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जिस रामचरितमानस का भारत के ही हिन्दू विरोधियों ने किया अपमान, उसे UNESCO ने अपनी सूची में दिया स्थान: जानिए और किन ग्रंथों को मिली जगह

भारत की सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक विरासत को यूनेस्को की ‘मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड एशिया-पैसिफिक रीजनल रजिस्टर’ में जगह मिली है। भारत के राम चरित मानस, पंचतंत्र और सहृदयलोक-लोकन को इस खास रजिस्टर में शामिल किया गया है। रामचरितमानस’, ‘पंचतंत्र’ और ‘सहृदयलोक-लोकन’ ने भारत के सामाजिक, धार्मिक एवं जीवन दर्शन पर गहरा असर डाला है और भारतीय साहित्य और संस्कृति को गहराई से प्रभावित किया है, देश के नैतिक ताने-बाने और कलात्मक अभिव्यक्तियों को आकार दिया है।

इन साहित्यिक कृतियों ने समय और स्थान से परे जाकर भारत के भीतर और बाहर दोनों जगह पाठकों और कलाकारों पर एक अमिट छाप छोड़ी है। उल्लेखनीय है कि ‘सहृदयालोक-लोकन’, ‘पंचतंत्र’ और ‘रामचरितमानस’ की रचना क्रमशः पं. आचार्य आनंदवर्धन, विष्णु शर्मा और गोस्वामी तुलसीदास ने की थी।

रामचरितमानस : भगवान राम के जीवन चरित- रामचरितमानस को तुलसीदास ने 16वीं शताब्दी में हिंदी भाषा की अवधी बोली में लिखा था। यह रामायण से भिन्न है जिसे ऋषि वाल्मीकि ने संस्कृत भाषा में लिखा था। रामचरितमानस चौपाई रूप में लिखा गया ग्रंथ है। रामकथा को देश दुनिया में प्रसारित करने में रामचरितमानस को सबसे अहम माना जाता है। आज भी रामचरितमानस का पाठ सामूहिक रूप से किया जाता है।

पंचतंत्र की कथाएँ: पंचतंत्र दुनिया की दंतकथाओं के सबसे पुराने संग्रहों में से एक है जो संस्कृत में लिखा गया था। विष्णु शर्मा जो महिलारोप्य के राजा अमर शक्ति के दरबारी विद्वान थे, उन्हें पंचतंत्र का श्रेय दिया जाता है। इसकी रचना संभवतः 300 ईसा पूर्व के आसपास हुई थी। इसका अनुवाद 550 ईसा पूर्व में पहलवी (ईरानी भाषा) में किया गया था।

‘सहृदयालोक-लोकन: ‘सहृदयालोक-लोकन’ की रचना आचार्य आनंदवर्धन ने संस्कृत में की थी। आचार्य आनंदवर्धन,10वीं शताब्दी के उत्तरार्ध और 11वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध के दौरान कश्मीर में रहते थे।

इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए) ने मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड कमेटी फॉर एशिया एंड द पैसिफिक (एमओडब्ल्यूसीएपी) की 10वीं बैठक के दौरान एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उलानबटार में हुई इस सभा में, सदस्य देशों के 38 प्रतिनिधि, 40 पर्यवेक्षकों और नामांकित व्यक्तियों के साथ एकत्र हुए। तीन भारतीय नामांकनों की वकालत करते हुए, आईजीएनसीए ने ‘यूनेस्को की मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड एशिया-पैसिफिक रीजनल रजिस्टर’ में उनका स्थान सुनिश्चित किया।

आईजीएनसीए में कला निधि प्रभाग के डीन (प्रशासन) और विभाग प्रमुख प्रोफेसर रमेश चंद्र गौड़ ने भारत से इन तीन प्रविष्टियों- राम चरित मानस, पंचतंत्र और सहृदयालोक-लोकन को सफलतापूर्वक प्रस्तुत किया। प्रो. गौर ने उलानबटार सम्मेलन में नामाँकनों का प्रभावी ढंग से समर्थन किया। यह उपलब्धि भारत की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने और बढ़ावा देने के लिए आईजीएनसीए के समर्पण को प्रदर्शित करती है, साथ ही वैश्विक सांस्कृतिक संरक्षण और भारत की साहित्यिक विरासत की उन्नति के प्रति अपनी प्रतिबद्धता की पुष्टि करती है।

बता दें कि यूनेस्को की मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड एशिया-पैसिफिक रीजनल रजिस्टर के बारे में 2008 में ही सहमति बना ली गई थी, लेकिन पहली बार इसके लिए नामाँकन जमा किए गए। गहन विचार-विमर्श से गुजरने और रजिस्टर उपसमिति (आरएससी) से सिफारिशें प्राप्त करने और बाद में सदस्य देशों के प्रतिनिधियों द्वारा मतदान के बाद, सभी तीन नामांकनों को शामिल किया गया, जिससे 2008 में रजिस्टर की स्थापना से पहले की महत्वपूर्ण भारतीय प्रविष्टियों को चिह्नित किया गया

डीडी न्यूज के पत्रकार ने कॉन्ग्रेस की हिन्दू घृणा का किया खुलासा, तुरंत बचाने कूद पड़ा जुबैर: फैक्टचेक में साबित हुआ झूठा, बहस से पहले ही भाग चुका

स्वघोषित फैक्ट चेकर और ऑल्टन्यूज का फाउंडर मोहम्मद जुबैर लगातार खुद का ही स्तर गिराता जा रहा है। कॉन्ग्रेस-वामपंथी विचारधारा का समर्थन ना करने वालों के फैक्ट चेक करने के चक्कर में जुबैर ने एक बार और खुद को झूठा और मूर्ख सिद्ध कर दिया है। इस बार उसने डीडी न्यूज के पत्रकार अशोक श्रीवास्तव के एक खुलासे का फैक्टचेक करने का दावा किया।

मंगलवार (14 मई, 2024) को डीडी न्यूज के वरिष्ठ पत्रकार अशोक श्रीवास्तव ने बताया कि कॉन्ग्रेस के राज में हिन्दू प्रतीकों से किस तरह की घृणा थी। एक वीडियो में उन्होंने बताया, “जब UPA की सरकार थी, तब मुझे एक दिन आला अफसरों ने बुलाया। मैं अपनी पहचान के तौर पर कलावा बाँध कर रखता हूँ, UPA सरकार के दौरान कहा गया कि आप जो कलावा पहनते हैं, वह स्क्रीन पर नहीं दिखना चाहिए।” अशोक श्रीवास्तव ने बताया कि यह घटना 2006 के आसपास की है।

अशोक श्रीवास्तव की यह बताते हुए क्लिप आनंद रंगनाथ ने एक्स (ट्विटर) पर शेयर की। उन्होंने जैसे ही यह क्लिप डाली, जुबैर तुरंत कॉन्ग्रेस को बचाने के लिए उस पर कूद गया और इसे फैक्ट चेक करने का प्रयास किया। उसने अशोक श्रीवास्तव की बात पर प्रश्न चिन्ह खड़े करने के लिए उनकी एक पुरानी वीडियो निकाली, इसमें श्रीवास्तव कलावा पहने हुए दिखते हैं।

जुबैर द्वारा शेयर की गई यह तस्वीर 2013 की है। इसमें अशोक श्रीवास्तव एक कार्यक्रम को डीडी न्यूज पर होस्ट कर रहे हैं और उन्होंने कलावा पहना हुआ है। यह दिखा कर जुबैर ने यह सिद्ध करना चाहा कि कॉन्ग्रेस के राज में डीडी न्यूज पर कलावा दिखाने को लेकर अशोक श्रीवास्तव से कुछ नहीं कहा गया था और वह झूठ बोल रहे हैं। जुबैर ने लिखा, “यदि आप झूठ बोलते हैं तो ऐसा झूठ बोलें कि आप आसानी से पकड़े ना जाएँ।”

