Home Blog Page 4061

ToolKit में पहली गिरफ्तारी: 21 साल की दिशा बेंगलुरु में धराई, दिल्ली पुलिस की साइबर सेल कर रही पूछताछ

किसान आंदोलन की आड़ में भारत के खिलाफ़ रचे गए षड्यंत्र को साबित करने वाले दस्तावेज़ ‘टूलकिट’ मामले में बड़ी कार्रवाई हुई है। दिल्ली पुलिस की साइबरक्राइम स्पेशल सेल ने शनिवार (13 फरवरी 2021) को युवा ‘स्टूडेंट क्लाइमेट चेंज एक्टिविस्ट’ दिशा रवि को बेंगलुरु से हिरासत में लिया।

‘फ्राइडेज़ फॉर फ्यूचर’ (FFF) की संस्थापक छात्रा दिशा रवि पर आरोप है कि उसने तमाम सोशल मीडिया माध्यमों पर ‘टूलकिट’ का प्रसार किया था। फ़िलहाल दिल्ली पुलिस दिशा से इस मुद्दे पर पूछताछ करेगी।  

रिपोर्ट्स के मुताबिक़ 21 वर्षीय दिशा को सोलादेवानहाली स्थित उसके घर से हिरासत में लिया गया। वह FFF की संस्थापक सदस्यों में से एक है। FFF जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर काम करने वाला वैश्विक अभियान (global climate strike movement) है, जिसकी शुरुआत अगस्त 2018 में हुई थी। स्वीडन की अंतरराष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन एक्टिविस्ट ग्रेटा थनबर्ग ने बेंगलुरु में इस अभियान के लिए एक स्ट्राइक स्कूल की शुरुआत की थी।

दिशा ने माउंट कार्मेल कॉलेज (mount carmel college) से बीबीए (bachelor of business administration) की पढ़ाई की है। फ़िलहाल वह गुड मिल्क कंपनी (good mylk company) में बतौर कल्नरी एक्सपीरियंस मैनेजर (culinary experience manager) काम कर रही हैं। जब पुलिस ने उसे हिरासत में लिया, उस वक्त वो वर्क फ्रॉम होम कर रही थी। दिशा के पिता मैसूर में एथलेटिक्स कोच हैं और माँ गृहिणी हैं।

दिल्ली पुलिस की साइबरक्राइम स्पेशल सेल ने 4 फरवरी को इस मामले में आईपीसी की धारा 124ए, 120ए और 153ए के तहत एफ़आईआर दर्ज की थी। देशद्रोह, आपराधिक षड्यंत्र और समूहों के बीच नफ़रत फैलाने संबंधी यह एफ़आईआर ‘टूलकिट’ के निर्माताओं के खिलाफ़ दर्ज की गई थी।

‘टूलकिट’ को ग्रेटा थनबर्ग ने भी साझा किया था। 18 वर्षीय ग्रेटा ने इसके बाद अपना मूल ट्वीट डिलीट कर दिया था, जिसमें टूलकिट मौजूद थी। इसके बाद दूसरा ट्वीट किया था, जिसमें दूसरी ‘टूलकिट’ शामिल की गई थी।       

हाल ही में ‘दी स्ट्रिंग’ ने ‘टूलकिट’ का वामपंथी मीडिया और ऑल्ट न्यूज़ जैसे कुछ स्वघोषित फैक्ट चेकर्स से संबंधों को उजागर करने का दावा किया था। ट्विटर पर ‘द स्ट्रिंग’ (The String) ने इस बात की जानकारी देते हुए बताया था कि यूट्यूब द्वारा उनका वीडियो डिलीट कर दिया गया है।

ग्रेटा थनबर्ग द्वारा किसान आन्दोलनों को लेकर ‘गलती से’ सार्वजानिक की गई एक ‘टूलकिट’ पर जारी विवाद को लेकर ‘दी स्ट्रिंग’ नाम के इस चैनल ने दावा किया था कि वो इस टूलकिट को लेकर खुलासे करेगा, जिनसे स्पष्ट होगा कि किस तरह से मजहबी फैक्ट चेकर वेबसाइट ‘ऑल्ट न्यूज़’ का भी इस टूलकिट से सम्बन्ध है।

इसके पहले दिल्ली पुलिस ने टूलकिट बनाने वालों को लेकर में शुक्रवार (फरवरी 05, 2021) को गूगल और अन्य सोशल मीडिया कंपनियों से ईमेल आईडी, डोमेन यूआरएल और कुछ सोशल मीडिया अकाउंट की जानकारी देने को कहा था।

बताया जा रहा है कि गूगल ने इस टूलकिट को बनाने वालों की जानकारी साझा करने के लिए अपनी सहमती दे दी थी। उल्लेखनीय है कि किसान आन्दोलन को लेकर पॉप सिंगर रिहाना के ट्वीट के बाद जलवायु परिवर्तन कार्यकर्ता ग्रेटा थनबर्ग (Greta Thunberg) ने ‘गलती से’ एक ‘टूलकिट’ ट्विटर पर शेयर कर डाली थी।

‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, हिंसा फ़ैलाने की स्वतंत्रता नहीं’ – ट्विटर के दोहरे रवैये पर लगाम जरूरी

6 जनवरी 2021 को अमेरिका में वहाँ की संसद के प्रांगण ‘कैपिटल हिल’ में हिंसा की घटनाएँ हुईं। उस समय हिंसा फैलाने के आरोप में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ट्विटर अकाउंट को ब्लॉक कर दिया।

माना गया कि ट्रंप ने एक वीडियो के जरिए अपने समर्थकों को हिंसा के लिए उकसाया। यही नहीं, बाकी कई टि्वटर अकाउंट भी इस आधार पर ब्लॉक या स्थगित कर दिए गए। यूट्यूब, फेसबुक व अन्य सोशल मीडिया कंपनियों ने भी ऐसा ही किया।

उस समय ट्विटर ने डोनाल्ड ट्रंप का ट्विटर अकाउंट ब्लॉक करते हुए कहा, “ट्रंप का अकाउंट 12 घंटे तक ब्लॉक रहेगा और यदि उन्होंने चुनाव परिणामों को अस्वीकार करने वाली और उन ट्वविट्स को डिलीट नहीं किया, जो हिंसा फ़ैलाने जैसी लगती हैं, तो ये रोक आगे बढ़ा दी जाएगी।” साथ ही इस बयान में ट्विटर ने ये भी कहा, “यदि ट्रंप ट्विटर की हिंसात्मक धमकियों और चुनाव संबंधित झूठे प्रचार की नीति का उल्लंघन जारी रखते हैं तो उनका अकाउंट स्थाई रूप से बंद कर दिया जाएगा।”

