Saturday, October 23, 2021
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PM मोदी के खिलाफ विदेशी मीडिया गिरोह और उसका प्रोपेगेंडा: कभी ‘डिवाइडर इन चीफ’ तो कभी Covid के ‘एकमात्र जिम्मेदार’

ये मीडिया समूह और पत्रकार आज भी अपना एजेंडा चला रहे हैं लेकिन अंतर इतना आया है कि इन्हें सत्ता का संरक्षण प्राप्त नहीं हो पा रहा है। इसी खीझ में ये मीडिया समूह आज मोदी विरोध करते-करते विदेशी मीडिया की गोद में जा बैठे हैं।

26 मई 2021 को केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार अपने कार्यकाल के 7 वर्ष पूरे करने जा रही है। भाजपा पहले भी सरकार में रही लेकिन इतने प्रचंड बहुमत के साथ नहीं। हालाँकि, यह नरेंद्र मोदी का करिश्माई नेतृत्व और ‘गुजरात मॉडल’ को बनाने वाली छवि का कमाल था कि लगातार विपक्षी पार्टियों और विश्व भर के लिबरल-वामपंथी षड्यंत्रों के बाद भी वह 2019 में सत्ता में लौट सके और 2014 के चुनावों से बेहतर प्रदर्शन कर सके।

उन्होंने न केवल भारत की सामाजिक सुरक्षा और आर्थिक प्रगति के लिए कार्य किए बल्कि भारत की सुरक्षा और विदेशी संबंधों को सुदृढ़ करने में भी आगे रहे। स्वच्छ भारत अभियान हो या उज्ज्वला योजना, करोड़ों जन-धन खाते खोलने की बात हो या रोजगार प्रदान करने वाली मुद्रा योजना के विस्तार की, नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार ने भारत में आर्थिक और सामाजिक विकास को हमेशा प्राथमिकता दी।

भारत की सुरक्षा के मुद्दे पर भी नरेंद्र मोदी ने शुरू से ही कड़े फैसले लिए। कभी मुंबई जैसा क्रूरतम आतंकी हमला झेलने वाला भारत आतंकियों को उनके घर में घुसकर मारने लगता है तो यह पीएम मोदी के दृढ़ निश्चय और सेना पर उनके अटल भरोसे को बताता है। कश्मीर और राम मंदिर जैसे जटिल मुद्दों का सुलझ जाना भी नरेंद्र मोदी सरकार की एक बड़ी उपलब्धि रही लेकिन मीडिया यह सब स्वीकार नहीं कर सकता।

न केवल भारतीय मीडिया बल्कि विदेशी मीडिया ने भी नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्रित्व कालखंड में जमकर नैरेटिव चलाया। कॉन्ग्रेस और मीडिया के इस गठजोड़ ने उसी दिन से नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार के खिलाफ षड्यन्त्र शुरू कर दिया था जिस दिन भाजपा ने प्रचंड जीत हासिल की थी। यह हमेशा से ही स्पष्ट रहा कि पश्चिमी मीडिया ने जिन पत्रकारों और वामपंथियों के दम पर पीएम मोदी के खिलाफ नैरेटिव चलाया, वो सभी कॉन्ग्रेस पार्टी के समर्थक रहे जो कॉन्ग्रेस के शासनकाल में सत्ता के संरक्षण में अपना हिन्दू विरोधी और राष्ट्र विरोधी एजेंडा चलाते थे। 2014 के बाद यही सब बंद हुआ।

हालाँकि, ये मीडिया समूह और पत्रकार आज भी अपना एजेंडा चला रहे हैं लेकिन अंतर इतना आया है कि इन्हें सत्ता का संरक्षण प्राप्त नहीं हो पा रहा है। इसी खीझ में ये मीडिया समूह आज मोदी विरोध करते-करते विदेशी मीडिया की गोद में जा बैठे हैं।