इस फैक्ट चेक से अशोक श्रीवास्तव की बात तो झूठी नहीं सिद्ध हुई परन्तु जुबैर की कॉन्ग्रेस वंदना और मूर्खता जरूर सामने आ गई। जुबैर ने दावा किया कि अशोक श्रीवास्तव झूठ बोल रहे हैं क्योकि 2013 में भी उन्होंने कलावा पहना हुआ था। दरअसल, अशोक श्रीवास्तव ने अपने वीडियो में कहीं भी यह नहीं कहा कि उन्होंने कलावा पहनना डीडी न्यूज के अधिकारियों के कहने के बाद छोड़ दिया था। उन्होंने सिर्फ यह बताया कि उसने कलावा स्क्रीन पर ना दिखाने को कहा गया था।

दूसरी बात यह है कि जुबैर ने जो तस्वीर शेयर की, वह 2013 की है। इसके उलट कॉन्ग्रेस सरकार के इस मौखिक आदेश की बात अशोक श्रीवास्तव ने 2006 के आसपास की बताई है। ऐसे में जुबैर किसी बात को झूठ तो नहीं साबित कर सका, लेकिन खुद को जरूर मूर्ख साबित कर गया।

जुबैर के इस असफल फैक्ट चेक के बाद अशोक श्रीवास्तव ने उसकी कलई खोल दी। पहले उन्होंने जुबैर को उनके साथ डिबेट के लिए चुनौती दी, लेकिन फिर उन्होंने बताया कि उसके पिछले रिकॉर्ड को देखते हुए, जुबैर उनसे डिबेट नहीं करेगा।

अशोक श्रीवास्तव ने बताया कि कैसे उन्होंने 2021 में गाजियाबाद के लोनी की घटना के बारे में झूठी खबर फैलाने के बाद जुबैर को अपने कार्यक्रम ‘दो टूक’ पर बहस के लिए किया था। श्रीवास्तव ने बताया कि उस समय जुबैर ने कोई जवाब नहीं दिया था।

श्रीवास्तव ने 2021 में जुबैर को भेजे गए व्हाट्सएप मैसेज का एक स्क्रीनशॉट भी अपलोड किया, जिसमें उन्हें डिबेट के लिए बुलाया गया था। यह डिबेट जुबैर के उस ट्वीट के बारे में थी, जिसमें उसने दावा किया था कि गाजियाबाद के लोनी में एक बूढ़े मुस्लिम व्यक्ति को जय श्री राम नहीं बोलने पर पीटा गया था।

जुबैर ने इस मामले को लेकर धार्मिक तनाव फ़ैलाने की कोशिश की थी और इसमें उसका सहयोग लिबरल वामपंथी गैंग ने भी दिया था। हालाँकि, यह मामला निजी दुश्मनी का था और उत्तर प्रदेश पुलिस ने इस मामले में FIR भी दर्ज की थी।

जिस सरकारी लॉ कॉलेज की लाइब्रेरी में थीं हिंदू विरोधी किताबें, उसके प्रिंसिपल इनामुर्रहमान पर दर्ज FIR सुप्रीम कोर्ट ने रद्द की: जानिए क्या-क्या थे आरोप

सु्प्रीम कोर्ट ने मंगलवार (14 मई 2024) को इंदौर के न्यू गवर्नमेंट लॉ कॉलेज के प्रिंसिपल प्रोफेसर इनामुर्रहमान के खिलाफ दर्ज FIR को रद्द कर दिया। यह FIR कॉलेज की लाइब्रेरी में मिलीं कथित हिंदूफोबिक, भारत विरोधी और लव जिहाद को बढ़ावा देने वाली किताबों से संबंधित था। बता दें कि इनामुर्रहमान इस महीने के आखिर में रिटायर होने वाले हैं।

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि FIR में लगाए गए आरोप बेतुके हैं, क्योंकि जिन किताबों की बात हो रही है वे सुप्रीम कोर्ट की लाइब्रेरी में भी मिल सकती हैं। अदालत ने इस बात पर अफसोस जताया कि सरकार आरोपित प्रोफेसर इनामुर्रहमान को प्रताड़ित करने के लिए इतना उत्सुक क्यों है।

सुनवाई के दौरान अपीलकर्ता के वकील ने बताया कि प्रोफेसर जल्द ही सेवानिवृत्त होने वाले थे। वहीं, मध्य प्रदेश सरकार के वकील ने अंतरिम राहत का विरोध किया और कहा कि उच्च न्यायालय के समक्ष सीआरपीसी की धारा 482 की कार्यवाई में तेजी लाई जा सकती है, क्योंकि आरोप गंभीर हैं।

हालाँकि, शीर्ष न्यायालय ने आदेश में कहा, “एकल न्यायाधीश (हाई कोर्ट के) 482 के तहत अपने अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करने में विफल रहे हैं। छुट्टी दे दी गई है। एफआईआर एक बेतुकेपन के अलावा और कुछ नहीं है। इसलिए हम अपील की अनुमति देते हैं और एफआईआर को रद्द कर देते हैं।” बता दें कि दिसंबर 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने प्रोफेसर की गिरफ्तारी पर रोक लगा दी थी।

दरअसल, शीर्ष अदालत मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के उस आदेश को चुनौती देने वाली इनामुर्रहमान की अपील पर सुनवाई कर रही थी, जिसने एफआईआर पर अंतरिम रोक लगाने से इनकार कर दिया था। इसके साथ ही हाई कोर्ट ने मामले को रद्द करने के लिए प्रोफेसर द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई दस सप्ताह के लिए स्थगित कर दी थी।

दरअसल, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) से जुड़े कॉलेज के छात्रों की शिकायत पर रहमान के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की विभिन्न धाराओं के तहत समुदायों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा देने और अन्य अपराधों के लिए FIR दर्ज की गई थी। आरोपों के कारण फैकल्टी का निलंबन, प्रोफेसर इनामुर्रहमान का इस्तीफा और पुलिस केस दर्ज किया गया।

क्या है मामला?

महाविद्यालय के ABVP अध्यक्ष दीपेंद्र सिंह ठाकुर ने 1 दिसंबर 2022 को महाविद्यालय के प्राचार्य इनामुर्रहमान को अमीक खोखर, मिर्जा मोजीज बेग, फिरोज अहमद मीर, सुहैल अहमद वानी, मिलिंद कुमार गौतम और पूर्णिमा बिसे के खिलाफ शिकायत सौंपी थी। इसमें प्रोफेसर्स पर मजहबी कट्टरता फैलाने, लव जिहाद को बढ़ावा देने और देश एवं सेना विरोधी दुष्प्रचार को बढ़ावा के आरोप लगाए गए थे।

एबीवीपी का आरोप था कि छात्रों के अलग-अलग मैसेजिंग ग्रुप बनाए गए हैं, जिनका इस्तेमाल नफरत फैलाने वाले संदेशों को आगे बढ़ाने के लिए किया जाता है। उनका यह भी आरोप था कि शिक्षक कॉलेज के नए छात्र-छात्राओं के बीच मजहबी कट्टरता को बढ़ावा देते हैं। उनके मन में भारत की सरकार तथा सेना को लेकर नकारात्मक विचार डालते हैं।

शिकायत में यह आरोप भी लगाया गया था कि हर शुक्रवार को कॉलेज के प्राचार्य, मुस्लिम शिक्षक और मुस्लिम छात्र-छात्राएँ मस्जिद में नमाज पढ़ने जाते हैं। इस वक्त कक्षाएँ नहीं लगती हैं। परिसर में मांस खाने का आरोप भी लगाया गया था। शिकायत के अनुसार, कुछ शिक्षक इंटरनल मार्क्स का हवाला देकर छात्राओं को बाहर चलने और अकेले में कैफे में मिलने के लिए दबाव डालते थे। 

प्रोफेसर ने हिंदू लड़कियों पर रखते हैं गंदी नजर

कॉलेज की एक छात्रा ने बताया था, “हमारे एक प्रोफेसर हैं अमीक सर, वो लड़कियों को अपने साथ मूवीज, पब, डिस्को और कैफे ले जाते हैं। सर उन्हें लेट नाइट मैसेज करते हैं, लव ईमोजी भेजते हैं। उनका बिहेवियर लड़कियों को आकर्षित करने वाला रहता है। यहाँ पर सबसे ज्यादा लव जिहाद को बढ़ावा मिल रहा है। हमारी क्लास में भी ऐसे बच्चे हैं जो इसे बढ़ावा दे रहे हैं।”

