Home Blog Page 4232

‘महाभारत’ की तरह रचा गया दिल्ली दंगों में षड्यंत्र, कोर्ट में पुलिस ने कहा- अभी ‘धृतराष्ट्र’ की पहचान होना बाकी

दिल्ली में हुए हिंदू विरोधी दंगों के मद्देनजर अब रामायण और महाभारत का जिक्र भी कोर्ट में होने लगा है। गुरुवार (दिसंबर 18, 2020) को कोर्ट में पुलिस की ओर से कहा गया कि महाभारत के षड्यंत्र की तरह ये दिल्ली दंगे भी एक षड्यंत्र का नतीजा थे। वहीं आरोपित पक्ष ने अपनी रिहाई के लिए दलील दी और कहा कि यह मामला रामायण नहीं होने जा रहा है, जहाँ बाहर निकलने के लिए 14 साल का इंतजार करना पड़े।

जानकारी के मुताबिक, दिल्ली पुलिस ने कोर्ट में दिल्ली दंगों की आरोपित व पिंजड़ा तोड़ मुहिम की सदस्य नताशा नरवाल की जमानत याचिका पर बहस के दौरान उक्त दलीलें कोर्ट के समक्ष पेश की। दिल्ली पुलिस ने गुरुवार को कोर्ट में कहा कि ये कहानी बिलकुल वैसी ही है जैसे संस्कृत महाकाव्य ‘महाभारत’ षड्यंत्र की कहानी थी।

पुलिस ने कहा कि बिलकुल महाभारत की तरह उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए दंगे भी कथित षड्यंत्र थे, जिसके ‘धृतराष्ट्र’ की पहचान किया जाना अभी बाकी है। इसके बाद आरोपित पक्ष की ओर से कहा गया कि यह पूरा मामला ‘रामायण’ नहीं होने जा रहा जहाँ उन्हें बाहर निकलने के लिए 14 साल का इंतजार करना पड़े। जो होगा यहीं और अभी होगा।

बता दें कि नताशा नरवाल को दंगों की पूर्वनियोजित साजिश में भाग लेने के आरोप में UAPA के तहत गिरफ्तार किया गया था। उनके वकील ने कोर्ट की सुनवाई में कहा कि नरवाल के विरुद्ध अभियोजन पक्ष ने एक ‘चक्रव्यूह’ की रचना की है और आरोपित महाभारत के अभिमन्यु की तरह इससे निकलने का प्रयास करेंगी।

नरवाल की ओर ये भी कहा गया कि उनके विरुद्ध दाखिल किया गया आरोप पत्र, महाभारत के बाद दूसरा सबसे बड़ा दस्तावेज है। जिसे सुन कर पुलिस की ओर पेश हुए विशेष लोक अभियोजन अमित प्रसाद ने दिल्ली प्रोटेस्ट सपोर्ट ग्रुप का उल्लेख किया और उसे एक ऐसे किरदार से जोड़ा जो धृतराष्ट्र को हर चीज सुनाता है। उन्होंने कहा, “इस षड्यंत्र का संजय डीपीएसजी है। संजय सब कुछ धृतराष्ट्र को सुना रहा था। यहाँ धृतराष्ट्र की पहचान अभी नहीं हो पाई है।”

आरोप पत्र को महाभारत के बाद सबसे बड़ा दस्तावेज कहने पर अभियोजक पक्ष की ओर से कहा गया,

“महाभारत 22,000 पृष्ठों का था और आरोप पत्र 17,000 पृष्ठों का है। मैं यह कहना चाहता हूँ कि महाभारत एक षड्यंत्र की कहानी थी और संयोगवश यह मामला भी एक षड्यंत्र का है। महाभारत में संजय था, जो (दूर बैठे ही) सब कुछ देख सकता था। इस षड्यंत्र का संजय DPSG है। संजय सब कुछ धृतराष्ट्र को सुना रहा था। यहांँ धृतराष्ट्र की पहचान अभी नहीं हो पाई है।”

उन्होंने अतिरिक्त सत्र के न्यायाधीश अमिताभ रावत को बताया कि इसी ग्रुप ने सभी प्रदर्शनस्थलों पर निगरानी की थी और सभी प्रदर्शन स्थलों की कमान सँभाली थी। पुलिस ने कहा कि इनका लक्ष्य विरोध प्रदर्शन करना नहीं था बल्कि चक्का जाम करना था जिसका अंत हिंसा के रूप में हुआ।

फिल्म निर्माता करण जौहर पर NCB का शिकंजा: नोटिस भेजकर माँगे ‘ड्रग्स वाले’ हाउस पार्टी के वीडियो और जानकारी

फिल्म निर्माता-निर्देशक करण जौहर पर एनसीबी का शिकंजा एक बार फिर कसता हुआ नजर आ रहा है। नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो ने करण जौहर को एक बार फिर नोटिस भेजा हैl एएनआई ने ट्वीट कर जानकारी दी है कि एनसीबी ने फिल्म निर्माता करण जौहर को नोटिस जारी किया है और उनसे उनके घर पर आयोजित होने वाली पार्टियों की जानकारी माँगी है। इसके अलावा उन्हें जवाब, दस्तावेज और इलेक्ट्रॉनिक सबूत देने के लिए भी कहा गया है। खासकर उस वीडियो के संदर्भ में जिसकी शिकायत मनिंदर सिंह सिरसा ने की थी।

पिछले वर्ष जुलाई में यह पार्टी करण जौहर के घर पर हुई थी और इसमें शामिल सितारे ड्रग्स के नशे में थे, ऐसा कई मीडिया रिपोर्ट में दावा किया गया था। दरअसल, सुशांत सिंह राजपूत की मौत की जाँच शुरू होने के बाद, जब बॉलीवुड में ड्रग्स की घुसपैठ का खुलासा हुआ तो यह वीडियो एक बार फिर चर्चा में आ गया। वहीं अब प्रारंभिक जाँच के बाद यह बात भी सामने आ चुकी है कि यह वीडियो सही था और इसके साथ कोई छेड़छाड़ नहीं की गई थी।

