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जुबैर और प्रोपेगेंडावादियों ने कपिल मिश्रा के खिलाफ FIR के ऑर्डर का फैलाया झूठ, कोर्ट ने फेरा पानी: ऐसा कोई आदेश नहीं, सिर्फ आगे की जाँच की कही थी बात, उस पर भी लग गया स्टे

दिल्ली दंगों से जुड़ी एक खबर इस महीने की शुरुआत में काफी तेजी से फैली, जिसमें कहा गया कि दिल्ली कोर्ट ने बीजेपी नेता और दिल्ली के मंत्री कपिल मिश्रा के खिलाफ 2020 के दिल्ली दंगों में FIR दर्ज करने का ऑर्डर दिया है। रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि यमुना विहार के मोहम्मद इलियास की अर्जी पर कपिल मिश्रा के खिलाफ एफआईआर का आदेश दिया गया है, जबकि सच में ऐसा कुछ भी नहीं था।

इसके बावजूद फेक न्यूज फैलाने में माहिर, इस्लामी प्रोपेगेंडा फैलाने वाले और खुद को फैक्ट चेकर कहने वाले मोहम्मद जुबैर और अन्य लोगों ने दावा किया कि कोर्ट ने कपिल मिश्रा पर शिकंजा कस दिया है और एफआईआर का आदेश दिया है। लेकिन अब सच सामने आया है कि कोर्ट ने ऐसा कोई ऑर्डर नहीं दिया था। दरअसल, 1 अप्रैल 2025 को मजिस्ट्रेट वैभव चौरसिया ने सिर्फ आगे की जाँच का आदेश दिया था, FIR का कोई जिक्र नहीं था।

इस मामले में इलियास की ओर से कहा गया था, कि कपिल मिश्रा और उनके साथियों ने दंगों में हिस्सा लिया। लेकिन दिल्ली पुलिस ने इसका विरोध किया और कहा कि मिश्रा को फँसाया जा रहा है, उनका दंगों से कोई लेना-देना नहीं। कोर्ट ने भी अपनी ऑर्डर में साफ किया कि दूसरी घटनाओं के लिए पहले से FIR दर्ज हैं, बस एक मामले में और जाँच की जरूरत है। फिर भी, मीडिया और जुबैर ने इसे FIR का ऑर्डर बताकर हंगामा मचा दिया।

बहरहाल, कपिल मिश्रा ने इस जाँच के ऑर्डर के खिलाफ अपील की और बुधवार (9 अप्रैल 2025) को राउज एवेन्यू कोर्ट की जज कावेरी बवेजा ने उनकी बात मान ली। कोर्ट ने कहा कि जब दूसरी FIR पहले से दर्ज हैं और केस चल रहा है, तो नई जाँच का ऑर्डर ठीक नहीं। इसलिए 21 अप्रैल 2025 तक उस ऑर्डर पर रोक लगा दी गई।

ये खबर दिखाती है कि कैसे गलत जानकारी तेजी से फैलती है। लोग हैरान हैं कि सच को तोड़-मरोड़कर कैसे पेश किया गया। कपिल मिश्रा के लिए ये राहत की बात है, लेकिन सवाल ये भी उठ रहे हैं कि क्या सच को दबाने की कोशिश हुई या जल्दबाजी में गलती हुई। अब सबकी नजर 21 अप्रैल 2025 पर है, जब कोर्ट अगला फैसला सुनाएगी।

कम नंबर वाले को नियुक्ति, OMR शीट में हेरफेर और फिर इसे छिपाने के लिए कॉपियों को जलाना: बंगाल के शिक्षक भर्ती घोटाले में जानिए CBI को क्या मिला और कोर्ट ने क्या कहा

पश्चिम बंगाल स्कूल सेवा आयोग (WBSSC) के तहत साल 2016 में की गई शिक्षकों और गैर-शिक्षण कर्मचारियों की भर्ती अब एक बड़े घोटाले के रूप में सामने आई है। ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल काॅन्ग्रेस सरकार की निगरानी में हुए इस भर्ती घोटाले ने न केवल शिक्षा व्यवस्था की पारदर्शिता पर सवाल उठाए हैं, बल्कि राज्य सरकार की विश्वसनीयता पर भी गहरा असर डाला है।

साल 2016 में कक्षा 9 से 12 के लिए सहायक शिक्षक और ग्रुप C एवं D के अंतर्गत गैर-शिक्षण स्टाफ की नियुक्तियों के लिए लिखित परीक्षाएँ और इंटरव्यू आयोजित किए गए थे। इस प्रक्रिया में ऑप्टिकल मार्क रिकॉग्निशन (OMR) शीट की स्कैनिंग और मूल्यांकन का जिम्मा ‘Nysa Communications’ नामक एक निजी कंपनी को दिया गया था। उसने इस घोटाले को अंजाम देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

चयन प्रक्रिया की शुरुआत से ही कई गड़बड़ियाँ सामने आईं। आयोग ने न तो प्राथमिक और न ही अंतिम चरण में अभ्यर्थियों की पूरी सूची जारी की और ही उनके अंक सार्वजनिक किए। इससे पारदर्शिता को लेकर संदेह गहराया। इसके अलावा भर्ती मानदंडों का उल्लंघन करते हुए योग्य अभ्यर्थियों को आयु में छूट नहीं दी गई, जिससे कई उम्मीदवारों को अदालत का रुख करना पड़ा।

इस मामले में पहली आवाज उठाने वाली थीं बैशाखी भट्टाचार्य, जिन्होंने साल 2016 में आयोग के खिलाफ सबसे पहला केस दर्ज कराया था। साल 2021 तक यह सामने आया कि कुल 25,753 नियुक्तियों में कई विसंगतियाँ हैं। इन नियुक्तियों में नियमों की अनदेखी, भ्रष्टाचार और सिफारिशों की भूमिका की आशंका जताई गई है।

मुख्य आरोपों में शामिल हैं –

रैंक जंपिंग – मेरिट लिस्ट में निचले स्थान पर रहे उम्मीदवारों को उच्च अंक वाले उम्मीदवारों की तुलना में वरीयता दी गई।

उम्मीदवारों के चयन में पिक एंड चूज़ पद्धति को अपनाया गया।

जो उम्मीदवार न तो मेरिट लिस्ट में थे और न ही वेटिंग लिस्ट में थे, उन्हें नियुक्त किया गया।

गैर-दागी उम्मीदवारों को नियुक्ति पत्र जारी किए गए, लेकिन उन्हें नौकरी में शामिल होने नहीं दिया गया।

समिति ने WBSSC अधिकारियों की धोखाधड़ी का पर्दाफाश किया

यह घोटाला केवल एक भर्ती प्रक्रिया की विफलता नहीं है, बल्कि यह राज्य की शिक्षा प्रणाली की नींव पर लगे उस दाग की तरह है, जिसे मिटाना आसान नहीं होगा। अब देखना यह है कि अदालत और जाँच एजेंसियाँ इस मामले में कितनी तेजी और पारदर्शिता से कार्य करती हैं, और दोषियों को कब तक न्याय के कठघरे में लाया जाता है।

सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति रंजीत कुमार बाग की अध्यक्षता में समूह सी और डी के तहत गैर-शिक्षण कर्मचारियों की नियुक्तियों को सत्यापित करने के लिए 4 सदस्यीय समिति का गठन किया गया था। समिति में WBSSC के प्रतिनिधि, पश्चिम बंगाल माध्यमिक शिक्षा बोर्ड और एक अधिवक्ता भी शामिल थे।

समिति ने अपनी जाँच में गंभीर विसंगतियाँ पाईं और केंद्रीय आयोग के अधिकारियों पर आपराधिक साजिश (आईपीसी धारा 120 बी), जालसाजी (आईपीसी धारा 465 और 468), धोखाधड़ी (आईपीसी धारा 417) और कर्तव्य के प्रति घोर लापरवाही का आरोप लगाया। समिति ने यह पाया गया कि केंद्रीय आयोग ने उम्मीदवारों के रैंक में बदलाव किया।

