Homeविचारमीडिया हलचलदुख-दर्द-पीड़ा… माड़वी हिड़मा के एनकाउंटर से The Wire का सब निकला बाहर, लाल आतंकी...

दुख-दर्द-पीड़ा… माड़वी हिड़मा के एनकाउंटर से The Wire का सब निकला बाहर, लाल आतंकी को वामपंथी पोर्टल बताने में जुटा ‘आदिवासियों का Hero’

वामपंथी पोर्टल 'द वायर हिंदी' ने 20 नवंबर को संतोषी मरकाम का लेख छापा, जिसमें माड़वी हिड़मा को 'आदिवासी नायक' बताया गया जो जल-जंगल-जमीन के लिए लड़ा।

भारत के सबसे खूँखार और मोस्ट वांटेड माओवादी कमांडरों में शुमार माड़वी हिड़मा को आखिरकार सोमवार (18 नवंबर 2025) को ढेर कर गिया गया। उसे आंध्र प्रदेश के अल्लूरी सीतारामराजू जिले के मारेडुमिल्ली जंगल में सुरक्षा बलों ने मुठभेड़ में मार गिराया। उसके साथ उसकी पत्नी मड़कम राजे (राजक्का) और चार अन्य माओवादी भी मारे गए।

हिड़मा पर केंद्र और राज्य सरकारों ने कुल 1 करोड़ रुपए से ज्यादा का इनाम घोषित किया था। वह माओवादी संगठन की सेंट्रल कमिटी का सबसे युवा सदस्य था और दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमिटी (DKSZC) का सचिव भी बना दिया गया था। पिछले दो दशकों में उसने 26 बड़े हमलों की कमान संभाली, जिनमें सैकड़ों सुरक्षा बलों के जवान और निर्दोष आदिवासियों की मौतें हुई।

लेकिन वामपंथी प्रोपेगैंडा मशीन के रूप में कुख्यात वेबसाइट ‘द वायर हिंदी’ ने हिड़मा की मौत पर गुरुवार (20 नवंबर 2025) को एक आर्टिकल पब्लिश किया, जिसकी हेडलाइन थी- “मोस्ट वांटेड या आदिवासी नायक? माओवादी कमांडर माड़वी हिड़मा के अंतिम संस्कार के लिए उमड़े लोग”। इस आर्टिकल में हिड़मा को पुलिस दस्तावेजों में ‘मोस्ट वांटेड नक्सली’ बताने के बावजूद उसे ‘आम लोगों के लिए हीरो’ करार दिया गया, जिसने ‘जल-जंगल-जमीन के लिए हथियार उठाया था’।

इस आर्टिकल में ग्रामीणों के वायरल वीडियो, सोनी सोरी और डिग्री प्रसाद चौहान जैसे विवादित एक्टिविस्ट्स के बयान छापकर यह नैरेटिव बनाया गया कि हिड़मा कोई आतंकवादी नहीं, बल्कि आदिवासियों का रक्षक था और उसकी मौत फर्जी मुठभेड़ में हुई।

यह लेख न सिर्फ तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश करता है, बल्कि एक खूंखार हत्यारे को महिमामंडित करने की घिनौनी कोशिश है। आइए, द वायर के इस लेख के हर दावे को तथ्यों की कसौटी पर कसते हैं और देखते हैं कि द वायर जैसा वामपंथी संस्थान कैसे लाल आतंक को ग्लैमराइज कर रहा है।

हिड़मा कोई ‘नायक’ नहीं बल्कि एक क्रूर हत्यारा था

द वायर का आर्टिकल हिड़मा को “आदिवासियों का हीरो” बताता है, जो जल-जंगल-जमीन के लिए लड़ा। लेकिन सच्चाई यह है कि हिड़मा छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले के पुवर्ती गाँव का रहने वाला एक अनपढ़ (केवल सातवीं तक पढ़ा) युवक था, जो 1994-95 में महज 17 साल की उम्र में माओवादी संगठन में शामिल हो गया। वह माओवादियों की पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (PLGA) की बटालियन नंबर-1 का कमांडर था। उसकी बटालियन माओवादियों की सबसे क्रूर और हथियारबंद इकाई मानी जाती है।