इससे पहले हमने रिपोर्ट किया था कि NCB मामले की जाँच शुरू कर सकता है और करण जौहर को इस मामले में बुलाया जा सकता है। वहीं पिछले दिनों डीएनए द्वारा यह पुष्टि की गई है कि इस मामले की जाँच शुरू हो गई है। इस वीडियो में दीपिका पादुकोण, विक्की कौशल, मलाइका अरोड़ा, वरुण धवन, अयान मुखर्जी, अर्जुन कपूर और शाहिद कपूर जैसे बड़े एक्टर दिखाई दे रहे हैं।

हालाँकि, करण जौहर ने इस वीडियो को लेकर सितंबर में एक बयान भी जारी किया था। इसमें उन्होंने इसे गलत और दुर्भावनापूर्ण बताया था। करण जोहर ने कहा था, “यह बहुत ही दुर्भावनापूर्ण और गलत खबर है। कई सारे समाचारों के लेख और क्लिपिंग्स बिना कारण ही मुझे, मेरे परिवार और धर्मा प्रोडक्शन को टारगेट कर रहे हैं। उनका नफरत फैलाना मकसद है।”

टाइम्स नाउ की रिपोर्ट के अनुसार, जुलाई 2019 में हुई इस पार्टी की फोरेंसिक रिपोर्ट नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) को सौंप दी गई थी। रिपोर्ट में बताया गया था कि यह वीडियो असली है और इसमें किसी भी तरह की एडिटिंग नहीं की गई है।रिपोर्ट में बताया गया था कि इस संदर्भ में एक मीटिंग भी की जाएगी जिसे SIT हेड केपीएस मल्होत्रा और मुंबई ज़ोन के डीडीजी अशोक जैन द्वारा लीड किया जाएगा। इसमें एनसीबी और डीजी से वार्तालाप के जरिए ये निर्णय लिया जाएगा कि मामले में अगला एक्शन क्या होगा।

खासतौर से करण जौहर के बारे में कहा जाता है कि वह ऐसे बॉलीवुड फिल्म निर्माता और निर्देशक हैं। जो अपने घर पर अक्सर बड़ी पार्टियों का आयोजन करते हैं। इसमें बॉलीवुड के कई कलाकार अक्सर नजर आते हैं। अब करण की पार्टियों पर एनसीबी की भी नजर है और उन पर लगातार शिकंजा कसता जा रहा है। करण जोहर को इसके पहले भी पूछताछ के लिए बुलाया गया था। इसके अलावा धर्मा प्रोडक्शन से जुड़े एक अधिकारी क्षितिज रवि प्रसाद को एनसीबी ने गिरफ्तार भी किया था। उनके घर पर छापे के दौरान मारिजुआना और कुछ मात्रा में गाँजा आदि बरामद किया गया था। 

गौरतलब है कि कुछ दिन पहले ही बॉलीवुड ड्रग्स माफियों पर खुलासा करते हुए कंगना रनौत ने भी अपने एक ट्वीट में रणवीर सिंह, रणबीर कपूर, अयान मुखर्जी और विकी कौशल से अनुरोध किया था कि वह ड्रग टेस्ट के लिए अपने ब्लड सैंपल दें, क्योंकि ऐसी अफवाहें है कि वह लोग कोकिन के आदी हैं। रिपोर्ट्स में यह भी बात सामने आई थी कि एनसीबी के अधिकारी ड्रग जाँच में कम से कम 25 प्रमुख बॉलीवुड सितारों को जल्द ही बुला सकते है। मशहूर हस्तियों में कुछ-बी-ग्रेड कलाकार भी शामिल हैं, जिन पर ड्रग्स लेने और खरीदने का आरोप लगाया गया था। NCB ने उसके बाद कई सितारों को पूछताछ के लिए समन भी भेजा था।

बंगाल में बुर्के वाली मतदाताओं की पहचान के लिए BJP का उप चुनाव आयुक्त को पत्र: उठाई महिला CPF कर्मियों की तैनाती की माँग

पश्चिम बंगाल में अगले साल (2021) होने वाले विधानसभा चुनावों के मद्देनजर भाजपा (BJP) ने उप चुनाव आयुक्त (Dy Election Commissioner) को पत्र लिखा है। इस पत्र में भाजपा की ओर से पोलिंग बूथों पर केंद्रीय पुलिस बल (CPF) की महिला कर्मियों की तैनाती के लिए माँग की गई है। 

पत्र में कहा गया है कि अल्पसंख्यक क्षेत्रों में महिला मतदाताएँ सामान्य तौर पर बुर्का पहनकर वोट देने आती हैं। ऐसे में उन्हें बूथ में प्रवेश की अनुमति देने से पहले उनकी पहचान कर पाना सीपीएफ जवानों के लिए संभव नहीं होता।

समाचार एजेंसी ANI द्वारा जारी पत्र के मुताबिक, 18 नवंबर 2020 को सार्वजनिक की गई वोटर लिस्ट की बाबत भाजपा ने पत्र में कहा कि राज्य में मतदाताओं की संख्या में बढ़ौतरी हुई है, खासकर उन इलाकों में जो बांग्लादेश सीमा के नजदीक हैं और जहाँ मुख्य रूप से अल्पसंख्यक वोटर्स हैं।

भाजपा ने कस्बा, सोनारपुर उत्तर, मेटियाब्रुज का जिक्र करके कहा कि इन विधानसभा क्षेत्रों में कोई टाउनशिप या सेटलमेंट न होने के बावजूद मतदाताओं में बढ़ौतरी हुई है। इसके अलावा उन्हें यह भी पता चला है कि मृत मतदाता या फिर ऐसे लोग जिन्होंने अपना आवास बदल लिया है, वो अब तक वोटर लिस्ट का हिस्सा हैं।

आगे पत्र में कहा गया कि अल्पसंख्यक (मुस्लिम) महिलाएँ आमतौर पर बुर्के में आती हैं। ऐसे में सीपीएफ जवानों के लिए उनकी पहचान सुनिश्चित कर पाना संभव नहीं होता। इसलिए पहले ही निवेदन है कि पर्याप्त मात्रा में सीपीएफ महिला कर्मियों को तैनात किया जाए।