छात्रा ने बताया था कि कॉलेज के ही एक मिर्जा सर हैं, जो सरकार की नई शिक्षा नीति का विरोध कर रहे हैं। छात्रा का कहना है कि वे छात्रों को इसके विरोध के लिए उकसाते हैं और उनसे कागज पर इसके विरोध में हस्ताक्षर ले रहे हैं।

एक अन्य छात्रा ने कहा था, “कॉलेज की कई स्टूडेंट ऐसी हैं, जो सर के साथ कैफे, पब और मूवी देखने बाहर जाती हैं। सोशल मीडिया पर स्टोरी भी अपलोड की गई हैं। टीचर पढ़ाने की जगह लड़कियों को क्लब और पब लेकर जाते हैं। इंटरनल मार्क्स का हवाला देकर छात्राओं पर दबाव डाला जाता है।”

हिंदू लड़कियों को किया जाता है टारगेट

दैनिक भास्कर को नाम नहीं छापने की शर्त पर कॉलेज की छात्राओं से बातचीत की थी। छात्राओं ने बताया कि क्लास में मुस्लिम लड़के हिंदू लड़कियों को टारगेट करते हैं। फर्स्ट और सेकंड सेमेस्टर में हिंदू लड़कियों को लव जिहाद में फँसाने का काम होता है और इसमें मुस्लिम लड़कियाँ मददगार बनती हैं।

लड़कियों ने बताया था कि मुस्लिम लड़कियाँ नई आईं इन हिंदू लड़कियों को मुस्लिम लड़कों से परिचय करवाती हैं। बाद में दोनों के बीच फोन नंबर आदान-प्रदान होता है और बातचीत होने लगती है। बाहर से पढ़ने के लिए इंदौर आई हिंदू लड़कियाँ इनका सॉफ्ट टारगेट होती हैं।

हॉस्टल में रहने वाली एक लड़की ने बताया था कि उसे एक लड़के ने परेशान करके रखा है। लड़के का कहना था कि उससे या सर से कमिटेड होना पड़ेगा। अपना धर्म बदल लो और निकाह कर लो। कॉलेज की छात्राओं ने बताया कि जिन लड़कियों से मुस्लिम लड़कों की दोस्ती हो जाती है, वे उन्हें बाहर घुमाने ले जाते हैं।

लड़कियों का कहना था कि अगर कोई छात्रा इसकी शिकायत कॉलेज प्रशासन से करती है तो उसे परेशान किया जाता है। यहाँ तक कि कॉलेज के इंटरनल परीक्षा में कम नंबर दिए जाते हैं। इससे डर कर लड़कियाँ चुप रहती हैं। वहीं, हिंदू टीचर भी नौकरी के चक्कर में आवाज नहीं उठाते हैं।

कॉलेज छात्र संघ के अध्यक्ष अभाविप के दीपेन्द्र सिंह ठाकुर ने कहा था कि इतिहास में जब मुगलों के बारे में पढ़ाने की बात आती है तो वे उनका महिमामंडन करते हैं। बढ़ा-चढ़ाकर पेश करते हैं। वहीं, हिन्दू राजाओं के बारे में बात करते समय उनकी उपलब्धियों की चर्चा भी नहीं करते हैं।

वहीं, ABVP के प्रांत मंत्री घनश्याम सिंह चौहान का कहना था कि परिसर में धार्मिक कट्टरता फैलाने को लेकर प्राचार्य को पहले मौखिक शिकायत दी गई थी, लेकिन उन्होंने कोई एक्शन नहीं लिया। छात्राओं पर पब और कैफे जाने के लिए शिक्षकों द्वारा दबाव बनाया जाता है। खुद छात्राओं ने प्राचार्य को इसकी जानकारी दी थी।

लाइब्रेरी में हिंदू विरोधी किताबें

कॉलेज के छात्रों का यह भी आरोप था कि लाइब्रेरी में ऐसी किताबें रखी गई हैं, जिनमें हिंदुओं के खिलाफ आपत्तिजनक बातें लिखी हुई हैं। किताब में लिखा है- हिंदू मुख्य आतंकवादी हैं। इसके साथ ही जम्मू-कश्मीर में धारा-370 को सही बताते हुए विश्व हिंदू परिषद और RSS को लेकर विवादास्पद बातें लिखी गई हैं।

छात्रों का कहना था कि डॉक्टर फरहत खान के नाम से लिखी गई इन किताबों को लाइब्रेरी में किसके कहने पर रखा गया, इसकी जाँच होनी चाहिए। इसके साथ ही छात्रों ने लेखिका, प्राचार्य, प्रोफेसर डॉ. मिर्जा मोईज, प्रो. सुहैल अहमद वानी और प्रो. अमीक खोखर के खिलाफ भँवरकुआ थाने में शिकायत दी थी और सबूत के तौर पर किताबों को भी पेश किया था।

इतना ही नहीं, इस लॉ कॉलेज में हिंदू लड़कियों को भी टारगेट कर लव जिहाद में फँसाने की बात कही गई थी। छात्रों ने कॉलेज परिसर में अनुशासनहीनता और धार्मिक कट्टरता फैलाने को लेकर प्रिंसिपल डॉ. इनामुर्रहमान से शिकायत की थी। मामला बढ़ने के बाद कॉलेज के 6 प्रोफेसरों को 5 दिन के लिए छुट्टी पर भेज दिया गया था और मामले की जाँच के लिए एक समिति गठित की गई थी।

क्या लिखा है किताब में

फरहत खान द्वारा लिखित ‘सामूहिक हिंसा एवं दाण्डिक न्याय पद्धति’ में कई सारी कट्टरता वाली बातें लिखी गई हैं। उसमें लिखा गया है, “पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान, बर्मा में सांप्रदायिकता का संघर्ष नहीं है। शासन तो वहाँ भी सैकड़ों वर्ष अंग्रेजों का रहा था और अमेरिका का हस्तक्षेप आज भी इनकी सत्ता पर रहता है। आज सारे हिंदू संगठन एक स्वर से मुसलमानों के कश्मीर में धारा 370 लगाकर विशेष सुविधाएँ देने का विरोध यह कहकर करते हैं कि कश्मीर में उग्रवाद धारा 370 के कारण ही पनप रहा है।”

किताब में आगे लिखा है, “यदि इनसे पूछा जाए कि पंजाब में उग्रवाद क्यों है, बिहार, उत्तर प्रदेश, असम में जहाँ हिंदू उग्रवाद है, वहाँ भी धारा 370 नहीं लगी है। हिंदू कहते हैं कि समान नागरिक संहिता की बात कहकर हम मुसलमानों के कानून में सुधार करना चाहते हैं, जो नारी के विरुद्ध है। यदि उनसे पूछा जाए कि आप अपने व्यक्तिगत कानून को और भी शास्त्रों के कानून को क्यों लागू करना चाहते हैं, जो शूद्र स्त्री और गैर हिंदुओं के विरुद्ध है। पहले हिंदुओं को अपने सिविल कोड में सुधार की बात करनी चाहिए।”

किताब में और आगे लिखा है, “उपरोक्त संक्षिप्त विवरण में हमने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसकी परिवार की संस्थाओं के क्रियाकलाप पर प्रकाश डाला। हिंदुओं के जितने भी सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक संगठन बने हैं। उनका एक मात्र उद्देश्य देश के मुसलमानों का विनाश करना है और शूद्रों को दास बनाना है। हिंदू पद पादशाही कायम करना है और हिंदू राजतंत्र का शासन वापस लाकर ब्राह्मण को पृथ्वी का देवता बनाकर पूज्य बनाना है।”

फरहत ने अपनी किताब में विश्व हिंदू परिषद को टारगेट करते हुए लिखा है, “विश्व हिंदू परिषद जैसे संगठन हिंदू बहुमत का राज्य स्थापित करना चाहते हैं। दूसरे समुदायों को शक्तिहीन बनाकर गुलाम बनाना चाहते हैं। पंजाब में सिखों के खिलाफ शिवसेना जैसे त्रिशूलधारी नए संगठनों ने मोर्चा बना लिया है। अपनी सांप्रदायिक गतिविधियों को मंदिरों और अन्य धार्मिक स्थलों से संचालित करने लगे हैं। शिवसेना हिंदू राष्ट्र का नारा दे रही है, जो पूरे सिख समाज के विरुद्ध हैं।”

