विचार

तब ब्रिटिश थे, अब कॉन्ग्रेस है: बंगाल विभाजन से दिल्ली दंगों तक यूँ समझें ‘मजहब’ वालों का किरदार

कॉन्ग्रेस जैसे राजनैतिक दल पहले समुदाय विशेष को भड़काते हैं, फिर तुष्टिकरण को सत्ता का जरिया बनाते हैं। इसके बाद मुस्लिम नेता ऐसे मौके का नाजायज ‘फायदा’ उठाने के लिए पहले अलग संविधान, फिर अलग देश की माँग करने लगते हैं।

न अमन की खोखली बातों से बुझेगी ये आग, न जीते-जी भरेंगे घाव: बारूद के ढेर को चिंगारी से बचाने की मुश्किल

एक भारत की व्यवस्था को चीनी माओवादी बनाना चाहता है। दूसरा भारत को चूस-चूस के शरिया की ओर ले जाना चाहता है। वैश्विक स्तर पर एक-दूसरे को फूटी आँख ना सुहाने वाले इन दो दुश्मन गुटों का भारत में याराना देखिए।

आप अपना धैर्य खो बैठे हैं और विपक्ष के अजेंडे में उलझ कर अनर्गल प्रलाप कर रहे हैं

वो चाहते हैं कि आप हिंसा की बात करें, वो चाहते हैं कि आप कानून को हाथ में ले जिस से उनके किए गए कामों को एक कारण मिल सके। क्यों करना है आपको राणा अयूब की ट्वीट को कोट और जवाब देना है? क्यों आपको स्वरा को गद्दार कहना है? राजदीप को क्यों गाली देना है आपको?

दिल्ली दंगों की 8 कहानियाँ, जिसे मीडिया छुपा रहा: अजीत भारती के सवाल | Ajeet Bharti on Delhi Riots and Media Hiding Facts

वामपंथी मीडिया ये कहानियाँ नहीं दिखाएगा क्योंकि ये कहानियाँ महत्वपूर्ण नहीं। हिन्दुओं की मौत से इस देश की मीडिया को कोई फर्क नहीं पड़ता है।

‘दोनों तरफ के लोग हैं’: ‘दंगा साहित्य’ के दोगले कवियों से पूछिए कि हिन्दू ने कहाँ दंगा किया, कितने दिन किया?

इस नैरेटिव से बचिए और पूछिए कि जिसकी गली में हिन्दू की लाश जला कर पहुँचा दी गई, उसने तीन महीने से किसका क्या बिगाड़ा था। 'दंगा साहित्य' के कवियों से पूछिए कि आज जो 'दोनों तरफ के थे', 'इधर के भी, उधर के भी' की ज्ञानवृष्टि हो रही है, वो तीन महीने के 89 दिनों तक कहाँ थी, जो आज 90वें दिन को निकली है?

बिना रिसर्च के हैप्पीनेस क्लास: केजरीवाल का प्रपंच, मेलानिया को बेचा जा रहा है प्रोपेगेंडा

एक तरफ अघोषित नीति के तहत फेल होने वाले बच्चों का एडमिशन नहीं लिया जाता। दूसरी तरफ कहानियॉं सुनाकर उनको खुश दिखाने का प्रोपेगेंडा रचा जा रहा है। पर दुर्भाग्य से यह कसरत भी आधी-अधूरी ही है।

‘पिंचर’ बनाने वालों से डर नहीं लगता साहब, ‘IIT-IIM वालों से’ लगता है: एंटी CAA से जलता भारत

ओवैसी, शरजील इमाम, हुसैन हैदरी, इकबाल, जिन्ना, लादेन की फेहरिश्त में आप नाम जोड़ते जाइए उन सबका भी जो शायद आपके आसपास बैठा हो, जो आपके साथ काम करता हो, जिनका पेशा कुछ भी क्यों न हो लेकिन वो लगे हों उम्मत के लिए ही।

POJK पर जब पाकिस्तान आक्रामक ढंग से आगे बढ़ रहा था, तब हम कान में तेल डाले सो रहे थे

महात्मा गाँधी की सलाह को प्रधानमंत्री नेहरू ने अनदेखा किया। शेख ने भी अपनी बात रखने में बहुत वक्त लगा दिया। प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव से पहले ही POJK को वापस लेने के लिए भारत सरकार को अपनी नीतियाँ स्पष्ट कर देनी थीं। लेकिन अफसोस यह है कि...

जामिया विडियो: वामपंथियों की ऐसे लीजिए कि वो ‘दुखवा मैं का से कहूँ’ मोड में आ जाएँ

यहाँ डिफेंड मत कीजिए, सवाल पूछिए और बार-बार पूछिए कि वो कहाँ से आए थे? सवाल पूछिए कि जब उसके हाथ में वॉलेट था तो उसने सारे सोशल मीडिया अकाउंट डीएक्टिवेट क्यों कर लिए? सवाल पूछिए कि पत्थर क्या आसमान से गिरे थे पुलिस पर?

ट्रेन की एक सीट पर हिंदू देवी-देवता को जगह देना एहसान नहीं… यह होना चाहिए, यही वक्त की माँग है

राज्यों के धर्मार्थ विभाग कमाते तो मंदिरों से हैं, लेकिन उससे हज हाउस बनवाते हैं। ये वही पैसा है, जिससे मस्जिदों के इमामों को सैलरी दी जाती है। अगर उस करोड़ों की कमाई के बदले में सरकार किसी हिंदू देवी-देवता को ट्रेन में एक सीट दे देगी तो एहसान नहीं करेगी। और यह होना भी चाहिए।

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