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राम मंदिर चढ़ावा विवाद पर विपक्ष का प्रोपेगेंडा फेल, श्रद्धालुओं की आस्था अटूट: आँकड़े बता रहे हैं कि अयोध्या में रामलला के दर्शन पर नहीं पड़ा कोई असर, कॉन्ग्रेसी-सपाई सियासी नरेटिव हुआ ध्वस्त

विपक्ष एक नरेटिव खड़ा करने की कोशिश कर रहा है कि चढ़ावा चोरी के का सीधा असर श्रद्धालुओं के आस्था पर पड़ा है। हालांकि श्रद्धालुओं की संख्या में हुई बढ़ोतरी ने इस नरेटिव को पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया है।

बीते एक महीने से अयोध्या स्थित राम मंदिर में चढ़ावा चोरी को लेकर सियासत गरमाई हुई है। विपक्ष एक नरेटिव खड़ा करने की कोशिश कर रहा है कि चढ़ावा चोरी का सीधा असर श्रद्धालुओं के आस्था पर पड़ा है। हालाँकि श्रद्धालुओं की संख्या में हुई बढ़ोतरी ने इस नरेटिव को पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया है।

राम मंदिर में श्रद्धालुओं का आना रुका नहीं है, कम नहीं हुआ है और न ही किसी तरह से आस्था कमजोर पड़ी है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, जून 2026 में राम मंदिर में रोजाना लगभग 1 लाख श्रद्धालु और 7 जून से 11 जून के बीच रोजाना 81,000 से 1,16,689 तक दर्शनार्थी दर्ज किए गए।

इस रिपोर्ट के अनुसार, महज पाँच दिनों में 4.90 लाख दर्शनार्थी राम मंदिर में दर्शन करने पहुँचे। अगर मंदिर खाली हो गया होता या लोग आना बंद कर चुके होते, तो इस तरह के फुटफॉल आँकड़े सामने ही नहीं आते।

टीवी9 की एक रिपोर्ट के अनुसार, 7 जून से पहले औसत 16-18 लाख रुपए प्रतिदिन चढ़ावे के तौर पर बैंक में जमा किए जाते थे। वहीं चढ़ावे का विवाद के शुरू होने के बाद ये औसत 22-24 लाख के बीच पहुँच गया है।

एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार, 22 जनवरी 2024 से 2026 तक करीब 12 करोड़ लोगों ने रामलला के दर्शन किए और सामान्य दिनों में लगभग 50 से 60 हजार श्रद्धालु रोज आते रहे।

SIT की रिपोर्ट में भी औसतन हर महीने 25 लाख श्रद्धालुओं के आने की बात सामने आई है। जहाँ तक सवाल है चढ़ावा चोरी और उसमें कमी का, तो हाल के हफ्तों में दान 16 से 18 लाख से बढ़कर 22 से 24 लाख रुपये प्रतिदिन तक पहुँच गया।

‘कोई सबूत नहीं है’- अफवाह को सुर्खी बनाने की कोशिश

कहानी की शुरुआत ही पाखंड की मिसाल है। 5 जून 2026 को मंदिर परिसर में रूटीन सुरक्षा जाँच के दौरान कुछ कर्मचारियों की जेब से नकदी बरामद हुई थी। 7 जून को जब यह बात सार्वजनिक हुई तो सपा मुखिया अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया पर गबन का मुद्दा उठाकर जाँच की माँग कर दी। लेकिन जब सवाल पूछा गया, तो असली रंग सामने आया।

अयोध्या से पूर्व विधायक और सपा प्रवक्ता पवन पांडेय ने खुद ऑपइंडिया को बताया कि यह बात महज चार दिनों से शहर में सूत्रों के हवाले से ‘टहल’ रही थी, जिसका कोई ठोस सबूत उनके पास नहीं था। यानी जिस ‘सबूत दो’ के नारे पर सपा हर सरकारी योजना, हर मुठभेड़, हर आंकड़े को कठघरे में खड़ा करती है, अपने ही सबसे बड़े ‘राम-भक्ति’ के दावे में वह खुद यह शर्त भूल गई।

