Monday, September 28, 2020
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मनोहर पर्रिकर के रक्षा मंत्री रहते बिना किसी घोटाले के ₹90,000 करोड़ के डिफेन्स कॉन्ट्रैक्ट साइन हुए थे

पर्रिकर ने रक्षा मंत्री रहते हुए केंद्र सरकार के इमरजेंसी वित्तीय अधिकारों के तहत आर्मी के लिए ₹5,800 करोड़ तथा वायुसेना के लिए ₹9,200 करोड़ की राशि उपलब्ध करवाई थी। डिफेंस एक्वीजीशन कॉउन्सिल (DAC) ने लगभग डेढ़ लाख करोड़ रुपए की रक्षा खरीद को Aceeptance of Necessity के स्तर पर सहमति प्रदान की थी।

मनोहर पर्रिकर ने फेडरेशन ऑफ़ गुजरात इंडस्ट्रीज़ के एक समारोह में अपने बचपन के समय की एक कहानी सुनाई थी। कहानी उनके गाँव पर्रा के बारे में थी जहाँ उच्च गुणवत्ता वाले बड़े-बड़े और रसीले तरबूज उगते थे। पर्रा का एक किसान तरबूज खाने की प्रतियोगिता करावाता था जिसमें बच्चे भाग लेते थे। बच्चों को यह निर्देश दिया जाता था कि तरबूज खाते समय बीज को चबाना नहीं है बल्कि एक टोकरी में थूकना है। किसान उन बीजों को इकठ्ठा कर उनसे पुनः बढ़िया तरबूज उगाते थे।

पढ़ाई के लिए गाँव छोड़ने के छः साल बाद जब मनोहर पर्रिकर लौटे तो उन्हें पता चला कि पर्रा में अब वैसे बढ़िया और बड़े-बड़े तरबूज नहीं होते जैसे पहले होते थे। कारण यह था कि जो किसान प्रतियोगिता करवाता था वह प्रतियोगिता में बड़े तरबूज रखता था ताकि उसके बीज बिना किसी अतिरिक्त श्रम के एकत्रित किए जा सकें। लेकिन जब उस किसान के बेटे ने खेती की कमान संभाली तो उसने बड़े तरबूज बाजार में बेच दिए और प्रतियोगिता में छोटे तरबूज रखने लगा। इस कारण तरबूजों की अगली पीढ़ी आकार में छोटी और गुणवत्ता में फीकी हो गई।

मनोहर पर्रिकर की कहानी का मंतव्य यह था कि यदि हमें अगली पीढ़ी में काबिल लोग चाहिए तो उन्हें अच्छे शिक्षकों के माध्यम से अच्छी शिक्षा देनी होगी। दुर्भाग्य से यह प्रक्रिया शासन प्रणाली में लागू नहीं होती। भारत में जिस प्रकार मंत्रालयों में कामकाज होता है उस व्यवस्था को देखें तो पता चलता है कि निर्णय लिए जाने के बाद भी दशकों तक गतिरोध बना रहता है और प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ पाती। फिर एक दिन कोई ऐसा मंत्री आता है जो काम में तेज़ी दिखाते हुए निर्णयों को फाइलों से बाहर क्रियान्वयन के धरातल पर लाता है। भारत में यशवंत राव चव्हाण और जॉर्ज फर्नांडीज़ के बाद मनोहर पर्रिकर ऐसे ही रक्षा मंत्री हुए।

रक्षा मंत्री रहते हुए श्री पर्रिकर की सबसे बड़ी उपलब्धि यह थी कि उन्होंने मंत्रालय के बाबुओं में व्याप्त अविश्वास और नकारात्मकता को दूर करने में बहुत हद तक सफलता पाई थी। वरिष्ठ डिफेन्स जर्नलिस्ट नितिन गोखले अपने ब्लॉग में लिखते हैं कि 2016 में आई रक्षा खरीद नीति (Defence Procurement Procedure) में ‘Buy- IDDM’ (Indigenously Designed, Developed and Manufactured) क्लॉज़ मनोहर पर्रिकर ने जुड़वाया था। रक्षा खरीद में स्वदेशी उत्पादों को वरीयता देने का श्रेय मनोहर पर्रिकर को जाता है। उन्होंने खरीद की प्रक्रिया में पारदर्शिता लाने के यथासंभव प्रयास किए थे।

