"मैं CAA और NRC के समर्थन में निकाली गई रैली में शामिल नहीं हो सका, क्योंकि मैं मीटिंग में बिज़ी था। मैं इसके लिए दु:ख व्यक्त करता हूँ। शिवसेना हमेशा से हिन्दुत्ववादी विचारधारा वाली पार्टी रही है। मैं इन दोनों मुद्दों का पुरज़ोर समर्थन करता हूँ, इसलिए मैं इस बारे में पत्र लिख रहा हूँ।"
"एक प्रचलित वाक्य है- विविधता में एकता। लेकिन हमारा देश एक कदम आगे जाता है। केवल विविधता में एकता नहीं बल्कि एकता की ही विविधता है। हम विविधताओं में एकता नहीं खोज रहे हैं, हम उस एकता को खोज रहे हैं जिससे विविधता निकली है।"
"कोयंबटूर आतंकी घटनाओं के आरोपी के लिए जेल को स्पा में बदला। अब्दुल नासिर की मालिश का खर्च वहन सरकार कर रही थी, उसकी पत्नी के खिलाफ गिरफ्तारी वॉरंट होने के बावजूद वह नासिर से बेरोकटोक मिल सकती थी। यह तब हो रहा था जब कॉन्ग्रेस के 33 विधायक और DMK के 97 MLA थे।"
अरुंधति रॉय ने कहा कि पीएम मोदी ने जानबूझ कर झूठ बोला क्योंकि उन्हें पता है कि मीडिया उनके हाथ में है, जो सच्चाई नहीं दिखाएगी। उन्होंने आरोप लगाया कि यूपी पुलिस मुस्लिमों के घर-घर जाकर उन्हें लूट रही है।
आज कॉन्ग्रेस CAA का विरोध कर रही है। इसका कोई आधार नहीं है। जरूरत है उसके नेता इतिहास को समझें। नेहरू मंत्रिमंडल में राहत और पुनर्वास के लिए अलग से मंत्रालय था। मोदी सरकार ने उसी प्रक्रिया का सरलीकरण किया है।
"इस रजिस्टर में आपका नाम ज़रूर होना चाहिए, क्योंकि ये आपके बहुत काम आएगा। एनपीआर के बहुत सारे फायदे हैं। इसके जरिए ही 'यूनिक आइडेंटिटी कार्ड' मिलेगा। ये पहचान पत्र सरकारी योजनाओं में ख़ास कर के काम आएगा।"
पहले मुस्लिमों को हिंसा के लिए उकसाया गया। अब राणा अयूब सोशल मीडिया में मरने वालों का नाम लिख कर लोगों को भड़काने की फिराक में है। इसे मुस्लिम विरोधी नरसंहार बता रही। लेकिन, उन्होंने उन दो हिंदुओं के नाम छिपा लिए हैं जो दंगों की भेट चढ़ गए।
NPR की शुरुआत मनमोहन सरकार के दौरान हुई। इसमें शामिल होना भारत में रह रहे लोगों के लिए अनिवार्य किया गया। साथ ही इसे NRIC की दिशा में पहला क़दम बताया गया। अमित शाह ने साफ किया है कि दोनों का कोई लेना-देना नहीं है।
एनपीआर को कैबिनेट की मंजूरी मिलने के बाद से विपक्ष उसी तरह अफवाह फैलाने में जुट गया है जैसा उसने नागरिकता संशोधन कानून (CAA) को लेकर किया। जिस तरीके से CAA को NRC से जोड़ा गया, उसी तरह अब NPR को भी NRC से जोड़कर दिखाने की कोशिश हो रही है। जबकि हकीकत कुछ और ही है।
हिंदुत्ववादी नेता कमलेश तिवारी की हत्या 18 अक्टूबर को लखनऊ के उनके दफ्तर में कर दी गई थी। इस मामले में पुलिस ने अदालत में चार्जशीट दाखिल कर दी है। हत्यारों को गुजरात एटीएस ने राजस्थान बॉर्डर से दबोचा था।