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जी-20 शिखर सम्‍मेलन से पहले सऊदी अरब ने वापस लिया विवादित नोट: जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को बताया था अलग देश

21 नवंबर को जी-20 देशों का शिखर सम्‍मेलन शुरू हो रहा है। कोरोना काल में शुरू हो रहे इस शिखर सम्‍मेलन में पहली बार दुनिया के 20 देश एक वर्चुअल मंच पर शिरकत करने जा रहे हैं। वहीं हाल ही में रियाद के नोट पर भारत का गलत नक्शा छापने के चलते उठे विवाद की वजह से सऊदी अरब ने सम्मेलन से पहले गलत मैप वाले नोट को वापस ले लिया है। बता दें सऊदी अरब ने 20 रियाल बैंक में अविभाजित जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को अलग दिखाया गया था।

इंडिया टुडे की रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय राजदूत औसाफ सईद ने 28 अक्टूबर को सऊदी अरब के सामने रियाद में गलत मैप को लेकर आपत्ति जताई थी। साथ ही नोट में बदलाव करने के लिए भी कहा था। जिसके बाद न केवल नोट को वापस लिया गया, बल्कि उसकी छपाई बंद करवा दी गई।

गौरतलब है कि पूरा विवाद नोट के सार्वजनिक होने के बाद शुरू हुआ। इसमें पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके), गिलगित-बाल्टिस्तान समेत पूरे जम्मू-कश्मीर को अलग देश के रूप में दिखाया गया था, जोकि भारत के लिए बर्दाश्त से बाहर था। इस विवादित बैंक नोट में एक तरफ किंग सलमान और जी-20 सऊदी समिट का लोगो था, तो दूसरी तरफ जी-20 देशों का वैश्विक मैप था।

विदेश मंत्रालय (एमईए) के प्रवक्ता अनुराग श्रीवास्तव ने गुरुवार को कहा था, “हमने सऊदी अधिकारियों के साथ भारतीय सीमाओं के गलत चित्रण का मामला उठाया था। रियाद के साथ ही नई दिल्ली में भी सऊदी के अधिकारियों से बात हुई। हमें सऊदी अधिकारियों द्वारा सूचित किया गया है कि उन्होंने इस मामले में हमारी चिंताओं को नोट किया है।”

इंडिया टुडे की रिपोर्ट के अनुसार, बढ़ते विवाद को शांत करने के लिए सऊदी अरब ने मामले को संभालते हुए दोनों देशों के बीच के रिश्ते में खटास नहीं आने दी। साथ ही जो मुद्रा स्मारिका के तौर पर जारी की गई थी, संचलन के लिए नहीं थी, उसे वापस ले लिया गया।

उल्लेखनीय है कि सऊदी अरब पहली बार इस सम्‍मेलन की मेजबानी कर रहा है। 15वें जी-20 शिखर सम्‍मेलन के जरिए सऊदी अरब की निगाह विश्‍व की दूसरी उभरती आर्थिक शक्तियों के साथ अपने संबंधों को सुधारने पर होगी।

CBI ने दर्ज की शिया वक्फ़ बोर्ड के पूर्व चेयरमैन पर वसीम रिज़वी पर FIR: संपत्ति की खरीद-बिक्री में धोखाधड़ी का आरोप

सीबीआई ने उत्तर प्रदेश शिया वक्फ़ बोर्ड के पूर्व चेयरमैन वसीम रिज़वी के विरुद्ध दो एफ़आईआर दर्ज की है। दोनों एफ़आईआर वक्फ़ बोर्ड की संपत्ति को प्रयागराज और कानपुर में ग़ैरकानूनी रूप से बेचने, खरीदने और स्थानांतरित करने के संबंध में दर्ज की गई हैं। इन संपत्तियों की बिक्री, खरीद और स्थानांतरण को लेकर धोखाधड़ी के आरोप लगाए गए हैं। फ़िलहाल सीबीआई ने इस मामले में जाँच भी शुरू कर दी है। 

दरअसल, साल 2016 के अगस्त महीने के दौरान प्रयागराज में वक्फ़ बोर्ड की संपत्ति की बिक्री को लेकर एफ़आईआर दर्ज की गई थी। यह मामला इमामबाड़ा गुलाम हैदर में ग़ैरकानूनी दुकानों के निर्माण और अतिक्रमण को लेकर था। इसके अलावा साल 2017 के मार्च महीने के दौरान लखनऊ में कानपुर स्थित वक्फ़ बोर्ड की संपत्ति के स्थानांतरण को लेकर एफ़आईआर दर्ज की गई थी। 

यह मामला कानपुर स्थित स्वरूप नगर की ज़मीन पर कब्ज़ा करने को लेकर था। सीबीआई ने प्रयागराज और लखनऊ में दर्ज मामलों में आधार बनाते हुए उत्तर प्रदेश शिया वक्फ़ बोर्ड के पूर्व चेयरमैन के विरुद्ध एफ़आईआर दर्ज की है। इसमें स्पष्ट तौर पर आरोप लगाया गया है कि वसीम रिज़वी ने चेयरमैन रहते हुए वक्फ़ बोर्ड की संपत्तियों की खरीद और बिक्री में धोखाधड़ी की है। 

लखनऊ में दर्ज किए गए मामले में वक्फ़ बोर्ड के दो अधिकारियों समेत 5 अन्य को नामजद किया गया है। शिया वक्फ़ बोर्ड की संपत्तियों में अनियमितता की बात सामने आने के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने इन मामलों में जाँच के आदेश जारी किए थे। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ स्थित सीबीआई की भ्रष्टाचार रोधी शाखा ने भारतीय दंड संहिता की धारा 409, 420 और 506 के तहत एफ़आईआर दर्ज की है। वसीम रिज़वी के अलावा वक्फ़ बोर्ड प्रशासनिक अधिकारी गुलाम सैयदन रिज़वी, वक्फ़ बोर्ड के इंस्पेक्टर वाकर रज़ा, नरेश कृष्ण सोमानी और विजय कृष्ण सोमानी को भी नामजद किया गया है। 

इसके पहले वसीम रिज़वी समेत दो अन्य पर उत्तर प्रदेश के ही बिजनौर स्थित जोगीपुरा श्राइन के केयरटेकर को धमकाने और उससे जबरन वसूली करने के आरोप में मामला दर्ज किया गया था। एडिशनल न्यायिक मजिस्ट्रेट की तरफ से आदेश जारी होने के बाद इस संबंध में एफ़आईआर दर्ज की गई थी। इस मामले में शिकायतकर्ता सैयद कैसर बाकरी का कहना था कि 2018 में शिया वक्फ़ बोर्ड का चेयरमैन रहते हुए वसीम रिज़वी ने उन्हें श्राइन का एडमिनिस्ट्रेटर नियुक्त किया था। 

नियुक्ति के बाद वसीम रिज़वी और उनके सहयोगी रुपए की माँग करने लगे। बाकरी ने आरोप लगाया कि श्राइन में हर साल लाखों करोड़ों रुपए का आर्थिक सहयोग दिया जाता है लेकिन इसमें से एक बड़ी धनराशि वसीम रिज़वी के खाते में जाती थी। बाकरी का यहाँ तक कहना था कि साल 2019 के जून महीने में वसीम रिज़वी ने धमकी दी कि उन्हें 10 लाख रुपए नहीं मिले तो उन्हें उठवा लिया जाएगा।    

