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दिल्ली जिमखाना क्लब और CIA के जासूस: राष्ट्रीय सुरक्षा में सेंध की इनसाइड स्टोरी

शीत युद्ध के दौर से ही दिल्ली जिमखाना क्लब विदेशी जासूसों के लिए एक आसान संपर्क क्षेत्र रहा है, जहाँ वे देश के नीति-निर्माताओं और नौकरशाहों से बिना किसी सरकारी पाबंदी या खुफिया एजेंसियों की कड़ी निगरानी के आसानी से मिल सकते थे।

अगर किसी परमाणु संपन्न राष्ट्र या दुनिया की उभरती हुई महाशक्ति की राष्ट्रीय सुरक्षा में सेंध लगानी हो, तो उसके सैन्य ठिकानों पर बम गिराने की आवश्यकता नहीं होती। इसके लिए बस उस देश के सबसे रसूखदार, औपनिवेशिक काल के एलीट क्लब की सदस्यता लेना ही काफी है, जहाँ शाम ढलते ही देश के नीति-निर्माता अपनी सुरक्षा और गरिमा को स्कॉच के पेग में घोल देते हैं।

यह सब कुछ वास्तविक घटनाओं पर आधारित कहानियाँ हैं, जो यह दर्शाती हैं कि कैसे देश की राजधानी दिल्ली के केंद्र में स्थित एक एलीट क्लब दशकों तक विदेशी जासूसों का खेल का मैदान बना रहा। इस पूरी गाथा के केंद्र में ‘दिल्ली जिमखाना क्लब’ (DGC) है, जिसे बचाने के लिए इसके रसूखदार सदस्यों ने अपनी पूरी ताकत लगा रखी है।

अध्याय 1: लुटियंस दिल्ली की ‘मधुशाला’ और राष्ट्रीय सुरक्षा का अलार्म

साल 2026 की शुरुआत दिल्ली जिमखाना क्लब के लिए एक बड़े झटके के साथ हुई। भारत सरकार के भूमि और विकास कार्यालय (L&DO) ने इस 113 साल पुराने क्लब को खाली करने का सख्त आदेश जारी कर दिया। इस कड़े कदम के पीछे राष्ट्रीय सुरक्षा, रक्षा बुनियादी ढांचे को मजबूत करना और जनहित जैसे गंभीर कारण रहे हैं।

यह क्लब प्रधानमंत्री आवास (7 लोक कल्याण मार्ग) से महज़ कुछ ही मीटर की दूरी पर, 27.3 एकड़ के बेहद संवेदनशील और रणनीतिक क्षेत्र में फैला हुआ है। आम जनता के लिए यह केवल रईसों के मनोरंजन का अड्डा हो सकता है, लेकिन भारत सरकार के लिए यह हमेशा से एक बड़ा राष्ट्रीय सुरक्षा जोखिम रहा है।

साल 2020 में कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय ने अदालत में इस क्लब की कार्यप्रणाली पर एक बेहद तीखा बयान देते हुए कहा था, “यह क्लब व्यायामशाला से मधुशाला बन चुका है।” यह एक ऐसी ‘रियासत’ बनकर रह गया था, जहाँ देश की संभ्रांत नौकरशाही और विदेशी राजनयिकों का ऐसा घालमेल था, जो सुरक्षा तंत्र की आँखों में धूल झोंकने के लिए पर्याप्त था।

शीत युद्ध (Cold War) के दौरान, दिल्ली जिमखाना क्लब एक ऐसा संपर्क क्षेत्र (कॉन्टैक्ट ज़ोन) था, जहाँ राजनयिकों के भेष में घूम रहे विदेशी जासूस बिना किसी सरकारी पाबंदी या इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) जैसी खुफिया संस्थाओं की नजरों में आए, भारतीय जनरलों और नौकरशाहों से आसानी से मिल सकते थे।