इतना नहीं, आयोग ने उम्मीदवारों के रैंक में हेरफेर का सहारा लिया और ग्रुप सी एवं डी के तहत गैर-शिक्षण कर्मचारियों की नियुक्तियों में अवैध प्रक्रिया को शामिल किया। 4 सदस्यीय समिति ने 5 अधिकारियों, अर्थात् सौमित्र सरकार, अशोक कुमार साहा, डॉ. शांति प्रसाद सिन्हा, डॉ. कल्याणमय गांगुली और समरजीत आचार्य के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई/एफआईआर की सिफारिश की।

सीबीआई द्वारा जाँच

बाद में यह मामला सीबीआई के हाथ में पहुँचा। सीबीआई की जाँच में बड़ा खुलासा हुआ है कि पश्चिम बंगाल स्कूल सेवा आयोग (WBSSC) ने टेंडर प्रक्रिया में नियमों को दरकिनार करते हुए ‘न्यासा कम्युनिकेशंस’ को चुन लिया। ‘न्यासा कम्युनिकेशंस’ ने आयोग से लिखित अनुमति लिए बिना ही ‘डेटा स्कैनटेक’ नाम की एक अन्य एजेंसी को हायर किया।

इस एजेंसी को ओएमआर शीट स्कैनिंग का काम सौंप दिया, जो स्पष्ट रूप से नियमों का उल्लंघन है। ओएमआर शीट की स्कैनिंग पूरी होने के बाद न्यासा कम्युनिकेशंस ने सारे डेटा को हार्ड ड्राइव में डालकर अपने साथ नोएडा कार्यालय ले गई। वहीं, ओएमआर शीट की कॉपियों को WBSSC कार्यालय में ही छोड़ दिया गया।

सीबीआई ने 2016 की भर्ती परीक्षाओं से जुड़े WBSSC सर्वर का डेटा जब्त कर लिया है और 2022 में की गई एक छापेमारी में ‘न्यासा कम्युनिकेशंस’ के पूर्व कर्मचारी पंकज बंसल के घर से तीन हार्ड डिस्क भी बरामद की है। इन सब साक्ष्यों के आधार पर भर्ती घोटाले की परतें धीरे-धीरे खुलने लगी हैं और इसमें गहरी साजिश के संकेत मिल रहे हैं।

सीबीआई की रिपोर्ट में पश्चिम बंगाल शिक्षक भर्ती घोटाले को लेकर चौंकाने वाले खुलासे सामने आए हैं। एजेंसी ने बताया कि पंकज बंसल की हार्ड डिस्क में मौजूद डेटा और आयोग के जब्त सर्वर डेटा का मिलान किया गया, जिसमें साफ तौर पर गड़बड़ी पाई गई। रिपोर्ट के अनुसार, कई अयोग्य उम्मीदवारों के लिखित परीक्षा अंकों को जानबूझकर बढ़ाया गया, ताकि उन्हें योग्य दिखाया जा सके।

यह अंतर इस बात का प्रमाण है कि अंकों में बड़े पैमाने पर हेरफेर किया गया। सीबीआई ने यह भी खुलासा किया कि डब्ल्यूबीएसएससी के अधिकारियों, न्यासा कम्युनिकेशंस के कर्मचारियों और अन्य संबंधित लोगों के बीच हुए ईमेल आदान-प्रदान से यह पुष्टि हुई कि उम्मीदवारों के डेटा में हेरफेर योजनाबद्ध तरीके से किया गया था।

रिपोर्ट में यह भी गंभीर आरोप लगाए गए कि साल 2019 में आयोग ने न केवल मूल ओएमआर शीट्स को नष्ट कर दिया, बल्कि उनकी स्कैन की गई तस्वीरों को भी नष्ट कर दिया था। इससे जाँच एजेंसी को यह आशंका हुई कि यह कदम डेटा में की गई हेरफेर को छुपाने के उद्देश्य से जानबूझकर किया गया था।

सबसे अहम बात यह रही कि सीबीआई ने यह पाया कि ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली राज्य सरकार ने न्यासा कम्युनिकेशन का पूर्व कर्मचारी और इस भर्ती घोटाले का मुख्य क्रियान्वयनकर्ता निलाद्री दास को कई अन्य सरकारी भर्ती परियोजनाओं का काम सौंप दिया। इससे यह संकेत मिलता है कि घोटाले में केवल तकनीकी ही नहीं, बल्कि राजनीतिक संरक्षण की भी भूमिका रही है।

निम्नलिखित 4 मामलों में ओएमआर शीट में हेराफेरी पाई:

कक्षा 9 और 10 के लिए 952 सहायक अध्यापक

कक्षा 11 और 12 के लिए 907 सहायक अध्यापक

ग्रुप सी से संबंधित 3481 गैर-शिक्षण कर्मचारी

ग्रुप डी से संबंधित 2823 गैर-शिक्षण कर्मचारी

WBSSC द्वारा कवरअप की की कोशिश

पश्चिम बंगाल स्कूल सेवा आयोग नियुक्त उम्मीदवारों की मूल ओएमआर शीट प्रस्तुत करने में विफल रहा, उसने दावा किया कि उन्हें नष्ट कर दिया गया था। इसने 2018 से 2023 तक आरटीआई आवेदकों को ओएमआर शीट की स्कैन की गई प्रतियाँ प्रस्तुत की थीं, लेकिन बाद में अदालत में दावा किया कि उन्हें बरकरार नहीं रखा गया है।

इतना ही नहीं, WBSSC ने सहायक शिक्षकों (कक्षा 9-12) और ग्रुप सी एवं डी में गैर-शिक्षण कर्मचारियों के लिए उपलब्ध रिक्तियों की तुलना में 2,355 अधिक नियुक्तियाँ कीं। बाद में इन अवैध नियुक्तियों को समायोजित करने के लिए ‘अतिरिक्त पद’ सृजित करने की आयोग से अनुमति माँगी।

सबसे चौंकाने वाला खुलासा यह है कि WBSSC ने उन उम्मीदवारों को भी नियुक्त कर दिया, जिन्होंने परीक्षा में खाली खाली OMR शीट जमा की थी या जिनकी रैंक काफी नीचे थी। इतना ही नहीं, आयोग ने भर्ती पैनल की वैध अवधि समाप्त हो जाने के बाद भी अवैध रूप से नियुक्तियाँ जारी रखीं। साथी OMR शीट को नष्ट करके नियमों का भी उल्लंघन किया गया।

WBSSC (पश्चिम बंगाल स्कूल सेवा आयोग) ने अपने कई अदालती हलफनामों में भर्ती प्रक्रिया में हुई गंभीर अनियमितताओं को स्वीकार किया है। आयोग ने माना है कि-

कई मामलों में रैंक जंपिंग हुई, यानी मेरिट सूची में पीछे रहने वाले उम्मीदवारों को ऊपर के स्थान पर नियुक्त किया गया।

पैनल में शामिल न होने वाले 1,498 उम्मीदवारों को अवैध रूप से नियुक्त किया गया।

926 उम्मीदवारों को जानबूझकर रैंक जंपिंग के ज़रिए नियुक्त किया गया।

4,091 उम्मीदवारों को उनके OMR स्कोर में गड़बड़ी के बावजूद नियुक्ति की सिफारिश की गई।

239 उम्मीदवार ऐसे थे, जिनके मामले में OMR में बेमेल और अन्य गड़बड़ियाँ दोनों पाई गईं।

इन सभी मामलों को जोड़ने पर अब तक कुल 6,276 अवैध नियुक्तियों की बात सामने आई है। हालाँकि, ये आँकड़ा अंतिम नहीं कहा जा सकता, क्योंकि आयोग ने OMR शीट्स की भौतिक प्रतियाँ नष्ट कर दी हैं और स्कैन की गई प्रतियों को भी बचाकर नहीं रखा है। इससे सत्यापन की प्रक्रिया अधूरी रह गई है।

