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पूर्व PM मनमोहन के सलाहकार व NDTV पत्रकार ने फैलाया झूठ, कहा- चीन से भारत में होने वाला आयात 27% बढ़ा

पत्रकार पंकज पचौरी ने भारत-चीन तनाव के बीच झूठ फैलाया है। NDTV में 15 वर्षों तक काम कर चुके पंकज पचौरी ने दावा किया कि जहाँ सीमा पर ‘लाइन ऑफ एक्चुअल कण्ट्रोल (LAC)’ पर चीन के सामने भारत अपनी आँखें लाल कर रहा है और QUAD राष्ट्रों को चीन को घेरने के लिए आमंत्रित कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ चीन से होने वाले आयात (Imports) में अप्रैल-अगस्त के बीच 27% की बढ़ोतरी हुई है।

इसके साथ ही उन्होंने लिखा कि ‘राजनीति का कारोबार’ कभी भी ‘असली व्यापार’ के रास्ते का रोड़ा नहीं बन सकता, कभी नहीं। हालाँकि, ट्विटर पर ‘PIB फैक्ट-चेक’ ने उनके इस दावे की धज्जियाँ उड़ा दी। दरअसल, अप्रैल-अगस्त की अवधि में भारत में आयत नहीं, बल्कि भारत का निर्यात (Exports) इस अवधि में 27% बढ़ा है। यानी, भारत ने चीन को पिछली अवधि के मुकाबले ज्यादा सामान बेचा है।

यहाँ पंकज पचौरी आयात और निर्यात (Imports & Exports) के बीच का अंतर भूल बैठे और इस डेटा को बिना जाने-समझे ट्वीट कर दिया। ‘PIB फैक्ट-चेक’ ने इस दावे को फेक बताते हुए जानकारी दी कि चीन से भारत में होने वाले आयात में 27.63% की कमी आई है, न कि ये बढ़ा है। बढ़ा है तो निर्यात। अपनी पोल खुलने के बाद पंकज पचौरी दावा करने लगे कि कुछ भी हो, व्यापार तो बढ़ा है और वो इसी की बात कर रहे थे।

NDTV के मैनेजिंग एडिटर रहे पंकज पचौरी को डॉक्टर मनमोहन सिंह ने जनवरी 2012 में अपना मीडिया सलाहकार नियुक्त किया था। उन्हें ‘कम्युनिकेशंस एडवाइजर’ का पद दिया गया था। तब पीएम मनमोहन के मीडिया सलाहकार रहे हरीश खरे के इस्तीफे के बाद उन्हें इस पद पर लाया गया था। अब वो ‘GoNewsIndia’ नामक मीडिया पोर्टल चलाते हैं, जिसके संस्थापक भी वही हैं। उन्होंने कई दफा मनमोहन सरकार का बचाव भी किया था।

चीन की सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टी के मुखपत्र ‘ग्लोबल टाइम्स’ ने भी कहा था कि 1 साल में भारत-चीन के बीच व्यापार में 10.9% की कमी आई है। चीन के आँकड़े अनुसार, चीन से भारत में होने वाला आयात में 17.7% नीचे गिरा है। और भारत से चीन में भारत से होने वाला निर्यात इतना ही बढ़ा है। चीन इस बात से घबराया हुआ है कि कहीं भारत में उसका बाजार ख़त्म न हो जाए। हाल ही में भारत ने कई चीनी एप्लीकेशंस को बैन किया।

राहुल गाँधी ने ‘आइटम’ कमलनाथ की भाषा पर जताई आपत्ति, कमलनाथ ने कहा- ‘माफ़ी नहीं माँगूँगा, ये राहुल के विचार हैं’

कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी ने ‘आइटम’ वाले बयान को लेकर अपनी पार्टी के वरिष्ठ नेता और मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ को फटकार लगाई, तो उन्होंने भी पलट कर जवाब दे दिया। अपने संसदीय क्षेत्र वायनाड के दौरे पर गए राहुल गाँधी ने मीडिया से बातचीत करते हुए कहा कि कोई भी महिलाओं के साथ अभद्र व्यवहार नहीं कर सकता है और वो कमलनाथ के बयान से सहमत नहीं हैं।

राहुल गाँधी ने कहा कि उन्हें व्यक्तिगत रूप से कमलनाथ द्वारा प्रयोग में लाई गई भाषा पसंद नहीं है। उन्होंने कहा कि वो इस चीज की प्रशंसा नहीं करते हैं और महिलाओं के साथ किए जाने वाले व्यवहार में सभी को सुधार लाने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा, “महिलाएँ हमारी शान हैं।” उन्होंने कमलनाथ की टिप्पणी को ‘दुर्भाग्यपूर्ण’ बताते हुए कहा कि वो सामान्य बयान दे रहे हैं कि इस देश में हर स्तर पर सभी को महिलाओं के साथ किए जाने वाले व्यवहार में सुधार लाने की ज़रूरत है।

वहीं अब कमलनाथ ने भी अपनी पार्टी के पूर्व-अध्यक्ष के बयान पर प्रतिक्रिया दी है। मध्य प्रदेश कॉन्ग्रेस कमिटी के अध्यक्ष कमलनाथ ने कहा, “ये तो राहुल गाँधी की राय है। उन्हें जो समझाया गया कि मैंने किस सन्दर्भ में ये कहा था। मैं तो साफ़ कर चुका हूँ कि मैंने किस सन्दर्भ में ये कहा था। मैं क्यों माफ़ी माँगूँगा?” उन्होंने कहा कि वो पहले ही खेद प्रकट कर चुके हैं, अगर कोई उनके बयान से अपमानित महसूस कर रहा है तो।