अध्याय 2: टी-72 टैंक और टेनिस कोर्ट का जादुई ‘ड्रॉप’

यह घटना साल 1978 की है। भारतीय सेना ने सोवियत संघ से पहली बार उस दौर के सबसे आधुनिक और खतरनाक टी-72 टैंक (T-72/T-72M) मँगाए थे। करीब 41 टन वजनी यह फौलादी टैंक उस समय अमेरिकी रक्षा मंत्रालय (पेंटागन) और सीआईए (CIA) के लिए एक बड़ा रहस्य बना हुआ था। आखिर इस टैंक में ऐसा क्या था जिसने अमेरिका की नींद उड़ा रखी थी? इसके मुख्य तीन कारण थे-

मजबूत फ्रंट आर्मर (Glacis Armour): यह सिर्फ स्टील की चादर नहीं थी, बल्कि हाई-कार्बन स्टील और पॉलीयुरेथेन की कई परतों से बनी एक ऐसी सुरक्षा ढाल थी, जिसे भेदना बेहद मुश्किल माना जाता था।
लेजर रेंजफाइंडर और ऑटो-लोडर सिस्टम: इसमें लक्ष्य की दूरी नापने और गोला लोड करने का काम मशीन खुद करती थी, जिससे टैंक दुश्मन पर बहुत तेजी से प्रहार कर सकता था।
125mm स्मूथबोर गन: उस दौर में यह दुनिया की सबसे घातक टैंक गनों में शुमार थी, जो कुछ ही सेकंड में दुश्मन के टैंक को मलबे में बदल सकती थी।

सीआईए इस टैंक का पूरा ब्योरा (जिसे खुफिया भाषा में ‘SOVMAT’ कहा जाता था) हर हाल में हासिल करना चाहती थी। उन्होंने एक भारतीय सैन्य अधिकारी को रिश्वत देकर टैंक को सीमा पार पाकिस्तान भगाने की भी योजना बनाई थी, जो विफल रही।

तभी मैदान में सीआईए का एक शातिर फील्ड एजेंट रॉबर्ट बेयर उतरा, जो नई दिल्ली में अमेरिकी दूतावास में तैनात था। बेयर ने अपनी प्रसिद्ध आत्मकथा ‘सी नो इविल’ (See No Evil) में इस खतरनाक घटनाक्रम का जिक्र किया है।

बेयर के एक भारतीय एजेंट ने सेना के लॉकर से टी-72 के बेहद गोपनीय मैनुअल्स चुरा तो लिए थे, लेकिन एक बड़ी शर्त थी। उन मैनुअल्स को सिर्फ दो घंटे के भीतर वापस सैन्य तिजोरी में रखना था, इससे पहले कि सार्जेंट की ड्यूटी बदले और राज़ खुले। बेयर मैनुअल लेकर भागा, लेकिन भारत की खुफिया एजेंसी ‘इंटेलिजेंस ब्यूरो’ (IB) की पाँच गाड़ियाँ उसका पीछा कर रही थीं।

समय तेज़ी से खत्म हो रहा था और केवल 17 मिनट बचे थे। बेयर ने तत्परता दिखाते हुए अपनी गाड़ी सीधे दिल्ली जिमखाना क्लब के गेट के भीतर घुसा दी। पीछे-पीछे आईबी की गाड़ियाँ भी आ गईं। बेयर ने बिना गाड़ी रोके उसे सीधे टेनिस कोर्ट के बीच के पतले बजरी वाले पैदल रास्ते पर दौड़ा दिया, जहाँ आईबी की गाड़ियाँ पीछे आने में असमर्थ थीं।