कलकत्ता हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

अप्रैल 2024 में कलकत्ता हाई कोर्ट की डिविजन बेंच ने पश्चिम बंगाल स्कूल सेवा आयोग (WBSSC) द्वारा 2016 में की गई 25,752 शिक्षकों की नियुक्तियों को पूरी तरह रद्द कर दिया। अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि ये नियुक्तियाँ भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन करती हैं, जो समानता और सार्वजनिक नौकरी में समान अवसर की गारंटी देते हैं।

इस ऐतिहासिक फैसले में केवल एक उम्मीदवार सोमा दास को मानवीय आधार पर नौकरी जारी रखने की अनुमति दी गई है। सोमा दास कैंसर सर्वाइवर हैं। इस मामले में कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि सभी अपात्र उम्मीदवारों को अपने अब तक के वेतन और लाभ 12% ब्याज के साथ चार सप्ताह के भीतर राज्य सरकार को लौटाने होंगे।

इसके साथ ही कोर्ट ने इस मामले को सीबीआई के हवाले करते हुए इसकी गहराई से जाँच करने का आदेश भी दिया। अदालत ने WBSSC को निर्देशित किया है कि वह जल्द से जल्द एक पारदर्शी और निष्पक्ष प्रक्रिया के तहत नई भर्तियों की शुरुआत करे, ताकि योग्य उम्मीदवारों को न्याय मिल सके।

भारत के सर्वोच्च न्यायालय का फैसला

मई 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने सभी नियुक्तियों को रद्द करने के कलकत्ता हाई कोर्ट के आदेश पर रोक लगा दी। हालाँकि, सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले की सीबीआई जाँच पर रोक लगाने से इनकार कर दिया।

सर्वोच्च न्यायालय ने कहा, “सार्वजनिक नौकरियाँ बहुत कम हैं। अगर जनता का विश्वास खत्म हो जाए तो कुछ नहीं बचेगा। यह व्यवस्थागत धोखाधड़ी है। अगर नियुक्तियाँ गलत तरीके से होती हैं तो सिस्टम में क्या बचेगा?” सुप्रीम कोर्ट ने आगे कहा, “या तो आपके पास डेटा है या नहीं है, दस्तावेजों को डिजिटल रूप में बनाए रखना आपका कर्तव्य था।”

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने 3 अप्रैल 2025 को कलकत्ता उच्च न्यायालय के फैसले को बरकरार रखा [pdf] और 2016 के WBSSC भर्ती मामले में व्यवस्थागत अनियमितताओं, विसंगतियों/धोखाधड़ी का उल्लेख किया। भर्ती प्रक्रिया की समग्र अखंडता में समझौता होने के कारण इसे पूरी तरह से रद्द कर दिया गया।

सर्वोच्च न्यायालय ने कहा, “हमारे विचार में यह ऐसा मामला है, जिसमें पूरी चयन प्रक्रिया को दूषित कर दिया गया है और इसे सुलझाया नहीं जा सकता। बड़े पैमाने पर हेरफेर और धोखाधड़ी, साथ ही इसे ढकने के प्रयास ने चयन प्रक्रिया को इतना नुकसान पहुँचाया है कि इसे आंशिक रूप से भी सुधारा नहीं जा सकता। चयन की विश्वसनीयता और वैधता समाप्त हो गई है।”

WBSSC ने तर्क दिया था कि पूरी भर्ती प्रक्रिया को रद्द नहीं किया जाना चाहिए। हालाँकि, सर्वोच्च न्यायालय ने तर्क में कोई दम नहीं पाया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “हम इस तर्क को स्वीकार कर सकते थे यदि WBSSC के पास मूल भौतिक OMR शीट या OMR शीट की फोटो कॉपी होती। हालाँकि, WBSSC स्वीकार करता है कि उनके पास OMR शीट नहीं हैं।”

सुप्रीम कोर्ट ने आगे कहा, “…क्योंकि उन्हें कक्षा IX और X और कक्षा XI और XII नियमों के नियम 21 के अनुसार नष्ट कर दिया गया था, जिसके अनुसार OMR शीट को केवल एक वर्ष तक रखना आवश्यक है।” सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ग्रुप C और D कर्मचारियों के लिए OMR शीट नष्ट करने के पीछे कोई तर्क नहीं था, क्योंकि भर्ती पैनल की वैधता समाप्त होने के बाद भी भर्ती चल रही थी।”

सर्वोच्च न्यायालय ने भर्ती पैनल के विस्तार में अवैधता को भी रेखांकित किया। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा, “इसमें कोई संदेह नहीं है कि कक्षा IX-X और XI-XII के लिए सहायक शिक्षकों के पद पर काउंसलिंग प्रक्रिया और नियुक्तियाँ पैनल की समाप्ति के बाद की गई थीं। यह अवैध और नियमों के विपरीत है।”

(यह रिपोर्ट दिबाकर दत्ता ने मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी है। इसे आप इस लिंक पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं।)

पुरुषों ने साड़ी पहन खिंचवाई फोटो, महिलाओं के नाम से बटोरे लाखों रुपए: कर्नाटक में MGNREGA में धाँधली, NMMS पोर्टल से खुली पोल

कर्नाटक के यादगीर जिले में सरकारी योजना MGNREGA में धाँधली का मामला सामने आया है। जहाँ कुछ पुरुषों ने साड़ी पहनकर महिला के रूप में मजदूरी कर तीन-तीन लाख रुपये भी कमा लिए। यहाँ से सब महिलाओं के नाम पर पुरुषों ने किया।

दरअसल, मामला सामने तब आया जब इस साल फरवरी में कथित तौर पर एक तस्वीर राष्ट्रीय मोबाइल निगरानी सेवा (NMMS) में उपस्थिति के लिए अपलोड की गई, जिसमें कुछ पुरुष और महिला मजदूर नहर की खुदाई वाली जगह के पास खड़े दिखाई दे रहे थे। फोटो को जूम करके देखने पर सच्चाई सामने आई, जिसमें पुरुष ही महिला की साड़ी पहने और घूंघट ओढ़े हुए थे।

स्थानीय पंचायत ने मामले से किनारा किया

इस घटना से संबंधित अधिकारियों पर सवाल खड़े हुए हैं। मामले में जाँच के सख्त आदेश दिए गए हैं। वहीं, स्थानीय ग्राम पंचायत ने घोटाले के बारे में कोई भी जानकारी होने से इनकार कर दिया। किनारा करते हुए कहा कि घटना में कुछ आउटसोसर्स कर्मचारी शामिल थे।

मल्हार गाँव की पंचायत ने इस मामले से पल्ला झाड़ लिया। पंचायत विकास अधिकारी चेन्नाबसवा ने कहा, “मुझे इस घोटाले की कोई जानकारी नहीं थी। ये सब एक आउटसोर्स कर्मचारी ने किया। जब मुझे पता चला, तो उसे निलंबित कर दिया।” लेकिन सवाल ये है कि इतनी बड़ी गड़बड़ी कैसे छिपी रही? अब जाँच के सख्त आदेश दिए गए हैं, और लोग चाहते हैं कि दोषियों को सजा मिले। गाँव में अभी भी 2,500 मजदूर काम कर रहे हैं और पंचायत का दावा है कि अब सब कुछ ठीक चल रहा है।

मनरेगा क्या है?