बता दें कि मध्य प्रदेश के डबरा में कॉन्ग्रेस प्रत्याशी सुरेंद्र राजेश के लिए प्रचार करने पहुँचे पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने मंच से भाषण देते वक्त कहा था,

“सुरेंद्र राजेश हमारे उम्मीदवार हैं, सरल स्वभाव के सीधे-साधे हैं। यह उसके जैसे नहीं है, क्या है उसका नाम? मैं क्या उसका नाम लूँ आप तो उसको मुझसे ज्यादा अच्छे से जानते हैं, आपको तो मुझे पहले ही सावधान कर देना चाहिए था, यह क्या आइटम है।”

इमरती देवी, उन पूर्व विधायकों में से एक हैं जिन्होंने कॉन्ग्रेस छोड़ भारतीय जनता पार्टी का दामन थाम लिया था। इमरती देवी को ज्योतिरादित्य सिंधिया का कट्टर समर्थक माना जाता है। भाजपा नेता इमरती देवी को आइटम बोलने के बाद कॉन्ग्रेस नेता व पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ के कार्यालय से इस पर हास्यास्पद स्पष्टीकरण आया था। इसमें कहा गया था कि आइटम शब्द में कुछ भी आपत्तिजनक नहीं है। हर कोई ‘आइटम’ ही होता है।

गाय चाहिए तो ‘प्रदूषण सर्टिफिकेट’ लाइए: NGT ने गोशाला खोलने के लिए जारी किए नए दिशानिर्देश

किसानों को गाय पालने के लिए अब शहर या गाँव से 200 मीटर दूर कोई जगह चुननी होगी। सीपीसीबी (केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड) ने हाल में गौशाला और डेयरी फार्म के लिए दिशा निर्देश जारी किए हैं। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) ने राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) को यह जानकारी दी है।

नए दिशा-निर्देश के तहत शहर हो या गाँव, जहाँ आबादी होगी, उससे 200 मीटर की दूरी पर ही डेयरी फार्म और गौशाला खोलने की इजाजत मिलेगी। इनमें कहा गया है कि गौशाला और डेयरी खोलने के लिए नगर नियम व अन्य स्थानीय निकायों से वायु और जल अधिनियम के तहत मंजूरी लेनी होगी। इन दिशा निर्देशों को NGT(राष्ट्रीय हरित अधिकरण) ने भी मंजूरी दे दी है।

नए दिशा-निर्देशों के अनुसार, शहर हो या गाँव, आबादी वाले क्षेत्र से 200 मीटर की दूरी पर डेयरी फार्म और गौशाला खोलने की इजाजत के अलावा नदी, तालाब, झील के अलावा अस्पताल और शिक्षण संस्थानों से कम से कम 500 मीटर की दूरी पर ही कोई डेयरी फार्म या गौशाला खोल पाएगा। इसी तरह राष्ट्रीय राजमार्ग और नहरों से 200 मीटर की दूरी पर खोलने की इजाजत होगी।

एनजीटी ने गौशाला और डेयरी फार्म खोलने और इसके नियमन के लिए जारी दिशा-निर्देश को मंजूरी देते हुए इसे लागू करने की हरी झंडी दे दी है। एनजीटी प्रमुख जस्टिस एके गोयल की अगुवाई वाली पीठ के समक्ष डेयरी फार्म और गौशाला के नियमन के लिए तैयार की गई दिशा-निर्देश पेश करते हुए सीपीसीबी ने यह जानकारी दी है।

यह नए दिशा निर्देश ट्रिब्यूनल ने नुग्गेहाली जयसिम्हा की ओर से दाखिल याचिका के बाद जारी किए हैं जिनका सोशल मीडिया पर बहुत विरोध किया जा रहा है। 21 राज्यों ने नई दिशा-निर्देश को लागू करने पर सहमति दी है। जिन प्रदेशों ने इन निर्देशों को माना है उसमें कर्नाटक भी है।

ऐसे में गिरीश अल्वा जैसे सक्रिय सोशल मीडिया यूजर्स का कहना है कि अगर ऐसा नियम होगा जहाँ गायों को पालन के लिए पॉल्यूशन क्लियरेंस लेना पड़ेगा तो इसका सीधा प्रभाव किसानों की जिंदगी और गौशालाओं पर पड़ेगा। लोग इस बाबत सीएम येदियुरप्पा को, पशुपालन मंत्री को टैग करके इस आदेश को वापस लेने की गुहार लगा रहे हैं।

एक यूजर कहता है एनजीटी के दिशा निर्देश पर आधारित यह आदेश डेरी फार्म और गौशालाों पर लागू होगा। कई हद्द तक यह डेरी फार्म के लिए स्वीकार्य है मगर गौशालों के लिए यह बिलकुल स्वीकार्य नहीं है। इससे भ्रष्टाचार बढ़ेगा और गौशालाएँ बंद होंगी। लोगों को लग रहा है कि ऐसे आदेशों के पीछे बूचड़खाना चलाने वाली लॉबी की साजिश भी हो सकती है।