झूठे प्रोपेगेेंडा को बढ़ाते हुए इसमें आगे कहा गया है, “अब शिवसेना के नौजवान सिखों के घरों में डकैती और अनजानी घटनाएँ कर रहे हैं। यहाँ तक कि निर्दोष सिखों की हत्याएँ भी कर रहे हैं। हिंदू शिव सेना के लोगों ने बैंक में डकैतियाँ भी डाली हैं। पंजाब में जो कुछ हो रहा है, पंजाबी और उर्दू अखबार ही सही लिखते हैं और हिंदी अखबार झूठ। पंजाब का सच आज यह है कि मुख्य आंतकवादी हिंदू हैं और सिख प्रतिक्रिया में आतंकवादी बन रहा है।”

छात्रों का कहना है कि इन किताबों को पढ़ने के लिए उन पर दबाव बनाया जाता है। अगर परीक्षा में उन किताबों का रेफरेंस देकर उत्तर नहीं लिखा जाता है तो नंबर काट लिए जाते हैं और उन्हें पास नहीं होने दिया जाता है। छात्रों का आरोप है कि कॉलेज के तार कई राष्ट्र विरोधी संगठनों से जोड़कर षड्यंत्रकारी छात्रों का ब्रेनवॉश किया जा रहा है। संगठनों में आगे की ट्रेनिंग लेने के लिए भी यहाँ के छात्रों को उकसाया जा रहा है।

गिरफ्तारी का लिखित आधार नहीं, छोड़ दीजिए: सुप्रीम कोर्ट से ‘टेक्निकल ग्राउंड’ पर NewsClick वाले प्रबीर पुरकायस्थ को राहत, चीन से पैसा लेकर करता था भारत विरोधी दुष्प्रचार

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (15 मई 2024) को वामपंथी प्रोपेगेंडा वेबसाइट न्यूज़क्लिक के संस्थापक एवं प्रधान संपादक प्रबीर पुरकायस्थ को बड़ी राहत है। हालाँकि, यह राहत तात्कालिक ही है। शीर्ष अदालत ने दिल्ली पुलिस द्वारा गिरफ्तारी और गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम 1967 (UAPA) के तहत एक मामले में उनकी रिमांड को अवैध घोषित कर दिया।

सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि न्यूज़क्लिक के संस्थापक प्रबीर पुरकायस्थ की गिरफ़्तारी और उसके बाद रिमांड अवैध थी। सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि रिमांड से पहले उन्हें या उनके वकील को गिरफ्तारी के आधार नहीं बताए गए थे। इतना ही नहीं, पुरकायस्थ के वकील को रिमांड आवेदन की कॉपी भी नहीं दी गई थी।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 4 अक्टूबर 2023 को रिमांड आदेश पारित करने से पहले प्रबीर पुरकायस्थ या उनके वकील को रिमांड आवेदन की कॉपी भी नहीं की गई थी। इसका मतलब यह था कि गिरफ्तारी का आधार उन्हें लिखित रूप में नहीं दिया गया था। दिल्ली पुलिस की जिम्मेदारी थी कि गिरफ्तारी के आधार को लिखित रूप में दे।

न्यायालय ने कहा कि 4 अक्टूबर, 2023 को रिमांड आदेश पारित करना से पहले इसकी कॉपी अपीलकर्ता को नहीं दी गई। नतीजतन, अपीलकर्ता इस अदालत द्वारा पंकज बंसल के मामले में दिए गए फैसले को लागू करके हिरासत से रिहाई के निर्देश का हकदार है। इसके बाद कोर्ट ने पुरकायस्थ को रिहाई का आदेश दे दिया।

हालाँकि, अदालत ने आदेश दिया कि रिहाई ट्रायल कोर्ट की संतुष्टि के अनुसार जमानत और बांड प्रस्तुत करने के अधीन होगी, क्योंकि आरोप पत्र दायर किया गया है। सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति बीआर गवई और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की खंडपीठ ने 30 अप्रैल 2024 को बहस पूरी करने के बाद फैसला सुनाया।

बता दें कि प्रबीर पुरकायस्थ चीन से धन लेकर राष्ट्र विरोधी दुष्प्रचार करने के आरोप में गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के तहत 3 अक्टूबर 2023 से हिरासत में थे। कोर्ट में पुरकायस्थ की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल पेश हुए। वहीं, दिल्ली पुलिस की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू पेश हुए।

प्रबीर पुरकायस्थ ने अपनी गिरफ्तारी की वैधता को चुनौती देते हुए अदालत का दरवाजा खटखटाया था। उन्होंने दलील दी कि पंकज बंसल मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार गिरफ्तारी के आधार उन्हें लिखित रूप में नहीं दिए गए थे। दिल्ली पुलिस ने तर्क दिया कि गिरफ्तारी का आधार रिमांड आवेदन में शामिल थे।

अपनी उम्र के बराबर भी रैली नहीं कर पाए हैं राहुल गाँधी, 73 के मोदी 60 दिन में कर चुके हैं 119 रैली-16 रोड शो… यूँ ही हैट्रिक की दहलीज पर नहीं खड़ी है BJP

देश में लोकसभा चुनाव समापन की और हैं। सात में से चार चरणों पर मतदान हो चुका है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सत्ता में लौटने के लिए लगातार मेहनत कर रहे हैं। जनसभाओं से लेकर रोडशो और पार्टी कार्यक्रमों से लेकर मीडिया से बातचीत तक पीएम मोदी सुबह से शाम तक इस बात को पक्का करने में जुटे हैं कि उनकी पार्टी की सत्ता बरकरार रहे। पीएम मोदी के सामने विपक्ष है, जिसने इस बार खुद को INDI गठबंधन का नाम दिया है।

इस गठबंधन की सबसे बड़ी पार्टी कॉन्ग्रेस के नेता राहुल गाँधी इस चुनाव में उतनी मेहनत नहीं कर रहे जितना कोई पार्टी सत्ता में आने के लिए करती है। राहुल गाँधी को लगातार प्रधानमंत्री मोदी के सामने खड़ा किया जाता है, उनकी पीएम से तुलना की जाती है। लेकिन अगर लोकसभा चुनाव 2024 को ही देख लिया जाए, तो साफ़ हो जाता है कि जहाँ पीएम मोदी लगातार मेहनत कर रहे हैं, वहीं राहुल गाँधी इससे बचते आए हैं। वह ना ही उस स्तर का चुनाव अभियान चला रहे हैं और ना ही मीडिया के बीच दिख रहे हैं।

देश की दो सबसे बड़ी पार्टियों की आज जो राजनीतिक स्थिति है, वह क्यों है, अगर हमें इसे समझना हो, तो हमें वर्तमान आम चुनावों में दोनों नेताओं द्वारा की गई मेहनत पर नजर डालनी होगी। इससे साफ़ हो जाएगा कि देश के ग्रैंड ओल्ड पार्टी कॉन्ग्रेस, विपक्ष तक का तमगा हासिल करने में सफल क्यों नहीं हो रही और 1980 में बनी भाजपा 2 सीटों से बढ़कर केंद्र में लगातार 10 वर्ष सत्ता और देश के 18 राज्यों में सत्ता में क्यों है।

पीएम मोदी: 100 से ज्यादा रैली, रोड शो और पार्टी सम्बन्धित बैठकें

2024 के लोकसभा चुनावों की घोषणा देश के चुनाव आयोग ने 16 मार्च, 2024 को की थी। वैसे तो प्रधानमंत्री हमेशा ही राजनीति को गंभीर मान कर पार्टी को बढ़ाने में जुटे रहते हैं लेकिन चुनावों से एक दिन पहले ही उन्होंने धुआंधार चुनाव अभियान चालू कर दिया था, जो कि अब तक जारी है। 15 मार्च, 2024 से लेकर 14 मई, 2024 तक देखा जाए तो पीएम मोदी अब तक 119 जनसभाओं को संबोधित कर चुके हैं। उन्होंने एक-एक दिन में 4-5 जनसभाओं को संबोधित किया है और पार्टी के लिए वोट माँगे हैं।