बात बिलकुल तर्कसंगत लगती है कि ट्विटर के अकाउंट का उपयोग हिंसा फैलाने के लिए नहीं किया जा सकता। यानी किसी भी मीडिया संस्थान के प्लेटफॉर्म का उपयोग किसी देश में उसकी सांवैधानिक व्यवस्था, मान्य संस्थाओं और कानून द्वारा स्थापित ढाँचों और परंपराओं को नुकसान पहुँचाने के लिए नहीं किया जा सकता।

लेकिन क्या ट्विटर अपने इन सिद्धांतों का पालन दुनिया में हर जगह करता है? भारत में क्या हुआ? लाल किले पर जो कि भारत की अस्मिता और राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक है, 26 जनवरी के दिन दंगाइयों ने राष्ट्रीय ध्वज का अपमान किया।

क्या ट्विटर ने लालकिले में 26 जनवरी को हुई हिंसा को लेकर ऐसा किया? क्या ट्विटर ने हिंसा और विद्वेष फैलाने वाले ट्विटर अकाउंट को ब्लॉक करने की चेष्टा तक की? यहाँ तक कि कुछ पत्रकारों ने जब दिल्ली पुलिस मुख्यालय के सामने एक किसान की ट्रैक्टर पलटने से हुई मृत्यु को पुलिस की गोली से होने वाली मृत्यु बताकर ट्वीट किया, तो भी ट्विटर ने ना तो इनको कोई चेतावनी दी और ना इनके खिलाफ कोई और कार्यवाही की।

और तो और भारत में तो #ModiPlanningFarmerGenocide जैसा हैशटैग चलाया गया। इस हैशटैग का हिंदी अर्थ है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी किसानों के नरसंहार की योजना बना रहे हैं। अब इससे विद्वेषपूर्ण, हिंसा भड़काने और उकसाने वाला और नितांत झूठा प्रचार क्या हो सकता है? भारत में नए कृषि कानूनों को लेकर एक वर्ग आंदोलन कर रहा है।

कुछ दिन पहले 26 जनवरी को हिंसा हो चुकी है। लाल किले और तिरंगे के अपमान पर समाज उद्वेलित है। ऐसे में इस तरह के हैशटैग के पीछे की मंशा समझने के लिए आपको कोई बड़ा विद्वान होने की आवश्यकता नहीं हैं। होना तो ये चाहिए था कि ट्विटर की सम्पादकीय टीम स्वयं संज्ञान लेकर इस पर कार्रवाई करती। ऐसा तो नहीं हुआ, बल्कि ट्विटर ने अमेरिका से उलट बाँसी करते हुए इसे ‘खबरीला कंटेंट’ बताया।   

भारत सरकार ने ट्विटर को लिखित आदेश देते हुए किसानों के नरसंहार वाले इस हैशटैग #ModiPlanningFarmerGenocide को चलाने वाले 257 ट्विटर अकाउंट पर कार्रवाई करने के लिए कहा। कुछ घंटे के लिए तो ट्विटर ने इनमें से कुछ अकाउंट को ब्लॉक किया।

फिर पलटी मारते हुए ट्विटर के अधिकारियों ने कहा कि इसे वह ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ का मुद्दा मानते हैं और इस हैशटैग को चलाने वाले अकाउंट को पुनः बहाल कर दिया। ट्विटर ने ये भी कहा कि ये हैशटैग ‘न्यूज़वर्दी’ यानी खबरीला है। ट्विटर यहाँ शिकायतकर्ता, अभियुक्त, वकील और न्यायाधीश – चारों भूमिकाएँ खुद निभाने लगा। अर्थात हर नियम कायदे से परे।

यह बात अलग है कि भारत के कड़े रुख के बाद ट्विटर ने पहले 297 और बाद के 1178 ट्विटर अकाउंट में से 97% फीसदी को ब्लॉक कर दिया है। लेकिन इनको भी जियो टैगिंग के जरिए भारत में ही ब्लॉक किया गया है। इनमें से कई अकाउंट्स अभी भी विदेशों में बकायदा चल रहे  हैं। 

इस घटना से कई सवाल पैदा होते हैं।

पहला सवाल यह है कि क्या ट्विटर जैसी सोशल मीडिया कंपनियाँ, जो लाभ के लिए काम करती हैं, उनको यह अधिकार है कि वह यह तय करें कि कोई देश कैसे चलेगा?

दूसरा प्रश्न है कि क्या ये कंपनियाँ भारत के कानून, भारतीय संसद, जनता द्वारा चुनी हुई सरकार और भारत की व्यवस्था से ऊपर हैं?

तीसरा सवाल कि क्या ये कंपनियाँ मुद्दई, वकील, मुजरिम और मुंसिफ – सारी भूमिका खुद ही अदा करेंगी ?

चौथा और सबसे बड़ा सवाल क्या भारत जैसे लोकतांत्रिक राष्ट्र की सार्वभौम सत्ता से ऊपर इन मीडिया संस्थानों को कोई अधिकार है?

कथित अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम से इन कंपनियों को अपने राजनीतिक विचार और खास सोच इस तरह किसी देश पर लादने का अधिकार किसने दिया? ट्विटर के भारत में कोई 01 करोड़ 80 लाख अकाउंट हैं। इनमें से भी माना जाता है कि 20% अकाउंट्स स्वचालित बॉट्स यानी मशीनों द्वारा चलाए जाते हैं। यानी ये फेक अकाउंट है।

ऐसे झूठे फरेबी अकाउंट के सहारे चलने वाले सोशल मीडिया संस्थानों को या उनके एक खास नजरिए को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सबसे बड़ा नियामक मान लिया जाने से बड़ी त्रासदी कोई नहीं हो सकती। अगर संख्या बल को ही मापदंड बनाया जाए तो 30 लाख से ज़्यादा अकाउंट तो भारत में कुछ महीने पहले चालू हुए ‘KOO’ (कू) नामक ऐप के भी हो चुके हैं।