महात्मा गाँधी राष्ट्रीय ग्रामीण गारंटी अधिनियम (मनरेगा) ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी और गरीबी को दूर करने के लिए एक सामाजिक कल्याण योजना है। केंद्र ने इस योजना को शुरु किया है, जिसमें केंद्र और राज्य सरकार मिलकर वित्तपोषण और परियोजना पर काम करने की जिम्मेदारियाँ साझा करती हैँ। यह योजना हर पंजीकृत ग्रामीण परिवार को हर साल 100 दिन का रोजगार देने की गारंटी देती है। मजदूरी के लिए धन पूरी तरह से केंद्र सरकार ही प्रदान करती है जबकि सामग्री लागत का 75 प्रतिशत केंद्र और 25 प्रतिशत राज्य सरकार को जाता है।

नरेंद्र यादव की डॉक्टरी की सारी डिग्री निकली फर्जी: जिस ‘मिशन हॉस्पिटल’ में करता था दिल का ऑपरेशन, उसकी पैरवी कर चुके हैं कपिल सिब्बल जैसे पुराने कॉन्ग्रेसी

मध्य प्रदेश के दमोह में एक ईसाई मिशनरी अस्पताल में लोगों की मौत के बाद बवाल मचा हुआ है। इसमें फर्जी डॉक्टर बनकर मरीजों का ऑपरेशन करने वाले एन जॉन कैम उर्फ नरेंद्र विक्रमादित्य यादव की डिग्रियाँ फर्जी पाई गई हैं। वहीं, इस अस्पताल को संचालित करने वाले पादरी अजय लाल पर दर्ज धर्मांतरण मामले की सुप्रमी कोर्ट में पैरवी कॉन्ग्रेस नेता विवेक तन्खा और कपिल सिब्बल ने की थी। पादरी अजय लाल विदेश भाग चुका है।

दरअसल, ईसाई मिशनरी अस्पताल में जनवरी-फरवरी 2025 में हार्ट सर्जरी के बाद 7 मरीजों की मौत हो गई थी। मामले की जाँच हुई तो ‘फर्जी’ यूके रिटर्न हार्ट स्पेशलिस्ट नरेन्द्र यादव का नाम आया। उस पर पिछले डेढ़ महीने में 15 हार्ट सर्जरी करने का आरोप लगा है। उसकी सारी डिग्रियाँ फर्जी मिली हैं। बड़े-बड़े अस्पतालों में काम करने का दावा करने वाला नरेंद्र खुद को डॉक्टर एन जॉन कैम बताता था।

घटना के खुलासे के बाद मध्य प्रदेश में हंगामा मच गया है, विपक्षी कॉन्ग्रेस पार्टी ने सत्तारूढ़ बीजेपी सरकार पर हमला बोला है। हालाँकि, इस मामले की जाँच में कई खुलासे हुए हैं। नकली नाम, नकली रजिस्ट्रेशन नंबर और नकली डिग्रियों के सहारे नरेंद्र यादव पिछले 18 सालों से डॉक्टर के रूप में प्रैक्टिस कर रहा था।

फर्जी मेडिकल की डिग्री और नकली रजिस्ट्रेशन नंबर

नरेन्द्र यादव के पास कलकत्ता नेशनल मेडिकल कॉलेज की डॉक्टर ऑफ मेडिसिन की डिग्री है। उसकी दूसरी डिग्री नॉर्थ बंगाल मेडिकल कॉलेज से बैचलर ऑफ मेडिसिन और बैचलर ऑफ सर्जरी यानी एमबीबीएस की है। एमबीबीएस रजिस्ट्रेशन एक महिला डॉक्टर के नाम पर है। तीसरी डिग्री पांडिचेरी मेडिकल कॉलेज से डॉक्टर ऑफ मेडिसिन की है। ये तीनों डिग्रियाँ फर्जी हैं।

एनडीटीवी के अनुसार, उसकी आंध्र प्रदेश मेडिकल काउंसिल का रिकॉर्ड भी संदिग्ध है। दमोह की एसपी श्रुतकीर्ति सोमवंशी के मुताबिक, “जो डिग्री पेश की गई है वो नकली लग रही हैं। ऐसा लग रहा है कि इसे मॉर्फ किया गया है। आरोपित का मोबाइल, टैब, ईमेल आदि सभी की जाँच की जा रही हैं। ये भी पता लगाया जा रहा है कि उसने अब तक कहाँ-कहाँ काम किया और क्या-क्या सीखा है।”

फर्जी डॉक्टर का कॉन्ग्रेस नेता से संबंध

फर्जी डॉक्टर नरेंद्र यादव को काम पर रखने वाले पादरी अजय लाल का प्रतिनिधित्व 2023 में सुप्रीम कोर्ट में कॉन्ग्रेस नेता विवेक तन्खा ने प्रतिनिधित्व किया। विवेक तन्खा इस समय कॉन्ग्रेस के राज्यसभा सांसद हैं। विवेक तन्खा के अलावा, कॉन्ग्रेस से जुड़े रहे कपिल सिब्बल ने भी पादरी की पैरवी की थी। वे जनवरी 2024 तक पादरी अजय लाल की पैरवी कर रहे थे।

अजय लाल फिलहाल भारत से बाहर हैं। कॉन्ग्रेस के एक अन्य नेता अजय सिंह के साथ साथ भी उसकी तस्वीरें सामने आई हैं। दरअसल, नवंबर 2022 में पादरी अजय लाल पर एक दलित दंपति और उसके परिवार को जबरन ईसाई बनाने का आरोप लगा था। दलित पीड़ितों ने बताया कि चर्च के अधिकारियों ने उन्हें धमकाया और धर्म परिवर्तन के समय पहले दिए गए धन से चार गुना अधिक धन की माँग की थी।

पीड़ित ने कहा, “शुरू में उन्होंने हमें जबरन धर्म परिवर्तन करवाया और 1,20,000 रुपए दिए। उन्होंने हमें चर्च सेवा में शामिल होने और हिंदू धर्म का पालन करना बंद करने के लिए भी कहा। हमने शुरू में चर्च सत्र में भाग लिया, लेकिन बाद में हम नहीं जा सके। इसलिए उन्होंने हमें धमकाना शुरू कर दिया कि अगर हम ईसाई धर्म का पालन करने में विफल रहे, तो वे दी गई राशि को चार गुना ब्याज के साथ वसूल करेंगे।”

उस समय NCPCR के तत्कालीन अध्यक्ष प्रियांक कानूनगो ने अजय लाल द्वारा संचालित ‘मिड इंडिया क्रिश्चियन सोसाइटी’ नामक ईसाई संगठन के 10 सदस्यों के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायत में कानूनगो ने कहा था कि सोसाइटी के बाल गृह में रहने वाले कई हिंदू नाबालिग छात्रों को ईसाई धर्म में परिवर्तित कर दिया गया। मिशनरी अधिकारियों ने उन्हें भविष्य में पादरी बनाने का लालच दिया था।

छत्तीसगढ़ विधानसभा अध्यक्ष की कर सर्जरी, हो गई थी मौत

फर्जी डॉक्टर नरेन्द्र यादव ने दिसंबर 2024 से फरवरी 2025 के बीच मिशन अस्पताल में 15 हार्ट सर्जरी की है। इससे भी अधिक चौंकाने वाली बात यह है कि साल 2006 में छत्तीसगढ़ विधानसभा के तत्कालीन अध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद शुक्ला की हार्ट सर्जरी करने का आरोप भी इसी फर्जी डॉक्टर पर लगा था। सर्जरी के बाद राजेंद्र शुक्ला की मौत हो गई थी।

यह ऑपरेशन बिलासपुर के अपोलो अस्पताल में किया गया था। यह बात सामने आई है कि छत्तीसगढ़ में नरेंद्र यादव के ऑपरेशन करने के बाद 8 मरीजों की मौत हुई थी। तब भी जाँच हुई थी और एमबीबीएस की डिग्री पर शक जताया गया था, लेकिन एक्शन नहीं हुआ था। इन 18 सालों में उसने न जाने कितने मरीजों को मौत दे दी और परिजनों को बेपनाह दर्द।

