Saturday, July 13, 2024
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अयोध्या राम मंदिर के मुख्य पुजारी कौन? जिन मोहित पांडेय की मीडिया में चर्चा उनकी नियुक्ति से श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का इनकार

बता दें कि सत्येंद्र दास पिछले 32 वर्षों से राम मंदिर के मुख्य पुजारी हैं। वहीं रामलला की पूजा करते आ रहे हैं। 1992 के दिसंबर में बाबरी ढाँचे के विध्वंस से 9 महीने पहले उनकी नियुक्ति की गई थी।

अयोध्या में बन रहे भव्य एवं दिव्य राम मंदिर में 22 जनवरी, 2024 को प्राण प्रतिष्ठा होनी है। इसी बीच मीडिया में खबर चलने लगी कि उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद के रहने वाले मोहित पांडेय को राम मंदिर का मुख्य पुजारी चुन लिया गया है। कई मीडिया संस्थानों ने चलाया कि 3000 पुजारियों के आवेदन स्वीकार किए गए थे, जिनमें से अंत में 50 को चुना गया और उनमें मोहित पांडेय का नाम है और उन्हें मुख्य पुजारी चुना गया है। वो दूधेश्वर वेद विद्यापीठ के छात्र रहे हैं

इसी बीच ‘श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र’ ट्रस्ट के सदस्य कामेश्वर चौपाल ने एक फेसबुक पोस्ट के जरिए इन खबरों को गलत बताया है। उन्होंने साफ़ कहा कि अयोध्या स्थित श्री रामजन्मभूमि मंदिर हेतु किसी भी मुख्य पुजारी की नियुक्ति नहीं की गई है। साथ ही उन्होंने अपील की कि कृपया भ्रामक ख़बरों पर ध्यान ना दें। कामेश्वर चौपाल ने ऑपइंडिया से बात करते हुए भी कहा कि राम मंदिर के पुजारी सत्येंद्र दास ही हैं और कोई नया पुरोहित नहीं चुना गया है।

उन्होंने बताया कि किसी मुख्य पुजारी की नियुक्ति नहीं हुई है। बकौल कामेश्वर चौपाल, इंटरव्यू के बाद 21 लोगों का चयन किया गया है। हालाँकि, उन्हें अभी 6 महीने की ट्रेनिंग दी जानी है। उसके बाद योग्यता के आधार पर निर्णय लिया जाएगा। कामेश्वर चौपाल ने कहा कि ये बात सत्य है कि सत्येंद्र दास बुजुर्ग हैं, लेकिन अभी वो ही मुख्य पुजारी का दायित्व निभा रहे हैं और उनके उत्तराधिकारी के रूप में किसी का नाम तय नहीं हुआ है।

‘श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र’ ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय ने भी मोहित पांडेय को मुख्य पुजारी बनाए जाने की खबरों पर ऑपइंडिया को प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि मीडिया और सोशल मीडिया का क्या है, वो तो कोई भी नाम लेकर चलाते रहते हैं, किसी का नाम चला सकते हैं। उन्होंने कहा कि जिसका जो मन हो नाम चला दे।

बता दें कि सत्येंद्र दास पिछले 32 वर्षों से राम मंदिर के मुख्य पुजारी हैं। वहीं रामलला की पूजा करते आ रहे हैं। 1992 के दिसंबर में बाबरी ढाँचे के विध्वंस से 9 महीने पहले उनकी नियुक्ति की गई थी। उन्होंने स्वयं बताया था कि पूजा करते हुए उन्हें लगता था कि एक न एक दिन रामलला का मंदिर बनेगा। बता दें कि प्राण-प्रतिष्ठा से पहले तक रामलला टेंट में ही रहेंगे जहाँ वो वर्षों से हैं। सत्येंद्र दास को नियुक्ति के समय मात्र 100 रुपए का वेतन मिलता था, जिसे बाद में 13,000 रुपए कर दिया गया।

सत्येंद्र जैन पेशे से शिक्षक रहे हैं और इसी नौकरी से वो घर चलाते रहे। BJP सांसद रहे विनय कटियार और VHP प्रमुख रहे अशोक सिंघल ने उनका नाम तय किया था। उनके हिन्दू नेताओं से अच्छे संबंध थे। 1949 में जिन बैरागियों ने राम जन्मभूमि में रामलला की प्रतिमा स्थापित की थी, उनमें वो भी शामिल थे। 1958 में उन्होंने घर छोड़ा, 1975 में आचार्य की डिग्री ली और इसके अगले ही वर्ष वो संस्कृत के अध्यापक हो गए। बाबरी विध्वंस के समय भी वो रामलला के पास ही थे और प्रतिमा को लेकर थोड़ी दूर चले गए थे।

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अनुपम कुमार सिंह
अनुपम कुमार सिंहhttp://anupamkrsin.wordpress.com
भारत की सनातन परंपरा के पुनर्जागरण के अभियान में 'गिलहरी योगदान' दे रहा एक छोटा सा सिपाही, जिसे भारतीय इतिहास, संस्कृति, राजनीति और सिनेमा की समझ है। पढ़ाई कम्प्यूटर साइंस से हुई, लेकिन यात्रा मीडिया की चल रही है। अपने लेखों के जरिए समसामयिक विषयों के विश्लेषण के साथ-साथ वो चीजें आपके समक्ष लाने का प्रयास करता हूँ, जिन पर मुख्यधारा की मीडिया का एक बड़ा वर्ग पर्दा डालने की कोशिश में लगा रहता है।

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