उल्लेखनीय है कि चुनावों के दौरान बुर्का पहनकर पोलिंग बूथ पर मतदान करने वाली अल्पसंख्यक महिलाओं को लेकर सवाल पहली बार नहीं खड़ा किया गया। पिछले साल का मामला है जब पश्चिम उत्तर प्रदेश के अमरोहा में एक महिला अपनी ही मृत सौतन के बदले वोट डालने पोलिंग बूथ पहुँची थी। बाद में पकड़े जाने पर उसे महिला पुलिस थाने ले गईं थी और केस दर्ज किया था।

इस साल हैदराबाद में हुए नगर निगम के चुनावों के बीच भी बुर्का पहनकर वोट करने आ रही महिलाओं पर सवाल उठाए गए थे। साल 2018 में कर्नाटक के बेलगावी में भी बुर्का पहने महिलाओं के वोट डालने पर विवाद हुआ था। उससे पहले साल 2017 के यूपी चुनाव में भी भाजपा ने ऐसी गड़बड़ियों से बचने के लिए चुनाव आयोग से ऐसी गुजारिश की थी। उस समय भी पोलिंग बूथों पर महिलाकर्मियों की तैनाती के लिए माँग की गई थी ताकि बुर्के वाली महिलाओं की पहचान सुनिश्चिन हों।

बता दें कि बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले मतदान में निष्पक्षता की चिंता लिए राज्यसभा सांसद स्वपन दास गुप्ता के नेतृत्व में बीजेपी नेताओं का एक दल चुनाव आयोग पहुँचा था। इस दौरान चुनाव आयोग के अधिकारियों को निष्पक्ष चुनाव के लिए उन्होंने एक मांग पत्र सौंपा था। अपने पत्र में भाजपा ने कहा था कि राज्य की कानून व्यवस्था बहुत ज्यादा बिगड़ गई है, ऐसे में वहाँ पर जल्द आचार संहिता लागू होनी चाहिए और चुनाव से पहले ही केंद्रीय पुलिस बल (CPF) भी तैनात होने चाहिए।

किसानों से पीएम मोदी की खास अपील, कहा- कृषि मंत्री का लिखा पत्र जरूर पढ़ें

पिछले 22 दिनों से चले आ रहे किसान आंदोलन को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किसानों से एक खास अपील की है। किसान आंदोलन के बीच किसानों के नाम केंद्रीय कृषि मंत्री के लिखे खुले पत्र पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए लोगों से इसे पढ़ने का निवेदन किया है।

पीएम मोदी ने गुरुवार (17 दिसंबर, 2020) को ट्वीट कर लिखा, “कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने किसान भाई-बहनों को पत्र लिखकर अपनी भावनाएँ प्रकट की हैं। एक विनम्र संवाद करने का प्रयास किया है। सभी अन्नदाताओं से मेरा आग्रह है कि वे इसे जरूर पढ़ें। देशवासियों से भी आग्रह है कि वे इसे ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुँचाएँ।”

दरअसल, केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने किसानों के नाम कृषि कानूनों को लेकर एक ओपन लेटर लिखा है। उन्होंने ट्वीट कर लिखा, “सभी किसान भाइयों और बहनों से मेरा आग्रह! सबका साथ सबका विकास सबका विश्वास के मंत्र पर चलते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में हमारी सरकार ने बिना भेदभाव सभी का हित करने का प्रयास किया है। विगत 6 वर्षों का इतिहास इसका साक्षी है।”

कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने आज (17 दिसंबर, 2020) किसानों के नाम 8 पन्नों का पत्र लिख कर निवेदन किया है कि किसान ऐसे राजनीतिक दलों और तथाकथित बुद्धिजीवियों के बहकावे में न आएँ जिन्होंने सालों से किसानों को सुविधा रहित रखने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा दिया।

अपनी कृषि पृष्ठभूमि का हवाला देते हुए उन्होंने किसानों को बताया कि जिन तकलीफों से वह लोग गुजरतें है, उससे वह स्वयं भी भली भाँति वाकिफ हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे समय में जब झूठ की दीवार तैयार करके साजिशें रची जा रही हैं तो उनका दायित्व है वस्तुस्थिति को सामने रखा जाए।

कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कृषि कानून के ऊपर पर फैलाए जा रहे झूठ का उल्लेख करके उसकी सच्चाई बताई। उन्होंने ध्यान दिलवाया कि कैसे कोरोना के दौर में किसानों की भूमिका ने अर्थव्यवस्था को गति दी थी और MSP पर सरकारी खरीद के सारे रिकॉर्ड तोड़ा था। लेकिन बावजूद इसके विपक्ष इस पर झूठ फैला रहा है।

उन्होंने जानकारी दी कि सरकार ने किसानों के लिए ही 1 लाख करोड़ रुपए का कृषि इंफ्रास्ट्रक्चर बनाया है और अब किसानों के लिए ही वह ये कानून लाए हैं जिसके बाद किसान कहीं भी अपनी उपज बेचने के लिए आजाद होगा।

एक समय में स्वामीनाथन रिपोर्ट को 8 साल तक दबाए रखने वाली कॉन्ग्रेस, आजाद मंडी का माँग करने वाली AAP, कृषि सुधार की माँग करने वाले अकाली दल की मंशा पर उन्होंने सवाल उठाया।

उन्होंने बताया कि एक विचारधारा के लोग कैसे अलग-अलग मुद्दे पर समाज में असंतोष और अराजकता फैलाने का प्रयास करते रहे हैं और आज भी ये यही सब कर रहे हैं। आंदोलन के पीछे छिपकर रची जा रही साजिश पर गौर करवाते हुए वह किसानों से अपील करते हैं कि सब किसान इस विचारधारा की मंशा को पहचानें, जिसने 62 की लड़ाई में देश का साथ नहीं दिया था।

फिर झूठ फैलाते पकड़ी गईं प्रियंका गाँधी, पोल खुली तो डिलीट किया फेसबुक पोस्ट

कॉन्ग्रेस महासचिव प्रियंका गाँधी वाड्रा ने अपने उस फेसबुक पोस्ट को डिलीट कर दिया, जिसमें उन्होंने आरोप लगाया था कि मोदी सरकार ने भारतीय रेलवे को अडानी समूह के हाथों में सौंप दिया है। फेसबुक द्वारा पोस्ट को ‘भ्रामक’ सामग्री बताए जाने के बाद इसे डिलीट किया गया।

