दिल्ली की हवाओं में जब भी राजनीति का पारा चढ़ता है, कुछ खास तरह के नारे गूँजने लगते हैं। वर्ष 2022 से लेकर 2026 की शुरुआत तक, देश के विभिन्न हिस्सों- चाहे वह JNU का कैंपस हो, कॉन्ग्रेस की रैलियाँ हों या पहलवानों का धरना, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ ‘मोदी तेरी कब्र खुदेगी’ और ‘मौत’ जैसे आपत्तिजनक नारे एक पैटर्न की तरह सामने आए हैं। बता दें कि गालियों की इस फेहरिस्त की शुरुआत गुजरात में कॉन्ग्रेस नेता सोनिया गाँधी की ‘मौत के सौदागर’ से शुरू हुई थी।
2026: जेएनयू में ‘मोदी-शाह कब्र खुदेगी’ के नारों की गूँज
वामपंथी विचारधारा का गढ़ कहे जाने वाले जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) के लिए विवाद और नारे कोई नई बात नहीं हैं। 5 जनवरी 2026 की रात एक बार फिर साबरमती हॉस्टल के बाहर ‘रेजिस्टेंस’ के नाम पर हुजूम जुटा। बहाना था 2020 की हिंसा की बरसी, लेकिन असली मकसद कुछ और ही निकला। जैसे ही खबर आई कि उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दी है, वैसे ही वहाँ मौजूद छात्र-छात्राओं का स्वर बदल गया।
देखते ही देखते कैंपस ‘मोदी-शाह की कब्र खुदेगी’ के नारों से गूँज उठा। विश्वविद्यालय प्रशासन ने इसे सुप्रीम कोर्ट की अवमानना और लोकतंत्र पर हमला बताते हुए पुलिस से FIR दर्ज करने की माँग की है। यह जेएनयू की वही पुरानी फितरत है जहाँ शिक्षा के मंदिर को राजनीतिक अखाड़ा बनाकर देश के शीर्ष नेतृत्व के लिए कब्रें खोदी जाती हैं।
2025: रामलीला मैदान में कॉन्ग्रेस का ‘नफरती’ राग
साल 2025 में भी यही कहानी दोहराई गई। मौका था दिल्ली के रामलीला मैदान में कॉन्ग्रेस की ‘वोट चोरी’ के खिलाफ रैली का। कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों के बीच से वही शब्द निकले- ‘मोदी, तेरी कब्र खुदेगी।’ हैरानी की बात यह थी कि मंच पर बड़े नेता मौजूद थे और नीचे कार्यकर्ताओं के साथ महिला विंग की पदाधिकारी भी सुर में सुर मिला रही थीं।
भाजपा ने इसे ‘अर्बन नक्सलियों’ की भाषा बताया और कहा कि कॉन्ग्रेस अब ‘मुस्लिम लीग नक्सलवादी पार्टी’ जैसी भाषा बोल रही है। संवैधानिक संस्थाओं को डराने के लिए मुख्य चुनाव आयुक्त की तस्वीरों को कैदी के रूप में दिखाया गया। यह वही दौर था जब राजनीति के मंच से सीधे तौर पर प्रधानमंत्री की मौत की कामना की जा रही थी।
2023: पहलवान प्रदर्शन और पवन खेड़ा की गिरफ्तारी का ‘इत्तेफाक’
2023 में यह नफरती नारा दो बड़े मंचों पर दिखा। फरवरी में जब कॉन्ग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा को दिल्ली एयरपोर्ट पर विमान से उतारा गया और गिरफ्तार किया गया, तब वहाँ मौजूद राज्यसभा सांसद और बड़े नेताओं के सामने कार्यकर्ताओं ने जमीन पर बैठकर चिल्लाना शुरू किया- ‘मोदी तेरी कब्र खुदेगी।’
यही नहीं, अप्रैल 2023 में जब जंतर-मंतर पर पहलवानों का धरना चल रहा था, तब विनेश फोगाट और अन्य प्रदर्शनकारियों की मौजूदगी में भीड़ ने फिर से वही ‘मोदी तेरी कब्र खुदेगी’ वाला राग छेड़ा। खेल के मैदान से न्याय की माँग करने वाले मंचों पर अचानक इस तरह के नारों का घुस आना यह बताता था कि पर्दे के पीछे कोई और है जो इन नारों की स्क्रिप्ट लिख रहा है।
2022: ‘हिटलर की मौत’ और ‘कुत्ते की मौत’ वाला घटिया स्तर
नफरत के इस इतिहास में 2022 का साल सबसे ज्यादा विवादास्पद रहा। ‘अग्निपथ योजना’ के विरोध के दौरान पूर्व केंद्रीय मंत्री सुबोध कांत सहाय ने सारी मर्यादाएँ लांघ दीं। उन्होंने सरेआम कहा, “मोदी हिटलर की राह चलेगा तो हिटलर की मौत मरेगा।”
मौत की कामना करने का यह सिलसिला यहीं नहीं रुका। महाराष्ट्र में नागपुर में कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष शेख हुसैन ने और भी आपत्तिजनक टिप्पणी करते हुए कहा कि ‘जैसे कुत्ते की मौत होती है, वैसे ही नरेंद्र मोदी की मौत होगी।’ इन बयानों के बाद भाजपा की तरफ से देशभर में विरोध प्रदर्शन किए गए थे और कई जगह FIR दर्ज हुई।
लोकतंत्र में ‘कब्र’ की भाषा कितनी सही?
प्रधानमंत्री के खिलाफ पिछले चार-पांच सालों का यह ‘नारा संकलन’ (Compilation) एक खतरनाक ट्रेंड को दर्शाता है। 2007 के ‘मौत के सौदागर’ वाले बयान से शुरू हुआ यह सफर 2026 के ‘कब्र खुदेगी’ तक पहुँच गया है। लेकिन सवाल यह है कि क्या दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में मतभेद का इजहार सिर्फ मौत और कब्र के नारों से ही मुमकिन है? जेएनयू से लेकर रामलीला मैदान तक लगने वाले ये आपत्तिजनक नारे आज भी गवाह हैं कि राजनीति किस कदर व्यक्तिगत नफरत की आग में झुलस रही है।