प्रधानमंत्री मोदी की यह जनसभाएँ जम्मू कश्मीर के उधमपुर से लेकर देश के अंतिम छोर कन्याकुमारी तक में हुई हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने इस दौरान अपनी पार्टी भाजपा समेत गठबंधन के दलों के लिए भी वोट माँगे हैं। इन जनसभाओं के दौरान पीएम मोदी ने अपनी सरकार की उपलब्धियों को बताने के अलावा कॉन्ग्रेस और विपक्षी दलों की नीतियों और इरादों के प्रति आगाह किया है। पीएम मोदी की इन जनसभाओं में भारी भीड़ भी देखने को मिली है। पीएम मोदी का विशेष फोकस इस बार दक्षिण भारत पर भी रहा है।

जनसभाओं के अलावा पीएम मोदी ने 15 मार्च के बाद 16 शहरों में रोड शो किए हैं। लोकसभा प्रत्याशियों के साथ किए गए इन रोड शो में उन्होंने जनता से भाजपा को वोट देने की अपील की है। इन रोड शो में भी भारी भीड़ उमड़ी है। जनता ने इस दौरान पीएम मोदी पर फूल बरसाए हैं। इसके अलावा पीएम मोदी ने 9 पार्टी सम्बन्धित कार्यक्रमों में भी हिस्सा लिया है। इस दौरान दौरान उन्होंने पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ चुनावी रणनीति पर बात की है और पार्टी का मेनिफेस्टो सामने रखा है।

मीडिया को 30 से अधिक इंटरव्यू, छोटे से लेकर बड़े अखबार तक बातचीत

देश का विपक्ष और विशेष कर लिबरल वामपंथी यह आरोप लगाते रहे हैं कि 2014 में सत्ता में आने के बाद से पीएम मोदी मीडिया से दूरी रखते आए हैं। ऐसा कोई आरोप वह राहुल गाँधी पर नहीं लगाते जबकि कॉन्ग्रेस पार्टी के कई बड़े नेताओं ने इसी आधार पर पार्टी छोड़ी कि उसने उनके नेता बातचीत नहीं करते। पीएम मोदी ने 2024 लोकसभा चुनावों में भी मीडिया से काफी बातचीत की है। उन्होंने राष्ट्रीय से लेकर क्षेत्रीय और यहाँ तक कि स्थानीय अखबारों, समाचार चैनल को इंटरव्यू दिए हैं।

पीएम मोदी ने देश की बड़ी समाचार एजेंसी ANI से लेकर गुजरात के स्थानीय समाचार पत्र ‘संदेश’ तक से बातचीत की है। यही नहीं पीएम मोदी ने इस दौरान देश की विविधता का ध्यान रखते हुए अपने पहले इंटरव्यू को तमिल चैनल थांती टीवी को दिया था। पीएम मोदी अब तक कुल 35 इंटरव्यू दे चुके हैं।

पीएम मोदी देश के उत्तर पूर्व, बांग्ला, मलयालम, अंग्रेजी और अधिकांश बड़े प्रकाशनों से बातचीत कर चुके हैं। इनमें उन्होंने कई मुद्दों पर अपनी बात खुल कर रखी है। पीएम मोदी ने हाल ही में पटना रोड शो के दौरान मीडिया से फिर बातचीत की थी जहाँ उनसे कई प्रश्न पूछे गए। चूंकि देश का लिबरल गैंग राहुल गाँधी को पीएम मोदी से राहुल गाँधी की तुलना करता है, इसलिए दोनों की चुनावी मेहनत की भी तुलना होनी चाहिए।

राहुल गाँधी: 50 से भी कम जनसभाएँ, 1 रोड शो, मीडिया पर सन्नाटा

राहुल गाँधी ने लोकसभा चुनाव की घोषणा के दौरान भारत जोड़ो न्याय यात्रा निकाल रहे थे। उनकी यात्रा का समापन 17 मार्च, 2024 को मुम्बई में हुआ था। तब उन्होंने यहाँ एक रैली की थी। 17 मार्च, 2024 के बाद से 14 मई, 2024 तक राहुल गाँधी ने पूरे देश में केवल 48 रैली की हैं। उन्होंने इस दौरान लंबा समय अपने ही लोकसभा क्षेत्र वायनाड में गुजारा है।

राहुल गाँधी ने अपनी पार्टी के किसी प्रत्याशी के लिए रोड शो नहीं किया है। उन्होंने इस पूरे चुनाव अभियान के दौरान केवल 1 रोड शो किया है, जो कि वायनाड में था, जहाँ से वह खुद प्रत्याशी हैं। रायबरेली में भी उनके चुनाव प्रचार का जिम्मा बहन प्रियंका गाँधी ने उठाया हुआ है। उन्होंने चुनाव अभियान के दौरान पार्टी के कार्यकर्ताओं के लिए विशेष रूप से आयोजित किसी भी कार्यक्रम में हिस्सा नहीं लिया है। इस दौरान वह मीडिया से भी दूर रहे हैं।

राहुल गाँधी लगातार आरोप लगाते हैं कि प्रधानमंत्री मोदी मीडिया से दूरी रखते हैं। इस नैरेटिव को कॉन्ग्रेस ने खूब खाद -पानी दिया है। जबकि सच्चाई इससे कोसों दूर है। राहुल गाँधी ने वर्तमान लोकसभा चुनावों की घोषणा के बाद से किसी भी राष्ट्रीय मीडिया संस्थान से बातचीत नहीं की है। उन्होंने ना ही किसी टीवी चैनल को इंटरव्यू दिया है। यहाँ तक कि उनके लिए दिन रात राशन-पानी लेकर जुटे रहने वाले यूट्यूबर पत्रकारों को भी उन्होंने इंटरव्यू देने लायक नहीं समझा है।

गंभीर राजनेता नहीं राहुल गाँधी

राहुल गाँधी का चुनावों के समय भी मेहनत से बचना दिखाता है कि वह गंभीर राजनेता नहीं हैं। वह राजनीति को पार्ट टाइम का काम समझते हैं। इसके उलट प्रधानमंत्री चुनाव ना होने के समय भी लगातार देश के अलग अलग हिस्सों में जाते हैं। पार्टी को मजबूत करने के कामों में हिस्सा लेते हैं। यह भी देखा गया है कि राहुल गाँधी तमाम महत्वपूर्ण मौकों पर विदेश चले जाते हैं, वह संसद में भी अहम् मुद्दों पर बहस के लिए उपलब्ध नहीं रहते।

राहुल गाँधी की संसद में 51% उपस्थित रही है जो कि देश के औसत 79% से कम है। उनकी संसद की प्रमुख बहसों में भागीदारी मात्र 8 की रही है जबकि इसका भी देश का औसत 46.7 है। विपक्ष का काम जनता के हित से जुड़े सवाल सरकार से पूछना होता है। संसद इसके लिए सबसे अच्छा माध्यम होती है। राहुल गाँधी ने एक सांसद के तौर पर मात्र 99 प्रश्न पूछे हैं, यह भी राष्ट्रीय औसत 210 से कहीं कम है।

विदेश दौरे करने, मीडिया से भागने और संसद में उपलब्ध ना रहने के बाद भी राहुल गाँधी आरोप लगाते हैं कि उनको मीडिया पीएम मोदी से कम जगह देता है। जबकि कोई भी सामान्य पाठक समझ सकता है कि यदि प्रधानमंत्री मोदी एक दिन में पाँच-पाँच रैली संबोधित करते हैं और राहुल गाँधी इस दौरान विदेश का दौरा करते हैं तो स्वाभाविक रूप पीएम को अधिक सुर्ख़ियों में जगह मिलेगी। मीडिया इसी सिद्धांत पर काम करता है, ऐसे में उनका यह आरोप भी झूठ साबित होता है।

फेक वीडियो मामले में मनीष कश्यप कोर्ट से बरी, सबूत पेश नहीं कर पाई पुलिस: बोले यूट्यूबर- पहली बार किसी के खिलाफ 4 मामलों में चला था स्पीडी ट्रायल

मशहूर यूट्यूबर मनीष कश्यप को फेक वीडियो मामले में बड़ी राहत मिली है। उन्हें आर्थिक अपराध शाखा द्वारा दर्ज 4 केस में बाइज्जत रिहा कर दिया गया। मनीष कश्यप के साथ ही प्रशांत कुमार को भी राहत मिली है। ये केस तमिल नाडु फेक वीडियो से जुड़ा था।