बाउंसर, सूटकेस के साथ आता था अस्पताल

फर्जी डॉक्टर नरेन्द्र यादव मिशन अस्पताल में एक बाउंसर के साथ आता था, जो हमेशा सूटकेस लेकर चलता था। अस्पताल के मुताबिक, इस सूटकेस में पोर्टेबल ईको मशीन भी थी, जो अस्पताल की थी। अब ये मशीन गायब है। इसी रिपोर्ट थाने में दर्ज कराई गई है।

फर्जी डॉक्टर नरेश विक्रमादित्य यादव की गिरफ्तारी के बाद पेशी के दौरान गुस्साए लोगों ने पीटने की कोशिश की, लेकिन पुलिस ने उसे बचा लिया। कोर्ट ने उसे 5 दिनों की पुलिस रिमांड में भेज दिया है। पुलिस उससे ‘सारा सच’ जानने की कोशिश कर रही है।

उसे अब घर के लड़कों से भी लगता है डर, क्योंकि 7 दिनों तक होता रहा रेप: पीड़ित पिता बोले- दानिश, साजिद, राज खान… ने बर्बाद कर दी बेटी की जिंदगी, अब तक 9 गिरफ्तार

उत्तर प्रदेश के वाराणसी में 19 साल की लड़की के साथ गैंगरेप की दिल दहला देने वाली घटना ने पूरे इलाके को झकझोर कर रख दिया है। लड़की के पिता का कहना है कि उनकी बेटी के साथ जो कुछ भी हुआ, वो साजिश की तरफ इशारा करता है। उन्होंने कहा कि शुरुआत में किसी को कोई जानकारी नहीं थी, बेटी जब होश में आई, तब उसने सारी बात बताई। पीड़िता के पिता ने बताया कि उसे (बेटी को) कई बार नशा दिया गया और उसके साथ गैंगरेप किया गया। हुक्का बार से लेकर अलग-अलग होटलों में उससे दरिंदगी की गई। वो अब घर के लड़कों से भी डरने लगी है।

पिता ने जताया साजिश का शक

पीड़ित लड़की के पिता का कहना है कि इतने सारे लोगों की संलिप्तता से साफ है कि यह एक सुनियोजित साजिश थी। प्राइवेट गाड़ी चलाकर घर चलाने वाले पीड़िता के पिता ने बताया कि उनकी बेटी स्पोर्ट्स टीचर बनना चाहती थी और इसके लिए वो बीपीएड की तैयारी कर रही थी। लेकिन इन दरिंदों ने उसका जीवन और करियर दोनों तबाह कर दिया।

पीड़िता के पिता के चार लड़कों के नाम लिए। उन्होंने कहा- दानिश, साजिद, राज खान और आयुष ने मेरी बेटी की जिंदगी को नर्क बना दिया। वो उसके क्लासमेट थे। उन्होंने मेरी बेटी को 7 दिन तक इतना नशा करवाया कि उसकी जिंदगी नर्क बन गई।

पीड़िता के पिता ने बताया, “मेरी बेटी 29 मार्च को अपनी सहेली से मिलने घर से निकली थी। इसके बाद उसके साथ ये सारी घटनाएँ हो गईं। उसने अपनी दोस्त के साथ गंगा घाट पर दिन बिताया और वहाँ कुछ लड़कों से उसकी मुलाकात हो गई। फिर 3-4 दिन तक उसका कोई पता नहीं चला। हम सब बहुत परेशान थे। समाज के डर से हमने पहले खुद उसे ढूँढने की कोशिश की, लेकिन कुछ नहीं हुआ। फिर 3 अप्रैल को हमने पुलिस से मदद माँगी। पुलिस ने 4 अप्रैल को उसे ढूँढ लिया, लेकिन उसकी हालत बहुत खराब थी। इलाज के बाद जब वह ठीक हुई, तो उसने सारी बात बताई।”

पीड़ित के पिता ने आगे कहा, “बच्ची ने बताया कि उसे कई बार नशा दिया गया और कई लोगों ने उसके साथ गैंगरेप किया। इतने सारे लोगों का शामिल होना दिखाता है कि यह एक सोची-समझी साजिश थी। मेरी बेटी इंटर में कॉमर्स की पढ़ाई कर रही थी और वह स्पोर्ट्स में करियर बनाना चाहती थी। वह 19 साल की है। मैं किसी भी आरोपित को नहीं जानता और न ही पहचानता हूँ।

उन्होंने कहा, “मैं सीएम योगी आदित्यनाथ जी से यही आग्रह करूँगा कि जिस चीज के लिए वो जाने जाते हैं, ये दुनिया से छिपी नहीं है। मैं चाहता हूँ कि वो वही काम बाखूबी करें। हमें न्याय दें। मैं फाँसी की सजा की माँग नहीं कर रहा हूँ, लेकिन ऐसी सजा दी जाए कि कोई इस तरह का अपराध दोबारा न करे। ताकी बहुत सारी बच्चियों को इस तरह के अपराधों से बचाया जा सके।”

पुलिस ने 3 टीमें बनाई, 9 आरोपित गिरफ्तार

पुलिस के मुताबिक, इस मामले में तीन टीमें बनाई गईं। पहली टीम ने मालदीहिया इलाके के एक होटल से लड़की को बरामद किया, जहाँ उसे नशे की हालत में रखा गया था। दूसरी टीम ने सीसीटीवी फुटेज के जरिए लड़की के मूवमेंट को ट्रैक किया। तीसरी टीम ने 12 लोगों के बयान रिकॉर्ड किए, जिसमें 11 आरोपितों की पहचान हुई। इनमें राज विश्वकर्मा, अरुण धूसिया, साजिद, सुहेल, दानिश, इमरान, शब्बीर, सोहेल और अनमोल शामिल हैं। पुलिस ने बताया कि एक होटल में लड़की को कई बार नशा देकर उसके साथ गैंगरेप किया गया।

इस मामले में युवती की माँ की तहरीर पर 12 नामजद और 11 अज्ञात के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया है। पुलिस ने इस मामले में 9 आरोपितों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है। सभी आरोपितों को जेल भेजने से पहले उनकी मेडिकल जाँच भी कराई गई।

ANI के खिलाफ आपमानजनक टिप्पणी हटाओ: दिल्ली हाई कोर्ट ने Wikipedia को दिया आदेश, कहा- तटस्थ रहो, ऑनलाइन ब्लॉग मत बनो

दिल्ली हाई कोर्ट ने मंगलवार (8 अप्रैल 2025) को विकिपीडिया की उसके ‘विचारपरक’ और ‘पक्षपाती’ कंटेंट के लिए आलोचना की। दरअसल, विकिपीडिया ने भारतीय न्यूज एजेंसी ‘एशियन न्यूज इंटरनेशनल (ANI)’ को अपने पेज पर केंद्र सरकार का ‘प्रोपगेंडा टूल’ यानी दुष्प्रचार उपकरण बताया था। इसके खिलाफ ANI ने अदालत का रूख किया था।

जस्टिस प्रतिभा एम. सिंह और जस्टिस रजनीश कुमार गुप्ता वाली दिल्ली हाई कोर्ट की खंडपीठ ने कहा कि विकिपीडिया को ‘विश्वकोश’ के रूप में देखा जाता है। इसलिए इसे एक ऑनलाइन ब्लॉग की तरह दिखने के बजाय तटस्थ रहना चाहिए। यदि विकिपीडिया मध्यस्थ होने का दावा करता है तो वह मामले के गुण-दोष के आधार पर अदालत के फैसले को चुनौती नहीं दे सकता।

हाई कोर्ट ने कहा, “ईमानदारी से कहें तो हम सभी विकिपीडिया का उल्लेख करते हैं। मुझे अच्छी तरह याद है कि जब बच्चे हाई स्कूल में होते हैं तो विकिपीडिया देखते हैं। बच्चों को इसके बारे में सिखा सकते हैं… शब्द ‘पीडिया’ विश्वकोश से आया है। एक विश्वकोश को बहुत तटस्थ होना चाहिए। विकिपीडिया इस तरह से एक महान सेवा कर रहा है… यदि आप इस तरह से पक्ष लेना शुरू करते हैं तो यह किसी ब्लॉग की तरह हो जाता है।”