‘जय श्री राम बोलना है तो गुजरात चले जाओ, पश्चिम बंगाल में यह सब नहीं चलेगा’: TMC नेता का वीडियो वायरल

बीजेपी बंगाल ने अपने आधिकारिक ट्विटर हैंडल से एक वीडियो साझा किया है। इस वीडियो में तृणमूल कॉन्ग्रेस के एक नेता (जैसा कि बीजेपी बंगाल द्वारा दावा किया गया है) को लोगों को धमकाते हुए सुना जा सकता है। कथिततौर पर टीएमसी नेता लोगों से कहते है कि अगर वह बंगाल में रहना चाहते है तो वे ‘जय श्री राम’ के नारे नहीं लगा सकते हैं।

वीडियो में देखा जा सकता है कि टीएमसी नेता स्पष्ट रूप से लोगों को किसी तरह की सभा में संबोधित कर रहे थे। इसी दौरान उन्होंने कहा कि टीएमसी शासित राज्य में ‘जय श्री राम’ का नारा लगाने की अनुमति नहीं दी जाएगी। साथ ही यह भी कहा कि अगर जिसको भी ‘जय श्री राम’ का जाप करना है तो वह गुजरात जा सकता है।

वीडियो में बंगाली में एक उग्र भाषण में नेता ने कहा कि राज्य में जय श्री राम बोलने की अनुमति नहीं है। उन्होंने कहा, “इन सब चीजों को यहाँ अनुमति नहीं दी जाएगी। जो लोग इसका जाप करना चाहते हैं वे मोदी के राज्य गुजरात में जाकर ये कर सकते हैं।” हालाँकि, यह वीडियो कब का है इस बारे में कुछ नहीं गया है।

गौरतलब है कि जय श्री राम के लिए तृणमूल कॉन्ग्रेस पार्टी की नफरत कोई आज की बात नहीं है। पिछले साल खुद सीएम ममता बनर्जी ने ‘जय श्री राम’ के नारे को लेकर खुले तौर पर अपनी नापसंदगी व्यक्त की थी। पिछले साल 2019 मई में ममता बनर्जी ने उस समय अपना संयम खो दिया था, जब कुछ लोग सड़क पर जय श्री राम के नारे लगा रहे थे। नारा सुनकर वह अपनी गाड़ी से नीचे उतरी और लोगों से भिड़ गई।

घटना के बाद सीएम ने आरोप लगाया था कि नारे लगा रहे लोग अपराधी थे, और उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। इसके बाद पश्चिम बंगाल सीएम के सामने सिर्फ नारा लगाने के लिए लगभग एक दर्जन लोगों को गिरफ्तार किया गया था।

उल्लेखनीय है कि टीएमसी प्रतिद्वंद्वी राजनीतिक विचारधाराओं के प्रति असहिष्णु होने के लिए कुख्यात है। वहीं बीते दिन (19 नवंबर, 2020) पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना जिले में मोहनपुर ग्राम पंचायत के बबनपुर क्षेत्र में स्थित भाजपा के एक कार्यालय को कथित रूप से टीएमसी कार्यकर्ताओं ने आग लगा दी। भाजपा कार्यकर्ताओं ने कार्यालय को जलाने के लिए टीएमसी को जिम्मेदार ठहराया और इसे उनके ‘सस्ते हथकंडे करार दिया।

तुफानगंज इलाके में कल ही एक भाजपा कार्यकर्ता की पीट-पीटकर हत्या कर दी गई थी। मृतक बीजेपी नेता के परिवार वालों ने टीएमसी के गुंडों पर हत्या का आरोप लगाया था। परिवार ने पुलिस को दी शिकायत में पाँच टीएमसी कार्यकर्ताओं का नाम लिया था। परिवार वालों का आरोप है कि पाँचों टीएमसी कार्यकर्ताओं ने बेरहमी से बीजेपी नेता की पिटाई की, जिससे उन्हें गंभीर चोटें आई। जब इलाज के लिए उन्हें हॉस्पिटल ले जाया गया तो डॉक्टरों ने मृत घोषित कर दिया।

बता दें पश्चिम बंगाल में 2021 चुनावों से पहले राजनीतिक हिंसा की घटनाएँ लगातार बढ़ रही हैं। पश्चिम बंगाल में भाजपा कार्यकर्ता अक्सर निशाना बनते रहे हैं और उनके साथ मारपीट, अपहरण व हत्या की कई खबरें आए दिन सामने आ रही हैं।

यूट्यूबर राशिद ने सुशांत की मौत पर फ़ेक दावे कर कमाए 15 लाख: अक्षय कुमार ने किया 500 करोड़ का मुकदमा, जानिए क्या है मामला

बिहार मूल के यूट्यूबर राशिद सिद्दीकी ने पिछले 4 महीनों में सुशांत सिंह राजपूत की मृत्यु के मामले में फ़ेक न्यूज़ का फैलाकर कथित तौर पर 15 लाख रुपए कमाए हैं। वहीं बॉलीवुड अभिनेता अक्षय कुमार ने अपने बारे में झूठे दावों के कारण उस पर 500 करोड़ रुपए का मानहानि का मुकदमा दर्ज कराया है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ 25 वर्षीय राशिद सिद्दीकी सिविल इंजिनियर है और उसका अपना यूट्यूब चैनल है जिस पर लगभग 3 लाख 70 हज़ार सब्सक्राइबर्स हैं। 

राशिद के यूट्यूब चैनल पर इस तरह के तमाम कंटेंट मौजूद हैं जो संदेह के दायरे में आते हैं। जिसमें उसने एक दावा यह भी किया है कि अक्षय कुमार ने सुशांत सिंह राजपूत की गर्लफ्रेंड रिया चक्रवर्ती की कनाडा भागने में मदद की। राशिद अक्सर अन्य यूट्यूब क्रिएटर्स से भी संवाद करता है लेकिन सबसे ज़्यादा हैरानी की बात है कि उसने सुशांत सिंह की मृत्यु को लेकर अप्रत्याशित और विचित्र दावे किए हैं। 

मिड डे में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक़ सुशांत सिंह की मौत ने देश के तमाम यूट्यूब चैनल वालों को फर्ज़ी थ्योरी बना कर इस मुद्दे के सहारे रुपए कमाने का मौक़ा दिया है। अक्षय कुमार के लिए उसने दावा किया था कि महेंद्र सिंह धोनी की बायोपिक में सुशांत सिंह की अहम भूमिका होने के चलते अक्षय कुमार नाराज़ थे। इसके बाद फ़ेक न्यूज़ फैलाते हुए राशिद ने यह भी दावा किया कि सुशांत सिंह की मृत्यु के मामले में अक्षय कुमार मुंबई पुलिस और आदित्य ठाकरे के साथ खुफ़िया बैठक करते थे। अंत में अक्षय कुमार ने रिया चक्रवर्ती की कनाडा भागने में मदद भी की। 

