संविधान और शरीयत में से शरीयत को चुन चुका है शाहीन बाग़

अगर सिर्फ सत्ता के विरोध के लिए 'फ़क़ हिंदुत्व' कहने वाली इस्लामिक विचारधारा के सामने ही अगर दूसरी भीड़ को खड़ा कर के 'फ़क़ *स्लाम' बुलवा दिया जाए, तो शार्ली हेब्दो जैसी घटना होते देर नहीं लगेगी।

जब देशभर में नागरिकता संशोधन कानून और राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर का विरोध शुरू हुआ था, तब किसी ने यह शायद ही सोचा होगा कि कानून और सत्ता के विरोध के बहाने मजहबी घृणा और मजहबी प्रभुत्व की लड़ाई इतनी जल्दी अपने वास्तविक स्वरुप में आ जाएगी। शाहीन बाग़ में जो कुछ घट रहा है, या फिर घटित हो चुका है, वह भारत जैसे एक संवैधानिक देश में होते देखना निराश करने वाला है।

यदि इस पूरे CAA-NRC विरोध के घटनाक्रम पर नजर डालें तो हम देखते हैं कि नागरिकता संशोधन कानून की जगह यह पूरा विवाद ओवैसी द्वारा फैलाए गए डिटेंशन कैम्प और मीडिया गिरोहों की भ्रामक करतूतों से ही शुरू हुआ। मीडिया गिरोह में रवीश कुमार जैस बौद्धिक दैन्य पत्रकारों ने लोगों को डराने और उन्हें गुमराह करने में पूरी भूमिका निभाई।

रवीश कुमार और उनकी सेना ने तुरंत मोर्चा संभाला और उन्हें मानो अपने सदियों पुराने फासिज़्म के शगल पर चर्चा करने का बहाना ही मिल गया। फ़ौरन हायब्रिड कम्युनिस्ट फासिज़्म की ढपली उठाकर उसे बजाने लगे। प्राइम टाइम से लेकर उनकी सोशल मीडिया प्रोफाइल तक गैस चैंबर की ‘रूमानी’ शायरियों से भर दी गईं। बाकी बची हुई कसर पूरी करने के लिए उनके छोटे-बड़े स्क्रॉल, ऑल्ट न्यूज़ और दी क्विंट जैसे घातक दस्ते तो हैं ही।

इसके बाद शाहीन बाग़ मानो आज़ादी के इन फ़र्ज़ी चितेरों का मक्का बन गया। बुर्के और हिजाब में लोग अल्लाह हू अकबर और इस्लामिक नारे लगाते हुए इकट्ठे हुए। इस सबके बीच राजनीतिक विरोधी दल अपने वर्षों पुराने लक्ष्य में आधे कामयाब होते नजर आए। वर्ष 2014 के चुनाव के बाद से ही हमने देखा कि कॉन्ग्रेस जैसे विपक्षी दल जनता से खुद को सत्ता न सौंपने की भड़ास निकालते रहे। देश में जाति, धर्म आदि के नाम पर समय-समय पर दंगे करवाए गए। यह कहने में कोई अतिश्योक्ति नहीं है कि कॉन्ग्रेस इन दंगों को सरकार में न होने के बदले दंड के रूप में जनता को सौंपती है।

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2014 से ही विपक्ष निरंतर यह चाहता रहा कि वह एक अनियंत्रित भीड़ को सत्ता के विरोध में सड़क पर लेकर आए। पहले किसानों के जरिए यह जोर आजमाया गया, फिर पुरस्कार वापसी गैंग को मैदान में उतरा गया। यही तरीका कश्मीर में अनुच्छेद 370 के निष्क्रीय किए जाने पर भी अपनाया गया। और भी ऐसे ही न जाने कितने तरीकों से सरकार विरोधी माहौल विपक्ष द्वारा तैयार किया गया। इस पूरे प्रकरण में सबसे दिलचस्प बात यह रही कि विरोधी हमेशा इस सरकार को संविधान को तोड़ने वाले और संविधान के प्रहरियों की लड़ाई के रूप में स्थापित करने का प्रयास करते हुए देखा गया।

लेकिन वास्तविकता आज बुरका पहनकर शाहीन बाग़ में अल्लाह हू अकबर के नारे लगाते हुए पत्रकारों की सामूहिक लिंचिंग कर रही है। शाहीन बाग़ कानून निर्माताओं द्वारा देश के सबसे पवित्र धर्मस्थल, संसद में बनाए गए कानून को प्राथमिकता देने के बजाए इस्लामिक नारे लगाते हुए जिहादियों की भाषा बोल रहा है। प्रोग्रेसिव लिबरल्स आज शाहीन बाग़ में अपनी विषैली मानसिकता के जहर को हवाओं में फेंकने के लिए आठ-दस साल के बच्चों तक को अपना हथियार बनाने से भी पीछे नहीं हट रहा है। सेकुलर शाहीन बाग़ आज ला इलाहा इल्लल्लाह और अल्हम्दुलिल्लाह का स्वर बोल रहा है, और क्योंकि यह स्वर क्रांतिजीवों, JNU-मतावलम्बियों के श्रीमुख से निकला है, इसलिए प्रोग्रेसिव लिबरल भी उनकी हाँ में हाँ मिलाता नजर आ रहा है।