इस केस के बारे में मनीष कश्यप ने खुद जानकारी दी है। मनीष कश्यप ने एक्स पर लिखा है, “तामिलनाडु प्रकरण में आर्थिक अपराध इकाई बिहार ने मेरे ऊपर चार केस किया था और उन चारों केस में मैं बाइज़्जत बरी हो गया।। कमाल की बात यह है कि पहली बार बिहार में किसी एक व्यक्ति के चार केस स्पीड ट्रायल में डाले गए और उन चारों केसों में वो व्यक्ति बाइज़्जत बरी हो गया।। मुझे अब किसी से बदला नहीं लेना है बल्कि बदलाव करना है ताकि अगली बार कोई बेवजह झूठे केस में फँसकर जेल ना जाए।”

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, पटना सिविल कोर्ट ने सबूतों के अभाव में मनीष कश्यप समेत अन्य दो लोगों को फर्जी वीडियो मामले में बरी कर दिया है। बताया जा रहा है कि इस केस में 9 लोगों के बयान भी दर्ज किए गए थे, लेकिन पटना सिविल कोर्ट ने मनीष को दोषी नहीं पाया।

बता दें कि मनीष कश्यप पर फर्जी वीडियो को लेकर बिहार पुलिस की आर्थिक अपराध इकाई ने मामला दर्ज किया था। वो कथित वायरल वीडियो तमिलनाडु में बिहार के मजदूरों के साथ मारपीट का था, जो फर्जी पाया गया था। इसी वीडियो को बनाने के बाद मनीष कश्यप बुरी तरह से फँस गए थे। वीडियो के वायरल होने के बाद तमिलनाडु पुलिस ने इसे भ्रामक बताते हुए उनके खिलाफ मामला दर्ज किया था, साथ ही बिहार में भी आर्थिक अपराध शाखा ने केस दर्ज किए थे।

इस मामले में जब पुलिस की ओर से दबिश दी गई तो मनीष कश्यप अंडरग्राउंड हो गए थे। हालाँकि, जब बेतिया पुलिस ने मनीष कश्यप के घर कुर्की शुरू की तो उन्होंने स्थानीय थाने में सरेंडर कर दिया था। नौ महीनों तक जेल में रहे मनीष कश्यप इसके बाद ईओयू ने केस को अपने कब्जे में लेते हुए मनीष कश्यप से पूछताछ की और उन्हें जेल भेज दिया था। इसके बाद तमिलनाडु पुलिस की टीम पटना पहुंची और 30 मार्च 2023 को ट्रांजिट रिमांड पर मनीष को अपने साथ ले गई। इस मामले में करीब नौ महीनों तक मनीष कश्यप जेल में रहे।

साध्वी को दिखाए पोर्न, कर्नल को किया नंगा, मेजर को दी बेटी से रेप की धमकी… क्या हिंदू होना गुनाह?

हिंदू बहुसंख्यक देश में जो हिंदूविरोधी माहौल आज आपको देखने को मिलता है वो एक रात का या कुछ सालों का काम नहीं है। दशकों से कॉन्ग्रेस की सरकार ने इसकी परिपाटी तैयार की है। कॉन्ग्रेस ही वो पार्टी है जिनके सत्ता में रहने के दौरान ‘हिंदू आतंकवाद’ शब्द अस्तित्व में आया और उन्होंने इसे सही साबित करने के लिए निर्दोषों पर अत्याचार की हदें पार कर दीं।

आपको अगर इस बात को और गहराई से समझना है तो साल 2008 में हुआ मालेगाँव ब्लास्ट के बारे में जानना होगा। इस केस को पढ़कर आपको पता चलेगा कि कैसे कॉन्ग्रेस की प्राथमिकताओं में मुस्लिमों को खुश रखना हमेशा सबसे टॉप पर था, वहीं हिंदू उनके लिए कुछ भी नहीं थे।

बात साल 29 सितंबर 2008 की है। मुंबई के मालेगाँव में ब्लास्ट हुआ था। धमाके में 6 लोगों की मौत हुई थी और 100 से ज्यादा लोग घायल हुए थे। तब, केंद्र में यूपीए की मनमोहन सरकार थी। चूँकि ये घटना एक मस्जिद के पास घटी थी इसलिए कॉन्ग्रेस ने इसे खूब भुनाया और जन्म दिया ‘हिंदू आतंकवाद’ की थ्योरी को। उन्होंने जगह-जगह इस शब्द का प्रयोग शुरू किया। सवाल उठे, तो अपनी थ्योरी सही साबित करने के लिए वह ऐसे लोगों को पकड़कर प्रताड़नाएँ देने पर आमादा हो गए, जिनसे उनकी थ्योरी को बल मिले। हालाँकि बाद में उनकी इस कुत्सित प्रयास की पोल दुनिया के आगे खुद उनके ही काल के ब्यूरोक्रेट आरवीएस मणि ने खोली थी।

आरवीएस मणि एक पूर्व नौकरशाह हैं जिन्होंने कॉन्ग्रेस के दौर में गृह मंत्रालय में एक अंडर-सेक्रेटरी के रूप में काम किया था। अपनी पुस्तक ‘हिंदू टेरर’ में, मणि ने संपूर्ण मिलीभगत का वर्णन किया हुआ है। उन्होंने बताया है कि किन-किन खिलाड़ियों ने ‘भगवा आतंक’ की कहानी गढ़ने के लिए मिलीभगत की और कैसे, कई वरिष्ठ कॉन्ग्रेसी नेता से लेकर कई अन्य लोग इस साजिश में शामिल थे।

वहीं, कोर्ट में भी गवाहों ने यह जानकारी दी थी उनके ऊपर हिंदू नेताओं को फँसाने के लिए कहा गया था। ये जानकारी चौंकाने वाली थी। लेकिन जब तक ये सच सामने आया तब तक कॉन्ग्रेस के तुष्टिकरण का शिकार ‘निर्दोष’ हो चुके थे। इनमें एक देश की सेना के कर्नल पुरोहित थे, मेजर रमेश उपाध्याय थे और भगवाधारी साध्वी प्रज्ञा थीं। तीनों का इस्तेमाल कॉन्ग्रेस ने ये फैलाने के लिए किया कि उनकी हिंदू आतंकवाद की थ्योरी एकदम सही है।

आज के समय में जहाँ सेना और संत-समाज से जुड़े लोगों को सम्मान देने का काम होता है, उनके लिए पाकिस्तान तक से देश की ठन जाती है, उसी वर्ग को कॉन्ग्रेस की यूपीए सरकार में कथिततौर पर राज्य (महाराष्ट्र) एटीएस ने असहनीय पीड़ा दी थी। इन्हें शारीरिक, सामाजिक और मानसिक रूप से ऐसी ठेस पहुँचाई थी कि अगर आज इनकी कहानी सुन ली जाए तो आत्मा सिहर जाएगी। जैसे,

  • साध्वी प्रज्ञा की बात करें तो वह कई बार इस मामले में अपना दर्द साझा करके भावुक हो चुकी हैं। वह वो दर्दनाक समय को नहीं भुला पातीं जब जेल के भीतर उन्हें तरह-तरह से प्रताड़ित करने का काम हुआ था। उनके अनुसार, इस केस में हिरासत में लिए जाने के बाद पुरुष कैदियों के साथ रखकर पोर्न वीडियो दिखाए जाते थे और भद्दे सवाल होते थे।