अक्षय कुमार के अलावा शिवसेना लीगल सेल के अधिवक्ता धर्मेन्द्र मिश्रा ने भी राशिद सिद्दीकी के विरुद्ध मुकदमा दर्ज कराया है। मानहानि, सार्वजनिक रूप से षड्यंत्र और इरादतन अपमान करने की धाराओं के अंतर्गत मामला दर्ज कर लिया गया है। इसके बाद न्यायालय ने उसे अग्रिम जमानत दी थी और मामले की सुनवाई के दौरान सहयोग करने का आदेश दिया था। पुलिस के मुताबिक़ सुशांत सिंह राजपूत पर उसके द्वारा काफी बड़े पैमाने पर पोस्ट सामग्री देखी गई थी और सिर्फ सितंबर महीने के भीतर ही उसने 6.5 लाख रुपए कमाए थे।

इसके पहले दिल्ली के अधिवक्ता विभोर आनंद को सुशांत सिंह राजपूत मामले में वीडियो बनाने और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे और आदित्य ठाकरे के लिए अपशब्द कहने पर गिरफ्तार किया गया था। बाद में उसने अपने ट्वीट के लिए रिपब्लिक भारत और अर्णब गोस्वामी पर आरोप लगाया था। जबकि पहले उसने दावा किया था कि सारी जानकारी उच्च स्तरीय सूत्रों के हवाले से मिली है लेकिन मामले की सुनवाई के दौरान उसने सारा आरोप रिपब्लिक टीवी और अर्णब गोस्वामी पर लगा दिया। 

सुशांत सिंह राजपूत की मृत्यु 

34 वर्षीय अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत 14 जून 2019 को अपने आवास पर मृत पाए गए थे। शुरू में इस घटना को आत्महत्या बताया गया था जबकि बाद में हत्या का पहलू भी सामने आया था। सुशांत सिंह की मृत्यु के बाद बॉलीवुड में फैले ड्रग्स नेटवर्क और ड्रग्स के इस्तेमाल से जुड़ी तमाम बातें सामने आई। फ़िलहाल अभी सीबीआई सुशांत सिंह राजपूत की मृत्यु और ड्रग्स दोनों मामलों पर जाँच कर रही है।    

धर्मराज, उनका दीवान और वो दीवार… त्रावणकोर में खोदी गई थी हिन्दुओं और ईसाइयों के नरसंहारक टीपू सुल्तान की ‘कब्र’

जैसे उत्तर भारत में मंदिरों के ध्वंस और हिन्दुओं पर अत्याचार करने के लिए मुग़ल कुख्यात रहे हैं, ठीक उसी तरह से दक्षिण भारत में टीपू सुल्तान ने किया था। मैसूर के सुल्तान हैदर अली का बेटा टीपू सुल्तान आज कट्टरपंथियों के एक बड़े वर्ग द्वारा ‘नायक’ के रूप में पूजा जाता है। लेकिन, दक्षिण भारत में कुछ ऐसे हिन्दू योद्धा भी थे, जिन्होंने उसे धूल चटाई। त्रावणकोर के धर्मराज राम वर्मा और राजा केशवदास पिल्लई उनमें से एक थे, जिन्होंने टीपू सुल्तान को नेदुमकोट्टा के दीवार के युद्ध (Battle Of Nedumkotta) में नाकों चने चबवाए।

धर्मराज की दूरदर्शिता और उस दीवार ने त्रावणकोर को बचा लिया

ये वो समय था, जब केरल को बाहरी खतरों का भान हो चला था और उसने एक दीवार बनवाई थी, ताकि उत्तर से आने वाले दुश्मनों से रक्षा की जा सके। ये चीन की दीवार की तरह बड़ा और विशाल तो नहीं था, लेकिन फिर भी इससे काम चल जाता था। इसी दीवार को वहाँ ‘नेदुमकोट्टा’ या फिर ‘Travancore Lines’ कहा जाता था। यहीं से मैसूर के टीपू सुल्तान ने केरल पर हमला किया। जब युद्ध का परिणाम उसके पक्ष में नहीं आया तो इसने इसे ‘घिनौनी दीवार’ बता दिया।

ये मैसूर के आक्रमण के दशकों पहले की बात है, जब त्रावणकोर के साम्राज्य को कालीकट से आक्रमण का भय रहता था और इसीलिए सुरक्षा के इंतजाम किए गए थे। सन 1759 में धर्मराज राम वर्मा को असली खतरे का आभास हुआ और उन्हें लगा कि अगर मैसूर मालाबार (उत्तरी केरल) पर आक्रमण कर के उस पर कब्ज़ा कर लेता है तो फिर त्रावणकोर के लिए समस्या खड़ी हो जाएगी। उस समय ओडेयर राजवंश (Wadiyar Dynasty) के नेतृत्व वाले मैसूर के सैन्य अभियानों का नेतृत्व हैदर अली ही किया करता था।

मैसूर की शक्ति दिनोंदिन बढ़ती ही जा रही थी। उसकी फ़ौज की खासियत ये थी कि वो अलग-अलग लोकेशन पर एक रणनीतिक मोर्चेबंदी के जरिए तैनात रहते थे और काफी चपल हुआ करते थे, जिनके आवागमन के बारे में विरोधियों को पता ही नहीं चल पाता था। धर्मराज राम वर्मा ने इस खतरे को भाँपा और उनका आकलन ये था कि एक दीवार बना कर मैसूर की सेना को रोका जा सकता है और राज्य की सुरक्षा हो सकती है।

उन्होंने अपने पड़ोसी राज्य कोचीन में इस दीवार को बनवाने का कार्य प्रारंभ करवाया। यूरोपियन इसे ही ‘त्रावणकोर लाइन्स’ कहा करते थे। राजा ने इसे बनवाने के समय सप्लाई और संसाधनों के मार्गों और स्रोतों का पूरा ध्यान रखा था, ताकि सेना और जनता कभी संकट में न पड़े। लगभग 48 किलोमीटर की ये दीवार 1764 में बन कर तैयार हुई, जो पश्चिमी समुद्री सीमाओं (अभी का कोच्चि) से घाटों तक फैली हुई थी।

ऐसा नहीं था कि त्रावणकोर ने कुछ बहुत नया सोच लिया और उस पर अमल किया। केरल में आज भी पहाड़ों और समुद्र के बीच एक अलग तरह का गैप है, जो प्राचीन काल से ही राज्य की रणनीतिक पोजीशन का हिस्सा रहा है। धर्मराज राम वर्मा ने इतिहास से ही सीख लेकर अपनी दूरदर्शिता का प्रदर्शन किया। यहाँ दुश्मन फ़ौज के पास पैंतरेबाजी के लिए जगह ही नहीं होती थी और वो दबा दिए जाते थे।

हिन्दू राजवंश को धोखा देकर सुल्तान बन बैठा था टीपू सुल्तान का अब्बू

मैसूर में इधर सत्ता के स्थानांतरण का खेल चल रहा था। हैदर अली ने ओडेयर राजवंश को धोखा दे दिया। एक हिन्दू राजवंश को एक इस्लामी आक्रांता को अपना सेनापति बनाना भारी पड़ा। जिस ओडेयर राजवंश ने उसे पाला, उसे ही धोखा देकर वो सुल्तान बन बैठा। उसके बाद उसके बेटे टीपू सुल्तान ने राज किया। लेकिन, समय का खेल देखिए कि आज टीपू सुल्तान का नामोंनिशान मिट गया है लेकिन ओडेयर राजवंश जिन्दा है।