वैसे अब सुप्रीम कोर्ट ने भी ट्विटर व अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को नोटिस भेजा है कि वह झूठ और फरेब से चलाए जाने वाली फेक न्यूज़ आदि पर अपनी स्थिति स्पष्ट करें। किसी भी सोशल मीडिया या मीडिया संस्थान को, खासकर जो लाभ के आधार पर चलाया जा रहा है, यह हक नहीं दिया जा सकता कि वह विधि द्वारा स्थापित भारतीय सरकार की अवमानना करें।

वैसे भी भारत के संविधान में दिया गया अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार अंतिम नहीं है। वह भी कुछ शर्तों के साथ ही लागू होता है। उसमें भी कई वर्जनाएँ हैं। इस कारण ट्विटर तथा अन्य सोशल मीडिया संस्थानों को भी उसी तराजू पर तौला जाना चाहिए, जो तराजू भारत के संविधान ने बनाई है।

इस नाते इन्हें भारत के लोगों के द्वारा चुनी हुई सरकार तथा उसके द्वारा स्थापित नियमों और कायदों के अनुसार चलना आवश्यक है। अन्यथा भारत सरकार को यह पूरा हक है कि वह ट्विटर जैसे संस्थानों के दोगलेपन के खिलाफ कानून के अनुसार कार्यवाही करें और उन्हें उनके द्वारा चलाई जा रही एक खास सोच को देश पर थोपने से रोके।

आखिर में, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सही संदर्भ में देखना आवश्यक है। अमेरिका में जब 6 जनवरी को कोहराम हुआ, तो वहाँ चारों ओर से सोशल मीडिया पर लगाम लगाने की आवाज़ उठाई गई। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के ‘लिबरल’ यानी उदारवादी पैरोकारों ने जोर-शोर से कहा कि बोलने की आज़ादी के नाम पर समाज में विद्वेष फ़ैलाने की छूट किसी को नहीं दी जा सकती।

इन मुद्दों पर पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा के विशेष सहायक रहे जोनाथन ग्रीनब्लेट ने स्पष्ट कहा, “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, हिंसा फ़ैलाने की स्वतंत्रता नहीं है।” उन्होंने कहा, “राष्ट्रपति (ट्रंप) ने सोशल मीडिया के ज़रिए ज़हर फैलाया है।” ग्रीनब्लेट, जो इस समय अमेरिका की एंटी डिफेमेशन लीग के मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं, ने कहा, “सोशल मीडिया कंपनियों पर ये लाजिमी है कि वे सख्त कार्रवाई करते हुए इसे रोकें।” 

ऐसा नहीं है कि ट्विटर भारत में हो रही घटनाओं से अनजान था। स्वीडन की रहने वाली  ग्रेटा थनबर्ग गलती से एक टूलकिट को अपने ट्विटर अकाउंट पर साझा कर चुकीं थी। इसमें विस्तार से बताया गया है कि कृषि कानून विरोधी प्रदर्शनों की आड़ में किस तरह भारत में विद्वेष और असंतोष फैलाया जाना चाहिए।

यानी ट्विटर के प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल सीधे-सीधे भारत के अंदरूनी मामलों को उलझाने के लिए हो रहा है, ये जानकारी सावर्जनिक थी ही। इस सबके बावजूद ट्विटर के अमेरिका और भारत में अलग-अलग मानदंड अपनाने को एक अंग्रेजी प्रतीक में शायद ऐसे कहा जा सकता है – ‘मेरा कुत्ता तो कुत्ता, लेकिन तुम्हारा कुत्ता तो टॉमी।

CPI मेंबर थे अयोध्या पर झूठ फैलाने वाले ‘इतिहासकार’ DN झा: मरने के बाद पार्टी ने खोली पोल, याद में बुलाई बैठक

भारत में पाठ्य पुस्तकों के कंटेंट्स से लेकर इतिहास से जुड़े नैरेटिव तैयार करने तक, इन सबमें वामपंथियों का ही रोल रहा है। इतिहासकारों ने वामपंथी विचारधारा से प्रेरित होकर भारतीय इतिहास से छेड़छाड़ किया और हिन्दू धर्म व हिन्दू राजाओं को नीचा दिखा कर मुगलों को महान बताया। उन्हीं में से एक थे द्विजेन्द्र नारायण (DN) झा, जिन्होंने राम मंदिर को लेकर झूठ फैलाया था। अब पता चला है कि वो कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (CPI) के सदस्य थे।

CPI की दिल्ली यूनिट के एक ईमेल से भी इसकी पुष्टि होती है। इसका दफ्तर नई दिल्ली स्थित असफ अली रोड में स्थित है। CPI ने कहा है कि DN झा का निधन न सिर्फ इतिहास की दुनिया के लिए एक बड़ी क्षति है, बल्कि इतिहास के ‘वैज्ञानिक लेखन’ के लिए भी बड़ा नुकसान है। पार्टी ने उन्हें अपने-आप में एक संस्था बताते हुए याद दिलाया कि उन्होंने कैसे प्राचीन और मध्ययुगीन भारत पर ढेर सारी पुस्तकें लिखीं।

CPI की बैठक में DN झा को किया गया याद

बकौल CPI, उनके इतिहास लेखन पर कई बार दक्षिणपंथियों ने अपना क्रोध दर्शाया, लेकिन वो अपनी बातों पर अड़े रहे और अपने दिमाग की आवाज़ को बोलने में कभी पीछे नहीं हटे। दिल्ली विश्वविद्यालय में इतिहास विभाग के HOD रहे द्विजेन्द्र नारायण झा के बारे में वामपंथी पार्टी ने दावा किया है कि उन्होंने अनुभववाद के आधार पर इतिहास लिखा। साथ ही उन्हें ‘सांप्रदायिक इतिहास के खिलाफ युद्ध लड़ने वाला’ करार दिया।

लेकिन, सबसे महत्वपूर्ण है कि CPI ने स्वीकार किया है कि उनका जाना पार्टी के लिए भी बड़ी क्षति है क्योंकि बतौर प्रोफेसर रिटायरमेंट से पहले तक वो CPI के सदस्य हुआ करते थे। पार्टी ने लिखा कि CPI दिल्ली उनके परिजनों के साथ खड़ी है। DN झा को श्रद्धांजलि देते हुए CPI ने खुलासा किया कि उनके निधन के बाद पार्टी नेताओं ने उनके मृत शरीर पर पार्टी का झंडा भी डाला। फरवरी 4, 2021 को उनके निधन के बाद कई नेता उनके घर पहुँचे थे।

