अभी तक इस शिकायत पर कोई कार्रवाई नहीं हुई है। पीड़िता इंसाफ़ के लिए दर दर की ठोकरें खाने को मजबूर हैं। उनका कहना है कि पुलिस द्वारा उनके मामले को दहेज प्रताड़ना में दर्ज किया गया है जबकि कार्रवाई तीन तलाक पर होनी चाहिए।
गुलशनजहाँ को जब तीसरी बेटी पैदा हुई, तो बौखलाए ससुराल वालों ने उसके साथ मारपीट करनी शुरू कर दी। फिर 20 जुलाई को उसके शौहर ने तीन तलाक देकर उससे सारे संबंध खत्म करते हुए दूधमुँही बच्ची के साथ घर से निकाल दिया।
शौहर मुनीर ने राबिया को तीन तलाक दे दिया। फिर उस पर हलाला का दबाव बनाने लगा। जब राबिया राजी नहीं हुई तो शौहर राबिया से होटल में मिलता रहा और शारीरिक संबंध बनाता रहा। इस दौरान वह 2 बार गर्भवती हुई तो गर्भपात भी कराया।
2 महीने पहले पति ने अपनी बीवी से मारपीट की और उसे घर से निकाल दिया। फिर 7 जुलाई को उसने तीन तलाक भी दे दिया। ठीक 14 दिन के बाद अचानक से ससुराल पहुँच बीवी को अपनाने की बात कही लेकिन अपने छोटे भाई के साथ हलाला करवाने के बाद!
रुखसाना ने अपने पिता को बताया कि उसके पति व ससुराल के अन्य परिजन दहेज के लिए उसे परेशान कर रहे हैं। जब कुतुबुद्दीन ने अपना दामाद शाहे आलम को समझाना शुरू किया तो उन्हें भी जान से मारने की धमकी दी गई।
"मेरे दामाद अब्बास के किसी और से अवैध संबंध थे। डेढ़ साल पहले उसने पूरे परिवार की मिलीभगत से मेरी बेटी आरिफा को तलाक दे दिया। फिर आश्वासन दिया कि वह आरिफा का हलाला करवाकर दोबारा अब्बास से निकाह करवा देंगे। 2 दिन पहले उसे मार दिया।"
मौलाना अरशद मदनी ने अल्पसंख्यक समुदाय, विशेषकर मुस्लिम और दलित समुदाय पर हो रहे कथित हमलों पर कहा कि वर्तमान स्थिति विभाजन के समय से भी बद्तर और खतरनाक हो चुकी है और ये संविधान के वर्चस्व को चुनौती एवं न्याय व्यवस्था पर सवालिया निशान हैं।
"सनोवर के अपनी भाभी के साथ अवैध संबंध थे, जिसके कारण वह अपने 2 बच्चों के साथ 3 साल से मायके में रहती थी। 10 दिन पहले ही दोनों पक्षों के बीच समझौते के बाद उसकी बेगम ससुराल आई थी। लेकिन जल्द ही उस पर तलाक देने का दबाव बनाया जाने लगा और तलाक देने से मना करने पर उसे आग के हवाले कर दिया।"
यह मामला पहला नहीं है और न ही आखिरी, जिस तरह से मुस्लिम महिलाओं को लगातार तीन तलाक़ और हलाला के नाम पर शोषण और मानसिक प्रताड़ना का सामना करना पड़ रहा है। वह बहुत ज़्यादा भयावह है। तीन तलाक़ बिल प्रक्रिया में है। जल्द ही ऐसे शख्त कानून को अमल में लाने की ज़रूरत है ताकि तमाम पीड़ित मुस्लिम महिलाओं को न्याय मिल सके।