बात यह है कि हर मामले में खास मजहब का लड़का ही क्यों होता है? ईसाई या सिक्ख लड़के आखिर किसी हिन्दू लड़की को अपना नाम हिन्दू वाला बता कर प्रेम करते क्यों नहीं पाए जाते?
लव जिहाद कोई काल्पनिक राक्षस नहीं है। ये वीभत्स हकीकत है। मेरठ में हुआ प्रिया का केस शायद जैनब ने पढ़ा ही नहीं या निकिता के साथ जो तौसीफ ने किया उससे वो आजतक अंजान हैं।
लोगों में एकता की पहल करना समाजसेवा है। 'लव जिहाद' के खिलाफ आवाज़ उठाना महिला अधिकारों की लड़ाई है। गोरक्षा पशु अधिकार की सुरक्षा है। वामपंथी इन्हीं अधिकारों के लिए लड़ने का दावा करते हैं तो फिर इनसे नफरत क्यों?