टीपू सुल्तान की मौत के बाद ओडेयर राजवंश को फिर से स्थापित किया गया। ये अपनेआप को भगवान श्रीकृष्ण का वंशज मानते हैं और द्वारका से आए थे। अभी 28 वर्षीय यदुवीर कृष्णदत्त चामराजा ओडेयर इस राजवंश के मुखिया हैं और मैसूर के मानद महाराजा भी हैं। अमेरिका के MIT से अंग्रेजी साहित्य और अर्थशास्त्र में स्नातक कृष्णदत्त इस राजघराने के ‘कस्टडियन’ भी हैं। विजयनगर साम्राज्य के बाद इसी राजवंश ने श्रीरंगपट्टम की सुरक्षा की थी।

तो, हैदर अली ने धोखा देकर मैसूर की राजगद्दी हड़प ली और सुल्तान बन बैठा। मालाबार में तो वो पहले ही आक्रमण कर चुका था, इसीलिए उसे क्षेत्र का अच्छा अनुभव था। अबकी उसका लालच उसे फिर से केरल लेकर गया। उसका मंसूबा था कि वो पूरे केरल पर कब्ज़ा कर के मसालों के व्यापार और अंतरराष्ट्रीय करोबार पर नियंत्रण करे ही, साथ में केरल व उसके मंदिरों की सम्पत्तियों को भी हड़प ले।

वो लगातार आक्रमण करने लगा। 17 सालों के सैन्य अभियान के बाद, 1761-78 तक संघर्ष करने के बाद उसे मालाबार नसीब हुआ। इस दौरान प्रिंस फ़तेह अली टीपू भी उस क्षेत्र में अपने अब्बू के लिए सैन्य अभियान का नेतृत्व करता था। आखिरकार 1766 में कालीकट पर भी मैसूर का कब्ज़ा हो गया और इस तरह से एक और हिन्दू साम्राज्य का पतन हुआ। 117वें ज़मोरिन राजा ने अपने राज्य की ये हालत देख कर आत्महत्या कर ली।

कालीकट की वो दुर्दशा की गई कि वहाँ से लोग भागने लगे। मैसूर की सेना ने जैसे ही वहाँ कब्ज़ा जमाया, लोगों को एक ही उम्मीद नजर आई और वो था त्रावणकोर। शरणार्थियों की संख्या बढ़ गई। इस्लामी आक्रांता द्वारा कब्जाए प्रदेश से लाखों की संख्या में शरणार्थी त्रावणकोर पहुँचने लगे। हजारों लोग मार डाले गए। अब वो समय आ गया था, जब दीवार की परीक्षा होनी थी। उत्तरी सीमा से बड़ा खतरा केरल के भीतर जा पहुँचा था।

आगे बढ़ने से पहले इस दीवार की बात कर लेते हैं। इसे डच कमांडर ‘Eustachius De Lannoy’ ने बनाया था। उसे धर्मराज राम वर्मा के पूर्वजों ने 1741 में कोलचेल के युद्ध में हरा दिया था। लान्नोय इस दौरान त्रावणकोर में ही रहा और कमांडर की पदवी तक पहुँचा। वो एक अच्छा रणनीतिज्ञ था, जिसका फायदा त्रावणकोर को 40 फ़ीट ऊँची और 30 फ़ीट मोटी इस दीवार के रूप में मिला।

ये चीन नहीं, भारत की दीवार थी: त्रावणकोर में कैसे हारा टीपू सुल्तान

इस दीवार को क्ले, मिट्टी के घोल, लैटेराइट मृदा, पत्थर और ग्रेनाइट से बनाया गया था। आधुनिक बंदूकों और माइंस के खिलाफ बचाव के लिए ये कारगर था। साथ ही सुरक्षा बढ़ाने के लिए वहाँ खाई भी बनाई गई थी। खाई के पास कँटीले पेड़ लगाए थे और झाड़ियाँ बना दी गई थी। दीवार के पास अंडरग्राउंड टनल भी था। साथ में सेना के लिए जगह भी बनाई गई थी। अपनी सहूलियत और दुश्मन की परेशानी – इस उद्देश्य के लिए सारे काम किए गए थे।

1777 में दीवार बनाने वाले लान्नोय की मृत्यु हो गई और अब हैदर अली को लगा कि त्रावणकोर कमजोर हो गया है। उसने संधि के लिए धर्मराज राम वर्मा को प्रस्ताव भेजा और उन्हें झुकने को कहा। राजा इसके लिए तैयार नहीं हुए। डच और अंग्रेज, ये दोनों से ही उनके रिश्ते अच्छे थे और अंग्रेज तो टीपू सुल्तान के नंबर एक दुश्मन थे। हैदर अली वहाँ पहुँचता, उससे पहले ही मालाबार में विद्रोह हो गया और कर्नाटक में ही कई समस्याएँ खड़ी हो गईं।

उधर हैदर अली कर्नाटक के लिए निकला और वहाँ एक-एक कर कई क्षेत्र जीत लिए। अंग्रेजों को ये रास नहीं आया और इस तरह से दूसरा एंग्लो-मैसुर युद्ध शुरू हुआ। 1782 में पीठ में कार्बन्कले नामक बीमारी से हैदर अली की मृत्यु हो गई और उसका बेटा टीपू सुल्तान गद्दी पर बैठा। 2 साल बाद उसके और अंग्रेजों के बीच संधि तो हो गई लेकिन टीपू सुल्तान की नजर त्रावणकोर पर थी। त्रावणकोर भी जानता था कि खतरा अभी टला नहीं है।

वो समय 4 साल बाद आया, जब टीपू सुल्तान फिर से त्रावणकोर के लिए निकल गया। मालाबार के सारे अमीर लोग अपने धन के साथ त्रावणकोर भाग गए थे। वहाँ हुए विद्रोह को त्रावणकोर का समर्थन था, सो अलग। उसके अब्बू को किस तरह से त्रावणकोर जीतने से पहले ही भागना पड़ा था, ये बात उसके जेहन में बैठी हुई थी। इस्लामी आक्रांता टीपू सुल्तान अपमान की आग में जल रहा था। उसे बदला भी लेना था। उसकी नजर कारोबार और संपत्ति पर कब्जे पर भी थी।

उसने फिर से राजा को कूटनीति और धमकियों के जरिए झुकाने की कोशिश की, लेकिन राजा जब उसके अब्बू के सामने नहीं झुके तो बेटे के सामने ख़ाक झुकते। टीपू सुल्तान दीवार को अवैध बताता रहा, राजा नकारते रहे। अंततः झल्लाए टीपू सुल्तान ने आक्रमण कर दिया। वो 40,000 की फ़ौज के साथ बढ़ चला। त्रावणकोर की सेना कमजोर थी, उनकी संख्या ज्यादा नहीं थी। ये कोई कृष्णदेव राय का विजयनगर तो था नहीं, जिससे बाबर से लेकर हैदराबाद तक खौफ खाएँ।

