सुप्रीम कोर्ट ने पद्मश्री से सम्मानित फ्रेंच मूल के भारतीय विद्वान मिशेल दानिनो को बैन कर दिया है। इसकी वजह है NCERT की किताब में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के मुद्दे पर लिखा लेख, जो इनकी देखरेख में तैयार हुआ था।
मिशेल दानिनो भले ही फ्रांस में पैदा हुए, लेकिन वो दशकों से भारतीय संस्कृति और सभ्यता की पहचान सामने लाने की कोशिशों में जुटे रहे हैं। उन्होंने अब तक पाठ्य पुस्तकों में पढ़ाए जा रहे कम्युनिष्टों के प्रोपेगेंडा -आर्य बाहरी थे और वो आक्रमणकारी के तौर पर भारत भूमि पर आए… इसे सबूतों के साथ खारिज किया था।
यही नहीं, मिशेल दानिनों ने वैदिक युगीन सरस्वती नदी की मूल धारा को खोजने में मदद की थी और हमेशा इस बात पर जोर दिया कि हड़प्पा सभ्यता नहीं, बल्कि भारतीय उपमहाद्वीप में उपजी सभ्यता सरस्वती सभ्यता थी। उनके कामों को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सराहना मिली है। आईए, इस पूरे मामले को विस्तार से समझते हैं और बताते हैं मिशेल दानिनों के बारे में, जिनका उनके कामों की वजह से पूरे भारत में सम्मान होना चाहिए, लेकिन फिलहाल वो SC की तरफ से बैन झेल रहे हैं।
मिशेल दानिनों को सुप्रीम कोर्ट ने क्यों किया बैन?
भारत की सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (11 मार्च 2026) को तीन बड़े विद्वानों पर सरकारी फंड वाले प्रोजेक्ट्स में काम करने पर रोक लगा दी। इस फैसले के पीछे की वजह थी- क्लास 8 की एनसीईआरटी किताब में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार पर लिखा एक चैप्टर। कोर्ट के पहले के आदेश पर एनसीईआरटी ने बताया कि ये विवादित चैप्टर विजिटिंग प्रोफेसर मिशेल दानिनो की देखरेख में तैयार हुआ था। इसमें दो और लोग शामिल थे- सुपर्णा दिवाकर और अलोक प्रसन्ना कुमार।
सुप्रीम कोर्ट ने इन तीनों के नाम सुनकर कहा कि इनको भारतीय न्यायपालिका के बारे में कोई ठीक जानकारी नहीं है या जानबूझकर गलत तरीके से फैक्ट्स पेश किए गए ताकि क्लास 8 के बच्चों के सामने न्यायपालिका की बुरी तस्वीर बनाई जाए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसे लोगों को अगली पीढ़ी की किताबें या सिलेबस बनाने में किसी भी तरह शामिल नहीं होना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने भारत सरकार, सभी राज्यों, केंद्रशासित प्रदेशों और यूनिवर्सिटीज को आदेश दिया कि इन तीनों को तुरंत अलग कर दें और कोई भी ऐसा काम न दें जिसमें पब्लिक फंड लगे। ये आदेश तब तक लागू रहेगा जब तक ये लोग कोर्ट में आकर एक्सप्लेनेशन नहीं देते और मॉडिफिकेशन नहीं माँगते।
एनसीईआरटी के एफिडेविट के मुताबिक, प्रोफेसर मिशेल दानिनो एक प्रसिद्ध फ्रेंच मूल के भारतीय लेखक और विद्वान हैं। क्लास 8 की सोशल साइंस किताब में ‘Corruption in the Judiciary’ नाम का सब-चैप्टर इन्हीं की देखरेख में बना था। कोर्ट ने इसे जानबूझकर गलत तरीके से पेश किया हुआ माना, जो छोटे बच्चों के सामने न्यायपालिका की इमेज खराब कर सकता है।
