राहुल और प्रियंका को ज़मीन बेचने वाले पाहवा से ED करेगी पूछताछ, कॉन्ग्रेस के लिए मुश्किलें बढ़ीं

प्रवर्तन निदेशालय ने दलाल एचएल पाहवा पर शिकंजा कसते हुए उससे पूछताछ की तैयारी शुरू कर दी है। राहुल गाँधी, प्रियंका गाँधी और रॉबर्ट वाड्रा के साथ उसके आर्थिक रिश्ते धीरे-धीरे अब और खुलते जा रहे हैं।

प्रवर्तन निदेशालय ने दलाल एचएल पाहवा पर शिकंजा कसते हुए उससे पूछताछ की तैयारी शुरू कर दी है। बता दें कि ऑपइंडिया ने राहुल गाँधी, प्रियंका गाँधी और रॉबर्ट वाड्रा के साथ रक्षा दलाल संजय भंडारी, सीसी थम्पी व पाहवा के बीच रिश्तों का ख़ुलासा किया था। इंडिया टुडे में प्रकाशित एक ख़बर के अनुसार, राहुल और प्रियंका को ज़मीन बेचने वाले पाहवा को पूछताछ के लिए कभी भी बुलाया जा सकता है। इस ख़बर में बताया गया है कि एजेंसी ने सीसी थम्पी और पाहवा को पहले भी पूछताछ के लिए समन जारी किया था। पाहवा ने एजेंसी के समन का अभी तक कोई जवाब नहीं दिया है। थम्पी फिलहाल अमेरिका में इलाज करा रहा है। प्रवर्तन निदेशालय (ED) जल्द ही उसका बयान दर्ज करेगी।

एजेंसी ने 2017 में एचएल पाहवा से जुड़े ठिकानों पर छापे के दौरान कई दस्तावेजों की बरामदगी की थी। इन दस्तावेजों से पता चलता है कि हरियाणा में पाहवा ने तीन लोगों को ज़मीन बेची थी। इन दस्तावेजों में उस लेन-देन का विवरण मौजूद था। दस्तावेजों के अनुसार, एचएल पाहवा ने मार्च 2008 में हरियाणा के हसनपुर में राहुल गाँधी को 6.5 एकड़ ज़मीन बेची। पाहवा को जमीन के लिए 26,47,000 रुपए का भुगतान किया गया था। स्पष्ट है कि यह राशि बाजार मूल्य से काफ़ी कम है। उसी महीने, उसी गाँव में 9 एकड़ जमीन रॉबर्ट वाड्रा ने अपने सहयोगी महेश नागर के माध्यम से ख़रीदी थी। महेश नागर रॉबर्ट वाड्रा का क़रीबी है और बीकानेर ज़मीन हेरा-फेरी के मामले में प्रवर्तन निदेशालय के रडार पर है। उस मामले में वाड्रा से भी पूछताछ की जा चुकी है।

पाहवा ने 2016 में प्रियंका गाँधी को 15 लाख रुपए में ज़मीन बेची थी। एजेंसी इस बात की भी जाँच कर रही है कि कहीं ये बिक्री डीड बैकडेटेड तो नहीं हैं। जाँचकर्ताओं का मानना है कि पाहवा को सीसी थम्पी से लगभग 54 करोड़ रुपए मिले थे, जिसका इस्तेमाल उसने ज़मीन में निवेश करके किया। एजेंसी ने ऐसे किकबैक्स के मनी-ट्रेल का भी विश्लेषण किया है। यह किकबैक पिलाटस (Pilatus) और सैमसंग के बीच हुए करार के लिए मिला था। पेट्रोलियम सौदे पर ONGC और सैमसंग इंजीनियरिंग कंपनी लिमिटेड के बीच हस्ताक्षर किए गए थे। इस सौदे को 2008 में मंजूर किया गया था। किकबैक को डायरेक्ट देने के बजाय संजय भंडारी की शारजाह स्थित कम्पनी सैन्टेक इंटरनेशनल FZC और सीसी थम्पी की दुबई स्थित कंपनी स्काईलेस्ट इंवेस्टमेंट्स के जरिए भेजा गया था।

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ईडी का यह भी दावा है कि सैमसंग और पिलाटस सौदे से प्राप्त किकबैक राशि का उपयोग लंदन में बेनामी संपत्तियों और भारत में ज़मीन ख़रीदने के लिए किया गया था। सैमसंग ने 13 जून, 2009 को सैन्टेक को 49.9 लाख अमेरिकी डॉलर का भुगतान किया। ऑपइंडिया के ख़ुलासे के निम्लिखित निष्कर्ष हैं, जिसे आप आसान भाषा में समझ सकते हैं:

  1. राहुल गांधी ने कथित रूप से कम कीमत पर एचएल पाहवा से जमीन खरीदी।
  2. रॉबर्ट वाड्रा और प्रियंका गांधी वाड्रा द्वारा भी एचएल पाहवा से जमीन खरीदी गई थी। कई मामलों में, एचएल पाहवा द्वारा इन्हीं ज़मीनों को बढ़े हुए मूल्य पर वापस खरीदा गया था। वो भी तब जबकि पाहवा का कैश बैलेंस निगेटिव में था।
  3. इस खरीद पर साफ-सुथरा दिखाने के लिए, एचएल पाहवा ने सीसी थम्पी से पैसे लिए थे।
  4. सीसी थम्पी और संजय भंडारी करीबी दोस्त हैं। उनके बीच कई वित्तीय लेनदेन भी हुए थे।
  5. संजय भंडारी एक हथियार डीलर है और रॉबर्ट वाड्रा का करीबी दोस्त भी। उसे रक्षा सौदे और पेट्रोलियम सौदे में कमिशन (किकबैक) भी मिला था।
  6. कमिशन (किकबैक) की इसी राशि से संजय भंडारी ने रॉबर्ट वाड्रा से बेनामी संपत्ति खरीदी थी, यहाँ तक ​​कि उसने इन संपत्तियों के नवीनीकरण (रेनोवेशन) के लिए भी भुगतान किया था।
  7. इस संपत्ति को फिर सीसी थम्पी को बेचा गया था।
  8. फिलहाल ईडी थम्पी के साथ रॉबर्ट वाड्रा की निकटता की जाँच कर रहा है।
  9. ये सभी सौदे कॉन्ग्रेस सरकार के दौरान हुए थे।
  10. संजय भंडारी एक हथियार डीलर है। 2012 से 2015 के बीच राफेल सौदे में ऑफ़सेट पार्टनर बनने की पैरवी संजय भंडारी कर रहा था लेकिन राफेल बनाने वाली कंपनी दसौं ने उसे अपने साथ करने से मना कर दिया था।
  11. 126 राफेल जेट की खरीद से संबंधित फाइल रक्षा मंत्रालय से गायब हो गई थी और बाद में इसे सड़क पर पाया गया था। आरोप है कि भंडारी ने फाइल चुराई थी। आरोप यह भी है कि भंडारी महत्वपूर्ण फाइलों की फोटोकॉपी करता था और जिन डिफेंस कॉन्ट्रैक्टरों के साथ उसके संबंध अच्छे थे, उन्हें वो कॉपी उपलब्ध करवाता था।
  12. अरुण जेटली ने आरोप लगाया था कि जब कॉन्ग्रेस सरकार के दौरान राफेल को अंतिम रूप दिया जा रहा था, तो यूरोफाइटर के बारे में बैकरूम बातें हुआ करती थीं।
  13. ऐसी अफवाहें भी हैं कि राहुल गाँधी जर्मनी में यूरोफाइटर के प्रतिनिधियों से मिले थे।
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