यूएन ने बार-बार पाकिस्तान द्वारा कश्मीर मुद्दे को उछालने पर कहा है कि दोनो देशों को शांतिपूर्ण तरीके से इस मामले का समाधान ढूँढना होगा। इस पर उनकी ओर से मध्यस्ता का अभी कोई विचार नहीं हैं।
पाकिस्तान दूरसंचार प्राधिकरण (PTA) ने बताया कि जब शिया मुस्लिम मुहर्रम की अपनी सबसे महत्वपूर्ण रस्म निभाएँगे, उस दौरान मोबाइल फोन सेवाएँ और इंटरनेट बंद रहेंगे.......
तेहरान ने इस्लामाबाद को स्पष्ट शब्दों में कहा है कि किसी तीसरे देश के खिलाफ इस तरह के पोस्टर लगाना राजनयिक मानदंडों के खिलाफ है। पाकिस्तान ने एक मौखिक नोट के जरिए जब इस मुद्दे को उठाया तो तेहरान ने इसे दुर्भाग्यपूर्ण करार दिया।
पूनावाला का तर्क था कि अनुच्छेद-370 के निरस्त होने से संविधान के अनुच्छेद-19 (बोलने की स्वतंत्रता) और संविधान के 21 (व्यक्तिगत स्वतंत्रता) का हनन हो रहा है।
पाकिस्तानी मूल के ब्रिटिश नागरिकों ने अपने इस विरोध-प्रदर्शन को 'कश्मीर फ्रीडम मार्च' का नाम दिया था। मार्च पार्लियामेंट स्क्वेयर से शुरू होकर भारतीय उच्चायोग की बिल्डिंग तक पहुँचा। मार्च का नेतृत्व यूके की लेबर पार्टी के कुछ सांसदों ने किया।
अब्दुल बासित द्वारा रीट्वीट की गई तस्वीरों में पोर्न स्टार जॉनी सीन्स की तस्वीरें दिखाई गई हैं, जो कि बिना किसी शक के कश्मीरी नागरिक नहीं है। इस तस्वीर में दिखाया गया है कि यूसुफ़ अनंतनाग का रहने वाला है, जिसकी आँखों की रौशनी पेलेट गन्स की वजह से चली गई।
कश्मीर के कॉन्ग्रेसी नेता सलमान निज़ामी ने केंद्र/राष्ट्रपति शासन और मुफ़्ती-अब्दुल्ला शासन के समय मारे गए लोगों की संख्या की तुलना की। उन्होंने लिखा, "उमर अब्दुल्ला के समय फैली अशांति में 200 लोग मारे गए, महबूबा मुफ़्ती के समय फैली अशांति में 260 लोग मारे गए, 2019 की अशांति में शून्य मारे गए।"
सोशल मीडिया पर एक तस्वीर दिखाई जा रही है, जिसमें दावा किया जा रहा है कि इन दो महिलाओं को भारतीय सेना ने बलात्कार के बाद मार दिया। अगस्त 30, 2019 को Twitter पर मोहम्मद हसन रजा ने यह तस्वीर #SaveKashmir हैशटैग के साथ ट्वीट की है।
प्रपंच फैलाया जा रहा है कि अस्पतालों में लोग मर रहे हैं, जीवनरक्षक दवाइयाँ नहीं हैं। आप सोचिए कि आखिर यही चार-पाँच मीडिया वाले, इसी एक तरह की रिपोर्टिंग क्यों कर रहे हैं? आखिर दो लोगों के बयान के आधार पर पूरी सेना को बर्बर कहने की रिपोर्टिंग का लक्ष्य क्या है? अमेरिकी अखबार को भारत के एक हिस्से के अस्पतालों पर झूठ लिखने की क्यों जरूरत पड़ती है?