बेयर ने उन मैनुअल्स को एक टेनिस बैग में डाला और इमली के पेड़ों के बीच से होते हुए गेस्ट हाउस नंबर तीन के पास झाड़ियों के पीछे छिपे अपने एजेंट की तरफ फेंक दिया। इसके बाद पीछा कर रहे आईबी के जासूसों को भ्रमित करने के लिए बेयर सीधे जिमखाना क्लब के बार में चला गया। वहाँ वह थ्री-पीस सूट पहने अकेले बैठे एक बेहद प्रतिष्ठित और निर्दोष भारतीय सज्जन के बगल में बैठ गया और वेटर को आवाज़ देकर दो डबल स्कॉच का ऑर्डर दे दिया।

जब आईबी के जासूस हाँफते हुए बार में घुसे, तो उन्होंने बेयर को उस भारतीय संभ्रांत व्यक्ति के साथ गंभीर चर्चा करते देखा। आईबी का पूरा ध्यान उस बेकसूर भारतीय पर टिक गया कि आखिर बेयर इतनी हड़बड़ी में उससे क्या बात करने आया था। इस ड्रामे ने सीआईए के एजेंट को इतना समय दे दिया कि वह मैनुअल लेकर सुरक्षित वापस जा सका और उन्हें सेना के लॉकर में रख दिया।

इस चोरी का परिणाम यह हुआ कि 1982 में सीआईए ने इस मैनुअल के जरिए निष्कर्ष निकाला कि शुरुआती टी-72 वर्जन की रात में लड़ने की क्षमता पश्चिमी समकक्ष टैंकों की तुलना में सीमित थी। यह रणनीतिक कमजोरी सीआईए ने तुरंत अमेरिकी डिफेंस इंडस्ट्री और अपने फ्रंटलाइन पार्टनर पाकिस्तान की सेना के साथ साझा कर दी।

अध्याय 3: पंजाब का जंगल, ‘चोर दरवाज़ा’ और मोर का अवैध शिकार

सैन्य अधिकारियों के लिए नियम बेहद कड़े थे। वे किसी विदेशी नागरिक से सीधे नहीं मिल सकते थे और मिलने पर उन्हें तुरंत सरकार को इसकी रिपोर्ट करनी होती थी। ऐसे में सीआईए के लिए सीधे सैन्य अधिकारियों को अपने जाल में फँसाना लगभग असंभव था।

रॉबर्ट बेयर ने अपनी किताब के पृष्ठ संख्या 75 पर लिखा है कि उन्होंने इस कड़े सिस्टम में एक ‘चोर दरवाज़ा’ खोज निकाला। बेयर को पता चला कि भारतीय सैन्य अधिकारियों को शिकार करने का अत्यधिक शौक है।

इसके बाद बेयर ने अपनी एक शिकारी वाली पहचान बनाई, सिविलियन नंबर प्लेट वाली एक मिलिट्री जीप खरीदी और पंजाब के जंगलों में डेरा डाल दिया। वहाँ उसकी मुलाकात ‘सिंह’ नाम के एक रसूखदार भारतीय सैन्य अधिकारी से हुई, जो भारत-सोवियत दोस्ती के सख्त खिलाफ था। दोनों के बीच दोस्ती गहरी हो गई। वे सप्ताहांत (वीकेंड) पर पंजाब के जंगलों और यहाँ तक कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के निजी एस्टेट में अवैध रूप से भारत के राष्ट्रीय पक्षी ‘मोर’ का शिकार करने लगे।

बेयर ने सिंह को एक बेहद कीमती इतालवी बन्दूक (Browning Double-barrel) उपहार में दी। बाद में, नई दिल्ली के सीआईए स्टेशन प्रमुख ‘वाइल्ड बिल’ को भी इस शिकार यात्रा में शामिल किया गया और ‘सिंह’ को पूरी तरह से अपने साथ मिला लिया गया। इसके बाद सिंह ने अनजाने में भारत के सोवियत सैन्य उपकरणों और रक्षा व रणनीतिक कमियों की सभी संवेदनशील जानकारियां सीआईए को सौंप दीं।

