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बिहार में ई बा: कुछ लोगों के निजी स्वार्थ और धंधे पर चोट है मैथिली ठाकुर का गाना

दहेज़ के बारे में सोचा है? एक तो इसमें ‘ज’ के नीचे जो बिंदी होती है, वो देवनागरी लिपी में होती ही नहीं। यानि ये देशज नहीं, विदेशज शब्द है। दहेज़ जैसा कोई सिद्धांत भारत में नहीं होता था, इसलिए संस्कृत-शुद्ध हिंदी आदि में इसका कोई पर्यायवाची ढूँढना भी वैसा ही होगा जैसे कुर्सी-टेबल, या फिर रेल जैसी चीज़ों का हिंदी पर्यायवाची नहीं मिलता। भाषा चूँकि लोक से वैयाकरणों की ओर बहने वाली नदी है, इसलिए अगर किन्हीं वैयाकरणों ने इसके लिए शब्द गढ़े भी तो उन्हें लोक ने कभी स्वीकार नहीं किया।

इस शब्द के बारे में फ़िलहाल इसलिए सोचना है क्योंकि भारत के लिए ये एक बहुत बड़ी समस्या है। कितनी बड़ी? इतनी बड़ी है कि एक तरफ जहाँ इसे रोकने के लिए भारत में 1961 से कानून हैं, वहीं, दूसरी तरफ दहेज़ का रिवाज़ रोकने के लिए बनाए कानूनों का दुरूपयोग रोकने की बात सर्वोच्च न्यायलय भी कर चुका है। जो पुरुषों और महिलाओं, दोनों के लिए समस्या हो, उसके बारे में सामान्य जन में चर्चा ना हो ऐसा कैसे हो सकता है? फ़िलहाल स्थिति ये है कि इसके विरुद्ध बिहार के राजनेता तो बात करते सुनाई देते हैं, मगर जनता की इसपर चर्चा करने में कोई रूचि नजर नहीं आती।

बिहार में नीतीश कुमार की सरकार ने दहेज़ के विरोध में पिछले वर्षों में चर्चा की है। बिहार से दहेज़ का रिवाज मिटाने की राजनैतिक कोशिशें कितना रंग लाईं, ये कहना मुश्किल है। कुछेक लोगों ने मुख्यमंत्री के इस पहल पर कदम भी उठाए। मुख्यमंत्री नीतीश ने भी कहा कि मुझे विवाह में आमंत्रित करना हो तो बताएँ कि इस विवाह में दहेज़ नहीं लिया गया। इस कदम के बाद कई लोगों ने दहेज़ ना लेकर शादियाँ की और नीतीश कुमार को आमंत्रित भी किया। मगर इतनी देर तक दहेज़ की बात करने के पीछे हमारा मकसद इस एक सामाजिक बुराई को देखना ही नहीं था, बल्कि कुछ और भी था।

अब जब दहेज़ का आमतौर पर देखा जाने वाला पक्ष हम देख चुके तो आइये सोचते हैं कि ये मिलता किसे है? कोई बेरोजगार हो, कम सुन्दर हो, दिव्यांग हो, तो उसे अधिक दहेज़ मिलेगा या कोई आईएएस हो, डॉक्टर हो, किसी नामी-गिरामी खानदान से हो, तब उसे अधिक दहेज़ मिलेगा? जवाब आपको पता है। कोई बेरोजगार अपना कोई व्यवसाय शुरू कर सके इसके लिए उसे लाखों करोड़ों का दहेज़ नहीं मिलने वाला, लेकिन डॉक्टर को अपना नर्सिंग होम शुरू करने के लिए मिल जाएगा। आपकी जरूरत कितनी बड़ी है, इसके आधार पर दहेज़ नहीं मिलता, आपकी क्षमता कितनी है, दहेज़ इस आधार पर मिलता है।

किसी भी व्यापारिक कर्ज, आर्थिक सहयोग जैसे मामलों में हमेशा यही होता है। ये मुद्रा आपको आपकी क्षमता के आधार पर मिलती है। जरूरत देखकर भीख मिलती है जिससे जैसे-तैसे गुजारा हो सकता है, आगे कोई उन्नति हो, इसकी संभावना भीख से नहीं बनती। जब बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिए जाने की माँग जैसी चीज़ें देखें, तो भी ऐसा ही नजर आएगा। विशेष राज्य का दर्जा या स्पेशल पैकेज की माँग, भीख माँगने जैसा ही है। ये अधिकार की तरह हक़ से नहीं माँगा जाता। इसकी तुलना में अगर गुजरात या महाराष्ट्र जैसे राज्य माँगें, उत्तराखंड माँगे, तो धन सहज ही उपलब्ध हो जाता है।

बिहार को भी अगर आर्थिक सहयोग, निवेश या उद्योगों की स्थापना चाहिए तो उसे बताना होगा कि उसके पास इन्फ्रास्ट्रक्चर मौजूद है। सड़कें हैं, सुरक्षा व्यवस्था है, कुशल श्रमिक उपलब्ध हैं, व्यापार के लिए सरकारी मदद का माहौल है, तब तो कोई आकर निवेश करना चाहेगा। जब तक ऐसा निवेश नहीं आएगा ‘विकास’ नहीं होगा। इसकी तुलना में तथाकथित प्रगतिशील पक्षकार जो चंदे-मदद के नाम पर अपने एनजीओ के लिए कुछ फंड माँगना कहते हैं, वो क्या करते हैं? वो कहेंगे गरीबी है, बाढ़ है, बीमारी है, आओ हमें भीख दे दो! ऐसे में जब कोई लड़की कह देगी कि ये अच्छी चीज़ें भी हैं हमारे पास तब क्या होगा?

मैथिली ठाकुर का ‘बिहार में ई बा’ गा देना तो सीधे सीधे उनके धंधे पर ही चोट है! पेट पर कोई लात मार दे और वो बिलबिलाएँ भी नहीं, ऐसा कैसे हो सकता था? मैथिली का गाना उनके ‘विकास’ की राह में रोड़ा है। उन्हें राज्य के विकास से कोई लेना देना नहीं, उनके निजी स्वार्थों से इस गीत के बोल टकराते हैं। ये विवाद गीत पर नहीं हो रहा, ये निजी स्वार्थ के सामाजिक हितों से टकराव का शोर है।

TOI ने पीवी सिंधु को ले कर फिर फैलाई फेक न्यूज, बैडमिंटन स्टार ने लगाई क्लास

फेक न्यूज फैलाने के कारण बैडमिंटन स्टार पीवी सिंधु ने ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ की ट्विटर पर जमकर क्लास लगाई है। पीवी सिंधु ने कहा है कि टाइम्स के पत्रकार को खबर लिखने से पहले तथ्य जान लेने चाहिए वरना उन्हें पत्रकार के ख़िलाफ़ कानूनी कार्रवाई करनी पड़ सकती है।

बता दें कि समाचार पत्र ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ ने पीवी सिंधु को लेकर आज (अक्टूबर 20, 2020) एक खबर पब्लिश की। इस खबर में उन्होंने बताया कि ‘निजी कारणों’ से पीवी सिंधु ने ओलिंपिक को लेकर लगे नेशनल कैंप को छोड़ दिया और वह लंदन चली गईं।

इस रिपोर्ट में लिखा गया कि पीवी सिंधु और उनके परिवार के बीच तनाव चल रहा है। साथ ही वह हैदराबाद छोड़ने से पहले अपने कोच को बता कर गई हैं कि वह भारत 8-10 हफ्तों से पहले नहीं आएँगी। इसके अलावा, ‘सूत्रों का हवाला’ देकर TOI की रिपोर्ट में यह भी लिखा गया कि जीवन के इस पड़ाव पर सिंधु को किसी और द्वारा कंट्रोल नहीं किया जाना चाहिए।

अब टाइम्स ऑफ़ इंडिया पर मंगलवार सुबह 9:35 पर प्रकाशित हुई इसी खबर को शेयर करते हुए पीवी सिंधु ने 11 बजे के आस पास लिखा कि वह जीएसएसआई के साथ अपने पोषण और रिकवरी की जरूरतों पर काम करने के लिए कुछ दिन पहले लंदन आई थीं। सिंधु ने स्पष्ट किया किउनके लंदन जाने के बारे में उनके माता-पिता को भी पता है और इसमें फैमिली टेंशन जैसी कोई बात नहीं है।