मिशेल दानिनो का भारत से जुड़ाव आध्यात्मिक
मिशेल दानिनो का जन्म 4 जून 1956 को फ्रांस के नॉर्मंडी के तटीय शहर ऑनफ्लेयर में हुआ। बचपन से ही उन्हें भारतीय अध्यात्म और दर्शन की ओर खिंचाव था। श्री अरविंद और उनकी सहयोगी मिर्रा अल्फासा (जिन्हें ‘द मदर’ कहा जाता है) से बहुत प्रभावित थे।
फ्रांस में चार साल की हायर साइंस पढ़ाई से असंतुष्ट होकर 1977 में 21 साल की उम्र में भारत आ गए। पहले तमिलनाडु के ऑरोविले में बसे, जो श्री अरविंद के आदर्शों पर बना प्रयोगात्मक शहर है। वहाँ कम्युनिटी लाइफ और आध्यात्मिक काम में डूब गए।
साल 1982 में नीलगिरि की पहाड़ियों में चले गए और दो दशक तक वहाँ रहे। वहाँ रहकर उन्होंने प्रकृति संरक्षण और इंडिपेंडेंट रिसर्च पर अपना ध्यान केंद्रित रखा। इसके बाद साल 2003 में वो कोयंबटूर के पास शिफ्ट हो गए और फ्रेंच सिटिजनशिप को छोड़कर भारत की नागरिकता ले ली।
दानिनो अक्सर कहते हैं कि ये बदलाव गहरे ‘मतलब’ की तलाश थी। इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि श्री अरविंद की सोच ने उन्हें वो कुंजी दी जो ढूँढ रहे थे।
मिशेल दानिनो का शैक्षिक और प्रोफेशनल करियर
दानिनो खुद को भारतीय सभ्यता का आजीवन छात्र बताते हैं। उनके पास इतिहास या पुरातत्व में कोई फॉर्मल हाई डिग्री नहीं है, लेकिन उन्होंने इस विषयों पर गहन अध्ययन किया है। उन्होंने भारत में आईआईटी कानपुर, आईआईएम रांची और कई कल्चरल फोरम पर लेक्चर दिए हैं।
मिशेल दानिनो साल 2011 से आईआईटी गाँधीनगर में गेस्ट प्रोफेसर हैं। यहाँ उन्होंने आर्कियोलॉजिकल साइंसेज सेंटर बनाने और इंडियन नॉलेज सिस्टम्स (आईकेएस) कोर्स चलाने में बड़ी भूमिका निभाई। इंडियन काउंसिल ऑफ हिस्टोरिकल रिसर्च (आईसीएचआर) के मेंबर भी हैं, प्राचीन भारत पर रिसर्च में योगदान देते हैं।
मिशेल दानिनो बीते सालों में एनसीईआरटी के सोशल साइंस करिकुलम कमिटी के चेयरपर्सन रहे। उनकी देखरेख में स्कूल किताबों में बदलाव हुए, जिसमें ‘बैलेंस्ड कंटेंट’ पर जोर और भारतीय विरासत को शामिल किया गया।
लेकिन अब कोर्ट के आदेश से उन्हें सभी सरकारी फंड वाले संस्थानों से हटा दिया गया है, वजह किताब में न्यायपालिका पर भ्रष्टाचार वाला चैप्टर।
मुख्य किताबें और योगदान
दानिनो की लिखी किताबें प्राचीन भारतीय सभ्यता पर फोकस करती हैं। वे औपनिवेशिक दौर की कहानियों को चुनौती देते हैं और स्वदेशी नजरिए की वकालत करते हैं। शुरुआती काम में श्री अरविंद और मदर की किताबों का फ्रेंच से इंग्लिश में अनुवाद किया, जैसे 13 वॉल्यूम मदर्स एजेंडा।
साल 1996 में ‘The Invasion that Never Was’ नाम से उनकी किताब आई, जिसमें इंडो-आर्यन माइग्रेशन थ्योरी को खारिज किया और कहा कि आर्य भारत के मूल निवासी थे। वे जेनेटिक एविडेंस से आर्य और द्रविड़ के बीच एकता का दावा करते हैं।