बता दें कि बीते दिनों प्रियंका गाँधी वाड्रा ने फेसबुक पर एक वीडियो डालकर किसान आंदोलन को भड़काने की कोशिश की थी। जिसको PIB Fact Check ने झूठा दावा करार दिया और प्रियंका गाँधी के पोस्ट के साथ उसे फर्जी बताया।

पीआईबी ने प्रियंका गाँधी के फेसबुक पोस्ट का स्क्रीनशॉट लेकर अपने ट्विटर अकाउंट पर दावे का खंडन किया। उन्होंने ट्वीट में लिखा, “फेसबुक पर एक वीडियो के साथ यह दावा किया जा रहा है कि सरकार ने भारतीय रेल पर एक निजी कंपनी का ठप्पा लगवा दिया है। यह दावा भ्रामक है। यह केवल एक वाणिज्यिक विज्ञापन है जिसका उद्देश्य केवल ‘गैर किराया राजस्व’ को बेहतर बनाना है।”

बता दें कि पिछले दिनों प्रियंका गाँधी ने फेसबुक पर वीडियो शेयर करते हुए लिखा था, “जिस भारतीय रेलवे को देश के करोड़ों लोगों ने अपनी मेहनत से बनाया। भाजपा सरकार ने उस पर अपने अरबपति मित्र अडानी का ठप्पा लगवा दिया। कल को धीरे-धीरे रेलवे का एक बड़ा हिस्सा मोदी के अरबपति मित्रों को चला जाएगा। देश के किसान खेती-किसानी को भी आज मोदी के अरबपति मित्रों के हाथ में जाने से रोकने की लड़ाई लड़ रहे हैं।”

प्रियंका ने ट्विटर पर भी एक वीडियो रीट्वीट किया था, जिसे गुजरात कॉन्ग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष हार्दिक पटेल ने शेयर किया था। इस वीडियो के साथ कमेंट में हार्दिक पटेल ने लिखा कि भारतीय रेल पर अडानी के फ़्रेश आटे का विज्ञापन देखने लायक़ है। अब तो दावे के साथ कह सकते है कि किसानों की लड़ाई सत्य के मार्ग पर है।

गौरतलब है कि कॉन्ग्रेस पार्टी द्वारा फर्जी खबर फैलाना आम बात हो गई है। यहाँ तक कि उनके पार्टी के वरिष्ठ नेता भी इस सूची में शामिल हैं, जो अक्सर अपनी राजनीति को चमकाने के लिए भ्रामक सूचनाओं और फर्जी खबरें फैलाने का सहारा लेते है। इस बार भी कुछ यही हुआ, मगर पोल खुलते ही पोस्ट डिलीट कर दिए गए।

डोडा में ‘भारत माता की जय’ बोलने के बाद अब महबूबा मुफ्ती के गढ़ में कश्मीरियों ने फहराया तिरंगा: देखें Video

जम्मू कश्मीर में डीडीसी चुनावों के दौरान आज (दिसंबर 17, 2020) एक बार फिर भाजपा प्रवक्ता शहनवाज हुसैन ने राज्य में राष्ट्रवाद का झंडा फहराया। उन्होंने बिजबेहरा में सैंकड़ों की भीड़ को संबोधित करते हुए तिरंगे के लिए नारे लगवाए और पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती को चुनौती दी।

उन्होंने भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ करते हुए कहा कि इसी उत्तर कश्मीर के इलाकों में दूसरी पार्टियों की छोटी रैलियों को बड़ा और भाजपा की बड़ी रैलियों को छोटा बताया गया।

उन्होंने कहा, “पूरा हिंदुस्तान इस बात का गवाह है कि साउथ कश्मीर के अनंतनाग में बिजबेहरा में महबूबा मुफ्ती कहती थीं कि भारत का तिरंगा उठाने वाला कोई नहीं मिलेगा। इसलिए मैं सैयद शाहनवाज हुसैन आज महबूबा मुफ्ती के बिजबेहरा में खड़े होकर ये तिरंगा फहराता हूँ।”

वीडियो में हम शहनवाज हुसैन को दोनों हाथ से तिरंगा फहराते देख सकते हैं। वहीं दूसरी वीडियो में हम सैंकड़ों की भीड़ को भाजपा के लिए नारे लगाते और हाथ में तिरंगा फहराते भी देख सकते हैं।

बता दें कि आज बिजबेहरा में शहनवाज हुसैन की इस बड़ी रैली के दौरान आतंकियों ने गुस्से में सुरक्षाकर्मियों के ऊपर ग्रेनेड से हमला किया। जिसकी जानकारी भाजपा प्रवक्ता ने अपने सोशल मीडिया अकॉउंट के जरिए दी।

उन्होंने लिखा, “आज बिजबेहरा में रैली के दौरान आतंकियों ने सीआरपीएफ के जवानों पर ग्रेनेड से हमला किया। हालाँकि, सब सुरक्षित हैं मगर इससे भाजपा कार्यकर्ताओं का उत्साह कम नहीं हो सकता।”

उन्होंने बताया कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया देख आतंकी घबराए हैं। उन्होंने बिजबेहरा और अवंतीपोरा में हमला किया। लेकिन अब कश्मीरी प्रधानमंत्री जी की विकासात्मक नीतियों के साथ होने का मन बना चुके हैं। उन्होंने यह भी जानकारी दी कि ये रैली सफल रही और सैंकड़ों की तादाद में कश्मीरी वहाँ आए।

उल्लेखनीय है कि महबूबा मुफ्ती के होमटाउन से आई भाजपा के रैली की ये तस्वीरें सोशल मीडिया पर बहुत तेजी से शेयर हो रही हैं। कई लोग शहनवाज हुसैन को आभार व्यक्त कर रहे हैं और उनकी तारीफ कर रहे हैं।

भाजपा नेता कपिल मिश्रा वीडियो शेयर करते हुए कहते हैं, “वाह शहनवाज जी। महबूबा मुफ्ती कहती थी कि कश्मीर में भारत का तिरंगा कोई उठाने वाला नहीं मिलेगामुफ़्ती और अब्दुल्लाओं के गढ़ में डंके की चोट पर तिरंगा लहराने वाले भारत के वीरों को नमन।”

याद दिला दें कि इससे पहले सोशल मीडिया पर डोडा से एक वीडियो सामने आई थी। ये वीडियो डोडा जिले के कारी घाटी की थी। इस वीडियो में स्थानीय लोग जोर-जोर से भारत माता की जय के नारे लगाते नजर आ रहे थे।

इस वीडियो को भाजपा प्रवक्ता सैयद शहनवाज हुसैन ने अपने ट्विटर पर शेयर किया। था उन्होंने लिखा था,

डोडा जिले की कारा घाटी… यहाँ की आवाम ने पहले आतंक का सिर कुचला और अब उनके दिलों से आ रही है मुल्क से मोहब्बत की गूँज। आप भी सुनिए… कारा घाटी में गूँजती ‘भारत माता की जय’!