विकिपीडिया के मध्यस्थ होने के दावे को लेकर खंडपीठ ने कहा, “आपने पहले ही दलील दी है कि आप एक मध्यस्थ हैं। IT नियमों के तहत उनका काम केवल अदालत के निर्देशों को लागू करना है। आप गुण-दोष के आधार पर इसका बचाव नहीं कर सकते। यदि आप एक मध्यस्थ हैं और अदालत आपको इसे हटाने का निर्देश देती है तो आप गुण-दोष के आधार पर बहस भी नहीं कर सकते।”

इससे पहले हाई कोर्ट की एकल जज ने 2 अप्रैल को अपने आदेश विकिपीडिया को ANI के खिलाफ अपमानजनक सामग्री हटाने और इस तरह के कंटेंट को आगे प्रकाशित करने पर रोक लगाने का निर्देश दिया था। जज ने एएनआई के पेज में संपादन पर रोक लगाने के लिए लगाए गए प्रोटेक्शन स्टेट को भी हटाने का निर्देश दिया था।

इसमें थोड़ा संशोधन करते हुए डिवीजन बेंच ने कहा कि विकिपीडिया को अपमानजनक सामग्री को हटाना होगा, लेकिन यदि इसी तरह की सामग्री फिर से दिखाई देती है तो ANI को वह सूचित कर सकता है, जिससे आगे की कार्रवाई के लिए विकिपीडिया को प्रेरित किया जा सके। वहीं, ANI के पेज पर प्रोटेक्शन स्टेट हटाने के एकल जज के फैसले को भी स्थगित कर दिया।

दरअसल, एकल न्यायाधीश के आदेश के खिलाफ विकिपीडिया ने दिल्ली हाई कोर्ट में डबल बेंच में अपील की थी। इसके बाद बेंच ने यह आदेश दिया। जुलाई 2024 में उच्च न्यायालय के एकल न्यायाधीश ने विकिपीडिया को समन जारी किया था और उसे ANI के विकिपीडिया पेज पर संपादन करने वाले तीन लोगों के बारे में जानकारी का खुलासा करने का आदेश दिया था।

जब ANI ने शिकायत की कि विकिपीडिया ने इस निर्देश का पालन नहीं किया है तो एकल न्यायाधीश ने विकिपीडिया के आचरण पर कड़ी आपत्ति जताई और न्यायालय की अवमानना ​​का नोटिस जारी किया। विकिपीडिया के एक अधिकृत प्रतिनिधि को 25 अक्टूबर को व्यक्तिगत रूप से न्यायालय में उपस्थित होने का भी आदेश दिया था। इसके बाद विकिपीडिया ने अपील में डिवीजन बेंच का रुख किया।

डिविजन बेंच में ANI और विकिपीडिया एक समझौते पर पहुँचे। इस समझौते के तहत विकिपीडिया ने उन यूजर्स को नोटिस देने पर सहमति जताई, जिन्होंने पेज का संपादन किया था। इसके बाद विकिपीडिया ने उन तीन उपयोगकर्ताओं को नोटिस दिया जिन पर एएनआई की प्रतिष्ठा को धूमिल करने वाले अपमानजनक संपादन करने का आरोप था।

गौरतलब है कि डिवीजन बेंच ने विकिपीडिया पर हाई कोर्ट के मामले से संबंधित ‘एशियन न्यूज इंटरनेशनल बनाम विकिमीडिया फाउंडेशन’ शीर्षक वाला पेज होस्ट करने के लिए भी आलोचना की और इसे हटाने का आदेश दिया। इस आदेश के खिलाफ अपील सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। इसके बाद जस्टिस नवीन चावला और रेणु भटनागर की बेंच ने मामले की सुनवाई बंद कर दी, क्योंकि जस्टिस नवीन चावला ने खुद को मामले से अलग कर लिया था।

बीत गए ‘कहाँ गई… बड़ा याद आती है’ वाले दिन, लौट आई ‘रिबेल किड्स’: अपूर्वा मुखीजा की नई सनसनी- दीवारों के भी कान होते हैं

आज से कुछ दशक पहले लोग चिट्ठी गायब होने पर पोस्टमैन को कोसते थे। अब इंस्टाग्राम पोस्ट गायब हो तो लोग सीधे ब्रह्मांड को दोष देने लगते हैं। अपूर्वा मुखीजा ने इंस्टा से सबकुछ डिलीट कर दिया!- जैसे ही ये खबर फैली, पूरे इंटरनेट में ऐसा कोहराम मचा, जैसे ‘कॉफी विद करण’ में कोई सलमान की शादी की तारीख बता दे।

‘द रिबेल किड’ यानी अपूर्वा, जिन्हें लोग इंस्टाग्राम की रंगीली विदूषी मानते थे, अचानक सबकुछ मिटा के गायब हो गईं। 21 दिनों तक उनकी कोई स्टोरी नहीं। कोई पोस्ट नहीं। एक बार को तो लगा कि शायद वो हिमालय चली गई हैं, फिल्टर के बिना ध्यान लगाने।

जब फॉलोअर्स हुए अनफॉलो

हमारे देश में दो चीज़ों का खास महत्व है- धार्मिक कर्मकांड और इंस्टाग्राम फॉलोअर्स। अपूर्वा ने एक झटके में दोनों की तरह अपने अकाउंट की पवित्रता का जलाभिषेक कर डाला। सभी को अनफॉलो किया और प्रोफाइल में ‘निंबू-मिर्ची’ टाँग दी। 2.9 मिलियन ‘रेबेलियंस’ को संपत्ति का दर्जा दिया।

अपूर्वा मुखीजा इंस्टाग्राम
‘द रेबेल किड’ उर्फ अपूर्वा मुखीजा का इंस्टाग्राम पर शून्य फॉलोइंग (साभार: Instagram – the.rebel.kid)

जनता ने सोचा, “कहीं किसी ने कुछ कह दिया होगा”। कुछ लोगों ने उनके डिलीटेड पोस्ट्स पर थ्योरी बनाई जैसे NASA वाले एलियन्स पर बनाते हैं। एक ट्रेंडसेटर ने यहाँ तक कह दिया, “यार, ये तो डिजिटल रिडेम्प्शन है, मैं भी आज सबकुछ डिलीट कर रहा हूँ।”

पर जनाब! डिलीट करने के बाद उनकी रील्स पर सिर्फ 42 लाइक्स आए और वह दोबारा अपूर्वा को फॉलो करने लगे। बस फर्क इतना था कि अब उन्हें फॉलो-बैक नहीं मिला।

टैलेंट तो गया पर ट्रोल्स आ गए

अब इस किस्से का सबसे मसालेदार हिस्सा आता है- ‘इंडियाज़ गॉट लैटेंट’। नाम से तो लगा था कोई मज़ेदार टैलेंट शो है, लेकिन निकला ऐसा अखाड़ा, जहाँ कंटेंट क्रिएटरों को नाटक, ड्रामा और धमकियों की तीर-कमान से नवाज़ा गया।

शो में अपूर्वा मुखीजा को बुलाया गया। सबने सोचा अब उनके ह्यूमर का जादू चलेगा। लेकिन हो गया उल्टा। एक और पैनलिस्ट ने ऐसा बयान दे डाला कि विवाद का मिर्ची पाउडर पूरे शो में छिड़क गया।

और फिर शुरू हुई असली चटनी – धमकियों की बाढ़, चरित्र हनन, ट्रोलिंग, मीम्स, ट्विटर थ्रेड्स और कानून के झंडे। रिपोर्ट्स के अनुसार, अपूर्वा पर FIR दर्ज कर दी गई जैसे वो कोई गैंगस्टर हों और इंस्टाग्राम की गली में कोई रील की डकैती कर ली हो।