उन्होंने साल 2010 की किताब ‘The Lost River: On the Trail of the Sarasvati’ में आर्कियोलॉजी, हाइड्रोलॉजी और प्राचीन ग्रंथों से वैदिक सरस्वती नदी को आज की घग्गर-हकरा नदी से जोड़ा। उन्होंने कहा कि ये इंडस वैली सिविलाइजेशन के पतन का कारण था।
दानिनो इंडस वैली सिविलाइजेशन को ‘इंडस-सरस्वती’ या ‘सिंधु-सरस्वती’ नाम से पढ़ाने की वकालत करते हैं। कुछ किताबों में ये वैकल्पिक नाम जोड़े गए। वे कहते हैं कि ये नाम पुरातत्व की स्थापित रिसर्च पर आधारित हैं, किसी राजनीतिक प्रभाव से नहीं।
उनकी अन्य किताबों में ‘Indian Culture and India’s Future’ (2011), सीबीएसई क्लास 11-12 के लिए ‘Knowledge Traditions and Practices of India’ शामिल हैं, जिनका उन्होंने सह संपादन किया। साल 2018 में उन्होंने ‘Sri Aurobindo and India’s Rebirth’ का संपादन किया।
उनकी रिसर्च वैदिक गणित, खगोलशास्त्र और पर्यावरण जैसे टॉपिक्स को मॉडर्न एजुकेशन में शामिल करने पर है। उन्होंने नीलगिरि की पहाड़ियों में पर्यावरण संरक्षण के लिए भी काफी काम किया है।
मिशेल दानिनो को मिल चुके हैं बहुत सारे सम्मान
साल 2017 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने उन्हें पद्मश्री सम्मान से सम्मानित किया। पद्मश्री भारत का चौथा सबसे बड़ा नागरिक सम्मान है। ये सम्मान साहित्य और शिक्षा में योगदान के लिए मिला।
मिशेल दानिनो की रिसर्च विवादों से भी घिरी रही है। इंडियन सभ्यता के समर्थक होने के कारण उन्हें हिस्टोरिकल नेगेशनिज्म का आरोप लगा, खासकर इंडो-आर्यन माइग्रेशन थ्योरी खारिज करने पर। सरस्वती नदी और इंडस वैली के नए नाम पर लेफ्ट-लिबरल्स ने उन्हें निशाना बनाया।
एनसीईआरटी में उनकी भूमिका पर किताबों में बदलाव को आइडियोलॉजिकल बताया गया, जैसे मराठा साम्राज्य को अच्छा और मुगल साम्राज्य को नेगेटिव दिखाना, या ‘अनप्लेजेंट’ टॉपिक्स से बचना ताकि बच्चे ट्रॉमा न झेलें। हालाँकि दानिनो ने ऐसे आरोपों को हमेशा ही इनकार किया है। उनका कहना है कि वो हमेशा बैलेंस्ड, नॉन-ट्रॉमेटाइजिंग एजुकेशन की बात करते हैं।
सुप्रीम कोर्ट का आदेश उन्हें एनसीईआरटी और अन्य सरकारी काम से हटाने का है, जिसे कई लोग ज्यूडिशियल ओवररीच मानते हैं।
बहरहाल, मिशेल दानिनो हमेशा की तरह भारत की सांस्कृतिक और शैक्षणिक दुनिया में अपना प्रभाव बनाए रखे हैं। वो ऐसे व्यक्ति हैं, जो भारत में भले ही पैदा नहीं हुए, लेकिन अपनी शैक्षिक तपस्या के दम पर भारत के गौरवशाली इतिहास के पुनर्लेखन में अहम भूमिका निभा रहे हैं। धीरे-धीरे ही सही, आम लोगों तक उनके बारे में जानकारी पहुँचेगी, तो आम लोग भी उन्हें वही सम्मान देंगे, जिसके वो असल में हकदार हैं।
(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)


