- इबादत
- सादिक
- अब्दुल्ला
- साहेब उर्फ शाहिब
- शेरयार
- फैजल
- आजम
- शब्बीर
- इमरान
- मुस्ताक
- राजिक
ऊपर जो 11 नाम हैं, वो रामनवमी शोभा यात्रा के दौरान हिंदुओं पर हमले के आरोपी रहे हैं। 2022 में मध्य प्रदेश के खरगोन जिले में कट्टर मुस्लिम भीड़ ने शोभा यात्रा में DJ बजाने को लेकर हमला किया था। जिले के SP तक को गोली मारी थी इसी भीड़ ने। अनेकों घर जला दिए थे, हिंदू बहन-बेटियों को रेप की धमकी दी गई थी। भगवान श्रीराम और माता सीता को लेकर आपत्तिजनक बात कही थी। जहाँ इतना सब कुछ हुआ, उसी जिले के सेशन कोर्ट ने लगभग 4 साल बाद 27 जुलाई 2026 को उपरोक्त सभी 11 आरोपितों को बरी कर दिया।
अभियोजन पक्ष की ओर से आरोपितों पर निम्नलिखित गंभीर आरोप लगाए गए थे:
(a) भीड़ जमा करने
(b) घातक हथियारों से लैस होकर हमला करने
(c) पत्थरबाजी करने
(d) मकान-वाहन व अन्य सामानों की तोड़-फोड़ करने
(e) पेट्रोल बम फेंकने
(f) घरों में आग लगाने
(g) पीड़ितों के जीवन को खतरा में डालने
(h) संपत्ति की क्षति करने
पुलिस की ओर से इनसे संबंधित सुसंगत धाराएँ भी आरोपितों पर लगाई गई थी।
इन आरोपों को साबित करने के लिए अभियोजन पक्ष ने कुल 13 साक्षी लोगों के बयानों को भी कोर्ट के सामने रखा, सभी 13 का परीक्षण भी कराया गया। कोर्ट ने इन 13 में से 11 लोगों को प्रत्यक्ष व चश्मदीद साक्षी भी माना। इस पूरी कानूनी प्रक्रिया में सभी 11 आरोपितों का कहना था कि वे लोग निर्दोष हैं, उनको झूठे केस में फँसाया गया है – हालाँकि किसी भी आरोपित की ओर से अपने बचाव में कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया।
अभियोजन पक्ष ने अपनी ओर से साक्ष्य सहित कुल 10 आरोप कोर्ट के सामने रखे। खरगोन (मंडलेश्वर) के चतुर्थ अपर सत्र न्यायाधीश मुकेश नाथ के समक्ष सभी 11 आरोपितों की संलिप्तता से संबंधित कुल 8 विचारणीय प्रश्न भी रखे गए। हालाँकि जज ने आदेश देते हुए 50 पॉइंट में सभी आरोपों और प्रश्नों पर कोर्ट का तर्क रखा। अंततः “अपराध संदेह से परे प्रमाणित करने में असफल” की बात रखते हुए जज मुकेश नाथ ने सभी 11 आरोपितों को उनके ऊपर लगाए गए अपराधों के आरोपों से दोषमुक्त कर दिया। अपने आदेश के पीछे न्यायाधीश ने 50 पॉइंट में निम्नलिखित महत्वपूर्ण तर्क दिए:
(i) साक्षी लोगों के कथनों में विरोधाभास
(ii) 2 दिन की देरी से दर्ज FIR
(iii) एक महत्वपूर्ण साक्षी के बयान को पुलिस द्वारा 51 दिन बाद दर्ज किया जाना
(iv) शिकायती आवेदन पत्र और शुरुआती FIR में 11 आरोपितों की जगह केवल 6 आरोपितों के ही नाम दर्ज
(v) कानूनी कार्रवाई के दौरान पुलिस द्वारा चश्मदीद साक्षी लोगों से आरोपितों की पहचान परेड नहीं कराया जाना
(vi) किसी भी साक्षी द्वारा कोर्ट में आरोपितों को नाम से नहीं पहचानना
(vii) दंगा करने आए लगभग 50 लोगों की भीड़ में से 11 आरोपितों की पहचान और उनके नाम किस आधार पर
(viii) एक साक्षी द्वारा आरोपितों को चेहरे से पहचानने का दावा जबकि दूसरे के द्वारा सभी दंगाई के चेहरे पर कपड़े बंधे होना बताना
(ix) भीड़ द्वारा विस्फोटक सामग्री के उपयोग संबंधित कोई भी विश्वसनीय साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया जाना
अब सवाल उठता है कि जब कोर्ट ने आरोपितों को उनके ऊपर लगे अपराधों से बरी कर दिया है तो लंबी-चौड़ी खबर लिखी ही क्यों जाए? इसका उत्तर जानने से पहले यह देखना जरूरी है कि खरगोन में रामनवमी शोभा यात्रा में जो दंगे हुए थे, उसकी भयावहता क्या थी? तब मीडिया में क्या-क्या छपा था?