शिशिर हेगड़े लिखते हैं कि अगर गोशाला और किसानों को पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड से इजाजत लेनी पड़ेगी तो कोई भी आम आदमी गो पालन नहीं कर पाएगा। इस फैसले की निंदा होनी चाहिए और इस ‘अवैज्ञानिक’ फैसले को वापस लिया जाना चाहिए।

शिशिर पूछते हैं कि जब यह वैज्ञानिक रूप से सिद्ध हुआ है कि गो-पालन से वायु-जल प्रदूषण में नियंत्रण होता है तो यह बहुत दुखद है कि किसानों को अब गाय पालने से पहले प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की इजाजत लेनी होगी। वह 200 मीटर दूर डेयरी फार्म और गोशाला खोलने की बात कर कहते हैं कि इससे चोरो और कसाइयों को आसानी होगी। आखिर कैसे उस समय पशुओं का ख्याल रखा जा सकेगा? कैसे पशुओं की सुरक्षा सुनिश्चित होगी? और कौन गाय पालने वालों को उनके घर या गाँव से 200 किमी दूर जगह देगा? उनका कहना है कि ये सब ऐसा लग रहा है कि ये एक एजेंडा हो ताकि लोगों को गाय पालने से रोका जाए।

दिल्ली के 3 बड़े अस्पतालों ने एडमिट करने से किया इनकार: इलाज के अभाव में 7 महीने की मासूम ने तोड़ा दम, मामला हाईकोर्ट में

दिल्ली में एक बार फिर से लापरवाही वाली घटना सामने आई है। जिसमें एक सात महीने के मासूम ने इलाज न मिलने के कारण दम तोड़ दिया। बच्चे को मस्तिष्क में फोड़ा (मस्तिष्क में मवाद जमा हो जाना) था। परिजनों का आरोप है कि उन्होंने दिल्ली के लगभग तीन बड़े-बड़े सरकारी अस्पताल का दौरा किया, लेकिन किसी भी अस्पताल ने उसे एडमिट नहीं लिया, सभी ने इनकार कर दिया, जिसके बाद बच्चे की मौत हो गई।

बच्ची के माता-पिता ने दिल्ली उच्च न्यायालय (HC) का रुख किया और उसे 3 सितंबर को सफदरजंग अस्पताल में भर्ती कराने के लिए एक रिट याचिका दायर की, जहाँ उसी दिन उसका ऑपरेशन किया गया था, लेकिन दुर्भाग्य से कुछ ही घंटों बाद उसकी मृत्यु हो गई।

उसके माता-पिता ने बच्ची को उचित चिकित्सा उपचार दिलाने के लिए काफी हाथ-पैर मारे, जिसके बाद उसे सफदरजंग अस्पताल में भर्ती कराया गया, लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी।

मामला अभी भी अदालत में लंबित है और अस्पतालों को बच्ची को एडमिट करने से इनकार करने के कारणों के बारे में जवाब देने के लिए कहा गया है। बच्ची को सबसे पहले 17 अगस्त को बाबू जगजीवन राम अस्पताल के आपातकालीन विभाग में ले जाया गया। वह बुखार, उल्टी, दौरे, और सेंसरियम या स्पष्ट रूप से सोचने में असमर्थता से पीड़ित थी।

एक दिन बाद, बच्ची को उचित स्वास्थ्य देखभाल के लिए एक उच्च केंद्र में भेजा गया। उसे 18 अगस्त को रोहिणी के डॉ. बाबा साहेब अंबेडकर (BSA) अस्पताल में भर्ती कराया गया था, जहाँ डॉक्टरों ने उसे एंटीबायोटिक्स, तरल पदार्थ और एंटीकॉनवल्सेंट दिया था।

मस्तिष्क का अल्ट्रासाउंड करने के बाद डॉक्टरों ने न्यूरोसर्जरी का सुझाव दिया। सर्जरी के लिए उसके परिवार को राम मनोहर लोहिया (आरएमएल), कलावती सरन और चाचा नेहरू बाल चिकित्सालय जैसे अस्पतालों से संपर्क करने के लिए कहा गया।

माता-पिता ने आरएमएल, सफदरजंग, जीबी पंत और कलावती सरन अस्पतालों से संपर्क किया, लेकिन इन सभी ने स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए एडमिट करने से मना कर दिया। डॉक्टरों ने सर्जरी करने के लिए अपनी लाचारी जताई, बिना किसी उपचार के अगले तीन दिनों तक बच्चे को बीएसए अस्पताल में भर्ती रखा गया।

बाबा साहब अंबेडकर अस्पताल में भर्ती के दौरान बच्ची का प्राइवेट डाइग्नॉस्टिक लैबोरेट्री से कम्प्यूटेड टोमोग्राफी (सीटी) स्कैन कराया गया, तो मस्तिष्क में फोड़ा की बीमारी के बारे में पता चला। इसके बाद बीएसए अस्पताल के अधिकारियों ने उसे बेहतर स्वास्थ्य सुविधा में स्थानांतरित करने का फैसला किया, क्योंकि उसकी हालत खराब हो गई थी। उसे एक रेज़ीड़ेंट डॉक्टर के साथ एक एम्बुलेंस प्रदान की गई थी। हालाँकि, आरएमएल और जीबी पंत अस्पताल के अधिकारियों ने उसे एडमिट करने से इनकार कर दिया, और उसे वापस बीएसए अस्पताल में लाया गया।