पीवी सिंधु कहती हैं, “मुझे मेरे माता-पिता से क्यों दिक्कत होगी जिन्होंने अपनी जिंदगी में मेरे लिए कुर्बान की। मेरा परिवार मुझसे बहुत जुड़ा हुआ है और वह मुझे हमेशा समर्थन करते हैं। मैं अपने परिवार से लगातार संपर्क में हूँ।” वह बताती हैं कि उन्हें उनके कोच गोपीचंद के साथ या उनकी अकादमी में प्रशिक्षण की भी कोई समस्या नहीं है।

आखिर में वह टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर लिखने वाले पत्रकार एम रत्नाकर को आड़े हाथों लेते हुए कहती हैं, “श्रीमान एम रत्नाकर, टाइम्स ऑफ इंडिया के रिपोर्टर, जो झूठी खबर फैला रहे हैं, उन्हें ये सब लिखने से पहले तथ्य पता करने चाहिए। अगर वह नहीं रुकते तो मुझे उनके ख़िलाफ़ कानूनी कार्रवाई करनी होगी।”

बता दें कि पीवी सिंधु ने सोमवार को अपने सोशल मीडिया अकॉउंट पर जानकारी दी थी कि वह यूके आई हैं अपनी रिकवरी और न्यूट्रिशन पर काम करने। टाइम्स की रिपोर्ट में यह जानकारी देते हुए लिखा गया कि उनके सूत्रों के मुताबिक सिंधू यूके में 10 दिन ठहरने वाली हैं।

TOI पीवी सिंधु के बारे में पहले भी फैला चुका है फेक न्यूज़

गौरतलब है कि यह पहली बार नहीं है जब टाइम्स ऑफ इंडिया ने शीर्ष भारतीय शटलर पीवी सिंधु के बारे में फर्जी खबरें फैलाई हो। जुलाई 2019 में प्रकाशित एक रिपोर्ट में, TOI ने जोर देकर कहा था कि पीवी सिंधु ने भारतीय ओलंपिक संघ से आग्रह किया था वे CWG खेलों में शूटिंग को हटाने पर इसका बहिष्कार करेंगे। दरअसल, बर्मिंघम में होने वाले कॉमनवेल्थ खेल 2022 में शूटिंग शामिल नहीं होगा। इससे नाराज भारत इन खेलों पर बहिष्कार का विचार कर रहा है। इसी TOI ने पीवी सिंधु के हवाले से फेक न्यूज़ प्रकाशित कर डाली थी।

TOI को लताड़ लगते हुए पीवी सिंधु ने कहा था, “उन्होंने मुझे गलत तरीके से समझा जहाँ मैंने बतौर खिलाड़ी स्पष्ट तौर पर कहा था कि हम सभी किसी भी खेल स्पर्धा में भाग लेना चाहते हैं, लेकिन भारतीय ओलंपिक संघ और हमारी सरकार जो भी निर्णय लेती है मैं उसका हमेशा समर्थन करुँगी।”

बेंगलुरु: HC ने दुनिया की सबसे ऊँची जीसस प्रतिमा के निर्माण पर लगाई रोक, कॉन्ग्रेस नेता ने अवैध रूप से दिलाई थी 15 एकड़ सरकारी भूमि

कर्नाटक हाईकोर्ट ने सोमवार (अक्टूबर 19, 2020) को बेंगलुरु से 80 किलोमीटर दूर कपालबेट्टा में जीसस क्राइस्ट की दुनिया की सबसे ऊँची प्रतिमा पर चल रहे कार्य को रोकने का आदेश दिया, जिसका शिलान्यास कॉन्ग्रेस नेता डीके शिवकुमार ने किया था। रामनगर जिले में चल रहे इस काम को रोकते हुए कर्नाटक हाईकोर्ट ने कहा कि उसकी अनुमति के बिना इस पर कोई काम नहीं होना चाहिए। एक PIL पर सुनवाई करते हुए उच्च-न्यायालय ने ये आदेश सुनाया।

उक्त PIL में कहा गया था कि जीसस क्राइस्ट की प्रतिमा बनाने के लिए अवैध रूप से भूमि का आवंटन किया गया था। साथ ही आरोप लगाया गया था कि दो बड़े नेताओं और उनके अनुयायियों के निजी हितों की पूर्ति करने के लिए सरकारी संपत्ति पर कब्ज़ा करने का प्रयास किया गया। याचिका में आरोप लगाया गया कि ईसाई समुदाय के तथाकथित ‘अभिभावकों’ ने ऐसा किया। अब ‘हरोबेले कपालबेट्टा अभिरुद्धि ट्रस्ट’ को कंस्ट्रक्शन का कार्य आगे बढ़ाने से रोक दिया गया।

एंथोनी स्वामी और 7 अन्य की याचिका पर सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश अभय श्रीनिवास ओका और जस्टिस अशोक एस किनगी की डिवीजन बेंच ने राज्य सरकार और ट्रस्ट को अंतरिम आदेश जारी किया। याचिकाकर्ताओं ने कहा था कि कनकपुरा में ईसाईयों की संख्या 2000 ही है, जो काफी कम है। इनमें से 1500 होरोबेले और नल्लाहल्ली गाँवों में रह रहे हैं। फिर यहाँ जीसस क्राइस्ट की इतनी बड़ी प्रतिमा बनाने का क्या औचित्य है?

आरोप है कि तत्कालीन ऊर्जा मंत्री डीके शिवकुमार और उनके भाई व बेंगलुरु रुरल के सांसद डीके सुरेश ने फ़रवरी 2017 में रामनगर के डिप्टी कमिश्नर से कह कर इस कार्य को शुरू करवाया था। ईसाई समुदाय द्वारा किसी भी प्रकार की माँग के बिना ही इन दोनों भाइयों ने इस काम के लिए 15 एकड़ की सरकारी जमीन उपलब्ध करा दी। कहा गया है कि गाँव में एक चर्च पहले से ही है, ऐसे में 15 एकड़ में फिर से चर्च और ईसाई संरचनाएँ बनाना सिर्फ वोट बैंक की राजनीति है।

कर्नाटक लैंड ग्रांट रूल्स की धारा-17 के तहत पब्लिक नोटिस जारी किए बिना ही भूमि उपलब्ध करा दी गई। तहसीलदार ने डिप्टी कमिश्नर को रिपोर्ट भेज दी कि ग्रामीणों को इससे कोई दिक्कत नहीं है। स्थानीय ग्राम पंचायत से जल्दी-जल्दी में ही अनुमति ले ली गई। याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला देते हुए कहा कि सार्वजनिक संपत्ति का इस्तेमाल निजी कार्यों के लिए नहीं हो सकता। जमीन उपलब्ध कराने को फॉरेस्ट एक्ट का भी उल्लंघन बताया गया है।

दिसंबर 2019 में क्रिसमस के मौके पर बताया गया था कि कथित तौर पर, प्रतिमा की कुल ऊँचाई 114 फीट होगी और शिलान्यास की प्रक्रिया ईसा मसीह के दाहिने पैर की पूजा करके की गई थी। क्राइस्ट द रिडीमर प्रतिमा रियो डी जनेरियो की ऊँचाई 98 फीट है और ब्राजील में 26 फीट है। क्रिसमस के अवसर पर, डीके शिवकुमार ने ट्रस्ट को ज़मीन से संबंधित दस्तावेज़ सौंपे थे। साथ ही शिलान्यास भी किया था।

हिन्दुओं की हत्या पर मौन रहने वाले हिन्दू ‘फ़्रांस की जनता’ होना कब सीखेंगे?