हिड़मा पर आरोप है कि उसने कम से कम 26 बड़े हमलों की कमान संभाली या उनमें प्रमुख भूमिका निभाई। इसमें से कुछ बड़े हमलों के बारे में जान लीजिए-

दंतेवाड़ा (ताड़मेटला) हमला: माओवादियों ने 6 अप्रैल 2010 को घात लगाकर CRPF की 76 जवानों की जान ले ली। यह भारत में माओवादी हिंसा का सबसे बड़ा हमला था। हिड़मा की बटालियन ने इसे अंजाम दिया था।

झीरम घाटी हमला 2013: कॉन्ग्रेस की परिवर्तन रैली पर लाल आतंकियों ने हमला किया था। उस हमले में पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल, छत्तीसगढ़ कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष नंदकुमार पटेल, पूर्व मंत्री महेंद्र कर्मा समेत 27 लोगों की मौत हो गई थी। इस हमले से कॉन्ग्रेस का लगभग पूरा राज्य नेतृत्व ही साफ हो गया था। कुख्यात नक्सल आतंकी हिड़मा ही इसका मास्टरमाइंड था।

सुकमा में साल 2017 में 2 हमले: हिड़मा के नेतृत्व में वामपंथी आतंकियों ने अप्रैल 2017 में सीआरपीएफ की टीम पर हमला किया था, जिसमें 25 जवानों को वीरगति प्राप्त हुई थी। वहीं, मार्च 2017 के हमले में 12 जवानों को वीरगति मिली थी।

सुकमा-बीजापुर हमला 2021: वामपंथी आतंकियों के इस हमले में 22 जवानों को वीरगति प्राप्त हुई।

इनके अलावा दर्जनों छोटे-बड़े हमले, वसूली, आदिवासियों को ‘पुलिस मुखबिर’ बताकर मारना, गाँवों को जलाना… यह सब हिड़मा का ‘कारनामा’ था। वह विरोधी आदिवासियों को क्रूरता से मारता था, महिलाओं का अपहरण करता था और जंगलों में अपना साम्राज्य चलाता था। क्या यही ‘जल-जंगल-जमीन’ की लड़ाई है? यह तो शुद्ध आतंकवाद है, जिसमें सबसे ज्यादा पीड़ित आदिवासी ही हुए हैं।

हिड़मा की माँ ने कुछ दिन पहले ही उससे सरेंडर करने की अपील की थी। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने नवंबर अंत तक उसे खत्म करने की डेडलाइन दी थी। लेकिन हिड़मा ने सरेंडर का प्रस्ताव ठुकरा दिया। उसे हथियारों की ताकत पर ही भरोसा था। ऐसे में वो आँध्र की ओर भाग गया, जहाँ नक्सलियों के अन्य सुरक्षित ठिकाने हैं, लेकिन सुरक्षा बलों ने उसे ढेर कर दिया।

लाल आतंकियों के पक्ष में फेक नैरिटव चला रहा है द वायर

द वायर का लेख पूरी तरह एकतरफा है। इसे इन बातों से समझ सकते हैं-

जिस गाँव में हिड़मा दशकों से नहीं आया, उसे दिखाया शोकग्रस्त: ग्रामीणों के वीडियो दिखाकर कहा गया कि पूरा गाँव शोक मना रहा है। लेकिन सच्चाई यह है कि हिड़मा ने दशकों से गाँव में कदम नहीं रखा था। वह डर के कारण गाँव नहीं आता था, क्योंकि उसके अपने ही इलाके में कई आदिवासी उसके खिलाफ थे। जो वीडियो वायरल हैं, उनमें कुछ महिलाएँ और बच्चे रो रहे हैं। ये दृष्य हर किसी के लिए स्वाभाविक है। जाहिर सी बात है कि जो भी मरा, वो भी किसी का बेटा, किसी का भाई और किसी का पति था ही न… लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि पूरा बस्तर उसे हीरो मानता है।

बस्तर के आईजी पी. सुंदरराज ने साफ कहा था, “शव के साथ बेसिक इंसानियत बरती जाएगी, लेकिन इसे शहीद समारोह नहीं बनने देंगे।” इसलिए इलाके में भारी सुरक्षा बल तैनात थे, मोबाइल नेटवर्क बंद था। ऐसे में कौन खुलकर बोलता? जो लोग वीडियो में बोल रहे हैं, वे भी डर के मारे या पार्टी के दबाव में बोल रहे हैं। यही माओवादी स्टाइल है, जिसमें डर का राज चलाकर उसे ‘जन समर्थन’ बताया जाता है।