DN झा के निधन के बाद CPI ने मेमोरियल मीटिंग बुलाई

साथ ही CPI ने डीएन झा के निधन के बाद उन्हें याद करने के लिए ‘मेमोरियल मीटिंग’ भी बुलाई। इस बैठक में कई वरिष्ठ नेता शामिल थे। इसमें DN झा समेत दो अन्य दिवंगत ‘इतिहासकारों’ को श्रद्धांजलि दी गई। इसमें उन्हें ‘बहुवाद और असहमति’ का चैंपियन बताया गया, जिनका जाना जाति और पंथ विहीन समाज की अवधारणा की लड़ाई में एक शून्य पैदा कर दिया। साथ ही उनके रास्ते पर चलने की बातें भी की गईं।

इतिहासकार डॉ. मीनाक्षी जैन ने भी ऑपइंडिया को बताया था कि 1947 के बाद के भारतीय इतिहास लेखन के “Big Four” – रोमिला थापर, इरफ़ान हबीब, आरएस शर्मा और डीएन झा ही थे और साथ ही उन्होंने इन सब के प्रपंच की पोल-पट्टी भी खोली थी। उन्होंने बताया कि कैसे ये चारों खुद अदालत में अपने झूठ की लानत-मलालमत से बचने के लिए अपने छात्रों को भेजते रहे, और खुद ‘निष्पक्षता’ का चोला ओढ़ कर अख़बारों के कॉलम से लेकर किताबें तक लिख-लिख कर बिना पाँव के झूठ की पालकी ढोते रहे।

अयोध्या पर डीएन झा व उनके साथी इतिहासकारों द्वारा तैयार की गई रिपोर्ट पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि ‘प्रख्यात इतिहासकारों’ द्वारा लिखी गई चीजों को सिर्फ़ उनका विचार माना जा सकता है, कोई सबूत नहीं। ‘Historians’ Report To The Indian Nation’ नामक इस रिपोर्ट को अयोध्या में हुए पुरातात्विक उत्खनन से निकले निष्कर्ष का अध्ययन किए बिना ही तैयार किया गया था। इनमें से एकाध को तो बाबर के बारे में भी कुछ नहीं पता था।

अब आप समझ सकते हैं कि किस तरह खास एजेंडा वाले राजनीतिक दलों के नेता इतिहासकार का चोला पहन कर इस देश का इतिहास लिखते रहे हैं। क्या इनसे उम्मीद की जा सकती है कि ये रामायण और महाभारत पर निष्पक्ष रिसर्च करेंगे? तभी हमें आज तक प्राचीन मंदिरों की आश्चर्यजनक संरचनाओं से दूर रख कर ताजमहल के बारे में पढ़ाया जाता रहा और अशोक व मौर्य जैसे सम्राटों की जगह मुगलों के गुणगान से पाठ्य पुस्तकों को भर दिया गया।

नेहरू के गुस्से के बावजूद जिस मेजर ने बिना खून बहाए तवांग को भारत में मिलाया, PM मोदी के समय मिला उन्हें सम्मान

भारत के एक महान सैन्य अधिकारी को उनके योगदान के लिए 70 साल बाद वो सम्मान मिला, जिसके वो हकदार थे। तवांग का भारत में विलय कराने वाले मेजर रालेंगनाओ बॉब खातिंग के सम्मान में रविवार (फरवरी 14, 2021) को CDS जनरल विपिन रावत, अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू, मेघालय के मुख्यमंत्री कोनराड संगमा, केंद्रीय खेल मंत्री किरण रिजिजू और अरुणाचल प्रदेश के राज्यपाल ब्रिगेडियर (रिटायर्ड) बीडी मिश्रा की उपस्थिति में खातिंग के स्मारक का अनावरण हुआ।

तत्कालीन नार्थ ईस्ट फ्रंटियर एजेंसी (नेफा) के सहायक राजनीतिक अधिकारी रहे खातिंग का जन्म मणिपुर के तंगखुल नगा समुदाय में हुआ था। उन्होंने बिना किसी खून-खराबे के जनवरी 17, 1951 को तवांग को भारत में मिलाने का कार्य किया था। इस काम में असम राइफल्स के 200 जवानों ने उनका साथ दिया था। तब असम के राज्यपाल रहे जयरामदास दौलतराम के आदेश पर ये हुआ था। उससे पहले तवांग स्वतंत्र तिब्बत प्रशासन का हिस्सा हुआ करता था।

तवांग का भारत में विलय कराने वाले मेजर रालेंगनाओ बॉब खातिंग ने इंडियन फ्रंटियर एडमिनिस्ट्रेटिव सर्विस (IAFS) के पहले अधिकारी, नगालैंड के मुख्य सचिव और विदेश में आदिवासी समुदाय के पहले भारतीय राजदूत के रूप में अपनी सेवाएँ दीं लेकिन उन्हें तवांग उपलब्धि के लिए कभी सम्मानित नहीं किया गया। उन्हें पद्मश्री और ब्रिटिश सरकार की तरफ से मेंबर ऑफ ब्रिटिश एंपायर सम्मान मिला था। उनके बेटे जॉन भी IRS की सेवा से रिटायर हो चुके हैं।

जॉन और उनके अन्य परिजनों की उपस्थिति में कालावांगपू ऑडिटोरियम में मेजर रालेंगनाओ बॉब खातिंग मेमोरियल की नींव रखने का कार्य संपन्न हुआ। मेजर रालेंगनाओ बॉब खातिंग के जीवन की बात करें तो उनकी 5वीं तक की शिक्षा-दीक्षा एक स्थानीय मिशनरी स्कूल में हुई थी। उनकी बौद्धिक क्षमता के कारण असम की तत्कालीन राजधानी शिलॉन्ग के सरकारी हाई स्कूल में पढ़ने के लिए उन्हें स्कॉलरशिप मिला।