ऑपइंडिया की अपनी पड़ताल में अखिलेश का यह दावा तथ्यों की कसौटी पर टिक ही नहीं पाया था। पूरे तथ्य सामने आने से पहले ही निशाना साध दिया गया था।

भले ही बाद में जाँच में सचमुच गड़बड़ी मिली, लेकिन टूटी हुई घड़ी भी दिन में दो बार सही समय बता देती है तो इससे घड़ी की साख साबित नहीं होती। सवाल यह नहीं कि सपा का शक गलत निकला या इत्तेफाक से सही, सवाल यह है कि बिना सबूत माइक थामकर हल्ला मचाना और बाद में संयोगवश सही साबित होकर पूरा श्रेय बटोर लेना ही अब सपा की स्थायी रणनीति बन चुकी है।

गोलियाँ चलवाने वाले ले रहे भगवान राम का सहारा

मंदिर में चढ़ावे की चोरी एक प्रशासनिक और जाँच का विषय है। वह प्रक्रिया चल भी रही है। लेकिन इसे बहाना बनाकर राम मंदिर के खिलाफ माहौल बनाकर श्रद्धालुओं की भावना पर सवाल उठाना और फिर राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश करना एक अलग ही एजेंडा दिखाता है। यह मंदिर-विरोधी नरेटिव वही लोग आगे बढ़ा रहे हैं, जिनका राम जन्मभूमि आंदोलन के प्रति रवैया हमेशा से ही सवालों के घेरे में रहा है।

यह भी याद रखने की जरूरत है कि राम मंदिर पर सवाल उठाने वालों का राजनीतिक इतिहास पहले से दर्ज है। 1990 के दशक में जब कारसेवक राम जन्मभूमि आंदोलन के लिए निकलते थे, तब गोलियों से उनका स्वागत करने वाली समाजवादी पार्टी आज रामभक्ति के सबसे बड़े पैरोकार बनने की कोशिश कर रही है।

30 अक्टूबर 1990 को तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के आदेश पर पुलिस ने कारसेवकों पर गोली चलाई, जिसमें कई लोगों की मौत हुई। दो दिन बाद, 2 नवंबर 1990 को हनुमानगढ़ी के पास दोबारा गोलीबारी हुई। जान बचाने के लिए कई कारसेवकों ने सरयू नदी में छलांग लगा दी। कुछ तो शवों के बीच लेटकर ही बच पाए।

आडवाणी की रथ यात्रा रोकने के लिए मुलायम यादव ने ऐलान किया था कि कारसेवकों को ‘कानून का अर्थ’ सिखाया जाएगा और हनुमानगढ़ी की तरफ बढ़ते कारसेवकों को चेतावनी दी थी कि ‘बाबरी मस्जिद पर परिंदा भी पर नहीं मार पाएगा।’

1990 का गोलीकांड कोई इक्का-दुक्का घटना नहीं थी बल्कि यह सपा की स्थापना की बुनियाद बना। बाबरी ढाँचा गिरने के बाद 1992 में मुलायम सिंह यादव ने जनता दल से अलग होकर समाजवादी पार्टी की नींव रखी थी यानी जिस पार्टी का जन्म ही राम मंदिर आंदोलन के सीधे विरोध की कोख से हुआ, वह पार्टी आज उसी मंदिर की आस्था का ठेकेदार बनने चली है।

समाजवादी पार्टी का समाजवाद अयोध्या के मसले पर हमेशा एक खास वोट बैंक के तुष्टिकरण का रहा है। यही प्रवृत्ति मुलायम सिंह के बाद उनके बेटे अखिलेश यादव के दौर में भी बिना रुके चलती रही। हजारों कारसेवकों की गिरफ्तारियाँ और अस्थायी जेलें भी उसी सपाई विरासत का हिस्सा रही हैं।

अब यह सिर्फ सपा तक सीमित बीमारी भी नहीं रही बल्कि पूरे ‘इंडिया गठबंधन’ में यही रग दौड़ती है। बिहार में लालू यादव की पार्टी आरजेडी के नेता तेजस्वी यादव ने प्राण प्रतिष्ठा से पहले तंज कसा था कि मंदिर जाओगे तो वहाँ भी दान माँग लेंगे। मतलब गोत्र भले ही अलग हों, पर नीयत एक जैसी ही है।