सोनी सोरी और डिग्री प्रसाद चौहान के बयान: सोनी सोरी खुद कई मामलों में आरोपी रही है और माओवादियों से कथित संबंधों के लिए जेल जा चुकी है। वह फर्जी मुठभेड़ का आरोप लगाती है, लेकिन कोई सबूत नहीं। चौहान भी ह्यूमन राइट्स के नाम पर माओवादियों का पक्ष लेते रहे हैं।

फर्जी मुठभेड़ का आरोप: लेख में कहा गया कि हिड़मा के साथ हमेशा सैकड़ों गार्ड रहते थे, तो सिर्फ 6 लोग कैसे मारे गए? सच्चाई यह है कि पिछले सालों में सुरक्षा बलों के लगातार ऑपरेशन से माओवादी संगठन कमजोर हो चुका है। हिड़मा भागते-भागते सिर्फ 5 लोगों के साथ रह गया था। मुठभेड़ में AK-47, डेटोनेटर और हथियार बरामद हुए। आंध्र प्रदेश पुलिस और छत्तीसगढ़ पुलिस ने साफ कहा कि यह असली मुठभेड़ थी।

द वायर ने हिड़मा के अपराधों को सिर्फ अंत में एक पैराग्राफ में डालकर कमतर दिखाया, जबकि पूरा लेख उसे ‘नायक’ बनाने में लगा है। यह स्पष्ट प्रोपेगैंडा है।

दिल्ली बैठकर माओवादियों की वकालत करती है लेखिका संतोषी मरकाम

यह लेख संतोषी मरकाम ने लिखा है। संतोषी द वायर हिंदी की नियमित लेखिका हैं, जो दिल्ली में बैठकर बस्तर, छत्तीसगढ़ और आदिवासी मुद्दों पर रिपोर्टिंग करती हैं। उनके अधिकतर लेख आदिवासी अधिकारों, बंधुआ मजदूरी, मनरेगा और माओवादी प्रभावित इलाकों पर होते हैं। लेकिन इनमें हमेशा एक पैटर्न दिखता है – सरकार और सुरक्षा बलों को विलेन दिखाना, जबकि माओवादियों या उनके समर्थकों को पीड़ित या ‘संघर्ष करने वाला’ बताना। मुद्दा कोई भी हो, विलेन तो सरकार ही होनी चाहिए।

उदाहरण के तौर पर इन बिंदुओं को देख सकते हैं-

वह बँधुआ मजदूरी पर लेख लिखती हैं, जहाँ छत्तीसगढ़ के आदिवासियों को हरियाणा या जम्मू में फँसाया जाता है-यह सही मुद्दा है, लेकिन समाधान में कभी माओवादियों की भूमिका नहीं बताती, जो इन इलाकों में विकास नहीं होने देते।

आदिवासी संस्कृति पर लेख लिखती है, लेकिन मुख्यधारा की शिक्षा को आदिवासी संस्कृति के लिए खतरा बता देती है। जबकि आँकड़े बताते हैं कि जिन क्षेत्रों को नक्सलियों से मुक्त कराया गया, उनका तेजी से विकास हुआ।

माओवादी इलाकों में माइनिंग के खिलाफ लेख, जहाँ कॉर्पोरेट और सरकार को दोषी ठहराती हैं, लेकिन माओवादियों द्वारा माइनिंग रोकने के लिए की जाने वाली हिंसा पर चुप्पी साध लेती है।

संतोषी कभी ग्राउंड पर जाकर दोनों पक्षों की बात नहीं करतीं। वह चुनिंदा एक्टिविस्ट्स (जैसे सोनी सोरी) से बात करके अपनी पूर्वाग्रही राय को ‘ग्राउंड रिपोर्ट’ का नाम दे देती हैं। यह दिल्ली से बैठकर ‘अर्बन नक्सल’ स्टाइल की पत्रकारिता है, जहाँ तथ्यों को तोड़-मरोड़कर वामपंथी नैरेटिव चलाया जाता है।