अध्याय 4: हनीट्रैप और मद्रास कैफ़े की कड़वी हकीकत

सीआईए का यह एलीट नेटवर्क सिर्फ दिल्ली या पंजाब तक ही सीमित नहीं था। 1980 के दशक के मध्य में, जब श्रीलंका का गृहयुद्ध अपने चरम पर था, तब भारत की बाह्य खुफिया एजेंसी रॉ (R&AW) के मद्रास स्टेशन प्रमुख के.वी. उन्नीकृष्णन थे।

उन्नीकृष्णन को श्रीलंका (कोलंबो) में उनकी तैनाती के दौरान सीआईए ने एक एयर होस्टेस के ज़रिए बेहद शातिर तरीके से हनीट्रैप में फँसा लिया था। उनकी कुछ आपत्तिजनक तस्वीरें और वीडियो रिकॉर्ड कर लिए गए थे, जिसके बाद ब्लैकमेलिंग का वह खेल शुरू हुआ जिसने भारत के राष्ट्रीय हितों को गहरे जख्म दिए।

उन्नीकृष्णन ने लगभग दो साल तक सीआईए के लिए काम किया। उन्होंने भारत की सबसे गुप्त नीतियों जैसे तमिल उग्रवादियों (LTTE) को भारत द्वारा दी जा रही हथियारों की ट्रेनिंग और श्रीलंका शांति समझौते को लेकर भारत सरकार की रणनीति की पूरी फाइलें सीआईए को सौंप दीं।

सीआईए ने यह संवेदनशील जानकारी श्रीलंकाई सरकार तक पहुँचाई, जिसके कारण बाद में भारतीय शांति सेना (IPKF) को वहाँ भारी सैन्य और मानवीय नुकसान झेलना पड़ा। जब तक आईबी की काउंटर-इंटेलिजेंस विंग ने उन्हें मुंबई से गिरफ्तार किया, तब तक देश का बहुत बड़ा नुकसान हो चुका था। इस घटना के बाद उन्हें सेवा से बर्खास्त कर तिहाड़ जेल भेज दिया गया था।

अध्याय 5: जासूसों के अन्य पसंदीदा ‘अड्डे’ और कराची कनेक्शन

राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसियों के रडार पर केवल दिल्ली जिमखाना क्लब ही नहीं, बल्कि एलीट कल्चर के ऐसे कई अन्य ठिकाने भी रहे हैं:

दिल्ली गोल्फ क्लब: लुटियंस दिल्ली के केंद्र में 170 एकड़ में फैला यह गोल्फ क्लब देश के सेवानिवृत्त जनरलों, खुफिया प्रमुखों और नौकरशाहों का अनौपचारिक अड्डा रहा है। यहाँ ‘सॉफ्ट कल्टीवेशन’ के ज़रिए विदेशी राजनयिक खेल-खेल में देश की नीतियां उगलवा लेते थे।

जयपुर पोलो ग्राउंड (दिल्ली): प्रधानमंत्री आवास के ठीक सामने स्थित यह मैदान खेल और सत्ता के मेलजोल का बड़ा केंद्र हुआ करता था, जिस पर कुछ समय पहले ही मोदी सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा कारणों से कड़ा एक्शन लिया है।

कराची जिमखाना क्लब (पाकिस्तान): दिल्ली जिमखाना की ही तरह औपनिवेशिक काल का यह क्लब पाकिस्तान के कराची शहर के केंद्र में स्थित है। यहाँ भी अमेरिकी और पश्चिमी राजनयिक वहाँ के स्थानीय अधिकारियों और सैन्य कर्मियों को प्रभावित करने तथा खुफिया नेटवर्क तैयार करने के लिए सोशल नेटवर्किंग का सहारा लेते थे।

