एक तरफ योगेंद्र यादव 'बाबासाहब के सपनों' की बात करते हुए जाति मिटाने की भी बात करते हैं, दूसरी तरफ ये भी चाहते हैं कि हर कोई अपनी जातिगत पहचान आगे करे। दोनों चीजें एक साथ कैसे हो सकती हैं?
RA&W और सेना के पूर्व अधिकारी कह चुके हैं कि कॉन्ग्रेस ने पंजाब में खिसकती जमीन वापस पाने के लिए भिंडराँवाले को पैदा किया। अब वही फॉर्मूला पार्टी अमृतपाल सिंह के साथ आजमा रही। कॉन्ग्रेस के बड़े नेता जरनैल सिंह के सामने फर्श पर बैठते थे। संजय गाँधी ने उसे 'संत' बनाया था।
लालकृष्ण आडवाणी ने ये रथयात्रा सिर्फ राम मंदिर के लिए नहीं निकाली थी, बल्कि इसका उद्देश्य था देश की सांस्कृतिक पहचान को पुनः पुष्ट करना। उनका सीधा कहना था - राम के मुकाबले बाबर को खड़ा करने का प्रयास गलत है।
राहुल गाँधी ने 'शक्ति के विनाश' की बात करने के बाद अब संपूर्ण हिन्दू समाज को हिंसक बता दिया है। साथ ही अहिंसा का वही पुराना रटा-रटाया शिगूफा छेड़ा है। राहुल गाँधी ये बकैती कर पा रहे हैं, क्योंकि भारत में 50 लाख जवान हाथों में शस्त्र लेकर खड़े हैं। हिन्दू धर्म कहता है - राक्षसों से अहिंसा नहीं।