फ़्रांस में एक शिक्षक की इस्लामी आतंकवादी ने हत्या कर दी। घटना श्वेत पश्चिमी विकसित राष्ट्र में हुई थी तो निंदा वैश्विक थी एवं क्षोभ सार्वजानिक। भारत में ऐसी घटनाओं का इतना सामान्यीकरण हो चुका है कि अब न जनता से प्रतिक्रिया होती है न सरकार से। यदि प्रतिक्रिया हो भी तो शाब्दिक निंदा पर ही इस्लामविरोधी इत्यादि आरोप लगा कर लोगों को चुप करा दिया जाता है। श्वेतवर्णी समाज के एक व्यक्ति के जीवन का मूल्य चार अश्वेतों के समान अमेरिकी संविधान में 1964 तक माना जाता था।

वैचारिक दासता के दौर में आज भी उसमें अधिक परिवर्तन नहीं है जब यूरोप के राष्ट्र किसी दूसरे राष्ट्र के प्रताड़ित को शरण दें तो उसे मानवता कहा जाता है परन्तु यही जब भारत नागरिकता संशोधन के द्वारा करना चाहे तो वही पश्चिमी देश झुण्ड बना कर भारत की सम्प्रभुता पर टूट पड़ता है। ऐसे में आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि भारत में सरकार भी एक रामलिंगम, ध्रुव त्यागी, कमलेश तिवारी या राहुल राजपूत की हत्या पर सार्वजानिक वक्तव्य देने से बचती है। ऐसी मानव जीवन की क्षति पर सरकार की ओर से हर्जाना भी भिन्न-भिन्न मिलता है। सत्ता की सौतेली संतान होने का कष्ट उभर आता है, और लोग सरकार से नाराज़ हो लेते हैं।  

भारतीय जनता पार्टी दूसरी बार सरकार में है परन्तु ऐसे समय रोष भाजपा के समर्थकों में अधिक दिखता है। फ्रांस के राष्ट्रपति इस जघन्य घटना की निंदा बिना लाग लपेट के इस्लामिक कट्टरवाद को जिम्मेदार ठहराते हुए कर सकते हैं तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ऐसा क्यों नहीं कर सकते हैं? इस प्रश्न पर मेरा एक ही उत्तर है कि हमें वे तस्वीरें देखनी चाहिए जो फ्रांस की घटना के पश्चात विभिन्न शहरों में दिखती हैं। सैकड़ों की सँख्या में फ्रांसीसी नागरिक सड़कों पर उतरे यह कहते हुए – “हम भयभीत नहीं हैं।” दिल्ली में राहुल राजपूत की हत्या हुई, कैराली में पुजारी की हत्या हुई, उन्नाव में दो पुजारियों की हत्या हुई, पालघर में साधुओं की पुलिस के सामने हत्या हुई। हम पूछते हैं कि सरकार कुछ क्यों नहीं बोली, प्रधानमंत्री कुछ क्यों नहीं बोले?

सरकार बनने के बाद राजनीतिक दलों का काम समाप्त होता है परंतु समर्थकों का काम आरंभ होता है। नेता रोडवेज़ के ड्राइवर की तरह होते हैं, और सवारी भरने पर ही बस में बैठते हैं। हज़ार लोगों का जुलूस कई शहरों में  निकाल दीजिए, नेता पहुँच जाएँगे और चौड़े मे समर्थन में भाषण भी देंगे। समर्थन में उतरी संख्या ही उनके राजनीतिक सरोकार तय करती है, उन्हें स्पष्ट बोलने का साहस देती है। झारखंड में एक हत्या हुई, केरल से लेकर दिल्ली तक लोग सड़क कर उतर गए। दिल्ली में पिछले दो महीने में दो हत्याएँ हुईं। तबरेज तो मार पीट के पाँच दिन बाद मरा, ये दोनों हत्याएँ तो तथ्यात्मक रूप से पिटाई से ही हुई। कितने लोग सड़क पर उतरे? पालघर में साधुओं की हत्या पर कितनी रैली निकली?

जब आप अपनी बात नहीं उठा सकते हैं तो सरकार क्यों उठाएगी? यदि लोग सड़क पर 2014 में नहीं उतरते तो आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार केंद्र में नहीं होती। बस का ड्राइवर बस यात्रियों को पहुँचाने के लिए चलाता है, लाँग ड्राइव के लिए नहीं। कोई भी बस का ड्राइवर बिना सवारी ख़ाली बस लेकर कोई नहीं जाएगा।

राजनीतिक बस पर चढ़िये, राजनीति भी बदलेगी, राजनैतिक संवाद भी। दस बड़े शहरों में दो-दो हज़ार की संख्या में लोग सड़क पर उतर कर पालघर पर न्याय माँगते तो मोदी क्या राष्ट्रपति भी राष्ट्र को संबोधित कर के निंदा करते। पालघर में कैमरे पर साधुओं की हुई हत्या पर तो सुशांत सिंह राजपूत के लिए न्याय माँगने वाले भी चुप है।

राजनीति एक बस स्टैंड है। हम एक नागरिक के नाते उस बस पर चढ़ना चाहते हैं जो भरी हुई है क्योंकि हमें लगता है वो बस पहले निकलेगी। सरकार भरी हुई बस को पहले स्टैंड से निकालती है। दोनों बातों में विरोधाभास है। हम टहल रहे हैं कि ड्राइवरआए तो बस में चढ़ेंगे, ड्राइवर चाय की प्याली पर प्याली पीते हुए दूर से दृष्टि रखे है की सवारियाँ भरें तो बस में जा के बैठे। क्या कारसेवा के बिना राम जन्मभूमि का निर्णय होता? क्यों न्यायपालिका उसे कश्मीरी पंडितों के केस की तरह प्राचीन मान कर न्यायपालिका से बाहर क्यों नहीं भेज देती। क्योंकि उस प्रश्न की बस तो अयोध्या गंतव्य के लिए निकली वह सवारियों से भरी हुई है। 

सरकार आपके सोशल मीडिया के उत्कर्ष प्रलाप को पढ़कर काम नहीं करेगी। यह न तो सरकार के स्वभाव में है, न ही यह सरकार के लिए उचित ही है। सोशल मीडिया पर तो लोग मिनी स्कर्ट पर भी क्षोभ प्रकट करने लगते हैं, उस विलाप और प्रलाप पर सरकार कोई रूचि क्यों ले। उस पर कोई दल अपनी राजनीतिक पूँजी क्यों लगाएगा? भारत मे 13 मिलियन या 1.3 करोड़ लोग ट्विटर पर हैं। मान लीजिए भाजपा के वोट शेयर के बराबर, लगभग 40% भाजपा समर्थक हैं। ये बने कोई पचास लाख। 130 करोड़ के देश में क्या राजनीति पचास लाख लोगों के विचारों पर होगी? मैं तो यह मानता हूँ कि ऐसा भ्रम पैदा कर के सत्ता पक्ष विपक्षियों को व्यस्त रखा जाता है। कॉन्ग्रेस की सम्पूर्ण राजनीति सोशल मीडिया पर सिमट गई है और यह मान कर चल रही है की सरकारें वहीं से बनती हैं। राहुल गाँधी ट्विटर पर ज्ञान देते हैं, चुनाव हार जाते हैं।

घरों में बैठ कर समाज या सरकार दोनों नहीं बदली जाती। विपरीत विचारधारा सड़क पर उतरती है, अदालत में जाती है, माहौल बनाती है और सरकार को उस पर जुड़ना ही पड़ता है। महाराष्ट्र में यदि जनता धरने पर उतरती, अदालत में अर्ज़ी दाखिल होती तो पालघर के लिए जाँच के लिए केंद्रीय ब्यूरो क्यों न उतरता या किसी न्यायाधीश के निरीक्षण में जाँच क्यों नहीं होती। साधुओं के परिवारों को, राहुल राजपूत के परिवार को शासन से वही मदद क्यों नहीं मिलती जो जुनैद और तबरेज़ को मिली। मोदी जी भी सार्वजनिक मंचों से घटना की निंदा करते। 130 करोड़ के देश में एक हत्या अन्य हत्याओं के मुक़ाबले प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री के ध्यान या समय के योग्य क्यों है, इसका निर्णय इस पर है कि मूक रहने पर और बोलने पर कितना समर्थन मिलता है। 