गुवाहाटी के बिशप कॉटन कॉलेज से स्नातक की डिग्री पाने वाले वो मणिपुर के पहले ऐसे व्यक्ति थे, जो जनजातीय समुदाय से आते थे। इसके बाद वो असम के दर्राम स्थित बारासिंघा में एक स्कूल खोल कर पढ़ाने लगे। तब एक ब्रिटिश अधिकारी ने उन्हें उखरुल हाई स्कूल में प्रधानाध्यापक बना दिया। 1939 में दूसरे विश्व युद्ध के समय उन्होंने सेना में शामिल होने का फैसला लिया। 5 फ़ीट 3 इंच के बॉब ‘किंग्स कमीशन’ पाने वाले पहले मणिपुरी थे।

सेना में भर्ती के दौरान उनकी क्षमताओं के कारण उनकी हाइट आड़े नहीं आई, लेकिन उन्हें इसके लिए दिक्कतों का सामना ज़रूर करना पड़ा। उन्होंने मेजर केएस थिमैय्या (आज़ादी के बाद भारतीय सेना के प्रमुख) के नेतृत्व में प्रशिक्षण लिया और फिर 19वीं हैदराबाद रेजिमेंट (बाद में 7वाँ कुमाऊँ रेजिमेंट) में शामिल हुए। जोरहाट में लॉजिस्टिक्स अधिकारी के रूप में काम करते हुए उन्होंने यूएस आर्मी एयर फोर्सेज (USAAF) की जापान की सेना के खिलाफ सहायता की।

बर्मा रोड में मणिपुरी जनजातीय समूहों के लोगों ने इस युद्ध में ब्रिटिश सेना के लिए गाइड का काम किया था। मणिपुर के महाराजा ने बर्मा के आक्रमण को ध्यान में रखते हुए भारत के साथ विलय का फैसला लिया और 1949 में ये एक भारतीय राज्य बना। 1950 में उन्होंने असम के तत्कालीन राज्यपाल अकबर हैदरी के निवेदन पर असम राइफल्स में सेवाएँ दी। तब असम-तिब्बत भूकंप के कारण इलाके में काफी बुरी स्थिति थी।

उन्होंने राहत कार्यों में बड़ी भूमिका निभाई। इसके बाद वो अरुणाचल प्रदेश में असिस्टेंट पॉलिटिकल अधिकारी बने और उनकी कूटनीति के सब कायल हो गए। जनवरी 17, 1951 को उन्होंने तवांग की तरफ मार्च किया। उन्होंने वहाँ के गाँवों के बुजुर्गों से बात की, तिब्बत के अधिकारियों से मिले और तिब्बती प्रशासन द्वारा मोनपा जनजातीय समुदाय पर लगाए कड़े टैक्सों की समीक्षा की। उनके तवांग दौरे के दौरान ही पीएम नेहरू ने अपने विदेश सचिव को एक पत्र लिखा। उन्होंने इस पत्र में लिखा था,

“मैं लगातार रक्षा समिति द्वारा उत्तर-पूर्वी सीमाओं पर हो रही गतिविधियों के बारे में सुन रहा हूँ। इससे तिब्बत और नेपाल की सीमा पर हलचल है। इन मामलों को कभी मेरी राय के लिए मेरे सामने नहीं लाया गया। असम के राज्यपाल और अन्य लोग निर्णय ले रहे हैं। हमारे तवांग में जाकर वहाँ का नियंत्रण लेने से अंतरराष्ट्रीय समस्याएँ आ सकती हैं, मैं पहले भी कह चुका हूँ। मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कि बिना मेरी जानकारी के ये सब कैसे हो रहा है।”

लेकिन ये सब उस दूरदर्शी नेता कहने पर हो रहा था, जिनका असामयिक निधन हो गया लेकिन उनकी नीतियाँ अब भी देश का भला कर रही थीं। सरदार पटेल ने अपने जीवनकाल में ही जयरामदास दौलतराम और मेजर बॉब को कह दिया था कि नेहरू से राय-मशविरा किए बिना ही ये ऑपरेशन चलाया जाए, क्योंकि वो दूसरी कश्मीर समस्या नहीं चाहते थे। उन्होंने 800 किलोमीटर की म्यांमार सीमा की समस्याएँ भी सुलझाईं।

36 करोड़ रुपए का कुत्ता: कैसे खर्च करना है, कितना खर्च करना है – सब लिखित में है

इंटरनेट पर अक्सर ऐसी चीज़ों पर बहस छिड़ी रहती है, जिनके बारे में सोचना तक मुश्किल होता है। फ़िलहाल इंटरनेट पर एक ऐसी ही चीज़ वायरल हो रही है। खबर है 8 साल के एक मादा कुत्ते की। वो 5 मिलियन अमेरिकी डॉलर यानी लगभग 36 करोड़ रुपए की मालकिन है।

लूलू (Lulu) नाम है इस मादा कुत्ते का। बॉर्डर कॉली (Border Collie) नस्ल के इस मादा कुत्ते को 36 करोड़ रुपए अपनी मालिक की मृत्यु के बाद मिला है। अमेरिका के टेनेसी (Tennessee) स्थित नैशविले (Nashville) की रहने वाली बिल डोरिस (Bill Dorris) की मृत्यु पिछले साल हुई थी। उन्होंने 5 मिलियन डॉलर अपने कुत्ते के नाम किए थे। 

रिपोर्ट्स के मुताबिक़ डोरिस (88) की इच्छा यही थी कि यह राशि एक ट्रस्ट को सौंपी जाएगी, जो लूलू की देखभाल करेगा। डोरिस ने सबसे पहले लूलू को अपनी दोस्त मार्था बार्टन (Martha Burton) के हवाले किया था। इसके अलावा महीने के हिसाब से उसका खर्च भी दिया था।

मार्था ने लूलू और डोरिस के बीच रिश्तों को लेकर भी कई बातें बताई। उन्होंने कहा, “मुझे नहीं पता इस बारे में क्या सोचा जाए, जिससे सब कुछ समझाया जा सके। फ़िलहाल के लिए बस इतना ही कहा जा सकता है कि उसे (डोरिस) अपने कुत्ते से कहीं ज़्यादा प्यार था।”      

फ़िलहाल डोरिस की सम्पत्ति को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं हुई है। लेकिन तमाम मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ उसके दोस्तों ने खुलासा किया है कि रियल एस्टेट से लेकर निवेश क्षेत्र तक डोरिस की सम्पत्ति बहुत ज़्यादा थी। इसका सीधा मुनाफ़ा किसी और को नहीं बल्कि लूलू को होगा।

