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‘नाबलिग नहीं, उसका ड्राइवर चला रहा था गाड़ी’: पुणे हादसे में अब नया दावा, जानिए ‘फिर से दिखाऊँगा सड़क पर खेल’ वाले वायरल रैप का सच

पुणे पोर्श कार एक्सीडेंट केस में नया मोड़ आ गया है। अग्रवाल परिवार के ड्राइवर ने दावा किया कि हादसे के समय आरोपित किशोर नहीं, बल्कि वो ड्राइविंग कर रहा था। इस मामले में पुलिस उससे पूछताछ कर रही है। बता दें कि इस हादसे में 2 लोगों की मौत हो गई थी और आरोपित किशोर को वहाँ मौजूद लोगों ने दौड़ा कर पकड़ा था।

ड्राइवर ने दावा किया है कि हादसे के समय कार वही चला रहा था। इंडिया टुडे की रिपोर्ट में बताया गया है कि ड्राइवर, कार में सवार आरोपित किशोर के दो दोस्तों, आरोपित किशोर के पिता विशाल अग्रवाल सभी के बयान एक जैसे हैं, जिसमें बताया जा रहा है कि ड्राइवर कार को चला रहा था। इस मामले में पुणे पुलिस परिवार के ड्राइवर, जो कथित तौर पर उस रात पोर्श चला रहा था, उससे आज फिर पूछताछ कर रही है।

इस मामले में पुणे पुलिस आरोपित किशोर के साथ ही उसके पिता विशाल अग्रवाल और विशाल अग्रवाल के बुजुर्ग पिता यानी तीन पीढ़ियों से पूछताछ कर रही है, ताकी घटना के बारे में सही जानकारी मिल सके। इस बीच, जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड ने आरोपित किशोर की जमानत रद्द कर दी है और उसे हिरासत में भेज दिया है। इस बीच, विशाल अग्रवाल का मोबाइल फोन बरामद कर लिया गया है और हादसे का खुलासा करने की कोशिश की जा रही है।

वहीं, इस मामले से जुड़ा एक वीडियो वायरल बताया जा रहा है, जिसमें दावा किया जा रहा है कि आरोपित किशोर ने जमानत मिलने के बाद एक रैप सॉन्ग रिकॉर्ड किया गया था, जिसके बोल हैं, ‘फिर से दिखाऊँगा सड़क पर खेल’.. हालाँकि पुलिस ने इस वीडियो को फर्जी करार दिया है। न्यूज18 मराठी के मुताबिक, पुलिस कमिश्ननर ने खुद कहा है कि इस वीडियो का आरोपित किशोर और हादसे से कोई लेना देना नहीं। हालाँकि इस वीडियो के बोल उस हादसे से जुड़ते दिखते हैं।

बताया जाता है कि जमानत मिलने के बाद नाबालिग ने एक रैप गाना तैयार किया था। इस वीडियो में रैप गाना गाने वाला लड़का कह रहा है कि वह फिर से सड़कों पर गाना चाहता है। इस वीडियो में वो गालियाँ देता दिख रहा है और लोगों पर गाड़ी चढ़ाने की बात करता दिख रहा है। लेकिन पुणे पुलिस कमिश्नर अमितेश कुमार ने कहा है कि यह वीडियो फर्जी है।

बता दें कि पुणे सड़क हादसे से पहले नाबालिग आरोपी ने अपने दोस्तों के साथ दो पब ब्लैक मैरियट और कोसी में शराब पार्टी की थी। पहले उसे निबंध लिखने और पुलिस की मदद करने की शर्त पर जमानत मिल गई थी, लेकिन बाद में अदालत ने जमानत कैंसिल कर उसे 5 जून तक के लिए बाल सुधार गृह भेज दिया।

पुलिस ने किशोर को शराब परोसने के आरोप में ब्लैक मैरियट पब के दो कर्मचारी जयेश सतीश गावकर (23) और नितेश धनेश शेवानी (34) को गिरफ्तार किया है। अदालत ने बिल्डर विशाल अग्रवाल और दोनों कर्मियों को 24 मई तक पुलिस हिरासत में भेज दिया है। इस मामले में कोसी पब के मालिक नमन भुटाडा (25), काउंटर मैनेजर सचिन काटकर (35) और ब्लैक मैरियट के असिस्टेंट मैनेजर संदीप सांगले (35) भी पुलिस रिमांड में भेजे गए हैं। अब तक कुल 7 गिरफ्तारियाँ हो चुकी हैं, जिसमें विशाल अग्रवाल का नाम भी शामिल है।

कॉन्ग्रेस नेता को ED से राहत, खालिस्तानियों को जमानत… जानिए कौन हैं हिन्दुओं पर हमले के 18 इस्लामी आरोपितों को छोड़ने वाले HC जज फरजंद अली

राजस्थान उच्च न्यायालय के जस्टिस फरजंद अली ने चित्तौड़गढ़ में मार्च 2024 में चारभुजा नाथ शोभा यात्रा पर हुए हमले के मामले में राजस्थान हाईकोर्ट ने 18 मुस्लिमों को जमानत दे दी। इस घटना में एक हिन्दू की मौत हो गई थी और दर्जन भर घायल हुए थे। जज फरजंद अली ने कहा कि हो सकता है कि ये मौत हार्ट अटैक से हुई हो, क्योंकि उक्त शख्स के घुटने पर सिर्फ एक छोटा सा घाव था। उन्होंने कहा कि भीड़ का मजहब नहीं होता है, ऐसे में भीड़ में कौन अपराधी हैं और कौन निर्दोष ये तय करना मुश्किल होता है।

आइए, जानते हैं कि जस्टिस फरजंद अली हैं कौन। 15 दिसंबर, 1968 को जन्मे फरजंद अली ने BA और LLB कर रखा है। उनके पिता भी बड़े वकील थे। 6 सितंबर, 1992 से उन्होंने बतौर अधिवक्ता प्रैक्टिस शुरू की थी। 2005 तक वो चित्तौड़गढ़ और आसपास के क्षेत्रों की अदालतों में प्रैक्टिस करते रहे। इसके बाद वो जोधपुर शिफ्ट हो गए और हाईकोर्ट में प्रैक्टिस करने लगे। हाईकोर्ट में केंद्र सरकार ने उन्हें स्टैंडिंग काउंसल बनाया। नेशनल हाइवे अथॉरिटी, म्युनिसिपल बोर्ड और वक्फ बोर्ड ने भी उन्हें अपना वकील नियुक्त किया।

जोधपुर स्थित राजस्थान हाईकोर्ट के मेडिएशन सेंटर में भी उन्होंने बतौर ट्रेंड मेडिएटर कार्य किया। जनवरी 2019 में राजस्थान के तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के नेतृत्व वाली कॉन्ग्रेस सरकार ने राज्य का एडवोकेट जनरल नियुक्त किया। आपराधिक, नागरिक और संवैधानिक मामलों में वो सरकार का पक्ष रखते रहे। PIL वगैरह के मामले में भी राजस्थान सरकार ने उन्हें अपना पक्ष रखने का काम दिया। 18 अक्टूबर, 2021 को वो राजस्थान हाईकोर्ट के जज बनाए गए।

सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्ष वाले कॉलेजियम पैनल ने उनके नाम पर मुहर लगाई। जज बनने के तुरंत बाद उन्होंने राजस्थान के अजमेर स्थिर ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर जाकर जियारत की। उन्होंने वहाँ मखमल की चादर चढ़ाई और अकीदत के फूल पेश किए। ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती का शुक्रिया अदा करने के लिए वो वहाँ गए थे। जस्टिस फरजंद अली ED को भी फटकार लगा चुके हैं।