अपेक्षाएँ होती हैं तो ऐसे प्रश्न उठते हैं। ऐसे ही प्रश्न योगी आदित्यनाथ से भी पूछे जाते हैं। उनसे यही कहा जा सकता है कि मुख्यमंत्री बनाए हो प्रभु, लठैत नहीं रखे हो। सड़क बन रही है, कोरोना नियंत्रण में है, दंगे दिल्ली से उत्तरप्रदेश नहीं फैले, माफिया के घर टूट रहे हैं, उद्योग आ रहे हैं। गोरखपुर में बालकों की जापान इनसेमफिलिटिस से मृत्यु लगभग बंद हो गई है। प्रधानमंत्री एवं मुख्यमंत्री का पद संवैधानिक पद है। अब कॉलोनी में ‘जागते रहो, जागते रहो’ कर के भी महाराज जी लाठी पीटते तो नहीं घूमेंगे। 

एक ओर वह वर्ग या समाज है जो राजनीतिक एवं वैधकीय अतिसक्रियता का लाभ शासन से और न्यायपालिका से अपनी पसंद के निर्णय एवं वक्तव्य निकाल रहा है। आपको सत्ता का वही स्नेह चाहिए तो आपको भी सड़क पर आना होगा, एक संख्या बल सड़क पर दिखाना होगा जिसकी विदेशी मीडिया भी उपेक्षा न कर सके। यदि दिल्ली की या मुंबई की सड़कें भर जाएँ पालघर पर तो उन्हें रिपोर्ट करना होगा, उन्हें इसका कारण भी अपनी रिपोर्ट में लिखना हो गए।

आप न्यायपालिका का ध्यानाकर्षण इन विषयों पर करते रहे तो उन पर निर्णय भी होंगे और समाचार पत्रों को छापने भी होंगे। आप बीस करोड़ पोस्ट कार्ड लिख के प्रधानमंत्री कार्यालय भेजेंगे तो प्रधानमंत्री भी उस पर ध्यान देंगे, कानून भी संसद में लाएँगे। मंदिर भी सरकारी प्रतिबन्ध से बाहर निकालेंगे, संभवतः संविधान के आपातकाल में कए गए संशोधन भी हटेंगे यदि जैसा वामपंथी करते हैं दक्षिणपंथी कानून, मीडिया और सड़क पर प्रदर्शन को साथ में जोड़ कर मुहिम चलाते हैं।  

भारत पर गौरी या ख़िलजी की जीत का बड़ा कारण जनता का जातियों में कटा रहना था, जिसके कारण बड़ा वर्ग न युद्ध के लिए प्रशिक्षित था ना ही उसमें रुचि रखता था। जैसे आज लोग पालघर या दिल्ली लिंचिंग पर मोदी को कोसते हैं, तब पृथ्वीराज चौहान को कोसते होंगे। सोचिए। पसंद की सरकार को सत्ता पर बैठा कर जनता के कर्तव्यों की इतिश्री नहीं हो जाती है। सत्ता वर्षों से बने समीकरणों को, लोकतंत्र ही सामाजिक सिद्धांतों में परिवर्तन ला सकता। एक राष्ट्र की जनता जब अपने शासकों को सामाजिक परिवर्तनों का उत्तरदायित्व सौंप कर उदासीन एवं निष्क्रिय हो जाती है, उसका क्षेत्र जावा से, वियतनाम से, ईरान से, बर्मा से पाकिस्तान और बांग्लादेश से संकुचित होता होता वहाँ पहुँच जाता है जहाँ एक संस्कृति के लिए अपने पँजों पर खड़े होने की भूमि भी नहीं होती है।

संस्कृति की रक्षा निष्क्रिय प्रेम से नहीं होती है, सक्रिय कर्म से होती है। यदि भ्रष्ट्राचार के विरोध में जनता2014 में सड़क पर नहीं उतरी होती, तो आज प्रधानमंत्री मोदी भी सत्ताधीश नहीं हुए होते। संख्या बल वही सक्षम होता है जो साक्ष्य होता है, स्पष्ट होता है। सरकार को चुनकर हमने कोई ठेका नहीं दिया है, और दिया भी हो तो उपभोक्ता की उपेक्षा की स्थिति में तो ठेकेदार उतना ही और उसी गुणवत्ता का कार्य करता है जितना न्यूनतम आवश्यक हो। सरकार से उस न्यूनतम सीमा से अधिक कार्य कराना हो तो बोलना होगा, लिखना होगा, पहुँचना होगा, सबसे बढ़कर – एक हो कर दिखना होगा।

एक फ़िल्म कुछ वर्षों पहले आई थी- गुलाल! उसके एक वाक्य को शिष्टता का आवरण पहना कर यह लेख समाप्त करता हूँ- “अपने पृष्ठपटल पर बैठे रहने से स्वराज्य नहीं आएगा, धर्म और संस्कृति की रक्षा नहीं होगी।” राष्ट्रीय राजनीति उतनी ही नैतिक होगी जितना नागरिक जागृत होगा। एक बार फिर फ्रांस में सड़कों पर उमड़ी, श्रद्धांजलि देती जनता का चित्र देखें और विचार करें।

महाराष्ट्र में रोज गायब होती हैं 105 महिलाएँ, इनमें से 95.6% का होता है यौन शोषण- NCRB

महाराष्ट्र में महिलाओं के साथ अपराध की घटनाएँ लगातार बढ़ रही हैं और राज्य की तीनों सत्ताधारी पार्टियाँ दूसरे राज्यों में हो रही घटनाओं पर बयान देते नहीं तक रही। NCRB के आँकड़े कहते हैं कि महाराष्ट्र में रोज 105 महिलाएँ रोज गायब होती हैं और हर सप्ताह 17 महिलाओं की तस्करी की जाती है, उनका यौन शोषण होता है। अगर अन्य राज्यों के साथ तुलना करें तो महाराष्ट्र में महिलाओं के गायब होने और उनके तस्करी होने की घटनाएँ सबसे ज्यादा हैं।

इसके बाद मध्य प्रदेश और पश्चिम बंगाल का नंबर आता है। महाराष्ट्र में तस्करी के जो 989 मामले दर्ज किए गए, उनमें से 88% महिलाएँ हैं और 6% बच्चे हैं। बंधुआ मजदूर बनाने के लिए, शरीर के अंगों को निकाल कर बेचने के लिए, ड्रग्स तस्करी के लिए, यौन शोषण के लिए और जबरदस्ती शादी के लिए महिलाओं की तस्करी की जाती है। अगर महाराष्ट्र की बात करें तो वहाँ गायब महिलाओं में से 95.6% महिलाओं को जबरन वेश्यावृत्ति में धकेल कर उनका यौन शोषण करने के लिए तस्करी की जाती है।

सबसे बड़ी बात तो ये है कि साल दर साल ये आँकड़े बढ़ते ही दिख रहे हैं क्योंकि 2019 में 2018 के मुकाबले ऐसे मामलों में 13% की वृद्धि देखी गई। 2018 में तो बच्चों की तस्करी के मामले में राज्य भारत के शीर्ष 10 राज्यों में था भी नहीं। लेकिन, अब ये चौथे नंबर पर आ गया है। एक साल में कुल 4562 बच्चे गायब कर दिए गए। इनमें से आधी से ज्यादा, 55% लड़कियाँ थीं। बावजूद इसके इस ओर ध्यान नहीं दिया जा रहा है।

मुंबई, पुणे और नागपुर में महाराष्ट्र के 3 बड़े शहर हैं और इन तीनों में कई बड़े रेड लाइट क्षेत्र हैं। आशंका जताई जा रही है कि ये क्षेत्र अब लड़कियों को गायब कर के उन्हें वेश्यावृत्ति की ओर धकेलने के लिए एक माध्यम बन गए हैं। राज्य में इन मेट्रो सिटीज के अलावा कई अन्य शहरों में भी छोटे और माध्यम रेड लाइट एरियाज की भरमार है। और राज्य में ऐसे क्षेत्रों की संख्या लगातार बढ़ती ही जा रही है।

‘मुंबई मिरर’ की खबर के अनुसार, अपहरण और उठाईगिरी के मामले में पूरे देश के मामलों में 0.7% की मामूली गिरावट देखी गई है, लेकिन महाराष्ट्र में ये मामले लगातार बढ़ते ही जा रहे हैं। 2019 में अपहरण के मामलों में महाराष्ट्र काफी ऊपर रहा और पिछले साल के मुकाबले ये संख्या 1.3% बढ़ ही गई। जहाँ मूलभूत सुविधाएँ नहीं हैं या विकास के मौके नहीं हैं, उन क्षेत्रों में तस्कर सबसे ज्यादा निशाना बना रहे हैं।