इसके अलावा लुटियंस दिल्ली के संभ्रांत इलाकों जैसे ‘गोल्फ लिंक्स’ के बंगले हमेशा से खुफिया निगरानी के मुख्य केंद्र रहे हैं। पूर्व रॉ अधिकारी मलय कृष्ण धर ने अपनी पुस्तक ‘ओपन सीक्रेट्स‘ में खुलासा किया है कि कैसे राजीव गाँधी सरकार के दौरान राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह और गृह मंत्री के बीच की तनातनी को रिकॉर्ड करने के लिए राष्ट्रपति भवन तक को टैप किया गया था। हालाँकि ऐसा नहीं है कि भारत ने कभी ऐसी रणनीतियाँ नहीं अपनाईं। मलय कृष्ण लिखते हैं कि कई बार मणिपुर के उग्रवादियों और एक पुलिस कांस्टेबल से जानकारी निकलवाने के लिए शराब को भी एक टूल की तरह इस्तेमाल किया जाता था।

परंतु खुफिया एजेंसियों के इस जिमखाना जैसे ढीले एलीट सुरक्षा सिस्टम का फायदा उठाकर साल 2004 में रॉ (R&AW) के संयुक्त सचिव रबिंदर सिंह, सीआईए के एजेंट डेविड वकाला की मदद से जाली पासपोर्ट पर काठमांडू के रास्ते अमेरिका भागने में सफल रहे। इस घटना को रॉ के पूर्व विशेष सचिव अमर भूषण ने अपनी चर्चित पुस्तक ‘एस्केप टू नोव्हेयर’ (Escape to Nowhere) में विस्तार से बताया है।

ये एलीट क्लब सुरक्षा के लिए क्यों हैं संवेदनशील?

विदेशी ताकतों के लिए ये जिमखाना जैसे संभ्रांत क्लब राष्ट्रीय सुरक्षा के सबसे बड़े ‘सॉफ्ट टारगेट’ क्यों रहे हैं? इसके तीन मुख्य रणनीतिक कारण हैं-

  1. प्रोटोकॉल का भय न होना: एक सरकारी दफ्तर में विदेशी राजनयिकों से मिलने के लिए कड़े नियम होते हैं, लेकिन जिमखाना या गोल्फ क्लब की हरी घास पर स्कॉच का ग्लास हाथ में लिए राजनयिक और रक्षा अधिकारी बिना किसी लिखित अनुमति के आपस में सुरक्षा नीतियां साझा कर लेते हैं।
  2. सॉफ्ट कल्टीवेशन: टेनिस, पोलो या गोल्फ जैसे खेलों और शिकार जैसे निजी शौकों को जरिया बनाकर विदेशी एजेंसियाँ धीरे-धीरे अधिकारियों को अपना कर्जदार बना लेती हैं। इसकी शुरुआत गोल्फ स्टिक्स उधार लेने या बन्दूक उपहार में देने से होती है और अंत देशद्रोह पर जाकर होता है।
  3. रणनीतिक निकटता: ये सभी एलीट क्लब राजधानी दिल्ली के केंद्र यानी प्रधानमंत्री आवास और संवेदनशील रक्षा मुख्यालयों के ठीक बगल में स्थित हैं। ऐसे संवेदनशील क्षेत्रों में सुरक्षा ऑडिट के बिना विदेशी नागरिकों की बेरोकटोक आवाजाही किसी भी देश के लिए आत्मघाती कदम है।

यही कारण है कि साल 2026 में भारत सरकार ने इस औपनिवेशिक दौर से मिले विशेषाधिकार वाले सुरक्षित ठिकाने का पट्टा खत्म करने और उसे खाली कराने का यह बड़ा फैसला लिया है। आखिर किसी भी संप्रभु देश के लिए कुछ चुनिंदा रईसों के मनोरंजन और शराब की महफिलों से कहीं अधिक महत्वपूर्ण उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा (National Security) होती है। देश की सुरक्षा से बढ़कर कोई विशेषाधिकार नहीं हो सकता।

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आशीष नौटियाल
आशीष नौटियाल
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