Thursday, October 1, 2020
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दिग्विजय सिंह को राज्यसभा भेजने के लिए कॉन्ग्रेस ने दी दलित की ‘बलि’: MP में चुनाव के बीच याद आया वडोदरा

मॉंग थी कि दिग्विजय सिंह त्याग करे। लेकिन, कॉन्ग्रेस ने अपने इस बड़बोले नेता के लिए फूल सिंह बरैया को 'दोयम दर्जे' का उम्मीदवार बनाया। ताकि उच्च सदन में दिग्विजय के पहुॅंचने में कोई शंका न रहे।

पूर्वी दिल्ली का सीलमपुर। यहॉं दलितों की अच्छी-ख़ासी आबादी है। 27 मार्च 2014) को यहॉं नरेंद्र मोदी भाषण दे रहे थे। तब वे प्रधानमंत्री नहीं बने थे। लोकसभा चुनाव का प्रचार जोरों पर था। गुजरात के वडोदरा से मोदी के चुनाव लड़ने की घोषणा हो चुकी थी।

इसी दौरान सीलमपुर में नरेंद्र मोदी ने एक विशाल सभा को सम्बोधित करते हुए कहा था;

“कॉन्ग्रेस ने वडोदरा से उम्मीदवार बदल दिया है और इसका कारण ये है कि वे दलित थे। शहजादे को लोकतंत्र में विश्वास नहीं है। क्या दलित होना गुनाह है? कॉन्ग्रेस ने ऐसा कर एक दलित का अपमान किया है। शहजादे को एक दलित के साथ हुए अत्याचार का जवाब देना होगा। तोमर को एक प्रक्रिया के तहत उम्मीदवार चुना गया था। फिर भी उन्हें हटा दिया गया। उन्हें दलित होने की सज़ा दी गई है।

अब जानते हैं कि मोदी ने ऐसा क्यों कहा था? असल में नरेंद्र रावत जो कि कॉन्ग्रेस के प्रमुख भी थे, को लोकसभा चुनाव लड़ना था। लेकिन, जैसे ही नरेंद्र मोदी ने वहाँ से चुनाव लड़ने की घोषणा की, कॉन्ग्रेस ने उम्मीदवार बदल दिया

नए उम्मीदवार का नाम था मधुसूदन मिस्त्री, जो पहले साबरकाँठा से 2 बार सांसद रह चुके थे। वही लोकसभा क्षेत्र, जहाँ से भारत के प्रधानमंत्री रहे गुलजारी लाल नंदा ने हैट्रिक बनाई थी। बाद में रामानंद सागर के रामायण में रावण का किरदार निभाने वाले अरविन्द त्रिवेदी भी यहीं से सांसद रहे थे।

अब मिस्त्री रसूखदार थे, कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी के क़रीबी माने जाते थे, उन्हें टिकट मिलने के बाद हंगामा हुआ। हंगामे का कारण उन्हें टिकट मिलने से ज्यादा नरेंद्र रावत का टिकट काटना था।

मोदी के उस संबोधन को छह साल से भी ज्यादा हो गए, लेकिन कॉन्ग्रेस वहीं की वहीं है। बस इलाक़ा बदल गया है। ताज़ा मामला मध्य प्रदेश में होने जा रहे राज्यसभा चुनाव और वहाँ के बड़बोले नेता और पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह से जुड़ा है। कॉन्ग्रेस के एक वर्ग की माँग थी कि अनुसूचित जाति से आने वाले फूल सिंह बरैया को राज्यसभा पहुँचाया जाए, ताकि दलितों के बीच पार्टी का आधार मजबूत करने में बल मिले।

हालाँकि, ऐसा नहीं है कि कॉन्ग्रेस में सब दिग्विजय के पक्ष में गोलबंद थे और सार्वजनिक रूप से आवाज़ नहीं उठी थी। कॉन्ग्रेस के ही नेता चौधरी राकेश सिंह चतुर्वेदी ने ट्वीट कर कहा था कि दिग्विजय सिंह को इस बात की पहल करनी चाहिए कि फूल सिंह बरैया राज्यसभा चुनाव में प्रथम वरीयता का उम्मीदवार बनें। चौधरी राकेश सिंह ने दिग्विजय सिंह को त्याग का परिचय देने की सलाह दी थी। पर पार्टी ने उन्हें नज़रअंदाज़ किया।

बता दें कि दिग्विजय सिंह ने ही बरैया को राजनीति में एंट्री कराई थी, लेकिन अब उनकी राह में दिग्विजय ही बाधा बन गए। बरैया को राज्यसभा जाने का मौका नहीं मिला और दिग्विजय कॉन्ग्रेस के उम्मीदवार बन गए। पिछले लोकसभा चुनाव में भोपाल से साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर ने दिग्विजय को करारी मात दी थी। एक दलित की जगह चुनाव हारे हुए उम्मीदवार को तरजीह दी गई। तभी तो भाजपा ने इस पर बयान देते हुए कहा:

“कॉन्ग्रेस का दलित विरोधी चेहरा फिर सामने आ गया है। दिग्विजय सिंह राज्यसभा जाएँगे और फूल सिंह बरैया को बाहर का रास्ता देखना पड़ेगा। दिग्विजय सिंह का रवैया लगातार दलित विरोधी रहा है। जब कॉन्ग्रेस विपक्ष में थी तब भी बाला बच्चन को दिग्विजय सिंह ने नेता प्रतिपक्ष नहीं बनने दिया था। नेहरू ने बाबासाहब आंबेडकर को चुनाव हरवाया था। इंदिरा ने बाबू जगजीवन राम को अपमानित कराया था। सोनिया ने सीताराम केसरी को कमरे में बंद कर अध्यक्ष पद हथियाया था। नेहरू ख़ानदान की हर पीढ़ी ने अनुसूचित वर्ग का अपमान किया है।”

हालाँकि, अगर चुनावी समीकरणों की बात करें तो एक सीट कॉन्ग्रेस और दो सीटें भाजपा के पक्ष में जानी तय है। लेकिन, यहाँ एक ट्विस्ट आता है। दिग्विजय सिंह के बाद फूल सिंह बरैया को भी राज्यसभा प्रत्याशी बना दिया गया है, जबकि राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि उनकी हार तय है। भाजपा भी कहती है कि दलित बरैया को ‘दोयम दर्जे’ का प्रत्याशी बनाया गया है। यानी, दिग्विजय की राज्यसभा सदस्यता के लिए एक दलित की ‘बलि’ ले ली गई।

एक सवाल ये भी उठ सकता है कि जब कॉन्ग्रेस को दलित फूल सिंह बरैया को राज्यसभा भेजने का मन नहीं था तो उसने उन्हें आगामी विधानसभा उपचुनाव के लिए क्यों नहीं उतारा? कॉन्ग्रेस का एक धड़ा मानता है कि चम्बल-दियारा क्षेत्र में उनके उतरने से एक सीट तो पक्की हो ही जाती। अन्य सीटों पर भी दलितों के कुछ वोट कॉन्ग्रेस के पाले में आते। लेकिन, कॉन्ग्रेस ने ऐसा नहीं किया। क्या दाँव उलटा पड़ने का डर था?

कॉन्ग्रेस को ये डर भी हो सकता है कि फूल सिंह बरैया को उतारने से कहीं ओबीसी या सामन्य वर्ग पार्टी के खिलाफ एकजुट न हो जाए। जहाँ उपचुनावों में ऐसी स्थिति में सत्ताधारी पार्टी की जीत का इतिहास रहा है, कॉन्ग्रेस यहाँ अपनी इज्जत बचाने उत्तर रही है, क्योंकि कमलनाथ सरकार के काम गिनाने के नाम पर उसके पास कुछ है नहीं। कर्जमाफी फ्लॉप हो गई और उलटा किसानों के गुस्से का कारण बनी।

क्या ध्रुवीकरण के इसी भय के कारण बरैया की ‘बलि’ दे दी गई?

अब आते हैं आंबेडकर वाली बात पर। दरअसल, वो पहले चुनाव में ‘शेड्यूल्ड कास्ट पार्टी ऑफ इंडिया’ से खड़े हुए थे। कॉन्ग्रेस ने उनके खिलाफ उम्मीदवार उतारा, सीपीआई ने उनके खिलाफ प्रचार किया और उनकी हार हो गई। आंबेडकर चौथे नंबर पर रहे। नेहरू ने बॉम्बे नॉर्थ से नारायण शाडोबा काजरोलकर को उतारा था जो आंबेडकर के सहयोगी रहे थे। उनकी जीत हुई।

इसी तरह आपातकाल के दौरान इंदिरा गाँधी से तंग आकर बाबू जगजीवन राम ने कॉन्ग्रेस छोड़ी थी। सोनिया गाँधी जब अध्यक्ष बनी थीं, तब तत्कालीन कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सीताराम केसरी को अपमानित किया गया था। यहाँ तक कि बूढ़े केसरी जब अपने घर पहुँचे तो वहाँ उन्हें रिसीव करने के लिए एक कुत्ते के अलावा कोई नहीं था। स्वाभाविक है कि ऐसी घटनाओं के मद्देनज़र कॉन्ग्रेस को उसका इतिहास याद दिलाया जाएगा।

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अनुपम कुमार सिंहhttp://anupamkrsin.wordpress.com
चम्पारण से. हमेशा राइट. भारतीय इतिहास, राजनीति और संस्कृति की समझ. बीआईटी मेसरा से कंप्यूटर साइंस में स्नातक.

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