें कि बंगाल में 2021 में हुई हिंसा पर कोलकाता हाई कोर्ट ने भी संज्ञान लिया था। मई में ही अदालत ने ममता सरकार को तीन सदस्यीय समिति का गठन करने का आदेश दिया था, जिसमें एनएचआरसी, राज्य मानवाधिकार आयोग और राज्य कानूनी सेवा प्राधिकरण के एक-एक सदस्य होने थे। कोर्ट ने समिति को स्थानीय पुलिस के साथ कॉर्डिनेट करके उन सभी लोगों की सकुशल वापसी सुनिश्चित करने का काम सौंपा था जो डर से पलायन कर गए थे।

इसके बाद अदालत ने अगस्त 2021 में भी जनहित याचिकाओं पर सुनवाई तरते हुए इस संबंध में आदेश दिया था। कोर्ट ने चुनावी नतीजों के बाद हुई हत्या, बलात्कार, हिंसा, महिलाओं के खिलाफ हुए अपराधों जैसी गंभीर घटनाओं की जाँच सीबीआई को सौंप दी थी। वहीं अन्य अपराध जैसे मारपीट, आगजनी और घर जलाना आदि के लिए लिए राज्य पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों की एक विशेष जाँच टीम (SIT) बनाई गई थी।

बाद में हाईकोर्ट के इस फैसले के खिलाफ ममता सरकार सुप्रीम कोर्ट भी गई। दलील दी कि आखिर सीबीआई क्यों उनकी मर्जी के बगैर इन केसों की जाँच कर रही है। हालाँकि अदालत ने केस की गंभीरता देखते हुए पड़ताल को जारी रखने का निर्देश दिया। बाद में CBI ने इस मामले में दर्जनों चार्जशीट दाखिल की और गिरफ्तारियाँ भी हुईं। शुरू में इस केस के कई मामलों की सुनवाई निचली अदालतों में चली। लेकिन 2024 में सीबीआई की एक याचिका पर गौर करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने बंगाल की सरकार को नोटिस जारी किया, साथ ही राज्य की निचली अदालतों में चल रही कार्यवाही पर रोक लगा दी।

अहमदाबाद में ‘ग्रीन बेल्ट’ बढ़ाने की तैयारी में है कॉन्ग्रेस? हिंदू बहुल इलाकों में मुस्लिम उम्मीदवार उतारने के फैसले ने गुजरात की राजनीति में छेड़ी नई बहस

हाल ही में हुए स्थानीय निकाय चुनावों के बाद गुजरात की राजनीति में कई तरह के विवाद देखने को मिले हैं। खास तौर पर अहमदाबाद नगर निगम चुनाव में कॉन्ग्रेस की टिकट बांटने की रणनीति ने राजनीतिक माहौल को गरमा दिया है। चुनाव के दौरान यह चर्चा तेज रही कि कॉन्ग्रेस ने हिंदू बहुल इलाकों में मुस्लिम उम्मीदवार उतारकर एक नया और विवादित राजनीतिक प्रयोग किया है।

अगर चुनाव के आंकड़ों पर नजर डालें तो कॉन्ग्रेस की यह रणनीति ज्यादा असरदार साबित नहीं हुई। राज्यभर में कॉन्ग्रेस के 2223 उम्मीदवार अपनी जमानत तक नहीं बचा पाए। इसे इस बात के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है कि जनता ने कॉन्ग्रेस की इस राजनीति को स्वीकार नहीं किया।

हालाँकि मणिनगर और पालडी जैसे इलाकों में किए गए ये प्रयोग आगे की राजनीति को लेकर नई बहस जरूर खड़ी कर रहे हैं। कॉन्ग्रेस ने पालडी जैसे अहम इलाके से फाहेजबानो और मणिनगर वार्ड से फारूक शेख को टिकट देकर राजनीतिक हलकों में चर्चा बढ़ा दी।

आमतौर पर राजनीतिक दल किसी भी क्षेत्र में उम्मीदवार चुनते समय वहाँ की आबादी और सामाजिक समीकरणों को ध्यान में रखते हैं, लेकिन कॉन्ग्रेस के इस फैसले को कई लोग एक सोची-समझी रणनीति के तौर पर देख रहे हैं। इसी वजह से अब इस मुद्दे पर राजनीतिक बयानबाजी भी तेज हो गई है।

कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस रणनीति के पीछे तथाकथित ‘ग्रीन बेल्ट’ की सोच काम कर रही है। पहले कॉन्ग्रेस का प्रभाव मुख्य रूप से जमालपुर और दानिलिम्दा जैसे मुस्लिम बहुल इलाकों तक सीमित माना जाता था, लेकिन अब पार्टी पश्चिमी अहमदाबाद के हिंदू बहुल क्षेत्रों में भी अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश करती दिख रही है।