दलित और सिख उनके लिए हथियार भी, शिकार भी

एक नारा है- जय भीम-जय मीम। इस नारे का अब तक का सफर विश्वासघातों से ही भरा है। ऐसे मौकों की फेहरिस्त काफी लंबी है, जब फायदे के लिए दलितों का पहले इस्तेमाल करने वालों ने ही बाद में मजहब के नाम पर उनका नरसंहार किया। ऐसा ही कुछ सिखों के साथ भी हर दौर में होता आया है।

इतिहास उन असंख्य अत्याचार, अनगिनत यातनाओं और बर्बरतापूर्ण तरीकों से भरा पड़ा है जिनका इस्तेमाल कर इस्लामी शासकों ने सिखों का खून बहाया। मसलन;

  • ​30 मई 1606 को सिखों के पाँचवे गुरु अर्जन देव जी को गर्म तवे पर बैठाकर ऊपर से खौलता तेल और गरम रेत डाली गई। फफोले पड़ने के बाद उनके शरीर को रावी नदी में बहा दिया गया।
  • केश कटवाने से इनकार करने पर 01 जुलाई 1745 को भाई तारू सिंह के सिर से खोपड़ी को ही अलग कर दिया गया।
  • इस्लाम कबूल नहीं करने पर 09 नवम्बर 1675 को गुरु तेग बहादुर के शिष्य भाई मतिदास के हाथों को दो खंभों से बाँधकर चीर दिया गया।
  • 09 नवम्बर 1675 को ही एक बड़ी देग में पानी डालकर उसमें भाई दयालदास को बिठाया गया और फिर देग का मुँह बंद कर नीचे से आग लगा दी गई। पानी को तब तक उबाला गया, जब तक उनकी मृत्यु नहीं हो गई।
  • 10 नवम्बर 1675 को भाई मतिदास के बड़े भाई सतीदास को रूई में लपेटकर जलाया गया।
  • गुरु गोविन्द सिंह के शिष्य भाई मोतीराम मेहरा को परिवार सहित, जिसमें छोटे-छोटे बच्चे भी शामिल थे, गन्ने पेरनेवाले कोल्हू में निचोड़कर मारा गया।
  • 12 दिसम्बर 1705 को गुरु गोविन्द सिंह के दो साहिबजादों, फतेह सिंह एवं जोरावर सिंह को दीवार में जीवित ही चुनवा दिया गया।
  • 09 जून 1716 को गुरु गोविन्द सिंह के सेनापति बाबा बन्दा सिंह बहादुर के पूरे शरीर की खाल गरम लोहे के चिमटों से उतार दी गई। खाल उतारते समय उनके सामने ही उनके मासूम बच्चे को काटकर उसका कलेजा बन्दा सिंह बहादुर के मुंह में ठूॅंसा गया। आखिर में उन्हें हाथी के पाँव तले कुचलवा दिया गया।
  • भाई सुबेग सिंह को लौहचक्रों में बाँधकर कील से पूरे शरीर को छेद दिया गया।

यहाँ तक कि सिखों के हौसलों को तोड़ने के लिए छोटे-छोटे बच्चों के टुकड़े किए गए और आसमान में उछालकर भालों से उन्हें गोद दिया गया। आप कह सकते हैं कि ये बीते कल की बातें है। फिर मेरी नजरों के सामने विभाजन के समय की वे कहानियाँ तैरने लगती हैं जिनमें सिख और हिंदू औरतों के स्तन तक काट दिए गए। गुजराँवाला के वे बाप बलवंत याद आ जाते हैं जिन्होंने अपनी सात बेटियों को ‘अल्लाह हू अकबर’ और ‘ला इलाहा इल्लल्लाह’ का शोर करती उस भीड़ से बचाने के लिए एक-एक कर काटकर कुएँ में फेक दिया था। यह सब उस दौर में गुजराँवाला में हुआ जब जाट, गुज्जरों और राजपूत मुसलमानों का यह शहर सब ‘अव्वल अल्लाह नूर उपाया’ गाता था। हर कोई बाबा बुल्ले शाह और बाबा फरीद की कविताएँ पढ़ता था। सूफी मजारों पर जाते थे।

यह किसी एक गुजराँवाला, किसी एक बलवंत या फिर किसी एक प्रभावती की कहानी नहीं है। उस समय नए बने पाकिस्तान के हर शहर की मस्जिद से एक भीड़ निकलती और उनके जुबान पर यही नारे होते;

  • पाकिस्तान का मतलब क्या, ला इलाहा इल्लल्लाह
  • हंस के लित्ता पाकिस्तान, खून नाल लेवेंगे हिंदुस्तान
  • कारों, काटना असी दिखावेंगे
  • किसी मंदिर विच घंटी नहीं बजेगी हून
  • हिंदू दी जनानी बिस्तर विच, ते आदमी श्मशान विच

आप इसे भी विभाजन का उन्माद बताकर खारिज कर दीजिए। पर 1990 के कश्मीर में क्या हुआ था? शुरुआत में सिख-मुस्लिम भाईचारे की आड़ में इस्लामी कट्टरपंथियों ने पहले कश्मीरी पंडितों को निशाना बनाया। नारा बुलंद किया- हमें पाकिस्तान चाहिए। पंडितों के बगैर, पर उनकी औरतों के साथ। फिर उन्हीं आतंकियों ने छत्तीसिंहपुरा जैसे नरसंहार को अंजाम दिया। अनंतनाग जिले का छत्तीसिंहपुरा सिखों का गाँव था। 200 सिख परिवारों के इस गाँव में 20 मार्च 2000 की रात सिख लोगों को घरों से बाहर निकाला गया। फिर उन्हें भून दिया गया। पलक झपकते ही 35 लाशों का ढेर लग गया। गोली चलाने वालों में एक मोहम्मद याकूब भी था। बगल के ही गाँव का। जिसे मरने वाले सिख ‘चट्टिया’ नाम से जानते भी थे और अपना मानते भी थे।