नवंबर 2023 में जब राजस्थान में विधानसभा चुनाव को लेकर सरगर्मी चरम पर थी, जब जस्टिस फरजंद अली ने कॉन्ग्रेस उम्मीदवार मेवाराम जैन को राहत देते हुए ED द्वारा उन्हें भेजे गए समन को रद्द कर दिया था। तब उन्होंने फैसला दिया था कि याचिकाकर्ता के चुनाव लड़ने के अधिकार में प्रचार करने का अधिकार भी शामिल है। समन को 7 दिनों के लिए टालते हुए उन्होंने कहा था कि इससे ED की कार्यवाही पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा।

ED ने 20 नवंबर को उन्हें समन जारी किया था और 22 नवंबर को पेश होने के लिए कहा था, वहीं चुनाव 25 नवंबर को हुए थे। जज ने कहा था कि मेवाराम जैन को समन से पहले ये जानने का अधिकार है कि उन्हें क्यों बुलाया जा रहा है और मामला क्या है, ताकि वो पेशी से पहले सामग्रियाँ जुटा सकें। उन्होंने ED से कहा कि वो 3 दिसंबर को काउंटिंग के बाद उन्हें दोबारा समन जारी करे। इससे कॉन्ग्रेस उम्मीदवार को राहत मिली थी। मेवाराम जैन चुनाव हार गए थे, उनका अश्लील वीडियो भी एक महिला के साथ वायरल हुआ था।

वहीं जस्टिस फरजंद अली खालिस्तानियों को भी जमानत दे चुके हैं। उन्होंने खालिस्तानी आतंकी गुरपतवंत सिंह पन्नू के प्रतिबंधित संगठन SFJ (सिख फॉर जस्टिस) के खालिस्तानियों को जमानत दी थी। इन दोनों ने एक सार्वजनिक दीवार पर ‘खालिस्तान ज़िंदाबाद’ लिखा था। इस दौरान जज फरजंद अली ने कहा था कि उन्हें समझ नहीं आ रहा है कि इसमें UAPA क्यों लगाया गया है। उन्होंने कहा था कि अपराध इतना गंभीर नहीं है इसमें UAPA लगाया जाए।

रोहिणी आचार्य के पहुँचने के बाद शुरू हुई हिंसा, पूर्व CM का बॉडीगार्ड लेकर घूम रही थीं: बिहार पुलिस ने दर्ज की 7 FIR, राबड़ी देवी के आवास पर पहुँची SIT

लोकसभा चुनाव 2024 में पाँचवें चरण के मतदान में छपरा में हिंसा और दूसरे दिन गोलीबारी में एक युवक के मौत के मामले में एसआईटी का गठन कर दिया गया है। सारण पुलिस ने बताया है कि इस मामले में अब तक 7 एफआईआर दर्ज की जा चुकी हैं। वहीं, मामले की जाँच के लिए बनी एसआईटी की टीम ने बिहार की पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी के घर पहुँचकर पूछताछ की है, क्योंकि राबड़ी-लालू यादव की बेटी रोहिणी आचार्य मतदान केंद्र पर राबड़ी देवी के बॉडीगार्ड को साथ लेकर घूम रही थी। रोहिणी आचार्य के मतदान केंद्र पर पहुँचने के बाद ही हिंसा शुरू हुई थी। इन 7 एफआईआर में 4 एफआईआर 20 मई 2024 की घटनाओं से जुड़ी हैं, तो 3 एफआईआर फायरिंग और हत्या के मामले से जुड़ी हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, रोहिणी आचार्य के साथ राबड़ी देवी के बॉडीगार्ड के घूमने वाले मामले में एसआईटी की टीम अलग-अलग एंगल से जाँच कर रही है। इस मामले में बिहार के डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी ने बयान भी दिया था कि रोहिणी के साथ राबड़ी देवी के अंगरक्षक के घूमने की जाँच की जाएगी। जानकारी के मुताबिक, एसआईटी की टीम ने राबड़ी देवी के आवास पर करीब 30 मिनट तक रही और पूछताछ करने के बाद वहाँ से निकल गई। बताया जाता है राबड़ी आवास पर उपस्थित बॉडीगार्ड और पुलिसकर्मियों से पूरे मामले में पूछताछ की इस दौरान विशेष अधिकारी मौजूद रहे।

सारण पुलिस ने क्या?

सारण पुलिस ने छपरा गोलीकांड के मामले में जानकारी साझा की है। सारण पुलिस ने सिलसिलेवार तरीके से सभी बातों को रखा है। सारण पुलिस ने बताया है कि 20 मई 2024 को छपवा विधानसभा के मतदान केंद्र संख्या 318-319 के बाहर मतदान के समय बीजेपी और आरजेडी के समर्थकों के बीच बूथ में गड़बड़ी के आरोप को लेकर नारेबाजी, गाली-गलौच एवं रोड़ेबाजी की घटना हुई थी, इस मामले में अब तक 4 एफआईआर दर्ज की गई है। इस मामले में नगर थाना कांड संख्या 345/24 में धारा 341/323/353/504/34 भादवि एवं 131-आरपी एक्ट 1951 के तहत केस दर्ज किया गया है।

इस मामले में स्टार प्रचारक भोला राय द्वारा 18 मई 2024 को सायं 5 बजे का समय बीतने के बाद भी छपरा में मौजूद होने की वजह से 348/24 नंबर एफआईआर दर्ज की गई है। इसके साथ ही आरजेडी प्रत्याशी के चुनाव एजेंट डॉ नवल किशोर के आवेदन पर अज्ञात के खिलाफ 341/24 नंबर एफआईआर दर्ज हुई है। वहीं, सारण से बीजेपी के प्रत्याशी के छपरा विधानसभा प्रतिनिध मनोज कुमार की शिकायत पर रोहिणी आचार्य एवं 7 नामजद आरजेडी समर्थकों और 50 अज्ञात के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई गई है। इसमें फर्जी मतदान करने एवं विरोध करने पर बीजेपी के पोलिंग एजेंट के साथ गाली-गलौज और मारपीट का आरोप है। ये मामला एफआईआर नंबर 349/24 में दर्ज किया गया है।

सारण पुलिस ने बताया है कि 20 मई की घटना के बाद अगले दिन 21 मई 2024 को मतदान केंद्र से कुछ दूरी पर भिखारी ठाकुर चौक पर असामाजिक तत्वों ने 3 लोगों को गोली मार दी। जाँच में सामने आया है कि ये घटना 2 लोगों के बीच आपसी विवाद से शुरू होकर गोलीबारी तक पहुँच गई। जिसमें चंदन राय (24) की मौत हो गई, तो गुड्डू राय और मनोज राय घायल हो गए। इस मामले में 347/24 एफआईआर दर्ज की गई है, जिसकी जाँच चल रही है।

मृतक के पिता नागेंद्र राय के आवेदन पर एफआईआर संख्या 346/24 में 12 नामजद और अन्य अज्ञात लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है, जिसमें मुख्य अभियुक्तों रमाकांत सिंह (62 वर्ष) और रविकांत सिंह (47) को गिरफ्तार किया गया है। इनके पास से घटना में प्रयुक्त 1 राइफल, 1 रिवॉल्वर और 56 जिंदा कारतूस बरामद हुए। सातवीं एफआईआर सोशल मीडिया पर भड़काऊँ मैसेज से जुड़ी है, जो साइबर थाना में दर्ज है।