इसके बाद माता-पिता ने दिल्ली उच्च न्यायालय (HC) का रुख किया और उसे 3 सितंबर को सफदरजंग अस्पताल में भर्ती कराने के लिए कहा गया, जहाँ उसी दिन उसका ऑपरेशन किया गया था, लेकिन दुर्भाग्य से ऑपरेशन के कुछ ही घंटों बाद उसकी मृत्यु हो गई। सफदरजंग अस्पताल के अधिकारियों ने अपने हलफनामे में कहा है कि उन्होंने मरीज को प्रवेश देने से कभी इनकार नहीं किया।

चाचा नेहरू बाल चिकित्सालय, जो दिल्ली के दो सबसे बड़े बाल रोग अस्पतालों में से एक है, के अधिकारियों ने दावा किया कि उनके पास बाल चिकित्सा न्यूरोसर्जरी की सुविधा नहीं थी।

आरएमएल अस्पताल के अधिकारियों ने जोर देकर कहा कि बच्चे को उपस्थित कर्मचारियों द्वारा उचित चिकित्सा सहायता दी गई थी और उसे बाल चिकित्सा न्यूरोसर्जरी आपातकाल में भेजा गया था, जहाँ उसे कथित तौर पर प्रवेश के लिए नहीं लाया गया था।

आरएमएल अस्पताल के दावे के विपरीत, मरीज के रजिस्ट्रेशन कार्ड में ‘कोई बिस्तर उपलब्ध नहीं है’ का बहाना दिया गया है। अदालत ने आरएमएल अस्पताल के अधिकारियों को अपने बयान में असमानता की व्याख्या करने के लिए एक और हलफनामा दायर करने का निर्देश दिया है।

UP: मनरेगा का वार्षिक लक्ष्य महज 6 माह में किया पूरा, 26.1 करोड़ कार्य दिवस बनाने का रिकॉर्ड

योगी सरकार के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश ने अपने नाम एक नया रिकॉर्ड दर्ज किया है। यह रिकॉर्ड महात्मा गाँधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार योजना (मनरेगा) के तहत 26.1 करोड़ मानव दिवस सृजन करने का है। इस योजना के तहत सालाना टारगेट 26 करोड़ का होता है। मगर इस वर्ष 6 महीने में ही प्रदेश ने अपना टारगेट हासिल कर लिया।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मनरेगा का वार्षिक लक्ष्य 6 महीने में पूर्ण किए जाने पर अपना संतोष व्यक्त करते हुए कल कहा कि कोरोना काल में ग्रामीण इलाकों में रोजगार के व्यापक अवसर सृजित करने के उद्देश्य से राज्य सरकार ने मनरेगा के कार्यों को प्राथमिकता से संचालित कराया।

उन्होंने बताया कि वित्तीय वर्ष 2020-21 में मनरेगा के माध्यम से 26 करोड़ मानव दिवस सृजन का लक्ष्य निर्धारित किया गया था। हालाँकि, इस लक्ष्य की 6 महीने में ही पूर्ति होते ही राज्य में अब तक मनरेगा के तहत 26.14 करोड़ मानव दिवस सृजित किए जा चुके हैं।

गौरतलब है कि पिछले कुछ सालों में राज्य ने यह आँकड़ा इतनी जल्दी नहीं पार किया था। डेटा बताता है कि इस स्कीम के तहत लोगों का पंजीकरण हर बार 1.03 करोड़ तक स्थिर होता था जिससे लगभग 5 करोड़ तक मानव दिवस निर्मित हो पाते। बावजूद इसके ग्रामीण विकास विभाग ने साल 2015-16 में 52.11%, 2016-17 में 48.11%, 2017-18 में 46.81%, 2018-2019 में 49.60% और 2019-2020 में 43.69% का लक्ष्य पूरा किया था।

टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर के अनुसार एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि यह आइडिया इसलिए था ताकि इसमें उन लोगों को शामिल किया जा सके जो सामाजिक आर्थिक सूचकांक में कम हैं। यह केंद्र द्वारा चिह्नित किए गए स्थायी लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए किया जा रहा है। यह पहली बार है कि राज्य ने केवल आधी अवधि में योजना का वार्षिक लक्ष्य प्राप्त किया है।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपने एक बयान में कहा कि महामारी के चरम के बीच ग्रामीण क्षेत्रों में वापस आने वाले प्रवासियों को रोजगार प्रदान करने में यह योजना काफी मददगार साबित हुई। वहीं एक सरकारी प्रवक्ता के अनुसार योगी आदित्यनाथ सरकार ने देशव्यापी लॉकडाउन की घोषणा के एक महीने बाद 21 अप्रैल से प्रवासियों को नौकरी देना शुरू कर दिया था।

‘बाबरी का बदला लिया जाएगा, CAA पर हम भारतीय मुस्लिमों के साथ’: ISIS की खतरनाक साजिश का खुलासा

खूँखार वैश्विक आतंकी संगठन ISIS ने अब भारत की तरफ अपनी नजरें गड़ाने की प्रक्रिया तेज कर दी है। अब उसने भारत के मुस्लिमों को बरगलाने की कोशिश शुरू कर दी है, जिसके तहत उन्हें हथियार उठाने के लिए भड़काया जा रहा है। साथ ही भारत के मुस्लिमों को बाबरी मस्जिद का विध्वंस भी याद दिलाया जा रहा है। राम मंदिर के निर्माण को लेकर खासकर मुस्लिम युवकों के मन में जहर भरा जा रहा है।