बता दें कि हाल ही में संजय राउत ने कंगना रनौत को ‘हरामखोर’ कह कर संबोधित किया था। एक महिला पर ऐसी अभद्र टिप्पणी के चलते संजय राउत की जम कर आलोचना हुई थी। लोगों का कहना था कि जब राज्य के सत्ताधीश ही महिलाओं को लेकर ये नजरिया रखते हैं तो फिर महिलाओं के साथ अपराध के मामलों में वो कैसे एक्शन लेंगे? वहीं हाथरस पर महाराष्ट्र की तीनों सत्ताधारी पार्टियाँ शिवसेना, एनसीपी और कॉन्ग्रेस – सभी भाजपा पर हमलावर थीं।

सैयद मुस्तफा ने हिन्दू प्रेमिका को भाई जमील के साथ मिलकर उतारा मौत के घाट

हैदराबाद में एक हिंदू लड़की को उसके प्रेमी सैयद मुस्तफा ने अपने भाई जमील के साथ मिलकर बेरहमी से मौत के घाट उतार दिया। घटना रेन बाजार में शनिवार (अक्टूबर 17, 2020) की रात घटी। पुलिस के संज्ञान में मामला अगले दिन सुबह आया।

‘द हंस इंडिया’ की रिपोर्ट के अनुसार, पुलिस को लड़की का शव रेन बाजार में एक होटल के नजदीक मिला। लड़की मूल रूप से संगारेड्डी जिले के नारायणखेड़ा इलाके में नागलगिंडा मंडल के करंगुट्टी इलाके से थी। वह कुछ समय पहले ही हैदराबाद आई थी और दत्तानगर में रह रही थी।

इसके अलावा, वह महात्मा गाँधी लॉ कॉलेज से एलएलबी की पढ़ाई कर रही थी और पीपल्स फॉर एनिमल सोसायटी की सक्रिय वॉलिंटियर थी। यहीं वह सैयद मुस्तफा से मिली। वह भी उसी सोसायटी से जुड़ा था और वॉलिंटियर का काम करता था। दोनों के बीच की दोस्ती धीरे धीरे प्रेम में बदल गई और दोनों ने शादी करने की सोची।

हालाँकि, कुछ दिन बाद मुस्तफा लड़की को नजरअंदाज करने लगा। उसने उसकी कॉल उठानी बंद कर दी। समय बीतने पर युवती ने मुस्तफा के घर जाने की ठानी और पूछना चाहा कि आखिर वह उससे क्यों दूरी बना रहा है। मगर, जब वह वहाँ पहुँची तो मुस्तफा के भाई और उसमें झगड़ा हो गया।

मुस्तफा का भाई जमील भी उससे लड़ाई करने लगा। यह सब करीब सुबह 4 बजे तक चलता रहा। इसके बाद मुस्तफा ने युवती को दिलासा दिया और उसे घर छोड़कर आने की बाद कही। लेकिन यह सब सिर्फ़ एक नाटक था। बाद में सैयद ने अपने भाई जमील के साथ मिलकर लड़की को चाकू से घोंपकर मौत के घाट उतारा और फिर दोनों उसे रेन बाजार में छोड़कर फरार हो गया।

पुलिस ने हत्या के केस में दोनों के ख़िलाफ़ उपयुक्त धाराओं में व एसएसी एसटी एक्ट के तहत मामला दर्ज किया है। शव को ओसमानिया अस्पताल पोस्टमार्टम के लिए भेजा गया है। अब आगे पुलिस हर संभव नजरिए से इस केस की जाँच कर रही है।

BSP MLA, उसकी पत्नी पर ₹754.24 करोड़ की धोखाधड़ी का केस दर्ज, सड़क बनाने के नाम पर लेते थे कर्जा

CBI ने सोमवार (अक्टूबर 20, 2020) को बैंक ऑफ इंडिया से धोखाधड़ी मामले में BSP MLA विनय शंकर तिवारी और उनकी पत्नी रीता तिवारी पर केस दर्ज किया है। पूरा मामला ₹754.24 करोड़ की फ्रॉड से जुड़ा है।

गोरखपुर के चिल्लूपुर से बसपा विधायक विनय शंकर तिवारी और उनकी पत्नी रीता तिवारी समेत गंगोत्री एंटरप्राइसेज व उसके निदेशक अजीत पांडे पर भी मामला दर्ज हुआ है।

अधिकारियों के अनुसार, एजेंसी ने सोमवार को अपनी जाँच हेतु छापेमारी की थी। उन्होंने गंगोत्री एंटरप्राइसेज के लखनऊ वाले दफ्तर और तिवारी के आवास पर भी अपनी छानबीन की थी। इसके अलावा नोएडा में भी छापा मारा गया।

सीबीआई टीम को छानबीन में कई अहम दस्तावेज हाथ लगे। इनमें कुछ फर्जी भी बताए जा रहे हैं। सीबीआई के प्रवक्ता ने बताया कि बैंक आफ इंडिया की ओर से शिकायत दर्ज कराई गई थी कि गंगोत्री इंटरप्राइजेज लिमिटेड के अधिकारियों ने बैंक को 753.24 करोड़ का नुकसान पहुँचाया। इन लोगों ने फर्जी दस्तावेज के सहारे बैंक से क्रेडिट लिया और फिर उस पैसे का इस्तेमाल दूसरी जगह किया गया।

प्रवक्ता ने बताया था कि उक्त कंपनी के महानगर स्थित कार्पोरेट ऑफिस है। यह कंपनी सड़कों के निर्माण, पुल और ओवर ब्रिज बनाने का काम करती है। कंपनी ने इसी तरह के काम के नाम पर बैंक से क्रेडिट लिया था।

बता दें कि कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में सूत्रों का हवाला देकर कहा जा रहा है कि इन पैसों को दूसरी कंपनी में डायवर्ट कर हेराफेरी की गई। इस धोखाधड़ी में गंगोत्री इंटरप्राइजेज के अलावा रायल एंपायर मार्केटिंग प्राइवेट लिमिटेड व कंदर्प होटर इंटरप्राइजेज भी शामिल हैं।

उल्लेखनीय है कि चिल्लूपुर से विधायक विनय कुमार तिवारी गोरखपुर के बाहुबली नेता हरिशंकर तिवारी के बेटे हैं। एक समय में हरिशंकर की पूरे प्रदेश में तूती बोलती थी। 6 बार चिल्लूपुर से विधायक बनने वाले हरिशंकर तिवारी का प्रदेश में इतना नाम था कि विधानसभा सीट का नाम ही तिवारी हो गया था। साल 2017 में हरिशंकर के बेटे विनयशंकर ने इस सीट को अपने नाम अर्जित किया था और इसके बाद अब उनकी सच्चाई उजागर हुई है।

इस मामले में सीबीआई की एंटी करप्शन ब्रांच, दिल्ली में एफआईआर दर्ज की गई है। इस एफआईआर में विनय शंकर तिवारी के अलावा उनकी पत्नी रीता तिवारी और अजीत पांडेय को भी नामजद किया गया है। रीता तिवारी रायल एम्पायर मार्केटिंग प्राइवेट लिमिटेड की निदेशक है।

‘कश्मीर टाइम्स’ अख़बार का श्रीनगर ऑफिस सील, सरकारी सम्पत्तियों पर कर रखा था कब्ज़ा

जम्मू कश्मीर की राजधानी श्रीनगर में ‘कश्मीर टाइम्स’ (Kashmir Times) के 2 दफ्तरों को सील कर दिया गया है। करीब 2 महीने पहले इसकी एग्जीक्यूटिव एडिटर अनुराधा भसीन को भी उनका आधिकारिक निवास खाली करने को कहा गया था। ‘कश्मीर टाइम्स’ प्रदेश के सबसे पुराने अख़बारों में से एक है। अनुराधा भसीन ने सुप्रीम कोर्ट में जम्मू कश्मीर को मिले विशेष राज्य का दर्जा वापस पाने के लिए याचिका भी दायर कर रखी है।