सारण पुलिस ने बताया है कि घटनास्थल से 1 जिंदा कारतूस और 4 खोखे बरामद हुए हैं। इस मामले से जुड़े वीडियो फुटेज भी मिले हैं, जिन्हें जब्त कर घटना में शामिल लोगों की पहचान की जा रही है। इस हत्याकांड में फरार लोगों की गिरफ्तारी के लिए एसआईटी का गठन किया गया है। साथ ही फरार अभियुक्तों की गिरफ्तारी/आत्मसमर्पण नहीं होने की स्थिति में इनकी संपत्तियों की कुर्की-जब्ती की प्रक्रिया शुकूर कर दी गई है। साथ ही हथियारों का लाइसेंस भी रद्द किया जा रहा है। इस घटना के बाद भारी संख्या में फोर्स की तैनाती कर दी गई है, साथ ही अर्धसैनिक बलों ने फ्लैग मार्च भी किया है। फिलहाल घटना के आसपास के क्षेत्रों में भी माहौल नियंत्रण में है।

लालू यादव के करीबी पर एफआईआर

छपरा गोली कांड मामले में आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव के करीबी आरजेडी के स्टार प्रचारक भोला यादव पर अब तक सात प्राथमिकी दर्ज कराई गई है। मिली जानकारी के अनुसार बीते 20 मई को छपरा में हुए मतदान केंद्र पर हंगामा मामले में में 4 और 21 मई को हुए हिंसा में तीन प्राथमिक की दर्ज कराई गई है। सारण के डीएम अमन समीर ने आरजेडी के स्टार प्रचारक भोला यादव का चुनाव के दौरान रोहिणी आचार्य के साथ भ्रमण को अवैध बताया है। डीएम ने उनके खिलाफ सीओ के जरिए आचार संहिता उल्लंघन का मामला दर्ज कराया है। दरअसल आरजेडी के स्टार प्रचारक भोला यादव पर ने कल अपनी मौजूदगी को जायज बताया था और कहा था कि उनको चुनाव आयोग से अनुमति थी। लेकिन, डीएम अमन समीर ने स्पष्ट किया है कि भोला यादव आरजेडी के स्टार प्रचारक थे और बाहरी जिले के थे लिहाजा उनका चुनाव के दौरान घूमना अवैध था।

20 को झड़प और 21 मई को हत्या

बता दें कि रिपोर्टों के अनुसार 21 मई 2024 को बीजेपी और राजद समर्थकों के बीच टकराव हुआ, फायरिंग हुई। हिंसा की यह घटना उसी इलाके में हुई, जहाँ के एक बूथ से रोहिणी आचार्य को मतदान के दिन (20 मई) विरोध के बाद लौटना पड़ा था। पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव की बेटी रोहिणी, सारण की सीट से राजद उम्मीदवार हैं। उनका मुकाबला बीजेपी के राजीव प्रताप रुडी से है। छपरा में हुई हिंसा को लेकर आई जानकारी बताती है कि भाजपा और राजद समर्थकों ने न केवल हाथापाई की बल्कि काँच की बोतल से एक दूसरे पर हमला किया और फायरिंग की गई। घटना में एक की मौत हो गई जबकि दो लोग गंभीर रूप से घायल हैं। हालाँकि उनकी स्थिति खतरे से बाहर है।

मी लॉर्ड! भीड़ का चेहरा भी होता है, मजहब भी होता है… यदि यह सच नहीं तो ‘अल्लाह-हू-अकबर’ के नारों के साथ ‘काफिरों’ पर हमला करने वाले कौन?

क्या भीड़ का कोई मजहब नहीं होता? क्या भीड़ को कपड़ों से नहीं पहचाना जा सकता? क्या भीड़ में शामिल लोगों के इरादे समान नहीं होते? हम ये सवाल इसीलिए पूछ रहे हैं क्योंकि राजस्थान के चित्तौड़गढ़ में हिन्दुओं की शोभा यात्रा पर हुए हमले के 18 मुस्लिम आरोपितों को राजस्थान उच्च न्यायालय ने जमानत दे दी है। इस दौरान हाईकोर्ट के जज फरजंद अली ने कहा कि भीड़ का कोई मजहब नहीं होता, कई बार निर्दोष फँस जाते हैं और असली अपराधी भाग निकलते हैं।

इस पर बहस ज़रूरी है, क्योंकि हमला हिन्दुओं की शोभा यात्रा पर हुआ था और हमलावर इस्लामी कट्टरपंथी थे। अगर हम दिल्ली से लेकर पश्चिम बंगाल तक के पैटर्न की बात करें तो आरोपित सिर्फ तमाशा देखने के लिए घटनास्थल के पास आए होंगे, ऐसे तो नहीं लगता। खैर, जज साहब का कहना है कि कई लोग उत्सुकतावश तो कई डर से भी घटना को देखने जाते हैं। जस्टिस फरजंद अली ने कह दिया कि आरोपितों को जेल में रखे जाने का कोई कारण नहीं है। मामले को समझने से पहले जानिए चारभुजा नाथ के बारे में, जिनकी यात्रा निकाली जा रही थी।

मेवाड़-मारवाड़ के आराध्य चारभुजा नाथ, जिनकी निकलती है यात्रा

मेवाड़ और मारवाड़ के आराध्य देवता हैं – चारभुजा नाथ, जिनका मुख्य मंदिर कुम्भलगढ़ तहसील के गढ़बोर गाँव में स्थित है। राजस्थान के राजसमंद में स्थित ये मंदिर ऐतिहासिक है, प्राचीन है। इसकी कथा महाभारत तक जाती है। सन् 1444 में राजा गंग सिंह ने यहाँ भव्य मंदिर का निर्माण करवाया। इस गाँव का नाम गढ़बोर इसीलिए है, क्योंकि यहाँ ‘बोर’ राजपूतों ने मंदिर का निर्माण कार्य करवाया। पांडवों ने अपने अंतिम दिनों में हिमालय की यात्रा से पहले यहाँ दर्शन किया था, ऐसी भी मान्यता है।

भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष में ‘देवझूलनी’ एकादशी के दिन यहाँ भव्य मेला लगता है, जहाँ दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं। सोने-चाँदी की पालकी में ठाकुर जी को बिठा कर उनकी यात्रा निकाली जाती है। गाजे-बाजे और रंग-गुलाल के साथ उत्सव का माहौल होता है। नृत्य-संगीत और श्रृंगार-इत्र वाला माहौल रहता है। 1000 गुर्जर परिवार इस मंदिर के पुजारी हैं। हर अमावस्या पुजारी बदलता है। इस दौरान पुजारी को कठिन तप एवं साधना के नियमों का पालन करना पड़ता है।

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से लेकर राजस्थान की मुख्यमंत्री रहीं वसुंधरा राजे तक यहाँ दर्शन-पूजन कर चुकी हैं। भगवान श्रीकृष्ण के चतुर्भज स्वरूप को समर्पित इस मंदिर में जब किसी पुजारी की पाली आती है तो वो सगे-संबंधियों की मौत होने के बाद भी अपनी अवधि पूरा होने तक नहीं उठ सकते। कइयों की बारी 48-50 साल बाद आती है, यानी जीवन में एक मौका। इस दौरान उन्हें हर प्रकार के व्यसन से दूर मंदिर में ही रहना पड़ता है।