आपको याद होगा कि मई 2019 में जब भारत में लोकसभा चुनाव अपने आखिरी चरण में चल रहा था तब ‘टाइम मैग्जीन’ ने अपने अंतरराष्ट्रीय संस्करण में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भारत का ‘डिवाइडर इन चीफ’ कहा था। यह मैग्जीन की कवर स्टोरी थी और बाकायदा टाइम मैग्जीन के कवर पर भगवा गमछा ओढ़े पीएम मोदी की फोटो के साथ डिवाइडर इन चीफ लिखा गया था।

टाइम मैग्जीन का कवर जिसमें पीएम मोदी को डिवाइडर इन चीफ कहा गया

टाइम मैग्जीन की इस कवर स्टोरी को भारतीय पत्रकार तवलीन सिंह और पाकिस्तान के पत्रकार एवं बिजनेसमैन सलमान तासीर के बेटे आतिश तासीर ने लिखा था। तासीर वही था जिसने गृह मंत्री अमित शाह के कोरोना संक्रमित होने पर उनके लिए आपत्तिजनक शब्दों का उपयोग किया था।

इस लेख में तासीर ने मोदी को एक ऐसा नेता कहा था जो 2014 में किए गए अपने वादे पूरे करने में असमर्थ रहे लेकिन 2019 के चुनावों में दोबारा चुने जाने की उम्मीद में है। तासीर ने लिखा था कि न केवल मोदी के आर्थिक चमत्कार असफल रहे बल्कि उन्होंने पूरे देश में एक विषैला धार्मिक राष्ट्रवाद का माहौल बना दिया है।

लेकिन यह सिर्फ टाइम मैग्जीन की बात नहीं है। विश्व मीडिया के एक बड़े वर्ग ने नरेंद्र मोदी की आलोचना ही की है। बीबीसी की खबरों को गौर से देखेंगे तो वहाँ भारत की नरेंद्र मोदी सरकार को कई मुद्दों पर घेरा गया है। कभी गौरक्षा के नाम पर तो कभी उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के लिए एक कट्टर छवि वाले एक हिन्दू संत को चुनने के नाम पर। बीबीसी ने जून 2017 में एक लेख प्रकाशित किया था जिसमें लिखा गया था कि नरेंद्र मोदी की हिन्दू राष्ट्रवादी भाजपा के शासन में गाय एक ध्रुवीकरण करने वाली जानवर हो गई है और धार्मिक विभाजन और भी बढ़ता जा रहा है।

बीबीसी के लेख का स्क्रीनशॉट

इसी लेख में कहा गया था कि नरेंद्र मोदी की नजरों के सामने भारत एक ‘भीडतंत्र (Mobocracy)’ में बदलता जा रहा है और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा में कानून व्यवस्था असमर्थ नजर आ रही है। लेख में यहाँ तक कह दिया गया कि मोदी सरकार हिन्दू भीड़ को रोकने में असमर्थ है या रोकना ही नहीं चाहती है।

बीबीसी का लेख जिसमें भारत को भीडतंत्र कहा गया

जैसा कि कॉन्ग्रेस के कथित टूलकिट में ‘सेंट्रल विस्टा’ प्रोजेक्ट को बदनाम करने और उसकी आलोचना करने के लिए कहा गया है, बीबीसी में हाल ही में एक लेख प्रकाशित किया गया जिसका शीर्षक था, “क्या भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को वाकई एक नए घर की जरूरत है?” शीर्षक से ऐसा लगता है कि जैसे सेंट्रल विस्टा मात्र पीएम मोदी के नए घर को बनाने का एक प्रोजेक्ट है जबकि वास्तव में इस प्रोजेक्ट के अंतर्गत नई संसद, उपराष्ट्रपति के घर और कई बहुमंजिला कार्यालयों का निर्माण किया जाना है।

बीबीसी के लेख जिसमें सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट की आलोचना की गई है

लेख में पीएम मोदी की तुलना रोम के नीरो (रोम जल रहा था और नीरो बाँसुरी बजा रहा था) से की गई क्योंकि देश में Covid-19 संक्रमण की खतरनाक लहर के बाद भी यह प्रोजेक्ट चल रहा है।