ये खुलासा ‘आजतक’ ने ISIS की डिजिटल मैगजीन के हवाले से किया है, जिससे इस आतंकी संगठन के भारत को लेकर खतरनाक इरादों की भनक लगती है। ‘वॉइस ऑफ इंडिया’ नामक इस मैगजीन के नौवें एडिशन में ये बातें कही गई हैं। इसमें बाबरी विध्वंस की तस्वीरों को दिखाते हुए मुस्लिमों को हथियार उठाने को कहा गया है। इसमें लिखा गया है कि अयोध्या में हुए बाबरी विध्वंस का का बदला लिया जाएगा।

साथ ही CAA के बहाने भारत को तोड़ने की साजिश में ISIS भी शामिल था, ऐसा इस मैगनीज में लिखी बातों से पता चलता है। आतंकी संगठन ने लिखा है कि वो ‘नागरिकता संशोधन क़ानून’ के खिलाफ हो रहे विरोध प्रदर्शनों में भारतीय मुस्लिमों के साथ खड़ा है। मुस्लिमों को सलाह दी गई है कि वो भारत सरकार के खिलाफ ‘जिहाद’ का रास्ता चुनें। साथ ही धमाकाया गया है कि जिन्हें ISIS के वसूलों पर यकीन नहीं, उन्हें मौत की सज़ा दी जाएगी।

मैगजीन में दावा किया गया है कि बाबरी मस्जिद का विध्वंस एक ऐसा कारण है, जिसके लिए इस्लामिक स्टेट के लड़ाके लड़ाई लड़ेंगे। बाबरी मस्जिद मामले में सभी आरोपितों के बरी होने के फैसले पर सवाल उठाते हुए मुस्लिमों से पूछा गया है, “क्या तुम हिंदुस्तान की अदालत का फैसला स्वीकार कर लोगे?” उसने लिखा है कि सरकार मुस्लिमों को बरगलाने की कोशिश कर रही है। इससे पहले भारत में ISIS की मैगजीन छपने वाले लोगों की गिरफ़्तारी भी हो चुकी है।

बता दें कि सितम्बर 30, 2020 को अयोध्या के बाबरी ध्वंस मामले में सीबीआई के स्पेशल जज एसके यादव ने 2000 पन्नों का जजमेंट (फैसला) दिया था। इस मामले में सभी आरोपितों को बरी कर दिया गया था। कोर्ट ने कहा था कि अयोध्या में बाबरी ध्वंस साजिशन नहीं हुआ, ये पूर्व-नियोजित नहीं था। इसे संगठन ने रोकने की भी कोशिश की, लेकिन घटना अचानक घट गई। 28 वर्षों में ये पहली बार हुआ, जब अयोध्या बाबरी मस्जिद ध्वंस मामले में किसी अदालत ने फैसला सुनाया।

मुंबई: पूर्व असिस्टेंट कमिश्नर इकबाल शेख ने ‘फेक TRP स्कैम’ में रिपब्लिक टीवी की रिपोर्टिंग रोकने के लिए अदालत की ली शरण

मुंबई पुलिस के पूर्व असिस्टेंट कमिश्नर इकबाल शेख ने मुंबई के एक कोर्ट में याचिका दायर कर रिपब्लिक टीवी, आर भारत और अर्नब गोस्वामी पर कथित TRP घोटाले की रिपोर्टिंग से रोक लगाने की माँग की है।

LiveLaw ने बताया कि मुंबई के पूर्व सहायक पुलिस आयुक्त इकबाल शेख द्वारा दायर मुकदमे में मुंबई पुलिस के खिलाफ ‘अपमानजनक रिपोर्ट’ के कारण हुई मानसिक पीड़ा के लिए 5 लाख रुपए की क्षतिपूर्ति की भी माँग की गई है।

इकबाल शेख ने याचिका में कहा, “..जब डिफेंडेंट नंबर 1 (अर्नब गोस्वामी) व्यक्तिगत रूप से इच्छुक पार्टी के तौर पर, मुंबई पुलिस पर बेईमान अधिकारियों का संगठन होने का आरोप लगाते हैं, तो यह मुद्दई के लिए काफी तकलीफदेह होती है, जिनके लिए मुंबई पुलिस उनका दिल और आत्मा है।” 

वकील आभा सिंह के माध्यम से दायर याचिका में आरोप लगाया गया है कि रिपब्लिक न्यूज नेटवर्क ने मुंबई पुलिस के खिलाफ एक ‘बदनामी अभियान’ शुरू किया है, जिसके कारण मुद्दई को गंभीर अपमान का सामना करना पड़ा है जो ‘मुंबई की शानदार पुलिस बल में अपनी विरासत पर गर्व करता है।’

इसमें कहा गया है, “मुद्दई ने कहा कि प्रतिवादी नंबर 1 ने दो सबसे लोकप्रिय टीवी चैनलों के मालिक के रूप में अपनी सीमा को स्थानांतरित कर दिया है और एडिटर-इन-चीफ होने के नाते अपने स्वयं के एजेंडे को चलाना शुरू कर दिया है, जो कि फिलहाल एक सांविधिक निकाय के तहत जाँच के अधीन है।”