इस मामले में एक और अहम बात है कि इतनी बड़ी राशि का यह मतलब नहीं है कि इसे किसी भी तरह या कितना भी खर्च किया जा सकता है। लूलू के वर्तमान मालिक को सिर्फ उतना ही खर्च करने की अनुमति होगी, जितनी उसकी महीने भर की आवश्यकताएँ हैं। 

मार्था का कहना है कि 5 मिलियन डॉलर एक कुत्ते पर खर्च करने के लिए बहुत होते हैं लेकिन वह प्रयास करती रहेगी। इसके अलावा कुत्ते की हर बातों का ख़याल रखते हुए उसकी सारी ज़रूरतों को वो पूरा करेंगी।

यह पहला ऐसा मौक़ा नहीं है, जब एक मालिक ने अपने कुत्ते के लिए इतनी मोटी रकम छोड़ी हो। फ़िलहाल इस बारे में कोई बात सामने नहीं आई है कि लूलू के मरने बाद 36 करोड़ की राशि का क्या होगा।  

पश्चिम बंगाल में BJP नेता पर बम से हमला, हाल ही में TMC छोड़ भाजपा में हुए थे शामिल

पश्चिम बंगाल में भाजपा नेताओं पर हमले की घटनाएँ थमने का नाम नहीं ले रही है। अब भाजपा नेता फिरोज कमाल गाजी पर हमला हुआ है। ‘बाबू मास्टर’ के नाम से पहचाने जाने वाले फिरोज की कार पर शनिवार (फरवरी 13, 2021) को क्रूड बम से हमला किया गया। ये हमला तब हुआ, जब वो राजधानी कोलकाता की तरफ जा रहे थे। गाजी उन नेताओं में शामिल हैं, जिन्होंने हाल के दिनों में तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) छोड़ कर भाजपा का दामन थामा है।

उन्हें बसीरहाट में स्थानीय स्तर के प्रभावशाली नेताओं में से एक माना जाता है। ये क्षेत्र नॉर्थ 24 परगना जिले में पड़ता है। उन पर हमला तब हुआ, जब वो मिनखा पुलिस थाने के अंतर्गत आने वाले बसंती हाइवे से गुजर रहे थे। उन्हें कोलकाता के एक प्राइवेट हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया है। भाजपा की राज्य यूनिट ने आरोप लगाया है कि ये हमला TMC के गुंडों ने किया है। भाजपा नेता सुवेंदु अधिकारी ने हॉस्पिटल जाकर उनसे मुलाकात की हालचाल लिया।

उन्होंने कहा कि उनके दोस्त बाबू मास्टर पर TMC के आपराधिक तत्वों ने काफी बेरहमी से हमला किया है। उन्होंने कहा, “मैं इस बात को लेकर निश्चित हूँ कि इस हमले की तस्वीरें आपने ज़रूर देखी होंगी। हार मत मानिए! ये सिर्फ तृणमूल की हताशा को दिखाता है।” इस हमले में गाजी को काफी गहरे जख्म आए हैं। उनकी कार को पहले स्पीड ब्रेकर पर रोका गया, फिर क्रूड बम से हमला किया गया।

भाजपा आईटी सेल के अध्यक्ष और पश्चिम बंगाल में पार्टी के सह-प्रभारी अमित मालवीय ने कहा कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी राज्य की गृह मंत्री भी हैं, ऐसे में वो इस घटना पर बाकी की ऐसी घटनाओं की तरह चुप्पी साधे रहेंगी। इसे 1 दिन पहले ही भाजपा के कार्यकर्ताओं के ऊपर गर्म पानी डाल दिया गया था, जिससे उनकी स्किन पर जख्म आ गए थे। अमित शाह के बंगाल दौरे के आसपास ही ये घटनाएँ हुईं।

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह कह चुके हैं कि  कोविड-19 वैक्सीन अभियान का काम पूरा होते ही सीएए पर अमल की दिशा में सरकार बढ़ेगी। बंगाल के मतुआ में रैली को संबोधित करते हुए उन्होंने यह बात क थीही। वहीं इंडिया टुडे के कॉन्क्लेव में उन्होंने दावा किया था कि बंगाल में बीजेपी 200 से ज्यादा सीटें जीतकर सरकार बनाएगी। उन्होंने आश्वस्त किया कि सीएए से किसी भी रूप में भारतीय अल्पसंख्यकों की नागरिकता पर प्रभाव नहीं पड़ेगा।

गलवान-पांगोंग का दौरा करेंगे सांसद, सरकार को भेज दिया प्रस्ताव… लेकिन चीन-चीन रटने वाले राहुल गाँधी गायब

रक्षा मामलों पर संसदीय स्टैंडिंग समिति के अध्यक्ष जुएल ओराँव ने शनिवार (फरवरी 13, 2021) को कहा कि उन्होंने सरकार को सलाह दी है कि 30 सदस्यीय दल को गलवान घाटी और पांगोंग झील भेजा जाए, जहाँ कई महीनों से भारत-चीन के बीच तनाव चल रहा है। ये संसदीय समिति मई 15 के बाद पूर्वी लद्दाख के इन इलाकों का दौरा कर सकती है। कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी इस बैठक से नदारद रहे।

भाजपा नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री जुएल ओराँव की अध्यक्ष वाली इस समिति में बतौर सदस्य राहुल गाँधी भी शामिल हैं, लेकिन उनकी संसदीय समिति की बैठकों और क्रियाकलापों में हिस्सेदारी न के बराबर ही रहती है। संसदीय पैनल के ‘लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल (LAC)’ दौरे के लिए अभी केंद्र सरकार की अनुमति मिलनी बाकी है। जिस बैठक में इस पर विचार-विमर्श हुआ, उसमें राहुल गाँधी शामिल नहीं हुए।

ओराँव ने कहा कि सरकार सीमावर्ती इलाकों में स्थिति की समीक्षा करते हुए संसदीय समिति के प्रस्ताव पर विचार-विमर्श करेगी और फिर अपना निर्णय बताएगी। ये बैठक करीब 10 दिनों पहले हुई थी और प्रस्ताव को लोकसभाध्यक्ष के पास भी भेज दिया गया है। ये वही संसदीय समिति है, जो इससे पहले नाथुला पास, तमांग और भारत-बांग्लादेश सीमाओं का दौरा कर चुकी है। समिति ने दक्षिणी सीमाओं का भी दौरा किया है।