इससे इतना तो आप समझ ही गए होंगे कि ये मंदिर न सिर्फ वैष्णव, बल्कि पूरे हिन्दू समाज, खासकर राजस्थान के हिन्दू समाज के लिए बड़ी महत्ता रखता है। मंदिर में कई जगह स्वर्ण-पत्र जड़े हुए हैं, सोने के दरवाजे में चाँदी के पत्र जड़े हुए हैं। मंदिर के पास एक छतरी में गरुड़ जी की 5 मूर्तियाँ हैं। मंदिर के सामने विशाल नक्कारखाना है। राजस्थान में अन्य स्थानों पर भी समय-समय पर चारभुजा नाथ की यात्रा निकाली जाती है, जिनमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु हिस्सा लेते हैं। चित्तौड़गढ़ में उनकी ही यात्रा निकाली जा रही थी, जिस पर हमला हुआ।

चित्तौड़गढ़ में हिन्दुओं की शोभा यात्रा पर हमला

आइए, अब जानते हैं कि चित्तौड़गढ़ में हुआ क्या था। घटना मंगलवार (19 मार्च, 2024) की है। चारभुजा नाथ यात्रा पर हमला किया गया, जिसमें श्याम छिपा नामक एक व्यक्ति की मौत हो गई। मौके पर ही उनकी दुकान थी। घटना राशमी थाना क्षेत्र के पहुना गाँव की है, जहाँ दशमी के अवसर पर चारभुजा नाथ की यात्रा निकाली जाती है। इस दौरान ढोल बजाते हुए ग्रामीण गाँव के विभिन्न हिस्सों से होकर निकलते हैं। लेकिन, कस्बे के मुख्य बाजार स्थित दरगाह पर पहुँचते ही शोभा यात्रा पर हमला हो गया।

इस घटना में नवीन जैन समेत कई लोग घायल भी हुए थे। वहीं 55 वर्षीय श्याम छिपा को भीलवाड़ा रेफर किया गया लेकिन उन्हें बचाया नहीं जा सका था। दरगाह के सामने से जैसे ही शोभा यात्रा निकली, वहाँ मौजूद मुस्लिम इससे आपत्ति जताने लगे। भले ही सड़क सार्वजनिक संपत्ति हो, ये कई जगह देखने को मिलता है कि इस्लामी संरचनाओं के सामने से शोभा यात्रा निकलते ही हमले होते हैं। चित्तौड़गढ़ में भी पत्थरबाजी शुरू हो गई। एक दर्जन से भी अधिक लोग घायल हुए, पुलिस को स्थिति सँभालनी पड़ी।

इसी क्रम में पुलिस ने 18 आरोपितों को चिह्नित करते हुए उन्हें गिरफ्तार किया था। न सिर्फ गाली-गलौज और पत्थरबाजी हुई, बल्कि श्रद्धालुओं को पीटा भी गया और आगजनी भी की गई। गाड़ियों और दुकानों में आग लगा दी गई। रात के समय हुए इस हमले का वीडियो भी सोशल मीडिया पर सामने आया था। वीडियो में इस्लामी टोपी पहने लोग हंगामा करते हुए स्पष्ट दिख रहे हैं। उस समय रमजान का पाक महीना चल रहा था। राजस्थान में सरकार बदल गई लेकिन इस्लामी कट्टरपंथियों का हौसला वही रहा।

जज फरजंद अली ने 18 आरोपितों को जमानत देते हुए क्या कहा

24 वर्षीय बाबू मोहम्मद सहित अन्य आरोपितों ने हाईकोर्ट का रुख किया था, क्योंकि ट्रायल कोर्ट ने उनकी जमानत याचिका ख़ारिज कर दी थी। वहीं इस मामले में राजस्थान सरकार समेत पीड़ित हिन्दुओं को भी पक्षकार बनाया गया था। याचिकाकर्ताओं ने कहा कि उनका इस घटना से कोई लेना-देना नहीं है और उन्हें झूठा फँसाया गया है। इन्होंने दावा किया कि मौत का कारण हार्ट अटैक था और मृतक के शरीर में कोई जख्म नहीं था। साथ ही इस मामले में SC/ST एक्ट हटाने की अपील भी की गई थी।

हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता ‘लंबे समय’ से जेल में हैं। ‘लंबे समय’, मतलब 2 महीना। जबकि पुलिस का स्पष्ट कहना था कि पूर्व से रची हुई साजिश के तहत हिन्दुओं के शांतिपूर्ण शोभा यात्रा पर हमला किया गया, वो भी खतरनाक हथियारों के साथ। जज साहब ने ये तक कह दिया कि इस हिंसा में कौन-कौन लोग शामिल थे इस संबंध में कुछ नहीं कहा जा सकता। यानी, हमला दरगाह के सामने हुआ और पीड़ित हिन्दू श्रद्धालु थे, फिर भी जज साहब को शक था कि कौन लोग इसमें शामिल थे।

जज फरजंद अली ने कहा कि भीड़ में निर्दोषों और हमलावरों को अलग-अलग चिह्नित करना बड़ा मुश्किल है, अपराधी भाग जाते हैं और निर्दोष फँस जाते हैं। आरोपितों के दोषी होने से लेकर उन पर SC/ST एक्ट के तहत मामला चलाने तक, अदालत हर मामले में संशय में दिखी। चूँकि पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में घुटने पर जख्म की बात है, ऐसे में मीलॉर्ड को ये भी नहीं लगता कि मौत हमले के कारण हुई है। उन्हें ये हार्ट अटैक का संभावित मामला लगता है क्योंकि खून नहीं निकल रहा था।

सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का जिक्र करते हुए कहा गया कि आरोपित अगर सुनवाई में नियमित रूप से उपस्थित रहते हैं तो ये अदालत के ऊपर है कि वो उन्हें अपने परिवार के साथ खाने, सोने और रहने की अनुमति देती है या नहीं। जज साहब ने इसके बाद निजी मुचलकों पर इन्हें जमानत दे दी, निचली अदालत ने फैसला पलट दिया। भारत में न्याय कुछ इसी तरह होता है। भीड़ का नहीं, हमलावरों का मजहब देखा जाता है। हाँ, अगर नूपुर शर्मा हों आरोपित तो सुप्रीम कोर्ट तक से कड़ी टिप्पणी की जाती है।

मीलॉर्डस, आपको कितने उदाहरण चाहिए ‘भीड़ का मजहब’ होने के?

चित्तौड़गढ़ में चारभुजा नाथ शोभा यात्रा निकाल रहे हिन्दुओं पर हमला करने वाले भीड़, जो दरगाह से निकली, उसका मजहब था। आइए, राजस्थान की ही बात कर लेते हैं अधिक दूर जाने से पहले। राजस्थान के करौली में अप्रैल 2022 में दंगे भड़के थे। नव-संवत्सर पर बाइक रैली आयोजित की गई थी, जिस पर हमला हुआ। हटवारा बाजार में जिस भीड़ ने इस रैली पर पत्थरबाजी की, उनका मजहब था। इसके बाद गाड़ियों, दुकानों और घरों में आगजनी हुई थी।

इसके अगले ही महीने जोधपुर में परशुराम जयंती के मौके पर शोभा यात्रा निकली और जालोरी गेट चौराहे पर झंडा लगाया गया, उस दौरान भी जिस भीड़ ने हिन्दू युवक के साथ मारपीट की और झंडा लगाने का विरोध किया, उस भीड़ का मजहब था। उससे 1 वर्ष पहले, यानी जुलाई 2021 में झालावाड़ में हिंसा भड़की, तब भी भीड़ का मजहब था। टोंक में अक्टूबर 2019 में दशहरा की रैली पर मालपुरा कस्बे में जिन लोगों का पथराव किया, उनका भी मजहब था।