    इसके अलावा कथिततौर पर 4-5 पुलिसकर्मी लगाकर उन्हें मारा जाता था। उनकी पिटाई चमड़े की बेल्ट से होती थी। उनको बिन किसी सबूत के भगवा आतंकी कहा जाता था। उनपर इतने अत्याचार होते थे कि उनकी हालत खुद के पाँव पर चलने लायक नहीं बची थी। उनकी रीढ़ की हड्डी में समस्या आ गई थी और उन्हें वेंटिलेटर पर जाना पड़ा था। इसके अलावा साध्वी प्रज्ञा ने ये भी बताया था कि इन्हीं सबके कारण उन्हें कैंसर और न्यूरो की बीमारी हो गई थी और उनके शरीर में पस पड़ गया था।
  • वहीं मेजर रमेश उपाध्याय ने भी अपने बारे में बताया था कि मालेगाँव ब्लास्ट में कॉन्ग्रेस की यूपीए सरकार ने उनको फँसाया था। हिरासत में लिए जाने के बाद एटीएस उनके साथ बर्बरता करती थी। उन्हें धमकी दी जाती थी कि पत्नी को नंगा घुमाया जाएगा, बेटी का रेप किया जाएगा, बेटे का जबड़ा तोड़ दिया जाएगा। इसके अलावा उनके मकान मालिक तक को उनके खिलाफ भड़काया गया- आतंकी को क्यों रख रहे हों। जिसके कारण उनके परिवार के सिर से छत छिन गई। उनकी शादीशुदा बेटियों के घरों पर दबिश दी गई । हर वो हालात पैदा कर दिए गए कि वो कैसे भी वो जुर्म कबूलें जो उन्होंने किया ही नहीं। प्रशासन उन्हें इस कदर इस मामले में दोषी बनाना चाहता था कि मेजर का नार्को टेस्ट भी कराया। हालाँकि जब उसमें उन्हें क्लीनचिट मिल गई तो ये बर्दाश्त नहीं हुआ और रिपोर्ट को दबा दिया गया।
  • इसी तरह प्रताड़ना की कहानी भारतीय सेना के लेफ्टिनेंट कर्नल श्रीकांत प्रसाद पुरोहित की है। रिपोर्ट्स के अनुसार, मालेगाँव ब्लास्ट केस में राज्य (महाराष्ट्र) एटीएस ने कथिततौर पर कर्नल पुरोहित को फँसाने के बहुत प्रयास किए। ये जानते हुए कि जिस समय ये ब्लास्ट हुआ था, उस वक्त वो अपने मिशन पर थे उन्हें हिरासत में लिया गया और देशद्रोही घोषित करने की कोशिश हुई। बाद में उनपर दबाव बनाया गया कि वो पूछताछ में आरएसएस और वीएचपी नेताओं का जबरन नाम लें ताकि हिंदू आतंकवाद की थ्योरी सही साबित हो सके। जब उन्होंने ऐसा नहीं किया तो उनका पैर तोड़ा गया, उन्हें अवैध रूप से हिरासत में रखा, उन्हें नंगा करके मारा गया, उनके प्राइवेट पार्ट पर हमला किया गया, उन्हें बाल से नोचा और खींचा गया।

… और ये सब इन तीनों के साथ क्यों हुआ… क्योंकि ये तीनों कॉन्ग्रेस की भगवा आतंकवाद की थ्योरी को सही साबित करने के लिए उचित चेहरे थे। 2008 में जहाँ एक तरफ मुस्लिमों को रैलियों के दौरान ये बताकर खुश किया जा रहा था कि मालेगाँव ब्लास्ट को इस्लामी आतंकियों ने अंजाम नहीं दिया है बल्कि हिंदू आतंकवादियों ने दिया है। वहीं दूसरी तरफ, हिंदू नेताओं को पूरे मामले में फँसाने की साजिश चल रही थी।

खुद गवाहों ने इस बात को स्वीकारा था कि उन पर योगी आदित्यनाथ समेत अन्य हिंदू नेताओं का नाम लेने का दबाव था। इसके अलावा जो प्रताड़नाएँ मेजर और कर्नल को दी गई थीं उसका मकसद भी यही था कि ये अपने बयानों में हिंदू नेताओं का नाम ले… लेकिन ये सब होता कैसे? कुछ दिन यूपीए शासन में ये नैरेटिव गढ़ा-बढ़ा। मगर फिर हकीकत सामने आने लगी। केस एनआईए के पास गया, चार्जशीट दाखिल हुई, गवाहों की पेशी हुई और हकीकत खुलती गई। ये भी सामने आया कि ये पूरा नैरेटिव सिर्फ जनता का ध्यान CWG घोटाले से हटाने के लिए किया था। इसी बीच ब्यूरोक्रेट आरवीएस मणि की किताब जनता के बीच आई, जिनसे कॉन्ग्रेस के हिंदूविरोधी चेहरे को शीशे जैसा साफ कर दिया।

मथुरा-काशी के लिए चाहिए 400 पार सीटें: दिल्ली में बोले असम के CM, कहा- बनेंगे भव्य मंदिर, PoK में भी दिखने लगा है तिरंगा

असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने बड़ा दावा किया है। हिमंता बिस्वा सरमा ने कहा कि लोकसभा में एनडीए के 400 पार सीटों के लक्ष्य को प्राप्त करने का मतलब है कि अयोध्या के बाद अब काशी और मथुरा में भव्य मंदिरों का निर्माण किया जाएगा। हिमंता बिस्वा सरमा पूर्वी दिल्ली लोकसभा सीट पर बीजेपी प्रत्याशी हर्ष मल्होत्रा के लिए लक्ष्मी नगर में चुनावी रैली को संबोधित कर रहे थे, जब उन्होंने ये बातें कही।

हिमंता बिस्वा सरमा ने कहा कि लोकसभा चुनाव में जब भाजपा 400 के पार जाएगी तो मथुरा में कृष्ण जन्मभूमि पर भव्य मंदिर बनेगा और काशी में ज्ञानवापी मस्जिद की जगह पर बाबा विश्‍वनाथ का भव्य मंदिर बनेगा। उन्होंने कहा कि मुगलों ने जो-जो कारनामे किए थे, उसमें से अभी बहुत कुछ साफ करना बाकी है। असम के मुख्यमंत्री ने कहा कि भाजपा ने अयोध्या में भव्य राम मंदिर बनाने का अपना वादा पूरा कर दिया है, इसलिए इस बार जीत भी बड़ी होनी चाहिए।

इसके साथ ही उन्होंने कहा है कि पीओक में भी भारत का झंडा दिख रहा है, जबकि कॉन्ग्रेस के शासन में अपने जम्मू-कश्मीर में भी पाकिस्तानी झंडा दिखता था। हिमंता ने कहा कि संसद में पहले कश्मीर की चर्चा नहीं होती थी, लेकिन अब पीओके में भी लोग भारत का झंडा थामे दिख रहे हैं।

दिल्ली के विकास को लेकर आम आदमी पार्टी को घेरा

हिमंता बिस्वा सरमा ने दिल्ली में विकास को लेकर आम आदमी पार्टी को घेरा। हिमंता ने कहा, “पहले दिल्ली आने पर लालकिला और कुतुबमीनार देखने के लिए बोला जाता था और अब मोहल्ला क्लीनिक देखने के लिए कहा जाता है, लेकिन आज जब मोहल्ला क्लीनिक देखने गया तो आश्चर्य हुआ कि अगर दिल्ली की पहचान मोहल्ला क्लीनिक है तो फिर देश का सम्मान कहाँ है? असम में हर जिले में मेडिकल कॉलेज बन रहा है और दिल्ली में जब भाजपा की सरकार आएगी तो मोहल्ला क्लीनिक की बजाय यहां सुपर स्पेशलिस्ट हॉस्पिटल और मेडिकल कॉलेज बनाएँगे।

कॉन्ग्रेस की गोद में बैठ गए केजरीवाल

लक्ष्मी नगर में जनसभा के बाद हिमंता ने मीडिया से भी बातचीत की। उन्होंने कहा, “कभी कॉन्ग्रेस के साथ हाथ नहीं मिलाने की बात कहने वाले केजरीवाल अब कॉन्ग्रेस की गोद मे जाकर बैठ गए हैं और कॉन्ग्रेस के साथ इलू-इलू कर रहे हैं।” केजरीवाल पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा कि परिवारवाद का विरोध करने वाले अरविंद केजरीवाल अब अपनी पत्‍नी को आगे बढ़ाने में लगे हुए हैं। केजरीवाल खुद आलीशान बँगले में रहते हैं। उन्होंने कहा कि केजरीवाल जो भी बोलते हैं, ठीक उसके उल्टा करते हैं और अब वह मानसिक संतुलन खो चुके हैं और जब तक वह ठीक होंगे तब तक दोबारा जेल जाने का समय हो जाएगा।

स्वाति मालीवाल को क्यों पीटा गया? उपराष्ट्रपति से कार्रवाई की माँग

इस दौरान हिमंता बिस्वा सरमा ने राज्यसभा सांसद स्वाति मालीवाल के साथ हुई मार-पीट के लिए केजरीवाल को घेरा। उन्होंने कहा कि राज्यसभा के सभापति एवं उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ जी को स्वतः संज्ञान लेकर दिल्ली के सीएम के खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि सुनीता केजरीवाल को भी यह बताना चाहिए कि स्वाति मालीवाल की पिटाई क्यों की गई