अपनी याचिका में भसीन ने जम्मू कश्मीर में ‘कम्युनिकेशन ब्लैकआउट’ का आरोप लगाते हुए माँग की थी कि संचार व्यवस्था को पूरी तरह बहाल किया जाए। उन्होंने सोशल मीडिया पर एक तस्वीर भी शेयर की, जिसमें जिसमें एस्टेट के अधिकारी मुस्ताक मेमोरियल प्रेस एंक्लेव में स्थित अखबार के दफ्तर में ताला जड़ रहे हैं, उसे सील कर रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि बिना किसी प्रक्रिया के तहत उनके दफ्तर को सील कर दिया गया है।

उन्होंने इसे बदले कि भावना से की गई कार्रवाई करार दिया। वहीं प्रशासन ने बताया है कि ‘कश्मीर टाइम्स’ के संस्थापक वेद भसीन को ये प्लॉट दिया गया था, जिसका अधिकार अब वापस ले लिया गया है। एस्टेट विभाग के डिप्टी डायरेक्टर मोहम्मद असलम ने ‘द इंडियन एक्स्प्रेस’ को बताया कि इन्हें दो संपत्तियाँ दी गई थीं – एक दफ्तर के लिए और एक दिवंगत वेद भसीन के निवास के लिए। इन्हें खाली करने के लिए पहले ही नोटिस जारी किया जा चुका था।

प्रशासन का कहना है कि ‘कश्मीर टाइम्स’ वालों ने खुद से ही इन संपत्तियों को उनके हवाले कर दिया और वो लोग औपचारिकताएँ पूरी करने के लिए वहाँ जा रहे हैं। वहीं अनुराधा भसीन का कहना है कि उन्हें कोई नोटिस या आदेश मिला ही नहीं। उनका कहना है कि कुछ ‘निचले स्तर’ के अधिकारी आते थे और सूचना देते थे कि अलॉटमेंट कैंसल कर दिया गया है। उन्होंने कहा कि दफ्तर जाने पर भी कोई नोटिस नहीं दिया गया, इसीलिए वो कोर्ट गए थे।

उन्होंने दावा किया कि जिस दफ्तर को सील किया गया है, वहाँ कंप्यूटर से लेकर सारी तकनीकी चीजें वहीं पर रखी हुई हैं। 90 के दशक में ही इस बिल्डिंग को ‘कश्मीर टाइम्स’ को दिया गया था। वहीं जम्मू कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूब मुफ्ती भी अब इसके समर्थन में उतर आई हैं। उन्होंने कहा कि ये भाजपा कि साजिश है, जिसके तहत वो उनसे असहमत होने वालों के साथ ऐसा कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि भारत सरकार के ‘अवैध और हानिकारक’ कार्रवाइयों के खिलाफ बोलने पर ऐसा किया जा रहा है।

इससे पहले भसीन ने आरोप लगाया था कि ‘कुछ गुंडे’ उनके फ्लैट में घुस गए थे और वो गहनों सहित सभी महँगे समान चुरा कर ले गए। उन्होंने इसके लिए पूर्व विधान पार्षद शहनाज़ गनाई के भाई इमरान गनाई को जिम्मेदार ठहराया। वो वज़ारत रोड स्थित उस सरकारी फ्लैट में 2000 से ही रह रही थीं। उन्होंने आरोप लगाया था कि उन चोरों के साथ कुछ पुलिसवाले भी थे। साथ ही कहा कि तस्वीरें क्लिक करने पर वो अपने चेहरे छिपा रहे थे।

वहीं पूर्व-मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्लाह ने भी प्रशासन की कार्रवाई का विरोध किया है। उन्होंने दावा किया कि इस कार्रवाई से पता चलता है कि क्यों हमारे कुछ ‘प्रतिष्ठित’ मीडिया संस्थानों ने सरकार का प्रवक्ता बनना स्वीकार कर लिया है। उन्होंने कहा कि ये मीडिया संस्थान सिर्फ सरकारी प्रेस रिलीज ही छापते हैं। उन्होंने कहा, “स्वतंत्र रेपोर्टिंग की कीमत ये है कि आपको बिना प्रक्रिया संपत्ति खाली करनी पड़ेगी।“

हाल ही में हिरासत से रिहा होने के बाद महबूबा मुफ़्ती ने कहा था कि जम्मू कश्मीर का कोई भी शख्स उस दिन की ‘डाकाजनी और बेइज्जती’ को कतई नहीं भूल सकता। जम्मू कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री ने लोगों को ये याद करने के लिए कहा था कि ‘दिल्ली दरबार’ ने अगस्त 5, 2019 को ‘असंवैधानिक, गैर-जम्हूरी और गैर-क़ानूनी’ तरीके से जो उनसे छीन लिया है, अब उसे वापस लेना होगा।

नेहरू के नेतृत्व में भारत ने खो दी 44000 वर्ग Km जमीन, बलिदान हो गए 3250 जवान: पटेल ने 12 साल पहले ही किया था आगाह

भारत और चीन ऐसे दो देश हैं, जिन्होंने आज से 58 वर्ष पहले युद्ध लड़ा था और आज भी सीमा पर माहौल तनावपूर्ण है। पाकिस्तान को तो हमेशा से भारत ने धूल चटाई है लेकिन चीन ने जब 1962 में भारत पर आक्रमण किया, तब जवाहरलाल नेहरू और उनके सारे ‘शांतिवादी दुनिया’ के मिथक धराशाई हो गए। अपने प्रधानमंत्रित्व काल के 16वें वर्ष में नेहरू को समझ आया कि देश की रक्षा नीति सटीक होनी चाहिए, सेना मजबूत व संसाधन संपन्न होनी चाहिए और हथियारों का निर्माण होना चाहिए।

लेकिन, तब तक देर हो चुकी थी। चीन की सेना ने अक्टूबर 20, 1962 को लद्दाख में और मैकमोहन रेखा के पार एक साथ हमले शुरू किए। चीन ने भारत को हरा दिया और हमारी सेना ने सीमित संसाधन और लचर राजनीतिक नेतृत्व के बावजूद इस युद्ध में अपना चरम पराक्रम दिखाया और ये सुनिश्चित किया कि देश को कम से कम नुकसान हो। देश का नेतृत्व उन्हीं नेहरू के हाथ में था, जिन्होंने ‘Scrap The Army’ जैसी शब्दावली का प्रयोग किया और ये वही सेना थी, जिसने तमाम उपेक्षाओं के बावजूद शक्तिशाली चीन का सामना किया।

भारत-चीन युद्ध की छोटी सी नींव: नेहरू ने सरदार पटेल की सलाह को नकारा

ऐसा नहीं है कि किसी को इस बात का अंदाज़ा नहीं था कि चीन भारत पर आक्रमण कर सकता है। एक व्यक्ति था, जिसने अपनी ज़िंदगी के अंतिम वर्ष में भी नेहरू को समझाने में कोई कसर नहीं छोड़ी कि तिब्बत पर सरकार की नीति क्या हो और चीन हमारे लिए कितना बड़ा खतरा है। 1950 में चीन ने तिब्बत पर आक्रमण कर के उस पर कब्ज़ा करने की शुरुआत कर दी। उनका नरसंहार तभी से चालू हो गया था।

नेहरू आँख बंद किए बैठे रहे। वरिष्ठ भारत-चीन विशेषज्ञ Claude Apri लिखते हैं कि न सिर्फ कॉन्ग्रेस के कई नेता बल्कि कई बड़े अधिकारी भी नेहरू की आत्मघाती ‘चीन तुष्टिकरण’ नीति से नाराज़ थे, लेकिन उन्होंने किसी की एक भी न सुनी। तत्कालीन उप-प्रधानमंत्री सरदार पटेल ने नवम्बर 11, 1950 में अपने अंतिम भाषण में तिब्बत और नेपाल के घटनाक्रम का जिक्र किया था। उन्होंने कहा था कि दुनिया में कोई भी देश तिब्बत जितना शांतिप्रिय नहीं है और चीन हथियार के बल पर ये निंदनीय हरकत कर रहा है।