जज साहब को समझना चाहिए कि पिछले 1400 वर्षों से हिंसक भीड़ का मजहब है। ज्यादा पीछे क्यों जाना, इसी साल रामनवमी के दौरान अप्रैल में जगह-जगह हिन्दुओं की शोभा यात्राओं पर हमले हुए। ये हमले करने वाले जैन, बौद्ध, सिख, ईसाई, पारसी या फिर यहूदी नहीं थे। लेकिन, इन भीड़ का मजहब था। मुर्शिदाबाद में जहाँ हमले हुए, वहाँ दो तिहाई जनसंख्या जिनकी है उनका एक खास मजहब है। पिछले साल भी कुछ ऐसा ही हुआ था, हर साल होता है।

मार्च 2023 में उत्तर दिनाजपुर के दालखोला में रामनवमी की शोभा यात्रा पर हुए हमले के मामले में NIA को जाँच सौंपनी पड़ी। फरवरी 2024 में जिन 16 लोगों को NIA ने गिरफ्तार किया, उनका भी मजहब था। दिल्ली में फरवरी 2020 में जो दंगे हुए थे, उस दौरान जिस भीड़ ने 51 वर्षीय विनोद कुमार पर ‘अल्लाह-हू-अकबर’ का नारा लगाते हुए उन्हें मार डाला, उस भीड़ का भी मजहब था। उनके बेटे मोनू को भी गंभीर चोटें आई थीं। वो मोहल्ला आज भी जिस डर में जीता है, उसके पीछे एक भीड़ का खौफ है और उस भीड़ का मजहब है।

CAA के खिलाफ देश भर में जो दंगे हुए, हर एक दंगे में भीड़ का मजहब था। तभी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी कहा था कि जो लोग आग लगा रहे हैं और TV पर उनके जो दृश्य आ रहे हैं, ये आग लगाने वाले कौन हैं ये उनके कपड़ों से ही पता चल जाता है। नूपुर शर्मा के बयान (जो उन्होंने हदीथ से उद्धरण दिया था) को पैगंबर मुहम्मद का अपमान बता कर पश्चिम बंगाल के नदिया में रेलवे स्टेशन को क्षतिग्रस्त करने वाली भीड़ का भी मजहब था। लेकिन, जज साहब को ये सब नहीं दिखता।

इस्लामी कट्टरपंथी विचारधारा को लेकर न्यायपालिका नरम क्यों?

नूपुर शर्मा को सुप्रीम कोर्ट के जजों ने पूरे देश में आग लगाने के लिए जिम्मेदार ठहरा दिया, जबकि ये काम वही मजहब वाली भीड़ कर रही थी। उसी मजहब के लोगों ने उदयपुर में कन्हैया लाल तेली और अमरावती में उमेश कोल्हे का गला रेता। उसी भीड़ ने नरसिंहानंद सरस्वती के खिलाफ भी ‘सर तन से जुदा’ का पोस्टर लेकर सड़कों को जाम किया। इसी भीड़ को हमने पाकिस्तान में मंदिरों को ध्वस्त करते, लंदन की सड़कों पर आतंकी संगठन हमास का समर्थन करते और बांग्लादेश में दुर्गा पूजा के पंडालों पर हमला करते हुए देखा है।

काशी विश्वनाथ मंदिर, अयोध्या का राम मंदिर और मथुरा के श्रीकृष्ण मंदिर को सैकड़ों वर्ष पूर्व ध्वस्त किए जाने के पीछे यही मानसिकता थी, मजहब वाली। आज जो ‘लव जिहाद’ की घटनाएँ हो रही हैं, उसके पीछे भी वही मानसिकता है। अगर न्यायपालिका ने समय रहते इस्लामी कट्टरपंथ के खिलाफ कड़ा रख नहीं अपनाया तो इसका खामियाजा उन्हें भी और पूरे देश को भुगतना पड़ेगा। जजों को तो आरोपितों को जमानत देने की बजाय उल्टा सरकारों को आदेश देना चाहिए कि वो हिन्दू पर्व-त्योहारों पर सुरक्षा मुहैया कराए।

हिन्दू धर्म-ग्रंथों का अपमान करने वालों पर कार्रवाई नहीं होती और दंगे करने वालों को जमानत मिल जाती है, इससे उस मजहब वाली भीड़ को प्रोत्साहन मिलता है। ISIS भी इसी भीड़ की तरह ‘अल्लाह-हू-अकबर’ का नारा लगाते हुए गला रेतता है और वीडियो बनाता है। साल बदलते हैं, स्थान बदलता है – मानसिकता वही रहती है। जब क्रिया की प्रतिक्रिया होती है या फिर आत्मरक्षा में बल प्रयोग करता है पीड़ित पक्ष, तो इसे ‘हिन्दू आतंकवाद’ बता कर प्रचारित किया जाता है।

कौन हैं राजस्थान हाईकोर्ट के जज फरजंद अली

राजस्थान हाईकोर्ट के जज फरजंद अली सितंबर 1992 से लॉ की प्रैक्टिस बतौर वकील करते रहे हैं। उन्हें अक्टूबर 2021 में राजस्थान उच्च न्यायालय का जज नियुक्त किया गया था। कॉन्ग्रेस सरकार ने उन्हें 2019 में अपना सरकारी जज बनाया था। जज नियुक्त होने के बाद उन्होंने अजमेर स्थित ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर जियारत की थी। नवंबर 2023 में कॉन्ग्रेस उम्मीदवार मेवाराम जैन को ED ने समन भेजा था तो उन्होंने इस इस समन को रद्द किया था।

इतना ही नहीं, जज फरजंद अली ने प्रतिबंधित आतंकी संगठन SFJ (सिख फॉर जस्टिस) के 2 खालिस्तानियों को जमानत भी दे दी थी। जजों की नियुक्ति जज ही करते हैं, उनकी नियुक्ति भी तत्कालीन CJI रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाले पैनल ने की थी। न्यायपालिका में सुधार समय की ज़रूरत है, समय-समय पर सरकारों के प्रयासों पर न्यायपालिका ही अड़ंगा लगाती आई है। कॉलेजियम सिस्टम विवादित है, लेकिन चल रहा है। यही स्थिति रही तो कल को देश के सारे दंगाई सड़क पर खुला घूम रहे होंगे।

‘तुम सब काफी खूबसूरत हो, गर्भवती होने लायक’: हमास के चंगुल में खून से लथपथ 5 इजरायली महिला सैनिकों का वीडियो, कह रहे आतंकी – सबको मार देंगे गोली

इजरायल पर 7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमले के दौरान बंधक बनाई गई 5 महिला इजरायली सैनिकों के परिवार ने उनके फुटेज जारी किए हैं। परिजनों का कहना है कि लड़ाई की जगह उन्हें अपने लोगों की रिहाई चाहिए। इजरायल के बंधकों और लापता परिवारों ने फोरम (Hostages and Missing Families Forum) ने बुधवार (22 मई 2024) को वो भयावह फुटेज जारी की, जिसमें 7 अक्टूबर 2023 के हमले में नाहल ओज बेस से 5 महिला सैनिकों को अगवा कर बंधक बनाया गया था। फुटेज को जारी करने वाले परिवारों ने ‘बंधकों को वापस लाने में विफल सरकार का प्रमाण’ करार देते हुए कहा कि अगर अब भी सरकार बंधकों को लाने का प्रयास नहीं करती है, तो ये सारी सीमाओं के पार करने जैसा है।