ओडिशा के सुंदरगढ़ से पाँचवी बार सांसद चुने गए जुएल ओराँव ने कहा, “एक तो राहुल गाँधी रक्षा मामलों पर गठित संसदीय समिति की बैठकों में नहीं आते, ऊपर से अगर वो कभी आते भी हैं तो बैठक के एजेंडे की जगह बाहरी मुद्दों पर बात करने लगते हैं। हालाँकि, इन सबसे हमारी कमिटी की कार्यवाही पर कोई असर नहीं पड़ता।” बता दें कि केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने संसद में बताया था कि चीन अपनी सेना को पीछे हटाने के लिए राजी हो गया है।

ये सब तब हो रहा है, जब राहुल गाँधी के अधिकतर भाषणों में चीन ही मुद्दा बना रहता है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ‘डरपोक’ बताते हुए कई बार आरोप लगाया है कि उन्होंने भारत की जमीन चीन को दे दी है। उन्होंने कहा था कि ताज़ा समझौता ‘गिव एंड टेक’ का नहीं, बल्कि सिर्फ ‘गिव’ का है। साथ ही कहा था कि पीएम मोदी की चीन के सामने खड़े होने की हिम्मत नहीं है। उन्होंने पूछा कि पीएम मोदी ने भारत की जमीन ‘चीन को क्यों दे दी?’

पब्लिक प्रॉपर्टी को नुकसान पहुँचाने वालों की खैर नहीं, अब सीएम खट्टर ने कहा- लाएँगे ‘वसूली’ कानून

किसान आंदोलन के बीच हरियाणा के सीएम मनोहर लाल खट्टर का बड़ा बयान सामने आया है। जिसमें वह यूपी केंद्र सरकार द्वारा पारित कृषि कानूनों के खिलाफ हो रहे आंदोलन की आड़ में उपद्रव मचाने वाले दंगाइयों को लेकर सीएम मनोहर लाल खट्टर ने कहा है कि किसी को भी सार्वजनिक संपत्ति का नुकसान करने का अधिकार नहीं है, हम इससे संबंधित क़ानून लेकर आ रहे हैं।

बता दें, हरियाणा के सीएम मनोहर लाल खट्टर ने आज (13 फरवरी, 2020) केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह से मुलाकात की। इस मुलाकात के बाद मुख्यमंत्री ने कहा कि किसान आंदोलन पर भी चर्चा हुई। सीएम ने कहा, “किसी को भी सार्वजनिक संपत्ति का नुकसान करने का अधिकार नहीं है, हम इससे संबंधित क़ानून लेकर आ रहे हैं।”

सीएम खट्टर ने केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह को धरनों और किसान पंचायतों को लेकर सारी जानकारी दी है। मनोहरलाल खट्टर ने बताया कि जो भी आंदोलनकारी भविष्य में पब्लिक प्रॉपर्टी को नुकसान पहुँचाएगा, वही उसकी भरपाई करेगा। इसके लिए विधानसभा के सत्र में कानून लेकर आएँगे। मंत्रिमंडल विस्तार पर मुख्यमंत्री ने कहा कि जब भी मंत्रिमंडल विस्तार होगा उसकी जानकारी दे दी जाएगी।

गौरतलब है कि पिछली बार सीएम ने आंदोलनजीवियों पर प्रकाश डालते हुए कहा था, कि कुछ लोग सिर्फ इसलिए आंदोलन कर रहे हैं कि उन्हें केंद्र के कानूनों के खिलाफ विरोध करना है।

उल्लेखनीय है कि देश की राजधानी दिल्ली में 26 जनवरी को कथित किसानों ने ट्रैक्टर रैली की आड़ में जमकर उत्पात मचाया, तोड़फोड़ की और लाल जिले की प्राचीर पर चढ़कर तिरंगे का अपमान करते हुए धार्मिक झंडा फहरा दिया था। जिसके बाद अब इस मामले में गहन जाँच के लिए दिल्ली क्राइम ब्रांच की टीम गिरफ्तार दीप सिद्धू और इकबाल सिंह को आज लाल किला लेकर पहुँची थी। जहाँ लाल किले पर हुई घटना के सीन को रीक्रिएट किया गया।

रिपोर्ट के मुताबिक, हिंसा उकसाने के आरोपितों दीप सिद्धू और इकबाल सिंह को लेकर दिल्ली पुलिस शनिवार को उन रास्तों पर गई, जहाँ-जहाँ से उपद्रवी लाल किले तक पहुँचे थे। लाल किले के भीतर दोनों कहाँ-कहाँ गए और क्‍या-क्‍या किया और किस प्रकार हिंसा के बाद ये लोग लौटकर गए। पुलिस ने यह जानने के लिए सीन रीक्रिएट किया है।

पुलिस के अनुसार, 26 जनवरी को लाल किले में हुई हिंसा और अराजकता के पीछे मुख्य रूप से दीप सिद्धू का हाथ था। उसे दिल्ली पुलिस के विशेष प्रकोष्ठ के दल ने सोमवार की रात को हरियाणा में करनाल बाइपास के पास से गिरफ्तार किया था।

ट्रैक्टर मार्च में शामिल 16 किसान अभी भी लापता, 14 FIR के संबंध में 122 गिरफ़्तारी: संयुक्त किसान मोर्चा का दावा

तीन कृषि कानूनों के खिलाफ दिल्ली की अलग-अलग सीमाओं पर 75 दिनों से अधिक समय से किसान आंदोलन जारी है। 26 जनवरी के मौके पर किसानों द्वारा दिल्ली में ट्रैक्टर रैली का आयोजन किया था, जिसकी आड़ में किसानों ने राष्ट्र की राजधानी में जमकर उत्पात मचाया। अब किसान नेताओं ने दावा किया कि ट्रैक्टर मार्च में शामिल 16 किसान अभी भी लापता हैं।

दरअसल, संयुक्त किसान मोर्चा ने शनिवार (13 फरवरी, 2021) को प्रेस कॉन्फ्रेंस कर आरोप लगाया है कि किसानों को फर्जी मामलों में फँसाया जा रहा है, उनका उत्पीड़न किया जा रहा है। किसानों ने तय कर लिया है कि अब वो यहीं रहेंगे। आंदोलन बंद नहीं होगा।