यहाँ से वो बैठे कर ये बता देती है कि नक्सलियों के संगठन में क्या चल रहा है और नक्सली अभी हथियार नहीं डाल रहे हैं। संतोषी की पकड़ तो देखिए, वो दिल्ली में बैठकर नक्सलियों की केंद्रीय और क्षेत्रीय कमेटियों के पदाधिकारियों के नाम भी बता रही है और चर्चित नक्सली प्रवक्ता ‘अभय’ के हथियार छोड़ने के प्रस्ताव को खारिज करने वाली रिपोर्ट लिखती है। इसमें रेफरेंस किन लोगों के होंगे, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है।

अर्बन नक्सलियों का सुरक्षित ठिकाना है द वायर

द वायर शुरू से ही वामपंथी प्रोपेगैंडा का केंद्र रहा है। इसके फाउंडर एडिटर सिद्धार्थ वरदराजन की पत्नी नंदिनी सुंदर खुद माओवादियों से सहानुभूति रखने के लिए जानी जाती हैं। द वायर के कई लेखक और कॉलमिस्ट खुले तौर पर माओवादियों का बचाव करते हैं, फर्जी मुठभेड़ के आरोप लगाते हैं और सुरक्षा बलों को बदनाम करते हैं।

ऑपइंडिया ने द वायर के प्रोपेगेंडा को कई बार बेनकाब किया है। जैसे-

यह सब जॉर्ज सोरोस जैसे विदेशी फंडिंग से चलने वाले नेटवर्क का हिस्सा है, जो भारत में अस्थिरता फैलाना चाहते हैं।

लाल आतंक का सफाया जरूरी

हिड़मा की मौत माओवाद के लिए अंतिम कील साबित होगी। मार्च 2026 तक माओवाद खत्म करने का लक्ष्य अब करीब है। लेकिन द वायर जैसे पोर्टल और उनके लेखक अभी भी लाल आतंक को जिंदा रखने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे प्रोपेगैंडा को पहचानना और उसका मुंहतोड़ जवाब देना हर देशभक्त का कर्तव्य है। चूँकि हिड़मा कोई हीरो नहीं बल्कि वो सैकड़ों मासूमों की जान लेने वाला खूँखार हत्यारा था, जिसने जनआंदोलन की चादर ओढ़ रही थी। ऐसे में उसके खात्मे से बस्तर में शांति की राह खुलेगी।

Join OpIndia's official WhatsApp channel

  सहयोग करें  

'द वायर' जैसे राष्ट्रवादी विचारधारा के विरोधी वेबसाइट्स को कभी पैसों की कमी नहीं होती। देश-विदेश से क्रांति के नाम पर ख़ूब फ़ंडिग मिलती है इन्हें। इनसे लड़ने के लिए हमारे हाथ मज़बूत करें। जितना बन सके, सहयोग करें

श्रवण शुक्ल
श्रवण शुक्ल
I am Shravan Kumar Shukla, known as ePatrakaar, a multimedia journalist deeply passionate about digital media. I’ve been actively engaged in journalism, working across diverse platforms including agencies, news channels, and print publications. My understanding of social media strengthens my ability to thrive in the digital space. Above all, ground reporting is closest to my heart and remains my preferred way of working. explore ground reporting digital journalism trends more personal tone.

संबंधित ख़बरें

ख़ास ख़बरें

जानिए दुबई के उस ‘Botim’ ऐप की कहानी, जिसके जरिए कनेक्टेड थे राँची में RSS दफ्तर पर बम फेंकने वाले पाकिस्तानी एजेंट

व्हाट्सएप की तरह दुबई में 'Botim' ऐप का इस्तेमाल होता है। जिन लोगों ने RSS दफ्तर पर पेट्रोल बम से हमला किया, उन्हें इसी ऐप पर टास्क मिला था।

आरफा जी, बेवकूफ तो आपने उन सेकुलर हिंदुओं को बनाया है जिन्होंने आपको ‘पत्रकार’ समझा

आरफा अगर इस्लामी कट्टरपंथियों के बचाव का काम और भारत सरकार की बुराई करना वो छोड़ दें तो उन्हें उनके अपने दर्शक ही नहीं पूछेंगे।
- विज्ञापन -