टाइम्स ऑफ इजरायल की रिपोर्ट के मुताबिक, पीड़ित परिवारों ने कहा कि उन्होंने जोखिम उठाते हुए अपने बच्चों और परिवारों की पहचान जाहिर की है। सरकार को उन बंधकों को तुरंत रिहा कराने के लिए हमास के खिलाफ जारी गाजा में अभियान को रोक देना चाहिए। इन परिवारों ने कहा कि हमास के पास अब भी 129 बंधक हैं, जिन्हें लाना सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए। ये वीडियो हमास के आतंकियों के शरीर पर लगे बॉडीकैम से बनाई गई है। वीडियो की कुल लंबाई 13 मिनट से ज्यादा है, लेकिन इसे एडिट करके सिर्फ 3 मिनट का ही जारी किया गया है।

इस वीडियो के माध्यम से पता चला है कि नाहल ओज बेस पर आतंकवादी करीब 3 घंटे रहे और आराम से वापस लौट गए। इस दौरान इजरायली सेना की तरफ से किसी भी तरह का कोई पलटवार नहीं हुआ। बता दें कि इस बेस पर हमले में कुल 50 महिला-पुरुष सैनिक मारे गए थे, तो 5 महिला सैनिकों को ये कहते हुए बंदी बना लिया गया था कि ये ‘बच्चे पैदा करने लायक’ हैं। इस वीडियो में हमास का एक आतंकी महिला सैनिकों की खूबसूरती की तारीफ कर रहा है, जबकि महिला सैनिक बंधक अवस्था में हैं। इसमें एक जगह हमास आतंकी बोलता है, ‘तुम कुत्तों को मार डालेंगे।’

हमास की कैद में लिरी अलबेग, करीबा एनिएव, एगम बर्जर, डेनिएला गिल्बोवा और नामा लेवी की पाँचों महिला सैनिक

इस वीडियो में दिख रही पाँचों महिला सैनिकों के नाम भी जारी किए गए हैं। इनके नाम लिरी अलबेग, करीबा एनिएव, एगम बर्जर, डेनिएला गिल्बोवा और नामा लेवी है। ये पाँचों महिला सैनिक अब भी हमास की चंगुल में कैद हैं। इनमें से एक नामा लेवी फिलिस्तीनियों के लिए काम करने वाली एक संगठन से जुड़ी थी और इजरायल के अंदर ‘फिलिस्तीन के साथ सह-अस्तित्व की भावना के साथ जिंदगी’ नाम के प्रोजेक्ट पर काम कर रही थी। इस तीन मिनट के वीडियो में वो हमास के आतंकियों से कहती हैं कि उनका दोस्त गाजा में है, जिसपर हमास का आतंकी चिल्लाकर कहता है कि वो अपने दोस्त को फोन करे। हालाँकि इस दौरान फोन नहीं किया गया। इन पाँच महिला सैनिकों में से एक नावा लेवी ‘पीस एक्टिविक्स’ भी थी, जो अब भी हमास की चंगुल में हैं।

इस वीडियो में एक आतंकी बंधक महिला सैनिकों को चिल्ला कर कहा है, “तुम्हारी वजह से हमारे भाई मरे, हम तुम सबको गोली मार देंगे।” वीडियो के साथ दिए गए अनुवाद में आतंकवादियों में से एक ने बंधकों को “ऐसी महिलाएँ जो गर्भवती हो सकती हैं(“women who can get pregnant)” कहा। हालाँकि इस शब्द का अनुवाद “महिला बंदी” के रूप में भी किया जा सकता है। पहले इस्लामिक स्टेट के आतंकवादियों द्वारा इसका इस्तेमाल सेक्स गुलामों के लिए भी किया जाता था।

बता दें कि 7 अक्टूबर 2023 को हमास के आतंकियों ने इजरायल पर हमला बोल दिया था। हमास के हमले में 1200 से अधिक इजरायली मारे गए थे, तो 234 को बंधक बना लिया गया था। पिछले साल सौ से अधिक बंधकों को रिहाई मिल गई थी, लेकिन अब भी 129 इजरायली नागरिक हमास की कैद में हैं। इनमें से कई बंधकों के मारे जाने की भी सूचना है। हमास के हमले के बाद इजराइल सेना ने गाजा पर हमला बोल दिया था, जिसमें हजारों लोग मारे गए हैं। ये लड़ाई अब भी जारी है।

‘प्यार से माँगते तो जान दे देती, अब किसी कीमत पर नहीं दूँगी इस्तीफा’: स्वाति मालीवाल ने राज्यसभा सीट छोड़ने से किया इनकार

आम आदमी पार्टी की राज्यसभा सांसद स्वाति मालीवाल ने कहा है कि उनसे अगर प्यार से राज्यसभा सीट से इस्तीफा देने को कहा जाता तो वह छोड़ देतीं। उन्होंने अब किसी भी हाल में राज्यसभा से इस्तीफा देने से मना कर दिया है। उन्होंने अपने साथ हुई मारपीट और चरित्र हनन के पीछे का कारण यही बताया है।

किसी ख़ास वकील के लिए राज्यसभा सीट खाली करने को लेकर स्वाति मालीवाल ने ANI पॉडकास्ट पर स्मिता प्रकाश से बताया, “अगर मेरी राज्यसभा सीट उनको वापस चाहिए थी, तो अगर प्यार से माँगते तो मैं जान भी दे देती, राज्यसभा सीट तो बहुत छोटी चीज है।”

गौरतलब है कि जिस खास वकील के लिए राज्यसभा सीट खाली करने की बात कही जा रही है, मीडिया रिपोर्ट्स में वह अभिषेक मनु सिंघवी बताए गए हैं। वह हाल ही में हिमाचल प्रदेश से राज्यसभा चुनाव हार गए थे। वह दिल्ली शराब घोटाला मामले में अरविन्द केजरीवाल के वकील हैं।

उन्होंने आगे कहा, “मैंने कभी भी पद की लालसा नहीं दिखाई, मैं 2006 में तब जुड़ी थी जब कोई किसी को जानता नहीं था। मैंने जमीन से जुड़ कर काम किया है। 2006 से 2012 तक सारे ऑपरेशन चलाए हैं। मैं 3-4 लोगों में सबसे अधिक महत्वपूर्ण व्यक्ति थी।”

उन्होंने अब राज्यसभा सीट से इस्तीफ़ा देने को लेकर साफ इनकार किया। उन्होंने कहा, “मुझे सांसद पद की कोई लालसा नहीं है, ये मुझे प्यार से बोलते तो मैं हर हाल में इस्तीफा दे देती, मुझे कोई समस्या नहीं। मैं किसी पद में नहीं बंधी। जिस तरीके से इन्होने मुझे मारा पीटा है, अब मैं किसी भी हाल में इस्तीफा नहीं दूँगी। मुझे बताया गया है कि इसी वजह से मेरा चरित्र हनन हो रहा है, मेरी बेइज्जती की जा रही है। मैं अब सांसद के तौर पर मेहनत करुँगी और एक आदर्श सांसद कैसा होता है, बन कर दिखाऊँगी।”

गौरतलब है कि AAP की राज्यसभा सांसद स्वाति मालीवाल के साथ 13 मई, 2024 को दिल्ली CM के आधिकारिक आवास पर मारपीट हुई थी। उनके साथ यह मारपीट दिल्ली CM केजरीवाल के पूर्व PS विभव कुमार ने की थी। इस घटना को लेकर स्वाति मालीवाल ने FIR भी दर्ज करवाई थी।उन्होंने FIR में बताया था कि विभव कुमार ने उन्हें गालियाँ दी थी।