उनका कहना था कि न तो चीन ने भारत की ये सलाह सुनी कि तिब्बत मुद्दे को शांतिप्रिय तरीके से हल किया जाए, और न ही भारत को लगता था कि चीन बल-प्रयोग करेगा। सरदार पटेल ने चेताया था कि जब कोई देश इस तरह अपनी सैन्य शक्ति के नशे में चूर रहता है तो वो किसी मुद्दे पर शांति से सोच-विचार नहीं करता। उन्होंने कहा था कि डरपोक नहीं बनना है, खतरों से नहीं भागना है। कलियुग में अहिंसा के बदले अहिंसा हो, लेकिन बल का जवाब बल से दिया जाए।

एक तरह से देखा जाए तो 1962 के भारत-चीन युद्ध की छोटी सी नींव तभी पड़ गई थी, जब भारत ने चुपचाप तिब्बत को उसके कब्जे में जाने दिया। अगर उस समय भारत आवाज़ उठाता तो हो सकता था कई देश उसके साथ आते। लेकिन, चीन ने भारत के बारे में समझ लिया कि वो कुछ भी करता रहेगा और वहाँ के राजनीतिक नेतृत्व के पास इसके खिलाफ जाने की हिम्मत तक नहीं है। खैर, नेहरू ने ‘स्वास्थ्य कारणों से’ दिसंबर 1950 में सरदार पटेल को एक तरह से कार्यमुक्त कर दिया।

नेहरू ने नहीं मानी थी सरदार पटेल की सलाह

सरदार पटेल जानते थे कि तिब्बत में जाकर चीनी सेना के बैठने का सीधा अर्थ है कि वहाँ से वो सीधा भारत के लिए खतरा पैदा करता रहेगा। तभी तो उन्होंने कहा था कि चीनी सेना का तिब्बत में घुसना भारतीय सैन्य कैलकुलेशंस को बर्बाद कर रहा है। उन्होंने चेताया था कि अब हमें अपनी सैन्य तैनातियों के खाके पर फिर से विचार करना पड़ेगा। तब विदेश मंत्रालय ने सेक्रेटरी जनरल गिरिजा शंकर बाजपेयी भी नेहरू से नाराज़ थे। नेहरू ने पटेल के पत्र को नजरअंदाज कर दिया। इसका दुष्परिणाम 12 साल बाद सिर उठा कर आया..

कैसे शुरू हुआ था भारत और चीन का युद्ध

अक्टूबर 20, 1962 – ये वो तारीख है, जब भारत और चीन का युद्ध शुरू हुआ। लेकिन, इसकी पटकथा काफी पहले से लिखी जा रही थी। अभी हमने इससे 12 साल पहले से समय की बात की। अब सीधा युद्ध शुरू होने के कारणों पर लौटते हैं। पर्वतराज हिमालय प्राचीन काल से ही भारत और इसके उत्तरी क्षेत्रों की सीमा रहा है। लेकिन, 40 के दशक में कम्युनिस्ट फ़ौज की सक्रियता और ब्रिटिश द्वारा भारत का नक्शा खींचने के बाद सब कुछ जैसे बदल सा गया।

सरदार पटेल का डर सही साबित हुआ और तिब्बत पर कब्जे के साथ ही चीन ने पूरे हिमालय पर ही अपना दावा ठोक दिया। वो हिमालय, जहाँ आदिकाल से हमारे ऋषि-मुनियों ने तपस्या की, वहाँ आध्यात्मिक एकांत की खोज की। पूर्व में भारत-चीन को अलग करने वाली मैकमोहन रेखा तक को चीन ने मानने से इनकार कर दिया। हालाँकि, दोनों देशों ने पंचशील पर हस्ताक्षर कर के जम्मू कश्मीर पर चीन के दावे को काफी हद तक रोकने की कोशिश की।

भारत निश्चिंत था लेकिन चीन के मन में खुराफात लगातार चल रही थी। अप्रैल 29, 1954 को पंचशील समझौते पर हस्ताक्षर हुए। चीन अरुणाचल प्रदेश पर अपना दावा करता रहा और नेहरू ‘हिंदी, चीनी भाई-भाई’ की ग़लतफ़हमी में अटके रहे। अक्साई चीन पर भी चीन ने अपना दवा ठोक डाला। 1956 में चीन के पहले प्रीमियर झोउ एनलाई ने कहा कि चीन किसी भी भारतीय क्षेत्र पर दावा नहीं करता। बाद में वो पलट गए।

भारत ने 1958 में अक्साई चीन को अपना हिस्सा बताया। उधर तिब्बत में हर प्रकार की विरोधी आवाज़ को कुचलने में चीनी फ़ौज लगी हुई थी। धर्मगुरु दलाई लामा को भाग कर भारत आना पड़ा। उन्होंने यहाँ आकर ही तिब्बत की सरकार का गठन किया। उसी साल अगस्त में ईस्टर्न सेक्टर में स्थित लोंगजू और अक्टूबर 1959 में वेस्टर्न सेक्टर में स्थित कोंग्का पास में भारत और चीन की सेनाएँ भिड़ीं। उनमें संघर्ष हुआ। नेहरू आँख मूँदे रहे।

चीन कह रहा था कि भारत तिब्बत में कोई बड़ी योजना बना रहा है। असल में वो बस थाह लेना चाहता था कि कहीं उसकी साम्राज्यवादी क्रियाकलापों में भारत कोई बाधा बन कर तो नहीं आएगा। नेहरू ने अक्साई चीन को भारत का हिस्सा आधिकारिक रूप से माना तो, लेकिन तिब्बत को लेकर उनके लचर रवैये ने चीन को ये एहसास दिलाया कि भारत अब कमजोर हो चुका है। 1961 में जब तक भारत की फॉरवर्ड पॉलिसी शुरू हुई, तब तक काफी देर हो चुकी थी।

1962: भारतीय सेना के जवानों ने दिखाया था अद्भुत पराक्रम

भारतीय सेना ने अपना अभियान शुरू किया और उनका उद्देश्य था कि आगे बढ़ रहे चीनियों को रोकने के लिए चेकपोस्ट बनाई जाए और उनकी सप्लाइज काटी जाए। 1962 आ गया। पहले 6 महीने में ही चीन के रवैये से लगता था कि वो युद्ध में उतर चुका है लेकिन भारत का केंद्रीय नेतृत्व सोया रहा। नेहरू को लगता था कि चीन कुछ भी कर ले लेकिन भारत के साथ युद्ध की जहमत नहीं उठाएगा।

नेहरू सरकार का मानना था कि छिटपुट संघर्ष ही होते रहेंगे क्योंकि चीन पूरी तरह युद्ध करने की स्थिति में है ही नहीं। आखिरकार चीन ने अरुणाचल प्रदेश और लद्दाख में हमला बोला। उसने वेस्टर्न सेक्टर में चिपचप वैली और ईस्टर्न सेक्टर में नामका चु नदी के पास के क्षेत्रों पर कब्ज़ा करने के लिए एक के बाद एक भारतीय चेकपॉट्स पर हमला बोला। रक्षा विशेषज्ञ आर सुकुमारन लिखते हैं कि इस युद्ध ने भारत की प्रतिष्ठा को कम कर दिया।

तब आईबी के निदेशक रहे बीएन मलिक ने कहा था कि ख़ुफ़िया एजेंसी की तरफ से मुख्यालय में सूचना भेज दी गई थी कि चीन के इरादे ठीक नहीं हैं। साथ ही ये भी बताया गया था कि पाकिस्तान भी मौका देख कर पश्चिम में धावा बोल सकता है। तत्कालीन रक्षा मंत्री ने वायुसेना और थलसेना प्रमुखों को तैयारियाँ करने का निर्देश दिया लेकिन पीएम नेहरू ने वायुसेना को आदेश दिया कि फाइटर एयरक्राफ्ट्स अंतरराष्ट्रीय सीमा के 24 किलोमीटर के दायरे में न उड़ाए जाएँ।

नेहरू का कहना था कि तनाव रोकने के लिए उन्होंने ये आदेश जारी किया है। भारत ने जिस तरह से उस वक़्त अमेरिका से मदद की अपील की थी, उससे उसकी प्रतिष्ठा को ठेस पहुँची क्योंकि देश में जो भी हो, विदेश में नेहरू ने अपनी अलग छवि बना रखी थी और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के कारण आज़ाद भारत की छवि भी ठीक थी। वायुसेना के फाइटर जेट्स का सहारा नहीं लिया गया। अन्यथा परिणाम शायद कुछ और हो सकते थे।

ये वो समय था, जब चीन को ताइवान के आक्रमण का भय भी सता रहा था। बावजूद इसके उसने भारत पर आक्रमण का निर्णय लिया। जनरल जीडी बक्शी लिखते हैं कि उस वक़्त युद्ध के बाद चीनी सेना के डिप्टी चीफ ने कहा था कि उनके देश की वायुसेना पश्चिमी देशों से 15 वर्ष पीछे है। यहाँ तक कि बाद में वियतनाम ने भी चीन को सबक सिखा दिया था। सही निर्णय न लेने के कारण भारत ये मौका चूक गया।

और ख़त्म हो गया युद्ध..

