Sunday, April 18, 2021
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देखले दरभंगा, चिन्हले चपरासी: नाम वाले गुलाम किनारे, ‘नामदार’ के वफादारों को प्रमोशन से कॉन्ग्रेस का कितना भला?

अमूमन किसी राजनीतिक दल में इतने व्यापक फेरबदल का असर उसकी कार्यसंस्कृति में बड़े बदलाव के तौर पर दिखता है। पर कॉन्ग्रेस के मामले में शायद ही यह हो। असल में जो भी नाम आगे बढ़ाए गए हैं, वे पहले भी राहुल के नेतृत्व में अलग-अलग वक्त पर बड़ी जिम्मेदारी सॅंभाल चुके हैं।

अमेरिका के राष्ट्रपति रहे फ्रैंकलिन डी रूजवेल्ट ने कहा था

राजनीति में कुछ भी अचानक नहीं होता है। यदि ऐसा दिखता है तो शर्तिया उसकी योजना ही इस तरह बनाई गई होगी

ठीक इसी तरह 24 अगस्त 2020 को कॉन्ग्रेस कार्यसमिति की बैठक से पहले अप्रत्याशित तौर उभरा ‘लेटर विवाद‘ 11 सितंबर को एक नए पड़ाव पर पहुॅंचा। व्यापक फेरबदल के नाम पर जिस तरह ओल्ड गार्ड को किनारे कर कॉन्ग्रेस ने अपने युवराज के वफादारों को भाव दिया है, वह उस यो​जना का हिस्सा है जो अध्यक्ष पद पर राहुल गॉंधी की दोबारा ताजपोशी से पूरी होनी है।

माना जाता है कि नए साल की शुरुआत में पंजाब या छत्तीसगढ़ में अखिल भारतीय कॉन्ग्रेस कमिटी का सत्र होगा। इसमें राहुल गॉंधी दोबारा अध्यक्ष चुने जाएँगे। उससे पहले सोनिया गॉंधी ने फेरबदल कर उन नेताओं के पर कतर दिए हैं, जिनसे राहुल अपने पहले कार्यकाल में भी सहज नहीं थे।

इससे यह भी जाहिर है कि कॉन्ग्रेस को गॉंधी परिवार से मुक्ति नहीं मिलने वाली है। लेकिन क्या इसके कुछ जमीनी असर भी होंगे, क्योंकि 2019 के आम चुनावों में करारी शिकस्त के बाद जब राहुल गॉंधी ने अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया था और मान-मनौव्वल के बाद भी इसे कबूल नहीं किया था, तभी से माना जा रहा था कि वे देर-सबेर फिर इस पद पर लौटेंगे। सवाल था कि यह कब होगा? कैसे होगा? ओल्ड गार्ड कैसे किनारे किए होंगे?

कॉन्ग्रेस के 23 नेताओं ने हाल में सोनिया गॉंधी को चिट्ठी लिखी और फुलटाइम असरदार नेतृत्व की मॉंग की थी। 24 अगस्त को कॉन्ग्रेस कार्यसमिति की बैठक में इन नेताओं की मंशा पर सवाल उठाए गए। तेवर दिखाकर गुलाम नबी आजाद और कपिल सिब्बल ढीले पड़ गए। 6 महीने के लिए फिर से सोनिया गॉंधी कॉन्ग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष चुन ली गईं।

11 सितंबर को पार्टी संगठन में बड़ा फेरदबल करते हुए सोनिया ने जिन नामों को किनारे लगाया है, उनमें पत्र लिखने वाले 23 नेताओं में शामिल रहे गुलाम नबी आजाद प्रमुख हैं। आजाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री रहे हैं। फिलहाल राज्यसभा में विपक्ष के नेता हैं। उनकी महासचिव पद से छुट्टी कर यह संकेत भी दे दिया गया है कि अगले साल उच्च सदन में कार्यकाल खत्म होने के बाद उन्हें वापसी का मौका नहीं दिया जाएगा। उनसे हरियाणा का प्रभार भी ले लिया गया है, जहॉं के एक वरिष्ठ नेता भूपेंद्र सिंह हुड्डा भी पत्र लिखने वालों में थे। हालॉंकि कॉन्ग्रेस कार्यसमिति में उन्हें रखा गया। इसी तरह आनंद शर्मा को भी वर्किंग कमेटी में ही समेट दिया गया। कपिल सिब्बल का भी कद छॉंट दिया गया है।

आजाद के अलावा मोतीलाल वोरा, अंबिका सोनी, मल्लिकार्जुन खड़गे और लुइजिन्हो फैलेरियो को भी महासचिव पद से हटाया गया है। ये सभी परिवार के पुराने वफादार हैं। इनको उम्र की वजह से मुक्त किया गया है।

दूसरी तरफ पत्र लिखने वाले नेताओं में से जो राहुल की पसंद थे उन्हें प्रमोशन दिया गया है। मसलन, जितिन प्रसाद। उन्हें बीते साल लोकसभा चुनाव से पहले पार्टी छोड़ने से रोका गया था। चिट्ठी प्रकरण के बाद यूपी के कॉन्ग्रेस नेताओं ने उनके खिलाफ मोर्चा खोल रखा था। बावजूद इसके उन्हें पश्चिम बंगाल जैसे राज्य का प्रभार दिया गया है, जहॉं अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं।