‘आप जो कलावा पहनते हैं, वह स्क्रीन पर नहीं दिखना चाहिए’: देश में चल रहा था UPA का शासन, जानिए पत्रकारों को कैसे हड़काते थे दूरदर्शन के अफसर

देश में UPA शासनकाल के दौरान सरकारी चैनल डीडी न्यूज पर पत्रकारों को कलावा पहन कर आने से रोका जाता था। इसके लिए एक बड़े पत्रकार अशोक श्रीवास्तव को विशेष रूप से निर्देश दिया गया था। दूरदर्शन पर राम के उन भजनों को दिखाने से रोका जाता था जिनमें अयोध्या को राम जन्मभूमि बताया गया हो। इसके अलावा कॉन्ग्रेस राज में प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी नरेन्द्र मोदी का इंटरव्यू भी काट छाँट कर चलाया गया था।

डीडी न्यूज के पत्रकार और एंकर अशोक श्रीवास्तव ने कलावा पहनने से रोकने की बात का खुलासा किया है। अशोक श्रीवास्तव ने बताया, “जब UPA की सरकार थी, तब मुझे एक दिन आला अफसरों ने बुलाया। मैं अपनी पहचान के तौर पर कलावा बाँध कर रखता हूँ, UPA सरकार के दौरान कहा गया कि आप जो कलावा पहनते हैं, वह स्क्रीन पर नहीं दिखना चाहिए।” अशोक श्रीवास्तव ने बताया कि यह घटना 2006 के आसपास की होगी।

अशोक श्रीवास्तव के इस खुलासे से पहले भी कॉन्ग्रेस राज के दौरान दूरदर्शन को हिन्दू प्रतीकों को ना दिखाने का आरोप भी लग चुका है। इस बारे में लोक गायिका मालिनी अवस्थी ने एक समाचार शो में खुलासा किया था। उन्होंने बताया था कि उन्हें 2005 में दूरदर्शन पर एक धार्मिक भजन गाने से रोक दिया गया था क्योंकि इसमें कहा गया था कि भगवान राम का जन्म अयोध्या में हुआ था।

उन्होंने इसको लेकर बताया था, ”एक समय था जब मुझे सार्वजनिक प्रसारक दूरदर्शन के लिए गाने के लिए नियुक्त किया गया था। मैंने उन्हें भगवान राम के जन्म पर एक भजन गाने की पेशकश की थी। शुरू में, वे इसके लिए सहमत हुए लेकिन जब मैंने गाना शुरू किया, तो इसमें एक श्लोक शामिल था जिसमें अयोध्या में भगवान राम के जन्म का उल्लेख था। अचानक, वे आए और मुझसे कहा कि यह ऑन एयर नहीं हो सकता और मुझसे दूसरा भजन गाने के लिए कहा।”

कॉन्ग्रेस पर दूरदर्शन को अपने राजनीतिक एजेंडे से चलाने का भी आरोप है। 2014 में प्रधानमंत्री प्रत्याशी नरेन्द्र मोदी के एक इंटरव्यू को दूरदर्शन पर काट छाँट कर चलाया गया था। उस समय पूरे 56 मिनट का इंटरव्यू महज 28 मिनट में, बिना किसी को जानकारी दिए प्रसारित किया गया था। इंटरव्यू से जो हिस्सा काटा गया वहाँ मोदी ने प्रियंका गाँधी और अहमद पटेल पर अपनी सॉफ्ट बातों को रखा था। लेकिन मोदी का यह कॉर्नर दिखाना शायद सिरकार कें नेतृत्व में दूरदर्शन को नामंजूर था।

कॉन्ग्रेस ने 2004 में सत्ता में आते ही बड़ी सँख्या में पत्रकारों को नौकरी से निकाला था। दूरदर्शन से निकाले जाने वालों में पत्रकार दीपक चौरसिया भी थे। चौरिसया ने हाल ही में एक शो में इस बात का में खुलासा किया था। उन्होंने यह बात कॉन्ग्रेस के ओबीसी आरक्षण को लेकर की जाने वाली राजनीति को लेकर कही थी।

उन्होंने बताया, “आरक्षण पर कॉन्ग्रेस पार्टी ने जितना फेक नैरेटिव फैलाया है, ऐसा कभी नहीं हुआ। मैं सच बोलूँ तो आधे लोगों को पता नहीं होगा। मैंने राहुल गाँधी का एक वीडियो देखा, जिसमें वो OBC पत्रकार ढूँढ रहे हैं। मैं हूँ न, मैं सामने बैठा हूँ। 2004 में राहुल गाँधी और उनकी पार्टी ने मुझे दूरदर्शन से निकाल कर बाहर कर दिया था। मैं DD का हेड था। मैं ओबीसी पत्रकार था, तब उनको नहीं दिखाई दिया।”

UK में 66 साल की भारतीय मूल की महिला अनिता मुखी की चाकुओं से गोद कर हत्या, मौके पर ही हो गई मौत : 22 साल का जलाल गिरफ्तार

इंग्लैंड की राजधानी लंदन में चाकूबाजी की एक और वारदात हुई है। उत्तर-पश्चिम लंदन में एक बस स्टॉप पर इंतजार कर रही 66 वर्षीय भारतीय मूल की महिला अनिता मुखी की हत्या कर दी गई। इस वारदात को एडग्वेयर इलाके में 9 मई 2024 को अंजाम दिया गया था। पुलिस ने इस मामले में 22 साल के जलाल डेबेला को गिरफ्तार किया है और उस पर फर्स्ट डिग्री मर्डर की धाराओं में केस दर्ज किया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, अनिता मुखी इंग्लैंड के राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा (एनएचएस) में पार्ट टाइमर के तौर पर मेडिकल सेक्रेटरी के पद पर काम करती थी। वो बर्न्ट ओक ब्रॉडवे बस स्टॉप पर थी, जब 22 साल के जलाल डेबेला ने उनकी हत्या की। इस वारदात से जुड़ी रिपोर्ट्स में बताया गया है कि डेबेला ने पहले उनके साथ बहस की और फिर उनका गला दबा कर मारने की कोशिश की, लेकिन जब वो असफल रहा, तो उसने चाकू निकाल लिया और उनके सीने-पेट में कई वार किए। अनिता मुखी को मारने के बाद डेबेला मौके से फरार हो गया था। मौके पर पहुँचे चिकित्साकर्मियों ने अनिता मुखी की जान बचाने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने दम तोड़ दिया।

अनिता मुखी की हत्या के बाद जलाल को पुलिस ने थोड़ी दूर से गिरफ्तार कर लिया था। लंदन पुलिस ने बताया है कि जलाल को शनिवार (11 मई 2024) को लंदन के ओल्ड बेली कोर्ट में पेश किया गया, जहाँ से उसे हिरासत में भेज दिया गया। उसे मंगलवार (14 मई 2024) को दोबारा कोर्ट में पेश किया गया और हत्या की धारा के साथ ही घातक हथियार की धाराएँ लगाई गई, जिसके बाद उसे जेल भेज दिया गया। अब इस मामले में अगली सुनवाई अगस्त में होगी, जिसमें उस पर आरोप तय किए जाएँगे।

लंदन और यूके में चाकूबाजों का कहर, हजारों मामले

बता दें कि कुछ समय पहले पीए न्यूज एजेंसी ने यूके और लंदन में चाकू बाजी के आँकड़े जारी किए थे, जो चौंकाने वाले थे। साल 2023 में अकेले लंदन मेट्रोपॉलिटर पुलिस ने 14,577 चाकूबाजी के मामले दर्ज किए। साल 2022 में ये आंकड़े 12,119 तक थे, वहीं कोरोना काल से पहले साल मार्च 2020 तक 14,680 मामले दर्ज हुए थे। पूरे देश की बात करें तो इंग्लैंड और वेल्स में साल 2023 में चाकू से जुड़े अपराधों की संख्या 49,489 रही, जिसमें अकेले लंदन में 29% मामले दर्ज किए गए।