आगे कहा गया है, “मुद्दई ने कहा कि रिपब्लिक टीवी चैनल इस मामले में एक वैधानिक जाँच के अधीन है और कानूनी रूप से गठित मंचों में उनकी स्थिति को भुनाने के लिए सभी कानूनी उपाय किए गए हैं। हालाँकि, कानून के तहत निर्धारित नियमों का पालन करने के बजाय यह कानून को अपने हाथों में ले रहे हैं और बड़े पैमाने पर मुंबई पुलिस को बदनाम करने की एकतरफा प्रक्रिया को अपनाया है। प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया एक्ट, 1965 के तहत प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया द्वारा जारी किए गए नॉर्म्स ऑफ़ जर्नलिस्टिक कंडक्ट के खुले और घोर उल्लंघन कर ये सारी बातें हो रही हैं।” 

गौरतलब है कि रिपब्लिक टीवी के खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द करने की याचिका पर सुनवाई करते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट ने सोमवार (अक्टूबर 19, 2020) को कहा था कि रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क के एडिटर-इन-चीफ अर्नब गोस्वामी TRP मामले में आरोपित नहीं हैं। इसके बाद रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क और अर्नब गोस्वामी की तरफ से इस मुद्दे पर प्रेस विज्ञप्ति जारी की गई। जिसमें उन्होंने मुंबई पुलिस कमिश्नर परमबीर सिंह पर 200 करोड़ के मानहानि के मुक़दमे की बात कही।   

सुनवाई के दौरान मुंबई पुलिस ने कोर्ट में परमबीर का सिंह का साथ देने से इनकार कर दिया था। कोर्ट में मुंबई पुलिस भी पीछे हट गई।  महाराष्ट्र सरकार और मुंबई पुलिस ने अदालत में यह बात स्वीकार ली कि टीआरपी मामले में दर्ज की गई एफ़आईआर में रिपब्लिक टीवी का नाम शामिल नहीं है। कोर्ट में उनके वकील ने भी माना कि रिपब्लिक आरोपित नहीं हैं। बता दें कि महाराष्ट्र राज्य और मुंबई पुलिस की तरफ से वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल पेश हुए थे।

फ्रांस में बैन होंगे 51 इस्लामी संगठन, Twitter पर भी कसी जा सकती है नकेल: शरणार्थी बन कर आया था हत्यारे का परिवार

फ्रांस में एक शिक्षक की इस्लामी कट्टरपंथी द्वारा हत्या किए जाने के बाद वहाँ कई इस्लामी संगठनों और इस्लामी कट्टरपंथी विचार रखने वाले लोगों के ठिकानों पर लगातार छापेमारी हो रही है। इस कार्रवाई में दर्जनों कट्टरपंथियों को गिरफ्तार किया गया है। इतिहास के शिक्षक सैमुअल पैटी की हत्या के बाद हो रही कार्रवाई में 15 लोगों को गिरफ्तार किया गया, जिनमें से 4 छात्र हैं। इसमें एक व्यक्ति हत्यारे से सम्पर्क में भी था।

ऑनलाइन हेट स्पीच के 80 मामलों में अलग-अलग जाँच चल रही है। साथ ही 51 इस्लामी संगठनों को प्रतिबंधित किए जाने पर विचार किया जा रहा है। इनमें कई बड़े संगठन भी शामिल हैं। इनमें से एक ‘ह्यूमेनिटेरियन एसोसिएशन बराकसिटी’ भी शामिल है, जिसने फ़्रांस के गृह मंत्री को भी पागल करार दिया है और कहा है कि उसके खिलाफ कोई सबूत न मिलने के बाद इस वारदात से उपजे इमोशंस का सहारा लेकर उसे निशाना बनाया जा रहा है।

साथ ही सरकारी वाचलिस्ट में आए 213 विदेशियों को भी देश से बाहर निकला जाएगा। इनमें से 150 पहले से ही जेल में हैं। इन सभी पर इस्लामी कट्टरवादी विचारधारा के अनुसरण का आरोप है। शिक्षक के खिलाफ जिसने भी लिखा या फिर हत्यारों का जिसने भी समर्थन किया, उन सभी को ट्रैक कर के गिरफ्तार किया जा रहा है। हत्यारे के परिवार के 4 लोगों को भी गिरफ्तार किया गया है। हत्यारे का नाम अब्दुल्लाख अँजोरोख है।

उसके मोबाइल फोन से शिक्षक सैमुअल की तस्वीर भी मिली है, जिसके साथ हत्यारे ने अपना जुर्म कबूल करते डाल रखा था। जब वो 6 साल का था, तभी वो शरणार्थी बन कर फ्रांस आ गया था। साथ ही जिस छात्र के पिता ने सोशल मीडिया पर शिक्षक के खिलाफ लिखा था और उसे बरखास्त करने की माँग की थी, उसे भी गिरफ्तार कर लिया गया है। अब्दुल्ला हमेशा ‘इस्लामोफोबिया’ के खिलाफ लड़ाई का दावा करता था और सोशल मीडिया पर सरकार के खिलाफ ‘समुदाय विशेष के साथ उसके रवैये’ को लेकर लिखता रहता था।

2011 में उसने बुर्के पर लगे प्रतिबंध के बाद विरोध प्रदर्शन भी किया था। साथ ही उक्त शिक्षक के खिलाफ फतवा जारी करने वाले संगठन को भी जाँच के दायरे में लिया गया है। फ्रांस के शिक्षकों का कहना है कि क्लास में मजहब के आधार पर तनाव का माहौल पहले से ही रहा है। शिक्षकों का कहना है कि वो डरेंगे नहीं और ‘सेकुलरिज्म’ के साथ-साथ ‘फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन’ की शिक्षा बच्चों को देते रहेंगे।