त्रावणकोर के केशवदास: गरीबी में जन्मे, गरीबी में मरे, पर टीपू सुल्तान को सबक सिखाया

लेकिन, यहाँ एंट्री होती है एक ऐसे व्यक्ति की, जिसने दिखा दिया कि अगर नेतृत्व ठीक हो तो सीमित संसाधन के साथ भी कमाल किया जा सकता है। त्रावणकोर के दीवान राजा केशवदास (रमन केशव पिल्लई) का जन्म 1745 में एक गरीब परिवार में हुआ था और वो बचपन से ही कुशल रणनीतिकार थे। डच कमांडर लान्नोय के अंतर्गत उनकी प्रतिभा और निखरी। जब इसमें अनुभव का मिश्रण हुआ तो वो एक कुशल प्रशासक बन कर उभरे।

हजारों हिन्दुओं और ईसाईयों के शरणदाता राजा धर्मराज राम वर्मा की प्रतिष्ठा दाँव पर थी और उस महानायक के विश्वास को वो बनाए रखें, इसके लिए केशवदास ने भरसक प्रयास किया और सफल भी हुए। अंग्रेजों ने मदद के नाम पर एक छोटी सी टुकड़ी मद्रास से भेज दी थी। अब जो करना था, खुद करना था। उधर से टीपू सुल्तान खुद नेतृत्व कर रहा था, इसीलिए परीक्षा और भी बड़ी होने वाली थी।

खैर, मैसूर की सेना आगे बढ़ चली। उन्हें कोई रोक नहीं पाया और उन्होंने दीवार के एक बड़े हिस्से पर कब्ज़ा कर लिया। लेकिन, ये तो दिन की बात थी। अभी रात बाकी थी। जैसे ही रात हुई, न जाने कहाँ से त्रावणकोर के 20 योद्धा निकले और टीपू सुल्तान की सेना पर आग के गोले गिरने लगे, फायरिंग होने लगी। मैसूर की फ़ौज को अँधेरे में कुछ सूझता ही नहीं था। ऐसा लगता था, जैसे एक बड़ी विशाल सेना ने उन्हें घेर लिया है।

मैसूर की सेना में ऐसी अफरातफरी मची कि सब इधर-उधर भागने लगे। खुद टीपू सुल्तान के पाँव में जख्म हो आया और वो चलने की हालत में भी नहीं रहा। उसके सैनिक किसी तरह उसे लेकर भागे। रास्ते में उसकी तलवार, अंगूठी, पालकी, गहने और न जाने क्या-क्या छीन लिया गया। त्रावणकोर ने एक बड़े राज्य के योद्धा की ये हालत कर दी थी। टीपू सुल्तान लगातार अपमान मिलने के कारण अंदर से धधक उठा।

2 महीने बीते और वो फिर आ धमका। इस बार फ़ौज और बड़ी थी। बंदूकें और हथियार भी बड़े-बड़े थे। उसने दीवार के एक हिस्से को निशाना बनाना शुरू किया। केशवदास ने फिर से अंग्रेजों से मदद के लिए कहा। अंग्रेजों ने फिर धोखा दिया। मैसूर की सेना फिर बढ़ चली। दीवार का एक हिस्सा ध्वस्त हो गया। त्रावणकोर की सेना अबकी उसे रोक नहीं पाई और उसने पूरे दीवार के दुर्ग पर कब्ज़ा कर लिया।

भागती हुई त्रावणकोर की सेना पर फिर टीपू सुल्तान का कहर बरपा। लूटपाट और हत्याओं का दौर फिर से शुरू हो गया। पेरियार नदी तक खदेड़ते-खदेड़ते मैसूर की फ़ौज बढ़त में दिख रही थी। लेकिन, युद्ध अभी बाकी था। केशवदास ने ऐसा दिमाग लगाया कि टीपू का दिमाग हिल गया। बारिश का मौसम आने वाला था। ऐसे में पानी से बढ़िया हथियार क्या हो सकता था? केशवदास ने पेरियार नदी को ही युद्ध में उतार दिया।

नदी का एक बाँध कुछ इस तरह से खोल दिया गया कि विशाल पानी की धारा न सिर्फ टीपू सुल्तान की फ़ौज को ले डूबी, बल्कि उसके बारूद को भी बहा ले गई। टीपू इससे उबर पाता कि बारिश का मौसम शुरू हो गया। बेहाल फ़ौज में बीमारी फैली। एक-एक कर सब या तो कुछ करने की हालत में ही नहीं रहे, या फिर मारे गए। तभी मद्रास में एक नया गवर्नर आ गया। अंग्रेजों ने मैसूर पर ही हमला बोल दिया।

मराठे भी उसके खिलाफ हो गए थे। उसने त्रावणकोर की दीवार तो तोड़ दी थी, लेकिन अब वो कहीं का नहीं रहा था। टीपू सुल्तान इतना कमजोर हो गया था कि वो अब त्रावणकोर के लिए खतरा भी नहीं रहा। 1799 में अंग्रेजों से युद्ध के दौरान वो मारा भी गया। जिस तरह उसके अब्बू ने ओडेयर राजाओं को धोखा दिया था, टीपू के भी करीबियों ने उसे धोखा दिया। हालाँकि, इधर नए राजा ने केशवदास को भी निकाल दिया था। उसी काल में केशवदास की भी जहर के कारण मृत्यु हो गई।

लेकिन, त्रावणकोर का ये इतिहास अमर हो गया। राजा धर्मराज राम वर्मा और केशवदास पिल्लई ने जिस तरह से टीपू सुल्तान और उसके अब्बू का सामना किया, हिन्दुओं और ईसाईयों की सुरक्षा की, मसाला के कारोबार और मंदिरों की संपत्ति को बचाया, अपने लोगों की सुरक्षा के लिए दूरदर्शिता के साथ प्रबंध किए, उसने इतिहास रच दिया। अफ़सोस ये कि आज टीपू को नायक मानने वाले धर्मराज राम वर्मा और केशवदास पिल्लई को भुला बैठे हैं। धर्मराज, उनके दीवान, वो दीवार और टीपू सुल्तान के खिलाफ ये सफलता इतिहास में कहीं गुम है।

BJP नेता किरीट सोमैया ने अन्वय नाइक और उद्धव परिवार के बीच हुए भूमि लेनदेन मामले में माँगा स्पष्टीकरण, जारी किए दस्तावेज

भाजपा नेता किरीट सोमैया ने गुरुवार (19 नवम्बर, 2020) को महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के परिवार का स्वर्गीय अन्वय नाइक के परिवार के साथ हुए भूमि के लेन-देन में कथित अनियमितताओं को लेकर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री से स्पष्टीकरण माँगते हुए कई अन्य दस्तावेज सबूत के तौर पर जारी किए है। वहीं एक हफ्ते पहले भी सोमैया ने भूमि लेनदेन को लेकर महाराष्ट्र सरकार पर कई आरोप लगाए थे।

बता दें रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क के एडिटर इन चीफ अर्णब गोस्वामी को मुंबई के इंटीरियर डिजाइनर अन्वय और उनकी माँ को कथित तौर पर आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप में 4 नवंबर बुधवार को पुलिस ने बिना किसी सूचना के गिरफ्तार कर लिया था। यह मामला 2 साल पुराना था, जो कोर्ट द्वारा पहले ही बंद कर दिया गया था।