भारत में कोरोना वायरस संक्रमण की दूसरी लहर के लिए भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ही दोषी ठहराया गया। बीबीसी के ही एक लेख में ऑस्ट्रेलियन अखबार के हवाले से कहा गया कि अफसरशाही की असफलता, अहंकार और छद्म राष्ट्रवाद के कारण भारत में कोरोना वायरस का संक्रमण खतरनाक हो गया। लेख में यह भी बताया गया कि मोदी ने गंगा नदी के किनारे न केवल एक हिन्दू त्यौहार (कुंभ) को होने दिया बल्कि पश्चिम बंगाल में चुनाव के दौरान खूब रैलियाँ भी की। हालाँकि इस लेख में दूसरी पार्टियों द्वारा किसी भी राज्य में की गईं एक भी रैली की चर्चा नहीं की गई।

वाशिंगटन पोस्ट का लेख

ऑपइंडिया ने एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी जिसमें बताया गया था कि वाशिंगटन पोस्ट और डीडब्ल्यू न्यूज ने भारत में कोरोना वायरस संक्रमण के हालातों का उपयोग करते हुए सोशल मीडिया में अपना प्रमोशन कर रहे थे। दोनों ही मीडिया समूहों ने ट्विटर ऐड का उपयोग करते हुए भारत में Covid-19 के हालातों पर आधारित अपनी रिपोर्ट को प्रमोट किया था।

वाशिंगटन पोस्ट में अप्रैल 2021 में प्रकाशित लेख में लिखा गया कि जब देश में कोरोना वायरस का संक्रमण तेजी से फैल रहा था तब नरेंद्र मोदी चुनावी रैलियाँ कर रहे थे और गंगा किनारे आयोजित हुए एक बड़े त्यौहार को रोकने में कोई रुचि नहीं दिखा रहे थे जबकि सही तो यह है कि पीएम मोदी ने स्वयं धर्मगुरुओं और मठाधीशों से बात करके कुंभ को सांकेतिक रूप से मनाए जाने का अनुरोध किया था जिसे मान भी लिया गया था।

वाशिंगटन पोस्ट के लेख का एक हिस्सा

इसी लेख में यह भी कहा गया था कि जब देश में स्वास्थ्य सुविधाओं को बढ़ाने की आवश्यकता थी तब मोदी सरकार टीकाकरण पर फोकस कर रही थी और खुद को ही शाबाशी दे रही थी। इस लेख में भी कहा गया कि मोदी ने 2019 की प्रचंड जीत के बाद भी भारतीयों को सेक्युलर गणतांत्रिक भारत की जगह एक ऐसे राष्ट्रवाद का स्वप्न दिया जो भारत को हिन्दू राष्ट्र के रूप में देखता है।

वाशिंगटन पोस्ट ने भारत की मोदी विरोधी राणा आयूब और बरखा दत्त की सहायता से शुरू से ही नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भारत सरकार के खिलाफ अपना प्रोपेगेंडा चलाया। ये दोनों ही ऐसी पत्रकार हैं जो मोदी सरकार की आलोचना का कोई अवसर नहीं छोड़ती हैं। हालाँकि इसे आलोचना के बजाय प्रोपेगेंडा या नैरेटिव कहा जाना चाहिए क्योंकि इनके जैसे कई पत्रकार 2014 से ही मोदी सरकार के पीछे पड़ गए थे और इन्होंने मोदी सरकार के द्वारा किए गए कार्यों पर कोई ध्यान नहीं दिया बल्कि मोदी के नेतृत्व में देश में बढ़ रहे हिन्दू कट्टरवाद का झूठा प्रोपेगेंडा चलाया।   

2014 में भी जब भाजपा की जीत हुई और नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने तब विश्व के कई मीडिया समूहों ने इसे भारत का बदलाव तो बताया लेकिन साथ में राष्ट्रवाद और कट्टर हिन्दुत्व की छवि को भी समेटे रखा। इन मीडिया समूहों के तब प्रकाशित हुए लेखों में यह आशंका जताई गई कि अब भारत में मुस्लिमों का भविष्य क्या है?

नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के साथ ही विश्व मीडिया का उनसे बैर शुरू हो गया था। हर बार इन मीडिया समूहों के लेखों में मोदी के साथ भारत में बढ़ रहे राष्ट्रवाद और हिन्दुत्व की भावना को भी निशाने पर लिया गया। जब भी नरेंद्र मोदी पर कोई लेख लिखा गया तो इसमें उनकी हिन्दू पहचान का वर्णन जरूर किया गया और इस प्रकार किया गया कि उसने पढ़ने वाला इस भ्रम में पड़ जाए कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत एक ऐसे हिन्दू राष्ट्र की ओर बढ़ रहा है जहाँ हिंदुओं के अलावा किसी के लिए कोई जगह नहीं है।

किसान आंदोलन से लेकर कोरोना वायरस संक्रमण तक जब भी सरकार ने अफवाहों को रोकने के लिए कड़े कदम उठाए, इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन बताकर मोदी सरकार पर निशाना साधा गया। 2014 में सत्ता में आने के बाद नरेंद्र मोदी सरकार ने भारत की आर्थिक उन्नति और सामाजिक सुरक्षा के लिए कई नीतियाँ बनाई लेकिन उन नीतियों को भी दरकिनार कर दिया गया और सरकार के प्रयत्नों को धूमिल कर दिया गया।

राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों पर भी जब नरेंद्र मोदी ने कड़े निर्णय लिए तो उन्हें भी हिन्दुत्व और राष्ट्रवाद के प्रतिरूप में ढाल दिया गया और उन्हें भारत में दक्षिणपंथ के अधिनायकवाद के उदय के रूप में दिखाया गया।

हालाँकि, ऐसा नहीं है कि विश्व का मीडिया 2014 से ही नरेंद्र मोदी का बैरी बना हुआ है। गुजरात में हुए 2002 के दंगों के बाद भी इसी मीडिया ने नरेंद्र मोदी को लगातार दंगों का आरोपी बताया और आज भी इन दंगों की चर्चा होने पर मोदी को ही जिम्मेदार ठहराते हैं। उनके लिए यह मायने नहीं रखता कि गोधरा में ट्रेन में हिंदुओं को जिंदा जला दिया गया था।

हाल ही में भारत के कई पत्रकारों ने जलती चिताओं की तस्वीरों को पश्चिमी मीडिया को मुहैया कराया जो बड़े दामों पर ब्रिटिश अमेरिकन मीडिया कंपनी द्वारा बेची जा रही थीं। इन जलती चिताओं का ही उपयोग करके विश्व मीडिया ने भारत में कोरोना वायरस संक्रमण की लड़ाई को असफल करार दिया था और अंततः नरेंद्र मोदी को संक्रमण से निपटने में असफल बताया था। आपदा में फायदा उठाने का बिजनेस मॉडल हमेशा से पश्चिमी मीडिया के लिए अच्छा रहा है। इसलिए उन्होंने जलती चिताओं और लाशों भी उसी में शामिल कर दिया।   

मीडिया ही नहीं अपितु मेडिकल जर्नल लैंसेट ने नरेंद्र मोदी के खिलाफ एक नैरेटिव चलाया। लैंसेट ने 08 मई 2021 को एक लेख प्रकाशित किया जहाँ भारत में कोरोना वायरस संक्रमण के बढ़ते संक्रमण का पूरा ठीकरा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर फोड़ दिया गया। हालाँकि, यह पहली बार नहीं है जब लैंसेट ने नरेंद्र मोदी का विरोध किया हो। इसके पहले लैंसेट कश्मीर से अनुच्छेद 370 के उन्मूलन का विरोध भी कर चुका है।

फिलहाल हम 2021 के मध्य में हैं और अभी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल के तीन वर्ष शेष हैं। ऐसे में यह निश्चित है कि मीडिया (चाहे वह भारतीय हो या विदेशी) और भारत के राष्ट्रवादी लोगों का युद्ध बहुत आगे तक चलने वाला है। इस युद्ध में इतना तो निश्चित है कि मीडिया, हिंदुओं और भारत के हितों पर जोरदार प्रहार करने वाला है और मीडिया के सामने खड़े हैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनका समर्थन करने वाले करोड़ों हिन्दू।  

 

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ओम द्विवेदी
Writer. Part time poet and photographer.

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