उधर वहाँ के 4 NGO ने ट्विटर के खिलाफ भी कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। हेट स्पीच पर लगाम लगाने में विफल रहने के कारण उसे कोर्ट में घसीटा गया है। हत्यारे का सन्देश और शिक्षक के मृत शरीर के साथ तस्वीर ट्विटर पर डाली गई थी, जिससे वहाँ के कई संगठन सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से खफा हैं। हत्यारे ने अपने ट्विटर अकाउंट से भी आपत्तिजनक चीजें डाली थीं। वहाँ के ये NGO सरकार के साथ खड़े हैं।

फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्क्रों ने भी इस घटना पर रोष जताया था। उन्होंने कहा था, “यह एक इस्लामी आतंकवादी हमला है। देश के हर नागरिक को इस चरमपंथ के विरोध में एक साथ आगे आना होगा। इसे किसी भी हालत में रोकना ही होगा क्योंकि यह हमारे देश के लिए बड़ा ख़तरा साबित हो सकता है।” उनकी सरकार के खिलाफ इस्लामी संगठन सोशल मीडिया पर आवाज़ उठा रहे हैं और कार्रवाई की निंदा कर रहे हैं।

बिहार का वो गाँव जहाँ कभी पूरे राज्य से आते थे कारोबारी, आज फेरी लगाने और पलायन को मजबूर

क्या बिहार से पलायन करने की मजबूरी को रोकने का इलाज बड़े कल-कारखाने ही हैं? क्या बड़ी इंडस्ट्रियों के बगैर राज्य में रोजगार का सृजन नहीं हो सकता?

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के एक बयान से यह बहस शुरू हुई है। नीतीश कुमार ने हाल ही में कहा था कि बड़े उद्योग उन राज्यों में लगते हैं जो समुद्र किनारे होते हैं। रोजगार को मुद्दा बनाने की कोशिश में लगी राजद इस बयान को लेकर नीतीश कुमार पर हमलावर है। लालू यादव ने ट्वीट कर पूछा है कि ‘बिहार में अब हिंद महासागर भेजऽल जाओ का?’

इन बयानबाजियों से इतर जमीनी हकीकत कुछ और है जो बताती है कि बिहार में कभी हर हिस्से के अपने उद्योग-धंधे थे। सरकारी उदासीनता की वजह से समय के साथ इन उद्योगों की अकाल मौत हो गई और जिनके पुरखे कभी कारीगर थे, वे मजदूर हो गए। पेट पालने के लिए पलायन उनकी मजबूरी हो गई। इस सूरत को बदलने के लिए न तो लालू प्रसाद यादव ने कुछ किया और न ही नीतीश कुमार ने इस दिशा में गंभीरता दिखाई। वोट के समीकरण भले अलग हों पर जमीन पर इस मोर्चे पर नीतीश कुमार के खिलाफ नाराजगी साफ दिखती भी है।

गया शहर से करीब 28 किमी दूर एक गाँव है केनार चट्टी। वजीरगंज विधानसभा क्षेत्र में पड़ने वाला यह गॉंव कभी कांसा और पीतल के बर्तन निर्माण के लिए जाना जाता था। गाँव के करीब 50 परिवार इस काम से सीधे तौर पर जुड़े थे। लेकिन, आज यह सिमट कर 5 घरों तक पहुँच गया है। जो परिवार इस पुश्तैनी काम से जुड़े हैं, अब उनके घर के भी कुछेक सदस्य मजदूरी वगैरह करने के लिए बाहर जाते हैं।

60 साल के राजमोहन कसेरा ने बताया, “20 साल पहले तक यहाँ करीब 50 परिवार इस काम से जुड़े थे। बाहर से व्यापारी माल लेने आते थे। पुराना माल लेकर वे भी आते थे जिसे हम लोग गलाकर रिपेयरिंग कर देते थे। अब यह काम दो-चार घर में होता है, वो भी लगन के हिसाब से बनता है। कुछ लोग फेरी करता है। कुछ लोग बाहर चले गए।”

उन्होंने बताया, “जब से में होश सँभाला हूँ सरकार से कोई फायदा नहीं हुआ है। बहुत से विधायक आए। यहाँ से फोटो भी ले गए। आश्वासन देकर गए आपका उद्योग बढ़ाएँगे। लेकिन फिर लौटकर नहीं आए। इससे हमलोगों का आशा टूट गया तो हमलोग दूसरा-दूसरा रोजगार करना शुरू कर​ दिए। पेट चलाने के लिए करना पड़ता है न। सरकारी मदद मिल जाए तो पहले 50 परिवार जो ये काम करते थे उनका उत्थान हो जाएगा।”

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करीब 25 साल पहले ब्याह कर इस गाँव में आई माला देवी ने बताया कि पहले पूरा घर इसी काम से जुड़ा रहता था। महिलाएँ भी सहयोग करती थीं। लेकिन अब पूॅंजी नहीं होने के कारण लोगों को दूसरा काम करना पड़ता है। वे कहती हैं, “जो हमलोगों का मदद करेगा उसको ही वोट पड़ेगा। जैसे मोदी सरकार है, ई हमलोगों को कुछ मदद किया है। पहले बिजली नहीं था। 5 साल पहले बिजली आई है… नीतीश कुमार मोदिए सरकार का आदमी है। लालू यादव ने कुछ नहीं दिया है।”