भाजपा के पूर्व सांसद किरीट सोमैया ने गुरुवार को उद्धव ठाकरे और उनके बेटे आदित्य ठाकरे से दोनों परिवारों के बीच जमीन के सौदे में अनियमितता को लेकर कई सवाल किए।

पिछले हफ्ते दस्तावेजों को जारी करते हुए, सोमैया ने आरोप लगाया था कि महाराष्ट्र सरकार की वेबसाइट में मौजूद मुरुद रायगढ़ के भूमि रिकॉर्ड के अनुसार उद्धव ठाकरे की पत्नी का स्वर्गीय अन्वय नाइक के परिवार के साथ भूमि का लेनदेन हुआ था। भूमि सौदों पर आगे स्पष्टीकरण माँगते हुए, किरीट सोमैया ने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री को उनकी अचल संपत्ति के भूमि सौदे के विभिन्न लेनदेन के बारे में जनता को बताने के लिए कहा।

अन्वय नाइक परिवार और रवींद्र वायकर परिवार के साथ भूमि सौदों से संबंधित दस्तावेज जारी करते हुए उन्होंने कहा, “हमनें श्रीमती रश्मि उद्धव ठाकरे और अन्वय नाइक के परिवार के साथ किए गए लेनदेन का विवरण और भूमि रिकॉर्ड 7/12 जारी किया हैं। हमने श्री उद्धव ठाकरे से अनुरोध किया कि वे इस बारे में कुछ जानकारी दें।”

किरीट सोमैया ने कहा, शिवसेना नेता आरोपों का जवाब देने के बजाय उनके साथ दुर्व्यवहार कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि विभिन्न नेताओं ने दिवंगत अन्वय नाइक और ठाकरे के बीच भूमि सौदे को उजागर करने के लिए उन्हें धमकी दी थी।

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री श्री उद्धव ठाकरे के चुनावी हलफनामों का हवाला देते हुए, भाजपा नेता ने पूछा कि क्यों रश्मि उद्धव ठाकरे के पास वैजनाथ, तालुका कर्जत, जिला रायगढ़ में एक ही सर्वेक्षण नंबर से दो संपत्तियाँ हैं।

डील के दस्तावेज

भाजपा के पूर्व सांसद ने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे से भूमि सौदे में अनियमितता के संबंध में पूछा, “हम सीएम उद्धव ठाकरे से अनुरोध करना चाहते हैं कि एक ही सीरियल नंबर से लैंडहोल्डिंग के बारे में हमें बताए। जोकि सर्वे नंबर पॉइंट 2A और पॉइंट 2B में उल्लेख है। क्या एक ही सर्वेक्षण संख्या के साथ दो अलग-अलग भूमि उपलब्ध / खरीदे गए? श्रीमती ठाकरे के पास कुछ अन्य जमीनें हैं, जिनका विवरण महाराष्ट्र के लोगों को हलफनामे के पॉइंट नंबर B में उपलब्ध नहीं कराया गया है।”

शिवसेना प्रमुख के बेटे आदित्य ठाकरे के व्यापारिक व्यवहार के बारे में दस्तावेज जारी करते हुए, भाजपा नेता किरीट सोमैया ने शिवसेना नेता से तीखे सवाल किए और उनसे पूछा कि वे रियल एस्टेट कारोबार में अपने निवेश के बारे में स्पष्ट करें।

चुनावी हलफनामे के अनुसार, आदित्य ठाकरे एम/एस हिबिस्कस फूड एलएलपी के नामित भागीदार और मालिक थे और उद्धव ठाकरे की पत्नी रश्मि उद्धव ठाकरे भी हिबिस्कस फूड एलएलपी में नामित भागीदार थीं।

कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय के 17 नवंबर 2020 तक के प्राप्त रिकॉर्ड के अनुसार, “आदित्य ठाकरे 2015 में हिबिस्कस फ़ूड एलएलपी में एक नामित पार्टनर बने और यह भी कहा कि उन्होंने 31 दिसंबर 2020 को इस कंपनी से इस्तीफा दे दिया था। वहीं 26 अप्रैल 2016 को एलियोरा सोलर एलएलपी में नामित भागीदार बन गए और उन्होंने इस कंपनी से भी 31 मार्च 2020 को इस्तीफा दे दिया था।”

भाजपा नेता ने कहा कि वह मुख्यमंत्री श्री उद्धव ठाकरे से इस व्यवसाय और इन वेंचर में आदित्य उद्धव ठाकरे की भूमिका के बारे जानना चाहते हैं। बता दें शिवसेना के खिलाफ आरोप यह है कि 28 नवंबर 2019 को उन्हें मंत्री बनाए जाने के बावजूद, वह 31 मार्च 2020 तक हिबिस्कस फूड एलएलपी और एलियोरा सोलर एलएलपी का कारोबार एक साथ चला रहे थे।

उल्लेखनीय है कि कानून के अनुसार, सांसद और विधायक फायदा पहुँचाने वाला कोई भी काम नहीं कर सकते है। साथ ही किसी भी तरह से कंपनसेशन वाली भूमिका में वो लिप्त नहीं हो सकते है। इसलिए, अगर आदित्य ठाकरे वास्तव में 31 मार्च तक दोनों कंपनियों के नामित भागीदार बने रहे, तो इसका मतलब है कि वह महाराष्ट्र सरकार में विधायक और मंत्री रहते हुए लाभ के पद धारण कर रहे थे।

मुंबई पुलिस नहीं बता रही रिपब्लिक TV के AVP घनश्याम सिंह की लोकेशन: सुरक्षा के लिए चिंतित परिवार और मीडिया चैनल

रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क के असिस्टेंट वाइस प्रेसीडेंट घनश्याम सिंह की बेल याचिका की सुनवाई को 24 नवंबर 2020 तक के लिए स्थगित किए जाने के बाद उनके ठिकाने की जानकारी भी किसी से साझा नहीं की जा रही है।

रिपब्लिक मीडिया चैनल ने अपने बयान में घनश्याम सिंह के लिए चिंता जाहिर करते हुए कहा कि उन्हें यह तक नहीं पता कि आखिर उनके असिस्टेंट वाइस प्रेसीडेंट घनश्याम सिंह को कहाँ रखा गया है।

समाचार चैनल के अनुसार, “रिपब्लिक मीडिया के असिस्टेंट वाइस प्रेसीडेंट घनश्याम सिंह न्यायिक हिरासत में है। उनकी लोकेशन का खुलासा न रिपब्लिक टीवी से किया गया है और न ही उनके परिवार से। हमें उनकी, उनके स्वास्थ्य की, उनकी सुरक्षा की बहुत ज्यादा चिंता है।”

बयान में चैनल ने कहा है कि महाराष्ट्र सरकार और मुंबई पुलिस को घनश्याम सिंह के ठिकाने के बारे में फौरन खुलासा करना चाहिए क्योंकि उनके परिवार को और रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क को यह जानने का अधिकार है।