संयुक्त किसान मोर्चा ने बताया, “26 जनवरी को ट्रैक्टर परेड में शामिल हुए 16 किसान अब भी लापता हैं। गणतंत्र दिवस की घटना की न्यायिक जाँच होनी चाहिए।” किसान नेताओं ने दावा किया है, “14 एफआईआर के संबंध में दिल्ली पुलिस ने 122 किसानों को गिरफ्तार किया है। संयुक्त मोर्चा गिरफ्तार किसानों को कानूनी और वित्तीय सहायता देगा।”

किसान नेता बलबीर सिंह राजेवाल ने सरकार पर आरोप लगाते हुए कहा, “भारत सरकार झूठ बोलकर सारे देश को गुमराह कर रही है। सरकार कह रही है कि हमें बताया नहीं जा रहा कि इन क़ानूनों में काला क्या है, सरकार के साथ 11 बैठक करके 3 बार एक-एक क्लॉज पर बता चुके हैं कि इनमें काला क्या है।”

वहीं भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत ने इस पर कहा, “ये आंदोलन जन मुक्ति आंदोलन है, लोग बंधक हैं उनको रिहा कराना है, इसी वजह से महापंचायत की जा रही है।” बता दें इतने दिनों से चल रहे आंदोलन पर कई तरह के सवाल उठने लग गए है।

आंदोलन का नेतृत्व कर रहे नेताओं पर इसकी फंडिंग को लेकर उनकी संपत्तियों का ब्यौरा भी इकट्ठा किया जा रहा। जिस पर टिकैत ने कहा, “मुझे नहीं पता कितने की प्रॉपर्टी बताई गई है, मेरे पास तो कुछ नहीं है।”

राकेश टिकैत ने कहा, “संयुक्त किसान मोर्चा पूरी तरह से एकजुट है। 23 फरवरी तक के कार्यक्रम निर्धारित हैं, जिन पर हम काम कर रहे हैं। आंदोलन पूरी मजबूती से चलता रहेगा, हम अपनी रणनीति बना रहे हैं। किसानों को हताश होने की जरूरत नहीं है।”

‘मुँह दबाना, कपड़े उतारना, रेप करना अकेले आदमी के लिए असंभव’- जैसे फैसले देने वाली जज का कार्यकाल 1 साल और बढ़ा

बच्चों के यौन उत्पीड़न मामलों में दो विवादास्पद फैसले सुनाने वाली बॉम्बे हाईकोर्ट की जज पुष्पा गणेदीवाला का कार्यकाल अतिरिक्त न्यायाधीश के तौर पर एक साल और बढ़ गया है। जस्टिस पुष्पा का नया कार्यकाल 13 फरवरी से प्रभावी हो गया है। बता दें, एडिशनल जस्टिस के रूप में उनका कार्यकाल शुक्रवार को समाप्त होना था।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, बंबई उच्च न्यायालय की नागपुर पीठ के वरिष्ठतम न्यायाधीश न्यायमूर्ति नितिन जामदार ने उन्हें आज पद की शपथ दिलाई। अगर जस्टिस गणेदीवाला की सेवा को विस्तार नहीं दिया जाता तो उन्हें फरवरी में जिला न्यायपालिका में वापस जाना पड़ता। बॉम्बे हाईकोर्ट आने से पहले 2019 तक वे यहीं थी।

बहरहाल, न्यायमूर्ति गणेदीवाला को स्थायी न्यायाधीश बनाने के प्रस्ताव को 20 जनवरी को प्रधान न्यायाधीश एस ए बोबडे की अध्यक्षता वाली कॉलेजियम ने एक बैठक में मंजूरी दे दी थी। कॉलेजियम की सिफारिश थी कि उन्हें (न्यायमूर्ति गणेदीवाला को) दो साल के लिए अतिरिक्त न्यायाधीश के तौर पर एक नया कार्यकाल दिया जाए।

हालाँकि, गणेदीवाला द्वारा हाल ही दिए गए विवादास्पद फैसले पर हुए बवाल को देखते हुए सरकार ने शुक्रवार को एक अधिसूचना जारी कर कहा कि उन्हें एक साल के लिए अतिरिक्त न्यायाधीश के तौर पर एक नया कार्यकाल दिया गया है। बता दें, आमतौर पर किसी स्थायी न्यायाधीश पद पर पदोन्नत किए जाने से पहले अतिरिक्त न्यायाधीश को दो साल के लिए नियुक्त किया जाता है।

गौरतलब है कि जस्टिस गनेडीवाल की हाल ही में POCSO एक्ट (प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्शुअल ऑफेंसस) के दो मामलों को लेकर दिए फैसलों की वजह से काफी आलोचना हुई थी। बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर बेंच ने अपने एक फैसले में कहा था कि ‘स्किन टू स्किन’ स्पर्श हुए बिना या कपड़ों के ऊपर से नाबालिग पीड़िता को ‘स्पर्श करना’ पॉक्सो कानून (POCSO Act) या यौन अपराधों पर बाल संरक्षण कानून के तहत यौन हमला नहीं माना जा सकता।

हालाँकि, चीफ जस्टिस एस ए बोबडे की अगुवाई वाली देश की शीर्ष कोर्ट ने इस फैसले पर 27 जनवरी को रोक लगा दी थी। क्योंकि यह समाज में गलत उदाहरण स्थापित करेगा।

इसके बाद एक और मामले में बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर बेंच की एकल पीठ ने यह फैसला दिया था कि किसी लड़की का हाथ पकड़ना और आरोपित का पैंट की जिप खोलना प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंसेज ऐक्ट, 2012 (POCSO) के तहत यौन हमले की श्रेणी में नहीं आता।

जस्टिस पुष्पा ने एक रेप के मामले में यह फैसला सुनाया था। दरअसल, इस मामले में निचली अदालत ने 26 साल के आरोपित को रेप का दोषी पाया था, लेकिन जस्टिस पुष्पा ने उसे बरी कर दिया। जस्टिस पुष्पा ने तर्क दिया, “बिना हाथापाई किए युवती का मुँह दबाना, कपड़े उतारना और फिर रेप करना एक अकेले आदमी के लिए बेहद असंभव लगता है।”