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दरअसल 2001-02 से पहले भारत की अपनी कोई रक्षा खरीद नीति नहीं थी। सन 1992 में जरूर एक रक्षा खरीद प्रक्रिया दस्तावेज बनाया गया था लेकिन उस पर कुछ काम नहीं हुआ था। उसके दस साल बाद राष्ट्रीय सुरक्षा संबंधी समिति के सुझावों पर अमल करते हुए Defence Procurement Management Structures and Systems नामक संस्था बनाई गयी जिसने पहली बार DPP-2002 नामक दस्तावेज तैयार किया।

भारत में डिफेन्स प्रोक्योरमेंट प्रोसीजर एक विकासशील नीतिगत प्रक्रिया है। पहले हमने केवल खरीदने की बात की थी, फिर रक्षा क्षेत्र में खरीद के साथ निर्माण पर ज़ोर दिया गया। विदेश से हथियार खरीदने की प्रक्रिया में हमने ऑफसेट और ट्रांसफर ऑफ़ टेक्नोलॉजी को भी जोड़ा। आठ DPP के बाद नौवीं DPP-2016 में हथियारों, विमानों, युद्धपोत और अन्य उपकरणों के कलपुर्ज़े बनाने वाली स्वदेशी कंपनियों से खरीदने का निर्णय किया गया।

रक्षा मंत्री रहते हुए मनोहर पर्रिकर ने यह सुनिश्चित किया कि रक्षा उत्पादन में भारतीय कंपनियों के हित सुरक्षित रहें। Buy-IDDM क्लॉज़ उन वेंडरों से जुड़ा है जो भारत में उत्पादन करते हैं। देश में डिज़ाइन से लेकर निर्माण करने वाली कंपनियों के लिए 40% देसी पुर्ज़ों का प्रयोग ज़रूरी है और यदि डिज़ाइन और उत्पाद स्वदेशी नहीं है तो कम से कम 60% पुर्ज़े देसी होने चाहिए। ऐसी नीतियाँ बनाई गईं जिससे भारतीय इंडस्ट्री को भी बढ़ावा मिले। मध्यम और छोटे उद्यमियों (MSME) को कैपिटल दिया गया जो पहले बड़ी इंडस्ट्री पर निर्भर थे।

मनोहर पर्रिकर के कार्यकाल में ही चालीस वर्षों से लंबित सशस्त्र सेनाओं की वन रैंक वन पेंशन (OROP) मांग पूरी की गई। इसका सबसे ज्यादा फायदा जूनियर कमीशंड अधिकारियों को मिला जो चालीस की आयु पूरी करते-करते सेना से रिटायर हो जाते थे।

पर्रिकर के कार्यकाल में अमेरिका से LEMOA (Logistics Exchange Memorandum of Agreement) समझौता भी किया गया। यह समझौता सामरिक दृष्टिकोण से एक अलग तरह का महत्व रखता है। इस समझौते पर हस्ताक्षर करने से भारत और अमेरिका दुनिया भर में फैले एक दूसरे के सैन्य ठिकानों से रसद सहायता साझा कर सकेंगे। इसमें हथियार और गोला बारूद शामिल नहीं है। दरअसल लॉजिस्टिक्स का अर्थ है हथियार और गोला बारूद के अतिरिक्त युद्ध में उपयोगी सामग्री जिसमें सैनिकों के खान पान से लेकर लड़ाकू विमान का ईंधन भी शामिल हैं। वामपंथियों ने आदतानुसार इस समझौते का यह कह कर विरोध किया था कि इससे भारत भी अमरीका का पिट्ठू देश बन गया है। जबकि वास्तविकता यह है कि यदि अमरीका किसी भी ऐसे देश पर हमला करता है जिससे भारत के दोस्ताना सम्बंध हैं तो भारत इस समझौते से अलग होने के लिए पूर्णतः स्वतंत्र है।