चैनल ने अपने दर्शकों को याद दिलाया है कि किस तरह घनश्याम को हिरासत में लिए जाने के बाद उन्हें कई बार काला मास्क पहना कर ले जाते देखा गया। रिपब्लिक टीवी का कहना है कि वह इस तरह मानवाधिकारों के दमन और बुनियादी कानून अधिकारों को नकारे जाने के मामले को कोर्ट में न्याय मिलने तक उठाते रहेंगे।

यहाँ स्पष्ट कर दें कि आज घनश्याम सिंह की बेल याचिका पर सुनवाई से पहले उन्हें तलोजा जेल में रखा गया था, लेकिन जब उनकी याचिका पर सुनवाई को 24 नवंबर तक के लिए स्थगित किया गया, उसके बाद रिपब्लिक टीवी ने यह बयान जारी किया। सूत्रों के अनुसार, सिंह की बेल याचिका पर जवाब देने के लिए महाराष्ट्र सरकार ने 5 और दिनों का समय माँगा है।

घनश्याम सिंह की गिरफ्तारी फेक टीआरपी स्कैम केस में हुई है जिसमें मीडिया चैनल के नाम का उल्लेख तक नहीं है। इसी संबंध में कल मुंबई पुलिस कमिश्नर परमबीर सिंह को महाराष्ट्र मानवाधिकार आयोग की ओर से समन जारी किया गया था। इस समन में उन्हें घनश्याम सिंह की गिरफ्तारी के मामले में 27 नवंबर से पहले आयोग के समक्ष पेश होने का आदेश दिया गया है। आयोग ने यह कार्रवाई वकील आदित्य आर मिश्रा की शिकायत पर की है।

पाकिस्तानी मंत्री को शो में स्पेस देने के सवाल पर सरदेसाई ने खोया आपा, अब फारूक अब्दुल्ला का जानना चाहते हैं पक्ष: देखें वीडियो

इंडिया टुडे के प्राइम टाइम एंकर राजदीप सरदेसाई की एक बार फिर अपने ही शो में फजीहत हो गई। भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता संबित पात्रा ने उन्हें पाकिस्तान के मंत्री फवाद चौधरी को स्पेस देने की बात पर जम कर लताड़ा। सरदेसाई इसके बाद बीच-बीच में चिल्लाते रहे कि उन्हें संबित पात्रा से अपने राष्ट्रवाद का प्रमाण नहीं चाहिए मगर भाजपा प्रवक्ता ने उनकी एक न सुनी।

इस बातचीत में सरदेसाई ने कहा कि फारूक अब्दुल्ला के साथ निष्पक्ष बर्ताव होना चाहिए। इसे सुन संबित पात्रा ने उनसे पूछा कि आखिर क्यों उनका प्राइम टाइम पाकिस्तान के मंत्री फवाद चौधरी जैसे लोगों को अपना पक्ष रखने के लिए प्लेटफॉर्म देता है।

वह बोले, “आपने मुझे अभी बताया कि हमें फारूक अब्दुल्ला के साथ निष्पक्ष होना चाहिए। क्यों आखिर आपके चैनल पर ये 9 बजे का शो पाकिस्तान के फवाद चौधरी को मौका देता है कि वह आएँ और अपना पक्ष रखें। आप फारूक अब्दुल्ला को मौका देकर क्यों यह साबित करना चाहते हैं कि वो राष्ट्रवादी हैं।”

बस दर्शकों के सामने अपनी फजीहत होता देख राजदीप सरदेसाई को गुस्सा आ गया और वह बीच बीच में बोलने लगे। उन्होंने पूछा कि आखिर वह फारूक अब्दुल्ला को बोलने का मौका क्यों न दें। पात्रा ने इस बीच कहा कि जो पत्रकारिता के तरीके सरदेसाई और उनके जैसे लोग इस्तेमाल करते हैं उसके बारे में पूरा देश जानता है। इस पर सरदेसाई और आग बबूला हो गए।

राजदीप सरदेसाई ने फिर चिल्लाकर कहा, “मुझे आपसे राष्ट्रवाद का प्रमाण नहीं चाहिए डॉ पात्रा। मैं भरतीय राष्ट्रवादी हूँ। मैं आपकी तरह राजनीतिक रूप से कट्टर नहीं हूँ।”

उल्लेखनीय है कि यह पहली बार नहीं है कि सरदेसाई को उनकी पत्रकारिता व समझ के कारण ऐसी शर्मिंदगी का सामना करना पड़ा हो। इससे पूर्व जब प्रधानमंत्री पहली बार लोकसभा चुनावों लड़ रहे थे तो सरदेसाई कई एनआरआई के साथ एक फ्लाइट में थे और उन्हीं में से एक ने उन्हें थप्पड़ भी जड़ा था।

पिछले 6 सालों में कई ऐसे मौके आए हैं जब सरदेसाई की ऐसी फजीहत हुई। अक्टूबर में उन्होंने फवाद चौधरी को अपने चैनल पर स्पेस दिया था सिर्फ़ इसलिए ताकि वह पुलवामा पर अपने बयान पर स्पष्टीकरण दे सकें। इस हरकत के लिए उनकी बहुत आलोचना हुई थी। एक इंटरव्यू के दौरान राजदीप ने यह भी स्वीकारा था कि उन्हें संसद हमले के समय खुशी हुई थी क्योंकि उन्हें अच्छी सामग्री मिल रही थी।

ऐसे ही एक इंटरव्यू में मुकेश अंबानी ने राजदीप को लेकर कह दिया था कि वह उन्हें गंभीरता से नहीं लेते। पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने उन्हें इस बात पर डाँटा था कि उनके इंटरव्यू के बीच में वह उन्हें न टोके। इसी तरह सौरभ गाँगुली ने भी राजदीप को उनकी हरकतों पर टोका था।

उद्धव ठाकरे को धृतराष्ट्र और उनके बेटे को पेंगुइन कहने पर फेसबुक यूजर के खिलाफ कार्रवाई: 10 लाख की मानहानि का दावा

महाराष्ट्र सरकार द्वारा सोशल मीडिया पर उद्धव ठाकरे और उनके बेटे की आलोचना करने वाले लोगों के खिलाफ लगातार कार्रवाई की जा रही है। ताजा घटना में, एक फेसबुक यूजर द्वारा महाराष्ट्र के सीएम की तुलना धृतराष्ट्र से और अदित्य ठाकरे को पेंगुइन कहने पर 10 लाख रुपए के मानहानि का मुकदमा ठोका गया है।

बता दें महाराष्ट्र सरकार की आलोचना करने वाले अपने फेसबुक पोस्ट की वजह से मुंबई के कमाठीपुरा के रहने वाले बालकृष्ण दीकोंडा (Balakrishna Deekonda) मुसीबत में पड़ गए हैं। मुख्यमंत्री और राज्य सरकार ने उन्हें सीएम और उनकी सरकार की प्रतिष्ठा को खराब करने का आरोप लगाते हुए एक वैधानिक नोटिस भेजा है। यह नोटिस शिवसेना के एक कार्यकर्ता श्री शिव आर.साधु द्वारा भेजा गया है, जो मुंबई के एंटॉप हिल इलाके में मोतीलाल नेहरू नगर में गत प्रधान हैं।

