हाल ही में एक वीडियो क्लिप सोशल मीडिया पर वायरल हुई है। यह बातचीत प्रोफेसर मुक्तेदार खान और डॉ कमर चीमा के बीच हुई थी। मुक्तेदार खान एक भारतीय-अमेरिकी प्रोफेसर हैं। वह इस्लाम और अंतरराष्ट्रीय मामलों पर अपनी समझ के लिए जाने जाते हैं। वहीं, कमर चीमा पाकिस्तान के एक रणनीतिक विश्लेषक हैं। इस बातचीत में राहुल गाँधी की 2023 की अमेरिका यात्रा का जिक्र हुआ। इसमें कुछ ऐसी बातें सामने आईं जो अब तक कम ही लोगों को पता थीं। इस क्लिप ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति और राजनयिक संबंधों पर नई बहस छेड़ दी है।
सोशल मीडिया पर एक वीडियो बहुत वायरल हो रहा है। इसमें दो लोग आपस में बात कर रहे हैं। यह वीडियो भारतीय अधिकारियों के लिए चिंता का विषय है। इसमें प्रोफेसर मुक़्तदर खान ने एक चौंकाने वाला खुलासा किया है। मुक़्तदर खान ने बताया कि राहुल गाँधी की 2023 की अमेरिका यात्रा के दौरान एक खास कार्यक्रम हुआ था। यह कार्यक्रम वाशिंगटन डीसी के हडसन इंस्टीट्यूट में हुआ। इसे कतर के राजदूत ने आयोजित किया था। उनका नाम शेख मेशाल बिन हमद अल-थानी है।
मुक़्तदर खान ने यह बात पाकिस्तानी कमेंटेटर कमर चीमा से कही। खान ने याद किया कि जब वे उस जगह पहुँचे तो गेट बंद मिले। इसकी वजह यह थी कि वहाँ राहुल गाँधी का एक सेमिनार चल रहा था। जब मुक़्तदर खान बाहर इंतजार कर रहे थे, तभी एक बड़ी गाड़ी आई। एक आदमी उसमें से उतरा। उसने भी अंदर जाने की कोशिश की। फिर दोनों को एक साथ अंदर जाने दिया गया।
अंदर जाकर उस आदमी ने खुद के बारे में बताया। वह अमेरिका में कतर का राजदूत था। उसका नाम शेख मेशाल बिन हमद अल-थानी था। उसने मुक़्तदर खान को एक हैरान करने वाली बात बताई। उसने कहा कि राहुल गाँधी का सेमिनार उसी ने आयोजित किया था।
Remember Rahul Gandhi’s 2023 US trip before PM Modi’s state visit?
— Viktor (@desishitposterr) September 18, 2025
He met Soros-funded hindu hater Sunita Viswanath & Muslim Brotherhood linked IAMC at @HudsonInstitute – meeting reportedly arranged by Qatar – a notorious islamist state, not “friendly” to India.
Question why. pic.twitter.com/IurKrJYr39
जून 2023 में राहुल गाँधी 10 दिन के लिए अमेरिका गए थे। यह यात्रा प्रधानमंत्री मोदी की अमेरिका यात्रा से ठीक पहले हुई थी। गाँधी की इस यात्रा ने कई लोगों को हैरान कर दिया था। अब इस घटना के बारे में जो बातें सामने आई हैं, वे बहुत चौंकाने वाली हैं।
राहुल गाँधी और भारत-विरोधी सुनीता विश्वनाथ की एकसाथ तस्वीर
राहुल गाँधी की हडसन इंस्टीट्यूट में सुनीता विश्वनाथ के साथ एक तस्वीर सामने आई है। इस तस्वीर को X (पहले ट्विटर) पर शेयर किया गया था। इस तस्वीर ने कई लोगों को चौंका दिया है। सुनीता विश्वनाथ ‘हिंदू फॉर ह्यूमन राइट्स’ (HFHR) की सह-संस्थापक हैं। यह संस्था भारत-विरोधी विचारों से जुड़ी है।
