कॉन्ग्रेस के भीतर कुछ लोगों का मानना है कि पार्टी अध्यक्ष के रूप में अगर कोई ग़ैर-गाँधी पद पर आसीन होगा तो पार्टी टूट जाएगी। बता दें कि पार्टी के अध्यक्ष पद के लिए ज्योतिरादित्य सिंधिया, सचिन पायलट और मिलिंद देवड़ा जैसे नाम भी इस दौड़ में शामिल थे।
देश की सबसे पुरानी पार्टी में अध्यक्ष पद पर इतनी माथापच्ची तब हो रही है जब राहुल गॉंधी ने लोकसभा चुनाव के नतीजों के तत्काल बाद इस्तीफे की पेशकश कर दी थी। मान-मनौव्वल से भी वे नहीं माने और तीन जुलाई को अपना इस्तीफा सार्वजनिक कर दिया। इसके बाद वयोवृद्ध मोतीलाल वोरा को अंतरिम अध्यक्ष बनाने की खबर आई जिसे वोरा ने खुद नकार दिया।
राहुल गाँधी ने प्रणब मुखर्जी को बधाई देने के लिए यहाँ तक कि एक ट्वीट भी नहीं किया है। हाल ही में एनडीटीवी के पत्रकार रवीश कुमार को मैगसेसे अवॉर्ड मिला था, तब राहुल ने उन्हें ट्वीट कर बधाई दी थी।
“जम्मू-कश्मीर को 2 हिस्सों में बाँटकर, जनता के द्वारा चुने हुए प्रतिनिधियों को जेल में डालकर और संविधान का उल्लंघन करके देश को एकजुट नहीं रखा जा सकता। देश उसकी जनता से बनता है न कि जमीन के टुकड़ों से। सरकार द्वारा शक्तियों का दुरुपयोग राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंंभीर खतरा साबित हो सकता है।”
विपक्ष की पहली कतार में मुलायम सिंह यादव, सोनिया गाँधी, सुदीप बंदोपाध्याय और माहताब जैसे नेताओं को जगह मिली है। दूसरी कतार में फारूक़ अब्दुल्ला, सुप्रिया सुले, अखिलेश यादव, व अन्य नेता नजर आएँगे।
बकौल राहुल उनका पारिवारिक उपनाम मालवीय था। बीएसएफ में कार्यरत उनके पिता को अच्छे आचरण की वजह से साथी 'गाँधी' कहकर पुकारते थे। बाद में पिता ने इसे ही उपनाम बना लिया और इस तरह राहुल मालवीय से गॉंधी हो गए।
राजस्थान के उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट और मध्य प्रदेश के ज्योतिरादित्य सिंधिया को अध्यक्ष बनाने की चर्चा शुरू होने के बाद शुरू हुआ प्रियंका का अभियान। इसके पीछे सोच यह है कि पार्टी अध्यक्ष के तौर पर गॉंधी ही गॉंधी की जगह ले।
पीसी चाको ने शीला दीक्षित को पत्र लिखकर कहा कि पार्टी संगठन का फैसला वो अकेले नहीं कर सकती हैं। इसलिए शुक्रवार (जुलाई 12, 2019) को जो उन्होंने ब्लॉक पर्यवेक्षकों की नियुक्ति की थी, उसे महासचिव प्रभारी के तौर पर वे (पीसी चाको) अयोग्य करार देते हैं।
गाँव-नगर में ढिंढोरा पिटवाने का राज-आदेश दे दिया गया कि युवराज नाराज हैं और कई दिनों से "कॉन्गलेच के छोना बाबू थाना नहीं था रहे।" तमाम विश्लेषकों के माथे बल पड़ गया। राजनीति के गलियारों में हलचल मच गई।