मुंबई स्थित अधिवक्ता प्रकाश यू सुतार के माध्यम से भेजे गए नोटिस में दीकोंडा के कई पोस्ट को कोट करते हुए कहा गया कि इनमें सीएम और सरकार के लिए बदनाम करने वाले और अपमानजनक बयान हैं। नोटिस में दीकोंडा के आपत्तिजनक पोस्ट की कॉपी को भी लगाया गया है। सोशल मीडिया यूजर ने अपने 25 अगस्त को किए एक पोस्ट में कहा था, “कोई बात नहीं पेंगुइन सरकार मात्र कुछ और दिनों के लिए ही है।” मुंबई मिरर पर प्रकाशित एक सर्वेक्षण रिपोर्ट साझा करते हुए कहा कि 64% उत्तरदाता उद्धव ठाकरे से खुश नहीं हैं, और 70% लॉकडाउन को खत्म करना चाहते है।

Balakrishna Deekonda के फेसबुक पोस्ट

18 अप्रैल को किए अपने एक अन्य पोस्ट में बालकृष्ण ने द प्रिंट का एक ओपिनियन आर्टिकल साझा किया था, जिसका शीर्षक था, “उद्धव ठाकरे कोविड महामारी से निपटने में विफल रहे हैं। मुंबई को बचाने के लिए सेना लाओ।” लेख का लिंक साझा करते हुए उन्होंने लिखा था, “200.. धृतराष्ट्र?”

नोटिस में कहा गया है कि दीकोंडा ने जानबूझकर कर जनता की नज़र में मुख्यमंत्री और राज्य सरकार को बदनाम और अपमानित किया है और इसके लिए उन्हें एक स्थानीय समाचार पत्र, एक राष्ट्रीय समाचार पत्र और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर माफी माँगनी चाहिए जहाँ उन्होंने कमेंट किया है।

गौरतलब है कि नोटिस में यह भी कहा गया है कि माफी के साथ महाराष्ट्र के सीएम ने दीकोंडा से 10 लाख रुपए का हर्जाना भी माँगा है, जिसे टाटा मेमोरियल अस्पताल में जमा करना है। अगर ऐसा नहीं किया जाता है तो उसके खिलाफ नागरिक और आपराधिक कार्यवाही शुरू की जाएगी।

वहीं नोटिस में इस बात को दोहराया गया है कि महाराष्ट्र के सीएम उद्धव ठाकरे और राज्य सरकार की प्रतिष्ठा को खराब करने की वजह से उन्हें सार्वजनिक माफी माँगनी चाहिए और नुकसान का भुगतान करना चाहिए, अन्यथा उन्हें इसके परिणाम भुगतने होंगे।

वहीं कानूनी नोटिस के बाद सोशल मीडिया यूजर को वडाला टीटी पुलिस स्टेशन ने भी एक नोटिस जारी किया, जिसमें उन्हें पुलिस के सामने पेश होने के लिए कहा गया। इस नोटिस में उन्हें नोटिस मिलते ही पुलिस स्टेशन को फोन करने और 3 दिन के अंदर पेश होने के लिए कहा गया है।

उल्लेखनीय है कि सिर्फ बालकृष्ण दीकोंडा ही नहीं कई अन्य व्यक्ति भी सरकार की आलोचना करने वाली अपनी टिप्पणियों के लिए महाराष्ट्र सरकार द्वारा की जा रही कार्रवाई का सामना कर रहे हैं। इनमें समीत ठक्कर शामिल हैं, जिन्हें एक ही टिप्पणी के लिए तीन बार गिरफ्तार किया गया था। वहीं सुनैना होले नाम की एक यूजर को उनके ट्वीट के लिए दो बार गिरफ्तार किया गया था। विभोर आनंद नाम के एक वकील को दिल्ली से गिरफ्तार किया गया था, इस लिस्ट में और भी कई लोग शामिल है।

उल्लेखनीय है कि इस वर्ष मई में महाराष्ट्र राज्य सरकार ने निषेधात्मक आदेश जारी किए थे। जिसके चलते सरकार की आलोचना करना अपराध श्रेणी में गिना जाने लगा। साथ ही शिवसेना ने सरकार की आलोचना करने वाले सोशल मीडिया पोस्ट को ट्रैक करने और उनपर कानूनी कार्रवाई करने के लिए एक टीम भी बनाई थी।

POK में फिर एक एयर स्ट्राइक? मीडिया में खूब फैला झूठ: अब दनादन ट्वीट हो रहे डिलीट

पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में आतंकियों के ख़िलाफ भारतीय सेना की बड़ी कार्रवाई की बात अभी कुछ देर पहले ही सामने आई कि हर मीडिया चैनल ने इसे तुरंत ब्रेकिंग बनाकर अपने चैनल पर चला दिया।

सबसे तेज होने की होड़े में हर मीडिया चैनल ने एक बार फिर साबित कर दिया कि दर्शकों को दिखाई जा रही उनकी ब्रेकिंग न्यूज किसी प्रमाणिक स्रोत पर आधारित नहीं होती बल्कि भेड़ चाल का ही नतीजा होती है।

आज लगभग हर चैनल और न्यूज वेबसाइट पर इतनी बड़ी खबर की प्रमाणिकता जाँचे बिना बताया गया कि भारतीय सेना ने पीओके में आतंकियों के लॉन्च पैड पर एयर स्ट्राइक करते हुए उसे तबाह कर दिया है।

ब्रेकिंग न्यूज के नाम पर चैनलों की हड़बड़ी का प्रमाण

खबरों में ये भी कहा गया कि इससे पहले खूफिया एजेंसी लगातार जानकारी दे रही थी कि पीओके में आतंकियों का जमावड़ा बढ़ रहा है और कम से कम 350 आतंकी सरहद पार से भारत में घुसपैठ करने की कोशिश में लगे हुए हैं। चैनलों ने कहा कि आतंकियों को सबक सिखाने के लिए भारतीय सुरक्षाबल ने यह कार्रवाई की है।

हालाँकि, खबर को फैलते कुछ टाइम ही हुआ था कि सेना के कई सूत्रों ने किसी भी प्रकार की फायरिंग को नकार दिया और रक्षा मंत्रालय की ओर से भी इसका खंडन किया गया। सेना ने अपने आधिकारिक बयान में कहा कि आज एलओसी पर कोई फायरिंग नहीं हुई है।

इस बयान के आते ही आज तक जैसे सबसे तेज मीडिया चैनल ने फौरन अपने ट्वीट डिलीट करने शुरू कर दिए। अंजना ओम कश्यप ने भी इसे सबसे बड़ी कार्रवाई कहकर झूठ फैलाया और पोल खुलते ही अपना ट्वीट डिलीट कर दिया।

ट्विटर पर अभी भी कई लोग इस झूठ को फैलाने में लगे हुए हैं और कई लोग सच्चाई जानने के बाद अंजना ओम कश्यप की तरह इसे डिलीट कर रहे हैं।

यहाँ बता दें कि इस एयर स्ट्राइक की खबर मीडिया में पीटीआई के हवाले से चलाई गई जबकि सेना का कहना है कि उनकी ओर से कोई फायरिंग नहीं हुई है। सेना के बयान की पुष्टि एएनआई और डीडी न्यूज की ओर से की जा चुकी है।