सुनीता विश्वनाथ का संगठन जॉर्ज सोरोस के ‘ओपन सोसाइटी फाउंडेशन’ से पैसे लेता है। यह संगठन ‘इंडियन अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल’ (IAMC) जैसे समूहों से भी जुड़ा है। IAMC के संबंध जमात-ए-इस्लामी जैसे आतंकवादी संगठनों से बताए जाते हैं। इससे यह लगता है कि यह मंच भारत की राष्ट्रवादी सोच के खिलाफ है।
सुनीता विश्वनाथ पर लगे हिंदूफोबिया के आरोप
राहुल गाँधी का सुनीता विश्वनाथ के साथ होना एक संयोग नहीं था। सुनीता हिंदू विरोधी विचारों के लिए जानी जाती हैं। वह मुस्लिम समर्थक भी मानी जाती हैं। पिछले साल, उन्होंने जन्माष्टमी पर एक लेख लिखा था। इसमें उन्होंने गाजा में फिलिस्तीनियों के दुख की तुलना महाभारत से की थी। सुनीता विश्वनाथ ने इजराइल को कंस कहा था और हमास के प्रति सहानुभूति दिखाने की कोशिश की। हमास एक आतंकवादी संगठन है। इस तरह सुनीता विश्वनाथ ने हिंदू धर्म का अपमान किया। उन्होंने अपनी बात सही साबित करने के लिए हिंदू धर्म ग्रंथों का गलत इस्तेमाल किया।
सुनीता का संगठन ‘हिंदू फॉर ह्यूमन राइट्स’ (HfHR) है। यह संगठन बार-बार हिंदुओं की छवि खराब करता है। फरवरी 2024 में, इस संगठन ने एक कार्यक्रम किया। इसका नाम ‘जायोनिज्म एंड हिंदू सुप्रीमेसी: पार्टनर्स अगेंस्ट प्लुरलिज्म’ था। इस कार्यक्रम में सुनीता ने हिंदू पहचान को ‘वर्चस्व’ कहा। सुनीता ने हिंदू धर्म को जायोनिज्म से जोड़ा। इस कार्यक्रम में ‘यहूदी वॉयस फॉर पीस’ के लोग भी थे। यह संगठन इजरायल के खिलाफ है।
यह सिर्फ एक घटना नहीं है। HfHR ने पहले भी कई ऐसे काम किए हैं। सुनीता ने ‘डिसमेंटलिंग ग्लोबल हिंदुत्व’ नाम के कार्यक्रम का समर्थन किया। सुनीता ने CAA और NRC के बारे में गलत जानकारी फैलाकर 2020 के दिल्ली दंगे भड़काए थे। सुनीता ने प्रधानमंत्री मोदी की 2023 की अमेरिका यात्रा के दौरान एक ‘टूलकिट’ भी जारी की थी। इसका मकसद भारत को बदनाम करना था।
एक संगठन जिसका नाम डिसइन्फोलैब है। यह संगठन ऑनलाइन जानकारी पर रिसर्च करता है। डिसइन्फोलैब के मुताबिक, ‘हिंदू फॉर ह्यूमन राइट्स’ (HfHR) नाम का एक संगठन है। इसे 2019 में IAMC और OFMI नाम के समूहों ने बनाया था। ये समूह जमात-ए-इस्लामी नाम के आतंकवादी संगठन से जुड़े हैं। सुनीता विश्वनाथ ने एक और संगठन बनाया था। इसका नाम ‘वुमन फॉर अफगान वुमेन’ है। इसे जॉर्ज सोरोस के ‘ओपन सोसाइटी फाउंडेशन’ से पैसा मिलता है। भारत में, HfHR के X अकाउंट को बंद कर दिया गया है। उस पर हिंदू-विरोधी बातें फैलाने का आरोप था।
साफ शब्दों में कहें तो सुनीता विश्वनाथ ने ना सिर्फ हिंदुओं पर हमले किए, बल्कि भारत को बदनाम किया और इस्लामी समूहों, जॉर्ज सोरोस के साथ मिलकर काम किया। हडसन इंस्टीट्यूट में राहुल गाँधी का उनके साथ बैठना एक संयोग नहीं था। यह मिलीभगत थी।
क्या राहुल गाँधी के पीछे कतर और भारत-विरोधी लॉबी का हाथ है?