2022 की खरगोन रामनवमी शोभा यात्रा पर दंगाई मुस्लिम भीड़ के हमले को लेकर प्रकाशित खबरें
- मध्य प्रदेश में रामनवमी की शोभा यात्रा पर मुस्लिम भीड़ का हमला, ट्रांसफर्मरों और गाड़ियों को किया आग के हवाले: DJ पर थी आपत्ति
- ‘निकालो राम को… तुम्हारी सीता मैया को ले जाएँगे’: खरगोन में रेप की धमकी दे रहे थे दंगाई, CCTV में चेहरा ढके-हथियार लिए दिखे
- खरगोन में श्रीराम शोभायात्रा पर हमले की पहले से ही थी प्लानिंग, छतों पर जमा थे पेट्रोल-बम; 77 गिरफ्तार
- पहली बार.. खरगोन दंगे के विलेन की तस्वीरें:तलवार लेकर दौड़ा इरफान, वसीम ने SP को गोली मारी, जानिए दंगा भड़काने वाले गुंडे कौन थे…
- ‘I told him to stay safe but he led mob attack on my family’: Hindu victim of Khargone violence talks about betrayal from his Muslim neighbour
- ‘A sword-wielding miscreant dashed toward the Hindus’: SP who sustained bullet injury narrates the mayhem unleashed during Khargone violence
- Khargone violence: 16-year-old Shivam Shukla with severe head injuries is struggling for his life in the hospital
- Khargone violence: Three main accused arrested; 182 people held so far in 72 cases
ऊपर जो खबरें दी गई हैं, वो सिर्फ ऑपइंडिया में प्रकाशित खबरें नहीं हैं। मुख्य धारा की मीडिया ने भी इसे प्रमुखता से कवर किया था। ग्राउंड रिपोर्टिंग की गई थी। दंगा पीड़ित हिंदुओं के अलावे घायल पुलिस वालों की आपबीती भी मीडिया ने बखूबी चलाया था। मतलब दंगा हुआ था, इसको इनकार नहीं किया जा सकता। बात अगर सिर्फ दंगे की हो तो मीडिया “अपराध संदेह से परे प्रमाणित करने में सफल” रहा था। व्यक्ति विशेष को अपराधी घोषित करना या नहीं – यह न्यायालय का काम है, उन्होंने किया भी।
“अपराध संदेह से परे प्रमाणित करने में असफल” Vs “अपराध संदेह से परे प्रमाणित करने में सफल”
माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने 1984 में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया था। Sharad Birdhi Chand Sarda vs State Of Maharashtra – इस केस के मामले में। परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधारित मामलों वाले इस केस में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि आरोपित पर लगाए गए आरोपों और अपराधों को साबित करने का दायित्व अभियोजन पक्ष का होता है। अभियोजन पक्ष मतलब राज्य, राज्य मतलब पुलिस-वकील-डॉक्टर-फॉरेंसिक-लैब आदि।
अब सवाल उठता है कि जब खरगोन में रामनवमी शोभा यात्रा पर दंगाई मुस्लिम भीड़ ने हमला किया और अभियोजन पक्ष को उससे संबंधित चश्मदीद की गवाही में एकरूपता नहीं दिखी, तो न्यायालय में परिस्थितिजन्य साक्ष्यों को लेकर जाने की जिम्मेदारी किसकी थी? मार खाए पीड़ित हिंदुओं की? जिनके घर जलाए गए, उन हिंदुओं की? जिनके बहू-बेटियों को रेप की धमकी मिली, उनकी? या राज्य सरकार और उसके तंत्र की?
दंगों के समय हिंदू अपनी जान बचाए या घड़ी में यह देखे कि कितना बजा है क्योंकि 2/4 साल बाद किसी न्यायालय में उससे समय पूछा जाएगा? दंगाई कितनी संख्या में थे, सभी हिंदू पीड़ित उसकी सटीक गिनती करें क्योंकि न्यायालय में अलग-अलग संख्या से संदेह उत्पन्न होगा। अगर हिंदू ऐसा नहीं करते हैं तो उनको ‘परिस्थितिजन्य साक्ष्य’, ‘अपराध संदेह से परे प्रमाणित करने में असफल’ – जैसे तकनीकी शब्दों में उलझाया जाएगा, तारीख पर तारीख मिलेगी… और अंततः न्याय के इंतजार में भटकना होगा।