विभव ने उनसे कहा, “तू कैसे हमारी बात नहीं मानेगी? कैसे नहीं मानेगी? साली तेरी औकात क्या है कि हमको ना करदे। समझती क्या है खुद को नीच औरत। तुझको हम सबक सिखाएँगे।” उन्हें जमीन पर घसीटा गया था और उनकी शर्ट भी खोली गई थी। इसके अलावा उन्हें लातों से मारा गया। इसके बाद उन्हें CM आवास से बाहर कर दिया गया था। उनकी मेडिकल रिपोर्ट में चेहरे के अंदर चोट लगने की बात की पुष्टि हुई थी।

दिल्ली पुलिस ने इस मामले में दर्ज FIR के आधार पर विभव कुमार को गिरफ्तार कर लिया था। अब दिल्ली पुलिस इस मामले की जाँच कर रही है।

UP में जज साहब का गायब हो गया कुत्ता, बरेली में 14 पर हुई FIR: पड़ोसी डंपी अहमद पर जताया शक, मारपीट-दुर्व्यवहार का भी आरोप

उत्तर प्रदेश के बरेली में एक जज साहब का कुत्ता गायब हो गया है। इस मामले में अब जज के पड़ोसी डंपी अहमद समेत 14 लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर ली गई है। इस एफआईआर में मारपीट, बेटियों से दुर्व्यवहार का भी आरोप है। जज साहब लखनऊ में रहते हैं, लेकिन उनका परिवार बरेली में ही रहता है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, मामला बरेली के इज्जत नगर का है। जज साहब की पत्नी का आरोप है कि 16 मई को डंपी अहमद, उनकी पत्नी और साथ आए लोगों ने दुर्व्यवहार किया। डंपी अहमद और उनके साथियों ने उनके साथ ही उनकी 2 बेटियों को भी धमकाया। लेकिन 18 मई को उन्होंने उनके कुत्ते को गायब कर दिया। जज के परिवार ने आशंका जताई है कि उनके कुत्ते को शायद जान से मार डाला गया है। इस मामले में पुलिस ने पशु क्रूरता अधिनियम का भी केस जोड़ा है।

जानकारी के मुताबिक, 16 मई की देर शाम को डंपी अहमद की पत्नी ने उनके कुत्ते द्वारा काटे जाने की शिकायत की और वो जज के घर पहुँची, तभी डंपी अहमद ने जज की बेटियों के साथ बदसलूकी की। उसने पास के गाँव से एक दर्जन से अधिक साथियों को बुला लिया और पूरे परिवार को जमकर धमकाया। जज साहब ने वॉट्सऐप पर कॉल किया, तो उन्हें भी धमकाया। इस दौरान पुलिस को फोन किया गया, तो पुलिस के पहुँचने से पहले ही सभी फरार हो गए।

जज की पत्नी ने आरोप लगाया है कि 18 मई की रात उनके पालतू कुत्ते को ‘गायब’ कर दिया गया। उन्हें शक है कि आरोपितों ने ही कुत्ते को गायब कर दिया है, वो उसकी जान भी ले सकते हैं। इस पूरे प्रकरण से जज का परिवार खौफ में है।

इज्जत नगर थाने के प्रभारी निरीक्षक जयशंकर सिंह ने बताया कि जज की पत्नी की तहरीर पर एक नामजद सहित कई अज्ञात के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया है। मामले की जाँच की जा रही है। इस मामले में डंपी अहमद और उसके करीब 14 अज्ञात साथियों के खिलाफ पशु क्रूरता अधिनियम के साथ ही कई गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज हुआ है।

‘टेबल पर लगा सिर, पैर पकड़कर नीचे घसीटा’: विभव कुमार ने CM केजरीवाल के घर में कैसे पीटा, स्वाति मालीवाल ने अब कैमरे पर बताया

आम आदमी पार्टी की राज्यसभा सांसद स्वाति मालीवाल ने बताया है कि दिल्ली CM अरविन्द केजरीवाल के आवास पर उन्हें घसीटा गया। उन्हें केजरीवाल के पूर्व निजी सचिव विभव कुमार ने पैर पकड़ कर घसीटा। उन्हें थप्पड़ मारे गए। उन्होंने अपनी आपबीती अब कैमरे के सामने बताई है। ANI पॉडकास्ट पर स्मिता प्रकाश से बात करते हुए स्वाति मालीवाल पूरी घटना बताई है।

उन्होंने बताया “मैं 13 मई को सुबह 9 बजे के करीब अरविन्द केजरीवाल से मिलने गई थी। वहाँ मुझे उनके स्टाफ ने ड्राइंग रूम में बिठाया और बताया कि केजरीवाल मिलने आ रहे हैं। इतने में ही विभव कुमार यहाँ आ गए। मैंने उनको बोला कि अरविन्द जी आ रहे हैं, क्या हो गया है। इतने में ही उन्होंने मुझ पर हाथ छोड़ दिया। उन्होंने मुझे 7-8 थप्पड़ पूरे जोर से मारे।”

आगे उन्होंने बताया, “जब मैंने उन्हें धक्का देने की कोशिश की तो उन्होंने मेरा पैर पकड़ लिया और नीचे घसीट दिया। मेरा सर भी बीच की मेज पर टकरा गया। मैं नीचे गिरी फिर उन्होंने मुझे लातों से मारना चालू कर दिया। मैं बहुत जोर से चीख चीख कर मदद माँगती रही लेकिन कोई नहीं आया। किसी ने भी मदद नहीं की।”

मालीवाल ने बताया कि विभव ने किसी के कहने पर उन्हें पीटा है, यह बात जाँच का विषय है। उन्होंने बताया कि वह किसी को क्लीन चिट नहीं दे रही हैं। उन्होंने कहा है कि जिस दौरान वह पीटी गईं, उस दौरान केजरीवाल घर में मौजूद थे लेकिन कोई बचाने नहीं आया।

गौरतलब है कि AAP की राज्यसभा सांसद स्वाति मालीवाल के साथ 13 मई, 2024 को दिल्ली CM के आधिकारिक आवास पर मारपीट हुई थी। उनके साथ यह मारपीट दिल्ली CM केजरीवाल के पूर्व PS विभव कुमार ने की थी। इस घटना को लेकर स्वाति मालीवाल ने FIR भी दर्ज करवाई थी।

उन्होंने FIR में बताया था कि विभव कुमार ने उन्हें गालियाँ दी थी। विभव ने उनसे कहा, “तू कैसे हमारी बात नहीं मानेगी? कैसे नहीं मानेगी? साली तेरी औकात क्या है कि हमको ना करदे। समझती क्या है खुद को नीच औरत। तुझको हम सबक सिखाएँगे।” उन्हें जमीन पर घसीटा गया था और उनकी शर्ट भी खोली गई थी। इसके अलावा उन्हें लातों से मारा गया। इसके बाद उन्हें CM आवास से बाहर कर दिया गया था। उनकी मेडिकल रिपोर्ट में चेहरे के अंदर चोट लगने की बात की पुष्टि हुई थी।

दिल्ली पुलिस ने इस मामले में दर्ज FIR के आधार पर विभव कुमार को गिरफ्तार कर लिया था। अब दिल्ली पुलिस इस मामले की जाँच कर रही है।