असल में जिनके राजनीतिक संस्कार राम मंदिर के विरोध, तुष्टिकरण और मंदिर आंदोलन की आलोचना से बने हों, उनसे आज श्रद्धा और मर्यादा की उम्मीद करना जनता की समझ का अपमान होगा।

यह सबसे बड़ा विरोधाभास भी है कि जब असल में राम मंदिर के लिए जनता का साथ देने की बारी थी तब इसी विपक्ष का विरोध दिखा था और अब जब चुनावी माहौल और सियासत के जरिए जनता को लुभाना है तो दिखावटी सहानुभूति सामने आ रही है। तब राम आंदोलन को रोकने की कोशिश थी और आज उन्हीं श्री राम के नाम पर नरेटिव बनाने की कोशिश में सपा और कॉन्ग्रेस जुटी हुई है।

चुनाव आया तो याद आ गए श्री राम

सबसे बड़ा सवाल यही है कि विपक्ष की अयोध्या-सक्रियता चुनाव से ठीक पहले अचानक तेज क्यों हुई। मंदिर निर्माण के पाँच साल और प्राण प्रतिष्ठा के डेढ़ साल में सपा को मंदिर-प्रबंधन की पारदर्शिता की याद कभी क्यों नहीं आई? यह ‘चिंता’ अचानक तभी क्यों जागी जब 2027 का विधानसभा चुनाव सिर पर है? इसी समय चढ़ावा-चोरी की खबर को बढ़ा चढ़ाकर पेश किया जाने लगा।

असल बात यह है कि विपक्ष को चढ़ावा चोरी के मामले से एक ऐसा राजनीतिक मुद्दा मिल गया, जिसके सहारे वह राम मंदिर को बदनाम करने का प्रयास कर सकता था। लेकिन यह दांव उल्टा पड़ रहा है, क्योंकि जनता भावनाओं से ज्यादा अब वास्तविक आँकड़े देख रही है।

मंदिर में भीड़ है, दर्शन हो रहे हैं, श्रद्धालु आ रहे हैं और आस्था जस की तस बनी हुई है। अगर कहीं कमी है, तो वह विपक्ष की विश्वसनीयता में है, रामभक्तों की श्रद्धा में नहीं। राम मंदिर के खिलाफ यह प्रोपेगेंडा सिर्फ एक विवाद को हवा देना नहीं, बल्कि उस सांस्कृतिक चेतना पर चोट करने की कोशिश है जिसने देश को वर्षों तक एक प्रतीक के लिए संघर्ष करते देखा।

हालाँकि अयोध्या का सच साफ है कि रामलला के दर्शन के लिए आने वाले भक्त आज भी उतनी ही निष्ठा से कतारों में खड़े हैं और यह तथ्य हर झूठे नरेटिव पर भारी पड़ता नजर आ रहा है।

जिस पार्टी की सरकार ने कभी राम भक्तों पर गोलियाँ चलवाईं, आज वही पार्टी खुद को उन्हीं भक्तों की आस्था का सबसे बड़ा प्रहरी बताकर पेश कर रही है। यही पाखंड की पराकाष्ठा है। विपक्ष जिस ‘कम भीड़’ वाले नरेटिव को बार-बार दोहरा रहा है, वह तथ्य के बजाय प्रचार पर आधारित है।

दान और चढ़ावे की राशि पर बहस अलग हो सकती है, सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल अलग हो सकते हैं, लेकिन श्रद्धालुओं की उपस्थिति के बारे में झूठ फैलाना न केवल गलत है बल्कि सनातन आस्था के साथ खिलवाड़ भी है।

राम मंदिर सिर्फ एक इमारत नहीं, करोड़ों हिंदुओं की भावनाओं, संघर्ष और प्रतीक्षा का प्रतीक है। ऐसे में उसके खिलाफ कोई भी झूठा प्रचार स्वाभाविक रूप से जनता के बीच टिक नहीं सकता।

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