चीन ने 4 दिनों के भीतर ही भारत को अच्छा-खासा नुकसान पहुँचाया। वहाँ की सेना अक्टूबर 24, 1962 तक भारत में 15 किलोमीटर भीतर तक घुस चुकी थी। इसके बाद चीन ने दोनों सेनाओं के 20 किलोमीटर पीछे हटने और अक्साई चीन में यथास्थिति को बरक़रार रखने की पेशकश थी। उसका उद्देश्य पूरा हो चुका था। इसी बीच नवम्बर 14 को पंडित जवाहरलाल नेहरू का जन्मदिन भी आया। लेकिन, युद्ध फिर शुरू हो गया।

हालाँकि, इसके एक सप्ताह बाद चीन ने ही एकतरफा सीजफायर की घोषणा कर दी। लेकिन, इसके साथ ही भारत की 43,000 वर्ग किलोमीटर भूमि चीनियों के कब्जे में जा चुकी थी। भारत के 3250 जवान वीरगति को प्राप्त हो चुके थे। अब नेहरू को समझ आ रहा था कि सेना को शक्तिशाली बनाना क्यों ज़रूरी है। हथियारों की फैक्ट्री और परमाणु कार्यक्रम के लिए फंड्स जारी किए गए। सेना को आधुनिक बनाने की कवायद शुरू हुई।

पूर्व एयर मार्शल डेंजिल कीलोर दो टूक कहते हैं कि 1962 का युद्ध भारत केवल पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के कारण हारा। उन्होंने उस समय एयरफोर्स का समर्थन नहीं किया। न ही सेना के जवानों को गर्म कपड़े उपलब्ध कराए। भारत यदि हारा तो उसकी वजह नेहरू थे। उन्होंने कहा था कि 1962 के युद्ध में सेना के हाथ में कुछ नहीं था। वो युद्ध बेहद राजनीतिक था, जिसे नेहरू ने हारा। शुरू भी उन्होंने किया और हारे भी वे।

इसके डेढ़ साल बाद जवाहरलाल नेहरू भी देश को मँझधार में छोड़ कर चल बसे। अपने आखिरी दिनों में वो उदास रहा करते थे। अब तक उन्होंने जो भी गलतियाँ की थीं, चीन ने उन सबका एहसास उन्हें एक बार में ही दिला दिया था। भारत की रक्षा नीति में अमूल-चूल बदलाव आने शुरू हुए। लाल बाहदुर शास्त्री के काल में पाकिस्तान ने हमला किया और मुँह की खाई। इंदिरा गाँधी के समय में पाकिस्तान के दो टुकड़े हुए। वाजपेयी काल में कारगिल में उसे धूल चटाया गया। लेकिन, 1962 का दाग अब तक रह गया! अंत में जाते-जाते लेखक रघुवीर सहाय का ये आकलन, जो इस स्थिति का विवरण देता है:

“1950-60 के बीच नेहरू का प्रभाव शिखर पर था। मध्यमवर्ग की आकांक्षाएँ बढ़ने लगीं और पूँजीपति वर्ग की मशीनें भी ज्यादा उत्पादन देने लगीं और इसके साथ ही शासक राजनीतिक दल का अहंकार और आत्मविश्वास भी बढ़ता चला गया। हालाँकि, सामान्य जन इस विकास का खामोश दर्शक बना रहा। नए लेखन में भी यथार्थ और भ्रम के बीच की अथाह खाई को तब तक नहीं पहचाना गया, जब तक राष्ट्र को 1962 में चीन युद्ध का भारी झटका नहीं लगा। बताते हैं कि आत्मस्वीकृति के अंदाज़ में नेहरू ने ये स्वीकार किया था कि अब तक राष्ट्र एक स्वप्न में जीवित था और अब आधुनिकता की ओर धकेला गया है।”

जैसे आज सिनेमा है, तब वैसे ही साहित्य की मदद से नेहरू ने अपनी छवि चमकाई थी। इधर भारत बेहाल था। उन्होंने ऐसा माहौल बना दिया था, जिसमें सब को नेहरू की ही चिंता थी और देश की नहीं। जबकि नेहरू की उम्र ढल रही थी और देश की हालत खस्ता होते जा रही थी। खैर, बाद में इन्हीं रघुवीर सहाय ने लिखा था कि आज नेहरू नहीं हैं लेकिन देश है और पहले से ज्यादा मजबूत है क्योंकि अब उसे सिर्फ अपनी फ़िक्र करनी है।

कोविड मरीजों की खुशी के लिए डॉ. अरुप ने किया जबरदस्त डांस, उनके स्टेप्स के हुए ऋतिक रोशन भी कायल: देखें वीडियो

सोशल मीडिया पर एक वीडियो काफी चर्चा में है, इस वीडियो में एक डॉक्टर साल 2019 में आई फ़िल्म ‘वॉर’ (War) के गाने घुँघरू पर डांस कर रहे थे। फ़िल्म के दौरान इस गाने में ऋतिक रोशन और टाइगर श्रॉफ नज़र आए थे। डॉक्टर की पहचान अरुण सेनापति के रूप में हुई है। दरअसल, डॉक्टर ने असम स्थित सिलचर मेडिकल के कोरोना वार्ड में भर्ती मरीजों का मनोरंजन करने का फैसला लिया। 

डॉक्टर अरुप सेनापति ईएनटी सर्जन विशेषज्ञ (स्पेशलिस्ट) हैं और फ़िलहाल उनके इस डांस की सोशल मीडिया पर काफी चर्चा हो रही है। खासकर इस डांस के पीछे किए गए उनके प्रयास की जिसके तहत वह मरीजों को खुश करना चाहते थे। इस डांस का वीडियो उनके सहकर्मी डॉक्टर सैय्यद फैज़ान अहमद ने साझा किया था। रविवार (18 अक्टूबर 2020) को ट्विटर पर यह वीडियो साझा करते हुए उन्होंने लिखा- 

“मिलिए मेरे ड्यूटी सहकर्मी डॉक्टर अरुप सेनापति से जो कि असम के सिलचर मेडिकल कॉलेज में ईएनटी सर्जन हैं। वह कोरोना वायरस से प्रभावित मरीजों को खुश करने के लिए उनके सामने डांस कर रहे हैं।” ख़बर लिखे जाने तक ट्वीट पर लगभग 49.9 हज़ार लाइक्स थे और 1.4 हज़ार रीट्वीट।

ऋतिक रोशन ने की डांस की तारीफ़

सोशल मीडिया पर चर्चा का कारण बनने के बाद यह बॉलीवुड के मशहूर अभिनेता ऋतिक रोशन की निगाह में आया। डांस करने वाले डॉक्टर की तारीफ़ करते हुए ऋतिक रोशन ने अपने ट्वीट में लिखा, “डॉक्टर अरुप से कहिए मैं बहुत जल्द उनसे डांस स्टेप्स सीखने वाला हूँ। फिर किसी दिन असम में उनके उनके जैसा बेहतरीन डांस कर पाऊँ। अद्भुत ज़िंदादिली।”

कोरोना वायरस अभी तक आम लोगों के लिए चुनौती से कम नहीं है, ऐसे में एक डॉक्टर का पूरी सुरक्षित पोशाक में डांस करना सकारात्मक माहौल तैयार करता है। बहुत से लोगों के लिए ऐसे कठिन समय में यह हौसला बढ़ाने वाला वीडियो साबित होगा। ऐसी छोटी कोशिशों से ही समाज में ख़ुशियों का दायरा बढ़ता है।