शाहीन बाग़ की भीड़ कल तक इस देश को एक सीमाओं से बंधा देश मानने से इंकार करती थी, लेकिन आज वह यह साबित करते देखे जा रहे हैं कि इस देश की मिट्टी में उनका भी खून है। शाहीन बाग़ का शरजील भी आज द्वि-राष्ट्र सिद्धांत को समय से बहुत पहले कह देने वाले मुस्लिम धर्म सुधारक सर सैयद अहमद खान की भाषा बोल रहा है। वो शाहीन बाग़ की भीड़ से कह रहा है कि वो असम को भारत से काट देना चाहता है। इस सबके बीच सवाल बस यह है कि इस सबके बीच संविधान के रक्षक कौन नजर आ रहे हैं?

क्या इस भीड़ का नायक यह नव-द्विराष्ट्र सिद्धांत का प्रणेता शरजील है या, इसकी नेता नव-कम्युनिस्ट शेहला रशीद है, जो अल्हम्दुलिल्लाह कहकर जम्मू कश्मीर में राजनीति में कूदने के दाँव खेलकर सारे वामपंथी समाज को चकमा दे चुकी है? या फिर लालू प्रासाद यादव के पैर छूकर फासीवाद से लड़ने वाला मौकापरस्त कन्हैया कुमार इस भीड़ का नायक है? इसी भीड़ के लिए हरिशंकर परसाई कह गए थे कि तुम क्रांतिकारी नहीं, बल्कि तुम एक बुर्जुआ बौड़म हो।

आर्यों को विदेशी सिद्ध करने में ही अपनी सारी बौद्धिक शक्ति झोंक देने वाली इस शाहीन बाग़ की भीड़ को आज अगर संविधान निर्माता आकर यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) और शरीयत का विकल्प दें, तो हम सब जानते हैं कि यह भीड़ क्या चुनने वाली है। हमारे देश में ही हमारे ही संविधान के विपरीत कुछ उतावले लोग खड़े होकर हिंदुत्व विरोधी नारे लगाते हुए अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता की भी दुहाई देते हैं। याद रखें कि यह भीड़ उन्हीं लोगों का झुण्ड है, जो यह मानता है कि राष्ट्रीय एकता और अखंडता की निष्ठा अपरिहार्य होना ‘हायपर नेशनलिज़्म’ है।

हम सब जानते हैं कि अगर सिर्फ सत्ता के विरोध के लिए ‘फ़क़ हिंदुत्व’ कहने वाली इस्लामिक विचारधारा के सामने ही अगर दूसरी भीड़ को खड़ा कर के ‘फ़क़ *स्लाम’ बुलवा दिया जाए, तो शार्ली हेब्दो जैसी घटना होते देर नहीं लगेगी। कौन ‘प्रोग्रेसिव क्रांतिबीज’ कब और कहाँ से फूट पड़ेगा, यह तय करना मुश्किल हो जाएगा। खुसर-पुसर तो इस बात को भी लेकर खूब हो रही है कि ‘प्रोग्रेसिव लिबरल्स’ की जुबान पर इस्लामिक नारों का इस तरह से खुलकर आना राम मंदिर के फैसले और कश्मीर में अनुच्छेद 370 को निष्क्रीय करने के बाद से उमड़ कर आ रहा है। लेकिन अफवाहों पर ध्यान नहीं दिया जाना चाहिए।

यह इस देश की सहिष्णुता ही है, जिसने हमेशा से शरणार्थियों से लेकर आतताइयों तक को भी सर आँखों पर बिठाए रखा और जो हम आज शाहीन बाग़ में देख रहे हैं वह इस सहिष्णुता का ही नतीजा है। CAA या NRC जरुरी है या नहीं लेकिन इस पूरे प्रकरण में कम से कम यह तो साबित हो ही चुका है कि इस देश का विचारक वर्ग देश के संविधान और इस्लामिक शरीयत कानून में से शरीयत को चुन चुका है। देखना अब यह बाकी है कि कानून के विरोध के नाम पर चल रहा यह देश विरोधी इस्लामिक एजेंडा अभी और कितनी करवटें लेता है।

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