इसे केवल चुनावी रणनीति नहीं, बल्कि शहर की बदलती सामाजिक और राजनीतिक तस्वीर से जोड़कर देखा जा रहा है। अब तक यह आरोप लगाए जाते रहे हैं कि अहमदाबाद के कुछ इलाकों में एक खास पक्ष द्वारा संपत्ति खरीद के जरिए अपनी मौजूदगी बढ़ाई जा रही है।

वहीं अब विपक्षी दलों का आरोप है कि कॉन्ग्रेस इस मुद्दे को राजनीतिक समर्थन देने की कोशिश कर रही है। उनका कहना है कि अगर किसी क्षेत्र का पार्षद मुस्लिम समुदाय से होगा, तो वह अपने समुदाय के लोगों को वहाँ बसने या संपत्ति खरीदने में मदद कर सकता है। इसी आधार पर कुछ लोग भविष्य में इलाकों की जनसंख्या संरचना बदलने की आशंका भी जता रहे हैं।

एलिसब्रिज के विधायक ने चेतावनी दी

एलिसब्रिज के विधायक अमित शाह ने भी सोशल मीडिया के जरिए इस मुद्दे पर लोगों का ध्यान खींचने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि कॉन्ग्रेस हिंदू बहुल इलाकों में एक विशेष समुदाय का राजनीतिक प्रतिनिधित्व बढ़ाने की दिशा में काम कर रही है।

साथ ही उन्होंने यह आशंका भी जताई कि अगर ऐसे क्षेत्रों में मुस्लिम पार्षद चुने जाते हैं, तो इसका वहाँ के सामाजिक माहौल और लंबे समय से चली आ रही सांस्कृतिक पहचान पर असर पड़ सकता है।

राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, यह पूरी रणनीति ‘ब्लॉक वोटिंग’ के आधार पर काम करती है। उनका कहना है कि मुस्लिम मतदाता अक्सर संगठित तरीके से बड़ी संख्या में मतदान करते हैं, जबकि कई हिंदू बहुल इलाकों में मतदान प्रतिशत अपेक्षाकृत कम रहता है।

ऐसे में अगर मतदाता यह सोचकर मतदान से दूर रहते हैं कि उनका क्षेत्र पहले से किसी एक दल का मजबूत गढ़ है, तो चुनावी समीकरण बदल सकते हैं। इसी वजह से अब इन चुनाव नतीजों को लेकर राजनीतिक बहस और भी तेज हो गई है।

क्या कॉन्ग्रेस सिर्फ मुसलमानों के लिए है?

विपक्षी दलों और कई राजनीतिक टिप्पणीकारों का आरोप है कि कॉन्ग्रेस अब अपनी राजनीति में मुस्लिमों को ज्यादा प्राथमिकता देती नजर आ रही है। इसी बहस के बीच एक हिंदू कॉन्ग्रेस विधायक के दरगाह जाकर चुनाव जीतने की मन्नत माँगने की खबर भी चर्चा में रही।

ऐसे मामलों को लेकर विरोधी दल यह दावा कर रहे हैं कि कॉन्ग्रेस वोट बैंक की राजनीति के लिए अपनी पारंपरिक छवि और राजनीतिक संतुलन से समझौता कर रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि अगर कॉन्ग्रेस की यह रणनीति आगे सफल होती है, तो भविष्य में कई हिंदू बहुल इलाके राजनीतिक रूप से अलग-थलग पड़ सकते हैं।

उनका मानना है कि इससे स्थानीय प्रतिनिधित्व और सामाजिक संतुलन को लेकर नई बहस खड़ी हो सकती है। कुछ लोग यह भी आशंका जता रहे हैं कि जनसंख्या और राजनीतिक समीकरणों में बड़े बदलाव भविष्य में सामाजिक तनाव बढ़ा सकते हैं, जिसका असर शहर के माहौल और आपसी सौहार्द पर पड़ सकता है।

राज्यभर में कॉन्ग्रेस के 2223 उम्मीदवारों की जमानत जब्त होना भी राजनीतिक चर्चा का बड़ा विषय बना हुआ है। भाजपा और उससे जुड़े संगठनों का कहना है कि यह सिर्फ चुनावी हार नहीं, बल्कि कॉन्ग्रेस की रणनीति के खिलाफ जनता की नाराजगी का संकेत है।

उनका दावा है कि लोग अब विकास के साथ-साथ सांस्कृतिक और सामाजिक मुद्दों को भी गंभीरता से देखने लगे हैं। इसी वजह से कॉन्ग्रेस की इस नई चुनावी रणनीति ने भाजपा और हिंदू संगठनों को भी अधिक सतर्क कर दिया है।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट गुजराती में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)