21 दिन बाद जब ‘दीवारों के भी कान होते हैं’

21 दिन बाद, अपूर्वा का ‘कमबैक’ हुआ। हाँ वही जिसकी उम्मीद हमे अपने जीवन से है। अपूर्वा का इंस्टा ब्रॉडकास्ट एक लाइन से वायरल हो गई “दीवारों के भी कान होते हैं।”

अपूर्वा मुखीजा ब्रॉडकास्ट चैनल
अपूर्वा ने ब्रॉडकास्ट चैनल पर लिखा ‘दीवारों के भी कान होते हैं’ (साभार : Instagram Broadcast ‘Rebellions’)

जनता ने इसे ऐसे पढ़ा जैसे कुरान की आयत हो या गुरुजी का संकेत। कोई बोला, “ये उन ट्रोल्स के लिए है।” दूसरा बोला, “नहीं रे! ये शो के प्रोड्यूसर के लिए है।” तीसरा चिल्लाया, “मैं तो इसे अपनी एक्स को भेजूंगा!”

फिर आया दूसरा पोस्ट, “इसलिए शुक्रिया।” अब जनता का दिमाग पूरी तरह फ्राई हो गया। शुक्रिया किसे? धमकी देने वालों को? FIR करने वालों को? या फिर भगवान को जिन्होंने 21 दिन तक वाईफाई बंद रखा?

डिजिटल शांति या सोशल मीडिया का सन्नाटा?

21 दिनों तक अपूर्वा ने सोशल मीडिया पर ‘ब्रह्मचारी’ जीवन बिताया। न रील, न ट्रेंडिंग ऑडियो, न फोटो डंप। उनके फैन क्लब वालों ने एक याचिका तक बना दी, “Bring Apoorva Back, or We Quit Instagram”।

इधर ट्रोल्स भी कंफ्यूज थे। एक ने कहा, “हमने तो मज़ाक उड़ाया पर वो चली गई, अब किसपे मीम बनाएँ?” इतने में दूसरे ने कहा, “चुप रहो! वो वापस आई है और उसके पास स्क्रीनशॉट्स हैं।”

जिन्हें कहानियाँ सुनानी आती हैं, उन्हें चुप कराना मुश्किल

अपूर्वा की कहानी महज एक इंटरनेट सेंसेशन की नहीं बल्कि उस डिजिटल समाज की है, जहाँ एक लड़की जब बोलती है, तो ट्रोल्स की तलवारें खिंच जाती हैं। अपूर्वा की स्टोरी टेलिंग की प्रतिभा का हर कोई फैन है। इसीलिए उसे चुप कराना मुश्किल है।

वो इंस्टाग्राम पर हँसी-मज़ाक करती, फनी रील बनाती, समाज पर तंज कसती थी। लेकिन जैसे ही उसने एक मंच पर कुछ ऐसा कहा जो ‘व्यवस्था’ को पसंद नहीं आया, उसके खिलाफ धमकियाँ शुरू हो गईं। FIR तक हुई। और सबसे बड़ी विडंबना तो यह थी कि एक शो जिसका नाम ‘India’s Got Latent’ था, उसने असली टैलेंट को ही चुप करवा दिया।

अपूर्वा लौट चुकी है

आज की डिजिटल दुनिया में कोई लड़की ज़्यादा बोलती है तो ‘Feminism’ की कैटेगरी में आती है। कभी उसे ‘Attention Seeker’ कहा जाता है। कभी ‘Over Sensitive’ और जब वो चुप हो जाती है तो वही लोग कहते हैं – “कहाँ गई? बड़ा याद आती है!”

पर अब अपूर्वा लौट चुकी हैं। उनके पास शब्द भी हैं, स्क्रीनशॉट भी। उनके पास व्यंग्य भी है, व्यथा भी। और सबसे बड़ी बात- उनके पास उनके फॉलोअर्स का वो भरोसा है, जो जानता है कि ‘दीवारों के भी कान होते हैं’। पर ‘रिबेल किड’ की आवाज़ अब गूँगी नहीं रही।

मल्लिकार्जुन खड़गे को अध्यक्ष तो बनाया, पर पार्टी बैठक में ही कुर्सी दिया किनारे: BJP ने शेयर किया सोनिया-राहुल गाँधी के सोफे वाला Video, कहा- दलित विरोधी है कॉन्ग्रेस

भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने कॉन्ग्रेस पर दलित विरोधी होने का आरोप लगाया है। दरअसल, मंगलवार (8 अप्रैल 2025) की शाम अहमदाबाद में कॉन्ग्रेस की कार्यसमिति की बैठक के दौरान का एक वीडियो सामने आया, जिसमें साबरमती आश्रम में हुई प्रार्थना सभा में कॉन्ग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे को किनारे बैठा दिया गया। वीडियो में साफ दिख रहा है कि सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी बड़े आराम से बीच में सोफे पर बैठे हैं, वहीं खड़गे को किनारे पर एक अलग कुर्सी थमा दी गई। भाजपा ने इस मुद्दे को लेकर कॉन्ग्रेस पर जमकर हमला बोला।

भाजपा आईटी सेल के इंचार्ज अमित मालवीय ने वीडियो शेयर करते हुए लिखा, “पहले खड़गे जी का सम्मान करना सीखो। वह कॉन्ग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। उनकी कुर्सी किनारे पर लगाने का क्या मतलब था? यह साफ़ दर्शाता है कि कॉन्ग्रेस दलित विरोधी है।”

सचमुच, ये घटना कॉन्ग्रेस के लिए शर्मिंदगी का सबब बन गई। दलित समाज से आने वाले और मौजूदा समय में पार्टी के सबसे बड़े नेता यानी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के साथ ऐसा व्यवहार देखकर कार्यकर्ताओं में भी नाराजगी फैल रही है। लोग पूछ रहे हैं कि अगर कॉन्ग्रेस अपने अध्यक्ष को ही सम्मान नहीं दे सकती, तो दलित समाज के लिए क्या उम्मीद रखेगी?

वहीं, कॉन्ग्रेस इस मुद्दे पर सफाई देने में जुट गई, लेकिन उसका बचाव कमजोर नजर आ रहा है। दूसरी तरफ, राहुल गाँधी भाजपा पर दलित विरोधी होने का आरोप लगाते नहीं थकते। उन्होंने हाल ही में कहा, “बीजेपी संविधान और दलितों पर हमला कर रही है।” मगर अब उनका ये बयान खुद उनकी पार्टी पर भारी पड़ रहा है। खरगे के साथ हुए इस अपमान ने कॉन्ग्रेस की दोहरी नीति को उजागर कर दिया। एक ओर वो दलितों के हितैषी होने का दावा करती है, दूसरी ओर अपने ही नेता को किनारे कर देती है।

ये पहली बार नहीं है जब कॉन्ग्रेस पर ऐसा आरोप लगा हो। पहले भी प्रियंका गाँधी वाड्रा के नामांकन के दौरान खड़गे को बाहर खड़ा रहना पड़ा था। तब भी भाजपा ने कहा था कि कॉन्ग्रेस में दलितों की कोई इज्जत नहीं। अब साबरमती आश्रम का ये वाकया कॉन्ग्रेस के लिए और मुश्किल खड़ी कर रहा है। जनता के बीच संदेश जा रहा है कि कॉन्ग्रेस सिर्फ वोट की राजनीति करती है, सम्मान देने की बात हो तो पीछे हट जाती है।

यासीन भटकल सहित IM के 5 आतंकियों की सजा-ए-मौत हाई कोर्ट ने रखी बरकरार, वकील बोले- सुप्रीम कोर्ट जाएँगे: दिलसुखनगर ब्लास्ट में 18 लोगों की हुई थी मौत

तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद में साल 2013 में हुए दिलसुखनगर विस्फोट को 12 साल बीत चुके हैं। इस मामले में मंगलवार (08 अप्रैल 2025) को तेलंगाना हाई कोर्ट ने लगभग 45 दिनों की सुनवाई के बाद फैसला सुनाया। हाईकोर्ट ने इस मामले में पाँच दोषियों की मौत की सजा को बरकरार रखा है। बता दें कि दिसंबर 2016 में राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) की विशेष अदालत ने सभी आरोपितों को मौत की सजा सुनाई थी। दोषियों ने इस फैसले के खिलाफ तेलंगाना हाई कोर्ट में अपील दायर की थी।

हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच में शामिल जस्टिस के. लक्ष्मण और पी. श्रीसुधा ने विशेष अदालत के फैसले को बरकरार रखा और दोषियों की अपीलें खारिज कर दीं। हाई कोर्ट ने कहा कि यह मामला ‘Rarest of the Rarest’ की श्रेणी में आता है। इसमें निर्दोष लोगों की जानें गईं और समाज में आतंक फैलाया गया। अदालत ने कहा कि दोषियों के खिलाफ पर्याप्त सबूत हैं, जो उनकी संलिप्तता को साबित करते हैं।

वहीं, दिलसुखनगर विस्फोट मामले पर अधिवक्ता मोहम्मद शुजाउल्लाह खान ने कहा, “मैं अभियुक्त संख्या 6 का वकील हूँ। हम सुप्रीम कोर्ट में आदेश के खिलाफ अपील करने जा रहे हैं, क्योंकि हम अपने देश की न्याय प्रणाली में विश्वास करते हैं। निर्णय की प्रति अभी तक नहीं दी गई है और न्यायाधीश ने कहा है कि प्रतियाँ आज उपलब्ध होंगी। इसके बाद हम सुप्रीम कोर्ट में अपील करेंगे।”

NIA कोर्ट से मौत की सजा

फास्ट ट्रैक कोर्ट ने साल 2016 में उत्तर प्रदेश का रहने वाला असदुल्ला अख्तर उर्फ ​​हड्डी, पाकिस्तानी जिया-उर-रहमान उर्फ ​​वकास, बिहार का रहने वाला मोहम्मद तहसीन अख्तर उर्फ ​​हसन उर्फ मोनू, कर्नाटक का रहने वाला मोहम्मद अहमद सिद्दीबापा उर्फ ​​यासीन भटकल, महाराष्ट्र का रहने वाला एजाज शेख उर्फ ​​समर अरमान टुंडे और सैयद मकबूल जुबेर को मौत की सजा सुनाई थी। जुलाई 2024 में पुरानी बीमारी के इलाज के दौरान मकबूल की मृत्यु हो गई थी।

विस्फोट में 18 की मौत, मुख्य आरोपित फरार

दरअसल, 21 फरवरी 2013 को हैदराबाद के दिलसुखनगर क्षेत्र में दोहरे बम विस्फोट हुए, जिनमें 18 लोगों की मौत हुई और 131 से अधिक लोग घायल हुए थे। पहला विस्फोट शाम 6:58 बजे बस स्टॉप पर हुआ था और उसके कुछ सेकंड बाद दूसरा विस्फोट पास के रेडियो मिर्ची सेंटर के करीब हुआ था। इन विस्फोटों में इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइसेज़ (IEDs) का उपयोग किया गया था।

इन्हें टिफिन बॉक्स में छिपाकर साइकिलों पर रखा गया था। मामले की जाँच राष्ट्रीय जाँच एजेंसी ने शुरू की तो पता चला कि इस आतंकी हमले में इंडियन मुजाहिदीन का हाथ और इसका सरगना यासीन भटकल और उसका भाई रियाज भटकल है। रियाज भटकल अभी तक फरार है। वहीं, यासीन भटकल को साल 2013 में नेपाल सीमा के नजदीक गिरफ्तार किया गया था।

10, 20, 34 और अब चीनी माल पर 104% टैरिफ, अमेरिका ने किया ‘डंडा’ तो चीन ने भारत से लगाई गुहार: कहा- इससे वैश्विक अस्थिरता आएगी, हमारे साथ आइए

अमेरिका और चीन के बीच चल रहा व्यापार का तनाव बढ़ता जा रहा है। ताजा खबर के अनुसार अमेरिका ने चीन पर अब 50 फीसद अतिरिक्त टैरिफ लगाने की घोषणा की है, जिसके बाद टैरिफ की कुल दर 104 फीसद पहुँच गई है। रिपोर्ट्स बताती हैं कि अमेरिका का यह फैसला 9 अप्रैल 2025 यानी आज से ही प्रभावी होगा।

बता दें कि अमेरिका द्वारा चीन पर इतना अधिक टैरिफ लगाने का फैसला उस समय लिया गया जब चीन ने बदला लेने के लिहाज से 34 % टैरिफ अमेरिका पर लगाया और बातचीत के बाद भी उसे हटाने पर माना नहीं। उनके प्रतिशोधात्मक टैरिफ से पहले अमेरिका ने चीन पर 20% अतिरिक्त टैरिफ ही लगाया था

इसके बाद, 2 अप्रैल को एक रिसिप्रोकल टैरिफ के तहत 34% का शुल्क लगाया गया। इस मुद्दे पर कुछ समय बात चली, मगर कोई हल न निकलने पर अब, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चीन पर एक और 50% अतिरिक्त टैरिफ लगाने की घोषणा की है, जिससे कुल मिलाकर चीनी वस्तुओं पर प्रभावी टैरिफ दर 104% तक पहुँच गई। शुरुआत में ये दर केवल 10 फीसद थी।

ट्रंप का कहना है कि चीन पर लगाया गया 104% टैरिफ भले सुनने में अजीब लगे, लेकिन हकीकत तो ये है कि चीन भी कई चीजों में अमेरिका से 100 फीसद से ज्यादा टैरिफ लेता है। उन्होने अमेरिका को नोचा है। अब उनकी बारी है।

चीन ने की आलोचना

गौरतलब है कि चीन ने इस नए टैरिफ के खिलाफ कड़ी प्रतिक्रिया दी है। चीनी प्रधानमंत्री ली कियांग ने कहा कि चीन किसी भी बाहरी दबाव का सामना करने के लिए पूरी तरह तैयार है और उन्होंने अमेरिका के इस कदम को आर्थिक धौंस दिखाने वाला बताया। उन्होंने यह भी कहा कि चीन अपनी आर्थिक नीतियों में स्थिरता बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध है, भले ही बाहरी चुनौतियाँ बढ़ें।

भारत को साथ खड़े होने को कहा

इसी प्रकार अमेरिका के कदम के खिलाफ भारत में चीनी दूतावास की प्रवक्ता यू जिंग ने भी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि अमेरिका का यह कदम वैश्विक व्यापार में अस्थिरता पैदा कर रहा है और इसे ‘टैरिफ का दुरुपयोग’ करार दिया। यू जिंग ने इस दौरान भारत के साथ संबंधों पर भी बात की। उन्होंने कहा चीन और भारत के बीच आर्थिक और व्यापारिक संबंध एक-दूसरे के पूरक हैं और इनका आधार पारस्परिक लाभ पर है।

इसके साथ ही, उन्होंने यह भी आग्रह किया कि दोनों देशों को मिलकर इस कठिनाई का सामना करना चाहिए। उनका मानना है कि अमेरिका का यह कदम विकासशील देशों को उनके विकास के अधिकार से वंचित करने वाला है। यू जिंग ने आगे कहा कि सभी देशों को बहुपक्षीयता का समर्थन करना चाहिए और एकतरफावाद के खिलाफ एकजुट होना चाहिए। उन्होंने कहा कि ट्रेड वॉर और टैरिफ युद्धों में कोई विजेता नहीं होता है।