‘भीड़ का मजहब नहीं होता’: हाईकोर्ट जस्टिस फरजंद अली ने 18 कट्टरपंथियों को दी जमानत, हिंदुओं की शोभायात्रा पर हुआ था हमला; कहा- हार्ट अटैक से मरा होगा

‘भीड़ का कोई मजहब नहीं होता’ – राजस्थान उच्च न्यायालय ने ये टिप्पणी की है। सांप्रदायिक हिंसा के आरोपितों की धर-पकड़ में आने वाली चुनौतियों का जिक्र करते हुए हाईकोर्ट ने ऐसा कहा। मामला बाबू मोहम्मद बनाम राजस्थान सरकार का है। ये टिप्पणी करने के साथ ही अदालत ने हिंसा के 18 आरोपितों को जमानत भी दे दी। ये सभी 19 मार्च, 2024 को चित्तौड़गढ़ में हिन्दुओं की शोभा यात्रा पर हुए हमले में भीड़ का हिस्सा थे। इस फैसले ने विवादों को जन्म दिया है।

राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि 2 अलग-अलग समुदायों के बीच हिंसा भड़की और धार्मिक भावनाएँ भी आहत हुई होंगी, लेकिन ये तय करना मुश्किल है कि विवाद पैदा करने और लोगों को घायल करने के लिए कौन लोग जिम्मेदार हैं। जस्टिस फरजंद अली का कहना है कि भीड़ के हमले में आरोपितों और निर्दोषों को अलग करना बड़ा मुश्किल होता है। जज ने कहा कि भीड़ का कोई मजहब नहीं होता, जब लोगों के एक बड़े समूह ने किसी घटना को अंजाम दिया हो तो ये पता करना बहुत कठिन होता है कि कौन आरोपित हैं और कौन निर्दोष।

जज फरजंद अली ने कहा कि जब भीड़-भाड़ वाले इलाके में कोई हंगामा होता है कई लोग वहाँ पर जुट जाते हैं। उन्होंने कहा कि कुछ सिर्फ देखने के लिए जाते हैं कि क्या घटनाक्रम चल रहा है तो कुछ डर के मारे जाते हैं, तो कुछ उत्सुकता से जुट जाते हैं। जज ने कहा कि ऐसी अस्त-व्यस्त स्थिति में जो असली अपराधी होते हैं वो भागने में कामयाब हो जाते हैं और जो सिर्फ देखने के लिए आए थे उन पर मामला दर्ज हो जाता है। सोमवार (20 मई, 2024) को ये फैसला सुनाया गया।

हाईकोर्ट ने इस मामले में SC/ST एक्ट लगाए जाने पर भी चर्चा की बात कही। ट्रायल कोर्ट ने इन 18 गिरफ्तार आरोपितों की जमानत याचिका ख़ारिज कर दी थी। हाईकोर्ट ने कहा कि अपीलकर्ता दोषी हैं या नहीं इस पर कुछ भी टिप्पणी करना फ़िलहाल सुरक्षित नहीं होगा। हाईकोर्ट के जज फरजंद अली ने कहा कि हो सकता है कि मौत हिंसा से नहीं बल्कि हार्ट अटैक से हुई तो क्योंकि मृतक के घुटने पर सिर्फ छोटा सा जख्म था जो मौत का कारण नहीं हो सकता।

जज फरजंद अली ने कहा कि मेडिकल बोर्ड का इस मौत को लेकर कोई ओपिनियन नहीं है, विसरा रिपोर्ट को केमिकल परीक्षण के लिए भेजा गया है। उन्होंने कहा कि आरोपितों को जेल में बंद रखने से कोई फायदा नहीं है, अतः तथ्यों एवं परिस्थितियों को देखते हुए इन्हें जमानत देना उचित रहेगा। बता दें कि मार्च महीने में भगवान चारभुजानाथ की शोभायात्रा के दौरान कट्टरपंथियों ने पत्थरबाजी और मारपीट की थी। गाड़ियों और दुकानों को आग के हवाले आकर दिया गया था। 1 व्यक्ति की मौत हो गई थी।

एक देश, 2 हाई कोर्ट… एक ने मुस्लिम के साथ ‘हिंदू लड़की’ को रहने की दी इजाजत, दूसरे को ‘मुस्लिम महिला’ का हिंदू के साथ रहना नहीं था कबूल: जानिए क्या है मामला

कर्नाटक हाई कोर्ट ने हाल ही में एक मामले की सुनवाई करते हुए एक हिन्दू लड़की को मुस्लिम व्यक्ति के साथ रहने की इजाजत दे दी। इससे कुछ दिन पहले इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक मुस्लिम महिला को हिन्दू व्यक्ति के साथ लिव इन रिलेशनशिप में रहने की इजाजत देने से मना कर दिया था।

कर्नाटक हाई कोर्ट ने दायर किए गए इस मामले में हिन्दू लड़की की माँ से उसे पेश करने की याचिका लगाई थी। हिन्दू लड़की के मुस्लिम पति के वकील ने लड़की को कोर्ट के सामने पेश कर दिया था। इसके बाद कोर्ट ने लड़की से उससे बातचीत की।

लड़की ने बताया कि उसने 1 अप्रैल, 2024 को मुस्लिम लड़के के साथ निकाह कर लिया था और अब वह अपने मुस्लिम पति के साथ केरल में रहना चाहती है। उसने कहा कि वह अपने हिन्दू परिवार में वापस नहीं लौटना चाहती। इसके बाद हाई कोर्ट ने उसे मुस्लिम पति के साथ रहने की इजाजत दे दी।

इससे पहले मार्च, 2024 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक मुस्लिम महिला को उसके हिन्दू लिव इन पार्टनर के साथ रहने की अनुमति देने से मना कर दिया था। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने यह निर्णय शरिया के आधार पर दिया था, जिसमें महिला का हिन्दू व्यक्ति के साथ रहना गलत गुनाह था।

याचिका लगाने वाली महिला का निकाह एक मुस्लिम व्यक्ति के साथ हुआ था, जिसने दो साल बाद एक और महिला से निकाह कर लिया था। इसके बाद मुस्लिम महिला अपने माता-पिता के पास रहने चली आई थी। इसके बाद उसका एक हिन्दू व्यक्ति से सम्पर्क हो गया और वह उसके साथ लिव इन रिलेशनशिप में रहने लगी।

महिला ने अपने पूर्व मुस्लिम पति के साथ जाने से मना कर दिया था, महिला का कहना था कि उसका मुस्लिम पति उसे मारता पीटता है। हिन्दू व्यक्ति के साथ रहने के कारण महिला को उसके घरवालों से धमकियाँ मिल रही थीं। उसने अपनी सुरक्षा को लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट के समक्ष एक याचिका लगाई थी।

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई करते हुए महिला को कोई भी राहत देने से इनकार कर दिया। हाई कोर्ट ने कहा कि महिला का पहले निकाह हो गया और उसने तलाक नहीं लिया ऐसे में वह हिन्दू पुरुष के साथ नहीं रह सकती। कोर्ट ने यह भी कहा कि महिला का हिन्दू पुरुष के साथ रहना शरिया के अनुसार हराम है।

कोर्ट ने यह भी कहा कि महिला पर हिन्दू पुरुष के साथ रहने के लिए मुकदमा भी चलाया जा सकता है। हाई कोर्ट ने इसी के साथ मुस्लिम महिला की हिन्दू पुरुष के साथ रहने की याचिका को खारिज कर दिया था और अनुमति नहीं दी थी।