इंडियन अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल (IAMC) ने भारत के खिलाफ बहुत प्रचार किया है। उन्होंने अमेरिका में भारत के खिलाफ बातें फैलाईं। उन्होंने कहा कि भारत में अल्पसंख्यकों पर अत्याचार हो रहा है। ये बातें नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) पर राहुल गाँधी के बयानों से मिलती हैं।
इस मामले में कतर के राजदूत की भागीदारी हैरान करने वाली है। कतर एक छोटा खाड़ी देश है, लेकिन इसका प्रभाव बहुत ज्यादा है। कतर पर दुनियाभर में इस्लामी समूहों को पैसा देने का आरोप है। हमास का राजनीतिक कार्यालय भी यहीं है। हमास को कई देश आतंकवादी समूह मानते हैं।
राजदूत अल-थानी एक अनुभवी राजनयिक हैं। उन्होंने 2016 में वाशिंगटन में काम शुरू किया था। उस समय सऊदी अरब ने कतर का बहिष्कार किया था। इसका कारण चरमपंथ को कतर का कथित समर्थन था। फिर भी, उन्होंने भारत के एक विपक्षी नेता के लिए कार्यक्रम आयोजित किया। यह समझ से परे है कि ऐसा क्यों हुआ। पर्दे के पीछे क्या चल रहा था, यह एक बड़ा सवाल है।
राहुल गाँधी की 2023 अमेरिका यात्रा: विवादों और एजेंडे की गहरी साजिश
राहुल गाँधी की 2023 की अमेरिका यात्रा पर कई सवाल उठे थे। अब ये बातें उन सवालों को और गहरा कर रही हैं। यह यात्रा प्रवासी भारतीयों और थिंक टैंकों के बीच भाषण देने के रूप में थी, लेकिन इसके दौरान कुछ ऐसे मुद्दे उठे जिनसे विवाद की खुशबू आने लगी। राहुल गाँधी ने कई जगहों पर भाषण दिए, जिनमें नेशनल प्रेस क्लब और स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी भी शामिल हैं।
राहुल गाँधी के भाषणों में वही पुराने शब्द दोहराए गए थे, जैसे हिंदुत्व को शैतान कहना, जिन्ना की मुस्लिम लीग को ‘धर्मनिरपेक्ष’ बताकर उसे सही ठहराना और भाजपा को सांप्रदायिक बता कर कॉन्ग्रेस को शांति का प्रतीक बताना। ये बस गलती नहीं थीं, बल्कि राहुल गाँधी के मेजबानों के एजेंडे से मेल खा रही थीं। हडसन इंस्टीट्यूट में सुनीता विश्वनाथ के साथ राहुल गाँधी ने वही बातें दोहराईं, जिन्हें HfHR और IAMC कई सालों से फैला रहे थे। राहुल गाँधी ने हिंदुत्व को बदनाम किया, CAA और NRC को लेकर डर फैलाया और अडानी समूह के खिलाफ सोरोस द्वारा वित्त पोषित अभियानों से जुड़ गए।
व्हाइट हाउस की गुप्त यात्रा
द इकोनॉमिक टाइम्स में सीमा सिरोही ने एक लेख लिखा था। इस लेख से एक और राज सामने आया। इसमें बताया गया कि राहुल गाँधी ने व्हाइट हाउस की एक गुप्त यात्रा की थी। इस यात्रा के बारे में भारत के विदेश मंत्रालय और सरकारी नियमों को जानकारी नहीं दी गई थी। यह घटना चिंताजनक है क्योंकि किसी विपक्षी नेता का बिना किसी प्रचार के बाइडन प्रशासन के पास जाना सवाल खड़े करता है। इससे कई सवाल उठते हैं कि राहुल गाँधी ने वहाँ किससे मुलाकात की और क्या कोई वादा या एजेंडा तय किया गया था?