लेकिन, आप भी लिबरल बड़े वाले हैं। सो कहेंगे कि अब तो 2020 है। वक्त बदल गया है। फिर मुझे याद आने लगता है 2020 में ही सीएए विरोध के नाम पर शाहीनबाग में हुआ एक जमावड़ा जिसकी परिणति उत्तर-पूर्वी दिल्ली के हिंदू विरोधी दंगों के तौर पर हुई। तब भी भाईचारे के नाम पर लंगर लगे थे।

इसलिए आज जब कृषि कानूनों के विरोध के नाम पर दिल्ली की सीमाओं पर जमावड़ा लगा है। आपके पास ऐसी खबरें आ रही हैं: मुस्लिमों ने अदा की नमाज, प्रोटेक्शन में खड़े दिखे सिख या फिर ये स्वर सुनाई पड़ते हैं आज सिख किसान सड़क पर हैं, आधा पंजाब सड़क पर है, तो लंगर की जिम्मेदारी मुसलमानों की है… तो इस भाईचारे पर लहोलोहाट मत होइए।

असल में यह सावधान होने का वक्त है। क्योंकि इतिहास के पाठ हमारे सामने हैं। उनके आज के कारनामे भी। याद करिए कैसे मजहब के नाम पर अफगानिस्तान से सिखों का सफाया किया गया। कैसे पाकिस्तान में हिन्दू और सिख गिनती के बचे हैं। कैसे किसान आंदोलन के बीच ही लाहौर में महाराजा रणजीत सिंह की प्रतिमा क्षतिग्रस्त कर दी गई। कैसे सीएए विरोध के नाम पर आपके देश के कई शहरों को हिंसा में झोंक दिया गया। सीरिया से लेकर फ्रांस तक वे कैसे मजहब के नाम पर आज भी गला रेत रहे हैं।

यह खतरा तब और बड़ा हो जाता है जब कथित किसान आंदोलन में खालिस्तानियों, इस्लामी कट्टरपंथियों और अतिवादी वामपंथियों की घुसपैठ को लेकर लगातार खबरें भी आ रही हैं। आपकी जिंदगी केवल इन्हीं ताकतों के लिए ही सस्ती नहीं है, बल्कि इनके सियासी सरपरस्तों को भी आपकी फिक्र नहीं है। यही कारण है कि जब नामशूद्रों का वामपंथी संहार कर रहे थे तो कॉन्ग्रेस भी चुप बैठी थी।

1979 के इस नरसंहार को लेकर पत्रकार दीप हालदार ने अपनी किताब ‘द ब्लड आइलैंड’ में एक प्रत्यक्षदर्शी के हवाले से कहा है, “14-16 मई के बीच आजाद भारत में मानवाधिकारों का का सबसे खौफनाक उल्लंघन किया गया। पश्चिम बंगाल की सरकार ने जबरन 10 हजार से ज्यादा लोगों को द्वीप से खदेड़ दिया। बलात्कार, हत्याएँ और यहॉं तक की जहर देकर लोगों को मारा गया। समंदर में लाशें दफन कर दी गईं। कम से कम 7000 हजार मर्द, महिलाएँ और बच्चे मारे गए।” इसी नरसंहार को लेकर दलित लेखक मनोरंजन व्यापारी ने कहा था कि यह एक ऐसा नरसंहार है, जिसने सुंदरबन के बाघों को आदमखोर बना दिया।

इसलिए, यह वक़्त है इतिहास से सबक लेते हुए इन मजहबी आदमखोरों के छिपे एजेंडे को बेनकाब करने का। वरना आज लंगर में भाईचारा दिखा रही यही कट्टरपंथी ताकतें कल फिर अपना एजेंडा पूरा होते ही मारने-काटने से भी गुरेज नहीं करेंगे।

CM हेमंत सोरेन पर लगे रेप के आरोपों का NCW ने लिया संज्ञान: मुंबई DGP से माँगा अब तक लिए एक्शन का ब्योरा

राष्ट्रीय महिला आयोग ने हेमंत सोरेन पर लगाए गए दुष्कर्म के आरोप के मामले में संज्ञान लिया है। आयोग ने गुरुवार (17 दिसंबर, 2020) को कहा कि मीडिया रिपोर्ट में इसकी विस्‍तृत जानकारी दी गई है कि किस तरह झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) के नेता ने मॉडल के साथ न सिर्फ दुष्‍कर्म किया, बल्कि इस अपराध को लेकर मुँह न खोलने की धमकी भी दी। इस मामले में आयोग ने महाराष्ट्र के डीजीपी से रिपोर्ट माँगी है।

राष्ट्रीय महिला आयोग की चेयरपर्सन रेखा शर्मा ने मॉडल से कथित तौर पर रेप मामले में संज्ञान लेते हुए महाराष्ट्र के पुलिस महानिदेशक को चिट्ठी लिखी है। DGP को लिखे पत्र में उन्होंने महाराष्ट्र पुलिस से सात साल में अब तक की गई कार्रवाई के पूरे ब्योरे की रिपोर्ट माँगी है।

ट्विटर पर साझा की गई जानकारी के अनुसार, आयोग ने कहा, “हमें मुंबई की एक मॉडल द्वारा हेमंत सोरेन पर रेप के आरोप की खबरें मीडिया रिपोर्ट्स में पढ़ने को मिली हैं। मॉडल ने आरोप लगाया है कि 2013 में हेमंत सोरेन और सुरेश नागरे नाम के व्यक्ति द्वारा न सिर्फ उसका रेप किया गया बल्कि उसे और उसके परिवार को लगातार धमकियाँ दी गई। मॉडल से कहा गया कि अगर उसने रेप की घटना सार्वजनिक की तो परिणाम भुगतने होंगे।”