25 साल के पंकज कुमार का कहना है कि पहले से स्थिति सुधरी है। लेकिन रोजगार की त्रुटि है। सरकार यदि छोटे छोटे उद्योग पर ध्यान दे दे तो इसका भी समाधान निकल जाएगा।

यह केवल इकलौते केनार चट्टी का ही दर्द नहीं है। बिहार के हर इलाके इसी उपेक्षा की वजह से उजड़ गए। फिर भी बगैर रोडमैप के प्रचार के दौरान राजनीतिक दल और उनके उम्मीदवार जिस तरह रोजगार और इंडस्ट्री को लेकर बड़े-बड़े दावे और वादे कर रहे हैं, उससे तो नहीं लगता कि वे इस संकट के स्थायी समाधान को लेकर गंभीर हैं।

गरीबों का राशन तो खाया, गाय भैंस का चारा भी खा गए: बिहार में गरजे ‘स्टार प्रचारक’ योगी आदित्यनाथ

बिहार चुनावों के मद्देनजर आज (अक्टूबर 20, 2020) उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ बिहार में अलग-अलग इलाकों में आधा दर्जन से ज्यादा रैलियों को संबोधित करेंगे। उनकी रैली की शुरूआत 12 बजे कैमूर के रामगढ़ विधानसभा से हो चुकी है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बिहार के कैमूर में जनसभा को संबोधित किया। उनकी लोकप्रियता और माँग को देखते हुए योगी आदित्‍यनाथ को भाजपा ने बिहार चुनाव में स्‍टार प्रचारक बनाया है।

उन्होंने संबोधन भारत माता के उद्घोष और वंदे मातरम के नारे के साथ किया। उन्होंने कहा, “भगवान राम की जन्मभूमि से राम के गढ़ रामगढ़ में आया हूँ। त्रेत्तायुग में इसी रामगढ़ को तपोस्थली के रुप में भगवान ने चुना था।”

योगी आदित्यनाथ ने अपने संबोधन के दौरान जनता को बताया कि कैसे एनडीए सरकार बिहार के हित में लगी हुई है। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बनी बिहार की सरकार का लाभ कैसे प्रदेश को मिल रहा है। उन्होंने उन चुनावी वादों को गिनवाया जिसके बूते भाजपा ने प्रचंड बहुमत हासिल किया था और सरकार में रहते हुए उन्हें पूरा भी किया। फिर चाहे कश्मीर को आतंकवाद से मुक्त कराना हो या फिर राम मंदिर बनवाना हो।

उन्होंने बताया कि कैसे पीएम मोदी व नीतिश सरकार ने बिहार के गरीबों को मुफ्त राशन और गैस दिए। गरीबों को रोजगार दिए। बिन भेदभाव किए गरीबों को मकान भी मुहैया करवाया। योगी आदित्यनाथ बोले कि हमलोग देश की बात करते हैं, वे लोग मजहब की बात करते हैं। जिनके कारण आतंकवाद व नक्‍सलवाद फैला था, अब उन्‍हें मिटाना है।

अप्रत्यक्ष रूप से लालू यादव पर निशाना साधते हुए यूपी सीएम ने कहा कि राजद की सरकार ने गरीबों का राशन तो खाया साथ ही गाय और भैंस का चारा भी खा लिया। यूपी सीएम ने इस दौरान बताया कि कैसे उनकी सरकार ने पाकिस्तान के घर में घुसकर भी मारा और भगवान राम का मंदिर भी बनवा दिया। उन्होंने अपने संबोधन के दौरान राजद और कॉन्ग्रेस पर खूब तंज कसे और कहा कि उन्होंने शासन लंबे समय तक किया लेकिन उनका एजेंडा कुछ नहीं था।

योगी आदित्यनाथ ने कहा कि कोरोना संकट के बीच केंद्र और राज्य सरकार ने जनता को मुफ्त में राशन दिया, अगर राजद सरकार होती तो ऐसा नहीं हो पाता। उन्होंने कहा कि वह (भाजपा नेतृत्व वाली सरकार) लोग विकास की बात की करते हैं और दूसरा पक्ष केवल परिवार और जाति की बात करते हैं। योगी आदित्यनाथ ने कहा, “हम एक भारत-श्रेष्ठ भारत की बात करते हैं, लेकिन विरोधी कहते हैं कि देश के संसाधन पर एक ही विशेष मजहब का अधिकार है।”

सीएम योगी ने कहा, बिहार के सामने एक तरफ विकास का गठबंधन है, दूसरी तरफ भेदभाव वाला गठबंधन है। अब उसे सही गठबंधन का साथ चुनना है। कॉन्ग्रेस के एजेंडे में विकास कभी नहीं रहा है। मगर भाजपा सबका साथ सबका विकास की बात करते हैं। उन्होंने याद दिलाया नीतीश सरकार आने से पहले बिहार की क्या स्थिति थी, वह किसी से छिपी नहीं है। इस बार भी एनडीए बिहार में नीतीश कुमार के नेतृत्व में एक मजबूत सरकार बनाने जा रही है।

गौरतलब है कि बिहार में उत्तर प्रदेश के सीएम योगी आदित्यनाथ करीब 18 चुनावी सभाएँ करेंगे। यूपी सीएम की बिहार चुनावों के दौरान हर दिन तीन रैलियाँ होनी हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत अन्य बड़े नेताओं के बाद योगी आदित्यनाथ की रैलियों की सबसे अधिक माँग है।