कई लोगों ने इस यात्रा पर सवाल उठाए। ‘हिंदू एक्शन’ जैसे लोगों का कहना है कि इस यात्रा में खालिस्तानी और पाकिस्तानी एजेंट भी शामिल थे। पत्रकार सुनंदा वशिष्ठ ने भी इस पर नाराजगी जताई है। सुनंदा वशिष्ठ ने कहा कि व्हाइट हाउस में राहुल गाँधी किनसे मिले, इसकी कोई जानकारी नहीं दी गई। कुछ अप्रवासी भारतीयों ने यह भी कहा कि यह सब 2024 के भारतीय चुनावों में दखल देने की कोशिश हो सकती है।
घरेलू राजनीति के लिए विदेशी दखलंदाजी: राहुल गाँधी का पुराना रिकॉर्ड
राहुल गाँधी का पुराना इतिहास भी इस मामले को और गंभीर बनाता है। पश्चिमी देशों से मदद माँगने की उनकी आदत नई नहीं है। 2023 में कैम्ब्रिज में दिए एक भाषण में, राहुल गाँधी ने यूरोप और अमेरिका से भारत में ‘लोकतंत्र बहाल’ करने की अपील में गलत जानकारी फैलाई थी। राहुल गाँधी ने भारत की मजबूत चुनाव प्रणाली को नजरअंदाज कर दिया था। 2021 में, राहुल गाँधी ने हार्वर्ड में अमेरिकी राजदूत निकोलस बर्न्स से भारत के ‘आंतरिक मामलों’ पर टिप्पणी करने को कहा था। यह सुनकर खुद राजदूत भी हैरान रह गए थे।
यह कोई अकेली घटना नहीं है। 2018 में कैलाश मानसरोवर की यात्रा के बाद राहुल गाँधी ने चीन के मंत्रियों से मुलाकात की थी। यह डोकलाम विवाद के बाद हुआ था। राहुल गाँधी ने चीनी राजदूतों से भी बात की थी। ये सब दिखाता है कि वह घरेलू राजनीति के फायदे के लिए विदेशी ताकतों की मदद लेने को तैयार रहते हैं।
कतर-सोरोस-कॉन्ग्रेस का गठजोड़: क्या यह भारत के खिलाफ एक साजिश है?
कतर एक महत्वपूर्ण अमेरिकी सहयोगी है। वहाँ अल उदीद एयर बेस है। कतर ने अफगानिस्तान में शांति वार्ता में मदद की थी। यह देश अपनी ‘सॉफ्ट पावर’ का उपयोग करता है। यह ऊर्जा और अल जजीरा जैसे मीडिया के जरिए ऐसा करता है। लेकिन कतर पर इस्लामी समूहों को पैसा देने का भी आरोप है। इनमें मुस्लिम ब्रदरहुड और हमास शामिल हैं। इसलिए, वह भारत के खाड़ी देशों के साथ संबंधों के लिए एक चुनौती है।
सवाल यह है कि कतर का राजदूत राहुल गाँधी के कार्यक्रम को क्यों बढ़ावा देगा? खासकर तब जब यह कार्यक्रम जॉर्ज सोरोस और IAMC से जुड़े समूहों के साथ हो। न्यू यॉर्क में एक और कार्यक्रम हुआ। उसके लिए कट्टरपंथी मस्जिदों और ICNA से जुड़े संगठनों ने पंजीकरण किया था। इन संगठनों का आतंकवाद से जुड़ा इतिहास रहा है। यह सब एक खास विचारधारा की ओर इशारा करता है।
यह एक समन्वित प्रयास जैसा लगता है, जहाँ कतर कूटनीतिक लाभ दे रहा है, सोरोस वित्तीय मदद कर रहा है और अमेरिकी लॉबिंग इसे बढ़ावा दे रही है। बंद दरवाजों के पीछे, चर्चाएँ मोदी की विदेश नीति को कमजोर करने पर हो सकती हैं, जैसे कश्मीर या CAA पर। राहुल गाँधी का इन सब से जुड़ना कॉन्ग्रेस के व्यापक संबंधों को दिखाता है। जॉर्ज सोरोस के संगठन से जुड़े सलिल शेट्टी भारत जोड़ो यात्रा में शामिल हुए थे। कॉन्ग्रेस ने CAA विरोधी प्रदर्शनों का भी समर्थन किया था, जो बाद में हिंसा में बदल गए थे।
राहुल गाँधी की कूटनीति अमेरिका यात्रा
जिस तरह भारत एक मजबूत देश बन रहा है, ऐसे विदेशी संबंध संदिग्ध हैं। ये हमारी संप्रभुता के लिए खतरा हो सकते हैं। X पर वायरल हो रही खान और चीमा की बातचीत इस बात को फिर से उठाती है। इससे पता चलता है कि राहुल गाँधी की अमेरिका यात्रा कोई साधारण यात्रा नहीं थी। यह कई ताकतों का एक साथ आना था, जिसमें कतर के राजदूत भी शामिल थे।
जब तक सच्चाई सामने नहीं आती, तब तक सवाल उठते रहेंगे। क्या यह सिर्फ कूटनीति थी या इसके पीछे कुछ और गहरी साजिश थी?