स्टेटमेंट में आगे कहा गया है, “ऐसी रिपोर्ट्स हैं कि पीड़ित मॉडल का एक कथित लेटर सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। इस लेटर में सात साल पहले की सारी घटनाओं का जिक्र है।”

गौरतलब है कि सोशल मीडिया पर एक पत्र वायरल हो रहा है। पत्र में झारखण्ड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन पर बलात्कार के आरोप लगाए गए हैं। साथ ही ‘Justice For Natasha (बदला हुआ नाम)’ भी ट्रेंड हो रहा है। शेयर किए गए पत्र में पीड़िता ने लिखा है कि वो 2013 में अभिनेत्री बनने का ख्वाब लिए बॉलीवुड में एंट्री करना चाहती थी, तभी उसकी दोस्ती सुरेश नागरे नामक व्यक्ति से हुई।

पत्र के अनुसार, “बातचीत और व्यवहार के हिसाब से सुरेश नागरे एक अच्छा व्यक्ति प्रतीत होता था। एक कॉमन दोस्त के जरिए हमारी मुलाकात हुई थी। उसके बाद कुछ अन्य कार्यक्रमों और पार्टियों में हम मिले। उसने मुझे फिल्म क्षेत्र में करियर बनाने के लिए मेरा समर्थन किया और मुझे ऐसे ही कई युवाओं से मिलवाया, जो बॉलीवुड में नाम कमाना चाहते थे। वो ऐसा दिखाता था, जैसे उसके बड़े लोगों से अच्छे संपर्क हों।”

इस पत्र में, जिसे पीड़िता का बताया जा रहा है, आगे दावा किया गया है कि सितम्बर 5, 2013 को सुरेश ने उसे बांद्रा वेस्ट स्थित होटल ताज लैंड्स में ये कह कर बुलाया कि वो कुछ प्रभावशाली लोगों से मिलवाएगा, लेकिन जब वो वहाँ पहुँचीं तो 3 ही लोग थे। दावा किया गया है कि इनमें से एक झारखण्ड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन थे और वहीं पीड़िता के साथ बलात्कार हुआ। बता दें कि जुलाई 2013 से दिसंबर 2014 के बीच भी हेमंत मुख्यमंत्री थे, जिसके बाद वो राज्य में नेता प्रतिपक्ष बने।

पत्र में पीड़िता ने कहा कि जब वो पुलिस के पास शिकायत दर्ज कराने गई तो वहाँ भी उसे प्रताड़ित किया गया क्योंकि तब हेमंत सोरेन एक बड़े पद पर काबिज थे। उसने लिखा है कि सुरेश नागरे उसे फिर से हेमंत सोरेन के पास भेजने के लिए मैसेज कर रहा था, लेकिन वो नजरअंदाज करती रहीं। उसने बताया है कि इस मामले में बांद्रा पुलिस थाने में अक्टूबर 20, 2013 को आधा दर्जन से भी अधिक धाराओं के तहत शिकायत दर्ज कराई गई थी।

कृषि मंत्री का किसानों के नाम 8 पन्ने का खुला पत्र: विपक्षी बहकावे और साजिश की बताई सच्चाई, हर बिंदु पर रखी बात

किसान आंदोलन की आड़ में विपक्षी दलों की राजनीति देख कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने आज किसानों के नाम 8 पन्नों का पत्र लिखा है। इस पत्र में उन्होंने निवेदन किया है कि किसान ऐसे राजनीतिक दलों और तथाकथित बुद्धिजीवियों के बहकावे में न आएँ जिन्होंने सालों से किसानों को सुविधा रहित रखने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा दिया।

पृष्ठ-1

अपनी कृषि पृष्ठभूमि का हवाला देते हुए उन्होंने किसानों को बताया कि जिन तकलीफों से वह लोग गुजरतें है, उससे वह स्वयं भी भली भाँति वाकिफ हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे समय में जब झूठ की दीवार तैयार करके साजिशें रची जा रही हैं तो उनका दायित्व है वस्तुस्थिति को सामने रखा जाए।

पृष्ठ-2

कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कृषि कानून के ऊपर पर फैलाए जा रहे झूठ का उल्लेख करके उसकी सच्चाई बताई। उन्होंने ध्यान दिलवाया कि कैसे कोरोना के दौर में किसानों की भूमिका ने अर्थव्यवस्था को गति दी थी और MSP पर सरकारी खरीद के सारे रिकॉर्ड तोड़ा था। लेकिन बावजूद इसके विपक्ष इस पर झूठ फैला रहा है।

पृष्ठ-3

तोमर ने किसानों के उत्थान को पीएम मोदी का प्रमुख उद्देश्य कहा। उन्होंने कहा कि उनकी सरकार 6 साल से किसानों के हित में काम कर रही है, जिसका फायदा छोटे किसानों तक को हो रहा है। विभिन्न योजनाओं का मकसद समझाते हुए वह कहते हैं देश इस लक्ष्य से आगे बढ़ रहा है कि अन्नदाता उर्जादाता बने।

पृष्ठ-4

उन्होंने जानकारी दी कि सरकार ने किसानों के लिए ही 1 लाख करोड़ रुपए का कृषि इंफ्रास्ट्रक्चर बनाया है और अब किसानों के लिए ही वह ये कानून लाए हैं जिसके बाद किसान कहीं भी अपनी उपज बेचने के लिए आजाद होगा।

पृष्ठ-5

केंद्रीय मंत्री ने इस पत्र में उन सभी मौकों और राजनीतिक पार्टियों की चर्चा की जब किसानों के हित का हवाला देकर ऐसे बदलावों का समर्थन किया। उन्होंने हर उस बिंदु की हकीकत बताई जिस पर झूठ फैलाया जा रहा है। राजनीतिक कुचक्र की पोल खोलते हुए अपने पत्र में तोमर ने बुद्धिजीवियों को लताड़ा और इनके राजनीतिक स्वार्थ की ओर गौर करवाया।

पृष्ठ-6

एक समय में स्वामीनाथन रिपोर्ट को 8 साल तक दबाए रखने वाली कॉन्ग्रेस, आजाद मंडी का माँग करने वाली AAP, कृषि सुधार की माँग करने वाले अकाली दल की मंशा पर उन्होंने सवाल उठाया।