प्रमोशन पाने वालों में मधुसूदन मिस्त्री भी हैं। केंद्रीय चुनाव समिति का अध्यक्ष बना उनका कद बढ़ा दिया गया है। मिस्त्री 2012 के उत्‍तर प्रदेश विधानसभा चुनाव और 2014 के लोकसभा चुनाव में भी अहम भूमिका में थे। लेकिन, ओल्ड गार्ड के दबावों की व​जह से राहुल को उन्हें किनारे करना पड़ा था। इसी तरह राहुल के वफादार माने जाने वाले मनकीम टैगोर को तेलंगाना का प्रभारी सचिव नियुक्त किया गया है। इसके अलावा उनके करीबियों दिनेश गुंडूराव, मणिकम और एच के पाटिल जैसे नेताओं का कद भी बढ़ा है। शक्तिकांत गोहिल और राजीव साटव जैसे उनके चहेते राज्‍यों के प्रभारी बने हुए हैं।

इन सबके बीच रणदीप सिंह सुरजेवाला का प्रमोशन हैरान करने वाला है। उन्हें उस 6 सदस्यीय विशेष समिति में रखा गया है जो पार्टी संगठन और कामकाज से जुड़े मामलों में सोनिया गॉंधी का सहयोग करेगी। पार्टी में बदलाव और आगे का रास्ता तय करने की जिम्मेदारी भी इसी कमेटी की होगी। इस कमिटी में सुरजेवाला के अलावा एके एंटनी, अहमद पटेल, अंबिका सोनी, केसी वेणुगोपाल, मुकुल वासनिक भी हैं। इन सभी की परिवार के प्रति वफादारी संदेह से परे मानी जाती है।

राहुल गॉंधी की निजी पसंद माने जाने वाले सुरजेवाला हरियाणा विधानसभा चुनाव में हार के बावजूद पार्टी संगठन में सीढ़ियॉं चढ़ते जा रहे हैं। मुख्य प्रवक्ता के बाद, पार्टी महासचिव, वर्किंग कमेटी के सदस्य, अध्यक्ष को परामर्श देने वाली समिति के सदस्य और कर्नाटक का प्रभार भी। एक साथ कॉन्ग्रेस में इतना कुछ पाने वाले वे अकेले नेता हैं।

इस पूरी कवायद में दो चीजें और महत्वपूर्ण हैं। राजस्थान में पहले से ही सारे पद से बेदखल कर दिए गए सचिन पायलट को कोई भूमिका केंद्रीय संगठन में भी नहीं दी गई है। वहीं किसी जमाने में राहुल के राजनीतिक गुरु रहे दिग्विजय सिंह की कॉन्ग्रेस वर्किंग कमेटी में दो साल बाद वापसी हुई है।

अमूमन किसी राजनीतिक दल में इतने व्यापक फेरबदल का असर उसकी कार्यसंस्कृति में बड़े बदलाव के तौर पर दिखता है। पर कॉन्ग्रेस के मामले में शायद ही यह हो। असल में जो भी नाम आगे बढ़ाए गए हैं, वे पहले भी राहुल के नेतृत्व में अलग-अलग वक्त पर बड़ी जिम्मेदारी सॅंभाल चुके हैं। पर राहुल गॉंधी के चुके हुए नेतृत्व की तरह ये भी नाकाम ही रहे हैं। इनमें से ज्यादातर नेताओं का जनाधार नहीं है। वे भी जमीन से उसी तरह कटे हैं, जैसे राहुल गॉंधी की स्टाइल आफ पॉलिटिक्स है। यह पहले से तय था कि राहुल के प्रत्यक्ष तौर पर मुख्य भूमिका में आने की पटकथा जब आगे बढ़ेगी तो इनका कद बढ़ेगा।

सोनिया ने उनकी ताजपोशी से पहले इसे अंजाम देकर पार्टी में ओल्ड गार्ड बनाम युवा नेतृत्व के बीच संघर्ष को खत्म कर दिया है। जिन नेताओं को किनारे किया गया है वे भी जनाधार विहीन ही हैं। यदि वे बागी रुख दिखाते भी हैं तो राहुल के दोबारा अध्यक्ष बनने से पहले उनके विरोध की हवा निकल चुकी होगी। यानी, यह सब कुछ पार्टी की जगह परिवार के भविष्य को ध्यान में रखकर गया है।

ब्रिटेन के प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल ने कहा था कि ‘राजनीति खेल नहीं, बल्कि एक गंभीर काम है’। इसका एहसास करने में कॉन्ग्रेस जितनी देर करेगी, उसके फिर से खड़ी होने की संभावनाएँ उतनी ही दम तोड़ती जाएगी। फिलहाल वह जिस तरह आगे बढ़ती दिख रही है, उससे तो यही लगता है कि उसके लिए सियासत पोगो के कार्यक्रमों जैसी है।

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अजीत झा
देसिल बयना सब जन मिट्ठा

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