रक्षा मंत्री रहते हुए मनोहर पर्रिकर ने इस विषय पर बयान भी दिया था जिससे उन अटकलों को विराम मिला जिसमें यह कहा जा रहा था कि LEMOA पर हस्ताक्षर करने से भारत अमेरिकी सैन्य अड्डे के लिए अपनी धरती देने को बाध्य होगा। अमेरिका ऐसे समझौते कई देशों के साथ कर चुका है। अन्य देशों के साथ हुए समझौते को अमेरिका लॉजिस्टिक्स सपोर्ट एग्रीमेंट नाम देता है किंतु भारत को विशेष सामरिक साझेदार बनाने के परिप्रेक्ष्य में इसे Logistics Exchange Memorandum of Agreement नाम दिया गया। यहाँ यह देखना आवश्यक है कि LEMOA गत दस-बारह वर्षों से अटका पड़ा था, जिसे अंततः मनोहर पर्रिकर ने समझौते का रूप देने का महत्वपूर्ण कार्य किया था।

बहुत से विचारक इसी उधेड़बुन में रत थे कि अमरीका भारत को नाटो जैसा सहयोग देगा या नहीं। जल्दबाजी में नफा नुकसान का आंकलन करने की बजाए यदि हम द्विपक्षीय सम्बन्धों का स्वरूप देखें तो पता चलेगा कि LEMOA भविष्य में अमरीका से तकनीकी सहायता साझा करने की पृष्ठभूमि भी तैयार करता है। हम अमेरिका से दो और फाउंडेशनल समझौते करने की ओर अग्रसर हैं: एक- Communication and Information Security Memorandum of Agreement (CISMOA) और दूसरा- Basic Exchange and Cooperation Agreement (BECA). पिछले साल तक भारत के परिप्रेक्ष्य में CISMOA का नाम बदलकर COMCASA रखकर इसपर नेगोशिएशन की प्रक्रिया चालू हो चुकी थी।

सन् 1974 में विख्यात और बहुत हद तक कुख्यात हेनरी किसिंजर ने कहा था कि अमेरिका विश्व को जो योगदान दे सकता है और जो दुनिया अपेक्षा भी करती है वह है अमरीका की तकनीकी क्षमता। इस सन्दर्भ में तत्कालीन अमेरिकी रक्षा सचिव एश्टन कार्टर के दिमाग की उपज Defence Technology and Trade Initiative (DTTI) कायदे से एक सन्धि न होने के बावजूद भारत के लिए विशेष रूप से लाभदायक है। लॉजिस्टिक्स एग्रीमेंट डीटीटीआई को सफलता की ओर अग्रसर करने की प्रतिबद्धता को दर्शाता है। इसका श्रेय मनोहर पर्रिकर को मिलना चाहिए।

यूपीए के कार्यकाल के खबरें आती थीं कि युद्ध हो जाए तो भारत के पास दस दिनों तक लड़ने की ही सामग्री होगी। भारत के महालेखा परीक्षक एवं नियंत्रक (CAG) की रिपोर्ट के अनुसार नए हथियार तथा उपकरण खरीदने में लगभग ₹20,000 करोड़ व्यय होते। मनोहर पर्रिकर ने रक्षा मंत्री रहते हुए केंद्र सरकार के इमरजेंसी वित्तीय अधिकारों के तहत आर्मी के लिए ₹5,800 करोड़ तथा वायुसेना के लिए ₹9,200 करोड़ की राशि उपलब्ध करवाई थी। डिफेंस एक्वीजीशन कॉउन्सिल (DAC) ने लगभग डेढ़ लाख करोड़ रुपए की रक्षा खरीद को Aceeptance of Necessity (जो कि डीपीपी का ही एक भाग है) के स्तर पर सहमति प्रदान की थी। यह भी उल्लेखनीय है कि पर्रिकर के कार्यकाल में ₹90,000 करोड़ के डिफेन्स कॉन्ट्रैक्ट साइन हुए थे वह भी बिना किसी घोटाले के।

मनोहर पर्रिकर के ढाई साल के रक्षा मंत्री के कार्यकाल में अनेक ऐसे कार्य हुए जिनके कारण देश उन्हें एक निष्ठावान, कर्मठ और सुयोग्य प्रशासक के रूप में सदैव याद रखेगा।  

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