पृष्ठ-7

उन्होंने बताया कि एक विचारधारा के लोग कैसे अलग-अलग मुद्दे पर समाज में असंतोष और अराजकता फैलाने का प्रयास करते रहे हैं और आज भी ये यही सब कर रहे हैं। आंदोलन के पीछे छिपकर रची जा रही साजिश पर गौर करवाते हुए वह किसानों से अपील करते हैं कि सब किसान इस विचारधारा की मंशा को पहचानें, जिसने 62 की लड़ाई में देश का साथ नहीं दिया था।

पृष्ठ-8

अपने पत्र में तोमर ने किसानों को आश्वस्त किया है कि उनकी सरकार हर तरह से किसानों को सुनने को तैयार है। उनका कहना है कि ये सुधार कानून कृषि के नए अध्याय की नींव बनेंगे और किसान इससे स्वतंत्र व सशक्त होंगे। वहीं हमारी कृषि समृद्ध और संपन्न होगी।

रायबरेली में कमला नेहरू ट्रस्ट की विवादित जमीन पर चला योगी सरकार का बुलडोजर: अवैध निर्माण ध्वस्त

उत्तर प्रदेश के रायबरेली के लखनऊ-प्रयागराज NH-30 स्थित सिविल लाइन चौराहा के बहुचर्चित करोड़ों की फर्जी कमला नेहरू ट्रस्ट नाम से दर्ज जमीन विवाद मामले को लेकर जिला प्रशासन ने अवैध रूप से कब्जा जमाए लोगों की दुकानों और मकान पर बुलडोजर चलावा दिया है। कथित तौर पर ट्रस्ट द्वारा भाजपा नेता को जमीन बेचने के बाद यह मामला पहली बार उच्च न्यायालय में गया। क्योंकि जमीन का स्थानांतरण विवादित था।

जिसके बाद उच्च न्यायालय ने जिला प्रशासन के पक्ष में फैसला दिया और इसे नजूल भूमि घोषित कर दिया। बता दें नजूल भूमि मूल रूप से ऐसी भूमि होती है, जिसका कोई दावेदार नहीं है और इसे सरकार से संबंधित माना जाता है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, सरकारी जमीन पर फर्जी तरीके से कब्जा जमाए लोगों से जमीन को सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट ने खाली करवाने के आदेश कई महीने पहले ही दिए थे। अदालत के आदेशों के बाद, ज़िला प्रशासन ने ज़मीन का अतिक्रमण करने वाले लोगों को नोटिस दिया और फिर उनकी बिजली काटी गई, लेकिन उसके बाद भी जमीन खाली नहीं नही हो पाई थी।

जिसके बाद बुधवार (16 दिसंबर, 2020) तड़के जिला प्रशासन ने जमीन पर सभी अवैध निर्माण को ध्वस्त करना शुरू कर दिया। कुछ लोगों ने पुलिस पर पथराव किया जिसके बाद पुलिस ने लाठीचार्ज का सहारा लिया लेकिन तोड़फोड़ जारी रही। इस दौरान कुछ गिरफ्तारियाँ भी की गई।

कमला नेहरू ट्रस्ट

कमला नेहरू ट्रस्ट चालीस साल पहले एक शैक्षिक समाज, स्कूल और अस्पताल बनाने के उद्देश्य से बनाया गया था। कमला नेहरू एजुकेशनल सोसाइटी की स्थापना 1976 में रायबरेली के सिविल लाइंस इलाके में सिधौली के रहने वाले कैलाश चंद्र द्वारा 1135 रुपए के वार्षिक किराए पर ली गई थी।

कथिततौर पर लड़कियों के लिए शिक्षा को बढ़ावा देने के उद्देश्य से सोसाइटी ने 30 साल के लिए जमीन को लीज पर ली थी। हालाँकि, जमीन पर कोई कार्य नहीं किया गया, कोई निर्माण नहीं हुआ और जमीन पर सैकड़ों लोगों द्वारा अवैध रूप से कब्जा कर लिया गया था। दिल्ली की पूर्व सीएम शीला दीक्षित के ससुर उमाशंकर दीक्षित, पूर्व पीएम इंदिरा गांधी के निजी सहायक यशपाल कपूर और पूर्व मंत्री शीला कौल, हाल ही में लखनऊ में जिनके घर प्रियंका गाँधी वाड्रा के रहने की व्यवस्था की गई थी, सहित सोसाइटी के सभी 8 सदस्यों का निधन हो चुका है।

जिसके बाद 2003 में एक नई समिति का गठन किया गया था। जिसमें कौल परिवार के सदस्य, पूर्व केंद्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद और वरिष्ठ वकील ललित भसीन शामिल थे। सोसाइटी ने 2003 में भूमि को एक फ्रीहोल्ड संपत्ति घोषित कर दिया और 2016 में इसे बेचने का फैसला किया। लगभग 6 महीने से जिला प्रशासन अदालत के आदेशों के अनुसार संपत्ति को खाली कराने का प्रयास कर रहा है, लेकिन लोगों ने भूमि को खाली करने से इनकार कर दिया था।

भाजपा नेता अदिति की भूमिका

उल्लेखनीय है कि पिछले महीने भाजपा नेता व पूर्व में रायबरेली से कॉन्ग्रेस की विधायक रही अदिति सिंह ने इकोनॉमिक ऑफिसर विंग (EOW) को पत्र लिखकर कमला नेहरू एजुकेशनल सोसायटी में कथित वित्तीय अनियमितताओं की जाँच की माँग की थी। सिंह ने आरोप लगाया था कि जिस उद्देश्य के लिए इसका गठन किया गया था वह समाज की सेवा नहीं था। उन्होंने कहा कि भूमि को फ्रीहोल्ड भूमि में परिवर्तित नहीं किया जाना चाहिए था क्योंकि 100 से अधिक दुकानें थीं जिनसे लगभग 600 लोगों की दैनिक रोजी रोटी चलती है।

जिसके मद्देनजर योगी सरकार ने नवंबर 2020 में कमला नेहरू ट्रस्ट के खिलाफ धोखाधड़ी के आरोपों की जाँच का आदेश दिया था।